Tuesday, 20 September 2011

अवैध शराब का ठेका बंद, 50 लाख की चपत, excise, revenue, loss


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला
नगर निगम की सीमा में अनधिकृत रूप से शराब बेच रहे गुड़ मंडी स्थित ठेके को आबकारी विभाग ने बंद करवा अगली कार्रवाई शुरू कर दी। हालांकि यह ठेका अब तक राज्य सरकार के आबकारी राजस्व को 50 लाख रुपये से ज्यादा की चपत लगा चुका है।
नगर निगम सीमा में शराब बेचने के लिए चार समूह बनाए गए हैं और 10 से 12 ठेकों के हर समूह के लिए लाइसेंस फीस 12.50 करोड़ रुपये है। अंग्रेजी व देसी का एक ठेका कम से कम एक करोड़ रुपये सालाना फीस पर आया है। ऐसे में एक अप्रैल से 20 सितंबर तक साढ़े पांच महीने से ज्यादा चले इस ठेके ने राजस्व को जमकर चूना लगाया है। हालांकि अधिकारियों को इस बाबत पहले भी शिकायतें मिलीं पर विभाग में मौजूद कुछ लोगों के चलते शराब बेचने वाले ठेकेदार सफलतापूर्वक आंख मिचौली खेलते रहे। विभाग के ही एक आला अधिकारी कहते हैं कि जब जाते थे तो बंद मिलता था पर बाद में फिर से खुला होने की शिकायत आ जाती। वहीं हाल ही में आबकारी एवं कराधान अधिकारी का कार्यभार संभालने वाले एसके गर्ग कहते हैं कि ठेका बंद है और अगली कार्रवाई की जा रही है।
दूसरी ओर कारोबार से जुड़े लोग और विभागीय सूत्र बताते हैं कि शहर व आसपास के क्षेत्रों में अधिकृत रूप से चल रहे शराब के कारोबार की लंबी फेहरिस्त है। इसमें सरहिंद रोड पर हरदासपुर के लिए मंजूर ठेका शहरी सीमा में गांव बारन में चल रहा है। आबकारी का ग्रामीण क्षेत्र में लाइसेंस शुल्क 35 लाख रुपये है तो शहर में एक करोड़ रुपये। ऐसे ही रेलवे स्टेशन पर विभाग से एक ठेका पास है पर अंग्रेजी व देसी के नाम पर दो अलग-अलग ठेके चलाए जा रहे हैं और दोनों पर दोनों तरह की शराब बिक रही है। इनमें एक ठेका पूरा तरह अवैध है जिससे राज्य सरकार को लाइसेंस का चूना तो लग ही रहा है उधर अन्य राजस्व की हानि भी हो रही है।

बांधों का भराव सीजन समाप्त, नीचे आने लगा जल स्तर, dam reservior, season is over,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून की लगभग वापसी के साथ बांधों का भराव सीजन मंगलवार को समाप्त हो गया। इसके साथ ही कम हुई पानी की आवक से बांधों के जल स्तर के नीचे आने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
उत्तर भारत के सबसे बड़े भाखड़ा बांध में पानी की आवक कम हो कर 29 हजार 352 क्यूसिक रह गई है, जबकि एक दिन पहले तक यह 32 हजार 108 क्यूसिक थी। बांध से बिजली बनाने के लिए रोजाना 32हजार 300 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा है। और बांध का जलस्तर 24 घंटों में 1680.94 फीट से कम हो 1680.80 फीट पर आ गया है।
पौंग बांध में पानी की आवक 19 हजार 34 क्यूसिक से गिरकर 15हजार 911 क्यूसिक रह गई है। हालांकि यहां से बिजली बनाने के लिए प्रतिदिन छोड़े जा रहे 11 हजार क्यूसिक पानी के चलते जल स्तर 1390.54 फीट पर बना हुआ है।
इसी प्रकार रावी पर बने रणजीत सागर बांध की क्षमता 527.91 मीटर है लेकिन इससे काफी नीचे 525.06 मीटर पर रहा जलस्तर बीते 24 घंटों में घटकर 524.93 मीटर पर आ गया है। यहां भी रोजाना की आवक 23 हजार क्यूसिक से गिर कर 14 हजार क्यूसिक रह गई है जबकि यहां से हररोज 18 हजार क्यूसिक से अधिक पानी छोड़े जाने की वजह से इस बांध का जलस्तर नीचे आने लगा है।
दिलचस्प है कि 11 से 18 सितंबर के बीच भाखड़ा बांध से हर रोज चार हजार क्यूसिक पानी बिना बिजली बनाए फ्लड गेट खोल कर छोड़ा गया। आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन इंजी. पदमजीत सिंह ने आज यहां इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि इन सात दिनों में जितना पानी बहाया गया है उससे 350 लाख यूनिट बिजली बननी थी और न्यूनतम दरों पर इसका मूल्य सात करोड़ रुपये बनता है, जबकि पानी की कीमत नहीं लगाई जा सकती।
बकौल इंजी. पदमजीत सिंह अगर पिछले साल का भाखड़ा का जल स्तर 1681.53 फीट पर रखा गया था तो इस साल बांध की सुरक्षा को कौन सा खतरा हो गया है? कौन सी कमजोरी है? इतना ही नहीं बीबीएमबी की ओर से जारी की गई विज्ञप्ति में खतरे का निशान 1680 फीट बता दिया जाता है जबकि डिजाइन के अनुसार बांध में 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है।
याद रहे कि इससे पहले भी पौंग बांध के मामले में बीबीएमबी ने इसी सीजन में 1400 फीट के पौंग बांध के ऊपरी निशान से काफी पहले पानी छोड़ दिया और फिर रोककर 'भूल सुधार' की गई। पौंग बांध से छोड़े गए पानी के आंकड़े बताते हैं कि यदि थोड़ा संयम बरता होता तो न केवल पौंग बांध से बही 49 करोड़ यूनिट की बिजली बची होती अपितु सिंचाई के लिए पानी की भी बचत होती। पौंग बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया गया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से बिजली के करीब 27 करोड़ यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने से रह गए।

