पराली में आर्गेनिक तत्व कम और जहर ज्यादा हो गया है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है कि खेतों में पराली जलाई जा रही है। इस पराली के साथ जल रहे केमिकल फर्टीलाइजर और पेस्टिसाइड ने इसके धुएं को इस कदर जहरीला बना दिया है कि बारूद का धुआं भी हलका लगने लगा है।
सोशल सांइसेज एंउड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि थोड़ी बहुत यह पहले भी जलती थी पर इतना बुरा हाल नहीं था कि आपको सांस लेने के लिए भी जगह की तलाश करनी पड़ती है। दोपहिया वाहन पर है तो सड़क युद्ध का मैदान नजर आती है और किसी काम को हाथ में लेते है तो आंख के साथ नाक भी टपकने लगती है। वे कहते है कि महत्वपूर्ण यह है कि जब गरीब बेघर तेज सर्दी से बचने के लिए घास फूस एकत्र कर अलाव तप रहा होता है तो आग में से एक भीनी सी खुशबू आ रही होती है। कुछ ऐसा ही अहसास गांव में चुल्हे पर पक रहे भोजन की बात हो या घर को धुंध कोहरे के दिनों में घर के आस पास पेड़ पौधों का कचरा जलाने की हो हमें धुआं परेशान करता। गोबर के उपले जलने को तो मेडिकेटिड धुएं तक का नाम दे उपचार तक करने के दावे होने लगते है।
वहीं लेखक केएस धालीवल कहते है कि आज पराली का नाम आते ही अस्थमे का तंदरुस्त हुआ मरीज भी दहल जाता है। एलर्जी की दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए तो दिवाली का सीजन ही पंजाब हरियाणा में जलने वाली पराली से निकलता है और साल भर की कमाई इन्हीं दो महीनों में हो जाती है। एंटी एलर्जी दवाओं से कुछ नहीं होने वाला बेहतर है कि किसान या तो पेस्टिसाइड व केमिकल फर्टीलाइजर का प्रयोग छोड़ दें या फिर पराली जलाना छोड़ दें। वे कहते है कि इसमें पौधे वाली बात ही नहीं रही। आर्गेनिक तत्व कम ओर जहर ज्यादा हो गया है।
दिलचस्प है कि पराली के स्मोग से परेशान लोगों ने भी एक नायाब तरीका तलाश लिया है वे डाक्टरों के पिछले सालों में लिखी पर्ची को किसी मंत्र की तरह अपने पर्स में रखते है और सांस के उखडऩे के पहले अहसास में ही दवा शुरू कर देते है। जुकाम और आंखों में जलन बर्दाश्त करने की बड़ों को आदत हो गई है कि इन दिनों म त्योहारें की तरह ये भी होना है। जबकि बच्चों के लिए कोई हल नहीं निकला है।
पराली न जलाने वाले किसान सम्मानित
संवाद सूत्र, सन्नौर : गांव बावलपुर में संरपच गुरमीत सिंह की अध्यक्षता में आयोजित समारोह के दौरान पराली न जलाने वाले किसानों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि डिप्टी डायरेक्टर पंचायत विभाग पुशपिंदर सिंह उपस्थित हुए। उन्होंने उन गांवों के किसानों को सम्मानित किया, जिन्होंने धान की फसल की कटाई करने के बाद बाकी बचे पराली को आग नहीं लगाई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने कहा कि धान की फसल को आग लगाने से गंदा धुंआ निकलता है, इससे तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। हमें अपने खेतों में आग न लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाना चाहिए। इस अवसर पर गांव के उन स्कूली बच्चों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने ने शिक्षा में नाम रोशन किया है। इस मौके पर गांव के सभी लोग उपस्थित थे।
Saturday, 30 October 2010
Friday, 29 October 2010
गाय-भैंसों ने नकारा पराली का 'आचार-मुरब्बा'
देश की दो फीसदी भूमि पर कैमीकल फर्टीलाइजर का दसवां हिस्सा, पेस्टिीसाइड का औसत इससे भी आगे
पराली में अन्य अनाज और थोड़ा काला नमक मिला बनता था 'आचार'
