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Friday, 23 November 2012

देसी पर भारी पड़ा इटालियन बीज!


-कीमत में च्यादा पर लागत में एक तिहाई से भी कम, लोकप्रियता इतनी की लोग रिश्तेदारों से लाने लगे
-खेत में धान की फसल की नमी का सदुपयोग गेहूं की बिजाई में होता है

भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेहूं की खेती के मामले में अमेरिका व आस्ट्रेलिया से देसी तकनीक हमेशा से ही पिछड़ी रही है लेकिन अब इसमें इटली जैसा यूरोपीय देश भी शामिल हो गया है। गेहूं के देसी बीजों पर अब एक इटालियन बीज रबी के इस सीजन में भारी पड़ गया है। कम से कम घग्गर नदी के दोनों ओर पंजाब-हरियाणा में इस बीज की खासी लोकप्रियता बन पड़ी है।
इन बीजों से गेहूं की उपज कैसी रहेगी? इस प्रति पूरी तरह से आश्वस्त धर्मेहड़ी गांव के किसान बब्बू बताते हैं कि गेहूं की अगेती किस्मों में शामिल इटली का यह बीज इस साल पंजाब हरियाणा सीमा के इर्द गिर्द खासा लोकप्रिय है। आलम ये है कि बाजार में उपलब्ध ही नहीं है, वे भी अपने एक रिश्तेदार से लेकर आए हैं। वे बताते हैं कि उक्त विदेशी बीज पिछले साल भी बिका था पर इस बार तो देखते ही देखते बाजार से गायब हो गया।
वहीं गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि जीबी-1386 नाम का इटली का ये बीज देसी बीज की तुलना में एक तिहाई से भी कम डलता है। देसी बीज जहां एक एकड़ में करीब 40 किलो डाला जाता है। देसी बीज का एक थैला नौ सौ से एक हजार रूपये में आ जाता है और करीब 25 रूपये किलो पड़ता है। वहीं इटली से आयात हुआ ये बीज एक एकड़ में मात्र नौ किलो ही डाला जाता है पर मिलता 70 रूपये किलो पड़ता है।
 इतना ही नहीं 25 अक्टूबर से गेहूं की बिजाई का सीजन संवर्धित किस्मों के लिए शुरु हो जाता है। इस किस्म की बिजाई धान की फसल लेने के बाद मात्र पांचवे दिन ही बिना खेत तैयार किए ही कर दी जाती है। पर्यावरण संरक्षण के मामले में भी यह खासा उपयोगी है। बिजाई के दौरान सिंचाई के लिए पानी का प्रयोग नाममात्र होता है। इससे खेत में धान की फसल की नमी का सदुपयोग कर गेहूं की बिजाई के लिए किया जाता है।

बाक्स
कृषि विभाग ने नहीं की है सिफारिश

राच्य कृषि विभाग के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर बीज व मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल कहते हैं कि ऐसे किसी बीज की सिफारिश कृषि विभाग ने नहीं की है। बीज की लोकप्रियता के सवाल पर वे कहते हैं कि पिछले साल भी कई लोगों ने पंजाब-हरियाणा सीमा के क्षेत्र में बीज का प्रयोग किया था पर रिजल्ट अच्छे नहीं आए। इससे एक साल पहले भी रोपड़ में भी ऐसा ही बीज प्रचलित किया गया पर झाड़ नहीं बढ़ा। तब मात्र सात किलो बीज डालने की बात कही थी। बीज का नंबर, मार्का आदि बताते पर डा. सोहल कहते हैं कि इन लोगों ने कौनसा सरकार से अनुमति लेनी होती है जो चाहे नंबर रख लें।

Saturday, 3 November 2012

कहीं मूषक ना भोग लगा ले गेहूं के बीजों का!


-रबी के सीजन की शुरुआत से पहले खेत को चूहों से मुक्त करना होता है
-कृषि विभाग के पास चूहे मारने की दवा जिंक फास्फेट खरीदने का फंड नहीं
-विभाग तकनीकि जानकारी उपलब्ध करवाता है: डायरेक्टर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
भारतीय सभ्यता में हर काम से पहले गणेश जी को याद किया जाता है। शायद इसीलिए काम की शुरुआत को ही 'श्री गणेशÓ करना कह दिया गया है। त्यौहारों के दिनों में आस्था चाहे बढ़ती हो लेकिन उत्तर भारत में रबी फसलों की बिजाई से पहले और विशेष रूप सीजन की प्रमुख फसल गेहूं की खेती से पहले भगवान गणेश के वाहन को खेतों से मुक्ति दिलवानी होती है। इस साल मूषक मुक्त खेत करने कृषि विभाग के पास फंड नहीं है और बाजार में गैर सरकारी दवाओं में दवा कम और बीमारी ज्यादा बिक रही है।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि चूहे मारने में प्रयोग होने वाली दवा जिंक फास्फेट खरीदने का प्रबंध नहीं हो पाया है। हर साल गेहूं की खेती होती है और हर साल इसी साल्ट की दवा का छिड़काव किया जाता है, लेकिन अलग से कोष ना होने की सूरत में अब 'इधर-उधरÓ से फंड का बंदोबस्त करने में विभाग जुटा है।
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि धान की फसल लेने के बाद और गेहूं की बिजाई से ठीक पहले खेत को इन मूषकों से मुक्त करवाना होता है। बीज को धरती में डालने से पहले उसे तैयार करते समय प्रिजर्व करने की किसी भी जरूरी प्रक्रिया के समान ही यह भी अति आवश्यक कार्य होता है। अन्यथा अंकुरित होने तक गेहूं का बीज ही चूहे चट कर जाते है और दोबारा बिजाई करने तक समय निकल जाता है।
उल्लेखनीय है कि गोदामों में स्टोर किए गए अनाज पर भारी छिड़काव होता है और खेतों में से धान की कटाई के बाद यहां पर राज करने वाले चूहे खाने के लिए इधर उधर मुंह मारते हैं। इसी दौरान किसान का मंहगा बीज इन चूहों का आसानी से टार्गेट बनता है।
कृषि विभाग के डायरेक्टर डा. मंगल सिंह संधू कहते हैं कि रैट कंपैन इन दिनों के लिए बेहद जरूरी है लेकिन विभाग के पास इस क्षेत्र में करने को च्यादा कुछ नहीं है। विभाग के पास इस कार्य के लिए किसी तरह का फंड नहीं है। प्रदेश का कृषि विभाग किसानों को तकनीकि जानकारी उपलब्ध करवाता है। इस अनुसार 40 किलो बीजों में एक किलो जिंक फास्फेट मिला कर खेत में डालने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा खेत में मौजूद चूहे की बिलों को पहले बंद करना होता है। हर स्तर पर चूहे का प्रबंध करना होता है। फसल की बिजाई से लेकर कटाई तक ये सिलसिला चलता है।

Saturday, 21 July 2012

अब धान चलेगा गेहूं की चाल, Sowing Paddy in wheat style


जल संरक्षण
 -दस जिलों में राष्ट्रीय खादय सुरक्षा मिशन के तहत प्रति एकड़ किसान को मिलेगा तीन हजार का अनुदान

भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की पनीरी लगाने वाले मजदूरों की कमी और बैड प्लांटेशन के माध्यम से रोपाई करने वाली मशीनों के लोकप्रिय ना होने के चलते आखिरकार जल संरक्षण करने वाली धान की सीधी बिजाई को प्रचारित करने केंद्र व राज्य सरकार दोनों ही सहमत हो गए हैं। ऐसे में अब धान का भी गेहूं की चाल से चलना तय हो गया है।
धान की आम किस्मों के बाद गेहूं की तरह बासमती और दुनिया का सबसे लंबा चावल और किसान को सर्वाधिक फायदा देने वाली 1121 किस्म की सीधी बिजाई कृषि विभाग करवाने जा रहा है। इसके लिए केंद्र सरकार, प्रदेश के दस जिलों में 18 हजार हैक्टेयर में बिजाई करवाएगा। कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर (बीज) रहे और वर्तमान में मुख्य कृषि अधिकारी का कार्यभार संभाल रहे डा. बीएस सोहल बताते हैं कि  3-4 जुलाई से शुरू होने वाले इस अभियान में पहली बार पंजाब के किसानों को केंद्र सरकार के राष्ट्रीय खादय सुरक्षा मिशन के तहत प्रति एकड़ किसान को तीन हजार रूपये का अनुदान भी दिया जा रहा है। पंजाब में हालांकि कुल 27.80 लाख हैक्टेयर में हो रही धान की खेती हो रही है। ऐसे में यह आंकड़ा पौना फीसद से भी कम है, लेकिन किसानों में 'सीधी बिजाईÓ का संदेश देने के लिए काफी है। योजना के तहत प्रत्येक ब्लाक में तीन तरफ से सजी हुई एक वैन घूमेगी। साहित्य बांटा जाएगा। कृषि विकास अधिकारी किसानों की ओर से पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देगा। कृषि विशेषज्ञ डा. सोहल कहते हैं कि बासमती व 1121 किस्म की सीधी बिजाई का फायदा यह है कि इन दोनों को सबसे ज्यादा लगने वाली बीमारी 'फुट रोटÓ बिलकुल नहीं लगती। इससे पौधा एकदम से लंबा होकर गिर जाता है। इसी बीमारी से सहमे पंजाब के किसान ने उम्दा व लाभदायक किस्मों से तौबा की थी।
 दस जिलों को ही योजना में शामिल किए जाने पर कंसोरटियम आफ इंडियन फार्मर एसोसिएशन के प्रधान सतनाम सिंह बहरू कहते हैं कि ये योजना तो पूरे प्रदेश में लागू की जानी चाहिए।
दूसरी ओर विभाग के संयुक्त निदेशक डा. गुरसेवक सिंह संधू बताते हैं कि पंजाब से धान की रोपाई मात्र पर 750 करोड़ रूपये खर्च होते हैं। और रोपाई करने से प्रति वर्ग मीटर 20-22 पौधे ही लग पाते हैं जबकि ड्रिल से 33 पौधे लग जाते हैं। इससे उपज अधिक होती है। खेत को लगातार लबालब पानी से नहीं भरना पड़ता ऐसे में पानी की बचत खासी है। हर साल खुदवाने और गहरे करवाने वाले टयूबवेल से किसान को अलग से छुटकारा मिलता है।

 किसान के खर्च में सात हजार की कटौती
भूमिगत जल स्तर को होने वाले फायदे को एक ओर कर दें तो भी किसान को प्रति एकड़ सात हजार रूपये का फायदा है अथवा धान की रोपाई पर होने वाले खर्च में सीधी कटौती। इस अनुसार
-दो हजार रूपये पनीरी लगाने का खर्च सीधे तौर पर बचेगा
-खेत तैयार करने में ट्रैक्टर व अन्य मशीनरी की घिसाई और डीजल का खर्च नहीं होगा
- पनीरी लगाने से पहले खेत में किए जाने वाले कद्दू करने (जमीन पर पानी रोकने के लिए सुहागा फेर कर उसे सख्त बनाना) पर होने वाली मेहनत व डीजल का खर्च और टै्रक्टर को कोई नुकसान नहीं।

Saturday, 21 April 2012

खराब मौसम में सड़क पर आई फसल, wheat on roads, as lifting got delayed


लोगो: गेहूं की खरीद
प्रशासन ने संसाधन झोंके, ओवर लोड मंडियों में डाइवर्ट किए अतिरिक्त साधन
 लिफ्टिंग बनी मुसीबत
भूपेश चट्ठा, पटियाला

गेहूं की सांझ संभाल का करीब करीब आधा काम किसान के पाले में से निकल कर अब सरकारी खरीद एजेंसियों के कर्मियों के पाले में आ गई है, लेकिन करवट बदलते मौसम में गेहूं की लिफ्टिंग मुसीबत बन पड़ी है और अधिकतर मंडियों में गेहूं परिसर से बाहर निकल कर सड़कों पर आ गई है।

पटियाला की मंडियों में जहां गेहूं की आवक हर दिन नए रिकार्ड बना रही है वहीं खरीद की गति भी खासी तेज है। ऐसे में मंडियों में गेहूं के अंबार लग रहे हैं और दिन भर सूर्य देवता की आंख मिचौली के बीच चढ़े पारे ने कर्मियों की भी सांसे सुखा रखी हैं।

प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि जिले की 104 मंडियों में अब तक पांच लाख 10 हजार टन गेहूं की आवक हुई है और अब ये आंकड़ा पिछले साल के पांच लाख 54 हजार के करीब आ चुका है। इतना ही नहीं शुक्रवार को जहां गेहूं की आवक रिकार्ड के ठीक करीब एक लाख 16 हजार टन रही वहीं एक दिन की खरीद में पटियाला ने रिकार्ड बना दिया है। 20 अप्रैल के दिन एक लाख 24 हजार टन से च्यादा की खरीद की गई है।

जबकि लिफ्टिंग के मामले में आंकड़े बताते हैं कि 19 अप्रैल तक मंडियों में दो लाख 69 टन खरीदा गया गेहूं पड़ा था और इसमें आज हुई एक लाख 24 हजार टन खरीदी गई गेहूं और जुड़ गई। जिला प्रशासन यदि अपने सारे संसाधन लिफ्टिंग में लगाता है तो आंकड़ा एक दिन में 35 हजार पर ही आ पाता है। ऐसे में हालात आने वाले दिनों में सुधरने की संभावना ना के बराबर ही है।

जिला खादय एंव आपूर्ति विभाग की कंट्रोलर अंजुमन भास्कर का मंडियों में से खरीदी गई फसल की लिफ्टिंग पर कहना है कि खरीदी गई उपज की साथ की साथ ही ढुलाई करवाई जा रही है लेकिन साधनों की उपलब्धता सीमित है और बीते दो दिनों में गेहूं की रिकार्ड आवक हुई है, ऐसे में कुछ समय अवश्य लग सकता है। हालांकि जहां पर सड़क पर गेहूं आई है और मंडियों में रखने की जगह नहीं बची है वहां अतिरिक्त साधन भेजे जा रहे हैं जिससे दिक्कत ना हो।

वहीं जिला प्रशासन की ओर से ट्रक यूनियन को अधिक से अधिक ट्रक भेजने के निर्देश जारी किए गए हैं जिससे गेहूं की सीधी डिलीवरी रेलवे से करवाई जा सके। लिफ्टिंग के आंकड़ों में लगातार दर्ज हो रही गिरावट पर अब प्रशासन ये भी विचार कर रहा है कि जिले से चावल की ढुलाई कुछ समय के लिए रोक कर सिर्फ गेहूं को ही बाहर भेजने का काम किया जाए। कारण सिर्फ एक है कि गेहूं खुले में आ गया है और चावल अभी गोदामों में ही है।