शराब बंदी सरकारी, चलते रहे मोबाइल ठेके, excise, dry day


भूपेश चट्ठा, पटियाला हर ड्राई-डे को गांधी जयंती कहने वाले पंजाबियों को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के आदर्श चुनाव आचार संहिता से कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। डिप्टी कमिश्नर की ओर से लागू की गई शराब बंदी को लगभग सरकारी साबित किया गया है। पुलिस व आबकारी विभाग की आंखों में धूल झोंकने वाली आंख मिचौली दिन भर चली। हालांकि दो दिन छकाने के बाद पटियाला पुलिस को देर शाम गुरबक्श कालोनी के ठेके के निकट से सफलता हाथ लगी है। दो दिन पहले तक पम्मी चिकन वाले के यहां काम करते तफज्जलपुरा में रहने वाले अनिल कुमार पर लाहौरी गेट थाने की पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। उसके पास से छह पेटी देशी शराब की बरामद की गई है। अनिल कुमार की जमानत ले ली गई है। विभागीय सूत्रों व प्रत्यक्षदर्शियों अनुसार शनिवार सुबह करीब 11 बजे शराब के कारोबारियों ने अपना धंधा शुरू कर लिया। बताया गया कि सुबह बस स्टैंड के गेट के सामने कार्नर होटल के पास, अनारदाना चौक और सन्नौरी अड्डा के अहाते खुल गए, लेकिन दोपहर बाद तक यह बंद कर दिए गए। इस दौरान रेलवे स्टेशन के पास ठेके के इर्द गिर्द गतिविधियां जारी रही। शाम होते-होते रेलवे स्टेशन से गुरुद्वारा श्री दुखनिवारण साहिब की ओर जाती सड़क पर मौजूद ठेके पर गहमागहमी हो गई। अंदर बाहर दो तरफ से सप्लाई होती रही, जबकि देर सांय मॉडल टाउन गोल चक्कर के पास स्थित ठेके पर शराब बेचने का नजारा साफ तौर पर देखा जा सकता था। यहां दरवाजे पर बने रोशनदान से सप्लाई बदस्तूर जारी रही। सन्नौरी अड्डा और सैफाबादी गेट के ठेके भी लगभग इसी श्रेणी में आते हैं। 

ठेके सील, गड़बड़ी की होगी जांच : आबकारी एवं कराधान अधिकारी 

आबकारी एवं कराधान अधिकारी एसके गर्ग से संपर्क किए जाने पर उन्होंने कहा कि विभाग ने पूरी गंभीरता से ठेके सील करवाए हैं, फिर भी कहीं गड़बड़ है तो वह तुरंत जांच करवाते हैं। दूसरी ओर जिले में पुलिस ने बख्शीवाला में दो और नाभा में ऐसी ही चुनावी शराब बेचने के मामले दर्ज किए हैं।

Sunday, 18 September 2011

खास नहीं, आम हुआ पटियाला का मतदान, sgpc, election, voting

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला
देश में लोकसभा के चुनाव हों या राज्य में विधानसभा के, पटियाला को प्रतिष्ठित चुनाव क्षेत्रों में रखा जाता रहा है। लेकिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की दस सीटों वाले पटियाला में इस बार चुनाव वीवीआईपी न होकर पूरी तरह से आम होकर रह गया है।
शिअद महासचिव प्रोफेसर प्रेम सिंह चंदूमाजरा का गांव चंदूमाजरा जिला फतेहगढ़ साहिब में चला गया तो उन्होंने भी पटियाला का रुख नहीं किया। राज्य सरकार में कभी नंबर दो की हैसियत रखने वाले तत्कालीन सहकारिता मंत्री कैप्टन कंवलजीत सिंह की मृत्यु के बाद जिले के इकलौते मंत्री भी एसजीपीसी चुनाव में मतदान नहीं कर पाए। अकाली दल के बनूड़ से विधायक जसजीत सिंह बन्नी अब डेराबस्सी के रास्ते मोहाली जिले के हो गए हैं।
पटियाला में अब सिख मतदाताओं के मामले में अकालियों के पास पूर्व मंत्री व पूर्व विधायक के रूप में पार्टी के विधानसभा क्षेत्र इंचार्ज ही रह गए हैं। इनकी फेहरिस्त हालांकि खासी लंबी है पर लाल बत्ती आधिकारिक रूप से न होने की स्थिति में वीवीआईपी की मुहर नहीं लग पाती।
राज्य में प्रदेश कांग्रेस के प्रधान कैप्टन अमरिंदर सिंह और विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर ने गुरु नानक देव फाउंडेशन स्कूल स्थित पोलिंग स्टेशन में अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया। उनके अलग से बने मतपत्र 529 परनीत कौर और 530 कैप्टन अमरिंदर सिंह दोनों का ही स्याही लगने का इंतजार पूरा नहीं हुआ। पोलिंग बूथ नंबर 38 में मोतीबाग पैलेस से बनी चार वोटें एसजीपीसी चुनाव के लिए नोटीफिकेशन होने के बाद वोट बनवाई गई हैं। उनके पुत्र रणइंदर सिंह और राजमाता महिंदर कौर ने भी मतदान में भाग नहीं लिया।
कांग्रेस के दोनों दिग्गजों के मतदान से दूर रहने और इनमें से एक के नदारद तो दूसरे के शहर में रहने के बावजूद वोट न डालने के बाद कांग्रेसियों ने मानो अघोषित बायकाट ही कर दिया।

Friday, 16 September 2011

बारिश ने तबाह कर डाली धान की 1121 किस्म, bad weather, paddy,


-पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बल्लियों में पूरे नहीं पड़ते: डा. सोहल
-पछेती को भी नुकसान पर अगेती के दाने बदरंग होने की संभावना बढ़ी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बल्लियां या धान की 'मुजंरेंÓ निकलने के ठीक उपर आई बारिश ने धान की पीएयू-1121 किस्म को लगभग तबाह कर डाला है, हालांकि कृषि विशेषज्ञों व पंजाब सरकार की ओर से इस किस्म को ना लगाने की सिफारिश की थी।
दुनिया भर में अपने सबसे लंबे चावल के लिए मशहूर धान की यह किस्म है तो साधारण लेकिन देखने में बासमती चावल का रंग रूप लिए होती है। अंतर सिर्फ इतना है कि इसमें बासमती जैसी खुशबू नहीं होती। इसके बावजूद दाम के मामले में ये साधारण धान की तुलना में दो से तीन गुना तक मंहगा बिकता है। खाड़ी देशों में ज्यादा मांग के चलते केंद्र सरकार की निर्यात नीति इसके दामों को आए सीजन प्रभावित करती रहती है। जिससे दाम शेयर बाजार की तरह अर्श से फर्श के बीच झूलते रहते है।
आठ व नौ सितंबर को हुई बारिश के बाद बीते दिन की बौछारों पर नौगावां केकुलजिंदर सिंह औलख बताते हैं कि जिस एकड़ में मुजंरें निकल रही थी वहां बारिश की बूंदों ने सारा सिट्टा सफेद कर दिया है और जहां दाने में दूध आ चुका था वहां पर अब आई बारिश ने इसे काला करना तय कर दिया है।
सितंबर मध्य की इन दो बौछारों ने धान की अन्य किस्मों को भी विपरीत रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। फसल कितने फीसदी खराब हुई है इसका आंकलन तो धूप निकलने के  बाद ही हो पाएगा लेकिन बारिश ने धान की गुणवत्ता पर सीधा-सीधा असर डाल दिया है। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि इस साल बराबर अंतराल पर हुई बारिशों ने धान के फसल को खासा तगड़ा कर रखा था। भारी हुए पौधे पर इन दिनों की बारिश ने कुछ ऐसे हालात बना दिए हैं जैसे किसी के मुंह पर आप लगातार थपड़ मारते रहो। दाने का थोथा रह जाना अथवा कम वजन का होना उतना ही खतरनाक है जितना ना बनना। ऐसे फोके दाने पंखा लगाते ही कचरे के रूप में कबाड़ में जा गिरते हैं।
पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज, डा. बीएस सोहल बताते हैं कि सितंबर के इन दिनों में होने वाली बारिश को ठीक कहा ही नहीं जा सकता और इसके बाद आने वाली बारिश और ज्यादा खतरनाक साबित होगी। धान के पौधे पर सीधे पड़ी पानी की बौछारें और साथ में चली हवा से बल्लियों में से दाने झड़ जाते हैं और जहां पर दाने नहीं हुए हैं वहां पानी लगने से थोथे रह जाते हैं। अन्य फसलों पर तो विशेष असर नहीं होता पर प्रदेश की खरीफ की मुख्य फसल धान के मामले में पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बल्लियों में पूरे नहीं पड़ते हैं।
 डा. सोहल कहते हैं जहां बल्लियां निकलने को होती हैं और हवा से पौधे गिर गए हैं उनमें बाद में बनने वाला बीज छोटा रह जाता है। इतना ही नहीं दाने का छिलका बदरंग हो जाता है। धान का छिलका काला होने पर इससे निकला चावल बदरंग अथवा मटमेला भूरा होता है। जिससे मंडी में धान के बेचने में भी खासी परेशानी आती है।
ऐसे ही लखविंदर सिंह बताते हैं कि  जिन किसानों ने धान की बिजाई और रोपाई देरी से की थी उन्हें इससे पहले नुकसान नहीं हुआ है। पर अब हालात बदल रहे हैं। पंजाब हरियाणा सीमा पर बाढ़ की मार तले आने वाले ज्यादातर क्षेत्र में कुछ ऐसा ही माहौल है। अगेती रोपाई पर जहां मार पड़ी है पर ज्यादा लाभ पछैती को भी नहीं है अलबत्ता नुकसान अब बढ़ेगा।

