Tuesday, 27 December 2011

एक्सट्रा धन बैंक में, लोग कानूनी फेरे में, code conduct, black money, income tex


उम्मीदवारों की ओर से सेकेंड लाइन लीडरों को बांटे जाने वाले काले धन को रोकने की कवायद

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला
आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद एक लाख रुपये से अधिक की नगदी लेकर चलने वालों पर की गई कार्रवाई से पकड़ा गया 'एक्सट्रा' धन जहां आयकर विभाग के माध्यम से फिर बैंक में चला गया, वहीं नगदी लेकर चलने वाले लोग कानून के फेरे में पड़ गए हैं।
आयकर विभाग के एक अधिकारी बताते हैं कि उनके पास केस आने के बाद पकड़ा गया धन बैंक में जमा करवा दिया जाता है। कंपनी अथवा संबंधित व्यक्ति के खातों की जांच की जाती है, कि क्या उक्त कंपनी ने नगद राशि अपनी किताबों में दर्ज करवाई है अथवा नहीं। इसके बाद विभाग कार्रवाई करता है।
दिलचस्प है कि पकड़ा गया ये पैसा विभाग की ओर से किए जाने वाले अन्य सर्वे अथवा छापेमारी से अलग है। इसमें मौके पर ही धनराशि का सरेंडर कर आरोपी अपने लिए पेनल्टी सहित टेक्स की राशि की जानकारी प्राप्त कर सकता है और जमा भी करवा सकता है। इसके साथ ही शेष राशि का प्रयोग एक नंबर के पैसे के रूप में कर सकता है। अधिकारी बताते हैं कि राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों व उनके समर्थकों पर चुनाव आयोग की ओर से चुनाव पर होने वाले क्षेत्रों में जारी किए गए निर्देश चुनावों में काला धन आने से रोकने और एक निश्चित सीमा से अधिक खर्च करने पर पाबंदी लगाने के लिए हैं। इसके तहत एक लाख रुपये से अधिक नगदी साथ लेकर चलने पर पाबंदी है।
वहीं एडवोकेट मनोज सोईन कहते हैं कि एक कानून तो यह कहता है कि 20 हजार रुपये से ऊपर का लेन-देन आप सिर्फ चेक से ही करेंगे, लेकिन बैंक से रकम इससे ऊपर की भी निकाली जाती है। कोई व्यक्ति ऐसा तभी करता है जब इमरजेंसी या कैजुअल्टी हो या फिर कोई सौदा करना हो। बैंक से निकले पैसों पर आयकर विभाग कुछ नहीं कर सकता। ठीक ऐसे ही यदि कोई व्यक्ति एक लाख या अधिक राशि के साथ पकड़ा जाता है तो पंजाब में उसका तर्क आढ़ती से पैसा लाने और उधारी चुकाने का होना लगभग तय है। ऐसे में व्यक्ति ने खुद ही विभाग के पास आढ़ती को बही सहित ले जाकर और एक ऐसे व्यक्ति को ले जाना होगा जो ये बताए कि हां उसने उधार दिया था और बस कहानी खत्म। हालांकि वे ये भी कहते हैं कि इस कानून से चुनाव दौरान सर्कुलेट होने वाला वो काला धन जरूर रुकेगा जो उम्मीदवार आगे सेकेंड लाइन लीडरों को बांटते हैं।
दूसरी और पटियाला डिवीजन के आयकर आयुक्त जीएस नेगी ने इस संबंध में किसी तरह की टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। कानूनी रूप से लगने वाली पेनाल्टी पर भी वे कुछ भी बोलने से इंकार करते हैं।

सर्दी से रुका गेहूं के पौधे का विकास, wheat, weather, winter,


गेहूं पर पीली कुंगी का खतरा अभी तक नहीं  यूरिया संयम से डालने की सलाह

भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में फसलों के लिए वरदान कहे जाने यहां के मौसम में थोड़ी सी भी गड़बड़ देश की विकास दर को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। दिसंबर मध्य के बाद भी बारिश न होने से पड़ रही सूखी सर्दी से फसल को नुकसान पहुंच रहा है। इससे गेहूं के पौधे का विकास मानो थम सा गया है।
इन दिनों होने वाली बारिश से पौधे की हल्की सिंचाई हो जाती है। इससे पत्ते पर जमा कोहरा व गर्द धुलने के साथ ही जड़ों को आक्सीजन मिल जाती है। इससे पौधे का विकास होता है। जबकि 'नक्का' तोड़ लगाए जाने वाले पानी से सिंचाई जरूरत से ज्यादा हो जाती है। जिससे जड़ों में पानी जमा हो जाता है और दम घुटने से पौधे का विकास तेजी से नहीं हो पाता।
कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान कहते हैं कि इन दिनों में ऐसा हर साल होता है। इसमें घबराने की जरूरत नहीं है। कई बार फसल के पीला पड़ते ही किसान ज्यादा मात्रा में यूरिया डाल कर अतिरिक्त प्रयास करते हैं। इससे पौधे झुलस जाते हैं। इस साल बीच-बीच में धूप निकलने से गेहूं की फसल पीली नहीं पड़ी। कुछ दिन में पारा चढ़ने पर हालात बदलने की पूरी संभावना है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया चलेगी और फिर जनवरी में पारा चढ़ने पर गेहूं की फसल खिल उठेगी। उनका कहना है कि जल्द आई बारिश अगेती बिजाई वाली गेहूं के लिए तो ठीक रही पर पछैती को मार सहनी पड़ रही है।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि गेहूं की फसल को प्रदेश में सबसे अधिक मार पहुंचाने वाली बीमारी पीली कुंगी का खतरा अभी तक कहीं भी देखने को नहीं मिला है। धुंध के बाद अगले दिन मौसम के खुल जाने के चलते दिन का तापमान बढ़ जाता है, जिससे नुकसान नहीं हुआ है। अगर इन दिनों बारिश हो जाए तो सोने पे सुहागा होगा। गेहूं के अभी तक बचे रहने के अलावा अन्य फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव पर वह कहते हैं कि सीजन में सब्जियों विशेष रूप से आलू-मटर पर कोहरा भारी पड़ सकता है।

Saturday, 24 December 2011

पिछड़ा शुतराणा और पिछड़ता चला गया, shutrana, punjab election, 2012,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
रेल मार्ग व किसी बड़े शहर से च्यादा दूरी होने के चलते शुतराणा विधान सभा क्षेत्र को वास्तविक  रूप से पिछड़ा क्षेत्र कहें तो गलत नहीं होगा। पंजाब हरियाणा सीमा पर बसे इस क्षेत्र में कोई बड़ा शहर भी नहीं आता। जिस घग्गर को सामने रख कर चुनाव लड़े जाते हैं वो तो जहां का तहां रहता है। अलबत्ता दोनों ही प्रमुख दलों के नेता अंतत: भावनात्मक मुद्दों की तलाश में रहते हैं। कौन क्या भला करेगा? इस पर चर्चा कम होती है जबकि किसके साथ कितना धक्का हुआ? इसे सामने जरूर रखा जाता है। हालांकि पिछले चुनाव में सबसे उपर डेरे का मुद्दा ही छाया रहा है।
वहीं इस क्षेत्र में बादशाह पुर बैल्ट के डेढ़ दर्जन गांव बाढ़ की मार तले हर साल आते हैं लेकिन बाढ़ नियंत्रण के उपाय नहीं किए गए, घग्गर नदी की बाढ़ के अलावा आम दिनों में नदी के प्रदूषित पानी से फसलों को होते रहे नुकसान के बारे में तो कभी विचार चर्चा ही नहीं हुई। हालांकि भूमिगत जल के प्रदूषित होने पर आरओ सिस्टम दिखने लगे है। इसी तरह पटियाला से समाना-पातड़ां-टोहाना होते हुए जाखल हरियाणा तक रेलवे लाइन बनाने का मुद्दा कांग्रेस ने उठाया जरूर पर अभी लगता है कि दिल्ली दूर है। हालांकि यहां की पातड़ां मंडी आटो मोबील क्षेत्र में प्रदेश की सबसे बड़ी मंडी कही जा सकती है लेकिन वह भी निजी क्षेत्र के दम पर सरकार का इसमें कोई योगदान नहीं है।

निसंदेह दूर दराज का क्षेत्र है: घग्गा
शिरोमणि अकाली दल से चुनाव लड़े व कांग्रेस की बेअंत सिंह सरकार में मंत्री रहे हमीर सिंह घग्गा कहते हैं कि दूर दराज का यह क्षेत्र खासा पिछड़ा है और जन प्रतिनिधत्व के साथ जब वे सत्ता में आए थे तब काफी विकास हुआ। लेकिन घग्गर की बाढ़ नियंत्रण दो राच्यों का मामला है और ऐसे ही रेलवे लिंक में कई अन्य मंत्रालय भी उलझे हैं। मुद्दा लगातार उठाया गया है।



सरकार मांग के विपरीत काम करती है: विधायक शुतराणा
कभी शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर चुनाव जीतते रहे निमर्ल सिंह शुतराणा आजकल कांग्रेस से विधायक हैं। क्षेत्र में विकास के नाम पर कहते हैं कि इस सरकार से जो कह दो ठीक उसका उल्टा करती है। केंद्र से बाढ़ नियंत्रण को जो पैसे आते हैं उसका प्रयोग भी नहीं कर पा रही और क्षेत्र हर साल बाढ़ की मार से जूझता है। बड़ी इंडस्ट्री तो दी नहीं जबकि मंडियों को भी नहीं सुधार सके।

क्या नहीं हुआ
-पटियाला से जाखल तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना सिरे नहीं चढ़ी
-घग्गर की बाढ़ का हल नहीं
-मंडियों के हालात में विशेष बदलाव नहीं
 

हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं: डा. आजाद, water supply and sanitation



भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम यूरोप से डेढ़ सौ साल पीछे हैं, जिस इंडस्ट्री को वहां प्रदूषण के चलते बंद कर दिया गया उसे हमारे यहां भेजा जा रहा है और हम प्राकृतिक कानून के विपरीत काम कर रहे हैं, यही वजह है कि पर्यावरण में सुधार की बजाए प्रदूषण का ग्राफ बढ़ रहा है। कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ व जाने माने पर्यावरणविद् डा. अमर सिंह आजाद पंजाब में पेयजल कि स्थिति पर अब तक की हर सरकार के साथ प्रदूषण नियंत्रण करने की जिम्मेदार संस्था को जम कर कोसते हैं।
कहते हैं कि पंजाब के अलावा हरियाणा व हिमाचल प्रदेश की इंडस्ट्री का टॉक्सिक जल, कई तरह के हैवी मैटल व रसायनिक ततवों के साथ और यहां के शहरों का सीवरेज लगातार दरिया व बरसाती नालों में उड़ेला जा रहा है। जो प्राकृति के नियम के विपरीत है। जो पानी एक बार ले लिया जाता है, उसे वापिस नदी अथवा नाले में नहीं डाला जाता, उस पानी का शोधन कर खेती में सिंचाई के लिए प्रयोग करना होता है। लेकिन यहां पर सारी इंडस्ट्री लगाई ही नदी किनारे जाती है, सरकार सोई रहती है और खुद अनुमति देती और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी सारी उम्र में एक भी इंडस्ट्री अथवा प्रदूषण फैलाने वाले को सजा नहीं दिलवा पाता।
डा. आजाद कहते हैं कि जिस पानी की कसमें खाई जाती थी और जिस पर गीत लिखे जाते थे, वो बहता पानी तो कई साल पहले गंदा कर दिया अब तो रिस कर धरती के नीचे पहुंचा पानी बीमारियां दे रहा है।
सरकार को परामर्श

डा. आजाद सलाह देते हैं कि सरकार को हर दिशा में काम करना होगा। नियम कानून को सख्ती से लागू करने के अलावा, घटिया और पुरानी पड़ चुकी तकनीक को पंजाब आने से रोकना होगा। जिससे शराब फैक्ट्रीयों की बाढ़ ना आए, कोयला आधारित थर्मल प्लांट ना आएं। पेस्टीसाइड व रसायनिक खादों का प्रयोग कम कर प्राकृतिक खेती की ओर जाना और शहरों में बड़े पैमाने पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने होंगे। तभी जीवन चक्र में प्रवेश कर चुके टॉक्सिक ततव निकाले जा सकेंगे अन्यथा कैंसर के रूप में ये फूटते रहेंगे।


पेय जल व सेनीटेशन :-पटियाला
कुल आबादी-18 लाख 92 हजार 282
शहरी- सात लाख, 62 हजार, तीन
ग्रामीण-11 लाख 37 हजार 130
-विश्व बैंक के प्रोजेक्ट के तहत पीने के स्वच्छ पानी की एक्सलरेटेड रूरल वाटर सप्लाई प्रोग्राम एआरडब्ल्यूएसपी के तहत हर ब्लाक में चार से पांच प्रोजेक्टों पर काम चल रहा है। कुल कमयूनिटी डिवेलपमेंट सीडी नाम से आठ ब्लाक हैं पांच सौ प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं 33 पर काम चल रहा है।
प्रोजेक्ट नाम-ओवर हैड वाटर रिजरवायर जिसे पानी की टंकी भी कह देते है। औसतन 30 लाख में बन रही है और एक टंकी से औसतन एक हजार की आबादी वाले गांव को सप्लाई,
- पीने के पानी का प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में सीवरेज का काम चालू होगा, अभी इक्का दुक्का पायलेट प्रोजेक्ट हैं। कुछ शर्तो के साथ इस पर काम होगा, तीन एकड़ जमीन हो, सैल्फ ससटेनेबल हो, पंचायत अथवा कमेटी के पास उचित आया हो, 70 फीसदी आबादी सेप्टिक टैंक का प्रयोग कर रही हो तभी सीवरेज की शुरुआत होगी
-टोबे को दुरुस्त करने के प्रोजेक्ट में हर ब्लाक में 25-25 गांव किए गए हैं
-पीने के पानी की व्यवस्था 2012 के अंत तक पूरी हो जाएगी, शहरी क्षेत्र में आबादी कवर है, लेकिन नहरी पानी राजपुरा में आता है। शेष में भूमिगत जल का ही प्रयोग होता है।
-पटियाला में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का वायदा पूरा नहीं हुआ, 131 करोड़ के सीवरेज प्रोजेक्ट पर दोनों ही पार्टियां दावे प्रति दावे कर रही हैं। भूपेश चट्ठा

चुनावी चटकारे:-chunavi chtkare


भूपेश चट्ठा, पटियाला

नेता जी का पर्सनल नंबर

-चुनाव सिर पर हैं और कई नेताओं का टिकट भी लगभग पक्का है पर पांच साल के आराम से पीछा नहीं छूटा है और ना ही पुराना हैंग ओवर उतर रहा है। ऐसे में एक पुराने कार्यकर्ता के मन में नेता जी के साथ पुराना प्यार जागा तो किसी तरह से रूटीन वाले नंबर पर ट्राई करने के बाद बात ना बनी तो नए मोबाइल नंबर का जुगाड़ कर लिया।
वहीं जब नंबर देने वाले ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और नेता जी का पर्सनल नंबर दे कर कह डाला ये पर्सनल नंबर है, खुद ही उठाएंगे, अगर जाग रहे हुए तो...

ये क्या मुसीबत है?

जिले के दक्षिणी हिस्से का एक विधान सभा क्षेत्र का कुछ हिस्सा किसी के जुगाड़ के चलते शहर के उत्तरी क्षेत्र तक आ गया है। चूंकि नेता जी क्षेत्र नया था ऐसे में नए लोगों के बीच तुरंत ही जाना पड़ा। खाली आने जाने का अब जमाना नहीं रहा ऐसे में आखिरी साल में काम करवाने भी जरूरी हैं, सो ईशारा मिलने के अगले ही दिन से भाग दौड़ शुरु हो गई। नेता जी ने सैंकिड लाइन की तलाश कर उनसे जरूरतें पूछी और अपने रसूख का इस्तेमाल कर संपर्क भी दे दिए पर सैकिंड लाइन के अपने मुद्दे होते हैं। बैठक में जब भी बात सिरे चढऩे को हो सैकिंड लाइन का प्रतिनिधि अपनी चला दिया करे। थोड़ी  ही देर में अफसरों को लोकतंत्र की शक्ति का अहसास हुआ तो नेताजी को भी लगा कि ये क्या मुसीबत है? पर साथ ही अपनी मजबूरी भी सामने आ गई तो कहने लगे ईनू हजे कर लेण दे।

चुनावी चटकारे

विवाह में नेता जरूर पर गनमैन घटे

विधान सभा चुनावों से पहले आए आखिरी  विवाह सीजन में नेता जी को अपने ही विधान सभा क्षेत्र की एक से दो हजार की गैदरिंग आराम से मिल रही है, और नेता जी ने भी अपने बंदे लगा रखे हैं कि किसी के यहां शगुन देने का काम रह ना जाए। ऐसे में जहां पिछले सीजन तक घर के ही अन्य लोग हाजरी लगाने जा रहे थे और ऐसे समारोहों में गनमैन कुछ च्यादा ही चमकते थे पर अब इसमें बदलाव आ गया है। समझदार हुए नेता जी कहते हैं कि अच्छा नहीं लगता, क्यों? दिलचस्प है कि अब लगभग हर निमंत्रण पत्र पर नेता जी खुद पहुंच रहे हैं और वो भी बिना या कम फौज के। इसके साथ ही साथ रहने वाले लोगों का पूरा ध्यान रखते हुए कैडर के कद के अनुसार पूरा समय दिया जाता है। गनमैनों को अब शक्ति प्रदर्शन के रूप में ना दिखा कर सुरक्षा के लिहाज से जरूरी तो बताया जाता है पर दूर खड़ा कर आम पब्लिक को मिलने देने में किसी तरह की परेशानी ना हो इस तरह की हिदायतें भी दी गई हैं। पर ये पब्लिक है सब जानती है...


