Thursday, 27 December 2012

पंजाब से छोटा किसान हुआ गायब



-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि योग्य जमीन का रकबा चाहे कम हो रहा है और कंकरीट के जंगल भी बस रहे हैं लेकिन राज्य में बड़े किसानों की संख्या बढ़ रही वहीं छोटा किसान तेजी से गायब हो रहा है। किसानों की जनगणना पर जुटाए गए व संग्रहित किए जा रहे आंकड़ों में देश के रूझान के विपरीत जानकारी सामने आ रही है।
दिलचस्प है कि देश भर में जहां छोटे किसानों की गिनती बढ़ रही है। कृषि विभाग के सांख्यकि विभाग से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि इससे पहले पंजाब में परिवारों के टूटने के पांच एकड़ तक के किसानों की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पर अब बड़े खेत बढ़ रहे हैं और स्वभाविक है कि कई दशकों के बाद बड़े जागीरदार भी एक बार फिर से समाज में फलने फूलने लगे हैं।
जनगणना के आंकड़े औपचारिक रूप से अगले साल मार्च-अप्रैल तक ही प्रकाशित होंगे लेकिन आरंभिक संग्रह करने वाले अधिकारी बताते हैं कि पंजाब में छोटा किसान जहां ठेके पर जमीन दे कर खुद खेती से किनारा कर रहा है। ऐसे लीज पर जमीन देने वाले छोटे व मध्यम किसानों की संख्या एक लाख 30 हजार पर आ गई है। जबकि ऐसे ही जमीन बेच देने वालों का आंकड़ा भी 72 हजार है जो अब जमींदार नहीं रहे।
वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के आने वाले परिणाम जहां बड़े किसानों की संख्या के मामले में चौंकाने जा रहे हैं वहीं उत्पादन के मामले में भी कम आश्चर्यजनक नहीं होंगे। पंजाब की तुलना में गेहूं उत्पादन अन्य राज्यों में बढ़ रहा है जबकि यहां पर लगभग स्थिर है। दस साल पहले मध्यप्रदेश में गेहूं उत्पादन जहां 57 हजार टन था वहीं अब 80 लाख टन है।
वहीं मक्की उत्पादन पर जोर देते मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि अभी तो सारा धान व गेहंू सरकारी खरीद एजेंसियां खरीद रही हैं, लेकिन तब क्या होगा जब यह आपूर्ति अन्य राज्यों से होने लगेगी। सारा सिस्टम निजीकरण की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए अभी से जागने की जरूरत है। केंद्र हमारी मक्की नहीं खरीद रहा पर बाजार में बिक रही है, धान का यही एकमात्र सही विकल्प है। वे कहते हैं कि पंजाबियों को अब एक बार चावल खाना कम कर मक्की की रोटी को तवज्जो देनी होगी।
वहीं सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि ये किसान कहीं गायब नहीं हो रहे ये लो अब खेत मजदूर व दिहाड़ीदार हो गए हैं। कर्ज में डूबे किसानों की जमीनें बिक रही हैं। पंजाब के किसान की हालत ठीक वैसी ही हो गई है जैसी देश की सीमा पर लड़ते हुए सिपाही की जो घायल हो गया है। देश का पेट भरने किसान ने अकाल, बाढ़, आतंकवाद जैसे हर हालात में फसल को पाला, हरित क्रांति ने किसानी का लागत मूल्य बढ़ा दिया और खर्चे किसान ने खुद बढ़ा लिए। ऐसे में अब देश की जिम्मेदारी बनती है कि घायल हुए किसान व कृषि का इलाज करे। जबकि बड़े किसानों का फायदा केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होगा जिनकी निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी हैं।

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 कृषि जनगणना वर्ष 2010-11

-पंजाब में बड़े किसानों की संख्या बढ़कर 10.28 लाख
-मध्यम किसानों की संख्या घटकर 1.01 लाख रह गई
-20 एकड़ से ज्यादा भूमि वाले किसानों की संख्या 2.79 लाख से ज्यादा
-तीन से चार एकड़ जमीन वाले किसानों की संख्या 3.43 लाख

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 2000-01 में 65 फीसद थे छोटे किसान

वर्ष 2000-01 में हुई जनगणना का हवाला दे पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. रणजीत सिंह घुम्मन की ओर से किए गए शोध में सामने आया है कि दस साल पहले पंजाब में किसानों की कुल संख्या 18.44 लाख थी, इसमें से पांच एकड़ से कम भूमि वाले छोटे किसान 32 फीसद और पांच से दस एकड़ भूमि वाले मध्यम किसानों का हिस्सा कुल आबादी का 33 फीसद था। शेष बड़े किसानों थे।

Friday, 21 December 2012

अब महिला शिक्षकों से छेड़छाड़ रोकने गाइड लाइन



-आईपीसी में दंड के क्या प्रावधान हैं, सर्कुलर में यह भी बताया गया
-दूर दराज के क्षेत्र में तैनाती से बचा जाए, एक स्थान पर सिंगल महिला की तैनाती ना हो, एक पुरुष कर्मी के साथ अकेली महिला कर्मी की डयूटी ना लगाई जाए
-10 निर्देशों में पंचायत सदस्यों, अधिकारियों और खुद महिलाओं से कहा गया क्या करें? और क्या ना करें?
भूपेश चट्ठा, पटियाला
स्कूल कालेजों में छात्राओं से बढ़ रही छेड़छाड़, दुव्र्यवहार यहां तक की दुष्कर्म की बढ़ रही घटनाओं के बाद अब महिला शिक्षकों के साथ ऐसी किसी दुर्घटना होने से पहले ही रोकने प्रदेश के डायरेक्टर जनरल आफ स्कूल एजूकेशन ने एहतियातन गाइड लाइन जारी कर दिए हैं।
इतना ही नहीं जारी किए गए दिशा निर्देशों में यह भी बताया गया कि कि भारतीय दंड संहिता के तहत महिलाओं के साथ किस प्रकार का दुव्र्यवहार करने पर आईपीसी में दंड के क्या प्रावधान हैं। कितनी सजा है? अथवा कितना जुर्माना हो सकता है? सर्कुलर में इसका भी विस्तृत ब्यौरा दिया गया है।
जारी किए गाइड लाइन में माना गया है कि महिला शिक्षकों को कई बार दूर दराज के क्षेत्रों में डयूटी पर जाना पड़ता है और कई स्थानों पर अकेले तैनाती के दौरान छेड़छाड़ अथवा मानसिक परेशानी से दो चार होना पड़ता है। ऐसी घटनाओं को सभ्य समाज के लिए कलंक बताते हुए इनसे सख्ती से निपटने को कहा गया है। शिकायत के लिए जहां डीजीएसई ने अपना ईमेल लिखा है वहीं मामला गंभीर होने की स्थिति सीधे फोन पर भी कहा जा सकता है। हालांकि महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेवारी समूचे समाज व सरकार की बताई गई है।
कहा गया है कि दूर दराज के क्षेत्र में महिला शिक्षक की तैनाती से बचा जाए, यहां पर पहल के आधार पर पुरुषों की तैनाती हो। जहां कहीं एक स्थान पर सिंगल महिला की तैनात हो, विशेष रूप से प्राइमरी स्कूलों में सुनिश्चित किया जाए कि आंगनवाड़ी सेंटर भी इन्हीं परिसर में काम करते हों। अगर ऐसा नहीं है तो पंचायतों से प्रार्थना है कि वो इन केंद्रों को शिफ्ट करवाएं।
महिला शिक्षकों को छुट्टी के बाद या देर सवेर रिपोर्ट लेने अथवा देने के लिए कार्यालय में ना बुलाया जाए। निर्देश में कहा गया है कि 'कई बार एक पुरुष कर्मी के साथ एक अकेली महिला कर्मी की डयूटी लगाने छेड़छाड़ की घटनाएं बढऩे के अवसर बढ़ जाते हैं।Ó यहां तक कि एक अकेली महिला शिक्षक को किसी भी स्कूल में तैनात ना किया जाए। कम से कम दो महिला शिक्षकों की एक स्कूल में नियुक्ति संबंधी निर्देशित किया गया है।
10 निर्देशों में से छठे में कहा है कि 'कई बार स्कूल प्रबंधन कमेटी, पंचायत सदस्य, स्कूल में आकर अथवा छुट्टी के समय गांव  के नौजवान टिप्पणियां करते है।Ó इस मामले में ब्लाक प्राइमरी शिक्षा अधिकारी समय समय पर जांच करें। जबकि ब्लाक रिसोर्स पर्सन व डिस्ट्रिक्ट रिसोर्स पर्सन के बारे में कहा है कि 'ये लोग भी कई बार स्कूल में आकर विजिटिंग रजिस्टर पर हस्ताक्षर नहीं करते...इससे स्पष्ट समझा जाए कि बुरी नीयत से आया हैÓ।
 अधिकारियों और खुद महिलाओं को ताकीद की गई है कि क्या करें? और क्या ना करें? इसके साथ ही शिकायत को तुरंत संबंधित इंस्पेक्शन टीम के समक्ष की जाए। ऐसा ना करने का मतलब असमाजिक तत्वों को शह देना होता है। इस जांच करने बनाई जाने वाली पांच सदस्यों की सैक्सुअल हरासमेंट कमेटी में तीन महिलाओं का होना भी जरूरी कर दिया गया है। जबकि पुलिस कार्रवाई करवाने की जिम्मेदारी बीपीईओ अथवा डीईओ की तय की गई है।