'सन्नी-बंटा' कर सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ बना कर बनता था 'मुरब्बा'
भूपेश चट्ठा, पटियाला
देश के कुल क्षेत्रफल का पंजाब चाहे मात्र दो फीसदी ही हिस्सा हो लेकिन यहां पर कैमीकल फर्टीलाइजर की खपत देश में प्रयोग होने वाली रसायनिक खादों का दसवां हिस्सा यहीं खप जाता है। फसलों विशेष रूप से पंजाब के लिए अप्राकृतिक कही जाने वाली धान की फसल की बात आती है तो इस पर छिड़के जाने वाले जहरीले पेस्टीसाइड यह सारी सीमाएं लांघ जाते है और फसल पर हर पंद्रह दिनों बाद जहर छिड़का जाता है। दिलचस्प है कि इंसानों को तो शायद अभी ये बात समझ में आनी है लेकिन पशुओं ने पराली से सदियों से बनते आ रहे 'अचार' और 'मुरब्बे' को नकार दिया है।
पंजाब में सूखे चारे के रूप में पराली का प्रयोग अचार व मुरब्बे के रूप में होता रहा है लेकिन पहले इसे गायों ने नकारा और अब भेंसों को भी इसे खाना पसंद नहीं है। कौरजीवाला गांव के निकट अत्याधुनिक डेयरी चला रहे परविंदर सिंह ढिल्लों बताते है कि उनका परिवार पांच दशक से इस व्यवसाय में है। हरित क्रांति के उतार चढ़ाव भी उनके परिवार ने देखे है। वे कहते है कि अविभाजित पंजाब में भी धान की फसल की बिजाई हुआ करती थी, लेकिन पराली जला कर पर्यावरण से खिलवाड़ नहीं किया जाता था, उन दिनों में पराली में कुछ अनाज मिला कर और थोड़ा काला नमक मिलाकर इसका 'आचार' बना दिया जाता था। चूंकि कृत्रिम सिंचाई के साधन काफी कम थे ऐसे में सूखे की मार पडऩे पर या हरे चारे की कमी आने पर एक वक्त पशुओं को यही आचार खिलाया जाता था।
कुछ इसी तरह से सन्नी (यह सरसों व बिनौले की खल को पांच से छह घंटे भिगोकर रखने के बाद बनती है) व बंटा (मोटा अनाज जो कई घंटा उबाला जाता है) कर सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ मिलाकर मुरब्बा बना पशुओं को एक और खुराक दी जाती थी।सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ मिला कर 'मुरब्बा' बना कर पशुओं को एक और खुराक दी जाती थी। लेकिन अब छिड़के जा रहे पेस्टीसाइड ने इसे जहरीला कर दिया और स्वाद बिगड़ दिया। पशु इससे मुंह मोडऩे लगे है। बीते आठ दस सालों में तो परंपरागत तरीके से किस तरह से पशुओं का आचार व मुरब्बा बनता रहा पर आज यह लुप्त प्राय है।
वहीं फाइव ऐलीमेंटस हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते है कि यदि हालात ना बदले तो पशु गेहूं की उपज लेने के बाद इसके पौधे के शेष बचे हिस्से से बनने वाली तूड़ी को भी नकार देंगे। धान की तुलना में गेहूं का पौधा रसायनों में डूबा नहीं रहता पर धरती में तो पेस्टीसाइड की मात्रा हर साल बढ़ रही है। अगर आप बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ दें तो धरती पर मिटटी कहीं भी नहीं बदल रही। ऐसे में पशुओं के जिस तरह से सीमंस आयात हो रहे है, ठीक वैसे ही पशुओं के लिए डिब्बा बंद खुराक विदेशों से मंगवाई जाएगी।
पराली में अन्य अनाज और थोड़ा काला नमक मिला बनता था 'आचार'
'सन्नी-बंटा' कर सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ बना कर बनता था 'मुरब्बा'
भूपेश चट्ठा, पटियाला
देश के कुल क्षेत्रफल का पंजाब चाहे मात्र दो फीसदी ही हिस्सा हो लेकिन यहां पर कैमीकल फर्टीलाइजर की खपत देश में प्रयोग होने वाली रसायनिक खादों का दसवां हिस्सा यहीं खप जाता है। फसलों विशेष रूप से पंजाब के लिए अप्राकृतिक कही जाने वाली धान की फसल की बात आती है तो इस पर छिड़के जाने वाले जहरीले पेस्टीसाइड यह सारी सीमाएं लांघ जाते है और फसल पर हर पंद्रह दिनों बाद जहर छिड़का जाता है। दिलचस्प है कि इंसानों को तो शायद अभी ये बात समझ में आनी है लेकिन पशुओं ने पराली से सदियों से बनते आ रहे 'अचार' और 'मुरब्बे' को नकार दिया है।