Tuesday, 17 April 2012

गेहूं की चमक फीकी, नहीं खरीदेंगी एजेंसियां wheat facing luster losss


 -राच्य सरकार की पांच एजेंसियों के कर्मियों की तालमेल कमेटी ने की घोषणा
-कहा केंद्र सरकार की टीम आकर गेहूं को 'लस्टर लॉसÓ घोषित करे
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश में एक ओर गेहूं की फसल पर मौसम की मार पडऩे से उपज में नमी की मात्रा बढ़ी हुई है। गेहूं के गीली होने के चलते किसान की फसल मंडियों में ही पड़ी है। वहीं गेहूं की चमक फीकी पडऩे का हवाला दे कर खरीद एजेंसियों ने गेहूं की खरीद करने से ही इन्कार कर दिया है।
केंद्र सरकार के संस्थान फूड कारपोरेशन आफ इंडिया की ओर से गेहूं की खरीद के मापदंड अनुसार नमी की मात्रा 12 फीसदी से च्यादा नहीं होनी चाहिए, जबकि बारिश के चलते नमी की मात्रा 16-17 फीसदी तक आ रही है। इसी क्रम में अब एक नई तकनीकि खामी 'लस्टर लॉसÓ उभर कर सामने आ गई है। यह गड़बड़ी मौसम में नमी के चलते उभरती है ओर गेहूं का दाना अपनी प्राकृतिक चमक खो देता है।
गेहूं की चमक फीकी होने के राच्य सरकार की खरीदेंगी एजेंसियों ने ऐसी गेहूं की खरीद करने से इन्कार कर दिया है। राच्य सरकार की पांच एजेंसियों पनसप, पनग्रेन, मार्कफैड, वेयरहाउस और पंजाब एग्रो के कर्मियों की तालमेल कमेटी ने उक्त घोषणा कर दी है। पटियाला से शुरुआत करते हुए पनसप के प्रदेश प्रधान विधू शेखर भारद्वाज ने बताया कि जहां कहीं भी गेहूं का लस्टर लॉस होगा वहां गेहूं की खरीद नहीं की जाएगी।
तालमेल कमेटी का कहना है कि केंद्र सरकार की टीम पहले आकर गेहूं को 'लस्टर लॉसÓ घोषित करे। इसके बाद ही गेहूं की खरीद की जाएगी। कमेटी में पंजाब एग्रो के प्रदेश प्रधान बलजीत सिंह, मार्कफैड के प्रदेश उपप्रधापन सुरजीत सिंह टोहड़ा, पनग्रेन के गुरप्रीत सिंह चहल, वेयरहाउस के गुरप्रीत सिंह ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से भी अपील की है कि इस तरह की गेहूं को संभालना खासा मुश्किल है।
कमेटी का कहना है कि अगर गेहूं की खरीद इसकी पालिश के आधार पर नहीं की जाती तब तक खरीद संभव नहीं है। आने वाले दिनों में इस चमक के और फीका पडऩे की संभावना च्यादा है। याद रहे कि इस तरह की गेहूं को लंबे समय तक संभाल कर नहीं रखा जा सकता।

Friday, 13 April 2012

मौसम की मार, किसान लाचार, wheat, bad weather, farmer,


 गेहूं की फसल में एक सप्ताह की और देरी
बारिश का असर
-प्रभावित क्षेत्र में अगेती गेहूं की उपज में एक से दो क्विंटल की गिरावट
-तकनीकि कारणों से सरकार से मुआवजे की उम्मीद नहीं
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 गेहूं की फसल की कटाई के दिनों में चली तेज हवाओं के साथ आई बारिश ने सरकारी तौर पर देरी से चल रहे सीजन में कम से कम एक सप्ताह की और देरी कर दी है।
प्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं की सरकारी खरीद एक अप्रैल से शुरु की गई है, हालांकि पंजाब में गेहूं की कटाई परंपरागत रूप से वैसाखी पर ही शुरु होती है। इस साल चले लंबे सर्द सीजन के चलते सरकारी सीजन की तुलना में परंपरागत सीजन पर उपज मंडियों में आनी थी। लेकिन बारिश का प्रत्यक्ष रूप से असर ये हुआ की खेत गीले होने के अलावा गेहूं में नमी की मात्रा बढ़ गई। तय मापदंड अनुसार नमी 12 फीसदी से अधिक होने पर एमएसपी पर गेहूं का बिकना भी संभव नहीं है।
मौसम की मार पर भारतीय किसान यूनियन एकता डकौंदा के प्रधान डा. दर्शन पाल कहते हैं कि गेहूं की अपेक्षा सरसों को नुकसान च्यादा हुआ है, पक्की हुई फसल अथवा अगेती लगी गेहूं के झाड़ में बारिश से एक से दो क्विंटल की कमी आ सकती है जबकि देरी से बिजाई वाली पछेती किस्में पानी से गिर गई हैं। इनकी कटाई में परेशानी आएगी।
दिलचस्प है कि सरकार की ओर से किसी तरह का मुआवजा मिलने की किसान को कोई संभावना नहीं है। मौसम की मार पर मुआवजा तभी दिया जा सकता है जब नुकसान कम से कम 25 फीसदी हुआ हो, ऐसे में तकनीकि कारण सामने हैं।
इसी क्रम में कंसोरटियम आफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन के प्रधान सतनाम सिंह बहरू बताते हैं कि फिलहाल तो ईश्वर की कृपा से बच गए हैं पर लोगों में डर खासा है, संगरूर, मानसा जिलों में ओलों से नुकसान जरूर हुआ है। देरी से चल रहे सीजन में प्रदेश के शेष क्षेत्र में एक दम से कटाई का जोर पडऩे वाला है। तब प्रबंध करना मुश्किल होगा।
दूसरी ओर अब तक प्रदेश की मंडियों में मात्र नौ हजार टन गेहूं की आवक होने के चलते मंडियों में गेहूं का नुकसान नहीं हुआ है।

'बारिश व तेज हवाओं से फसल कई जगहों पर टेडी हो गई है, संभव है कि कंबाइन चलाने में दिक्कत आए, लेकिन झाड़ में कमी नहीं आएगी, क्षेत्र विशेष में नुकसान हुआ है। जहां कहीं ओले गिरे हैं, वहां दाने भी गिरे है और पौधे भी टूटे हैं, पर लंबे चले ठंडे मौसम के चलते कुल उपज पिछले साल की 112 लाख 68 हजार टन से च्यादा और 115 लाख टन से 120 लाख टन मंडियों में आने की उम्मीद हैÓ अजमेर सिंह लक्खोवाल, चेयरमैन पंजाब मंडी बोर्ड  

कणकां दी मुक गई राखी...wheat, season, late, start

-सरकारी तारीख से नहीं परंपरागत तिथि से शुरु होगा सीजन
-मंडियों में गेहूं आने में लग सकते हैं 10-12 दिन: मंडी अधिकारी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के जाने माने कवि धनी राम चात्रिक की लोकप्रिय पंक्तियां 'कणकां दी मुक गई राखी जट्टा आई बसाखीÓ इस बार सही मायनों में चरितार्थ होने जा रही है। प्रदेश में रबी की फसल के लिए रहे उपयुक्त तापमान के चलते इस सीजन में गेहूं की फसल सरकारी खरीद की तारीख से शुरु ना होकर परंपरागत रूप से शुरु होने वाले तिथियों के सीजन पर ही शुरु होने जा रही है।
हाल के वर्षो में सामान्य रूप से एक अप्रैल से गेहूं की सरकारी खरीद शुरु होती है। औपचारिक रूप से समय इस बार भी यही है जब न्यूनतम समर्थन मूल्य पर राच्य की छह सरकारी खरीद एजेंसियां और केंद्र सरकार के एक संस्थान भारतीय खाद्य निगम की ओर से गेहूं की खरीद एक अप्रैल से ही शुरु हो रही है, लेकिन फसल के अब तक हरा होने व कहीं कहीं तो पानी लगा होने के चलते मंडियों में आने की संभावना अभी नजदीक नहीं है।
दक्षिणी पंजाब में गेहूं की मंडियों में आवक के सवाल पर पटियाला के जिला मंडी अधिकारी जीएस औलख बताते हैं कि इस बार सीजन देरी से ही शुरु होगा, चाहे सरकारी खरीद के आदेशों के चलते एक अप्रैल के हिसाब से ही तैयारियां की गई हैं, लेकिन मंडियों में गेहूं के आने की फिलहाल संभावना नहीं है। फसल पकने में कम से कम 10 से 12 दिन अभी और ले सकती हैं।
वहीं भवानीगढ़ रोड पर स्थित संसारपुर गांव के प्रोग्रेसिव किसान हरजिंदर बदेशां कहते हैं कि ये सही है कि फसल को पूरी तरह से पकने में अभी कुछ दिन लगेंगे लेकिन मौसम में किसी तरह की विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं तो हालात बदल भी सकते हैं। आसमान में बादल होने और बारिश की संभावना हुई तो किसान कंबाईन खेत में लेजाने से गुरेज नहीं करेगा बशर्ते खेत की जमीन सूखी हो और कंबाईन चल सकती हो।
दूसरी ओर मंडी बोर्ड के अधिकारी बताते हैं कि गेहूं के एमएसपी 1285 रूपये प्रति क्विंटल पर खरीद करने मंडियों में सभी तरह के प्रबंध किए जा चुके हैं। इनमें बिजली पानी के प्रबंध के टेंडर लगाए जाने के अलाव ग्रामीण स्तर पर मंडियों की सफाई का काम चल रहा है जिसे अगले दो दिनों में निपटा लिया जाएगा।