चुनावी फीवर है नहीं उतरेगा
ावी लोकतंत्र में प्रत्यक्ष रूप से भाग लेने वालों को चुनावी फीवर होना आम है। दिलचस्प है पंजाब में विधान सभा के चुनाव लगाता
चुनावों में नेताओं कम से कम चुनाव सर्दियों में ही होते आ रहे हैं। इस बार के चुनाव के अलावा पिछले दो में भी सर्दी की भूमिका रही है। याद रहे कि इक्का दुक्का नेताओं को छोड़ दें तो शेष सभी वही हैं जो नब्बे के दशक के अंत में थे पर अब उनकी सेहत वैसी नहीं है जो तीन-चार चुनाव पहले हुआ करती थी। ऐसे में चुनावी फीवर का असर इस बार कुछ च्यादा है। शुगर-ब्लड प्रैशर-युरिक एसिड की कभी कभार होने वाली जांच अब दिनचर्या का हिस्सा बन गई है। परहेज भी पूरे हैं पर फीवर शरीर के उपरी हिस्से में है ऐसे में दवाओं का असर नहीं हो रहा जो फीवर उतार सके पर चैकअप जारी है।  


500 का शगुन 100 में चलता रहा

चुनावी चटकारे

मैं प्रधान हां

हाल ही में हुई एक के बाद एक रैली से उत्साहित एक नेता जी अपने चंद चुने हुए दोस्तों की टीम को लेकर थकान उतारने शॉपिंग माल में जा पहुंचे, पहले बात फिल्म देखने तक थी पर चूंकि थकान कुछ च्यादा थी सो शक्ति वाटर का इस्तेमाल करने की सलाह दे दी गई जिसे स्वीकार भी कर लिया गया। चूंकि मामला प्रधान जी का था तो माल में कुछ कायदे कानून किनारे कर सप्लाई कार तक सुनिश्चित कर दी गई। इतने में भीड़ में से गुजर रहा एक मोटर साइकिल कार से टकरा गया। बस फिर क्या था प्रधान जी पुरानी फार्म में आ गए और बंदा धुन दिया गया। पब्लिक भी आजकल जागरुक है ऐसे में विपक्ष भारी पड़ा तो प्रधान जी के दोस्त भी पिछली कार से आ गए, सत्ता समीकरण पूरे ना बैठे तो नेता जी ने पुलिस बुलवा ली अब नेता जी पहचाने नहीं जा रहे थे तो बताना पड़ा के मैं प्रधान हां। बताया जा रहा है कि देर रात बुजुर्गों ने बीच बचाव कर समझौता करवा दिया।

ये आचार संहिता कब लागू होगी?

एक ओर फटाफट काम निपटाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर से एक ही सवाल उठ रहा है कि ये चुनाव आचार संहिता कब लागू होगी? बात इसी महीने से शुरु होती है। फिर अंतिम सप्ताह तक जाती है, थोड़ी गणना और अपने चंडीगढ़ के खास बंदे का हवाला दिया जाता है, फिर एकदम से बताया जाता है कि 15 को हो जाएगी, जबकि सामने वाला अगर थोड़ा भी प्रशासन से जुड़ा हुआ है और पुराने चुनाव देख चुका है तो सेफ प्ले में बताया जाता है कि 20 से 24 दिसंबर के बीच लागू हो जाएगी। इस आंकड़े को मान भी लिया जाता है। अरे भई जो पांच साल में नहीं हुआ वो पांच दिन में क्या बदल जाएगा। कर लेने दो किसी के तो पल्ले पउ़ रहा है। बाकि कोड कंडक्ट ये अगर किसी को पता है तो वो अकेला चुनाव आयोग।

पांच दिन बाद पिक्चर क्लीयर होगी

विधान सभा चुनावों की तारीख तय नहीं हुई, चुनाव आचार संहिता लागू नहीं हुई, यहां तक की राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों को टिकट भी अलाट नहीं किए हैं लेकिन विधायक तो अलग, सरकार और मुख्यमंत्री तक के नामों की घोषणा हो रही है। हर दिन, हर गली मुहल्ले के साथ ही सरकार बदल भी रही है। ऐसे में अब एक नया जुमला चल निकला है कि नौकरशाही अभी नहीं बोल रही पर आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के पांच दिन बाद में पूरी पिक्चर क्लीयर हो जाएगी। दिलचस्प  है कि बाजारू विश्लेषकों को किसी तरह के सहायक आंकड़ों की भी जरूरत नहीं है।

भाई साहब मुझे भी एडजस्ट करो

आजकल नेताओं का खुद मिन्नत करने का दौर चल रहा है। जो कभी आलाकमान से सीधे व पारिवारिक संबंधों की बात करते थे इन दिनों में मिलने के लिए तरस रहे हैं। जिस किसी को इशारा हुआ है उसकी बांछे खिली हुई हैं, लेकिन जिस किसी के सामने इशारा हुआ है उसे लग रहा है कि वो दुनिया का सबसे सताया हुआ आदमी है, उसे लग रहा है कि पार्टी ने उसके साथ न्याय नहीं किया। दिलचस्प है कि इन लोगों में सबसे च्यादा संख्या उनकी है जिन्होंने अच्छे कैरियर के अवसर तलाशने पार्टी व नेता बदले हैं। इस पंक्ति के नेता जी का आलम ये है कि सूझ ही नहीं रहा कि किससे मदद के लिए कहें और किससे नहीं बस एक ही गुहार लग रही है कि भाई साहब मेरी मदद करो, ऐंवे तां धक्का है।

चुनावी चटकारे
प्रस्तुति:- भूपेश चट्ठा, पटियाला

फोटो बड़ी करवा लो
चुनावी सीजन में हर तरफ प्रचार तंत्र की बल्ले बल्ले हो रही है, मीडिया से लेकर सड़क किनारे हो रही पब्लिसिटी अब ड्राइंग रूम तक पहुंच गई है। छोटा हो या बड़ा पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, सिर गिनने वाले लोकतंत्र में हर कोई अपने मतलब के संपर्क सूत्र साधने में लगा है। इसमें सबसे च्यादा भूमिका तस्वीरें निभा रही है। बड़े नेता जी आपके पिताजी के भोग में आए या आपकी बहन की शादी में हर वो तस्वीर कीमती हो गई है जिसमें आपके सबसे करीब बैठे नेता जी आपसे बात करते दिखाई दे रहे हैं। दिलचस्प है कि लेमीनेशन पुरानी हो चुकी तस्वीरों को अब ना केवल बड़ा करवाया जा रहा है, बल्कि उन्हें ऐसे स्थान पर लगाया जाता है, जहां नेता जी से मिलने आने वाला पहले कुछ देर बैठ कर मन बना ले।

दो का टाइम था डेढ़ बजे आ गए रोटी भी...

शहर में एक बड़े नेता जी ने आना था समय भी व्यक्तिगत रूप से घोषित किया गया तो फोन सुनने वालों को लगा कि उन्हें च्यादा महत्वपूर्ण कार्यकर्ता समझ किसी विशेष चुनावी मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाया जा रहा है हो सकता है कि टिकट संबंधी ही चर्चा हो जाए ऐसे में दो का टाइम था तो जनता लंच छोड़ अगली पंक्ति में बैठने के लिए डेढ़ बजे ही पहुंचनी शुरु हो गई। बात तीन-चार बजे तक तो खास नहीं रही पर शाम साढ़े पांच बजे बैठक स्थल पर लाइटें लगनी शुरु हुई तो भूख भी बढऩे लगी और सर्द मौसम में रोटी और किसी पेय पदार्थ की याद आने लगी। इतना ही नहीं एक स्पष्ट वादी ने तो राजनीति को जलालत तक बता डाला और कहा कि की करिए बीओओएस बॉस हैं।

हुण साडी यारी सिधी पै गई ए

पटियाला: हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। लेकिन ये भी कहा जाता है कि जब वो दिन नहीं रहे तो ये भी नहीं रहेंगे। ठीक ऐसे ही हालात आजकल आनन फानन वाली राजनीतिक रिश्तेदारी में हो गए हैं जहां पहले करीबी रहे बंदे को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया जाता है और जब बात सीधी हो जाए तो सीढ़ी को हटा भी दिया जाता है, मानों सीढ़ी की कभी जरूरत ही नहीं पड़ेंगी। 'हुण साडी यारी सिधी पै गई एÓ के सिद्यांत पर चलने वाले  सेकंड लाइन नेतागिरी करने वाले के कुछ लोग अक्सर भूल जाते हैं कि अगर सीढ़ी ना रही तो उतरने  पर गिरने के चांस च्यादा रहेंगे।

कभी लिफाफे बांट पब्लिसिटी तो कभी फोन ना उठाना  

पटियाला : जिले के एक कद्दावर कहे जाने वाले नेताजी हर काम पैसे के दम पर ही करवाना चाहते हैं, हालांकि उनकी यही आदत पिछली बार छह महीने के लिए उन्हें कोप भवन में ले गई थी और अफसोस से ही बाहर नहीं निकल पाए थे। पर पुरानी आदतें हैं देरी से जाएंगी, जाएंगी भी या नहीं कहा नहीं जा सकता। अब भी नेता जी को जब जरूरत महसूस होती है तो वे लिफाफे बांट कर पब्लिसिटी की उम्मीद करते हैं तो कभी फोन भी खुद उठाना  पसंद करते, ऐसे में नेताजी के बंदों की तो मौजें हैं पर नेताजी का क्या होगा? कुछ नहीं कहा जा सकता पर इससे इतना तो तय है कि अपनी बात कहने हर बार लिफाफा भारी करना ही पड़ेगा नहीं तो...  

घग्गर की बाढ़, नियंत्रण दूसरे ही चरण में अटका, issues, punjab election, 2012, river ghagger,


...घग्गर का मुद्दा
सरकारें बदलती रहीं पर नहीं बदले हालात
-मात्र 17.5 किलोमीटर ही हो पाया चैनेलाइजेशन का काम
-अब केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए घोषित किया 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
पक्ष-विपक्ष में रहने वाला क्षेत्र का चुनाव लडऩे वाला हर वो नेता घग्गर की बाढ़ से निजात दिलाने की बात करता रहा है और ये सिलसिला संभव है कि आजादी के बाद से चला आ रहा है। सरकारें, विधायक और सांसद बदलते रहे पर घग्गर के आस पास रहने वालों के हालात नहीं बदले हैं।
हिमाचल प्रदेश के डग्शई से शुरु हो पाकिस्तान तक बहने वाली इस नदी से पंजाब-हरियाणा के अलावा राजस्थान भी प्रभावित होता है लेकिन सबसे ज्यादा मार पटियाला व संगरूर जिलों में करीब दो सौ किलोमीटर क्षेत्र पर पड़ती है। इस सबके बावजूद घग्गर की बाढ़ नियंत्रण का कार्य दूसरे ही चरण में अटक गया है। पहले चरण में खनौरी से मकरोड़ साहिब के बीच मात्र 17.5 किलोमीटर नदी के चैनेलाइजेशन का काम मुक म्मल हुआ है।
दूसरे चरण के 21.7 किलोमीटर में मकरोड़ साहिब से पंजाब के कड़ैल अथवा हरियाणा के जाखल तक चैनेलाइज करने के बाद अन्य सहायक नदियों के किनारे पक्के करने के प्रोजेक्ट शुरु होने थे। इसी क्रम में हरियाणा राज्य की ओर से अपने क्षेत्र में बांध बनाने को पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट में 70 गांवों के आठ फीट पानी में डूबने का हवाले दे आपत्ति जताई गई तो केंद्र की ओर से फरवरी में प्रोजेक्ट रोकने पर उपमुख्य मंत्री सुखबीर बादल ने इसी साल फरवरी में मूणक में लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।
इसके बाद केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट दिए जाने की घोषणा कर रखी है। इसमें डेरा बस्सी, बनूड़, राजपुरा, घनौर, पातड़ां, खनौरी, लहरा गागा, मूणक, फतेह गढ़ साहिब, नाभा, बसी पठाना, मंडीगोबिंद गढ़ के नाम शामिल हैं।

केंद्र सिर्फ बातें करता है: सेखों

पंजाब सरकार के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों कहते हैं कि ये लोग इजाजत ही नहीं दे रहे। केंद्र में बैठे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के मंत्री ही आगे नहीं बढऩे देते। केंद्रीय केबिनेट मंत्री जय राम रमेश से मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की मुलाकात के बाद हुई घोषणा पर वे कहते हैं कि सिर्फ बाते ही हैं। पौने तीन सौ करोड़ का प्रोजेक्ट बना कर भेजा था अभी तक मंजूरी नहीं आई है।

हमने पहला चरण पूरा करवाया: लाल सिंह

पूर्व सिंचाई मंत्री लाल सिंह कहते हैं कि पहले चरण के लिए नाबार्ड से 72 करोड़ रूपये मंजूर करवा और दस करोड़ अपनी सरकार से लगाने के बाद उन्होंने पहला चरण पूरा करवाया। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रोजेक्ट की नींव पत्थर रखा और पूरा भी करवाया। जिसमें दो पुल और दोनों ओर बांध पक्के करवाए। पंजाब में खनौरी से हरियाणा के जाखल तक कुल 40 किलोमीटर तक चैनेलाइज करने का कार्य था जिसे मौजूदा सरकार आगे नहीं बढ़ा सकी।

मंहगी हुई चीनी की मिठास पर सरकारी मिल रही ठंडी, issues, punjab election, 2012, patiala,


मुद्दा:- कोआपरेटिव चीनी मिल
-कर्मियों को नहीं मिला 23 महीनों से वेतन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
नाभा रोड़ स्थित जिले की इकलौती  कोआपरेटिव शुगर मिल पिछले चुनावों में समाना विधान सभा क्षेत्र के लिए खासी महत्वपूर्ण थी कारण था ढ़ाई सौ से च्यादा कर्मियों के परिवारों की वोटें, जिन्हें उन दिनों वेतन नहीं मिल रहा था, हालांकि गेहूं-धान से अलग हट गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों के बारे में किसी ने नहीं सोचा पर कर्मियों के धरने प्रदर्शन पर वायदे होते रहे। दिलचस्प है कि कोआपरेटिव क्षेत्र की रखड़ा शुगर मिल समाना विधान सभा क्षेत्र से बाहर हो कर पटियाला ग्रामीण का हिस्सा हो गई और चीनी की मिठास भी मंहगी होती रही पर सहकारी क्षेत्र की यह मिल ठंडी ही रही।
मिल के कर्मियों का 23 महीनों से वेतन अब भी बकाया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने काम नहीं किया पर मिल फिर भी नहीं चल पाई।

कब क्या हुआ?
 इसी सरकार के सहकारी मंत्री स्व. कैप्टन कंवलजीत सिंह 19 जनवरी 2008 को हुई बैठक में रखड़ा सहित राच्य की तीन मिलों को लीज पर देने निर्णय लिया था 30 सितंबर 2009 तक काम निपटा देना था। इसी साल कर्मियों को वेतन व दिवाली का बोनस भी मिला और यह इआदेश भी दजारी हुआ कि पुराने लोन की किश्त इसमें से ना काटी जाए। मिलों को शुगर हाउस बना कर यहां से एथनाल बाजार में बेचने और इनकी क्षमता को बढ़ाने का निर्णय हुआ। लेकिन कैप्टन कंवलजीत की 29 मार्च 2009 को मृत्यु के बाद मिलें एक बड़े अकाली नेता के हवाले हो गई और अब फिर बीओटी के आधार पर देने का निर्णय इसी दिसंबर में कैबिनेट की बैठक में लिया गया है।

बीओटी आधार पर देने का हुआ है निर्णय : रखड़ा

पूर्व विधायक व जिला योजना बोर्ड के चेयरमैन सुरजीत सिंह रखड़ा कहते हैं कि वे इस मिल के चेयरमैन रहे हैं और 2002 में कांग्रेस सरकार आने तक यही मिल डेढ़ सौ फीसदी क्षमता पर लाभ में काम कर रही थी लेकिन कांग्रेस सरकार के आने के बाद गन्ना गायब हो गया और मिल ठप्प हो गई। अब अकाली-भाजपा गठबंधन की सरकार ने कर्मियों को वीआरएस दे कर इस मिल को बिल्ट ओन आपरेट के सिद्यांत पर देने का निर्णय लिया है। कर्मियों के वेतन के सवाल पर वे कहते हैं कि करीब सौ लोगों का एक मामला न्यायालय में चल रहा है, जो बीओटी में तकनीकि अड़ंगा नहीं है।


दो बार उठाया विधान सभा में मुद्दा: ब्रहम महिंदरा

कांग्रेस के समाना से विधायक ब्रहम महिंदरा कहते हैं कि सरकार को चाहिए कि किसानों को गन्ने पर अधिक समर्थन मूल्य दें जिससे किसानों का भला हो और चीनी मिलों को भली प्रकार से चलाए जाने के अलावा आम आदमी को सस्ती चीनी मिलने का रास्ता भी कुछ कदम तय हो। वे कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि प्राइवेट सेक्टर में चीनी मिलें आराम से चल रही हैं जबकि कोआपरेटिव सेक्टर में कर्मियों को महीनों से वेतन ही नहीं दिया जा सका है। विधान सभा में कर्मियों के वेतन ना मिलने और मिल के बंद होने का मुद्दा वे दो बार उठा चुके हैं। क्षेत्र कि रखड़ा मिल पर पे कहते हैं कि इसे तो बेचने का प्रावधान भी सरकार ने एकबार कर दिया था, फिर ना जाने क्या हुआ कि ना मिल चली ना बिकी।