पंजाब में सूखे चारे के रूप में पराली का प्रयोग अचार व मुरब्बे के रूप में होता रहा है लेकिन पहले इसे गायों ने नकारा और अब भेंसों को भी इसे खाना पसंद नहीं है। कौरजीवाला गांव के निकट अत्याधुनिक डेयरी चला रहे परविंदर सिंह ढिल्लों बताते है कि उनका परिवार पांच दशक से इस व्यवसाय में है। हरित क्रांति के उतार चढ़ाव भी उनके परिवार ने देखे है। वे कहते है कि अविभाजित पंजाब में भी धान की फसल की बिजाई हुआ करती थी, लेकिन पराली जला कर पर्यावरण से खिलवाड़ नहीं किया जाता था, उन दिनों में पराली में कुछ अनाज मिला कर और थोड़ा काला नमक मिलाकर इसका 'आचार' बना दिया जाता था। चूंकि कृत्रिम सिंचाई के साधन काफी कम थे ऐसे में सूखे की मार पडऩे पर या हरे चारे की कमी आने पर एक वक्त पशुओं को यही आचार खिलाया जाता था।
कुछ इसी तरह से सन्नी (यह सरसों व बिनौले की खल को पांच से छह घंटे भिगोकर रखने के बाद बनती है) व बंटा (मोटा अनाज जो कई घंटा उबाला जाता है) कर सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ मिलाकर मुरब्बा बना पशुओं को एक और खुराक दी जाती थी।सूखी पराली में गेहूं की तूड़ी और गुड़ मिला कर 'मुरब्बा' बना कर पशुओं को एक और खुराक दी जाती थी। लेकिन अब छिड़के जा रहे पेस्टीसाइड ने इसे जहरीला कर दिया और स्वाद बिगड़ दिया। पशु इससे मुंह मोडऩे लगे है। बीते आठ दस सालों में तो परंपरागत तरीके से किस तरह से पशुओं का आचार व मुरब्बा बनता रहा पर आज यह लुप्त प्राय है।
वहीं फाइव ऐलीमेंटस हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते है कि यदि हालात ना बदले तो पशु गेहूं की उपज लेने के बाद इसके पौधे के शेष बचे हिस्से से बनने वाली तूड़ी को भी नकार देंगे। धान की तुलना में गेहूं का पौधा रसायनों में डूबा नहीं रहता पर धरती में तो पेस्टीसाइड की मात्रा हर साल बढ़ रही है। अगर आप बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ दें तो धरती पर मिटटी कहीं भी नहीं बदल रही। ऐसे में पशुओं के जिस तरह से सीमंस आयात हो रहे है, ठीक वैसे ही पशुओं के लिए डिब्बा बंद खुराक विदेशों से मंगवाई जाएगी।
पराली का जलाना: सरकारी सलाह पर यकीन नहीं, समय सीमा भी
-रोटा वेटर से छह बार खेत में बाही करना पड़ता है
-मैनेज करने में आने वाला दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख डर रहा किसान
-कहा कृषि विशेषज्ञ व सरकार बेहतर विकल्प सुझाए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की उपज लेने के बाद और रबी की अगली फसल गेहूं के लिए बिजाई करने में तब भी समय कम होता है जब धान की फसल जल्द आ जाए इस बार तो धान ही काफी देरी से पक कर आ रहा है ऐसे में गेहूं की बिजाई को कहीं 20 दिन तो कहीं एक महीने का समय कटाई से बुआई के बीच रह गया है, ऐसे में सरकार की ओर से दी जा रही सलाहों पर यकीन नहीं हो रहा। महमूदपुर गांव के परमजीत सिंह का यह सवाल एयरकंडीशनर कमरों में बैठ कर पंजाब में पराली, प्रदूषण और पर्यावरण पर चर्चा करने वालों को सकते में डाल देता है।