Tuesday, 27 March 2012

गेहूं बीमारी से बचा, पर बादलों में फंसा, wheat yield may increase by 2 percent


 उम्मीद : उत्पादन एक से दो फीसदी बढ़ने की संभावना, पर बारिश हुई तो नुकसान
भूपेश चट्ठा, पटियाला सर्दियों में कभी लंबे समय तक कोहरा तो कभी पाला। यदि दोनों न हों तो तेला और चढे़ पारे की मार। इस बार रबी के सीजन में ऐसा कुछ नहीं हुआ। गेहूं की फसल हर बीमारी से बची रही, पर अब पकने को तैयार है तो बादलों में उलझ कर रह गई है।
 किसान को आशंका है कि कहीं समाप्त होते सीजन में जाते जाते मौसम की मार न पड़ जाए। हालांकि बकौल कृषि माहिर, सब कुछ ठीक रहा तो उपज पिछले साल की तुलना में बढ़नी तय है। डकाला ब्लाक के धर्मेहड़ी गांव के प्रोग्रेसिव किसान गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि इस बार पीली कुंगी जैसी बीमारी की मार नहीं पड़ी है और सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन आसमान को देखते ही हौसले पस्त हो रहे हैं। ऐसे हालात में अगर बारिश आई तो नुकसान तय है। बारिश के बाद चलने वाली हवा से पौधे का गिरना तय है। इससे न केवल दाने बल्लियों से बाहर बिखरेंगे, बल्कि कंबाइन से कटाई भी मुश्किल हो जाएगी। 
इसी प्रकार घनौर ब्लाक के सील गांव के हरदीप सिंह बताते हैं कि इन दिनों बिलकुल साफ मौसम और तेज धूप की जरूरत गेहूं को है, जिससे दाने भली प्रकार पक जाएं और पौधे से बीमारी छंट जाए। पर आखिरी पानी के समय से आसमान पर बादल छाए हैं जिससे दाने में नमी के आसार बढ़े हुए हैं। 
वहीं मुख्य कृषि अधिकारी डा. राजिंदर सिंह सोही बताते हैं कि इस बार बारिश की मार न पड़े तो झाड़ एक से दो फीसदी बढ़ना तय है, लेकिन बादलों के ऐन उपज लेने के समय आ जाने ने डर बढ़ा दिया है। सीजन के दौरान उपजे हालात पर डा. सोही कहते हैं कि तेले की कहीं-कहीं हल्की मार पड़ी है और येलो रस्ट अथवा पीली कुंगी भी कुछ जगह देखी गई है, लेकिन इससे भी ज्यादा नुकसान की आशंका नहीं है। तेले पर समय रहते दवाओं का छिड़काव करवा दिया गया तो येलो रस्ट की मार सीमित रही है। हवा में से पैदा होने वाली यह कुंगी तापमान के 23 डिग्री पर आते ही स्वत: झड़ जाती है। ऐसे में इससे भी नुकसान की संभावना कम है।

Tuesday, 27 December 2011

सर्दी से रुका गेहूं के पौधे का विकास, wheat, weather, winter,


गेहूं पर पीली कुंगी का खतरा अभी तक नहीं  यूरिया संयम से डालने की सलाह

भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में फसलों के लिए वरदान कहे जाने यहां के मौसम में थोड़ी सी भी गड़बड़ देश की विकास दर को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। दिसंबर मध्य के बाद भी बारिश न होने से पड़ रही सूखी सर्दी से फसल को नुकसान पहुंच रहा है। इससे गेहूं के पौधे का विकास मानो थम सा गया है।
इन दिनों होने वाली बारिश से पौधे की हल्की सिंचाई हो जाती है। इससे पत्ते पर जमा कोहरा व गर्द धुलने के साथ ही जड़ों को आक्सीजन मिल जाती है। इससे पौधे का विकास होता है। जबकि 'नक्का' तोड़ लगाए जाने वाले पानी से सिंचाई जरूरत से ज्यादा हो जाती है। जिससे जड़ों में पानी जमा हो जाता है और दम घुटने से पौधे का विकास तेजी से नहीं हो पाता।
कृषि विकास अधिकारी डा. एएस मान कहते हैं कि इन दिनों में ऐसा हर साल होता है। इसमें घबराने की जरूरत नहीं है। कई बार फसल के पीला पड़ते ही किसान ज्यादा मात्रा में यूरिया डाल कर अतिरिक्त प्रयास करते हैं। इससे पौधे झुलस जाते हैं। इस साल बीच-बीच में धूप निकलने से गेहूं की फसल पीली नहीं पड़ी। कुछ दिन में पारा चढ़ने पर हालात बदलने की पूरी संभावना है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया चलेगी और फिर जनवरी में पारा चढ़ने पर गेहूं की फसल खिल उठेगी। उनका कहना है कि जल्द आई बारिश अगेती बिजाई वाली गेहूं के लिए तो ठीक रही पर पछैती को मार सहनी पड़ रही है।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि गेहूं की फसल को प्रदेश में सबसे अधिक मार पहुंचाने वाली बीमारी पीली कुंगी का खतरा अभी तक कहीं भी देखने को नहीं मिला है। धुंध के बाद अगले दिन मौसम के खुल जाने के चलते दिन का तापमान बढ़ जाता है, जिससे नुकसान नहीं हुआ है। अगर इन दिनों बारिश हो जाए तो सोने पे सुहागा होगा। गेहूं के अभी तक बचे रहने के अलावा अन्य फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव पर वह कहते हैं कि सीजन में सब्जियों विशेष रूप से आलू-मटर पर कोहरा भारी पड़ सकता है।

Sunday, 20 November 2011

सोने के रखवालों का शरीर हुआ मिट्टी, food, storage, grain, employee, fci, wheat,

-एफसीआई के गोदामों में काम करने वाले मजदूरों-कर्मियों का स्नायू तंत्र प्रभावित
-धरती पर, गेहूं की बोरी में, बोरियों के उपर, हवा में एयर चार्जिंग के लिए छिड़के रसायनों का असर

-मैलाथीन महीने में दो बार, डीडीवीपी 21 दिनों पर, डेल्टा मैथलीन तीन महीने पर और सल्फास सदा के लिए

भूपेश चट्ठा, पटियाला

अनाज के गोदामों में रखे गए सोने को संजोए रखने होने वाले रसायनों के छिड़काव ने इसके रखवालों का शरीर मिट्टी का बना दिया है। फूड कारपोरेशन आफ इंडिया सहित हर खरीद एजेंसी के गोदामों में रखी गई गेहूं से होने वाले प्रभाव से अंजान कोई नहीं है पर ईलाज के नाम पर भी च्यादा कुछ नहीं है।