महिलाओं के खिलाफ जुर्म करने पर भारतीय दंड संहिता में सजा के प्रावधान
धारा 354 किसी महिला से जोर जबरदस्ती करना, छेड़छाड़ करना, परेशान करना तो दो साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों हो सकती हैं।
धारा 376 बलात्कार - किसी महिला से उसकी सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाने पर सात साल की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।
धारा 376 (2बी) सरकारी कर्मचारी होते हुए अपनी स्थिति का गलत फायदा उठाते हुए किसी महिला से बिना सहमति शारीरिक संबंध बनाने पर दस साल की कैद एवं जुर्माने का प्रावधान।
धारा 493 किसी महिला को धोखे से यह यकीन दिलाकर कि अब वह उसकी पत्नी है, शारीरिक संबंध बनाने पर दस साल की कैद एवं जुर्माना अथवा दोनों सजाएं हो सकती हैं।
धारा 509 ऐसा कुछ कहना, इशारा करना जिससे महिला की लज्जा का अनादर हो तो एक साल की कैद या जुर्माना या दोनों सजाओं का प्रावधान।

लोक सभा चुनाव: कैप्टन कंवलजीत की बेटी कांग्रेस में होंगी!


-विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के प्रयास तेज मुलाकात की
-मनप्रीत डौली ने भी किया दिल खोलकर स्वागत
-डेरा बस्सी में परनीत समर्थक दीपेंद्र सिंह ढिल्लों के अकाली हो जाने के बाद राजनीतिक संतुलन की जुगत
भूपेश चट्ठा, पटियाला
शिरोमणि अकाली दल का दिमाग कहे जाने वाले तेज तर्रार नेता स्व. कैप्टन कंवलजीत सिंह की बेटी मनप्रीत डौली जल्द ही कांग्रेस का हाथ थामने जा रही हैं विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के प्रयास जिस तरह से चल रहे हैं उनसे तय है कि अगले लोक सभा चुनाव से पहले अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र अधीन आते डेराबस्सी, बनूड़ व कुछ हद तक राजपुरा में राजनीतिक संतुलन बनाने जा रही है।
डेराबससी से परनीत कौर के करीबी और खासा जनाधार रखने वाले दीपेंद्र सिंह ढिल्लों के इसी साल जुलाई में अकाली हो जाने के बाद से कांग्रेस इस क्षेत्र के बागी अकालियों पर डोरे डालने की कोशिश में लगी है। विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के इसी प्रयास का खुलासा डेरा बस्सी के निकट अमलाला गांव में घग्गर नदी पर बनने वाले पुल के लिए आयोजित किए गए कार्यक्रम में हुआ है। घड़ाम के बाबा बुल्ले शाह की ओर से रखे गए कार्यक्रम मनप्रीत कौर डौली व विदेश राज्य मंत्री के खासी करीब रही । नजदीकियां बढऩे के सिलसिले में जहां परनीत कौर की और से शुरुआत की गई बताई जा रही है वहीं मनप्रीत डौली ने भी इस प्रयास का दिल खोलकर स्वागत किया है। कार्यक्रम स्थल तक मनप्रीत कौर को कभी स्व. कैप्टन कंवलजीत के बेहद करीबी गुरकीरत सिंह थूही लेकर गए। याद रहे कि स्व. कैप्टल कंवलजीत की मौत के तुरंत बाद थूही ने अकाली दल छोड़ कांग्र्रेस का दामन थाम लिया था।
पटियाला संसदीय क्षेत्र में आता अमलाला गांव यों तो मोहाली जिले में आता है लेकिन इस पुल के बनने से पटियाला जिले के बनूड़ व स्व. कैप्टन कंवलजीत की कर्म भूमि बनूड़ से सीधा संपर्क हो जाएगा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मनप्रीत डौली भी घग्गर के इसी पुल से कांग्रेस में जाने का सफर लगभग पूरा कर चुकी हैं और अब परनीत कौर का 'आफरÓ ठुकराने की स्थिति में नहीं है। हालांकि मनप्रीत कौर कहती हैं कि उन्होंने अपना राजनीतिक भविष्य अभी तय नहीं किया है वे तो बाबा बुल्ले शाह की ओर से रखे गए कार्यक्रम में बुलाने पर भाग लेने आई हैं। वहीं परनीत कौर को उन्होंने बेहद अच्छी महिला बताया और कहा कि दोनों परिवारों में अच्छे रिश्ते रहे हैं। जबकि मंच से वे यह भी कहती हैं कि स्व. कैप्टन कंवलजीत की मृत्यु के बाद से उनके साथ सारा डेरा बस्सी ही अनाथ हो गया है।
डेरा बस्सी में परनीत समर्थक दीपेंद्र सिंह ढिल्लों के अकाली हो जाने के बाद इस विधान सभा क्षेत्र में राजनीतिक संतुलन की जुगत में कांग्रेस का निशाना भी सटीक है। अकाली दल से इसी साल टिकट ना मिलने की स्थिति में मनप्रीत कौर डौली ने अकाली दल छोड़ कर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा था। इसी प्रकार दीपेंद्र ढिल्लों ने कांग्रेेस का टिकट ना मिलने पर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा। जीते तो दोनों में से कोई नहीं पर वोट व समर्थन खासा जुटा गए।

पंजाबी पानी के बाद मिट्ïटी भी हुई बेदम!


-मिट्टी को कौनसी चाहिए टॉनिक? बताएगा कृषि विभाग
-किसान का नुकसान कम करने फसलें भी सुझाई जाएंगी और कुछ से दूर रहने को भी कहा जाएगा: विशेषज्ञ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पांच पानियों की धरती पंजाब का पानी गड़बड़ हुआ तो पहले शहरों के घरों में फिल्टर लगे और अब गांवों में पीने का साफ पानी उपलब्ध करवाने पंचायतों में आरओ लग रहे हैं। आलम ये है कि देश के अन्न भंडार में दो तिहाई तक हिस्सा डालने वाले पंजाब की मिट्टी भी बेदम हो गई है। यूरिया, फास्फेट जैसे हरित क्राति के ताकतवर तत्व अब बेमानी हो गए हैं। ऐसे में कृषि विभाग आने वाले दिनों में इससे एक कदम आगे की मिट्टी की टॉनिक सुझाने जा रहा है।
विभागीय अधिकारियों अनुसार अभी तक कृषि विभाग मिट्टी का परीक्षण केवल तीन तत्वों का ही करता था अब इसे माइक्रो न्यूट्रीएंट्स स्तर पर ले जाया जाएगा। नाइट्रोजन, फास्फोरस, केलशियम व जैविक तत्वों की मात्रा ही जांची जाती थी अब बदले हालात में मैग्नीज, जिंक, आयरन व गंधक  की जांच की जाएगी।
डिप्टी डायरेक्टर बीज रह चुके मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेती जिस स्तर पर पहुंच गई है वहां से इसे लाभदायक बनाने के लिए या तो हमे शोध कर लागत कम करनी होगी या फिर उपज के उत्पादन के स्तर को बनाया रखना होगा। इसके लिए जिन तत्वों की कमी है केवल उन्हें ही खेत में डालने की सिफारिश की जाएगी। यह मिट्टी की जांच के दौरान ही पता चल जाएगा। इसके लिए फसल पर एक तत्व विशेष की कमी का असर देखे जाने तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसी के आधार पर किसान को सुझाया जाएगा कि कौनसी फसल की बिजाई करे अथवा किस फसल से बिलकुल दूर रहें। संभव है कि मिट्टी के परीक्षण के बाद किसान को कुछ नुकसान करने वाली फसलें हमेशा के लिए छोडऩी पड़ें।
डा. सोहल कहते हैं कि अभी तक कई किसानों ने सिर्फ एक दूसरे से सुन कर ही यूरिया खेत में डाल लिया, इसने खेत के जिंक तत्वों को खासा नुकसान पहुंचाया है। जहां जरूरत नहीं थी वहां भी प्रयोग करने से पहले किसान ने यूरिया पर पैसे खर्चे और अब जिंक पर करेगा। ऐसे ही हम एक तय माप अनुसार रसायनिक खादों का प्रयोग करते जाते हैं, जिसका प्रभाव हम 15 दिनों अथवा कई बार तो एक महीने बाद फसल पर बीमारी के रूप में या फिर पौधे की ग्रोथ के रूप में देखते हैं, जबकि पहले माइक्रो न्यूट्रीएंटस की जांच करने पर हमे इस तरह के मंहगे व रिस्की तर्जुबे नहीं करने पड़ेंगे।