कोहरे की मार बिजली पर छह थर्मल यूनिट ट्रिप, fog, electricity, tripping,


-बठिंडा व मुक्तसर क्षेत्र में 66 केवीए की लाइनों के कंडक्टर मिलने से हुई गड़बड़ी
-दो चलाए, दो चल जाएंगे पर दो को लगेगा समय
-बिजली की कमी नहीं पर स्थिति ठीक होने में एक दो दिन: पावरकाम
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हर साल जनवरी महीने में उत्तरी ग्रिड पर ट्रिपिंग के मंडराने वाले खतरे ने इस साल दिसंबर अंत में ही दस्तक दे दी है। दक्षिणी पंजाब में कोहरे की मार बिजली सप्लाई की बड़ी लाइनों पर पडऩे से प्रदेश के छह थर्मल यूनिट ट्रिप कर गए हैं।
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि बठिंडा व मुक्तसर क्षेत्र में 66 केवीए की लाइनों पर कोहरा जमने से इनके कंडक्टर आपस में मिल गए जिससे यह गड़बड़ी हुई है। लाइनों पर दिवाली व पराली के प्रदूषण की डस्ट पर कोहरा जमने से अक्सर भारी हुई लाइनें परस्पर संपर्क में आने से उत्तरी ग्रिड पर ट्रिपिंग और उत्तर भारत में ब्लेक आउट का खतरा मंडराता है, लेकिन इस साल दिसंबर के आरंभ में हुई बारिश ने वो प्रदूषण तो धो डाला पर कोहरे की मार से फिर भी नहीं बच पाई।
 22 दिसंबर को सुबह तीन बजे हुई इस घटना के चलते श्री गुरु हरगोबिंद सिंह थमर्ल प्लांट लहरा मुहब्बत के चारो यूनिट और श्री गुरु नानक देव थमर्ल प्लांट बठिंडा के दो यूनिट ट्रिप कर गए, हालांकि इनमें से दो यूनिट शुक्रवार सुबह तक चला दिए गए हैं। पावरकाम के अधिकारी बताते हैं कि अगले 12 घंटों में दो यूनिट और चल जाएंगे पर शेष दो को चलाने में अभी समय और लग सकता है।
वहीं पावरकाम के प्रवक्ता कहते हैं कि राच्य के पास बिजली की कमी नहीं है। 900 लाख यूनिट के पास चल रही मांग की तुलना में उपलब्धता एक हजार लाख यूनिट के पार है। पंजाब 125 लाख यूनिट बिजली बैंकिंग के माध्यम से दे भी रहा है। पर एक दम से 1140 मेगावाट की आपूर्ति में कमी आने के बाद स्थिति के पूरी तरह से ठीक होने में एक दो दिन का समय लग सकता है। हालांकि अगले दो दिन सरकारी कार्यालयों में अवकाश के होने के चलते कट लगने की संभावना अब कम है।

रेलवे लाइन बिछाने चले थे 'स्टेशन' भी उखड़ गया,issues, punjab election, 2012, patiala,



मुद्दा: रेलवे लिंक
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पटियाला से जाखल तक रेलवे लिंक बना कर समाना और पातड़ां को जोडऩे का मुद्दा हालांकि अब पूरी तरह से चुनावी हो कर रह गया है, लेकिन चुनावों में रेलवे लाइन का लारा लगाने के दौर में समाना का 'स्टेशनÓ ही उखड़ गया। करीब दो साल पहले एक ही रात में हुई कार्रवाई के बाद से रेलवे लाइन की बात करने वालों को तो राहत मिल गई पर आम आदमी की समस्या और बढ़ गई है।
 रेलवे की ओर से पासर्ल व अन्य प्रकार की बुकिंग  के लिए समाना में 'स्टेशनÓ खोला गया था और ये स्टेशन रियासती काल की मौनो रेल के समय से यहां के लोगों को सेवाएं देता आ रहा था। जिस किराए की जगह पर उक्त स्टेशन दशकों से चलता रहा उक्त भूमि पर मालिकाना हक की लड़ाई में एक ही रात में सामान सड़क पर आ गया आजकल उसी जमीन पर बनी बिल्डिंग पर बैंक चल रहे हैं।  
 आतंकवाद की शुरुआत अथवा 70 के दशक के अंत में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह के कार्यकाल में जब स्व. संत राम सिंगला समाना से चुनाव लड़े तो पटियाला-समाना-पातड़ा-जाखल रेलवे लाइन का विचार आया जम कर वोटें भी पड़ी पिछड़े कहे जाने वाले क्षेत्र के लोगों को लगने लगा कि उनका गांव-खेत मैन रेल लाइन पर होगा, जमीन की कीमत बढ़ेगी और व्यापार का विकास होगा, लेकिन परिणाम आज सभी के सामने है, विधान सभा चुनावों में उठने वाला रेलवे लिंक का मुद्दा अब लोक सभा चुनावों तक पहुंच गया है, पर मामला हर बार स्र्वे शुरु होने के साथ ही सिमट जाता है।


क्या है मामला
 2005-06 के बाद से रेलवे में कंप्यूटरीकरण होने के बाद से आउट एजेंसी के नाम पर टिकट की बुकिंग बंद हो गई। अब सिर्फ उन्हीं स्थानों के टिकट दिए जाते हैं जहां रेलवे लाइन जा रही है और जो स्टेशन कंप्यूटर में फीड हैं। हालांकि इससे पहले तक समाना के लिए देश के किसी भी कोने से रेलवे टिकट लिया जा सकता था और सुबह शाम समाना तक आने जाने का प्रबंध रेलवे पीआरटीसी के माध्यम से करवाता था, इसी बस में पार्सल के साथ सवारियों के बैठने का प्रबंध होता था। पर अब ऐसा नहीं है। अंतिम किराया 13 रूपये बताया जा रहा है।




केंद्र का प्रोजेक्ट है जल्द शुरु होने की उम्मीद: ब्रहम महिंदरा

कांग्रेस के समाना से विधायक ब्रहम महिंदरा कहते हैं कि ये  केंद्र का प्रोजेक्ट है और हम इसका स्वागत करते हैं, प्रोजेक्ट अभी भी आस्तित्व में है, संभव है जल्द पूरा होगा, केंद्रीय रेलवे मंत्रालय ने स्र्वे किया है। उन्हें भी लोक सभा में सांसद परनीत कौर के माध्यम से मुद्दा उठाए जाने पर हर्ष हुआ है।

हमने केंद्र को लिखा है: रखड़ा

शिरोमणि अकाली दल से विधायक रहे, वर्तमान में हल्का इंचार्ज व जिला योजना बोर्ड के चेयरमैन सुरजीत सिंह रखड़ा कहते हैं कि उन्होंने केंद्र को इस बाबत लिखा है। क्षेत्र की जरूरतों व रेलवे लिंक बनने से खुलने वाली संभावनाओं पर विस्तार पूर्वक बताया है, पर बात आगे नहीं बढ़ सकी है।

18 साल, 18 गांव और सात बाढ़, पर साइफन नहीं, issues, punjab election, 2012, patiala,



 मुद्दा:- साइफन

-पंजाब के अकाली-भाजपाई व कांग्रेसी एकमत
-क्षेत्र के लोग मुआवजे की बजाए साइफन मांगते हैं पर मिलता मुआवजा ही है
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
सतलुज यमुना लिंक नहर से पंजाब ने क्या खोया ? और क्या पाया? ये चाहे अतीत का मुद्दा हो गया हो लेकिन इस नहर के जगह जगह से टूटने के बाद ये जिले के घन्नौर क्षेत्र में हर दूसरे तीसरे साल बाढ़ का कारण बनती आ रही है। 1993 में आई भयानक के बाढ़ के बाद के 18 सालों में अब तक सात बार बाढ़ आ चुकी है, लेकिन हर बार सरकार बदलने के बावजूद क्षेत्र के लोगों को बाढ़ से राहत दिलाने साइफन नहीं बनाए जा सके हैं।
दिलचस्प है कि पंजाब में चुनाव लडऩे वाले हर राजनीतिक दल चाहे वो शिरोमणि अकाली दल भारतीय जनता पार्टी गठबंधन हो या कांग्रेस दोनों ही भाखड़ा मैन लाइन की नरवाना ब्रांच पर लाछड़ू व फकीरमाजरा के पास साइफन बनाने को लेकर एकमत हैं। लेकिन 2004 में आई बाढ़ के बाद सेंट्रल वाटर कमीशन की टीम की जांच रिपोर्ट में दो साइफन व बाढ़ का पानी निकालने एक ड्रेन बनाए जाने को जरूरी बताए जाने के बावजूद साइफन का मामला इधर से उधर भटक रहा है।
वर्तमान सरकार के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों केंद्र व हरियाणा सरकार के सिर बाढ़ का ठीकरा फोडऩे के अलावा अपने मुख्यमंत्री के सुर में बोल पानी को पंजाब का प्राकृतिक संसाधन बता राजस्थान व हरियाणा से रायल्टी की मांग भी करते हैं। बताते हैं कि लगातार सीडब्ल्यूसी के पास मामला उठाने के बावजूद हरियाणा पैसे जमा नहीं करवा रहा। चूंकि हरियाणा ही इस नहर का सबसे बड़ा लाभपात्री है ऐसे में ये जिम्मेदारी भी उसकी बनती है।
वहीं पूर्व सिंचाई व ऊर्जा मंत्री लाल सिंह याद कर कहते हैं कि उनके कार्यकाल में इस नहर पर साइफन बनाए जाने के अलावा माइक्रो हाइडल प्रोजेक्ट बनाने का निर्णय लिया था, लेकिन हरियाणा ने यह कह कर अड़ंगा लगा दिया कि पानी उसके पास आ रहा है इसलिए बिजली में हिस्सा दिया जाए।

11 करोड़ मुआवजे पर खर्च पर आठ करोड़ का साइफन नहीं बना

 2004 में एसवाईएल और बीएमएल नहरों के बीच फंसे गावों के लोगों ने मुआवजा लेने से इंकार करते हुए साइफन बनाए जाने की मांग रखी। यह भी तय था कि 15 से 22 दिन के बीच साइफन अथवा सुपर पैसेज बन जाएगा और इतने ही दिन नहर बंद रहेगी, लेकिन सरकारों ने 11 करोड़ रूपये मुआवजे के बांट दिए लेकिन उन दिनों के आठ करोड़ रूपये का साइफन फिर अटक गया।

दोनों राच्यों ने रद्द किए समझौते

इंटर स्टेट कहे जाने वाले पानी के मामले पर पंजाब विधान सभा में कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में प्रस्ताव पारित कर पंजाब टर्मिनेशन आफ एग्रीमेंट एक्ट 2004 लागू कर पानी पर हुए सभी समझौते रद्द कर दिए गए तो इसके डेढ़ साल के भीतर हरियाणा ने भी कुछ ऐसा ही कर लिया गया। तब भी वहां कांग्रेस की ही सरकार थी।



भाखड़ा मैन लाइन व नरवाना ब्रांच

1950 से 1954 के बीच बनाई गई 164 किलोमीटर लंबी बीएमएल का 159 किमी हिस्सा पंजाब व शेष हरियाणा में है। इससे पानी लेने वालों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के अलावा पीने के पानी की सप्लाई दिल्ली व चंडीगढ़ को भी की जाती है। वर्ष 2004 में इसकी क्षमता को बढ़ा कर 12 हजार 455 क्यूसिक कर दिया गया। बीएमएल में से निकली  98 किमी लंबी नरवाना ब्रांच में से 45 किमी पंजाब में से गुजरती है। 4500 क्यूसिक क्षमता की इस नहर से 4022 क्यूसिक पानी अकेला हरियाणा लेता है। इसके 1256 किमी लंबे चैनलों से सात लाख 35 हजार 463 एकड़ क्षेत्र कवर होता है।

शहर में डेयरियां, गई दोनों भेंस पानी में, issues, punjab election, 2012, patiala,



मुद्दा :
भूपेश चट्ठा, पटियाला
सर गंगा राम के डिजाइन किए गए अपने बेहतरीन सीवरेज सिस्टम पर फर्ख करने वाले एतिहासिक शहर पटियाला में आबादी के कई गुणा बढऩे के बाद सीवरेज सिस्टम ही सबसे बड़ी समस्या बन गया। लगातार दो सरकारों ने यहां के सीवर पर से डेयरियों के गोबर का वजन कम करने के 'संजीदाÓ प्रयास किए लेकिन ना जाने क्यों शहर की भेंसे तो परकोटे से बाहर नहीं निकल पाई और कांग्रेस व शिरोमणि अकाली दल दोनों के ही प्रयास पानी में जाते रहें हैं।
दोनों दल चाहे एक दूसरे पर कितने भी आरोप प्रत्यारोप लगाएं या दावे प्रति दावे करें पर अंतत: परिणाम वही निकले कि शहर के आम आदमी का मसला नहीं सुलझाया जा सका और दोनों ही बार भेंस पानी में चली गई और निकाली नहीं जा सकी।
शहर में सात सौ से अधिक डेयरियां हैं और प्रत्येक डेयरी में पशुओं की संख्या 10-20 से लेकर 70-80 तक है और नाले के आस पास बनी इन डेयरियों में से हर रोज टनों के हिसाब से गोबर कवर किए गए नाले में धकेल दिया जाता है।
दिलचस्प है कि नाला कवर करने के बाद 24 जून 2005 को अबलोवाल के पास 15 एकड़ जमीन पर शहर की डेयरियों को स्थापित करने के प्रोजेक्ट का  शिलान्यास किया गया। इस जमीन में पांच एकड़ जगह वन विभाग की आ गई तो काम रुक गया। फिर दोनों नदियों के बीच घलोड़ी रकबे की जमीन में लेजाने का ब्लू प्रिंट बना लेकिन ड्रेनेज विभाग ने बड़ी नदी के दूसरी ओर का किनारा ना होने का हवाला दे अनुमति नहीं दी तो रुख फिर नानक सर गुरुद्वारा की ओर किया गया अब फिर अबलोवाल की तैयारी चल रही है। जहां गोबर गैस प्लांट से लेकर अन्य सुविधाएं विकसित करने बुकिंग के पैसों का उपयोग करने की बात हो रही पर इन दिनों में डेयरी एसोसिएशन का दवाब समूह भी काम कर रहा है। इस पर भी पार पाना होगा।


नक्शा तैयार है जल्द मिलेंगे प्लाट: मेयर

शहर के वर्तमान मेयर अजीतपाल सिंह कोहली कहते हैं कि पूरे प्रोजेक्ट का नक्शा तैयार है, 100 से 500 गज के प्लाट जल्द मिलने शुरु हो जाएंगे। इससे मिली राशि से ही क्षेत्र विकसित किया जाएगा। वन विभाग से विवाद वाली जमीन को अलग कर लिया गया है। पहले चरण में शहर की बाहरी कालोनियों की डेयरियों को अबलोवाल में शिफ्ट कर, इसे 107 करोड़ के सीवरेज प्रोजेक्ट के साथ जोड़ दिया जाएगा। शेष के लिए अलग जगह तलाशी जाएगी। देरी पर वे कहते हैं कि पीने का पानी उपलब्ध करवाना च्यादा जरूरी था और आप विवादास्पद जमीन पर नया प्रोजेक्ट नहीं लगा सकते थे।


...पर सरकार बदल गई: पूर्व मेयर

कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में मेयर रहे विष्णु शर्मा कहते हैं कि उनके समय में जमीन आदि लेकर प्रोजेक्ट का शिलान्यास कर दिया गया था पर सरकार बदल गई और इन लोगों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। अब इतने दिन ही नहीं बचे हैं कि कुछ किया जा सके, आदर्श चुनाव आचार संहिता लगने को है।

पटियाला-चंडीगढ़ किलर रोड फोर लेन नहीं हुई issues, patiala to chandigarh, killer road, election,


-कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में घोषणा होती रही
-अब अकालियों ने घोषणा को चंडीगढ़-पटियाला-बठिंडा तक बढ़ाया

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पटियाला-चंडीगढ़ रोड का 60-70 किमी का रास्ता कभी 45 मिनट में तय होता था, लेकिन बढ़ते ट्रैफिक ने यह समय बढ़ाकर दोगुणा कर दिया। कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार वर्ष 2002 में आई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री को अपने गृह जिले व गृह नगर से राजधानी तक जाने में परेशानी होने लगी। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 20 मिनट की दूरी कम करने स्वयं तो हैलीकाप्टर का रास्ता चुन लिया, पर आम लोगों के लिए सड़क को फोर लेन करने की घोषणा कर दी। वादा किया गया कि जल्दी ही सड़क फोर लेन होगी, सड़क के बीच डिवाइडर होगा और दोनों और दो-दो गाडिय़ां आसानी से निकल सकेंगी।
अब इस सड़क पर चंडीगढ़ तक जाने में दो जगह पर 15-15 रूपये के टोल टेक्स के साथ बिल्ट ओन आपरेट के सिद्धांत पर निजी क्षेत्र के हवाले करने का प्रस्ताव केंद्रीय भूतल मंत्रालय के पास भेजा गया है। राष्ट्रीय राज्य मार्ग 64 नंबर होने के चलते संभवत: केंद्रीय मंजूरी के बाद काम कब चालू हो पाएगा? कहा नहीं जा सकता।
 18 से 24 फुट चौड़ी सड़क पर दुर्घटनाएं बढ़ती रही और सड़क को किलर रोड का नाम मिल गया। शोर ज्यादा मचा तो सड़क को चौड़ा करने का कार्य शुरू हुआ। साढ़े 17 करोड़ रूपये की लागत से पांच सात फुट सड़क चौड़ी भी हो गई। अब तीन गाडिय़ां निकलने लायक हो गईं। लेकिन अब हालात फिर वहीं आ गए हैं। जब डेढ़ से दो घंटे का सफर हो गया है। और तो और क्षेत्र में नए वाहनों का हो रहा रजिस्ट्रेशन तेजी से बढ़ता जा रहा है।
मालवा बेल्ट से अकाली भाजपा गठबंधन को पिछले विधान सभा चुनाव में कड़ी हार का सामना करना पड़ा तो गठबंधन सरकार ने घोषणा का सिलसिला पटियाला से और डेढ़ सौ किलोमीटर आगे बढ़ते हुए बठिंडा तक कर दिया, वादा किया गया कि चंडीगढ़ से बठिंडा तक एक्सप्रेस हाईवे बनाया जाएगा।
 पटियाला शहर से बहादुरगढ़ तक सड़क फोर लेन है, राजपुरा में भी थोड़ा क्षेत्र फोर लेन का है। बनूड़ में भी शहरी आबादी वाला हिस्सा फोर लेन हो चुका है। ऐसे ही स्थिति जीरकपुर से पहले और बाद में चंडीगढ़ तक की है। मामला तो इन फोर लेन वाली सड़कों को आपस में मिलाने भर का रह गया जो पूरा नहीं हो सका।


 हमने पीआईडीबी से सड़क चौड़ी करवाई: बाजवा

कांग्रेस सरकार में लोक निर्माण मंत्री रहे प्रताप सिंह बाजवा कहते हैं कि उनके कार्यकाल में पंजाब इंफ्रास्ट्रक्चर डवलेपमेंट बोर्ड से इस सड़क को उस वक्त की जरूरत अनुसार चौड़ा करवाया था, फिर चंडीगढ़ से बठिंडा तक का प्रोजेक्ट केंद्रीय मंत्रालय के हवाले कर नैशनल हाई वे अथारिटी से फोर लेन करवाने का प्रावधान कर दिया लेकिन अब समझ में नहीं आता कि आखिर इन लोगों ने वापिस  राच्य के पास पीआईडीबी से टोल टेक्स वाला प्रोजेक्ट करवाने का क्यों मन बनाया? अब दोनों ही पूरे नहीं हुए, जबकि सड़क पर ट्रैफिक लगातार बढ़ रहा है।