गोदामों में रखी गई बोरियों में दवा डालने के अलावा इसकी जमीन व हवा को भी 'सुरक्षितÓ रखने के चक्कर में पूरा वातावरण जहरीला किया जाता है। एफसीआई के वीके बत्ता बताते हैं कि बोरी रखते ही इस पर डेल्टा मैथलीन का स्प्रे कर दिया जाता है। हर तीन महीने पर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है। इसके तुरंत बाद खाली जगह में डीडीवीपी का छिड़काव होता है, एयर चार्जिंग के नाम पर किसी पतंगे को भी ना फटकने देने वाला यह स्प्रे 21 दिनों के अंतराल पर रिपीट होता है। हवा में उड़ती 'भुंडीÓ, 'भमक्कड़Ó इस वायु के संपर्क में आते ही जमीन पर ऐसे गिरते हैं मानों किसी ने एंटी एयरक्राफ्ट गन से गिराया हो।

इन सबके बावजूद यदि कीड़ा लगने की संभावना होने पर एल्मोनियम फास्फेट का प्रयोग होता है। ये वो गेहूं की बदनाम गोली है जिसे सल्फास कहते हैं और पंजाब में खुदकुशी करने वालों में प्रचलित रही है। वीके बत्ता बताते हैं कि इससे बीमारी की बात ना करें ये तो जान लेती है, गोली पानी के संपर्क में आते ही जहरीली गैसें छोड़ती है।

बात यहीं समाप्त नहीं धरती के नीचे से कार्रवाई करने वाले दीमक अथवा दाने में पैदा होने वाली 'सुसरीÓ के लिए मैलाथीन का स्प्रे महीने में दो बार जरूरी है, तभी गेहूं को बचाया जा सकता है कीट पतंगों और कीड़े मकौड़ों की जान लेने वाले ये रसायन इंसानों के लिए भी कम घातक नहीं हैं।

इसी क्रम में जतिंदरवीर सिंह कहते हैं कि कर्मियों को नियमित खांसी आम है, दमा और हाईपर टेंशन से शायद ही कोई बचा हो, लंबा समय रहने पर अस्थमा व सांस के रोग घेर लेते हैं। सरकार के पास दस्ताने व मास्क देने से च्यादा कुछ नहीं है। जबकि जालंधर जैसे मुख्य शहरों को छोड़ दें तो अन्य जगहों पर ऐसे अस्पतालों से ही कोई समझौते नहीं किए गए हैं जिसके तहत कर्मी जा कर चिक्तिसा जांच करवा सकें।

वहीं कम्यूनिटी मेडिसीन में एमडी और एपिडमोलोजिस्ट डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि इन रसायनों से इंसान की बीमारी से लडऩे की क्षमता ही खत्म हो जाती है। जुकाम से लेकर कैंसर तक की हर बीमारी की पकड़ में ऐसा व्यक्ति जल्दी आता है। प्राकृति से हमें तोहफे में मिले इम्यून सिस्टम में कमजोरी आती जाती है। जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है।

Thursday, 19 May 2011

गेहूं पर बारिश ने भुलाया किसान को बोनस, wheat, weather, may 3rd


-बारिश के बाद चली हवा से ज्यादा नुकसान
-रात में कंबाईन मशीन चलाने की अनुमित देने की मांग उठने लगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला

मौसम में लगातार बनी हुई नमी और बीच बीच में होने वाली बारिश और विशेष रूप से रात में चली रही तेज हवाओं ने किसान की सुध-बुध खो दी है। ऐसे में गेहूं पर मिले 50 रूपये प्रति क्विंटल के बोनस को कम से कम वो किसान बिलकुल तव्वजो नहीं दे रहा जिसकी फसल अभी खेतों में खड़ी है। बोनस को भूला किसान ईश्वर के आगे अरदास में लगा है कि किसी तरह से मौसम शुष्क हो और पश्चिमी हवाएं चलें जिससे उपज लेने में आसानी हो और दाना जल्द पक कर सूख जाए तो बेचने में भी कोई दिक्कत ना आए।

प्रदेश में रबी की प्रमुख फसल गेहूं पर देश भर की निगाह टिकी है और गेहूं के परंपरागत सीजन की शुरूआत के बाद और मंडियों में गेहूं के आने में आई तेजी के बाद से फिर शुरू हुई बारिश से राज्य का किसान सहमा है। गेहूं की देर से हुई बिजाई के चलते इन दिनों की बारिश संभवत पौधे बर्दाश्त कर लेते लेकिन साथ आई तेज हवाओं ने रिकार्ड उपज पर सवालिया निशान लगा दिए है। तेज हवाओं से गिरे पौधों ने हालत ऐसे कर दिए है कि कंबाईन तो दूर की बात हाथ से कटाई करनी भी मुश्किल हो गई है।

किसानों की ओर से मांग उठने लगी है कि ऐसे मौसम में रात के दौरान भी कंबाईन मशीन चलाने की अनुमित दी जाए जिससे ठीक मौसम वाले दिन काटाई हो जाए। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि रात में कंबाईन चलाने पर तूड़ी ज्यादा बनती है और दाना मोटा रहता है।

वहीं कंर्सोटियम आफ इंडियन फार्मर्स ऐसोसिएशन के प्रदेश प्रधान सतनाम सिंह बहरू कहते है कि पश्चिम से हवाएं चलती हों और मौसम ठीक रहे तो कटाई कभी भी हो सकती है। इस बार तो सभी तरफ नुकसान हो रहा है। देवीगढ़ क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। साथ ही उन्होनें केंद्र की ओर से घोषित किए गए कम बोनस और राज्य की ओर से मध्यप्रदेश, कर्नाटक व आंध्र प्रदेश सरकारों के समान किसान को अपनी ओर से लाभ ना दिए जाने की कड़ी आलोचना की है।

अनाज भंडारण: चुनावी गेहूं सबसे बड़ा सरदर्द? storage, wheat, food, rotton

2009 मई में खरीदी गई चार लाख 4187 टन गीली गेहूं कर चुकी है उम्र पूरी
-राच्य सरकार की चार एजेंसियों पर पड़ी सबसे च्यादा मार

भूपेश चट्ठा, पटियाला

चुनाव सर पर हों तो सत्ताधारी राजनीतिक दल को एंटी इंक्बेंसी फेक्टर की चिंता सबसे च्यादा सताती है मई 2009 में हुए लोकसभा चुनावों से ठीक पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ गेहूं खरीद के दिनों में बारिश आई तो उपज खेत और मंडी दोनों जगहों पर भीग गई लेकिन वोटदाता किसान कहीं नाराज ना हो जाए इसका प्रबंध कर लिया गया और हर तरह का गेहूं खरीद लिया गया इसमें बारिश में भीगा हुआ गेहूं भी शामिल है।

कथित रूप से सरकारी अफसरों के दवाब तले अधिक नमी वाला ये चुनावी गेहूं आज पंजाब सरकार से लेकर केंद्र तक सभी के लिए बड़ा सरदर्द बन गया है। तकनीकि रूप से 12 फीसदी से ज्यादा नमी वाले गेहूं की खरीद नहीं की जा सकती। विभाग के उच्च स्तरीय सूत्र बताते है कि चार लाख 4187 टन गेहूं गुणवत्ता के हिसाब से ठीक नहीं रहा। ठीकठाक से गेहूं की सेल्फ लाइफ दो साल से अधिक नहीं होती, खुले में या एक बार भीगने के बाद यह सीमा एक साल में सिमट जाती है।