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बदलती है टॉनिक की मात्रा, पर होता है विपरीत प्रयोग
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां मिट्टी में ज्यादा नमी है वहां नहरी पानी की तुलना में खाद का प्रयोग मात्र दो तिहाई हिस्सा ही करना होता है जबकि रेतली जमीन पर ये एक तिहाई रह जाता है। जबकि किसान रेतली जमीन में ज्यादा खाद डाल कर अधिक उपज लेने का प्रयास करता है। इसी प्रकार अगर गेहूं को सिफारिश की गई फास्फोरस वाली खाद डाली गई हो तो उन खेतों में धान, कपास, मक्की, मूंगफली आदि के लिए इस खाद की जरूरत नहीं होती लेकिन ऐसी स्थिति में अगर टेस्ट में नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा आ जाए तो इसका प्रयोग करना पड़ता है।

Thursday, 13 December 2012

कमजोर मानसून: पर धान की उपज सात फीसद ज्यादा


-धान का सीजन समाप्त, लिफ्टिंग मुकम्मल
-आपात स्थितियों में उत्पादन बढ़ता है: कृषि विशेषज्ञ
-उत्पादन की तुलना में किसान का खर्च ज्यादा बढ़ा: किसान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में प्री मानसून के नाम पर जून में एक भी बारिश नहीं सर्वाधिक जरूरत व जोरदार मानसून वाले जुलाई महीने में हुई तीन से चार बारिश और कुल मिला कर कमजोर कहे जाने वाले मानसून के बावजूद धान की उपज बढ़ गई है। कम से कम पटियाला जिले में पिछले साल की तुलना में धान का उत्पादन बढ़ा है।
मंडियों में आए धान के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल के शानदार मानसून के खरीफ सीजन की तुलना में इस साल धान की उपज सात फीसद ज्यादा रही है। यही आंकड़े एक और दिलचस्प तथ्य उजागर कर रहे हैं। जिसके अनुसार देरी से बिजाई की जाने वाली बासमती किस्मों के उत्पादन को शामिल किया जाए तो कुल बढ़ोतरी दो फीसद ही रह जाती है। यानी बासमती अथवा इसके समतुल्य किस्मों का उत्पादन कम हुआ है।
जिले की 107 मंडियों में पिछले साल जहां 11 लाख 68 हजार 915 टन धान की आवक हुई थी वहीं इस साल इन्हीं पीआर किस्मों की आवक 12 लाख 51 हजार 666 टन धान आया है। जो पिछले साल से सात फीसद ज्यादा है। इसी प्रकार मंडियों में बासमती सहित आए कुल धान की आवक जहां पिछले साल 13 लाख 14 हजार टन रही थी वहीं इस साल ये बढ़कर 13 लाख 41 हजार 260 टन पर आ गई है।
मंडी बोर्ड के अधिकारी बताते हैं कि धान का सीजन अब लगभग समाप्त हो चुका है और मंडियों में से धान की लिफ्टिंग भी मुकम्मल हो चुकी है। संभव है कि एक, दो ट्राली आ जाए पर उम्मीद अब नहीं है।
दूसरी ओर कमजोर मानसून के बावजूद उत्पादन बढऩे के सवाल पर कृषि विशेषज्ञ डा. एएस मान कहते हैं कि आपात स्थितियों में उत्पादन बढ़ता है। पौधों का व्यवहार भी इंसान या अन्य जीवों की तरह होता है। जो खुद को खतरे में पाकर आबादी बढ़ाने लगते हैं। यह लंबे युद्ध अथवा अकाल जैसी  परिस्थितियों में देखा गया है। कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि पौधे के लिए मौसम उसके पक्ष में होने अथवा बारिश ठीक ठाक होने की स्थिति में वो फलता फूलता ज्यादा है। वेजीनेशन का आनंद लेने लग जाता है। उसकी लंबाई ज्यादा बढ़ती है पर बल्लियों में बीज पैदा नहीं होता। इस साल भी कुछ हालात ऐसे ही बने कि पौधे ज्यादा नहीं पनपे पर दाने ज्यादा बने हैं।
वहीं भारतीय किसान यूनियन के हरभजन सिंह कहते हैं कि सरकार उत्पादन बढऩे की बात तो करती है पर इसकी तुलना में किसान का खर्च ज्यादा बढ़ा है। उसका जिक्र नहीं करती। मौसम चाहे जैसा हो, सूखे की मार चाहे जितनी पड़े, किसान अपनी फसल को गहने बेच कर या उधारी लेकर पाल ही लेगा। ये भी उसके बच्चों के बारबर ही होती है। जिसे मरने नहीं दिया जा सकता, पर सूखे पर सरकार ने क्या किया?

Tuesday, 4 December 2012

कैसी विकलांग पेंशन? बैसाखी भी नहीं खरीदी सकते


-ढ़ाई सौ रूपये की मासिक पेंशन भी करवाती है तीन महीने का इंतजार
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भूपेश चट्ठा, पटियाला
हम धार्मिक इंसानों की बात सुनते हैं और कई बार उन्हें पूजने भी लग जाते हैं लेकिन हमसे दो कदम दूरी पर खड़े जरूरत मंद इंसान की मदद नहीं करते चाहे उसे कितनी भी इमरजेंसी क्यों ना हो। विकलांगता दिवस पर जिला पुर्नवासन केंद्र में आयोजित एक संगोष्ठी में केंद्र के प्रभारी डा. प्रितपाल सिंह सिद्धू की बातें पंजाब सरकार की ओर से विकलांगों को दी जाने वाली पेंशन पर पूरी तरह से सटीक बैठती है। करोड़ों रूपये की जमीन के मालिक से लेकर बड़े उद्योगपतियों को सरकारी अनुदान दिया जाता है। सरकारी नौकरों को भी कई तरह के सुविधा भत्ते दिए जाते हैं लेकिन विकलांगों को दी जाने वाली पेंशन से आप ढ़ंग की बैसाखी भी नहीं खरीद सकते। अगर आप लकड़ी की भारी भरकम बैसाखी से एल्यूमिनीयम की बैसाखी पर शिफ्ट करना चाहें तो आपको कम से कम दो महीने की पेंशन का इन्तजार करना पडेगा। सरकारी पेंशन ढ़ाई सौ रूपये है तो बैसाखी की कीमत साढ़े चार सौ रूपये।
यह बात सिर्फ एक टांग खराब होने वालों के लिए है। अगर आपके दोनों पांव नहीं है या पूरी तरह से दुरुस्त नहीं है और आप जमाने के साथ रेंग कर ही सही पर ट्राई साइकिल पर चलना चाहते हैं तो आपको वाली ट्राई साइकिल खरीदने के लिए आपको दो महीने की पेंशन एडवांस जमा करवानी पड़ेगी। इसके बाद 90 सब्सिडी वाली ट्राई साइकिल को अपने अनुसार दुरुस्त करवाने के लिए दो से तीन पेंशन लगानी पड़ेगी।
विकलांगता दिवस पर 'दैनिक जागरणÓ के इस प्रयास में सामने आया कि सरकार की ओर से दी जाने वाली पेंशन उन विकलांगों के लिए बेमानी है जिनके हाथ या पांव कट गए हैं और वे कृत्रिम अंग लगवाना चाहते हैं। यहां पर पेंशन तो वही रहती है पर आम आदमी के लिए सब्सिडी कम होकर 75 फिसद रह जाती है और दाम हजारों में चला जाता है। छह से आठ महीने की पेंशन खर्च करने के बाद प्राप्त होने वाले हाथ या पांव की उम्र अधिकारिक रूप से दो साल ही है और इसे तीन साल तक चलाया जा सकता है।
दिलचस्प है कि किसी भी उपकरण अथवा अंग के खराब होने की स्थिति में उसे बाजार भाव पर ही रिपेयर किया जाता है। अंगुली भी खराब हुई तो हाथ का दस्ताना पहले फाड़ा जाता है और फिर अंगुली के दाम डेढ़ पेंशन हैं तो दस्ताना दो पेंशन का है। इस पर भी यदि आप पुर्नवासन केंद्र के आसपास नहीं रहते हैं तो आपको रिक्शा से बस तक का किराया भी लगाना होगा।
ध्यान रहे कि इस दौरान आप अपनी विकलांगता की वजह से कहीं गिरें ना जिससे आपको चोट लगे और ना ही किसी तरह की बीमारी का शिकार हों अन्यथा आप एक बार फिर आम आदमी बन जाएंगे और पेंशन की जद से बाहर हो जाएंगे।
इन हालातों से एडीशनल डिवीजनल कमिश्नर अमृत पाल कौर को जब मौके पर ही अवगत करवाया जाता है तो कहती हैं कि वे सारी बातें सुन रही हैं और नोट भी कर रही हैं। सरकार के पास अधिक ग्रांट देने का प्रस्ताव भेजा जाएगा।