Thursday, 15 September 2011

गोदाम ठसाठस, धान न जाए फंस, storage, rice, in punjab,


नहीं हुए गोदाम खाली, कहीं चावल ना बन जाए मुसीबत
-शैलर मालिकों से एफसीआई नहीं लेगा, विवादित पीएयू-201 किस्म के दो लाख टन धान के चावल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
न्यूनतम समर्थन पर धान की सरकारी खरीद शुरू होने से ठीक दो सप्ताह पहले भी पंजाब के गोदाम खाली नहीं हो पाए हैं। गेहूं की बात अलग भी रख दें तो राच्य में 58 लाख टन चावल से गोदाम अटे पड़े हैं और करीब डेढ़ सौ लाख टन धान आने को है।
दिलचस्प है कि केंद्र सरकार के संस्थान फूड कारपोरेशन आफ इंडिया ने शैलर मालिकों से धान की विवादित रही किस्म पीएयू-201 से बनने वाला चावल लेने से ही इंकार कर दिया है। पंजाब के शैलरों में पड़े साल 2009-10 सीजन के दो लाख टन धान के चावल के एवज में 1905 रूपये प्रति क्विंटल की दर से पैसे भरवाने का आदेश जारी कर दिया है। अब ये पुराना चावल, नए चावल में मिल कर एफसीआई के खाते में एक बार फिर पिछले रास्ते से जाएगा या बाजार के रास्ते निर्यात होगा इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन राच्य में
अभी वर्ष 2010-11 सीजन के 18 लाख टन धान से बना 11 लाख टन चावल अगले महीने तक एफसीआई के पास जरूर जा पहुंचेगा।
उल्लेखनीय है कि पंजाब में अनाज के सडऩे की खबरों से तंग केंद्र ने जहां गेहूं और चावल के मामले में 20-20 लाख टन के निर्यात की अनुमति दी है लेकिन मानसून के पहले तक के हालात और अब के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। एफसीआई ने बाढ़ से सबसे च्यादा प्रभावित हो सकने वाले निचले क्षेत्रों से अनाज निकालना शुरू किया। जून जुलाई में गेहूं की ढुलाई को प्राथमिकता दी तो अब चावल मुसीबत बन गया। प्रदेश में भंडारण के आंकड़ों अनुसार मानसून से ठीक पहले 135 लाख टन गेहूं था, इसमें एक चौथाई बंद गोदामों में तो 102 लाख टन खुले में था जबकि चावल की मात्रा 26 लाख टन थी। रेलवे की ओर से आठ-नौ लाख टन की ढुलाई की गई तो मिलिंग के बाद चावल की मात्रा लगातार बढ़ती रही। अब ये 58 लाख टन पर आ गया है।

'बठिंडा, मानसा और बरनाला के राइस शैलर मालिक पीएयू-201 किस्म के धान से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। एफसीआई को चाहिए कि नया चावल आने से पहले ही पुराने का भली प्रकार निपटारा कर ले, साथ ही रेलवे की ओर से ढुलाई को तेज करना चाहिए तभी अनाज को सडऩे से रोका जा सकता है। अन्यथा विदेशी बाजारों में हमें उचित दाम मिलना तो दूर कंसाइनमेंट वापिस तक आने का अंदेशा बना रहता हैÓ
फैडरेशन आफ आल इंडिया राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान तरसेम सैणी

' राच्य में धान की फसल के शैलरों में जाने के बाद नवंबर के पहले सप्ताह तक उनके पास नया चावल आना शुरू होगा और एफसीआई पंजाब से हर महीने करीब 15 लाख टन आनाज उठवा रही है। ऐसे में किसी तरह की परेशानी नहीं आनी चाहिए। रही बात धान के स्टोरेज की, वो राच्य सरकार की खरीद एजेंसियों ने करवा कर रखवानी है। इसमें एफसीआई की कोई भूमिका नहीं हैÓ
फूड कारपोरेशन आफ इंडिया के डिप्टी जनरल मैनेजर असीम छााबड़ा