कैप्टन अमरिंदर को चुनौती नहीं, भाई ने भी मांगा टिकट, ticket, punjab election, 2012, patiala,


टिकट की टिकटिक पटियाला
-चार अकालियों सुरजीत रखड़ा को समाना, तेजिंदर संधू को सनौर, हरप्रीत कौर मुखमेलपुर को घनौर व कुलदीप कौर को पटियाला ग्रामीण से मिली थापी
-पटियाला ग्रामीण से विधायक ब्रहम महिंदरा, काका रणदीप एक ही केंद्रीय गुरु कमलनाथ के चेले कांग्रेस की दौड़ में
-राजपुरा से भाजपा के राजखुराना, सनौर से कांग्रेस के लाल सिंह का लगभग तय
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश कांग्रेस के प्रधान व पूर्व मुख्य मंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की पटियाला शहरी सीट के लिए कांग्रेस की ओर से किसी ने उन्हें चुनौती नहीं दी है हालांकि उनके भाई राजा मालविंदर सिंह ने साथ लगती पटियाला ग्रामीण सीट के लिए दावेदारी ठोकी है। वे स्व. राजीव गांधी के सहपाठी रहे हैं।
 वहीं पटियाला जिले में शिरोमणि अकाली दल ने भी अपने चार उम्मीदवारों सुरजीत रखड़ा को समाना, तेजिंदर संधू को सनौर, हरप्रीत कौर मुखमेलपुर को घनौर व कुलदीप कौर टोहड़ा को पटियाला ग्रामीण से 'थापीÓ दे दी गई है। इसके अलावा शुतराणा से बनिंदर कौर लूंबा के नाम के साथ अकालियों ने जिले में आठ में से पांच नाम तय कर दिए हैं। जबकि कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ संभव है एक बार फिर कोहली परिवार में से ही किसी को शहीद किया जाएगा।
इसी क्रम में समाना से टूट कर नाभा के 32 गांवों के साथ बनी पटियाला ग्रामीण से विधायक ब्रहम महिंदरा व काका रणदीप एक ही केंद्रीय गुरु कमलनाथ के चेले कांग्रेस की दौड़ में हैं। नाभा सीट के आरक्षित होने पर काका रणदीप बेघर हुए हैं तो ब्रहम महिंदरा का बहावलपुर बिरादरी के चलते तगड़ा वोट बैंक है।
 राजपुरा से भारतीय जनता पार्टी के लिए राजखुराना को हलके विरोध के बावजूद टिकट मिलना तय है। हालांकि भाजपा के हरजीत ग्रेवाल के दौरे यहां पर बढ़े हुए हैं। ऐसे ही सनौर से कांग्रेस के लाल सिंह का प्रतिद्वंदी नही है। हालांकि घनौर व राजपुरा को साथ मिला कर तीन कंबोज को टिकट देती है या नहीं ये अभी प्रश्न ही है। ऐसी स्थिति में परनीत कौर करीबी हरदयाल कंबोज राजपुरा से और मदन लाल जलालपुर घनौर से कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे। घनौर से पूर्व मंत्री जसजीत रंधावा अमलोह की ओर कूच कर गए हैं।

दिलचस्प है कि समाना से कांग्रेस टिकट के लिए जहां ब्रहम महिंदरा ने अपने पत्ते नहीं फैंकें हैं वहीं पूर्व वित्त मंत्री सुरिंदर सिंगला, राजा मालविंदर सिंह, जगतार सिंह राजला भी जुगत में हैं।
 नाभा से कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत व रणधीर सिंह लिबड़ा में कश्मकश जारी है तो यहां से अकाली दल मक्खन सिंह लालका को उतार सकता है। जबकि कांग्रेस शुतराणा से दो बार के विधायक निर्मल सिंह शुतराणा पर ही दांव लगाना पसंद करेगी।

Friday, 23 December 2011

कांग्रेसी, अकाली, भाजपाई और निर्दलीय सभी जीते, एक सीट खाली भी, punjab election, 2012, patiala,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
राज्य की सत्ता में दो सबसे महत्वपूर्ण जिलों में से एक पटियाला में जहां तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ एक निर्दलीय ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रखी है, वहीं यही प्रदेश का एक मात्र जिला है जहां ऐसे आंकड़ों के साथ एक सीट खाली भी पड़ी है। पटियाला ग्रामीण के नाम से बनी सीट पहली बार अपना विधायक तय करेगी।
पिछले चुनावों के बाद बने राजनीतिक हालातों पर 'दैनिक जागरणÓ  की विशेष रिपोर्ट


1 पटियाला शहर
-विधायक कैप्टन अमरिंदर सिंह-कांग्रेस

हिंदु बहुल सीट पर पूर्व मुख्य मंत्री व प्रदेश कांग्रेस के प्रधान कैप्टन अमरिंदर को पाकिस्तान से आए रिफयूजी सिखों का समर्थन मिलता रहा है। अकाली दल को उम्मीदवार तलाशने में भी दिक्कत होती है, जीत का अंतर कांग्रेस लगातार बढ़ा रही है। संभावित अकाली उम्मीदवार में पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह कोहली हो सकते हैं। 22 हजार वोटों का अंतर पाट पानी मुश्किल है।
मुद्दा:-कैप्टन अमरिंदर की दमदार छवि



2 पटियाला ग्रामीण
सीट खाली
-इस बार ही समाना विधान सभा क्षेत्र के हिस्से को काट कर बनाया गया है। कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री व पांच बार के विधायक ब्रहम महिंदरा उम्मीदवार हो सकते हैं। बहावलपुरी बिरादरी के 20-25 हजार वोट प्रत्यक्ष रूप से उनके खाते में जाते हैं। अकाली दल की ओर से पंथ रत्न जत्थेदार स्व. टोहरा के जंवाई व पूर्व मंत्री हरमेल सिंह टोहरा को हाल ही के क्षेत्र के संगत दर्शन में प्रकाश सिंह बादल ने प्रमुखता दी थी। अगर भाजपा के साथ कोई सीटों का आदान प्रदान हो तो राजपुरा से विधायक राज खुराना को बहावलपुरी बिरादरी के चलते उतारा जा सकता है।
मुद्दा:-विकास के दावे प्रति दावे

3 समाना
-विधायक ब्रहम महिंदरा-कांग्रेस
तकनीकि रूप से अकाली दल की सीट कही जा सकती है, अकाली दल के हल्का इंचार्ज सुरजीत सिंह रखड़ा की सुखबीर बादल घोषणा कर चुके हैं, रिफ्यूजी जट्ट सिखों में पैठ रखने वाले हैरी मान कहीं एडजस्ट ना हुए तो 15 से 20 हजार वोटों के साथ समीकरण बदल सकते हैं। कांग्रेस के संत राम सिंगला चुनाव लडऩे की घोषणा कर चुके हैं, कैप्टन अमरिंदर सिंह के भाई मालविंदर सिंह भी दावा जताते रहे हैं, कांग्रेस में आए पूर्व विधायक जगतार सिंह राजला भी सीट पर अपना हक समझते हैं।
मुद्दा:-विकास यहां मुद्दा नहीं है

4 सन्नौर-पुरने नाम डकाला का अधिकांश क्षेत्र
-विधायक लाल सिंह-कांग्रेस
कंबोज बिरादरी की वोटों के दम पर सात बार विधान सभा में पहुंचे हैं, अकाली दल की ओर से पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने स्मर्थकों के रास्ते अपना नाम उछाला है पर हरमेल सिंह टोहरा की पिछले बार की उम्मीदवारी अभी कायम है। प्रो. चंदूमाजरा को पिछले चुनाव में लहरागागा से उतारे जाने पर यहां से उनके समर्थक बड़ी संख्या में कूच कर गए और इतने ही अंतर से हरमेल हार गए। हरमेल और चंदूमाजरा एक दूसरे के लिए अड़ंगा रहेंगे।
मुद्दा:- घग्गर की बाढ़, हांसी बुटाना का जिन्न


5 घनौर
-विधायक मदन लाल जलालपुर, निर्दलीय

निर्दलीय के रूप में जीते पहले अकाली हुए आजकल कांग्रेसी हैं। जिले में अगर कांग्रेस तीसरे कंबोज को टिकट देने का जोखिम उठाती है तो उनका नाम कांग्रेस के पूर्व मंत्री जसजीत सिंह रंधावा से आगे होगा। अकाली दल से पूर्व मंत्री अजैब सिंह मुखमैलपुर उम्मीदवार हो सकते हैं, लेकिन अकाली दल से ही पांच बार विधायक रहे जसदेव सिंह संधू के पुत्र व एसएस बोर्ड के पूर्व चेयरमैन तेजिंदर पाल सिंह संधू सरेआम पिता की बरसी पर बादल के सामने चुनाव लडऩे की घोषणा कर चुके हैं।
मुकाबला यहां भी तिकौना ही रहेगा, लेकिन निर्दलीय के स्थान पर पंजाब पीपल्स पार्टी का नाम आ सकता है। संधू संभावित पीपीपी के उम्मीदवार होंगे, यह भी संभव है कि अकाली दल हरमेल टोहरा के पुत्र को टिकट सन्नौर अथवा पटियाला ग्रामीण से टिकट दे कर मुखमैलपुर को भी शांत कर दे, मुखमैलपुर की बेटी हरमेल के लड़के को ब्याही है।
मुद्दा:- बाढ़ व परिवारिक समिकरण

6 राजपुरा
-विधायक राज खुराना-भारतीय जनता पार्टी
राज खुराना के हालात पहले जैसे नहीं रहे, लेकिन कांग्रेस के हरदयाल कंबोज भी बाहरी होने का लेबल नहीं हटवा पाए हैं। महारानी परनीत कौर के करीबी होने के चलते किसी भी स्थानीय कांग्रेसी का नाम हटवा कर टिकट उन्हें टिकट मिलता है, तो बढ़त तभी बना सकते हैं यदि अकाली दल एसजीपीसी सदस्य सुरजीत सिंह गढ़ी को नहीं उतारती है। अकाली दल के लिए चंदूमाजरा फैक्टर उनके गांव की वजह से भी काम करेगा, उनके समर्थक आगे हुए तो कांग्रेस को उनके नेगेटिव रवैये के चलते लाभ होगा, यहां हिंदू व सिखों का मामला भाजपा की जगह अकाली दल के उतरने पर कांग्रेस को लाभ होगा।
मुद्दा:-बहावलपुर बिरादरी और बाहरी उम्मीदवार

7 नाभा
-विधायक काका रणदीप सिंह-कांग्रेस

अब इसे आरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। दोनों ही दलों के उम्मीदवार क्षेत्र में नए होंगे, कांग्रेस के अमलोह से विधायक  साधू सिंह धर्मसोत को बाजीगर बिरादरी का वोट बैंक उनके पक्ष में है। अकाली दल नए चेहरे मक्खन सिंह लालका पर दांव लगा सकता है। दिलचस्प है कि इस बार यहां पर तिकौना मुकाबला आरक्षित सीट हो जाने के चलते कम होने की संभावना है।
मुद्दा:-जिला बनाया जाए

8 शुतराणा
-विधायक निर्मल सिंह शुतराणा-कांग्रेस
अकाली से कांग्रेसी हुए निर्मल सिंह की स्थिति कैप्टन अमरिंदर के प्रधान बनने से फिर ठीक हो गई है, जबकि पूर्व कांग्रेसी मंत्री व पिछला चुनाव अकाली दल से लडऩे वाले हमीर सिंह घग्गा का टिकट कटना तय है। कैप्टन कंवलजीत से करीबी के चलते उन्हें पिछली बार टिकट मिला था। संभव है कि पूर्व विधायक इकबाल सिंह को अकाली दल टिकट दे दे।
मुद्दा:-घग्गर की बाढ़
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निम्न चुनाव क्षेत्रों में डी-लिमिटेशन के चलते बदलाव आया है

9 बनूड़ अब डेरा बस्सी-जसजीत सिंह बन्नी-शिरोमणि अकाली दल,

डेराबस्सी पटियाला लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है पर जिले के रूप में अब मोहाली में जा चुका है।
ठीक ऐसे ही नाभा विधान सभा क्षेत्र को पटियाला लोक सभा का हिस्सा इस बार बनाया गया है, जबकि संगरूर जिले के लहरा गागा व सुनाम विधान सभा क्षेत्रों को पटियाला लोक सभा क्षेत्र से बाहर कर दिया गया है।
10 लहरागागा-बीबी राजिंदर कौर भट्ठल-कांग्रेस

11 सुनाम-परमिंदर सिंह ढींडसा-शिरोमणि अकाली दल

चुनावी चटकारे punjab election, 2012, patiala, chtkare



मुड़ मुड़ याद सतावे...

चुनावी सीजन में आजकल हर कोई नई गाड़ी के साथ नए कुर्ते पायजामे सिलवा कर नए रंग में दिखने की चेष्टा कर रहा है। ऐसे में किसी का भी मन घर पर नहीं लगता, कम से कम चुनावी राजनीति में टांग रखने वालों में बैचेनी कुछ च्यादा ही रहती है। घर पर रहना पड़ जाए या रिश्तेदारी में कहीं जाना पड़ जाए तो लगातार मोबाईल पर टच रहने की जरूरत मजबूरी से कम नहीं लगती मानों नेता जी गुरदास मान का गाना गुनगुना रहे हों मुड़ मुड़ याद सतावे...। एक नेता जी का आलम ये है कि हर एक दो घंटे के बाद अपने कभी एक समर्थक को फोन करते हैं तो कभी दूसरे को मानों आज ही टिकट का बंटवारा ना हो जाए वो भी उनकी गैर मौजूदगी में।

अब महिलाओं का है जमाना भई

दुनिया की आधी से थोड़ी कम आबादी ने कुछ साल पहले कंधे से कंधा मिला कर चलने की बात कही फिर आधा नहीं तो एक तिहाई आरक्षण मांग लिया लेकिन लोक सभा में पटियाला से प्रतिनिधित्व मिलने के बाद अब सुनने में आया है कि एक नहीं दो नेता जी घर बैठने वाले हैं, ईश्वर उनकी सेहत दुरुस्त रखे पर जो हार का ग्राफ उन्होंने दिखाया है लगता है उसे देख कर ही घर की महिलाओं ने प्रबंधन छोड़ कर सीधे चुनाव लडऩे का निर्णय ले लिया है। चटकारे लिए जा रहे हैं कि अब महिलाओं का जमाना है, अगर अब और पुरुष हारे तो अगली बार संख्या और बढ़ सकती है।

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चुनावी चटकारे पटियाला

गन मैन भी हुए चुनावी विशेषज्ञ

नेताओं के साथ रहते रहते आप नेता चाहे ना बन पाएं पर आपको इतना ज्ञान जरूर प्राप्त हो जाएगा कि नेतागिरी कैसे होती है? बीच बीच में होने वाली प्रैस कांफ्रेंस और अफसरों अन्य संपर्क सूत्रों से होने वाली बातचीत सुनते सुनते आप कब चुनावी विशेषज्ञ हो जाएं आपको खबर नहीं होती पर हैरानी तब होती है जब आप अपने समाज में वापिस लौटते हैं। हुआ भी कुछ ऐसा ही बीते दिनों सर्किट हाउस में हुई एक बैठक के दौरान बाहर डटे नेता जी के गनमैन किसी चुनावी विशेषज्ञ की तरह एक के बाद एक टिप्पणी करते रहे। आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने से लेकर टिकट बंटवारा, जीतने की संभावना, खर्चा और यहां तक कि सरकार बनने पर कौनसा मंत्रालय दिया जा सकता है? सारी जानकारी एक ही सांस में दी गई वो भी पूरे विश्वास के साथ।    

ऐह काम साडे बस दा नहीं

एक रैली के आयोजन की तैयारियों में सभी की डियूटियां लगाई जा रही थी हर किसी को बड़े नेता जी ने काम सौंप दिए। अपनी प्रधानगी चलती रहे और करना कुछ ना पड़े के तहत दी गई डयूटियों में जब एक दो को जिम्मेदारी पंसद ना आई तो लोड पड़ौसी की ओर करने का प्रयास हुआ, काम ही कुछ ऐसा था कि पड़ौसी भी जवाब दे गए, तो सलाह दी गई कि चलो खुद ही कर लिया जाए, लेकिन थोड़ी ही देर में ये बात भी समझ आ गई कि ऐह काम साडे बस दा नहीं है। लीडरी ही चलानी ही कोई और तरीका ढूंढ लेंगे।  
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दिन आने लगे एक दिन के राजा के

चुनावी लोकतंत्र में यों तो बहारें पांच साल बाद ही आती हैं लेकिन कभी लोकसभा तो कभी विधानसभा और कभी स्थानीय निकाय, हर दो साल बाद वोटर की पूछ पड़ताल शुरु होती है, लेकिन कुल मिला कर आम मतदाता एक दिन का ही राजा रहा है। दिलचस्प है कि राजा की क्वालिटी पर ही अब निर्भर करता है कि वो कितने दिन खातिरदारी करवा सकता है। शहर में तो नहीं पर ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा शुरु हो गई कि दिन लौटने लगे हैं तैयार हो जाओ बाद में तो जो होना है वो किसी से नहीं छिपा है पर अभी तो बदली फिजाओं का आनंद ले लो।

यार वो तो पैदल है

बीते दिनों तक समझदार नजर आने वाले लोग आजकल पैदल हो गए बताए जा रहे हैं। हुआ कुछ यों की पड़ौसी जिले के एक नेता जी अक्सर पटियाला आ कर अपनी हैकड़ी झाड़ते रहे हैं। बात सार्वजनिक कार्यक्रम की हो तो नेता जी का रुआब देखने वाला होता है, हर किसी को ज्ञान बांटते नजर आते रहे हैं। लेकिन आज एक कार्यक्रम के दौरान नेता जी को जब पूरी बात समझा दी गई तो नेता जी ने एक बार फिर जानकारी मांगी, तसल्ली ना हुई तो पड़ौसियों का नंबर मांग लिया, इसके बाद भाईचारे में चली चर्चा ने पुष्टि कर दी कि यार वो तो पैदल है।  

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जो भोग संस्कार पर जाने लगा समझो...

