-कीमत में च्यादा पर लागत में एक तिहाई से भी कम, लोकप्रियता इतनी की लोग रिश्तेदारों से लाने लगे
-खेत में धान की फसल की नमी का सदुपयोग गेहूं की बिजाई में होता है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेहूं की खेती के मामले में अमेरिका व आस्ट्रेलिया से देसी तकनीक हमेशा से ही पिछड़ी रही है लेकिन अब इसमें इटली जैसा यूरोपीय देश भी शामिल हो गया है। गेहूं के देसी बीजों पर अब एक इटालियन बीज रबी के इस सीजन में भारी पड़ गया है। कम से कम घग्गर नदी के दोनों ओर पंजाब-हरियाणा में इस बीज की खासी लोकप्रियता बन पड़ी है।
इन बीजों से गेहूं की उपज कैसी रहेगी? इस प्रति पूरी तरह से आश्वस्त धर्मेहड़ी गांव के किसान बब्बू बताते हैं कि गेहूं की अगेती किस्मों में शामिल इटली का यह बीज इस साल पंजाब हरियाणा सीमा के इर्द गिर्द खासा लोकप्रिय है। आलम ये है कि बाजार में उपलब्ध ही नहीं है, वे भी अपने एक रिश्तेदार से लेकर आए हैं। वे बताते हैं कि उक्त विदेशी बीज पिछले साल भी बिका था पर इस बार तो देखते ही देखते बाजार से गायब हो गया।
वहीं गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि जीबी-1386 नाम का इटली का ये बीज देसी बीज की तुलना में एक तिहाई से भी कम डलता है। देसी बीज जहां एक एकड़ में करीब 40 किलो डाला जाता है। देसी बीज का एक थैला नौ सौ से एक हजार रूपये में आ जाता है और करीब 25 रूपये किलो पड़ता है। वहीं इटली से आयात हुआ ये बीज एक एकड़ में मात्र नौ किलो ही डाला जाता है पर मिलता 70 रूपये किलो पड़ता है।
इतना ही नहीं 25 अक्टूबर से गेहूं की बिजाई का सीजन संवर्धित किस्मों के लिए शुरु हो जाता है। इस किस्म की बिजाई धान की फसल लेने के बाद मात्र पांचवे दिन ही बिना खेत तैयार किए ही कर दी जाती है। पर्यावरण संरक्षण के मामले में भी यह खासा उपयोगी है। बिजाई के दौरान सिंचाई के लिए पानी का प्रयोग नाममात्र होता है। इससे खेत में धान की फसल की नमी का सदुपयोग कर गेहूं की बिजाई के लिए किया जाता है।
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कृषि विभाग ने नहीं की है सिफारिश
राच्य कृषि विभाग के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर बीज व मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल कहते हैं कि ऐसे किसी बीज की सिफारिश कृषि विभाग ने नहीं की है। बीज की लोकप्रियता के सवाल पर वे कहते हैं कि पिछले साल भी कई लोगों ने पंजाब-हरियाणा सीमा के क्षेत्र में बीज का प्रयोग किया था पर रिजल्ट अच्छे नहीं आए। इससे एक साल पहले भी रोपड़ में भी ऐसा ही बीज प्रचलित किया गया पर झाड़ नहीं बढ़ा। तब मात्र सात किलो बीज डालने की बात कही थी। बीज का नंबर, मार्का आदि बताते पर डा. सोहल कहते हैं कि इन लोगों ने कौनसा सरकार से अनुमति लेनी होती है जो चाहे नंबर रख लें।