जल जाएंगे पौधे घुटने लगेगा दम,world ozone day, air, pollution,

भूपेश चट्ठा, पटियाला
दुनिया भर में ओजोन की पतली होती जा रही परत को लेकर हाय तौबा मची है, लेकिन देश के विकसित प्रदेशों की श्रेणी में खुद को रखने वाले पंजाब में ग्रीन हाउस गैसों को कम करने की दिशा में एक कदम भी नहीं उठाया गया है, यदि ऐसा ही रहा तो छोटे पौधे जल जाएंगे और दम घुटने लगेगा।
गौरतलब है कि अक्टूबर के आरंभ में उत्तरी भारत के पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की पराली हर ओर जलेगी। इसे कार्बन गैसों की भरमार निकलेगी। प्रदेश के वातावरण में 30 सालों में खासा बदलाव आ गया है। रातें गर्म और दिन ठंडे होने लगे हैं। फिर भी वायु प्रदूषण के इस पहलू पर हर कोई मौन है।
याद रहे कि ओजोन की परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसें कार के इंजन या इंडस्ट्री से निकले सीधे प्रदूषण से प्रभावित नहीं होती, लेकिन सूरज की रोशनी के हाइड्रोकार्बन व नाइट्रोजन आक्साइड से प्रतिक्रिया करने पर जरूर उत्पन्न होती हैं। उत्तर भारत में पराली के जलने से उठा धुआं यानी स्मोक और हवा में मौजूद नमी यानी फोग के मिश्रण से बना स्मोग ओजोन को नुकसान पहुंचाने की आदर्श परस्थितियां पैदा करते हैं।
आक्सीजन के तीन अणुओं से बनने वाली ओजोन गैस का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यदि यह वातावरण में हो तो सबसे पहले वायु प्रदूषण के रूप में पशुओं को सांस लेने में तकलीफ पैदा करती है और कई तरह के संवेदनशील पौधों को जला कर समाप्त कर देती है। लेकिन जब यही नीले रंग की ओजोन गैस वातावरण के उपरी हिस्से में, धरती से 10 से 50 किलोमीटर की दूरी पर होती है, तो इसकी मोटी परत खासी लाभकारी हो जाती है और धरती तक पहुंचने वाली इलेक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन को पहले ही रोक देती है।
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सोशल सांइसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला ने वीरवार को इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि यदि ऐसा ही होता रहा तो गर्मी के दिनों में आपकी कार यदि धूप में पार्क हो गई और भले ही आपने शीशों पर काली फिल्म भी लगा रखी है। फिर भी कार में बैठते ही आप अल्ट्रा वायलट किरणों की वजह से बेहोश होने वाली स्थिति में आ जाएंगे। ये किरणें जब एक बार अंदर घुस आती हैं तो स्वत: बाहर नहीं निकलती। धरती की हालत भी हमने कुछ ऐसी ही कर दी है। कार का माहौल तो एयरकंडीशनर चला कर थोड़ी देर में ठीक कर लिया जाता है परंतु धरती पर एसी का काम करने वाले पौधे हम लगा नहीं रहे हैं।
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'निसंदेह ओजोन की परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसें एयर कंडीशनर व रेफ्रीजरेटर से निकलती हैं और ज्यादातर उपकरण भी बिजली के ही हैं लेकिन पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड(पावरकॉम) का इन गैसों को रोकने अथवा नियंत्रित करने से सीधा संबंध नहीं है। इस दिशा में अभी तक पावरकॉम की ओर से किया गया कोई अध्ययन उनके ध्यान में नहीं है'
ऊर्जा बचत विभाग के चीफ इंजीनियर व पीएसईबी इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रधान इंजी. जीएस बेदी।
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'पंजाब में पराली जलती है और थोड़ा बहुत अन्य वायु प्रदूषण भी होता है लेकिन इन सभी का ओजोन की परत से सीधा संबंध नहीं है। ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाने वाली मीथेन जैसी ज्यादातर ग्रीन हाउस गैसें विकसित देशों की देन हैं'
डा. चरणजीत सिंह नाभा, डायरेक्टर पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड



Tuesday, 13 September 2011

भाखड़ा बांध में अभी भरा जा सकता है पानी, dam reservior, bhakhra,


भूपेश चट्ठा, पटियाला

प्रदेश से गुजरने वाली नदियों की बाढ़ को किसी तरह नियंत्रित करने के मद्देनजर बनाए गए बांध ही अच्छा मानसून आने की स्थिति में सितंबर में बाढ़ का खतरा बन जाते हैं। दिलचस्प है कि बांधों से अक्सर तेज बारिश के दौरान घबराहट में पानी छोड़ा जाता है। रविवार दोपहर को एक फिट खोले गए भाखड़ा बांध के फ्लड गेट एक बार फिर वही इतिहास दोहराया गया है। बांध की गोबिंद सागर झील में 1680 फीट को खतरे का निशान बताकर पानी छोड़ दिया गया है, जबकि बांध का ऊपरी स्तर करीब दस फुट दूर है।
डिजाइन के अनुसार आधिकारिक रूप से बांध का खतरे का निशान 1690 फीट पर रखा गया है, जबकि व्यवहारिक रूप से अब भी इसे 1687 फीट तक भरा जा सकता है। दिलचस्प है कि एक ओर मौसम विभाग ने अगले 48 घंटे पंजाब व हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश के बताए हैं और पंजाब में नदियां पहले से ही उफान पर हैं। वहां फ्लड गेट खोलना खासा खतरनाक साबित हो सकता है। हालांकि बांधों पर नियंत्रण रखने वाले भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड(बीबीएमबी) ने इसी सीजन में 1400 फीट के पौंग बांध के ऊपरी निशान से काफी पहले पानी छोड़ दिया और फिर रोककर 'भूल सुधार' की गई। यह सब कुछ हुआ भी कुछ उन दिनों में जब बारिश थी तो पानी छोड़ा, जब बंद हुई तो रोक दिया गया।
भाखड़ा बांध में भराव का इतिहास बताता है कि दस बार पहले भी 1680 फीट के ऊपर भरा गया है और इसका उच्चतम स्तर 1687.55 फीट तक गया भी है। आल इंडिया पावर इंजीनियर फेडरेशन के चेयरमैन इंजी.पदमजीत सिंह ने केंद्रीय ऊर्जा सचिव से मामले में हस्तक्षेप कर पानी की बर्बादी रोकने और बाढ़ से बचाने की गुहार लगाई है। भाखड़ा बांध का खतरे का निशान 1690 से घटाकर 1680 फीट करने के ब्योरे को भी सामने रखा है।

साल उच्चतम स्तर
2010 1681.53
2008 1680.69
2005 1681.40
1998 1682.67
1995 1683.49
1994 1682.55
1988 1687.55
1983 1686.01
1978 1685.96
1975 1687.36
इंजी.पदमजीत ने मौसम विभाग का हवाला देते हुए बताया है कि अगले पांच दिनों में मानसून वापस होने वाला है और तय मापदंड के अनुसार 20 सितंबर को भाखड़ा का जलस्तर 1685 फीट और 26 सितंबर को 1687 फीट तक किया जा सकता है।

पांच दिनों में-जीरो जीरो आवर पर
सात सितंबर को-1677.38 फीट
आठ सितंबर को-1677.11 फीट
नौ सितंबर को-1677.98 फीट
10 सितंबर को-1679.10 फीट
11 सितंबर को-1679.7 फीट