चुनावी सीजन में नेतागण किसी का विवाह तो क्या भोग संस्कार मिस नहीं कर रहे, हालांकि मिस वैसे भी नहीं करते पर इन दिनों में तो च्यादातर समय  निर्वाचन क्षेत्र में ही गुजर रहा है ऐसे में समय ही समय है। राजनीतिक दलों की तर्ज पर ही लगभग होने वाली यूनियन की राजनीति में भी अब यही कुछ होने लगा है और साथ ही कहा जाने लगा है कि जो भोग संस्कार पर नियमित रूप से जाने लग गया समझो लीडर हो गया। पहचान चाहे दूर की ही हो पर नेता जी सबसे करीबी होते हैं कई बार तो जरूरी रस्में निभाने में करीबी रिश्तेदार भी करीब नहीं आ पाते कि नेता जी काम निपटा जाते हैं।

बारी बारी, सबकी बारी, अबकी बारी, साडी बारी

बारी बारी से हर कोई चुनाव लड़ रहा है पर एक नेता जी पिछले कई चुनावों से बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए बड़प्पन में किसी ना किसी को अपना समर्थन दे कर चुनाव जितवाते भी रहे हैं लेकिन इस बार कुछ हालात अलग हैं। इस बार दबंग कहे जाने वाले नेताजी ने अपना मन बना लिया है। बताया जा रहा है कि नेता जी ने अपनी टीम में कुछ पेशेवर लोग साथ जोड़े हैं जो सारी प्रक्रिया को सिरे चढ़ाएंगे। वहीं नेता जी कह रहे हैं कि बारी बारी, सबकी बारी, अबकी बारी, साडी बारी और किसी की बारी अबकी बारी नहीं चलेगी।
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कौन? केहड़ा? औ छड्डो भा जी

अक्सर नेता लोग चुनाव के बाद जनता को भूल जाते हैं लेकिन इस बार कुछ नेतागण ऐसे भी हैं जो चुनावों से पहले ही जनता के साथ अपने समझे जाने वाले बंदों को भूलने लगे हैं। हाल ही एक आयोजन के लिए नेता जी को भीड़ जुटाने की खासी जरूरत थी पर संगठन में घुस आए कुछ बंदों के चलते और नेता जी के ओवर कांफिडेंस ही कुछ ऐसा है कि जिसने कोई सलाह दी समझों चाटूकारों की साजिशों में लपेट लिया गया। ऐसे ही किसी ने एक सच्जन का नाम लिया तो फिर वहीं जुमला दोहरा दिया गया कौन? केहड़ा? औ छड्डो भा जी... हालांकि परिणाम शाम होते होते सामने आने लगे कि काश भा जी ने ना छोड़ा होता।

 
 इश्क और इलेक्शन में सब जायज है

कभी कहा जाता था कि इश्क और जंग में सब जायज है पर अब समय के साथ जुमले भी बदल गए हैं जंग के रूप में इलेक्शन आ गया है। जंग तो दुश्मनों के बीच होती है ऐसे में दुश्मन को मारना सिपाही का धर्म बताया जाता है पर इलेक्शन अपनों के  बीच में ही अपना प्रतिनिधि चुने जाने के लिए होती है, फिर भी सारे रिश्ते नाते दर किनार किए जा रहे हैं और बताया जाता है कि चुनाव जीतना है इसलिए सब जायज है। हालांकि  एक रैली में लगी कुर्सियों ने तय कर दिया कि जिसे आप चुनाव जिताने वाला समझ रहे हैं कहीं वही तो सलाह नहीं दे रहा कि कुर्सियां इतनी लगवा दो, भई कुर्सियां तो पिछली रैली में भी इतनी ही थी पर ढ़क कर रखी गई थी और बाद में लगी थी। अब ये लोग कहीं नेता जी का टिकट कटवाने वाले ना बन जाएं।

कहने को बहुत कुछ, हुआ कुछ भी नहीं, punjab election, 2012, nabha


विधान सभा क्षेत्र:- नाभा

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कभी बेल्जियम के बाद हरे कांच की बोतलों का उत्पादन करने में विश्व भर में विख्यात रहे एतिहासिक शहर नाभा की आबादी चाहे कम रही है, रेलवे व सड़क के लिहाज से भी यह प्रमुख मार्ग पर नहीं है, लेकिन साथ लगते फतेहगढ़ साहिब, बरनाला व मानसा जैसे गांवों व कस्बों के जिला बनने के बाद से इसे जिला बनाए जाने की मांग हर बार जिस तरह से उठती है ठीक उसी तरह से बैठती भी रही है। जिला मुख्यालय से मात्र 26 किलोमीटर की दूरी के चलते तकनीकि रूप से इसे खारिज भी कर दिया जाता है। हालांकि अन्य मामलों में ऐसा नहीं हुआ है। नाभा इकलौती रियासत है जो जिला नहीं बनी है। इतना ही नहीं देश की यह इकलौती पूर्व रियासत है जिसे परिसीमन के बाद आरक्षित क्षेत्र बना दिया गया है।
इस विधान सभा क्षेत्र में विकास का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता हैं कि यहां आटो एलपीजी का प्लांट लगा है, आईओसी का बाटलिंग प्लांट है, पर फायर ब्रिगेड की गाड़ी नगर परिषद के पास नहीं है। आग लगने की स्थिति में इसे बाहर से मंगवाना पड़ता है। सीवरेज सिस्टम दुरुस्त नहीं हो पाया है तो मूलभूत सुविधाओं के नाम पर सड़कों की हालत खस्ता है। जहां कहीं इंटर लाकिंग टाइलें लगी हैं वहां विजीलेंस ने नमूने ले रखे हैं।
शिरोमणि अकाली दल के उम्मीदवार राजा नरिदंर सिंह का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं चल रहा।


जो विकास हुआ उन्हीं के कार्यकाल में हुआ: विधायक काका रणदीप

नाभा से दो बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने काका रणदीप सिंह के पास कहने को काफी कुछ है। उनके रियासती परिवार ने आजादी के बाद से आठ एमएलए दिए हैं। नेहरू से राजीव गांधी तक पीढ़ी दर पीढ़ी संबंध रखने वाले काका रणदीप कहते हैं कि जो विकास हुआ उन्हीं के समय में हुआ। पहले सैंट्रल रोड फंड और फिर बीओटी के माध्यम से सभी बाहरी सड़कें बनवाई, शहर मेंं आरओबी व रोहटी के पुल बनाए। परिषद को कर्ज मुक्त कर सीवरेज का प्रोजेक्ट लाए जबकि आरोप लगाते हैं कि अकाली सरकार वायदे कर भूलती रही है।

दिलचस्प पहलु
-पंजाब की इकलौती रियासत है जो जिला नहीं बनी
-देश की इकलौती पूर्व रियासत है जिसे परिसीमन के बाद आरक्षित क्षेत्र बनाया गया


क्या नहीं हुआ
-जिला नहीं बन पाया
-सीवरेज सिस्टम नहीं हुआ दुरुस्त
-फायर ब्रिगेड नहीं है
-शहर के भीतर की सभी सड़कें नहीं बन पाई
-सैटेलाइट टाउन में शामिल नहीं हो पाया

गेट वे आफ पंजाब में विकास हुआ पर...punjab election, 2012, rajpura


विधान सभा क्षेत्र :- राजपुरा
-भावनाओं में उलझता रहा है चुनाव
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेट वे आफ पंजाब कहे जाने वाले राजपुरा विधान सभा क्षेत्र में होने वाला हर चुनाव अक्सर भावनाओं पर अधिक व मुद्दों पर कम लड़ा गया है, लेकिन चुनाव प्रचार के दिनों में किए गए वायदों के मामले में जहां 2007 के चुनावों की तुलना में इस सरकार में कुछ काम जनहित के हुए हैं पर सिरे चढ़ाने के मामले में कहीं ना कहीं कमी जरूर रह गई है।
 दो सरकार पहले से बज रहा बस स्टैंड का गीत इस बार भी गाया गया पर करोड़ों रूपये खर्च होने  पर भी यह चालू नहीं हो पाया। इंजीनियरिंग कालेज बनाए जाने का वायदा हुआ पूरा तो राजपुरियों को ट्रैफिक की समस्या से निजात दिलाने के लिए खोखे वालों को बूथ तो अलाट हो गए पर आम शहरी को समस्या से छुटकारा नहीं मिला। हालांकि1996 में हुए शिलान्यास के बाद से लटकता आ रहा बहावलपुरी बिरादरी का भवन पूरा हो गया। इधर उधर चलने वाले प्रशासन को मिनी सचिवालय भी अंतत: मिल ही गया है।
दिलचस्प है कि राजपुरा सीट के लिए अक्सर कहा जाता रहा है कि दूसरी बार लगातार जीतना मुश्किल होता है लेकिन पुराने रिकार्ड को हिलाने के बाद या फिर पार्टी बदलने के साथ विधायक रिपीट हो गए पर पार्टी नहीं।

रिकार्ड तोड़ विकास हुआ: खुराना

भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े राज खुराना कहते हैं कि इस बार रिकार्ड तोड़ विकास हुआ है। बस स्टैंड के पास एक पुल बन रहा है इसके बाद चालू हो जाएगा। बूथ अलाट हुए, थर्मल प्लांट का निर्माण शुरु, मिनी सचिवालय बना, इंजीनियरिंग कालेज बना, जैसी लंबी फैहरिस्त है। राज खुराना कहते हैं कि इस बार की उनकी पारी पिछले 20 सालों में सबसे शानदार रही है और कोई काम नहीं रहा है।


सत्यानाश किया, भ्रष्टाचार फैलाया: कंबोज

कांग्रेस के प्रत्याशी रहे हरदयाल सिंह कंबोज, राजपुरा के विकास के दावों को खोखला बता कहते हैं कि इन्होंने सत्यानाश कर दिया है शहर का। सबसे च्यादा भ्रष्ट अफसर लगाए, दड़ा सट्टा व नशे का कारोबार चल रहा है। जो सड़के बनी हुई थी उन्हें तोड़ कर इंटें बिछवा दी हैं और 80 फीसदी पैसे खा गए। आईटी पार्क के लिए जमीनें देने वालों को मुआवजा नहीं मिला, नौकरी दूर की बात घर उजाड़ दिए।  

क्या नहीं हुआ
-गरीबों का बसेरा प्रोजेक्ट चालू पर नहीं हुआ पूरा
-वाटर सीवरेज प्रोजेक्ट की बढ़ी आबादी अनुसार क्षमता बढ़ाने का 32 करोड़ का प्रोजेक्ट लटका

सरकारें बदल गई पर नहीं बदला घग्गर, punjab election, 2012, sanour



विधान सभा क्षेत्र :-सन्नौर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पुराने विधान सभा क्षेत्र डकाला के अधिकांश हिस्सों से बने सन्नौर क्षेत्र को चाहे नया नाम मिल गया हो लेकिन यहां की समस्याएं व चुनावी मुद्दों में कोई च्यादा बदलाव नहीं आया है, अलबत्ता हांसी-बुटाना नहर के नाम से एक नया जिन्न जरूर जुड़ गया है। हर बार घग्गर की बाढ़ चुनावी मुद्दा रही है और इसे चैनेलाइज करने को लेकर अकाली व कांग्रेसी दावे-प्रति दावे करते रहे हैं। पर दो चरणों की पूर्ति मात्र हो पाई है। अब करीब सौ गांव हांसी बुटाना नहर की मार में आ गए हैं।
 बिजली के मामले में ओवर लोड बलबेड़ा ग्रिड पर से कुछ दवाब कम हुआ है लेकिन अभी भी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है।  मीरांपुर चौ, टांगरी, मारकंडा व पटियाला की राव जैसे बरसाती नाले बाढ़ का कारण बनते रहे हैं। क्षेत्र में सड़कों की बर्बादी के साथ साथ मूलभूत ढ़ांचागत सुविधाओं को भी नुकसान होता रहा है। एयरकंडीशंड आधुनिक सब्जी मंडी बनी है और इसे बनवाने का श्रेय लेने में दोनों ही प्रमुख पार्टियां एक दूसरे से आगे निकलने के प्रयास में हैं।
दिलचस्प है कि बाढ़ की मार के चलते ही इस क्षेत्र के काफी बड़े हिस्से के गांवों को पिछड़े क्षेत्र में रखा गया था, नाटकीय ढ़ंग से पिछली कांग्रेस सरकार ने जब नीति में संशोधन किया तो क्षेत्र के ये गांव पिछड़े नहीं रहे और अकाली दल इसे पिछले चुनाव में मुद्दा ही नहीं बना पाया। इतना ही नहीं क्षेत्र के लोगों को कहना है कि  वर्तमान अकाली सरकार ने इस मामले को हल करने की दिशा में कुछ नहीं किया। जिन बच्चों के एडमिशन कालेज अथवा यूनिवर्सिटी में पिछड़े क्षेत्र के कोटे से हो जाते थे वे भी बंद हो गए। सुविधाएं देना तो दूर की बात पिछली भी हटा दी गई। मीरांपुर में कालेज खोलने का वायदा तो पूरा हुआ लेकिन यह अभी इमारत से च्यादा कुछ नहीं है। भली प्रकार से इसे चलाया नहीं जा सका है।



बिजली व सड़क के काम तो पहले ही निपटा दिए: लाल सिंह

प्रदेश कांग्रेस में सबसे वरिष्ठ विधायक लाल सिंह क्षेत्र से चार दशकों से जुड़े हैं और चुनाव लड़ते आ रहे, लेकिन अपने पिछले कार्यकाल में मंत्री रहते हुए किए कामों को आज वे च्यादा गिनवाते हैं और ईमानदारी से स्वीकार भी करते हैं कि सत्ता में ना आने के चलते वे अपने दो वायदे पूरे नहीं कर सके हैं। जबकि बिजली व सड़क के काम तो उन्होंने पिछली सरकार में ही निपटा दिए थे।

तकरीबन सारे वायदे पूरे किए: हरमेल सिंह टोहरा

शिरोमणि अकाली दल के डकाला विधान सभा क्षेत्र के इंचार्ज हरमेल सिंह टोहरा कहते हैं कि उन्होंने जो वायदे किए थे वो लगभग सभी पूरे कर दिए हैं। गलियों-नालियों-सड़कों व फिरनियों की बात छोड़ दें तो बिजली व्यवस्था को दुरुस्त किया गया है। नए ग्रिड बनवा पुराने ग्रिड अंडर लोड किए हैं और अब भी विकास के नाम पर ही चुनाव लड़ेंगे।


क्या नहीं हुआ
-बाजीगर व हरिजनों जातियों के लोगो को चार-चार मरले के प्लाट देना
-लंबे समय से पंचायती जमीनों पर बसे लोगों को वो अलाट कर किश्तों में मुआवजा लेना
-रोजगार लाने वाला कोई बड़ा उपक्रम नहीं लगा
-बरसाती नालों की बाढ़ का स्थायी उपाय
-नदी का चैनेलाइजेशन करने का घग्गर प्रोजेक्ट पूरा करना
-पिछड़े क्षेत्र से निकाले गए गांवों को पुन: नहीं लाया जा सका


पानी आया नहीं, जब आया तो बाढ़ आई, punjab election, 2012, ghanour





विधान सभा क्षेत्र- घन्नौर

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पटियाला जिले व लोक सभा क्षेत्र में सबसे कड़ा व त्रिकोणीय किंतु दिलचस्प मुकाबला देने वाले घन्नौर विधान सभा क्षेत्र की मुख्य सड़कों का ट्रैक रिकार्ड पिछली अकाली-भाजपा सरकार के समय से ही अच्छा रहा है। लेकिन सिंचाई के लिए नहरी पानी की पर्याप्त सुविधा नहीं हो पाई है। यहां जब भी पानी आया बाढ़ के साथ ही आया है।
दिलचस्प है कि जिस जगह पर सतलुज यमुना लिंक नहर का नींव पत्थर रखा गया आज वहां पीने के पानी के लिए भी मशक्कत करनी पड़ती है। ठीक ऐसे ही भाखड़ा मैन लाइन की नरवाना ब्रांच से हरियाणा दिल्ली को पानी यहीं से गुजरता है पर किसानों पर पानी चोरी करने के आरोप आम हैं। सरकारें आती जाती रही पर एक नहर सालों से बंद पड़ी है, जिसे चालू नहीं करवाया जा सका है। जबकि घग्गर की बाढ़ के स्थायी उपाय तो दूर की बात टूटी नहरों से आए पानी की बाढ़ को भी नहीं रोका जा सका है।  


दो वादे पूरे किए दो अगली सरकार में: जलालपुर
निर्दलीय प्रत्याशी लड़कियों के लिए डिग्री कालेज बनवाया और शंभू के पास रेलवे ब्रिज बनवाया दो वायदे पूरे किए और दो रह गए जिन्हें अगली सरकार में पूरा करवा लेंगे। इनमें पानी का मसला हल करवाना है, बनूड़ से आ रही नहर चालू नहीं है, जिसे चालू करवाया जाएगा इसके अलावा साइफन बनवाना क्षेत्र की बड़ी जरूरत है। हालांकि घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित करने पर काम चल रहा पर यह अभी घन्नौर क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाया है।


स्कूल अपग्रेड करवाए, सड़कें बनवाई: मुखमैलपुर

शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन के टिकट पर चुनाव लड़ दूसरे नंबर पर रहे पूर्व मंत्री अजैब सिंह मुखमैलपुर को पार्टी ने अपना हल्का इंचार्ज लगा कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता दे दी। आज वे कहते हैं कि उन्होंने क्षेत्र में स्कूलों को अपग्रेड करवाया और डिग्री कालेज की आजादी से चली आ रही मांग को पूरा करवाया है। साइफन ना बन पाने के सवाल पर वे कहते हैं कि उनकी सरकार बी ओर से इस दिशा में कोई कमी नहीं है, लेकिन वे नहर नहीं तोड़ सकते इसके लिए हाईकोर्ट की मंजूरी जरूरी है। साथ ही वे कहते हैं कि विकास के नाम पर ही अगला चुनाव लड़ेंगे।