दिलचस्प है कि घटिया गेहूं के लिए केंद्रीय खरीद एजेंसी एफसीआई राज्य की खरीद एजेंसियों पर अब एक ओर रिकवरी का दवाब बना रही है, जबकि राच्य की खरीद एजेंसियों की कोआर्डिनेशन कमेटी कह रही है कि वर्ष 2009 में 105 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी इस अनुसार ये साढ़े तीन फीसदी से भी च्यादा नहीं है। ऐसे में या तो एफसीआई इसे पूर्व में लाई गई ओपन मार्केट सेल्स की योजना के तहत इससे कुछ वसूली कर ले या फिर गेहूं से बिक्री कर वसूलने वाली राज्य सरकार इसकी कीमत वहन करे, लेकिन इसमें की जा रही देरी इसे जानवरों के खाने लायक भी नहीं छोडऩे वाली। अन्यथा वोदका बनाने अनाज सड़ा दिया के आरोप लगने तय है।

पंजाब फूडग्रेन एजेंसियों की संयुक्त तालमेल कमेटी के प्रधान भूपिंदर सिंह कहते है कि इस साल 31 मार्च तक पंजाब में 46 लाख टन गेहूं ढुलाई के इंतजार में है। इसमें दुत्कारा जाने वाला भीगा हुआ चुनावी गेहूं एफसीआई के एजेंडे पर बिलकुल नहीं आ रहा है।

भूपिंदर सिंह बताते है कि पनग्रेन के पास कुल छह लाख 43 हजार टन गेहूं है तो 2009 का 25 हजार टन है। इसी प्रकार मार्कफैड के पास कुल 14 लाख 71 हजार टन में से 2009 का एक लाख 62 हजार टन, पनसप के कुल 11 लाख 92 हजार टन में से 88147 टन, पंजाब वेयर हाउसिंग कारपोरेशन लिमिटेड के कुल छह लाख 13 हजार टन में से 51061 टन चुनावी गेहूं है तो पंजाब एग्रो का ये आंकड़ा कुल सात लाख 22 हजार टन में से 77286 टन भीगे हुए गेहूं का है।

Monday, 4 April 2011

गेंहू की आवक नाममात्र, नमी अधिक,wheat, crop,


-राजपुरा के अलावा जिले की अन्य 98 मंडियों में नहीं आई फसल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बेमौसमी बारिश और बिजाई में आधुनिक तकनीक अनुसार हुई देरी के चलते मंडियों में गेहूं की आवक नाममात्र ही है। जिले में गेहूं खरीद के बनाए गए 99 केंद्रों में से मात्र एक राजपुरा में फसल आई है। हालांकि यहां आई किसान की उपज में भी नमी की अधिकता होने की वजह से यह भी नहीं बिक पाई है।
न्यूनतम समर्थन मुल्य पर होने वाली सरकारी खरीद शुरू हुए चार दिन बीत जाने के बाद भी जिले में अभी तक 40 टन गेहूं ही आया है। जबकि बीते साल यदि बनूड़ क्षेत्र की मंडियों में आई गेहूं की आवक को अलग भी रखा जाए तो भी जिले में आवक 24 सौ टन से उपर रही थी।
जिला मंडी अधिकारी जीएस औलख बताते है कि अभी तक सिर्फ राजपुरा की मंडी में गेहूं आया है। यहां भी मात्र 40 टन आवक तीन अप्रैल रात तक की पहुंच है। चूंकि गेहूं में नमी की मात्रा 18-20 फीसदी के आसपास आ रही है ऐसे में अभी तक खरीद नहीं हुई है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दो सप्ताहों में हुई दो बारिशों ने इस बार पहले ही परंपरागत समय पर आने वाली गेहूं की उपज को मंडियों में आने से थोड़ा और रोक दिया है। ओलावृष्टि व तेज हवाओं के साथ चली बारिश ने गेहूं के दाने में नमी बढ़ा दी है और बारिश की वजह से गिरे पारे ने फसल के पकने में और देरी कर दी है। जबकि इन दिनों में पौधे को खिली धूप की ज्यादा जरूरत होती है। केंद्र सरकार की ओर से एमएसपी पर गेहूं की खरीद के तय किए गए मापदंड अनुसार 12 से 14 फीसदी नमी वाले गेहूं की खरीद की जा सकती है। चूंकि पंजाब सरकार ने 12 फीसदी से अधिक नमी वाले गेहूं पर लगाए जाने वाली मूल्य कटौती का अपनी खरीद नीति में कहीं भी जिक्र नहीं कर रखा है ऐसे में पंजाब में 12 फीसदी से अधिक नमी वाले गेहूं की खरीद सामान्य परिस्थितियों में नहीं की जाती।
जानकार कहते है कि अभी क्षेत्र की मंडियों में गेहूं का सीजन शुरू होने में समय लगेगा, लेकिन एक बार तापमान तेज होने पर गेहूं की आवक एकदम तेज होगी और ढेर लगने में भी देरी नहीं लगेगी। राज्य में खरीद एजेंसियों के कर्मियों की ओर से की जा रही हड़ताल का असर भी दिखाई देने में कम से कम एक सप्ताह और लगने वाला है.

Tuesday, 22 March 2011

गेहूं परंपरागत समय पर, बंपर फसल होगी wheat, , trends, vesakhi, MSP


-वैसाखी मनेगी गेहूं कटाई से एमएसपी से नहीं
-लंबी चली सर्दी ने दी राहत, पौधे पर ज्यादा शाखाएं फूटी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हरित क्रांति के बाद से किसान रबी के मौसम वैसाखी  की का कम और एमएसपी का ज्यादा याद कराता आया है, लेकिन इस साल पंजाब का किसान वास्तव में खेत में गेहूं की फसल की कटाई वैसाखी  मनाने जा रहा है। जी हां कुदरत ने सालों बाद पंजाब को पंजाब का मौसम बक्शा है जब लगातार और लंबी चली सर्दी के चलते गेहूं का पौधा अपनी उपज मार्च अंत में ना देकर अप्रैल के दूसरे सप्ताह में देने जा रहा है और हालात साफ तौर पर कह रहे है कि गेहूं बंपर होगी और इसकी उपज पिछले सारे रिकार्ड तोडऩे जा रही है। कृषि  विभाग ने इन दिनों लगने वाले उपज के अनुमान को ही  आगे बढ़ा दिया है।

पिछले साल मानसून के लंबा चलने और फिर नवंबर में पारे के चढ़े रहने के चलते गेहूँ की बिजाई में आधुनिक कृषि अनुसार देरी हुई लेकिन परंपरागत अनुभव व ज्ञान में यकीन करने वाले फाईव एलीमेंट हैल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि पंजाब में देसी किस्मों की बिजाई लोहड़ी तक चलती थी और वैसाखी  पर शगुन के तौर पर 'टक' लगाया जाता था पर अब एमएसपी एक अप्रैल से आता है तो किसान गीली उपज ही  मंडियों में फैंक आता है। जो हर किसी के लिए सरदर्द बनती है। आजकल उठे बादलों पर वे कहते है कि ये बारिश भी  नुकसान नहीं करने वाली बशर्ते ओले ना पड़े। दिसंबर अंत तक चली बिजाई और फिर बराबर अंतराल पर आई बारिश कोहरे को ओस में बदलती रही, पारा कम रहा जिससे शाखाएं ज्यादा फूटी, लंबी चली सर्दी ने गेहूं की बल्लीयों को भी  बड़ा होने का मौका मिला तो दाने ज्यादा आने तय है।
 