विकलांगता: इलाज से च्यादा रोकथाम जरूरी
-आटो रिक्शा के लगाए गए रिफलेक्टर
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उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
जिला पुर्नवासन केंद्र में विश्व विकलांगता दिवस पर आयोजित किए गए सेमिनार में वक्ताओं ने जहां विकलांगता के इलाज से च्यादा उसकी रोकथाम को जरूरी बताया और कहा कि बहुत से ऐसे काम हैं जिनसे दुर्घटनाएं होने से पहले ही रोकी जा सकती हैं। एडीशनल डिप्टी कमिश्नर विकास अमृत कौर गिल, शहर के ट्रैफिक प्रभारी हरदीप सिंह बडंूगर, केंद्र के प्रभारी डा. प्रितपाल सिंह सिद्धू व पटियाला सोशल वेलफेयर एसोसिएशन के विजय कुमार गोयल ने कहा कि हम दो मिनट के लिए कहीं भी रुक जाते हैं तो ट्रैफिक जाम हो जाता है। इसी देरी को पूरा करने कई लोग रफ्तार बढ़ाते हैं और कई बार जानी नुकसान होता है।
वक्ताओं ने कहा कि सड़क पर सेंस के साथ नैतिक शिक्षा पढ़ाई जानी जरूरी है। इस अवसर पर आटो रिक्शाओं के पीछे रिफलेक्टर भी लगाए गए जिससे कम से कम धुंध के समय में सड़क पर दुर्घटना ना हो।


काम है नहीं, सरकारी कार्यालयों में मिलते धक्के
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
ईश्वर ने जो करना था वो कर दिया...जो सजा लगनी थी लग गई...लेकिन अब हम अपने मां-बाप पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। सरकार कुछ करती नहीं, इतना पढ़े नहीं कि नौकरी मिल जाए अब तो बस चलता है। जिला पुर्नवासन केंद्र में ट्राई साइकिल लेने आए विकलांगों के अनुभव लगभग एक जैसे ही रहे हैं। हालांकि समस्या एक जैसी होने पर ऐसा स्वभाविक भी है। समाज का उनके प्रति रवैया कम से कम उनकी नजरों में तो नकारात्मक ही है। हालांकि अपनी और से प्रशासन और सरकार को कोसने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। कई मायनों में ऐसा वाजिब भी लगता है।  
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कर्मजीत सिंह कहते हैं कि वे आठवीं पास हैं और नौकरी मिल नहीं रही अब करें तो क्या? दो बार उन्हें बुलाया भी गया पर आगे धक्के ही मिले, बस चलता कर दिया। हालांकि कर्मजीत से जब कम शिक्षा की बात की जाती है तो वे सहमति भी प्रकट करते हैं। स्वीकार करते हैं कि च्यादा नहीं पढ़ पाए।  
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कुलविंदर सिंह कहते हैं कि कम से कम सरकार उन्हें दी जाने वाली चीजों पर तो जुर्माने के रूप में टेक्स ना लगाए। सरकार बड़े जागीरदारों सरमाए दारों पर खर्च कर रही है और उनके लिए जरूरत की चीज भी नहीं दे पाती। ऐसी कैसी सरकार है। एक ट्राई साइकिल मिल रही है। इसे अपने मुताबिक तैयार करवाएंगे। इसमें भी खासा खर्च है।

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जबकि शहर के ही रहने वाले जगतार सिंह कहते हैं कि जो कर रहे हैं उनके मां-बाप कर रहे हैं। अब तो सारा कुछ बोझ सा लगने लगा है। रोटी और कपड़े का प्रबंध जैसे तैसे घर से किया जा रहा है पर बीमारी के हालात में सब कुछ ईश्वर पर निर्भर हो जाता है। काम कोई करने की स्थिति में नहीं है।

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ऐसे ही गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि आज तक सिवाय धक्के खाने के कुछ नहीं मिला है। प्रशासन के अधिकारियों की ओर इशारा कर वे कहते हैं कि ये लोग भी अगर कुछ देते हैं तो तरसा कर।

विकलांगता के जारी हुए एक हजार सर्टिफिकेट
हमारे संवाददाता, पटियाला
सिविल सर्जन कार्यालय विकलांग होने पर मेडिकल जांच करने के बाद सर्टिफिकेट जारी करता है। सिविल सर्जन कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक इस साल एक जनवरी से लेकर 3 दिसंबर तक सिविल सर्जन कार्यालय ने एक हजार सर्टिफिकेट जारी किए हैं, जबकि पिछले साल में सिविल सर्जन कार्यालय ने 2024 विकलांग लोगों को सर्टिफिकेट जारी किए थे। विकलांगों की ये वो संख्या है जो आधिकारिक रूप से हर साल बढ़ती जा रही है। जिन लोगों अथवा उनके परिजनों को सरकारी प्रक्रिया की जानकारी है।


बस में चढ़ नहीं पाते, पार्क में घुस नहीं सकते

फ्लैग: विकलांगों के लिए व्यवस्थागत बदहाली
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-डीसी ने माना समस्या है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
केंद्र अथवा पंजाब की सरकारें अथवा जिले का प्रशासन विकलांगों को आम आदमी को मिल रही सुविधा देने में भी नाकाम रहा है। आलम ये है कि विकलांग व्यक्ति बस में चढ़ नहीं पाता क्योंकि बसें ऐसी नहीं बनी कि इनमें आसानी से चढ़ा जा सके और पार्कों के प्रवेश द्वार ऐसे नहीं कि इनमें व्हीलचेयर अथवा तिपहिया साइकिल के साथ घुसा जा सके।
विकलांगों की आबादी के आंकड़ों को लेकर चाहे विवाद हो लेकिन यह फिर भी पांच सात फीसद से कम नहीं है और वोटों के लिहाज से देखा जाए तो सरकारी दस्तावेजों में पटियाला जिले में ही विकलांगों की संख्या 40 हजार के पार है। हर साल सिविल सर्जन के कार्यालय में विकलांगता प्रमाण पत्र बनवाने वालों की संख्या में एक से दो हजार की बढ़ोतरी हो रही है। दिलचस्प है कि  ये आंकड़ा वोटों का वो अंतर है जो कई विधान सभा सीटों में हार-जीत के एक-दो हजार वोटों के अंतर से कहीं ज्यादा है लेकिन इस वर्ग की सुनवाई कहीं नहीं हो रही।
विकलांगों के लिए व्यवस्थागत सुविधाओं पर 'दैनिक जागरणÓ की ओर से की गई पड़ताल में सामने आया है कि जिला मुख्यालय वाले शहर में पिछले एक-डेढ़ दशक में बने सरकारी भवनों में व्हीलचेयर लाने ले जाने को रैंप बने हैं। इनमें मिनी सचिवालय, निगम व पूडा कार्यालय की बनी इमारतें शामिल हैं। लेकिन इनमें कहीं भी स्थाई रूप से रखी गई व्हीलचेयर नहीं दिखाई देती।
सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में चल रही बसें में प्रवेश के लिए द्वार के ही उपर नीचे कर सकने वाली डेक्कन बसों वाली तकनीक कहीं नहीं है। इतना ही नहीं जिले के सबसे बड़े व पीआरटीसी के मुख्यालय वाले शहर के बस स्टैंड में ही विकलांगों का बिना मदद के प्रवेश संभव नहीं है। पार्क में जाने के लिए घूमते जंगले के गेट लगे है। जहां से निकल पाना संभव नहीं है जबकि मुख्य गेट किसी वीआईपी के आने अथवा बड़े कार्यक्रम के अलावा नहीं खुलता है।
निजी क्षेत्र में हालात ज्यादा बुरे हैं। किसी बड़े शो रूम या मार्केट में आने जाने की आसान सुविधाएं नहीं है। इस पर हंस कर यह भी बताया जाता है कि जिसके पास माल खरीदने की क्षमता है, उसके लिए होम डिलीवरी भी है और शॉप को बाहर सड़क तक लाने की सुविधा है। इसके अलावा जो संभावित ग्राहक नहीं है, उसके लिए क्या करें?
वहीं डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह से संपर्क करने पर वे स्वीकार करते हैं कि यह समस्या तो है और इस दिशा में काम किया भी जा रहा है। लेकिन समस्या के निराकरण पर भी उतना ही काम हो पाया है जितना अन्य पर।