क्या नहीं हुआ
-घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित कर स्थायी समाधान
-एसवाईएल का पंगा दूर करना
-भाखड़ा मैन लाइन की नरवाना ब्रांच पर लाछड़ू के पास साइफन बनाना
-वर्तमान साइफन बड़े कर दोनों नहरों के बीच बसे 22 गांवों को झील बनने से बचाना
-अंबाला की ओर जाने वाले क्षतिग्रस्त पुलों का निमार्ण करवाना
-कस्बे में मार्डन बस अड्डा बनवाना




टिकट की टिकटिक पटियाला, patiala, election, 2012,



 1 पटियाला शहर
कांग्रेस :- कैप्टन अमरिंदर सिंह-कोई अन्य दावेदार नहीं
अकाली दल-सुरजीत सिंह कोहली अथवा उनके मेयर पुत्र अजीतपाल ंिसह कोहली

2 पटियाला ग्रामीण
कांग्रेस:-पूर्व मंत्री ब्रहम महिंदरा, काका रणदीप के अलावा पूर्व सांसद चरणजीत वालिया, केके शर्मा, विष्णु शर्मा, व राजा मालविंदर सिंह
अकाली दल:-पंथ रत्न जत्थेदार स्व. टोहरा की बेटी कुलदीप कौर, सतबीर सिंह खटड़ा


3 समाना
कांग्रेस:-ब्रहम महिंदरा, सुरिंदर सिंगला, राजा मालविंदर सिंह, जगतार सिंह राजला
अकाली दल:- हल्का इंचार्ज सुरजीत सिंह रखड़ा, हरिंदर पाल सिंह हैरी मान

4 सन्नौर-
कांग्रेस- लाल सिंह, गुरबंस सिंह पूनिया
अकाली दल-तेजिंदर पाल सिंह संधू

5 घनौर
कांग्रेस- मदन लाल जलालपुर, पूर्व मंत्री जसजीत सिंह रंधावा, एडवोकेट केपी सिंह, शरणजीत ंिसह जोगी पुर
अकाली दल- पूर्व मंत्री अजैब सिंह मुखमैलपुर की पत्नि हरप्रीत कौर

6 राजपुरा
कांग्रेस- हरदयाल कंबोज, लखविंदर सिंह भिंडर, राजिंदर राजा, फकीर चंद बंसल
भारतीय जनता पार्टी-राजखुराना, हरजीत सिंह ग्रेवाल, जगदीप सिंह सोढ़ी, श्याम सुंदर वधवा, गठबंधन में सीट फेरबदल पर मुकाबले में अकाली दल के सुरजीत सिंह गढ़ी

7 नाभा
कांग्रेस-साधु सिंह धर्मसोत, रणधीर सिंह लिबड़ा
अकाली दल- मक्खन सिंह लालका, बलवंत सिंह शाहपुर, चरणजीत सिंह अटवाल

8 शुतराणा
कांग्रेस- निर्मल सिंह शुतराणा, कबीर दास, शिंदर कौर
अकाली दल-बनिंदर कौर लूंबा, हमीर सिंह घग्गा

इतिहास हुआ एतिहासिक शहर का विकास, 2012, election, patiala


विधान सभा क्षेत्र:-पटियाला

भूपेश चट्ठा, पटियाला

एक चुनाव पहले प्रदेश का सत्ता केंद्र रहा पटियाला शहर अपने विकास की गति को कायम नहीं रख सका है। कहने सुनने को यहां काफी कुछ है और एक पूर्व मुख्यमंत्री के शहर में वर्तमान मुख्यमंत्री ने खासे दौरे भी किए और लोक सभा चुनावों से पहले संगत दर्शनों के नाम पर जम कर धन राशि बांटी भी गई लेकिन शहर में से कबाड़ी बाजार और ट्रैक्टर मंडी को बाहर निकाले जाने और लोअर माल को चौड़ा किए जाने के अलावा च्यादा च्यादा कुछ दिखाई भी नहीं देता। हालांकि कुछ ऐसे लंबी अवधि के प्रोजेक्ट भी हैं जिन पर काम चल रहा है।

फोटो:1
तुलना ही करनी है तो 2002 व 2007 के बीच की हो: कैप्टन अमरिंदर सिंह
कांग्रेस से विधायक व पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कहते हैं कि इस निकम्मी सरकार ने हर वो काम रोका है जो हमने शुरु किया और शहर को बेहतर बनाने के लिए जरूरी था। वैसे विपक्ष में रहते हुए हमे कोई काम ही नहीं करने दिया, इन लोगों ने तो पटियाला को ही प्रतिनिधित्व वहीन करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हम विकास, विकास और विकास के नाम पर चुनाव लड़े थे जो हमने इससे पहले के पांच सालों में किया था। अगर शहर की समस्याओं को हल करने की ही बात करनी है तो 2002 से 2007 के बीच हुए कार्यो की करो। इन पांच सालों की नहीं। तुम लोगे बेहतर जानते हो विपक्ष में रह कर बंदा क्या कर सकता है।



70 से च्यादा टयूबवेल, दो सड़कें व सीवरेज बिछाया: कोहली

शिरोमणि अकाली दल से चुनाव लड़े सुरजीत सिंह कोहली कहते हैं कि पांच साल पहले के विधान सभा चुनावों के मुद्दे की बात वे नहीं करते। ये विधायक ने विधान सभा में उठाने होते हैं जबकि उन्होंने नगर निगम के माध्यम से विकास किया है। 70 से च्यादा टयूबवेल लगा कर पेय जल कि समस्या को हल किया तो सीवरेज की समस्या को 20 फीसदी पर लाए हैं। लोअर माल व इंकम टेक्स रोड को चौड़ा किया। 109 करोड़ रूपये का सीवरेज प्रोजेक्ट आउटर कालोनियों के लिए चल रहा है। नया जाल बिछाया जाउ रहा है। जबकि कांग्रेस तो उन्हें पांच करोड़ का कर्ज दे कर गई थी।

क्या नहीं हुआ
-शहर से पशुओं की डेयरी बाहर करना
-एयर कंडीशनंड बस स्टैंड बनाना
-छोटी नदी-बड़ी नदी के किनारे पक्का करना
-छोटी नदी नाले में तब्दील फिर कब्जे अधीन आई
-नाले की समस्या का स्थाई हल करना
-सड़कें चौड़ी करना
-नहरी पानी आधारित वाटर ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगा
-पटियाला-चंडीगढ़ राज मार्ग के फोर लेन का प्रोजेक्ट कागजों में सिमटा, केंद्र व राच्य के मंत्रालयों के बीच झूल रहा है।


जहां काम चालू है
-बाई पास निर्माणधीन, पुल बनने शेष
-सीवरेज सिस्टम पर काम चालू
-बड़ी नदी का काम राजपुरा रोड तक हुआ आगे अधूरा

Friday, 9 December 2011

पटियाला ग्रामीण का जन्म, नाभा आरक्षित, delimitation, election, punjab


भूपेश चट्ठा, पटियाला प्रत्येक 30 सालों बाद होने वाले चुनाव क्षेत्रों के बदलाव ने इस बार पटियाला जिले व लोक सभा क्षेत्र को कुछ अधिक तर्कसंगत बना दिया है। इसी परिसीमन के चलते जिले की विधानसभा क्षेत्रों में हुए भौगोलिक बदलाव के बाद नाभा विधान सभा क्षेत्र आरक्षित हुआ तो पटियाला ग्रामीण के नाम से नए विधान सभा क्षेत्र का गठन हुआ। हालांकि कुल संख्या आठ में बदलाव न होने की वजह बनूड़ क्षेत्र का अस्तित्व समाप्त होना है। डकाला सीट का नाम बदलकर सन्नौर विधानसभा क्षेत्र हो गया है। जिले में अब शुतराणा के साथ नाभा के रूप में दो सीटें आरक्षित होंगी। सबसे प्रमुख बदलाव के तहत बने पटियाला ग्रामीण सीट में पटियाला नगर निगम के 22 वार्ड रखे गए हैं, जबकि ये पहले समाना विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा थे। इसमें समाना के 54 और नाभा ब्लाक के 32 गांवों और घन्नौर अधीन आते अर्बन एस्टेट, पंजाबी युनिवर्सिटी व बहादुर गढ़ कस्बे तक के क्षेत्र को जोड़ दिया गया है। राज्य में वोटों के लिहाज से दूसरे और लंबाई में पहले नंबर के समाना सीट के ज्यादा छोटा होने की स्थिति पुराने डकाला क्षेत्र के समाना क्षेत्र के साथ लगते और डकाला गांव के आसपास के 40 गांवों को समाना में जोड़ा गया है। पिछले चुनाव तक 90 किलोमीटर तक की दौड़ लगवाने वाला व ढाई लाख से अधिक मतदाताओं वाला यह क्षेत्र अब भौगोलिक दृष्टि से सिमट गया है। डकाला के स्थान पर बने सन्नौर क्षेत्र में घन्नौर सीट के 42 गांव जोड़े गए हैं, जबकि घन्नौर में यही कमी पूरी करने राजपुरा क्षेत्र से इतने ही गांव निकाल कर घन्नौर में मिला दिए गए हैं। बनूड़ सीट का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया और बनूड़ कस्बा और 25 गांव राजपुरा में मिला दिए गए हैं, जबकि बनूड़ क्षेत्र के अधिकांश हिस्से से डेरा बस्सी क्षेत्र बना है जो पटियाला लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा तो रहेगा लेकिन यहां जिले का नाम एसएसटी नगर अथवा मोहाली हो गया है। इसी प्रकार लोक सभा सीट पटियाला में से संगरूर जिले के लहरागागा और सुनाम को हटा दिया गया है और आनंदपुर साहिब सीट अधीन आते नाभा को पटियाला लोकसभा में मिला दिया गया है।

एफएंडसीसी की अंतिम प्रभावी बैठक आज, muncipal corporation, f & cc


भूपेश चट्ठा, पटियाला अगले साल होने जा रहे विधानसभा के चुनावों के लिए आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले नगर निगम के अधीन आने वाले क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से विकास कार्यो को अंजाम तक पहुंचाने के लिए निगम की फाइनेंस एंड कांट्रैक्ट कमेटी की अंतिम प्रभावी बैठक शुक्रवार को होने जा रही है। निगम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि बैठक में अधिकतर कार्य 22 नवंबर की बैठक में लिए गए निर्णयों पर तकनीकि रूप से मुहर लगाने के अलावा कुछ अन्य एस्टीमेट भी पास करवाना है। पिछली बैठक में पास हुए प्रस्तावों पर निगम के इंजीनियरों ने तय किए गए रेट पर आपत्ति जताई है। बताया जा रहा है कि ठेकेदारों की ओर से पोस्ट टेंडर निगोसिएशन के बाद दिए गए रेटों पर स्पष्ट रूप से कुछ पता लग पाने के चलते ठेकेदारों को वर्क आर्डर जारी करने में खासी समस्या पेश आ रही थी। दिलचस्प है कि22 नवंबर को पास हुए करीब 10 करोड़ के 85 कार्यो के लागत मूल्य में अब लगभग सभी में दो फीसदी की कटौती की जा सकती है। वहीं 12 नए कामों को भी इसी बैठक में मंजूरी दी जा सकती है। इसके अलावा 57 लाख रुपये के चार सड़कों के प्रोजेक्टों पर अलग से सहमति बनने के आसार हैं।



एंबेसडर कारों की खरीद में देरी 

नगर निगम में अति आवश्यक कार्य निपटाने को लेकर दो एंबेसडर कारों की खरीद के लिए एडवांस में दी गई मंजूरी के बावजूद इन कारों के निगम तक पहुंचने में देरी हो गई है। स्थानीय निकाय निदेशालय की ओर से स्वीकृति के बाद कंपनी से मंगवाए गए कोटेशन में कारों की कीमत का प्रस्ताव पिछली बैठक में पास हो गया, लेकिन खरीदी जाने वाली इन कारों का बीमा, अस्थाई रजिस्ट्रेशन व एसेसरी की कीमत नहीं जोड़ी गई थी, हालांकि मेयर व कमिश्नर की ओर से अब इसकी मंजूरी दी जा चुकी है। 

सुखबीर की जुबां में बोले मेयर 
एफएंडसीसी की बैठक के संदर्भ में मेयर अजीतपाल सिंह कोहली कहते हैं कि आप इसे अंतिम नहीं कह सकते। निगम की सत्ता में पार्टी अभी कई साल और रहेगी। हालांकि वह स्वीकार करते हैं कि आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने के चलते प्रभावी रूप से ये अंतिम ही है। वह कहते हैं कि नया एस्टीमेट बना कर पास करवाने में एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके लिए संभव है कि समय नहीं मिल पाए, लेकिन शहर में इतने प्रोजेक्ट पास कर चालू कर दिए गए हैं कि काम अगले साल अंत तक चलते रहेंगे।

अकालियों-कांग्रेसियों की वोट सघनता बढ़ी, punjab election, 2012, delimitation


 ...चुनाव 2012 परिसीमन
- पटियाला ग्रामीण-सन्नौर कांग्रेस के लिए और समाना-घन्नौर अकालियों के लिए 'सुरक्षितÓ हुई, नाभा आरक्षित तो काका रणदीप बेघर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोक सभा क्षेत्र व जिले के अंर्तगत आते विधान सभा क्षेत्रों की सीमाओं में हुए बदलाव के बाद राच्य में दो दलों अथवा दो घटकों वाले लोकतंत्र के सिद्धांत को पूरी तरह से बल मिला है। दोनों प्रमुख दलों शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस ने अपनी दो-दो किलों को मजबूती प्रदान कर ली है।
भोगोलिक दृष्टि से चाहे विधान सभा का केंद्र किसी छोर से कितना दूर है इससे परिसीमन में 'बदलावÓ लाने वाले प्रभावशाली नेताओं को तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन अपने बंदों अथवा अपनी पार्टी की विचारधारा, बिरादरी के गांवों को एक साथ  लाना रहा है। दिलचस्प है कि यह प्रयास जिस किसी ने भी किया उसने विरोधी खेमे को बराबरी का मौका भी उसी वक्त दे दिया।
हालांकि चुनाव आयोग की ओर से लिए गए निर्णय में नाभा सीट के आरक्षित होने से कांग्रेस के विधायक काका रणदीप सिंह अपनी पुश्तैनी सीट से बेघर हो गए हैं।
वहीं दो-दो सीटों पर कंसोलिडेटेड हुए वोटों से पटियाला ग्रामीण और सन्नौर कांग्रेस के लिए और समाना व घन्नौर अकालियों के लिए 'सुरक्षितÓ सीटें बन गई हैं। इनमें राच्य के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्र समाना में से पटियाला शहर का मुख्य रूप से त्रिपड़ी क्षेत्र बाहर होने व पटियाला ग्रामीण कांग्रेसियों के लिए आसान सीट बन गया। पुराने डकाला क्षेत्र के कुछ अकाली पक्षीय गांवों का समाना में शामिल होने से अकालियों को राहत मिल गई।
इसी प्रकार पुराने डकाला से अकाली गांव बाहर निकले और नए नाम से बने सन्नौर क्षेत्र में घन्नौर के चंद कांग्रेसी समझे जाने वाले गांव मिला लेने से सन्नौर कांग्रेस बहुल लगने लगा है। ठीक  यही वजह है कि घन्नौर में अकालियों की स्थिति मजबूत लगती है। जबकि पटियाला लोक सभा क्षेत्र अधीन आते पुराने बनूड़ को तोड़ कर बनाए डेराबस्सी में भी राजपुरा के पास के अकाली गांव मिलाए गए हैं लेकिन ऐसे ही बहावलपुर बिरादरी के गांव शामिल होने से डेरा बस्सी पर स्पष्ट दांव लगाना अब आसान नहीं है।

सरकारी जमीन पर मंदिर की उम्र तय, बस 15 साल, hindu, temple, gamada,


-ग्माडा ने दो जगहों पर मंदिर बनाने को मांगे प्रार्थना पत्र
- लीज डीड में मंदिर की जमीन 15 साल बाद स्वत: शांतिपूर्ण ढ़ंग से जमीन खाली करने की शर्त, कहा सभी टेक्स भी देने होंगे
भूपेश चट्ठा, पटियाला
सहस्त्र शताब्दियों से चलती आ रही हिंदु सभ्यता और असंख्य आक्रांताओं के हमलों के बावजूद अपना आस्तित्व बचाने में कामयाब रहे हिंदु मंदिरों की 'सरकारी उम्रÓ तय कर दी गई है। कम से कम ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलेपमेंट अथारिटी ग्माडा की ओर से सेक्टर 68 और 70 में बनने वाले दो मंदिरों पर तो यह निश्चित रूप से लागू होने जा रही है। ग्माडा की सरकारी जमीन पर बनने वाले इन मंदिरों की उम्र तय करते हुए बस 15 साल नियत कर दी गई है।
उल्लेखनीय है कि ग्माडा ने सार्वजनिक रूप से एक-एक हजार गज में दो जगहों पर मंदिर बनाने को प्रार्थना पत्र मांगे हैं। हालांकि आवश्यक्ता पडऩे पर इसे दो हजार गज तक बढ़ाया भी जा सकता है। 11 नवंबर से खुली योजना नौ दिसंबर तक लागू रहेगी। जारी किए गए विवरण अनुसार कोई नियमानुसार बनी रजिस्टर्ड सोसायटी अथवा ट्रस्ट जमीन के लिए आवेदन कर सकता है।
लीज डीड में 200 रूपये प्रति गज की दर से नॉन रिफंडेबल धरोहर राशि के अलावा लीज राशि के रूप में 1750 रूपये प्रति गज और प्रार्थना पत्र के साथ 50 हजार रूपये भी जमा करवाने होंगे।
हिंदु वेलफेयर बोर्ड के चेयरमैन रवि कांत मुनि कहते हैं कि लीज डीड में यहां तक जो है उसे तो बर्दाश्त किया जा सकता है। लेकिन मंदिर की जमीन की लीज सिर्फ 15 साल के लिए रखी गई है। अलाटमेंट पत्र जारी होने के 30 दिनों के भीतर निमार्ण शुरु कर तीन साल में बनने वाले मंदिर के लिए रखी गई अगली शर्त में कहा गया है कि ग्माडा के मुख्य प्रशासक लीज खत्म होने से पहले भी तीन महीने का नोटिस दे कर लीज समाप्त कर सकते हैं।
 इसके बाद की अगली शर्त में लीज समाप्त होने अथवा रद्द होने की स्थिति में मंदिर की जमीन को अलाटी स्वत: शांतिपूर्ण ढ़ंग से जमीन खाली कर एस्टेट अधिकारी को सौंप देगा।
इतना ही नहीं 30 दिन के भीतर जमीन पर से हटाए गए मंदिर के अवशेष हटाने की शर्त भी जोड़ी गई है। कहा गया है कि सभी तरह के टेक्स जहां मंदिर भरेगा वहीं किसी तरह के मुआवजे का अधिकारी नहीं होगा।
बोर्ड के चेयरमैन कहते हैं कि जो काम गजनी जैसे लोग नहीं कर सके वो ग्माडा कर रही है। हिंदु मंदिर में एक बार प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ती स्थापित होने के बाद हिलाई तक नहीं जाती जबकि ये लोग मंदिर ढाहने की ही बात करते है, जो अनुचित है और  धर्म के विरुद्ध है। इसके खिलाफ आवाज उठाई जाएगी।