वहीं कृषि विशेषज्ञ डा.  बीएस सोहल कहते है कि इस साल गेहूं पर पीली कुंगी की मार पड़ी और तेला या अन्य कोई बीमारी नहीं लगी है। पीली कुंगी का असर  सभी  जगहों पर नहीं हुआ। यह पहाड़ी क्षेत्रों विशेष रूप से जम्मू  कश्मीर से होती हुई पंजाब में आती है। रोपड़ और गुरूदासपुर इसके एंट्री पवांइट है। पीली कुंगी की मार ऐसे ही कुछ क्षेत्रों में पड़ी है। जहां पर गेहूं की उपज पर प्रभाव पडऩा तय है। शेष क्षेत्रों में फसल पिछले साल की तुलना में बढऩे की संभावना ज्यादा है। सरकार ने भी  सबसीडी पर एक लाख  लीटर दवा बंटी है जिससे बीमारी नियंत्रित रही। अक्सर फरवरी के तीसरे सप्ताह में तापमान बढ़ता है लेकिन इस बार मार्च के दूसरे सप्ताह तक मौसम ठंडा रहा। वे कहते है कि सब कुछ ठीक रहा तो पिछले साल से उपज काफी अधिक रहेगी।

वहीं मुख्य  कृषि अधिकारी एससी खुराना कहते है कि कृषि  विभाग ने अभी  अनुमान नहीं लगाएं है। लेकिन पिछले साल की तुलना गेहूं अच्छी रहनी चाहिए। अगले सप्ताह तक यदि कोई बड़ी मार नहीं पड़ती है तो सब कुछ ठीक ही रहेगा। 

Thursday, 3 March 2011

अब बस भी करो मेघा..


गेहूं की जरूरत : तेला धुला पर पीली कुंगी की मार बढ़ने का अंदेशा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 जब गेहूं को ठंड की जरूरत थी तो फरवरी के शुरू में ही तापमान बढ़ गया और अब फसल पकने को है तो पारा लुढ़क कर नीचे आ गया है। रुक-रुक कर लेकिन लगातार हो रही बारिश से मौसम में आई नमी गेहूं की उपज को विपरीत रूप से प्रभावित करने को है। महंगे कीटनाशकों से जूझ रहा किसान अब आसमान से गुहार लगा रहा है,मत बरसो मेघा, मानसून का इंतजार कर लो। धर्मेड़ी गांव के किसान गुरप्रीत सिंह कहते है कि कुदरत के आगे किसी की नहीं चलती, यहां कोई बीमा भी नहीं करवाता, सब कुदरत पर छोड़ा जाता है, और अब कुदरत का बिगाड़ है यही ठीक करेगी। पिछली बार धान के सीजन में भी किसान बाढ़ का शिकार हो गया था और अब भी यही हालात बने हुए हैं। आज गर्म मौसम की जरूरत है, बल्लियां निकलने को हैं और दाना तभी बेहतर ढंग से बनेगा अगर मौसम में नमी नहीं होगी और ज्यादा से ज्यादा शुष्क रहेगा। ऐसे ही संसारपुर में प्रोग्रेसिव फार्मिग करवा रहे हरजिंदर सिंह बदेशां कहते हैं कि तेले की मार से उभरे ही नहीं थे कि अब पीली कुंगी आ गई, ऐसे में मार तो पड़नी तय है। अब कितनी पड़ेगी, यह आने वाले दिनों में खिलने वाली धूप पर निर्भर करता है। हालांकि क्षेत्र में जिन किसानों ने अपनी मनमर्जी से किस्मों की बिजाई की है, वे ज्यादा चपेट में आई है। उधर मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना कहते है कि ऐसा मौसम गेहूं को तो यह खराब ही करेगा, बारिश के बाद हवा चली तो नुकसान कई गुना बढ़ सकता है। कृषि अधिकारी बताते हैं कि इन दिनों में बारिश के साथ ओलावृष्टि की संभावना ज्यादा रहती है। जिन किसानों ने फसल को पानी लगा रखा है और उपर से बारिश के साथ हवा चली है वहां पौधे के गिरने की संभावना बन पड़ती है। कृषि विभाग की ओर से 50 फीसदी सब्सिडी पर प्रोपेगोणजोल अथवा टिल्ट स्प्रे करने को कहा गया है। इसकी कम से कम एक और जरूरत पड़ने पर दो स्प्रे 15 दिन के अंतराल पर किए जा सकते हैं। साथ ही वे यह भी कहते है कि किसान अब इस प्रति काफी जागरूक है लेकिन विभाग भी बराबर प्रचार कर रहा है।

Friday, 14 January 2011

बारिश ने धोया कोहरा, बंपर फसल की उम्मीद जगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश में ठीक एक पखवाड़े के अंतराल पर आई सीजन की दूसरी बारिश ने फसलों पर चिपके कोहरे को धो दिया है। हर लिहाज से बेहतर कही जा रही बारिश ने इस बार बंपर फसल की उम्मीद जगा दी है।
रबी के मौसम की मुख्य फसल गेहूं के लिए सोने पर सुहागा कही जा रही बारिश पर गांव संसारपुर के किसान हरजिंदर सिंह बिदेशां कहते हैं कि इसने पौधे के पत्तों को करीने से साफ कर दिया है मानों किसी ने हर पौधे को नहलाया हो। गेहूं के अलावा खड़ी सब्जियों को ज्यादा लाभ दिख रहा है। बीमारी न लगने से पेस्टीसाइड का खर्च भी कम रह जाना है।
गांव धर्मेड़ी के किसान गुरप्रीत सिंह का कहना है कि एक निश्चित अंतराल के बाद लगातार बारिश से मारू फसलों को आराम मिलना तय हो गया है।
वहीं, मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना बताते हैं कि गेहूं के अतिरिक्त आलू, गोभी व मटर की खड़ी फसल को भी बारिश से अच्छा लाभ मिला है, चने अथवा किसी मारू फसल पर बारिश के नुकसान की आशंका को वे निर्मूल करार देते कहते हैं कि अभी वो स्टेज नहीं आई है। अब अगर कोहरा पड़ भी जाए तो नुकसान नहीं करेगा।
गौरतलब है कि बारिश के बाद कुछ दिन कोहरे का न होना और तापमान का कम रहना गेहूं के लिए बेहतर बताया जाता है। बारिश के बाद कोहरे का स्थान ओस ले लेती है। कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते हैं कि बारिश इन दिनों में सोने पर सुहागा का काम करती है। हर फसल को इससे लाभ है। गेहूं का पौधा कम पारे में लंबाई कम लेगा और इसकी शाखाएं ज्यादा फूटेंगी।
उधर, सोशल सांइसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि सूखी सर्दी से निजात दिलाने वाली इस बारिश से जैसे इंसान को फेफड़ों और छाती रोगों से राहत मिलेगी वैसे ही फसलों, पेड़ पौधों को भी लाभ होगा।