लक्ष्य 1000 मेगावाट, जुटाए 70 मेगावाट


- चार सालों में पंजाब में 52 एमओयू पर साइन
- सभी के चालू होने पर भी आने वाले सालों में 650 मेगावाट से च्यादा नहीं
- हर महीने एक-दो नए समझौते हो रहे हैं: पावरकाम
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मंहगे कोयले व गैस की किल्लत से जूझ रहे पंजाब ने परमाणु ऊर्जा से तौबा कर रखी है, लेकिन सैद्धांतिक रूप से गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के प्रयास के बावजूद राज्य में निकट भविष्य में इन साधनों से ज्यादा उत्पादन नहीं होने वाला है। राज्य की ओर से बायोमास ईंधन व माइक्रो हाइडल पन बिजली प्रोजेक्टों के अलावा हर प्रकार के गैर परंपरागत बिजली स्रोतों से बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य एक हजार मेगावाट रखा गया है और बार बार दोहराया भी जा रहा है, लेकिन अभी तक मात्र 70 मेगावाट से ही उत्पादन शुरू हो पाया है।
दिलचस्प है कि परंपरागत बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम करने की घोषणाएं वर्ष 2002 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल से होती रही हैं। उन दिनों ताबड़तोड़ ढ़ंग से मैमोरेंडम आफ अंडरस्टेंडिंग एमओयू पर हस्ताक्षर हुए लेकिन बात सीमित ढंग़ से ही आगे बढ़ पाई। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि पिछले चार सालों में पंजाब में बायो मास व माइक्रो हाइडल के रूप में छोटी पन बिजली परियोजनाओं सहित गैर परंपरागत बिजली उत्पादन स्रोतों के 52 एमओयू पर साइन हुए हैं। हालांकि सोलर व अन्य बिजली प्रकार के बिजली उत्पादन का हिस्सा इसमें नाममात्र का ही है। लगभग सभी प्रोजेक्ट आधा मेगावाट से 16 मेगावाट तक के हैं और सभी के चालू होने पर भी आने वाले सालों में 650 मेगावाट बिजली पैदा होने लगेगी। फिलहाल राज्य में चल रहे इस प्रकार के सभी प्रोजेक्टों की क्षमता करीब 70 मेगावाट है और पूरी क्षमता पर चलने की स्थिति में इनसे 16 लाख यूनिट से थोड़ा ज्यादा का उत्पादन हो रहा है।
वहीं पावरकाम के प्रवक्ता कहते हैं कि विश्व बाजार में छाई मंदी के कारण निजी क्षेत्र से ज्यादा लोग नहीं आ पाए हैं। बघौरा में प्लांट चला रही पंजाब बायोमास प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनी ही सौ से ज्यादा प्लांट लगाना चाहती है। ऐसी ही कई और कंपनियां हैं लेकिन उंची ब्याज दरों क चलते लोन लेना पूरी रह से व्यवहारिक नहीं महसूस करती। फिर भी लगभग हर महीने एक से दो नए समझौते हो रहे हैं। ऐसे में लक्ष्य से ज्यादा उत्पादन जल्द दिखेगा।

...क्या हैं पेंच
पंजाब से हरियाणा अथवा राजस्थान यहां तक कि दिल्ली को जाने वाले नहरी पानी पर लगने वाले माइक्रो हाइडल प्रोजेक्ट लगाने दो दशक पहले ही हरियाणा ने अड़ंगा लगा दिया था। नहरी फाल पर लगने वाले प्रोजेक्टों से पैदा होने वाली बिजली में से हरियाणा ने यह कहते हुए हिस्सा मांग लिया कि जो पानी हरियाणा को जा रहा है उससे पैदा होने वाली बिजली में से हरियाणा को हिस्सा दिया जाए और नहर पर प्रोजेक्ट लगाने से होने वाली पानी की बंदी से पूर्व हरियाणा से अनुमति ली जाए और इस प्रकार की अनुमति हरियाणा ने कभी नहीं दी।

...हर तरफ पराली और अथाह संभावनाएं हैं पर..
तकनीकि रूप से देखा जाए तो पंजाब में बायो मास ईंधन आधारित बिजली उत्पादन केंद्रों को लगभग हर गांव में लगाया और बिजली उत्पादन किया जा सकता है। इसके साथ ही प्रदूषण-पर्यावरण की समस्या के हल के अलावा किसान को भी आर्थिक रूप से मदद मिलना और बिजली की समस्या का लंबे समय तक हल शामिल है। लेकिन तमाम दावों के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया है।

20 लाख मीटर बाहर निकाले, 15 लाख सीफएल बांटे: चेयरमैन


- टीएंडडी लासेज 18 फीसद से कम होकर 17.40 फीसद हुए
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड और पंजाब एनर्जी कंजरवेशन लिमिटेड पीडा की ओर से बिजली बचत पर मनाए जाने वाले पखवाड़े की शुरूआत केंद्रीय लाइब्रेरी में आयोजित किए गए समारोह से की गई है। जन साधारण में बिजली बचत प्रति चेतना पैदा करने रखे गए कार्यक्रम में पावरकाम के चेयरमैन इंजी. केडी चौधरी ने कहा कि पावरकाम ने इस साल 20 लाख बिजली मीटर घरों अथवा उपभोक्तओं के अन्य परिसरों से बाहर निकाले हैं और पीले बल्बों के स्थान पर 15 लाख सीफएल सस्ती दरों पर बांटे हैं।
इंजी. केडी चौधरी कहते हैं बल्ब बदले जाने की योजना पूरे प्रदेश में चलाई जाएगी। राज्य भर में सीएफएल बदले जाने से करीब छह सौ मेगावाट बिजली की बचत होने की संभावना है। जबकि 20 लाख बिजली मीटरों को परिसर से बाहर निकाले जाने और शेष 50 लाख मीटरों को भी जल्द ही बाहर निकालने के बाद राज्य में पांच सौ मेगावाट बिजली और बचने लगेगी। जिन क्षेत्रों में से मीटर बाहर किए गए हैं वहां पर ट्रिपिंग कम हुई है और ट्रांसफार्मर कम जले हैं। इतना ही नहीं टीएंडडी लासेज भी पिछले साल की तुलना में 18 फीसद से कम होकर 17.40 फीसद रह गए हैं। इससे पावरकाम को दो सौ करोड़ रूपये की बचत होने का अनुमान है। सिस्टम के और दुरुस्त होने पर लासेज 16 फीसद होने का अनुमान है।
चेयरमैन का कहना है कि 11527 किलोमीटर का एलटी एंव एचटी कंडक्टर बदल दिया गया है और इतना ही और बदले जाने की जरूरत है। जिसे धान के सीजन में नहीं बदला जा सका है। 53 हजार से अधिक ओवर लोड ट्रांसफार्मर बदल कर उनका लोड कम किया है। इसी क्रम में 23 हजार ट्रांसफार्मर और बदले जाने हैं।
वहीं अपने उद्घाटन भाषण में पावरकाम के डायरेक्टर उत्पादन इंजी जीएस छाबड़ा ने कहा कि अनावश्यक रूप से बिजली का प्रयोग करने से बचा जाए। विवाह शादी व अन्य कार्यक्रमों में बिजली की फिजूल खर्ची से बचा जाए और घरों व व्यापारिक संस्थानों में अच्छी गुणवत्ता के उपकरणों का प्रयोग किया जाए। उन्होंने बताया कि ऊर्जा बचत पखवाड़े की शुरूआत पटियाला से की गई है जबकि 14 दिसंबर को इसी प्रकार का कार्यक्रम अमृतसर में भी करवाया जाएगा।

इस साल भी पावरकाम चूका एआआर की डेड लाइन


- अगले साल के राजस्व व खर्च का अनुमान पावरकाम नहीं लगा पाया
- 30 नवंबर तक पीएसईआरसी के पास दायर करनी होती है एआरआर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
इस साल भी पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड अपने अगले वित्तिय वर्ष के खर्च व राजस्व का अनुमान लगाने वाली वार्षिक राजस्व रिपोर्ट एआरआर दायर करने की डेड लाइन 'चूकÓ गया है।
 अगले साल के राजस्व व खर्च का अनुमान 30 नवंबर तक लगाने के बाद पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेग्यूलेटरी कमीशन, पीएसईआरसी के पास एआरआर दायर करनी होती है। इसके बाद ही पीएसईआरसी एक अप्रैल से शुरू होने वाले वित्तिय वर्ष के लिए प्रदेश में बिजली दरों को संशोधित करता है।
उल्लेखनीय है कि कृषि क्षेत्र को छोड़ प्रदेश का हर बिजली उपभोक्ता इस साल बिजली बिलों की मार तले आया है। सात शहरों में एक साफ्टवेयर में गड़बड़ी के चलते जहां तीन से चार महीनों के बिल एक साथ आए हैं, वहीं सितंबर के बाद से आने वाला बिजली बिल एरियर के साथ आया है। इसके बाद आना वाला बिल भी कुछ ऐसा ही होगा हालांकि इसमें गर्मियों में घूमे बिजली मीटर के आंकड़े ना होने से राहत जरूर होगी।
 दिलचस्प है कि बजट गड़बड़ देने वाले इन एरियर वाले बिजली बिलों से आम आदमी को छुटकारा अगले साल भी नहीं मिलने वाला है। पीएसईआरसी के पास दायर की जाने वाली वार्षिक राजस्व रिपोर्ट एआरआर के साथ ही शुल्क संशोधन याचिका भी पावरकाम की ओर से दायर की जाती है। राजस्व के अलावा थर्मल प्लांटों में ईंधन, बिजली खरीदने के मुख्य खर्च के अलावा कर्मियों के वेतन व पेंशन पर होने वाले खर्च के बाद हुए घाटे अथवा लाभ को सामने रख कर अगले साल के लिए बिजली शुल्क का संशोधन मांगा जाता है।
एआरआर दायर करने के बाद 120 दिनों का समय पीएसईआरसी की ओर से ऐतराज व फीडबैक लेने के लिए रखा गया है। उपभोक्ता, सरकार व पावरकाम के बीच कड़ी का काम करने वाला पीएसईआरसी इसके बाद बिजली दरों की घोषणा कर देता है।
वहीं, पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि इस बार अभी तक एआरआर तैयार करने की गति खासी धीमी है। संभव है कि दिसंबर मध्य तक यह तैयार ही ना हो पाए। इसके बाद होने वाली पावरकाम प्रबंधन की बैठक में इसे पारित करवाने के अलावा ऊर्जा मंत्रालय के समक्ष रख कर स्वीकृति ली जाती है। इस प्रक्रिया में लगने वाले समय से अभ्यस्त पावरकाम के ही एक अधिकारी बताते हैं कि इस बार एआरआर अगले साल जनवरी में ही दायर हो पाएगी। ऐसे में एक अप्रैल से लागू होने वाली बिजली दरें एक बार फिर देरी से लेकिन पिछली तारीखों से ही लागू होंगी। ऐसे में एरियर के साथ आने वाले भारी भरकम बिजली बिल फिर परेशान करने तय हैं।