'साबुन वेजीटेरियन है या नॉन वेज बताया जाए'

-हिंदु वेलफेयर बोर्ड पीआईएल दायर करेगा: महंत रविकांत मुनि
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
नहाने व कपड़े धोने के साबुन को वनस्पति आयल से बनाया गया है या इसमें पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल किया  गया है इस बारे में अभी तक किसी भी साबुन पर नहीं लिखा गया है। हिंदु वेलफेयर बोर्ड ने रविवार को बैठक कर निर्णय लिया है कि बोर्ड उच्च न्यायालय में इस संबंध में पीआईएल दायर करेंगे।
बोर्ड के चेयरमैन महंत रविकांत मुनि ने रविवार को संवाददाताओं को बताया कि पिछले दिनों में अबोहर में पशुओं की चर्बी से भरे गए एक ट्रक के मामले में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में सामने आया कि साबुन में पशुओं की चर्बी का प्रयोग किया जाना कानूनी रूप से गलत नहीं है। उक्त मामले में वहां की पुलिस ने कुछ नोटिफीकेशन का हवाला भी दिया है। लेकिन कौनसा साबुन  वनस्पति तेल से बना है और कौनसा जानवर की चर्बी से बना है इसकी सूचना किसी भी साबुन पर दर्ज नहीं है।
महंत रवि कांत कहते हैं कि जब कोई हिंदु स्नान कर अथवा धुले कपड़े पहन कर पूरी शुद्धता के साथ पूजा अर्चना करने बैठता है तो ये उसके धर्म के विपरीत है। शाकाहारी हिंदु को आप मांस लगे कपड़े में पूजा करने के लिए कह रहे होते हैं। ठीक ऐसे ही आप सोचते हैं कि नहाने से आप साफ सुथरे हो जाएंगे और अपने देवी देवता के लिए अराधना करेंगे तो भी आप पाप के भागीदार हो जाते हैं। वे कहते हैं कि साबुन में कानूनी रूप से यदि चर्बी मिलाना सही है तो उपभोक्ता को यह बताना भी जरूरी होना चाहिए कि साबुन किस चीज से बना है।

अन्नदाता का कटोरा 11 लाख टन खाली रहा,paddy, production,


-पिछले साल का उत्पादन 144 लाख पांच हजार टन था तो इस बार 133 लाख 52 हजार टन रहा
-सूखे में खर्च के साथ बढ़ता है उत्पादन, बेमौसमी रही बारिश: लक्खोवाल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
राष्ट्र के चावल उत्पादन में आधे से अधिक का योगदान दे अन्नदाता का तगमा 60 के दशक में हासिल करने वाले पंजाब का कटोरा इस साल 11 लाख टन खाली रह गया है। राच्य में हुई सरकारी व निजी खरीद पिछले साल की तुलना में सात फीसदी कम रही है।
पंजाब मंडी बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दो महीने चले धान के खरीद सीजन के बाद आए कुल खरीद के आंकड़ों से हर किसी को निराशा हाथ लगनी तय है। राच्य को जहां टेक्स का नुकसान हुआ तो किसान की उपज कम रही और सीधी आर्थिक हानि हुई तो आढ़ती को कमीशन कम मिला, कुछ ऐसा ही हाल शैलर मालिकों का रहेगा लेकिन सबसे बड़ी क्षति देश में उस आम आदमी की होगी जिसे अच्छे मानसून के बावजूद उत्पादन गिरने से सस्ता धान अथवा चावल नहीं मिलेगा।
राच्य में हुई खरीद के आंकड़े भी उल्ट कहानी बताते हैं। केंद्र की इकलौती खरीद एजेंसी फूड कारपोरेशन आफ इंडिया ने पिछले साल 5.14 लाख टन धान की खरीद की थी तो इस साल यह घट कर 1.87 लाख टन रह गई। इसके साथ ही राच्य में एफसीआई का खरीद हिस्सा चार फीसदी से कम हो 1.6 रह गया है।
जबकि निजी क्षेत्र अथवा राइस शैलर्स मिलर्स की खरीद 1.82 लाख टन से बढ़ कर 4.35 लाख टन पर आ गई। ऐसे में हिस्सा 3.7 फीसदी पर आ गया है।
मंडी बोर्ड के चेयरमैन अजमेर सिंह लक्खोवाल कहते हैं कि सात फीसदी उत्पादन कम रहा है और पूरे पंजाब में लगभग समान रूप से गिरावट दर्ज हुई है। बेमौसमी बारिश को जिम्मेदार ठहराते हुए वे कहते हैं कि दाना पडऩे के दिनों  में हुई बारिश से झाड़ गिरा है। इसके अलावा वे देसी नुक्ता बता वे कहते हैं कि दाना पडऩे के दिनों में यदि पूर्व से हवा चल जाए तो उपज कम रहती है जबकि पश्चिमी हवाओं से उपज बढ़ती है। तीसरे प्रमुख कारण में सूखा व बारिश के दिनों का अंतर है सूखे में खर्च के साथ उत्पादन बढ़ता है जबकि बारिश च्यादा होने पर उपज कम रह जाती है। राच्य में उत्पादन के सवाल पर वे कहते पिछले साल का उत्पादन 144 लाख पांच हजार टन था तो इस बार 133 लाख 52 हजार टन रहा है।

विकास से शुरु हुआ चुनाव डेरे पर अटका,punjab election, 2012, samana, patiala, rural



विधान सभा क्षेत्र-पटियाला ग्रामीण-समाना
भूपेश चट्ठा, पटियाला
2007 में हुए विधान सभा चुनावों में समाना विधान सभा क्षेत्र अब बंट कर समाना के अलावा पटियाला ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र भी हो गई है। इसमें चुनाव प्रचार की शुरुआत किसी आम चुनाव की तरह 'विकास के मुद्देÓ से ही हुई लेकिन चुनाव के शिखर तक पहुंचने तक तत्कालीन समाना विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा रहे और नए बने व इस बार पहली बार आस्तित्व में आए पटियाला ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र ने राच्य स्तर के सबसे प्रमुख मुद्दे 'डेरा सच्चा सौदा के प्रेमियों से समर्थन व विरोधÓ की शुरुआत हो गई।
दिलचस्प है कि क्षेत्र के लोग दुकानदारों की ओर से अपनी हद से बाहर जा कर किए गए नाजायज कब्जों से परेशान हैं तो दुकानदार क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की कमी से खिन्न हैं। आम राय है कि त्रिपड़ी मैन बाजार की सड़क दुरुस्त होने के बावजूद हालात नहीं बदले हैं। त्रिपड़ी में आधे अधूरे मन से अस्पताल चालू हुआ जबकि समाना में ब्यूटिफीकेशन कुछ क्षेत्रों में हुआ है। इसी प्रकार सिवरेज सिस्टम दुरुस्त करने लाया गया प्रोजेक्ट भी अभी पूरी तरह से सिरे नहीं चढ़ा है। पटियाला ग्रामीण क्षेत्र में आज भी कई क्षेत्र हैं जहां पानी का बिल आता है पर नल में पानी नहीं आता।


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फोटो भेजी जाएगी
विपक्ष में रहते हाथ बंधे: विधायक ब्रहम महिंदरा
सरकार ही इन लोगों की है हम भला क्या कर सकते थे? लेकिन हर व्यक्ति के दुख दर्द में उन्होंने साथ दिया है। कांग्रेस से विधायक ब्रहम महिंदरा कहते हैं कि यह सवाल ही उनके लिए बेमानी है। वे विपक्ष में रहे हैं। यह सवाल सत्ता पक्ष के लिए है। हालांकि मुद्दे की बात पर वे यह भी स्पष्ट करते हैं निसंदेह पार्टी के मैनीफेस्टो पर चुनाव लड़ा गया है।

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फोटो भेजी जाएगी
विकास के नाम पर लड़े और करवाया: रखड़ा
शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन से चुनाव लड़े सुरजीत सिंह रखड़ा कहते हैं कि वे विकास का मुद्दा लेकर ही चुनाव में उतरे थे, क्योंकि इससे पहले के पांच सालों में कांग्रेस ने बिलकुल भी धन राशि जारी नहीं की, जिसके चलते क्षेत्र पिछड़ा रहा अब हालांकि वे विधायक नहीं हैं लेकिन पार्टी के प्रभारी होने व जिला योजना बोर्ड का चेयरमैन होने के नाते समाना में सड़क से सीवरेज तक बिलडिंग से ब्यूटीफिकेशन के अलावा एक आईटीआई, लड़कियों का कालेज, चार ग्रिड, दो पुल, प्रदेश का पहला वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, समाना में पूरा सीवरेज इसके अलावा गांवों के विकास के अनगिनत मुद्दे हैं।


क्या नहीं हुआ

-डीएमडब्ल्यू के पास फलाई ओवर की मांग नहीं हुई पूरी,
-समाना शहर से रेलवे लिंक का सपना पूरा नहीं
-दुख निवारण साहिब के पास एलिवेटिड रोड बना ट्रैफिक समस्या का हल
-छोटी नदी को दुरुस्त किया जाना

Friday, 2 December 2011

'खुशहाल' मौसम की पड़ी मार, धान का उत्पादन गिरा, paddy, weather, yield,



-आम धान का उत्पादन तीन फीसदी तो बासमती का छह फीसदी गिरा
-अच्छे फेवरेवल मौसम में पौधा हरियाली का आंनद लेने लगता है पीढ़ी बचाने, री-प्रोडेक्शन के बारे में तनाव में ही सोचा जाता है: कृषि वैज्ञानिक
भूपेश चट्ठा, पटियाला
फसलों पर मौसम की मार के बारे में ज्यादातर बातें अकाल अथवा सूखे के बाद बाढ़ व ओलावृष्टि की ही पड़ती है लेकिन इस साल आदर्श रहे 'खुशहालÓ मौसम की मार धान के उत्पादन पर पड़ी है। जिससे प्रदेश में धान की उपज गिरी है। मानसून के दिनों और इसके अंत तक रहे अच्छे रहे मौसम के चलते आम धान का उत्पादन तीन फीसदी और बासमती व इसके जैसी किस्मों का उत्पादन छह फीसदी गिर गया है।
पंजाब कृषि विभाग के वैज्ञानिक व कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान उपज के इस सिद्यांत पर बताते हैं कि अच्छे फेवरेवल मौसम में किसी भी फसल का वेजीटेशन फेज बढ़ जाता है, पौधे ज्यादा हरे भरे हो जाते हैं, फैलते भी हैं, फूलते भी हैं पर फलते नहीं हैं। पौधा हरियाली का आंनद लेने लगता है। उसे किसी अन्य बात की फिक्र नहीं रहती, और वो बीज बनाने की ओर ध्यान ही नहीं देता। ऐसे में अपनी अगली पीढ़ी प्रति चिंता मुक्त पौधा उपज नहीं दे पाता।
डा. मान आगे बताते हैं कि यदि मौसम थोड़ा प्रतिकूल होता है तो पौधे तनाव में रहते हैं और वे अपनी नस्ल बचाने की कवायद में रहते हैं। सारा जोर री-प्रोडेक्शन करने में लगा देते हैं। अपना जीवन कम जान कर वे बीज बनाने लग जाते है। जिससे दाने ज्यादा बनते हैं।
दिलचस्प है कि प्रदेश मंडी बोर्ड के आंकड़े भी इसी के समर्थन में बोलते हैं। और पिछले साल की तुलना में उपज में आई गिरावट की कहानी दोहराते हैं।
उधर अपनी थ्योरी के पक्ष में उदाहरण दे डा. मान कहते हैं कि पीढ़ी बचाने के बारे में अक्सर इंसान व पशु भी तनाव में ही ज्यादा सोचता है।
साथ ही वे तर्क देते हैं कि जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक फसल में खाद भी खूब डाली थी पर झाड़ कम रह गया इसका भी यही कारण होता है कि पौधे अथवा पेड़ न अपना आनंद तो लेते हैं पर फल कम उतरता है।
 कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि इस बार के हालत भी कुछ ऐसे ही रहे, जब भी जरूरत हुई अंतराल पर बारिश होती रही, धूप भी खिलती रही, ना ही किसी बीमारी ने बड़ा हमला ही किया। फिर भी उत्पादन कम रहा। पिछले सालों का उदाहरण भी वे सामने रखते हैं। याद दिलाते हैं कि जब कभी अकाल की आशंका हुई या सूखे की मार पड़ी तो उपज बढ़ी है। हालांकि उन दिनों में कृषि लागत मुल्य बढ़ा और भूमिगत जल स्तर को जरूर नुकसान भी हुआ है।
धान की आम किस्मों का उत्पादन जहां पटियाला में बीते साल 12 लाख, 2768 टन की तुलना में 11 लाख 67 हजार, 688 टन रहा वहीं बासमती का उत्पादन एक लाख, 1102 टन से कम हो कर 95 हजार, 258 टन रह गया है।  

Tuesday, 29 November 2011

16 नवंबर को सजा, 25 को बरी और हर्जाना भी, electricity, open access, pserc, pspcl,

-नियमों के विपरीत बिजली कनेक्शन काटने के जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई भी होगी
-18.45 रूपये जुर्माने की वापसी छह दिसंबर तक और एक लाख रूपया हर्जाना देने के आदेश
-'ओपन एक्सेसÓ के तहत बाहर से बिजली लेने और पावरकाम बनने के बाद पहला मामला
भूपेश चट्ठा, पटियाला
'बड़े नामों को अक्सर देर से सजा क्यों मिलती है...Ó भ्रष्टाचार व मानव अधिकारों को लेकर बने और न्यायपालिका से लेकर पूरे सिस्टम पर बने और  टेलीविजन पर चल रहे इस विज्ञापन में संभव एक कमी भी है कि 'नाम बड़ा हो तो सजा देना भी आसान नहीं होताÓ और अगर तंत्र में निजी व्यवस्था शामिल हो जाए और नियम कानून लागू करने में एक भी कमी रह जाए तो सारा दांव उलटा पड़ जाता है और वो भी चंद दिनों में।
मनमर्जी से बिजली बिल भेजने और बकाया ना भरने और यहां तक कि किसी बिजली कर्मी के बनते 'मान-सम्मानÓ में थोड़ी भी कसर रहने पर सख्त परिणाम भुगताने के लिए कुख्यात रहे पूर्व पंजाब राच्य बिजली बोर्ड के पुराने दिन भी उसके साथ ही लद चुके हैं। बिजली अधिनियम 2003 के लागू होने के बाद बने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड और पंजाब स्टेट पावर ट्रांसमिशन कारपोरेशन लिमिटेड बनने के बाद 'ओपन एक्सेसÓ के तहत अन्य राच्यों अथवा पंजाब के बाहर से इंडस्ट्री को सीधे बिजली लेने देने के निर्णय के बाद पहला मामला सामने आया है जब एक मामले में16 नवंबर को जालंधर की एक फैक्ट्री जेएमपी इंडस्ट्री को पीक लोड आवर में बिजली ड्रा करने पर 'सजाÓ के रूप में बिजली कनेक्शन से हाथ धोना पड़ा।
उक्त इंडस्ट्री पर 18.45 लाख रूपये का जुर्माना ठोकते हुए तीन किश्तों में जमा करवाने के आदेश भी जारी हो गए। इस पर कंपनी ने 6.15 लाख रूपये की एक किश्त जमा करवाने के साथ ही पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेग्यूलेटरी कमीशन के पास अपील करते हुए अपना केस दायर कर दिया।
दिलचस्प है कि पीएसईआरसी ने सारी सुनवाई के बाद 25 नवंबर को कंपनी को बरी करने के साथ ही ग्राहक को नाहक परेशान करने व अवैध तरीके से नियमों के विपरीत कार्रवाई करने पर हर्जाना देने के आदेश भी जारी कर दिए।
पीएसईआरसी ने पीएसटीसीएल के चीफ इंजीनियर आरके शर्मा और ओपन एक्सेस के सुपरीटेंडिंग इंजीनियर एके मठारू पर नियमों के विपरीत बिजली कनेक्शन काटने पर कार्रवाई करने को भी कहा है। इसके अलावा 18.45 रूपये जुर्माने की राशि में से दी गई पहली किश्त की वापसी छह दिसंबर तक सुनिश्चित करने और एक लाख रूपया हर्जाना देने के आदेश भी दिए हैं।
वहीं पावरकाम प्रवक्ता का कहना है कि पीएसईआरसी के आदेशों अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई उक्त दोनों अधिकारियों के खिलाफ की जाएगी। साथ ही अधिकारी ये भी बताते हैं कि सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेग्यूलेटरी कमीशन के नियम पीक लोड के दौरान फ्रिक्वेंसी गिरने की स्थिति में भी बिजली लेने पर खामोश हैं, जबकि प्रदेश में 'ओपन एक्सेसÓ के तहत किसी भी इंडस्ट्री को तय सीमा से अधिक बिजली लेने की अनुमति नहीं है।
याद रहे कि उक्त इंडस्ट्री ने अपनी अपील में कहा कि ओपन एक्सेस में किए गए समझौते में यह कहीं नहीं कहा गया कि पीक लोड समय तक ही बिजली ली जाएगी। ऐसे में उसने बिजली ले कर गलत नहीं किया है। हालांकि बिजली इंजीनियर यह भी कहते हैं कि अगर फ्रिक्वेंसी च्यादा गिरे और उपभोक्ता लगातार बिजली लेते रहें तो ग्रिड के फेल होने का खतरा बन पड़ता है। संभव है कार्रवाई इसी स्थिति में की गई।