Monday, 13 December 2010

ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਦੀ ਗਰਦ ਛੰਟਨੇ ਦਾ ਇੰਤਜਾਰ

ਭੂਪੇਸ਼ ਚੱਠਾ , ਪਟਿਆਲਾ
ਅਕਤੂਬਰ ਵਿੱਚ ਪਰਾਲੀ ਨੂੰ ਜਲਾਣ ਤੋਂ ਧੁਆਂ ਛਾਇਆ ਤਾਂ ਨਵੰਬਰ ਵਿੱਚ ਦਿਵਾਲੀ ਦੇ ਪਟਾਖੋਂ ਤੋਂ ਹੋਏ ਪ੍ਰਦੂਸ਼ਣ ਨੇ ਪੂਰੇ ਰਾਜ ਨੂੰ ਗੈਸ ਚੈਂਬਰ ਬਣਾ ਪਾਇਆ , ਗੈਸਾਂ ਤਾਂ ਅਸਮਾਨ ਵਿੱਚ ਚੱਲੀ ਗਈ ਉੱਤੇ ਗਰਦ ਹੁਣੇ ਵੀ ਛੰਟੀ ਨਹੀਂ ਹੈ । ਮੌਸਮ ਵਿੱਚ ਮੌਜੂਦ ਸਸਪੈਂਡਿਡ ਪਾਰਟੀਕਿਊਲੇਟ ਮੈਟੇਰਿਅਲ ਨੂੰ ਧੋਣੇ ਅਤੇ ਫਸਲਾਂ ਨੂੰ ਟਾਨਿਕ ਦੇਣ ਲਈ ਹਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਮੀਂਹ ਦਾ ਇੰਤਜਾਰ ਹੈ ।
ਕੋਹਰੇ ਦਾ ਨਹੀਂ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਤਾਪਮਾਨ ਦਾ ਘੱਟ ਰਹਿਨਾ ਕਣਕ ਲਈ ਬਿਹਤਰ ਦੱਸ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਮਾਹਰ ਡਾ . ਬੀਏਸ ਸੋਹਿਲ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਜੇਕਰ ਮੀਂਹ ਇਸ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ ਹੋ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਸੋਣ ਉੱਤੇ ਸੁਹਾਗਾ ਹੋਵੇਗਾ । ਹਰ ਫਸਲ ਨੂੰ ਇਸਤੋਂ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਹੈ । ਕਣਕ ਦਾ ਪੌਧਾ ਘੱਟ ਪਾਰੇ ਵਿੱਚ ਲੰਮਾਈ ਘੱਟ ਲਵੇਗਾ ਅਤੇ ਇਸਦੀਸ਼ਾਖਾਵਾਂਜ਼ਿਆਦਾ ਫੁੱਟਣਗੀਆਂ । ਇਸਤੋਂ ਉਪਜ ਵਧਣ ਦੀ ਸੰਭਾਵਨਾ ਜ਼ਿਆਦਾ ਹੁੰਦੀ ਹੈ , ਲੇਕਿਨ ਜੇਕਰ ਕੋਹਰਾ ਪੈਣ ਲੱਗੇ ਤਾਂ ਸੂਰਜ ਦੀਆਂ ਕਿਰਨਾਂ ਤੋਂ ਪੱਤੀਆਂ ਉੱਤੇ ਹੋਣ ਵਾਲੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ ਸੰਸ਼ਲੇਸ਼ਣ ਦੀ ਪਰਿਕ੍ਰੀਆ ਹੌਲੀ ਹੋਣ ਨਾਲ ਬੂਟੇ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਥੰਮ ਜਾਵੇਗਾ ।
ਫਾਈਵ ਏਲੀਮੇਂਟ ਹੇਲਥ ਐਂਡ ਏਜੂਕੇਸ਼ਨਲ ਸੋਸਾਇਟੀ ਦੇ ਡੇ . ਜੋਗਿੰਦਰ ਟਾਈਗਰ ਮੀਂਹ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਦੇਰੀ ਤੋਂ ਇੱਤੇਫਾਕ ਨਹੀਂ ਰੱਖਦੇ , ਉਹ ਕਹਿੰਦੇ ਹੈ ਕਿ ਕਣਕ ਨੂੰ ਮੀਂਹ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ 20 ਦਿਸੰਬਰ ਦੇ ਬਾਅਦ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਤੱਦ ਤੱਕ ਇਹ ਹੋ ਵੀ ਜਾਵੇਗੀ । ਸਰਦੀ ਦੀ ਲੋੜ ਇਸਦੇ ਬਾਅਦ । ਅੱਜਕੱਲ੍ਹ ਚੱਲ ਰਹੇ ਮੌਸਮ ਤੋਂ ਕਣਕ ਦੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਸਮਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਹੋਵੇਗਾ ਜਿਨ੍ਹਾਂਦੀ ਦੇਰ ਨੂੰ ਬਿਜਾਈ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ , ਮਾਨਸੂਨ ਦੇ ਲੰਮੇ ਖਿੰਚਨੇ ਅਤੇ ਝੋਨਾ ਦੀ ਕਟਾਈ ਵਿੱਚ ਹੋਈ ਦੇਰੀ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਫਸਲ ਉੱਤੇ ਕੋਈ ਵਿਪਰੀਤ ਪ੍ਰਭਾਵ ਨਹੀਂ ਹੈ ।
ਮੀਂਹ ਦੀ ਕਮੀ ਉੱਤੇ ਸਿੰਚਾਈ ਲਈ ਇਲਾਵਾ ਬਿਜਲੀ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ ਏਕਤਾ ਉਗਰਾਹਾਂ ਦੇ ਮਹਾਸਚਿਵ ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਕੋਕਰੀਕਲਾਂ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਸਿਰਫ ਚਾਰ ਘੰਟੇ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਨੂੰ ਬਿਜਲੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ ਜਦੋਂ ਕਿ ਮੰਗ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ ਅੱਠ ਘੰਟੇ ਕੀਤੀ ਹੈ । ਉਹ ਦੱਸਦੇ ਹੈ ਕਿ ਨਰਮਾ ਪੱਟੀ ਵਿੱਚ ਹੁਣੇ ਪਹਿਲਾ ਪਾਣੀ ਹੀ ਨਹੀਂ ਲਗਾ ਹੈ । ਰਾਜ ਭਰ ਵਿੱਚ ਦਸ ਫੀਸਦੀ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਬਿਜਾਈ ਹੋਣੀ ਹੈ । ਅਜਿਹੇ ਵਿੱਚ ਜੇਕਰ ਸਿਰਫ ਦਸ ਦਿਨਾਂ ਲਈ ਹੀ ਠੀਕ ਲਗਾਤਾਰ ਅੱਠ ਘੰਟੇ ਬਿਜਲੀ ਮਿਲ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਕਿਸਾਨ ਬੱਚ ਜਾਵੇਗਾ ।

Friday, 10 December 2010

प्रदूषण की गर्द छंटने का इंतजार

भूपेश चट्ठा, पटियाला
अक्टूबर में पराली को जलाने से धुआं छाया तो नवंबर में दिवाली के पटाखों से हुए प्रदूषण ने पूरे राज्य को गैस चैंबर बना डाला, गैसें तो आसमान में चली गई पर गर्द अभी भी छंटी नहीं है। मौसम में मौजूद सस्पैंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल को धोने और फसलों को टॉनिक देने के लिए हर किसी को बारिश का इंतजार है।
कोहरे का न होना और तापमान का कम रहना गेहूं के लिए बेहतर बता कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते हैं कि यदि बारिश इन दिनों में हो जाए तो सोने पर सुहागा होगा। हर फसल को इससे लाभ है। गेहूं का पौधा कम पारे में लंबाई कम लेगा और इसकी शाखाएं ज्यादा फूटेंगी। इससे उपज बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन यदि कोहरा पड़ने लगे तो सूरज की किरणों से पत्तों पर होने वाली प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया धीमी होने से पौधे का विकास थम जाएगा।
फाईव एलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर बारिश में हुई देरी से इत्तेफाक नहीं रखते, वे कहते हैं कि गेहूं को बारिश की जरूरत 20 दिसंबर के बाद होती है और तब तक यह हो भी जाएगी। सर्दी की आवश्यकता इसके बाद। आजकल चल रहे मौसम से गेहूं की उन किस्मों को भी लाभ होगा जिनकी देर से बिजाई की गई है, मानसून के लंबा खिंचने और धान की कटाई में हुई देरी के बावजूद फसल पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं है।
बारिश की कमी पर सिंचाई के लिए अतिरिक्त बिजली की मांग करने वाले भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के महासचिव सुखदेव सिंह कोकरीकलां कहते हैं कि सिर्फ चार घंटे कृषि को बिजली दी जा रही है जबकि मांग कम से कम आठ घंटे की है। वे बताते हैं कि नरमा पट्टी में अभी पहला पानी ही नहीं लगा है। राज्य भर में दस फीसदी क्षेत्र में बिजाई होनी है। ऐसे में यदि मात्र दस दिनों के लिए ही सही लगातार आठ घंटे बिजली मिल जाए तो किसान बच जाएगा।