अगली गर्मियों की तैयारियों में लगा पावरकाम


-शार्ट टर्म समझौतों के टेंडर जारी, 18 हजार लाख यूनिट से ज्यादा बिजली खरीद करने का लक्ष्य
-बैंकिंग के माध्यम से करीब एक सौ लाख यूनिट पहाड़ी राज्यों के पास जमा करवानी शुरू
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान का सीजन अभी समाप्त हुआ ही है और सर्दी ने अभी पूरा जोर नहीं पकड़ा है लेकिन पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड को अगले साल आने वाली गर्मियों की चिंता सताने लगी है।
पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि इस साल उत्तरी ग्रिड के दो बार ठप होने के चलते उत्तर भारत के लगभग सभी राज्य अगली गर्मियों में बिजली खरीद करने के शार्ट टर्म समझौते करने में लगे हैं। चूंकि पंजाब ने पड़ौसी राज्य हरियाणा और उत्तर प्रदेश की तुलना में पिछले साल जल्द प्रबंध कर लिए थे जिसके चलते अन्य राज्यों को बिजली खरीदने में खासी मशक्कत करनी पड़ी और उत्तरी ग्रिड से ओवर ड्रा करने पर कई बार चेतावनियां जारी हुई और जुर्माने भी लगे हैं। लंबे चले सूखे की वजह से पंजाब के बिजली खरीद समझौते कम पड़ गए।
दिलचस्प है कि पहले प्रयास कर पंजाब लाभ में रहता आया है। अधिकारी बताते हैं कि गर्मियों में बिजली के मामले में अंतिम छोर पर होने की वजह से पंजाब के लिए यह जरूरी भी है। उत्तर भारत में शार्ट टर्म समझौतों के तहत कुछ साल पहले तक छह-सात रूपये प्रति यूनिट से सस्ती बिजली नहीं मिल पाती थी लेकिन पावरकाम ने कोयला, डीजल, गैस, फर्नेस आयल व रेलवे के ढुलाई भाड़े के दामों में बढ़ोतरी के बावजूद 2011 में 3.92 रूपये प्रति यूनिट की बिजली खरीदी तो इस साल 3.88 रूपये प्रति यूनिट की दर से। अगली गर्मियों के लिए शार्ट टर्म समझौतों के टेंडर जारी कर दिए गए हैं और इस साल खरीदी गई 18 हजार लाख यूनिट से ज्यादा बिजली खरीद करने का लक्ष्य भी रखा गया है।
इतना ही नहीं इन दिनों में पंजाब में बिजली की मांग कम होने के साथ ही प्रदेश ने अन्य को बैंकिंग के माध्यम से जमा करवानी शुरु कर दी है। करीब एक सौ लाख यूनिट पहाड़ी राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल व जम्मू कश्मीर के पास हर रोज जमा करवाई जा रही है। पहाड़ों में सर्दियों में बिजली की मांग खासी बढ़ जाती है जबकि पानी जम जाने क चलते पन बिजली उत्पादन काफी गिर जाता है। इसी क्रम में दक्षिणी राज्यों को पंजाब फरवरी से बिजली देनी शुरू करेगा। दक्षिण के समुद्र तटीय राज्यों में धान की बिजाई फरवरी में शुरू होती है और जून जुलाई में दक्षिण में बिजली की कमी नहीं होती।  बार्टर नियम के तहत दी जाने वाली बिजली अगले साल दस जून से सितंबर अंत तक वापिस ली जाएगी।
वहीं पावरकाम के डायरेक्टर फाइनांस सुरेश अरोड़ा कहते हैं कि प्रदेश में बिजली का प्रबंध लगातार और समय पर होता रहा है। इस बार भी ऐसा ही होगा।

आटो रिक्शा में 'सुरक्षा' कम 'जुगाड़' ज्यादा


- लोगों को दिखती हैं कमियां, ट्रैफिक पुलिस को नजर नहीं आती
- न हेडलाइट ठीक है न टेल लाइट, कई आटो में नंबर प्लेट भी नदारद
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
वैध रूप से शहर में नगर निगम की सीमा क्षेत्र और निगम सीमा के बाहर अवैध रूप से चलने वाले आटो रिक्शा में सफर करने वालों में 'सुरक्षा' की कम और 'जुगाड़' का सा अहसास ज्यादा होता है। फिर भी मजबूरी में लोग इनमें जान जोखिम में डालकर बैठते भी हैं और शिकायत भी करते हैं।
शहर में चल रहे ज्यादातर आटो रिक्शा का ढांचा पुराना है। कई की जहां हेडलाइट खराब है तो संभव है कि शायद ही किसी में तलाशने पर टेल लाइट ठीक से जलती दिखाई दे। बहुत से आटो तो ऐसे हैं, जिनमें टेल लाइट की जगह ही नदारद है। हालांकि आम आदमी को दिखने वाली ये कमियां सड़क पर चौबीस घंटे मौजूद रहने का दावा करने वाली ट्रैफिक पुलिस को नहीं दिख पाती है। ट्रांसपोर्ट विभाग से पारित क्षमता से बहुत ज्यादा सवारियां बैठाने से नहीं कतराने वाले आटो रिक्शा चालकों से इनमें न बैठने वाले, पर सड़क पर इनके आसपास चलने वाले वाहन चालक भी इन्हें पास देखते ही परेशानी महसूस करने लगते हैं। सर्दी शुरू हो चुकी है और धुंध व कोहरे का सीजन आने को है। ऐसे में दुर्घटनाओं की संभावनाओं को अभी ही रोका जा सकता है।
मार्कल कालोनी के सोनू शर्मा का कहना है कि शहर में बेलगाम घूम रहे आटो रिक्शाओं पर ट्रैफिक पुलिस को रोक लगानी चाहिए। शहर के भीड़ भरे बाजारों में ये तेज रफ्तार से बेधड़क चलते हैं। सनौरी अड्डा के बृज मोहन का कहना है कि सनौरी अड्डा के पास दर्जनों आटो रिक्शा चलते हैं, लेकिन किसी भी आटो रिक्शा पर पूरा नंबर नहीं लिखा होता, जो कानून की सरेआम उल्लंघना है। जबकि पुलिस वाले हर चौक पर नाका लगाकर केवल मोटरसाइकिलों के चालान काट रहे होते हैं।
ऐसे ही राजपाल सिंह बताते हैं कि ज्यादातर आटो रिक्शा की हालत तरस योग्य है, जिनमें बैठना सुरक्षित नहीं है। हालांकि आवाजाही के सीमित साधन होने की सूरत में हर सवारी अपनी जान की जिम्मेवार बनकर बैठी होती है।
दूसरी ओर ट्रैफिक पुलिस के प्रभारी हरदीप सिंह बडूंगर का कहना है कि शहर में करीब 14 आटो रिक्शा यूनियन हैं। इन लोगों को नियमों प्रति जागरुक करने के लिए बैठकें की जा रही हैं। इसके अलावा शहर के सभी आटो रिक्शा चालकों की सूची तैयार की जा रही है, जिससे भविष्य में कोई असुविधा न हो।

Friday, 23 November 2012

देसी पर भारी पड़ा इटालियन बीज!