पंजाब---हर रोज बेकार बह रहे 20 लाख यूनिट,dam reservior, hydel, save electricity,


-बाढ़, बांध और बिजली-
-पौंग बांध से 49 करोड़ यूनिट बिजली बहा कर सुधारी भूल
-मामला केंद्रीय ऊर्जा सचिव के पास, बांध खाली करने पर सवाल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में एक ओर नदियों की बाढ़ लोगों को सता रही है, वहीं दूसरी ओर से बाढ़ रोकने के लिए बनाए गए बांध पानी को व्यर्थ बहा रहे हैं। भाखड़ा बांध के फ्लड गेटों से कुल कितना बहुमूल्य पानी बहा, इसका अनुमान तो सीजन के बाद ही लगेगा, लेकिन जितना पानी बह रहा है उससे हर रोज 20 लाख यूनिट पनबिजली के बन सकते हैं वो भी औने पौने दाम पर।
पंजाब राज्य बिजली बोर्ड के पूर्व सलाहकार और आल इंडिया पावर इंजीनियर फेडरेशन के चेयरमैन इंजीनियर पदमजीत सिंह बताते हैं कि बांध को यदि 1680 फीट पर ही रखा जाता है तो इसकी क्षमता को हम चार फीसदी कम कर रहे हैं और चार हजार क्यूसिक पानी आज दूसरे दिन भी बहाया जा रहा है। इससे हर रोज 20 लाख यूनिट बिजली का उत्पादन हो सकता है। सिंचाई अथवा राजस्थान जैसे राज्य में पीने के लिए इस पानी का प्रयोग होना था, सो अलग।
आल इंडिया पावर इंजीनियर फेडरेशन के चेयरमैन की ओर से केंद्रीय ऊर्जा सचिव को सोमवार को लिखे गए एक और पत्र में भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए हस्तक्षेप की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है जब मौसम विभाग कह रहा है कि पांच दिनों में मानसून लौट जाएगा तो अब बांध खाली क्यों किए जा रहे हैं? अगर पिछले साल का स्तर 1681.53 रखा गया था तो इस साल बांध की सुरक्षा को कौन सा खतरा हो गया है? कौन सी कमजोरी है?
इतना ही नहीं, बीबीएमबी की ओर से जारी की गई विज्ञप्ति में खतरे का निशान 1680 फीट बता दिया जाता है, जबकि डिजाइन अनुसार बांध में 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है। ऐसे में बांध की क्षमता चार फीसदी क्यों कम कर दी गई है?
याद रहे कि इससे पहले भी पौंग बांध के मामले में बीबीएमबी ने इसी सीजन में 1400 फीट के पौंग बांध के ऊपरी निशान से काफी पहले पानी छोड़ दिया और फिर रोककर 'भूल सुधार' की गई।
पौंग बांध से छोड़े गए पानी के आंकड़े बताते हैं कि भराव के पिछले इतिहास क ो देख थोड़ा संयम बरता होता तो न केवल पौंग बांध से बही 49 करोड़ यूनिट बिजली बची होती अपितु सिंचाई के लिए पानी भी। वहीं अनावश्यक रूप से पानी छोड़े जाने से बाढ़ आई सो अलग।
दिलचस्प है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से करीब 27 करोड़ बिजली के यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) की ओर से भाखड़ा व पौंग बांध से छोड़े जा रहे अतिरिक्त पानी और खतरे के निशान को लेकर बने विरोधाभास पर बीबएमबी के सदस्य ऊर्जा इंजीनियर अशोक थापर कहते हैं कि पानी छोड़े जाने का निर्णय सभी पक्षों की सहमति से लिया गया है। थापर के मुताबिक अभी मानसून का सीजन चल रहा है। बांधों में भराव का सीजन सितंबर अंत तक रहता है। ऐसे में पानी छोड़ने पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए

पीपीएससी की परीक्षा में चलेगा कैलकुलेटर, ppsc, exams,


भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन की बुधवार को होने जा रही परीक्षा में कैलकुलेटर के प्रयोग पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया है। इस आशय की जानकारी पीपीएससी के अध्यक्ष रिटायर्ड ब्रिगेडियर डीएस ग्रेवाल ने जागरण से विशेष मुलाकात के दौरान दी। उन्होंने उम्मीदवारों से अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान देने का आहवान करते हुए कहा कि परीक्षार्थियों को नियमानुसार उन सभी सुविधाओं का उपयोग करने की इजाजत दी जाएगी जो दी जा सकता है।
 विशेष रूप से कैलकुलेटर के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि चिंता न करें, इसमें कैलकुलेटर भी शामिल है। यहां पर उल्लेखनीय है कि इससे पहले, परीक्षा देने जा रहे उम्मीदवारों को भेजे गए रोल नंबर के साथ कैलकुलेटर न लाने की हिदायत जारी की गई थी। 
परीक्षा में कैलकुलेटर के प्रयोग के मुद्दे को दैनिक जागरण ने 10 सितंबर के संस्करण में प्रमुखता से उठाया था। पीपीएससी की ओर से लगाया गया ये प्रतिबंध साइंस, इंजीनियरिंग और अकाउंट को विषय के रूप में लेने वाले उम्मीदवारों को अपाहिज कर रहा था, जबकि यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन की ओर से ली जाने वाली परीक्षाओं में भी साइंटिफिक नान प्रोग्रामेबल कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति है। आयोग को चाहिए कि वह पीसीएस परीक्षा में भी कैलकुलेटर की अनुमति दे अन्यथा गणनाओं के चक्कर में उम्मीदवारों के भविष्य का गणित उलझ कर रह जाएगा।

Saturday, 10 September 2011

पीपीएससी की परीक्षा में कैलकुलेटर पर पाबंदी, ppsc, exams

उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
पंजाब पब्लिक सर्विस कमिशन (पीपीएससी) की 14 सितंबर को होने जा रही परीक्षा में कैलकुलेटर लेकर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, इससे कई उम्मीदवारों के माथों पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।
पीपीएससी की ओर से जारी किए गए रोल नंबरों के साथ दी गई हिदायतों में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि उम्मीदवारों को कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति नहीं है। 'दैनिक जागरण' के पास शुक्रवार को आए कई उम्मीदवारों ने बताया कि पीपीएससी की ओर से लगाया गया यह प्रतिबंध साइंस, इंजीनियरिंग और अकाउंट्स को विषय के रूप में अपाहिज कर रहा है। इससे इन विषयों के पेपर समय पर करना लगभग असंभव सा है।
उम्मीदवारों का कहना है कि यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन(यूपीएससी) की ओर से ली जाने वाली परीक्षाओं में भी साइंटिफिक नॉन प्रोग्रामेबल कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति है। हालांकि इन परीक्षाओं में मोबाइल फोन व पेजर इत्यादि संचार के साधनों पर पाबंदी लगाई गई है। ऐसे में पीसीएस की परीक्षा में भी अनुमति दी जानी चाहिए अन्यथा लंबा समय गणनाओं में लगना तय है और इन विषयों के उम्मीदवार एक तरह से बाहर ही हो जाएंगे।
याद रहे कि आधिकारिक रूप से 1998 के बैच के बाद से पीपीएससी की परीक्षा अब ली जानी है। यद्यपि दस साल पहले भी इसी बैच की परीक्षा ली गई थी तथापि इसके बाद से कई उम्मीदवारों की उम्र गुजर जाने के बाद 188 पदों के लिए ली जा रही परीक्षा दो बार पहले भी स्थगित हो चुकी है।
इस बार कोर्ट जाने की तैयारी तो किसी पक्ष की ओर से नहीं की जा रही पर पीपीएससी के सचिव को कैलकुलेटर ले जाने की अनुमति देने की गुहार जरूर लगाई गई है।

बारिश से धान की गुणवत्ता पर असर, bad weather, paddy, sept.