Monday, 28 November 2011

डॉलर की चढ़ाई से एक्सपोर्टरों की चांदी, doller-rupee, export

 -मार्च, 2009 के बाद पहली बार 52 रूपये के पार हुआ डालर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
एक ओर जहां डॉलर के 21 नवंबर को 52 रूपये का स्तर तोडऩे के बाद रिजर्व बैंक आफ इंडिया के हाथ पांव फूल रहे हैं उस पर देश का शेयर बाजार ना केवल गिरते डालर के साथ नीचे आ रहा है अपितु बाजार को भी नीचे की ओर खींच रहा है। वहीं एक्सपोर्टर के चेहरे डॉलर की चढ़ाई के साथ खिलने लगे हैं।
फारेक्स ट्रेडिंग के बाजार से जुड़े जानकार बताते हैं  कि डॉलर के दाम का 45 रूपये से 50 रूपये के बीच में रहने से किसी को एतराज नहीं था और इसे ट्रेडिंग के अलावा आयात निर्यात के लिहाज से भी ठीक ही समझा जा रहा था। यही वो रेंज थी जिसे भारतीय बाजार ने पिछले दो सालों से होल्ड कर रखा था पर बीते दो महीनों अथवा भारत में सर्दी व त्यौहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही डॉलर की तुलना में रूपये में गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ जो इस सप्ताह भी जा रही है।
ट्रेड जंक्शन पर फारेक्स में डील करते रवि एस आहलुवालिया बताते हैं कि तीन मार्च को डालर ने 52 रूपये का स्तर तोड़ा था और अब इसी सप्ताह 21 नवंबर को में 52.37 तक जाने के बाद 52.18 रूपये पर बंद हुआ और 22 नवंबर को 52.69 का रिकार्ड बनाया है। तीन महीने में सात फीसदी की बढ़ोतरी के बाद दो दिनों में तीन फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है। जिस तरह के हालात हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अगले छह महीनों में 54 रूपये के स्तर भी दिखाए जा रहे हैं। एक बार ये उपर निकला तो फि र उपर के स्तर का कुछ नहीं कहा जा सकता।
वहीं ब्रोकर आशीष गोयल कहते हैं कि पंजाब में बात लुधियाना की हो या अमृतसर की या फिर चंडीगढ़ के किसी ट्रेडर या कंपनी की च्यादातर ने 50 रूपये तक  डॉलर के जलाने की उम्मीद के साथ ही 'हैजिंगÓ कर रखी थी लेकिन 21 नवंबर को एक ही दिन मेंं दो फीसदी अथवा एक रूपये की गिरावट ने हर किसी का हिला कर रख दिया है, इसके अगले ही दिन 22 को फिर एक फीसदी की बढ़ोतरी हुई, लेकिन निर्यातकों को इसका लाभ तय है। तीन फीसदी की लाभ में अतिरिक्त बढ़ोतरी वो भी सीजन के दौरान कम नहीं आंकी जा सकती।
याद रहे कि पूरे ढ़ाई साल में डालर ने दस फीसदी का उतार और चढ़ाव देखा है ऐसे में दो फीसदी को आप बोनान्जा ही कहेंगे।

Thursday, 24 November 2011

सुनिए सरकार ! ये पत्थर कुछ कहता है, bye pass, southern, road,




शिलान्यास का सच दक्षिणी बाई पास
अधूरे काम : पिछली सरकार का सपना, इस सरकार में भी नहीं हुआ पूरा
एक दशक से ज्यादा मंत्रालयों की लड़ाई में लटका, अब छह साल से निर्माण में
 14 दिसंबर 2006 को 18 महीने में चालू करने की घोषणा से हुआ था शिलान्यास
भूपेश चट्ठा, पटियाला शाही शहर को भारी व सैनिक ट्रैफिक से मुक्त करने, चंडीगढ़ व अंबाला की ओर से आने वाले तथा समाना व संगरूर की ओर जाने वाले वाहनों को शहर के भीतरी यातायात में उलझने से बचाने के लिए बनाए जाने वाले दक्षिणी बाई पास का सपना सूबे की पिछली सरकार ने दिखाया था, लेकिन एक और सरकार का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी यह पूरा नहीं हो सका है। राजपुरा रोड को संगरूर रोड से मिलाने के लिए 18.8 किलोमीटर लंबे बाई पास को जमीन से करीब 13 फीट ऊपर उठाकर बनाए जाने वाले इस कोरीडोर का मामला एक दशक से ज्यादा केंद्रीय वन व रक्षा मंत्रालय समेत राज्य के लोक निर्माण विभाग की लड़ाई में लटका रहा। इसके बाद सेना के बार्डर रोड आर्गेनाइजेशन को निर्माण की जिम्मेदारी दे दी गई। 2007 के राज्य विधानसभा चुनावों की आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले 14 दिसंबर 2006 को तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बाई पास का शिलान्यास कर दिया। नींव पत्थर रखने के तुरंत बाद बताया गया कि 80 करोड़ रूपये की अनुमानित लागत से यह बाई पास करीब 18 महीने में चालू हो जाएगा। यदि मौसम, खासकर मानसून के सीजन में बाढ़ की मार पड़ी तो चार-छह महीने और लग सकते हैं। हकीकत ये है कि बाई पास के नीचे से निकलने वाली सड़कों के लिए बनने वाले ओवर ब्रिज आज भी निर्माणाधीन हैं और आगामी विधानसभा चुनावों की आदर्श चुनाव आचार संहिता लगने को है। बाई पास के लिए क्रासिंग पर सर्विस रोड, लूप रोड और कोरीडोर बनाने, सड़क के दोनों ओर तारबंदी अथवा किसी तरह के एंगल लगा रेलिंग लगाए जाने जैसे काम अभी शेष हैं। इसके अलावा सड़क चूंकि पूरी तरह से अत्याधुनिक व भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर बनाई जानी है और बड़े सैनिक वाहन इसका प्रयोग करेंगे, ऐसे में एक्सप्रेस हाईवे का रूप भी अभी दिया जाना है।

ना आम किसान को कमाई, ना लोगों को निवाला,vegitables, season, farmer, inflation


-मंहगी को अगेती लगा, दवा के दम पर वसूलते हैं मोटा मुनाफा
-50 के पार बिकी गोभी अब 'टोकेÓ से सस्ती

भूपेश चट्ठा, पटियाला
गोभी कभी पचास के पार होती है तो कभी पशुओं के चारे के बराबर आ जाती है। मटर की कीमत कभी तिहाई में पहुंचती है तो चंद सप्ताह बाद वही हरे रंग का मटर दहाई में भी नहीं आ पाता। दिलचस्प है कि सब्जी के दाम कब गिरेंगे? कब चढ़ेंगे? इसका अंदाजा हर किसान को होता है पर स्टीक अनुमान लगा जुआ खेलने वाले ही मोटी कमाई कर पाते हैं। ऐसे में आम किसान को कमाई नहीं होती और आम आदमी को सस्ती सब्जी तभी मिलती है जब जानवरों के चारे के बराबर आ जाती है।
सब्जियों के दामों में होने वाले उतार चढ़ाव पर 'दैनिक जागरणÓ ने पाया कि मंहगी बिकने वाली सब्जी को अगेती लगाया जाता है और दवाओं के दम पर उगा जिंदा रखा जाता है और फिर सीजन शुय होने से पहले ही मोटा मुनाफा भी वसूला जाता है। जबकि जल्द खराब होने वाली सब्जी पर रिस्क कम लेते हुए सीजन अनुसार ही काम करते है। सब्जी के दामों में होने वाले उतार चढ़ाव पर पूर्वानुमान लगाने में एक दो बार असफल रहने वाला आम किसान इस पंगे से दूर चला जाता है। जबकि आधुनिक पेस्टीसाइड व केमिकल डालने व टीके लगाने के अलावा पुराने देसी तरीके अपनाने वालों की भी कमी नहीं है। यहां तक कि देसी तरीके से तूड़ी के कुप में प्याज भर कर स्टोर किया जाता है और दाम बढऩे के बाद ही बाहर निकाला जाता है।
सब्जी कारोबारी बाबू लाल बताते हैं कि गोभी नवरात्र से दीपावली तक 50 के पार बिकने वाली गोभी अब पशुओं को डालने वाले 'टोकेÓ से सस्ती हो गई है। टोका सवा दो रूपये किलो बिक रहा है तो गोभी दस रूपये की ढ़ाई किलो पर आ गई है। मूली का भी यही हाल है। 120 रूपये किलो का मटर 60 पर आया आगे छह रूपये भी होगा जबकि मटर का प्रिजरवड दाना 60 रूपये किलो है।
हालांकि पीढिय़ों से फल सब्जी व फूलों के बीजों की खेती करते आ रहे प्लांट्स मैन एंड सीड्स के अब्दुल वाहिद कहते हैं कि दुनिया भर में मंहगाई बढ़ी है, डीजल, खाद, दवाएं, कृषि उपकरण सहित अन्य खर्चे बढ़े हैं लेकिन किसान को थोड़ा भी लाभ मिलता है तो शोर शुरू हो जाता है। जबकि होना तो यह चाहिए कि सरकार मार्केटिंग का पुख्ता प्रबंध करे।
वहीं फाइव एलीमेंट्स हैल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि जब, जो सस्ती हो तो समझो उसी का खाने का सीजन है और बिना जहरीले केमिकल के उपजी है। ऐसी सब्जी ही लाभकारी होती है जो प्राकृति के साये में उगे ना की प्राकृति के विपरीत जा कर।

Sunday, 20 November 2011

पंजाब में किसान यूनियन राजनीति गरमाई, farmer, confrence, politics,


-एक ने कहा सरकारी बंदे हैं, तो दूसरे ने कहा बहुराष्ट्रीय कंपनियां बनी हैं सपांसर
-देश भर के किसानों की महापंचायत 25 को अमृतसर में: लक्खोवाल
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
प्रदेश में पहली बार आयोजित की गई कंसोरटियम आफ इंडियन फारमर्स एसोसिएशन सीआईएफए की कांफ्रेंस ने किसान यूनियनों की राजनीति में गर्मी ला दी है। अब तक किसानों के मुद्दे पर एक दूसरे के साथ वैचारिक मतभेद रखने के बावजूद 'साड्डा ही बंदाÓ होने का दम भरने वाली यूनियनों ने एक दूसरे की कलई खोल दी है।
एक ओर जहां एसोसिएशन के राष्ट्रीय प्रधान के पद पर पहुंचे सतनाम सिंह बहरू के आज के शो से ठीक पहले भारतीय किसान यूनियन लक्खोवाल के प्रधान व पंजाब मंडी बोर्ड के चेयरमैन अजमेर सिंह लक्खोवाल ने मार्केट कमेटी के  कार्यालय में आ कर घोषणा कर दी की उनका संगठन देश भर के किसानों की महापंचायत का आयोजन 25 नवंबर को अमृतसर में करने जा रहा है। इसमें उत्तर भारत के 10 से 12 राच्यों के किसान नेता पहुंच रहे हैं।
इसी दौरान आयोजित संवाददाता सम्मेलन में सतनाम बहरू के कार्यक्रम में शामिल होने बारे पूछे जाने पर लक्खोवाल कहते हैं कि उन्हें बुलाया ही नहीं गया। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि ये चंद सरकारी बंदों का झुंड है। जो सरकार के लिए ही काम करता है। यहां तक कि केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय में इन किसान नेताओं को आफिस तक दिया गया है। हालांकि पंजाब सरकार की ओर से स्वयं ली गई सुविधाओं पर वे कहते हैं कि यह मंडी बोर्ड के चेयरमैन के रूप में हैं ना किसान यूनियन को दी गई हैं।
दूसरी ओर भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के जिला प्रधान डा. दर्शन पाल ने इसे प्रैस के माध्यम से कांग्रेस सांसद की ओर से चलाया जाने वाला प्रचार अभियान बताया है। डा. दर्शन पाल कहते हैं कि एक जागीरदार की बेटी और एक पूर्व राजा की पत्नि किसानों के मुद्दे कैसे समझ सकती है। जिन्हें सुलझाने का दावा कर रही है। साथ ही कहा है कि पूरा कार्यक्रम किसानों का खून चूसने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ओर से प्रायोजित है। दिलचस्प है कि मंच पर लगे बैनर का हवाला भी स्पष्ट रूप से दर्शाने को दिया गया। जिस पर कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रायोजक के रूप में दिखाया गया है।
डा. दर्शन पाल का कहना है कि दूसरी ओर हरसिमरत कौर जैसी राजनीतिक रूप से शक्तिशाली महिला को बुलाना और किसानों का मंच उपलब्ध करवाना खुदकुशी करने वाले परिवारों की भावनाओं से खिलवाड़ करने बराबर है।

एक मंच से अलग सुरों में बोली, परनीत व हरसिमरत, farmer, confrence, politics,


...किसान सम्मेलन

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कंसोर्टियम आफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन की ओर से आयोजित किए गए सम्मेलन में एक ही मंच से और एक ही मुद्दे पर विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर और सांसद हरसिमरत कौर बादल अलग अलग सुरों में बोली हैं। हालांकि दोनों ने ही अपनी अपनी सरकारों का बचाव करने और दूसरों को लपेटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
कंसोरटियम के आठवें सम्मेलन में कांग्रेस से सांसद परनीत कौर ने जहां खुद को किसान की बेटी बता इस मंच से राजनीतिक लाभ ना लेने की बात कह पंजाब में तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में किसान हित में लिए गए निर्णय कि आठ घंटे मुफ्त व निर्विघन बिजली देने के अलावा किसानों को दिए जाने वाले ऋण पर ब्याज को 14.5 फीसदी से कम करवा 11 फीसदी पर लाने के लिए पीठ ठोकी और मीडिया को भी 'निर्देशितÓ कर दिया कि यहां से जाने वाला संदेश 'राजनीतिकÓ नहीं होना चाहिए। परनीत कौर ने जहां खुद को एक पार्टी की सदस्य व सरकार में होने के साथ अप्रत्यक्ष रूप से अपना एजेंडा रखा और मंच से कहा कि वे प्रधानमंत्री से मिलकर इस कमेटी के लोगों को मिलने का समय एक सप्ताह में दिलवाएंगी। अर्थशास्त्री व राज्य सभा सदस्य एमएस स्वामीनाथन की रिपोर्ट को लागू करने प्रति विचार विमर्श करवाया जाएगा।
वहीं शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने जहां खुद को कृषि से जुड़ा होने हवाला दे किसानों के मंच से कांग्रेस व केंद्र को जमकर खरी-खरी सुनाई। संसद में अपनी ओर से उठाए गए किसानों के मुद्दों के साथ ही आंकड़ों के परिपेक्ष्य में हरसिमरत बादल ने कहा कि केंद्र जिन योजनाओं को अपनी बताता है वो पंजाब के पैसे से ही चल रही हैं। जितना टेक्स पंजाब से जाता है उसका 1.3 फीसदी ही पंजाब को अपने राज्य में विकास करने के लिए केंद्र लौटाता है। अगर दस फीसदी भी आ जाए तो पंजाब के हालातों में जमीन आसमान का अंतर होगा।
हरसिमरत ने सीधा हमला कर कहा कि देश का 1.98 फीसदी रकबे वाला पंजाब 60 फीसदी लोगों का पेट भी रहा है और केंद्र में ऐसे संस्थान है जो अतिरिक्त बफर स्टाक को संजोने में 27 हजार कारोड़ रूपये सालाना की दर से खर्च कर रहे हैं। जबकि 22 करोड़ लोग भूखे सोते हैं और सात हजार की हर रोज मौत हो रही है।
 इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि परनीत कौर ने बाहर निकलते ही प्रधानमंत्री से मिलवाने के सवाल पर कह दिया कि 'इसकी कोई समय सीमा नहीं है...कोशिश करते हैं...चार दिन तो नोटिस के ही हैंÓ। जबकि हरसिमरत ने कहा कि 'इनकी सरकार है ये लोग टिकट मांगने तो एक मिनट में मिल लेते हैं किसानों के मामले में आज तक समय नहीं मिला और आगे भी ऐसा ही चलेगाÓ।
दूसरी ओर केंद्रीय लाइब्रेरी में आयोजित किए गए सम्मेलन में प्रधान सतनाम सिंह बहरू ने कहा कि संसद के शीतकालीन सत्र में किसान चार से पांच दिन की विशेष चर्चा स्वामीनाथन की रिपोर्ट व किसानों के अन्य मुद्दो पर करवाने की मांग कर रहे हैं। चाहते हैं कि सत्ताधारी और विपक्ष दोनों के सांसद किसानों के मामलों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें।
महा सचिव पी चैंगल रेड्डी ने बताया कि आंध्र प्रदेश में एक लाख किसान खेती करना छोड़ गए हैं, क्योंकि गेहूं में ही दस हजार रूपये प्रति एकड़ का सालाना नुकसान हो रहा है।
 राजस्थान के किसान नेता कृष्ण कुमार ने कहा कि सरकार आज किसान केच्बच्चे को कम पौष्टिक आहार मिलने का तर्क दे मिड डे मील के नाम पर हाथ में कटोरा पकडऩे की आदत डाल रही है। सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के योगेश दाहिया ने किसानों को मुआवजा देने के तरीके पर सवाल उठाया और कहा कि गैस पाइप लाइन बिछानी हो या बिजली के खंबे लगाने हो कंपनियां पेड़ कटने से नुकसान की भरपाई मात्र भी नहीं करती पेड़ लगाने की कीमत देना अभी दूर की कौड़ी है। कार्यक्रम में तामिलनाडू व महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के किसानों ने कपास व चीनी सहित हर तरह की उपज के निर्यात खोलने की मांग रखी है।
हालांकि सम्मेलन में सांसद शरद पवार व नवजोत सिद्धू, पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू सहित बड़ी संख्या में किसान हितैषी नेताओं के पहुंचने की संभावनाएं भी जताई जा रही थी।