-कीमत में च्यादा पर लागत में एक तिहाई से भी कम, लोकप्रियता इतनी की लोग रिश्तेदारों से लाने लगे
-खेत में धान की फसल की नमी का सदुपयोग गेहूं की बिजाई में होता है

भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेहूं की खेती के मामले में अमेरिका व आस्ट्रेलिया से देसी तकनीक हमेशा से ही पिछड़ी रही है लेकिन अब इसमें इटली जैसा यूरोपीय देश भी शामिल हो गया है। गेहूं के देसी बीजों पर अब एक इटालियन बीज रबी के इस सीजन में भारी पड़ गया है। कम से कम घग्गर नदी के दोनों ओर पंजाब-हरियाणा में इस बीज की खासी लोकप्रियता बन पड़ी है।
इन बीजों से गेहूं की उपज कैसी रहेगी? इस प्रति पूरी तरह से आश्वस्त धर्मेहड़ी गांव के किसान बब्बू बताते हैं कि गेहूं की अगेती किस्मों में शामिल इटली का यह बीज इस साल पंजाब हरियाणा सीमा के इर्द गिर्द खासा लोकप्रिय है। आलम ये है कि बाजार में उपलब्ध ही नहीं है, वे भी अपने एक रिश्तेदार से लेकर आए हैं। वे बताते हैं कि उक्त विदेशी बीज पिछले साल भी बिका था पर इस बार तो देखते ही देखते बाजार से गायब हो गया।
वहीं गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि जीबी-1386 नाम का इटली का ये बीज देसी बीज की तुलना में एक तिहाई से भी कम डलता है। देसी बीज जहां एक एकड़ में करीब 40 किलो डाला जाता है। देसी बीज का एक थैला नौ सौ से एक हजार रूपये में आ जाता है और करीब 25 रूपये किलो पड़ता है। वहीं इटली से आयात हुआ ये बीज एक एकड़ में मात्र नौ किलो ही डाला जाता है पर मिलता 70 रूपये किलो पड़ता है।
 इतना ही नहीं 25 अक्टूबर से गेहूं की बिजाई का सीजन संवर्धित किस्मों के लिए शुरु हो जाता है। इस किस्म की बिजाई धान की फसल लेने के बाद मात्र पांचवे दिन ही बिना खेत तैयार किए ही कर दी जाती है। पर्यावरण संरक्षण के मामले में भी यह खासा उपयोगी है। बिजाई के दौरान सिंचाई के लिए पानी का प्रयोग नाममात्र होता है। इससे खेत में धान की फसल की नमी का सदुपयोग कर गेहूं की बिजाई के लिए किया जाता है।

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कृषि विभाग ने नहीं की है सिफारिश

राच्य कृषि विभाग के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर बीज व मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल कहते हैं कि ऐसे किसी बीज की सिफारिश कृषि विभाग ने नहीं की है। बीज की लोकप्रियता के सवाल पर वे कहते हैं कि पिछले साल भी कई लोगों ने पंजाब-हरियाणा सीमा के क्षेत्र में बीज का प्रयोग किया था पर रिजल्ट अच्छे नहीं आए। इससे एक साल पहले भी रोपड़ में भी ऐसा ही बीज प्रचलित किया गया पर झाड़ नहीं बढ़ा। तब मात्र सात किलो बीज डालने की बात कही थी। बीज का नंबर, मार्का आदि बताते पर डा. सोहल कहते हैं कि इन लोगों ने कौनसा सरकार से अनुमति लेनी होती है जो चाहे नंबर रख लें।

पूर्व डीसी विकास गर्ग व एक अन्य जमानत याचिका खारिज


 पटियाला में विवादित जमीन घोटाला
-बचाव पक्ष ने कहा तत्कालीन डीसी की जमीन के वसीकों को तसदीक करने में भूमिका नहीं
-रवदीप के वकील ने कहा उसके पास केवल मुख्तयारनामा ही था, जिसके रद्द होने की उसे खबर नहीं थी
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
बहु चर्चित व कई करोड़ रूपये की विवादित जमीन के मामले में घोटाले के आरोप झेल रहे पटियाला के पूर्व डिप्टी कमिश्नर व आईएएस अधिकारी विकास गर्ग व एक अन्य आरोपी रवदीप सिंह की जमानत याचिका अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने खारिज कर दी है।
उल्लेखनीय है कि लीला भवन के निकट सिविल सर्जन कार्यालय परिसर की विवादित जमीन के खरीद फरोख्त के मामले में कथित घोटाला सामने आने पर विजीलेंस ने नौ नवंबर को पूर्व डीसी विकास गर्ग, जिला माल अधिकारी राजवीर सिंह, नायब तहसीलदार गुरविंदर सिंह, कानूनगो प्रितपाल सिंह, पटवारी सुरेश कुमार के अलावा एनपी सिंह, यशपाल अग्रवाल, दविंदर सिंह संधू, रवदीप सिंह और जसवंत सिंह पर मामला दर्ज कर लिया था। इनमें से पूर्व डीसी विकास गर्ग व जीपीए होल्डर रवदीप सिंह की ओर से दायर की गई जमानत की याचिका अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश निर्भय सिंह गिल की अदालत ने खारिज कर दी है।
विजीलेंस ब्यूरो की ओर से अदालत में बताया गया कि सरकारी जमीन की रजिस्ट्रियां करने की मंजूरी जिला माल अधिकारी की ओर से उस समय के डिप्टी कमिश्नर विकास गर्ग की सहमति से दी गई थी। इस बात को पटियाला डिवीजन के कमिश्नर की ओर से की गई जांच में खुद विकास गर्ग ने माना भी है। इसके अलावा विकास गर्ग रजिस्ट्री होने के दिनों में जमीन के खरीददारों के साथ फोन पर लगातार संपर्क में रहे। इससे स्पष्ट होता है कि सारा मामला विकास गर्ग की जानकारी में था।
इसी प्रकार विजीलेंस की ओर से रवदीप सिंह के बारे में बताया गया कि यह व्यक्ति जमीन के खरीददार एनपी सिंह का सगा भाई है और इस व्यक्ति की ओर से रद्द हुए मुख्तयारनामे के आधार पर सरकारी जमीन की रजिस्ट्री करवाई है। विजीलेंस का कहना है कि इस जमीन का सौदा 6.25 करोड़ रूपये में होना दिखाया गया था जबकि इस जमीन की बाजार कीमत 200 से 250 करोड़ रूपये है। वास्तव में बेचने वाले को खरीददार की ओर से 3.25 करोड़ रूपये की अदायगी ही की गई।
दूसरी ओर बचाव पक्ष में विकास गर्ग के वकील अशोक माथुर ने दलील दी है कि विवादित जमीन के वसीकों को तसदीक करने में तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर विकास गर्ग की कोई भूमिका नहीं है। यह मंजूरी समय के माल अधिकारी राजवीर सिंह की ओर से अपने स्तर पर दी गई थी। मंजूरी देने संबंधी फाइल कभी भी विकास गर्ग के सामने पेश नहीं की गई।
इसी क्रम में रवदीप सिंह के वकील ने कहा उसके पास केवल मुख्तयारनामा ही था, जिसके आधार पर उसने जमीन की रजिस्ट्री करवाई थी और उक्त मुख्तयारनामे के रद्द होने की उसे खबर नहीं थी।

Monday, 19 November 2012

चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ा था पराली प्रदूषण अभियान

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कृषि व कृषक हितैषी कही जाने वाली पंजाब सरकार पिछले साल पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम करने में पूरी तरह से असफल रही थी। कारण सिर्फ और सिर्फ चुनावी था। इस साल हुए विधान सभा चुनाव से ठीक पहले के सीजन में सरकार और प्रशासन ने किसानों को सिर्फ 'जागरुकÓ ही किया है। किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से बचती रही।
बीते साल ही मोगा के गांव में खेत में जल रही पराली में एक आटो रिक्शा में बैठे तीन बच्चों के चपेट में आने से मौत हो गई थी। दिलचस्प है कि उन दिनों पंजाब सरकार के लिए धान की खरीद व लिफ्टिंग में जुटे विशेष सचिव दरबारा सिंह गुरु लगातार कहते रहे कि 'पहले लोगों को जागरुक करना जरूरी है।Ó हालांकि बाद में उन्होंने भी चुनाव लड़ा।
कांग्रेस के शब्दों में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में चाहे कुछ ना किया हो लेकिन वर्ष 2007 से 2011 तक की सरकार ने पंजाब में सब सोयल एक्ट(धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करवाना) को सफलता पूर्वक लागू करने के अलावा पराली को जलाए जाने प्रति कड़ाई से कानून की पालना करवाना। दो महत्वपूर्ण कामों के लिए जाना जाएगा। फिर भी चुनावी साल में अपने सबसे बड़े वोट बैंक के आगे यह सरकार भी पिछले साल नतमस्तक हो गई थी।


पराली जलाने की रोकथाम पर कानूनी
 कानून अनुसार अभी तक केवल धारा 144 के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश पर जिले में तैनात डिप्टी कमिश्नर अपने जिला मैजिस्ट्रेट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिबंध लगाता है और इसी धारा के तहत कृषि अधिकारी व एसडीएम के माध्यम से पराली जलाए जाने वालों पर एफआईआर दर्ज करवाता है।