भूपेश चट्ठा, पटियाला दो दिन से लगातार हो रही बारिश ने धान की फसल को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। फसल कितने फीसदी खराब हुई है इसका आंकलन तो धूप निकलने के बाद ही हो पाएगा, लेकिन बारिश ने धान की गुणवत्ता पर सीधा असर डाल दिया है।
पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इन दिनों में होने वाली बारिश को ठीक कहा ही नहीं जा सकता। इसके बाद आने वाली बारिश और खतरनाक साबित होगी। धान के पौधे पर सीधे पड़ी पानी की बौछारें और हवा से बालियों से दाने झड़ जाते हैं और जहां पर दाने नहीं हुए हैं वहां पानी लगने से थोथे रह जाते हैं। अन्य फसलों पर तो विशेष असर नहीं होता पर प्रदेश की खरीफ की मुख्य फसल धान के मामले में पॉलीनेशन नहीं होने से दाने बालियों में पूरे नहीं पड़ते हैं। पौधे गिरने से दाने का छिलका बदरंग हो जाता है। इसका चावल भी बदरंग अथवा मटमेला भूरा होता है। जिसे मंडी में बेचने में भी खासी परेशानी आती है।
धर्मेहड़ी गांव के किसान हरभजन सिंह बताते हैं कि जिन किसानों ने धान की बिजाई और रोपाई देरी से की थी उन्हें इस बारिश में भी नुकसान नहीं हुआ है। पंजाब हरियाणा सीमा पर बाढ़ की मार तले आने वाले ज्यादातर क्षेत्र में कुछ ऐसा ही माहौल है।

Thursday, 8 September 2011

नहर से नहीं है मतलब, बाढ़ नहीं आनी चाहिए, hansi-butana, dhermehri, flood protection, farmer's agitation,

-क्षेत्र के हर किसान के पास है बाढ़ रोकने योजना
-नहर बनने से रोकना सरकार का काम, हमे साइफन व घग्गर की समुचित व्यवस्था चाहिए: पंजाब व हरियाणा के किसानों की एक आवाज
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला)
'मारकंडा का पानी घग्गर में ना डाला जाए, इसे एक पुरानी प्राकृतिक ड्रेन को जिंदा करते हुए निकाला जाए और सिंचाई के काम में लिया जाए...Ó। 'चीका से होकर निकलने वाली घग्गर नदी की ब्रांच को फिर से चलाया जाए ताकि पानी का बंटवारा हो और एक जगह पर बाढ़ ना आए...Ó। साइफन चौड़े हों..., 'हांसी बुटाना नहर को चार किलोमीटर तक भूमिगत कर दिया जाए...Ó, घग्गर नदी को एक हजार फुट चौड़ा करने के साथ गहराई तीस फुट की जाए...इत्यादि। 
 पंजाब हरियाणा की सीमा पर पटियाला-चीका रोड पर रहने वाले हर किसान के पास क्षेत्र में बाढ़ रोकने की योजना है। उसने ड्रेनेज सिस्टम पर ये महारथ पीढिय़ों से आती रही बाढ़ से जूझने के बाद सीखी है। उसका अनुभव उसे कहता है कि बाढ़ रोकने के यही कारगर तरीके हैं। इनके विपरीत यदि कुछ किया जाता है तो बाढ़ ज्यादा आएगी और नुकसान कम होने की बजाए बढ़ जाएगा।
दिलचस्प है कि नहर के साथ बन रही दीवार के विरोध में उतरे किसानों से 'दैनिक जागरणÓ की बातचीत में सामने आया कि किसानों को नहर से कोई 'एतराजÓ नही हंै, लेकिन उनके क्षेत्र में बाढ़ नही आनी चाहिए। 


'बाढ़ रोकने के कई उपाय हैं लेकिन सरकारें हैं कि अपनी-अपनी अड़ी पर ही अड़ी हैं हमारी सुनी ही नहीं जा रहीÓ
हरभजन सिंह चट्ठा गांव धर्मेहड़ी, पंजाब


'सरकारें आती हैं, फोटो खिंचवा कर चली जाती हैं, सदियों से संताप झेल रहे हैं, बाढ़ का उपाय तो किया नहीं अब एक और जिन्न ला कर खड़ा कर दिया है, अब उसके भी पंख लगाए जा रहे हैंÓ
गुरनाम सिंह गांव धर्मेहड़ी, पंजाब



'नहर तो बन गई है, उसे हटाना या रखना सरकार का काम है, पर बाढ़ रुकनी ही चाहिए, ये दोनों से ज्यादा जरूरी हैÓ
मुख्तयार सिंह गांव खमेहड़ा हरियाणा




'हम नहर के विरोधी नहीं है पर हट जाए तो अच्छा। सबसे ज्यादा जरूरी है कि पानी की निकासी प्राकृतिक तरीके से ही होनी चाहिए। ये सरकारें चाहे हरियाणा की है या केंद्र की प्राकृति से लड़ रही हैं ओर हमें दांव पर लगा रखाÓ
महल सिंह पूर्व सरपंच




'घग्गर नदी को चौड़ा और गहरा करने के अलावा मानसून के दिनों में आने वाले फ्लैश फ्लड के हिसाब से हांसी बुटाना नहर पर साइफन बनाए जाएं और ये सब हर उस जगह पर हों जहां पिछले सीजनों में नहर टूटी हैÓ
सोहन सिंह गांव राम नगर, पंजाब

पौंग बांध से बिजली उत्पादन गिरा, गलती उजागर, pong, dam reservior , electricity, hydel, flood protection,





भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में उफनती ब्यास की बाढ़ को रोकने के लिए बना पौंग बांध ही इस सीजन में बाढ़ का कारण बना है। बांध से छोड़े गए अतिरिक्त पानी के बाद अब न केवल बांध के जलाशय का जल स्तर गिरना शुरू हो गया है, बल्कि बांध से होने वाले पन बिजली उत्पादन में भी गिरावट आ गई है।