डकाला रोड स्थित फन विल में दवा लेने पहुंचे परमजीत सिंह महमूदपुर कहते है कि उन्हें पता है कि खेत में कटाई के बाद बचे किरचों को आग लगाने से प्रदूषण फैलता है, मिट्टी के अंदर मौजूद मित्र कीट भी इसके साथ ही जल जाते है, धरती के अनावश्यक रूप से ज्यादा गर्म होने पर उर्वरा शक्ति में भी कमी आती है, और खाद ज्यादा डालनी पड़ती, पर वे भी क्या करें मजबूरी है, समय की भी सीमा है।
वहीं राजला गांव के सरपंच कश्मीर सिंह बताते है कि बेहतर विकल्प मौजूद नहीं है। सरकार, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और कृषि वैज्ञानिक मिल बैठ कर ऐसा हल सुझाए जिससे पराली का पूरी तरह से चूरा कर खेत में ही मिलाए जाने का उपाय किया जा सके मौजूदा उपकरण काफी नहीं है। और मंहगाई इतनी ज्यादा है कि आप अगली फसल में देरी करने का रिस्क नहीं उठा सकते। ऐसे में सारी समझ के बावजूद भी किसान अपनी ही जमीन के साथ ये आग लगाने का पाप कर गुजरता है।
पर्यावरण पर काम करते आ रहे और शानदार परिणाम देने वाले फाइव ऐलीमेंट हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि किसान यदि चाहे तो पराली को खेत में ही दबा कर गेहूं की फसल और ज्यादा बढिय़ा ले सकता है, जमीनी सच्चाई ये है कि पराली के मौजूद रहते गेहूं की बिजाई करने वाली जीरो टिल ड्रिल में ये किरचे फंस जाते है और बिजाई ढ़ंग से नहीं होती और यदि किसान पराली को खेत में गलाने का प्रयास करता है तो साधारण तरीके से जनवरी महीना आ पहुंचता है। डा. टाईगर कहते है कि रोटा वेटर से खेत की बाही कर फिर पानी छोडऩा और फिर बाही करने का सिलसिला कम से कम छह बार दोहराना पड़ता है। तभी सख्त पराली खेत में मिक्स होती है और अगली फसल के लिए खाद का काम करेगी और आप अच्छी फसल ले सकते है।
डा. टाईगर कहते है कि पराली को मैनेज करने में आने वाला करीब दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख किसान इसके दुषपरिणमों को नजरअंदाज कर देता है।
-मैनेज करने में आने वाला दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख डर रहा किसान
-कहा कृषि विशेषज्ञ व सरकार बेहतर विकल्प सुझाए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की उपज लेने के बाद और रबी की अगली फसल गेहूं के लिए बिजाई करने में तब भी समय कम होता है जब धान की फसल जल्द आ जाए इस बार तो धान ही काफी देरी से पक कर आ रहा है ऐसे में गेहूं की बिजाई को कहीं 20 दिन तो कहीं एक महीने का समय कटाई से बुआई के बीच रह गया है, ऐसे में सरकार की ओर से दी जा रही सलाहों पर यकीन नहीं हो रहा। महमूदपुर गांव के परमजीत सिंह का यह सवाल एयरकंडीशनर कमरों में बैठ कर पंजाब में पराली, प्रदूषण और पर्यावरण पर चर्चा करने वालों को सकते में डाल देता है।
डकाला रोड स्थित फन विल में दवा लेने पहुंचे परमजीत सिंह महमूदपुर कहते है कि उन्हें पता है कि खेत में कटाई के बाद बचे किरचों को आग लगाने से प्रदूषण फैलता है, मिट्टी के अंदर मौजूद मित्र कीट भी इसके साथ ही जल जाते है, धरती के अनावश्यक रूप से ज्यादा गर्म होने पर उर्वरा शक्ति में भी कमी आती है, और खाद ज्यादा डालनी पड़ती, पर वे भी क्या करें मजबूरी है, समय की भी सीमा है।
वहीं राजला गांव के सरपंच कश्मीर सिंह बताते है कि बेहतर विकल्प मौजूद नहीं है। सरकार, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और कृषि वैज्ञानिक मिल बैठ कर ऐसा हल सुझाए जिससे पराली का पूरी तरह से चूरा कर खेत में ही मिलाए जाने का उपाय किया जा सके मौजूदा उपकरण काफी नहीं है। और मंहगाई इतनी ज्यादा है कि आप अगली फसल में देरी करने का रिस्क नहीं उठा सकते। ऐसे में सारी समझ के बावजूद भी किसान अपनी ही जमीन के साथ ये आग लगाने का पाप कर गुजरता है।