दो दशक में सफलता मात्र 20 फीसद

90 के दशक में पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और वर्तमान में पीपीसीबी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत डा. चरणजीत सिंह नाभा कहते हैं कि दो दशक तक लोगों को समझाने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए हैं और आज भी केवल जागरुक ही कर रहे हैं। सफलता का परिणाम 20 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा है।
क्या है विकल्प
पराली से गत्ता बनाने और बायोमॉस प्लांट लगा कर बिजली बनाने वाले कामर्शियल उपयोग के अलावा पराली को खेत में ही खुर्द-बुर्द कर खाद में तबदील करने वाले उपायों पर मुख्य कृषि अधिकारी  डा. बीएस सोहल कहते हैं कि अभी में मिनी टिल ड्रिल अथवा रोटावेटर ही चलन में। इससे किसान आंशिक तौर पर मोटे किरचे जला कर शेष को खेत में कुतर लेता है। पूरी तरह से जलाए बिना पराली को खेत में खपा देने वाले हैप्पी सीडरों की संख्या ज्यादा नहीं है। इनके सस्ता होने अथवा कंबाईन की तरह लोकप्रिय होने के बाद आपको पराली कहीं जलती हुई नहीं दिखेगी।

वक्त बदला मंजर नहीं

पटियाला के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल अनुसार जिले में 2.33 लाख हैक्टेयर में धान की फसल लगी है। इसकी कटाई की शुरुआत हो चुकी है। मोटे अनुमान अनुसार धान का पौधा ठीक ठाक रहे तो प्रति हैक्टेयर 15-16 टन पराली पैदा होती है। ऐसे में साधारण गणित अनुसार 30 से 35 लाख टन पराली का बनना तय है।
वहीं पराली से उपजने वाली गैसों पर कृषि विज्ञानी बताते हैं कि पराली के जलाने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं पराली जलने से खेत में मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल जल जाती हैं। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण होने लगी है।
पटियाला में अभी धान की कटाई शुरु ही हुई है और डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह ने धारा 144 के तहत पराली का जलाया जाना प्रतिबंध कर रखा है। फिलहाल किसी तरह की दुर्घटना सामने नहीं आई है।

Friday, 16 November 2012

लुधियानवियों ने किया सबसे ज्यादा पटाखों से प्रदूषण


दीवाली पर प्रदूषण
-लुधियाना के बाजारों में में वायु प्रदूषण भी 50 फीसद बढ़ा
-शोर मचाने में आगे रहने वाले पटियाला को पीछे छोड़ा लुधियाना ने
-जहरीली गैसों की मात्रा व संवेदनशील क्षेत्र में पटियाला सबसे कम प्रदूषित
भूपेश चट्ठा, पटियाला
दीवाली पर प्रदूषण के मामले में प्रदेश भर में जहां लगभग हर तरह के प्रदूषण में या तो कमी आई है या बहुत थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इस दीवाली लुधियानवियों ने जहां पटाखों से सबसे ज्यादा शोर मचाया है वहीं प्रदूषण फैलाने में भी आगे रहे हैं।
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से दीवाली पूर्व व दीवाली के दिन की गई मानीटरिंग में सामने आया कि व्यावसायिक क्षेत्र वर्ग में लुधियाना के बाजार में वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यहां रेस्पीरेटरी सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मेटेरियल की मात्रा करीब 50 फीसद बढ़ी है। 489 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर से बढ़ कर 648 पर आ गई है। यह 100 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर की सीमा से कहीं अधिक है।
इसी प्रकार पटाखों से शोर मचाने के मामले में आगे रहने वाले पटियाला को इस साल लुधियाना ने पीछे छोड़ दिया है। 25 डेसीबल की प्रतिबंधित सीमा से ये कम ही है लेकिन 80.5 डेसीबल के साथ ये प्रदेश में अधिकतम है। हालांकि पिछले साल की तुलना में यह थोड़ा कम रहा है, जबकि पटियाला में पिछले साल यही आंकड़ा 85.7 डेसीबल पर था, इस साल गिर कर 70 से थोड़ा उपर ही रहा है। ध्वनि प्रदूषण में जालंधर का व्यवसायिक क्षेत्र आम दिनों में भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा शोर भरा रहता है। इस वर्ग में अन्य शहरों में शोर में गिरावट दर्ज की गई है।
दूसरी ओर आरएसपीएम के मामले में व्यवसायिक क्षेत्र में लुधियाना में बढोतरी हुई है तो अन्य शहरों में गिरावट है। जबकि आवासीय क्षेत्र में मंडी गोबिंदगढ़ व अमृतसर में कमी है पर पटियाला, लुधियाना व जालंधर में हल्की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इसी प्रकार संवेदनशील क्षेत्रों में लुधियाना में आरएसपीएम की मात्रा कम हुई है लेकिन जालंधर व अमृतसर में यह बढ़ी है, हालांकि दरबार साहिब क्षेत्र में यहां गिरावट दर्ज की गई है।
 नाइट्रोजन डाई आक्साइड व सल्फर डाई आक्साइड जैसी जहरीली गैसों की मात्रा खतरनाक सीमा 80 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर से खासी नीचे ही रही हैं। लेकिन दरबार साहिब क्षेत्र में ये 43 पर हैं जो पटियाला में 19 पर ही हैं। संवेदनशील क्षेत्र में पटियाला सबसे कम प्रदूषित है। यहां पर सल्फर डाई आक्साइड मात्र छह माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर ही रही।
राज्य भर में सल्फर डाई आक्साइड की मात्रा में व्यवसायिक व आवासीय क्षेत्रों में कमी ही दर्ज की गई है, जबकि नाइट्रोजन डाई आक्साइड लगभग पिछले साल के आसपास ही रही है।
Comparative Statement of Ambient Air Quality Monitoring (24 HR AV. Values of RSPM, SO2, NOx (µg/m3) on Diwali Day for the year 2010,2011,2012


MONITORING DAYS
PARA
METERS
COMMERCIAL AREA OF CITIES
Day before Diwali
MGG
PATIALA
JALANDHAR
LUDHIANA
AMRITSAR
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
Day before Diwali
RSPM
186
161
152
96
89
132
160
239
201
378
358
364
239
233
231
Diwali day
318
285
292
268
234
238
188
325
294
511
489
648
504
370
358
Day before Diwali
SO2
16
11
8
8
8
5
16
19
18
29
19
19
14
12
10
Diwali day
22
21
20
16
14
10
28
22
24
34
26
24
23
22
21
Day before Diwali
NOx
27
21
20
18
20
16
22
28
28
47
34
41
35
36
34
Diwali day
29
29
32
26
24
22
34
35
35
59
60
51
43
44
43


MONITORING DAYS
PARA
METERS
RESIDENTAL AREA OF CITIES
Day before Diwali
MGG
PATIALA
JALANDHAR
LUDHIANA
AMRITSAR
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
Day before Diwali
RSPM
193
143
138
87
98
122
229
269
192
265
278
303
205
210
188
Diwali day
298
287
284
260
244
250
253
245
285
367
365
390
462
349
360
Day before Diwali
SO2
18
10
7
6
6
4
16
19
17
28
21
20
13
13
9
Diwali day
24
22
20
16
14
12
31
23
26
31
28
30
21
20
20
Day before Diwali
NOx
26
18
20
20
18
18
32
31
29
40
36
35
33
34
29
Diwali day
34
31
40
26
24
24
43
32
33
53
46
45
42
40
39




MONITORING DAYS
PARA
METERS
SENSITIVE AREA OF CITIES
Day before Diwali

MGG
PATIALA

JALANDHAR
LUDHIANA
AMRITSAR
G.T.B        Civil
Hospital  Hospital
Sri Darbar
Sahib


2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2010
2011
2012
2011
2012
Day before Diwali
RSPM
176
148
150
102
90
118
201
153
160
218
291
247
218
184
213
207
189
Diwali day

263
231
222
184
166
150
247
200
215
374
403
321
435
342
361
401
390
Day before Diwali
SO2
14
9
6
8
6
4
17
18
15
25
16
13
13
11
12
10
9
Diwali day

22
17
13
14
12
6
30
22
22
26
28
17
20
19
21
23
23
Day before Diwali
NOx
26
17
18
16
14
13
31
31
27
35
36
27
33
32
32
34
24
Diwali day

34
23
26
22
20
19
43
32
33
49
50
36
41
40
41
45
43



Permissible Limits :-
Parameter
Time Weighted
Average
Concentration in Ambient Air
Commercial,
Residential Areas
Sensitive Areas
RSPM (µg/m3)
24 Hours
100
100
SO(µg/m3)
24 Hours
80
80
NOx (µg/m3)
24 Hours
80
80












 Noise Level Monitoring on Diwali in dB(A) Leq.

Station
Residential
Sensitive
Commercial
2011
2012
2011
2012
2011
2012
Before
During
Before
During
Before
During
Before
During
Before
During
Before
During
Jalandhar
66.6
76
56.5
72.7
52.7
54
51.7
57.4
64.7
61.5
71.4
73.6
Ludhiana
71.7
78.3
66.6
74.1
70.4
77.8
69.4
73.4
77.4
84.5
76.8
80.5
Patiala
73.8
85.3
41.1
70.1
71.5
74.1
47.7
63.5
77.5
85.7
59.1
71.4
Amritsar
52
69.1
51
67
53.3
63.1
58
65
60.2
69.1
62
73
Amritsar at Sri Darbar Sahib
-
-
-
-
58
75
56
74
-
-
-
-
Mandi Gobindgarh
-
-
55.5
73.1
-
-
51.2
73.8
-
-
62.6
73.5