याद रहे कि 'दैनिक जागरण' ने दो सितंबर के संस्करण में ही बता दिया था कि गलती हो चुकी है और बिजली के 49 करोड़ यूनिट बहाने के अलावा अनावश्यक रूप से छोड़े गए पानी की वजह से कई इलाकों में बाढ़ का कारण भी यही पानी बना है।
गौरतलब है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से बिजली के करीब 27 करोड़ यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे, जो नहीं बने।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड(बीबीएमबी) का यह पौंग बांध का ऊपर वाला हिस्सा 1430 फीट पर है, जबकि इसके डिजाइन के अनुसार अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट रखी गई है, जबकि पूर्ण जलाशय 1400 फीट पर है। टर्बाइन के सभी छह यूनिट पूरी क्षमता पर चलाने के लिए इससे 17हजार 500 क्यूसिक पानी छोड़ा जाता है। पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन लेने वाला स्तर 1480 फीट पर आता है, जबकि 207 मेगावाट क्षमता के मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए डिस्चार्ज 11हजार 500 क्यूसिक चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के इंजी.पदमजीत सिंह की ओर केंद्रीय ऊर्जा सचिव पी. उमा शंकर को लिखा गया है कि वर्ष 2010 में बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया और 15 से 18 सितंबर के बीच बहुत कम पानी छोड़ा गया, जबकि इस साल अगस्त मध्य में ही 1480 फीट के आंकड़े से पहले ही डैम से पानी रिलीज करना शुरू कर दिया गया, जबकि बांध का भराव सीजन 21 सिंतबर तक है।
इंजी. पदमजीत कहते हैं कि गलती हो चुकी है। पानी का बहाव कम हो गया है। उम्मीद थी कि जल स्तर सात सितंबर तक 1386 फुट पर आ जाएगा लेकिन यह 1378 फुट रह गया है। बीबीएमबी को अब भी पानी को सहेजना चाहिए। किसी तरह से 26 सितंबर तक पानी भरने दिया जाए।
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किस दिन कितना हुआ उत्पादन?
पटियाला : 396 मेगावाट क्षमता के बांध से पन बिजली उत्पादन एक सितंबर को 396 मेगावाट, दो को 368 मेगावाट, तीन को 370 मेगावाट, चार को 370 मेगावाट, पांच को 370 मेगावाट और छह सितंबर को 295 मेगावाट रह गया है।

Saturday, 3 September 2011

जामुन नहीं रहेंगे सिर्फ जामुनी,होंगे लाल, सफेद, काले...agriculture, trees, trend, farmer, blackberry


-पायलेट प्रोजेक्ट के तहत महाराष्ट्र और गुजरात से मंगवाए गए पौधे
-छोटी गुठली और बहुतयात में होता है गुदा, तीन साल में फल देने लगता है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बैंगन जब बैंगनी नहीं रहा और सफेद होते ही ये 'बै-गुणÓ से 'ताज वालीÓ एकलौती सब्जी हो गया ऐसे में जामुन भला क्यों जामुनी ही रहने वाली थी। आने वाले सालों में पंजाब में लाल, सफेद, काले और यहां तक की नीले रंग में भी दिखाई देंगी। संभवत तब भी इन्हें जामुन ही कहा जाएगा, लेकिन रस और गुदे के मामले में पेड़ों पर लगने वाली ये जामुनें किसी हलवाई की जामुनों को भी पीछे छोड़ती नजर आएंगी।    

पंजाब में इन रंग बिरंगी जामुनों को लाने के पीछे भी मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की दिखाई गई दिलचस्पी है। प्रदेश वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि प्रकाश सिंह बादल के बीते साल गुजरात व महाराष्ट्र में किए गए दौरे के दौरान उनका सामना रंग बिरंगी जामुनों से हुआ तो पंजाब में ऐसी ही जामुने उगाने की इच्छा जताई गई।

अधिकारी बताते हैं कि हार्टीकल्चर विभाग की तुलना में वन विभाग को जिम्मी सौंपा गया जिसके तहत पायलेट प्रोजेक्ट बनाया गया और महाराष्ट्र और गुजरात से एक हजार पौधे लाए गए। बीते साल लाए गए पौधों में से ज्यादातर का प्रयोग सिंबल के रूप में हुआ, वीवीआईपी की ओर से कहीं स्मृति के रूप में लगवाने के अलावा गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर बांटे भी गए हैं। याद रहे कि फलों के पौधे लगाने फरवरी के अलावा सितंबर ही बेहतरीन महीना होता है।

प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाले व वर्तमान में कंजरवेटर के पद पर तैनात धर्मेंद्र शर्मा ने 'दैनिक जागरणÓ को बताया कि  इन जामुनों का बीज अथवा गुठली खासी छोटी होती है और गुदा बहुतयात में होता है। आम जामुन की तुलना में इसका पेड़ जल्द फल देने लगता है। तीन साल में ही ये अच्छा खासा फल देने लगता है।
रंग बिरंगी जामुने हाईब्रिड वेरायटी में आती है। आमतौर पर ये विदेशी किस्मों की श्रेणी में ही रखी जाती है, जिसे ग्राफटिंग से तैयार किया जाता है। धर्मेंद्र शर्मा याद करते हैं कि पंजाब में साधारण तय जमोए हुआ करते थे जिनकी गुठली खासी बड़ी होती है। बड़े साइज में ज्यादा गुदे और छोटी गुठली के साथ फिरोजपुर क्षेत्र में ऐसी ही एक किस्म पाई जाती है लेकिन उसकी रंग जामुनी ही होता है

याद रहे कि महाराजा पटियाला के पास भी ऐसी ही किस्म के जामुनों के प्लांट रहे हैं। जिनकी कलमें चोरी छिपे मोती बाग से बाहर जाती रही लेकिन जामुनों की उक्त रसभरी वेरायटी भी अब ज्यादा नहीं दिखाई देती है।

गिदड़बाहा पावर प्लांट पर भी लटकी तलवार!, giderbaha, thermal, power , plants, electricity, generation


- एनटीपीसी ने करना है निर्माण, रेल व कोल लिंकेज के अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेनी है क्लीयरेंस
- एनटीपीसी ने अपनी क्षमता से ज्यादा कर रखे है सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर, पंजाब खुद बनाए प्लांट: इंजी. एसो.
भूपेश चट्ठा, पटियाला
राज्य में बिजली की सप्लाई व खरीद के अलावा उत्पादन के प्रबंध का जिम्मा रखने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन पावरकाम को राज्य के गिदड़बाहा क्षेत्र में लगने वाले पावरप्लांट पर भी तलवार लटक रही है।
 केंद्र सरकार के संस्थान नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन की ओर से स्थापित किए जाने वाले इस प्लांट पर जहां एक ओर आंदोलन की छाया मंडराने लगी है वहीं पंजाब सरकार और एनटीपीसी के बीच हुए समझौते को एक साल होने को है और निर्माण की दिशा में एक इंच भी प्रगति नहीं हुई है।

पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि बीते साल अक्टूबर में एनटीपीसी के साथ 15 हजार करोड़ रूपये की राज्य की सबसे बड़ी बिजली परियोजना के समझौते के तहत राज्य ने केवल जमीन का अधिग्रहण करना था और प्लांट के चालू होने पर बिजली की खरीद करनी थी। इसके अलावा सभी निर्माण कार्य और प्लांट के लिए रेल व कोल लिंकेज की क्लीयरेंस के अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्वयं मंजूरी लेनी थी। सूत्र कहते हैं कि इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

जबकि इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रदेश प्रधान इंजी. बेदी कहते हैं कि वे पहले दिन से कह रहे हैं कि प्रदेश के पास प्लांट स्थापित करने की पूरी विशेषज्ञता है और पूर्व में बिजली बोर्ड ने प्लांट लगाए भी हैं। ऐसे में प्लांट एनटीपीसी के हवाले किए जाने का कोई तुक नहीं है। वैसे भी 37 हजार मेगावाट उत्पादन क्षमता वाले एनटीपीसी ने पिछले साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच 40 हजार मेगावाट और उत्पादन के समझौते कर लिए जिन्हें सिरे चढ़ाना संभव नहीं है। एनटीपीसी ने अपनी क्षमता से ज्यादा सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं।
वहीं उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की ओर से एनटीपीसी के साइन किए गए एमओयू को रद्द करने के दिए गए वक्तव्य पर पावरकाम के अधिकारी खामोश हैं। नाम ना प्रकाशित करने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि पावरकाम के कागजों में अभी प्लांट पर काम चल रहा है, पर कई तरह की क्लीयरेंस अभी कंपनी को नहीं मिली है, चाहे ये केंद्र का ही संस्थान है।

दिलचस्प है कि चुनावी साल में जमीन को लेकर हर ओर तेज हो रहे किसान आंदोलनों से सहमे अकाली थिंक टैंक को समझ नहीं आ रहा कि तीन गांवों की 2350 एकड़ जमीन में से आधी एक साल पहले तक सैम की मार तले थी, पर अब दाम लगातार बढ़ रहे हैं। आधी जमीन का अधिग्रहण करने के बाद राज्य सरकार दोबारा दूसरे चरण में शेष आधी जमीन पुराने दाम पर खरीदने की स्थिति में नहीं है। और एनटीपीसी को अभी से दाम ज्यादा लगने लगे हैं।

Thursday, 1 September 2011

बाढ़ रोकने बने बांध से निकली बाढ़, बिजली गई बेकार, dam, flood protection, reservior , pong, hydel,


-पौंग बांध से बहा दिए 49 करोड़ बिजली यूनिट, बाढ़ आई सो अलग
-बांध 1430 फीट का, अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट, रिजरवायर 1400 फीट पर पानी छोड़ दिया 1380.4 फीट पर
-बीते साल बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया था
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में उफनती ब्यास नदी की बाढ़ को रोकने बना पौंग बांध ही इस सीजन में बाढ़ का कारण बना है। बांध से छोड़े गए पानी के आंकड़े बताते हैं और कहते हैं कि भराव के पिछले इतिहास को  देख थोड़ा संयम बरता होता तो ना केवल पौंग बांध से बही 49 करोड़ यूनिट बिजली बची होती अपितु सिंचाई के लिए पानी भी। वहीं अनावश्यक रूप से पानी छोड़े जाने से बाढ़ आई सो अलग।
दिलचस्प है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से करीब 27 करोड़ बिजली के यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरिंयां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड का यह पौंग बांध का उपरी हिस्सा 1430 फीट पर है जबकि इसके डिजाइन अनुसार अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट रखी गई है जबकि पूर्ण रिजरवायर 1400 फीट पर है। सभी छह यूनिट पूरी क्षमता पर चलाने इससे 17500 क्यूसिक पानी छोड़ा जाता है, पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन लेने वाला स्तर 1480 फीट पर आता है, जबकि 207 मेगावाट क्षमता के मुकेरिंयां हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए डिसचार्ज 11500 क्यूसिक चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन के इंजी. पदमजीत सिंह की ओर केंद्रीय ऊर्जा सचिव सहित सभी संबंधित पक्षों को भेजे गए श्वेत पत्र में लिखा गया है कि वर्ष 2010 में बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया और 15 से 18 सितंबर के बीच बहुत कम पानी छोड़ा गया, जबकि इस साल ये शुरुआत ना केवल अगस्त मध्य में ही 1480 के आंकड़े से पहले ही रिलीज करना शुरू कर दिया गया। जबकि बांध का भराव सीजन 21 सिंतबर तक है, इसके बाद पानी बहुत कम रिलीज किया जाता रहा है।
बाक्स : मापदंड 
महीना,   मिलीयन यूनिट,  लोड, स्तर
-अक्टूबर 10 को,140, 52 फीसदी, 1388 फीट
-नवंबर, 172, 66 फीसदी, 1379 फीट
-दिसंबर, 170, 63 फीसदी, 1368 फीट
-जनवरी 11 को, 114, 43 फीसदी, 1361 फीट
-फरवरी, 165, 68 फीसदी, 1351 फीट
-मार्च,    103,38 फीसदी, 1345 फीट
-अप्रैल,  12,  पांच फीसदी, 1349 फीट
-मई,     71,  27 फीसदी,  1350 फीट
-जून,    135, 52 फीसदी,  1351 फीट

पौंग बांध का न्यूनतम जल स्तर 1260 फीट है इसके अब तक के सबसे कम जल स्तरों में 26 अप्रैल 1982 में 1311 फीट, 25 जून 1978 में 1315 फीट रहा है। इसके बाद मानसून के दिनों में बांध फिर से भरने लगता है। इस साल जुलाई में प्लांट 81 फीसदी लोड फैक्टर पर चला, जबकि एक से 12 अगस्त के बीच इसे 65 फीसदी कर दिया। 14 अगस्त को सुबह नौ बजे गेट खोलने के बाद दोपहर तीन बजे 100 फीसदी लोड पर चलाया गया। 
बांध से 70 हजार क्यूसिक तक पानी छोड़े जाने ने भारी तबाही मचाई। 15 से 19 अगस्त के बीच प्रदेश भर में भारी बारिश हुई और 17 अगस्त से 21 अगस्त के बीच जल स्तर 1388.02 फीट से गिरता हुआ 1386.83 फीट पर आ गया। जबकि 1400 फीट तक का गैप भविष्य की बाढ़ की संभावनाएं रोकने के लिए होता है। इंजी. पदमजीत कहते हैं कि उन्होंने लगातार ऊर्जा मंत्रालय के अलावा बीबीएमबी को 22, 23, 25, 29, 30 अगस्त को ईमैल किए हैं कि बांध को पिछले साल के स्तर तक भरने दो पर नहीं हुआ। कम से कम चार रूपये यूनिट की 50 करोड़ यूनिट बिजली के अलावा बहुमूल्य पानी बह गया।