पर्यावरण पर काम करते आ रहे और शानदार परिणाम देने वाले फाइव ऐलीमेंट हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि किसान यदि चाहे तो पराली को खेत में ही दबा कर गेहूं की फसल और ज्यादा बढिय़ा ले सकता है, जमीनी सच्चाई ये है कि पराली के मौजूद रहते गेहूं की बिजाई करने वाली जीरो टिल ड्रिल में ये किरचे फंस जाते है और बिजाई ढ़ंग से नहीं होती और यदि किसान पराली को खेत में गलाने का प्रयास करता है तो साधारण तरीके से जनवरी महीना आ पहुंचता है। डा. टाईगर कहते है कि रोटा वेटर से खेत की बाही कर फिर पानी छोडऩा और फिर बाही करने का सिलसिला कम से कम छह बार दोहराना पड़ता है। तभी सख्त पराली खेत में मिक्स होती है और अगली फसल के लिए खाद का काम करेगी और आप अच्छी फसल ले सकते है।
डा. टाईगर कहते है कि पराली को मैनेज करने में आने वाला करीब दो हजार रूपये प्रति एकड़ का खर्च देख किसान इसके दुषपरिणमों को नजरअंदाज कर देता है।
Wednesday, 27 October 2010
70 लाख एकड़ में पराली कितनी जलेगी कितनी बचेगी?
बीते दस सालों में पांचवा हिस्सा भी काम नहीं हुआ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के करीब-करीब 70 लाख एकड़ में धान की पराली प्रशासन की आंख झपकते ही जलने को तैयार है विकल्प के रूप में सरकार के पास दस फीसदी से भी ज्यादा बचा पाने की क्षमता नहीं है। और तोल के साधारण अनुसार एक एकड़ में 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या होने वाला है। और इस दिशा में अब तक क्या हुआ है। बीते आठ दस सालों में पर्यावरण संजोने की दिशा में दो फीसदी सालाना की गति से पांचवां हिस्सा भी तय नहीं हुआ है।
कृषि विभाग की ओर से अब लगाए जा रहे अनुमानों अनुसार 196 लाख टन पराली जल ही जाएगी, चाहे गलती से ही सही। इसके साथ कार्बनिक तत्व व धरती के नीचे लगभग हर खेत में चलने वाली प्राकृतिक रूप से खाद बनाने वाली लाखों फैक्ट्रीयां भी जल जाएंगी, जिन्हें मित्र कीट भी कहा जाता है।
वर्ष 1999 में अमेरिकी सेटेलाइट की ओर से ली गइ्र्र तस्वीरों और भारत के मौसम विज्ञान विभाग को दी गई चेतावनी कि पंजाब-हरियाणा के आसमान पर स्मोक व फोग क मिश्रण से स्मोग के बादल बन रहे का कोई असर 12 अक्टूबर 2002 त नहीं हुआ जब लोगों ने खुद को लगातार दो तीन दिनों तक भूरे बादलों की परत से ढका पाया।
इसके बाद आए स्र्वेक्षण में सामने आया राज्य की 80 फीसदी धरती पर धान की खेती होती है। 26 लाख हैक्टेयर से ज्यादा भूमि पर पैदा हुई पराली में से 90 फीसदी को तब भी जला दिया जाता था। इससे 233 लाख टन कार्बन डाई आक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल, फासफोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जल कर आसमान में चले जाते है। हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें होती है जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक 13 फीसदी सूर्य की किरणें भी रोके रखती।
इतना ही नहीं बीते तीन दशक में रातें गर्म और दिन ठंडे होते जा रहे है। लुधियाना केदिन के औसत तापमान में 2.1 की गिरावट और रात के तापमान में छह फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पटियाला व बठिंडा की रातें हर साल 0.03 डिग्री की रफ्तार से गर्म होती जा रही है।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते है कि पराली के जलाए जाने की गति और मात्रा बदलती रहती है पर दे साल पहले सेटेलाइट से उपलब्ध डाटे से सामने आई स्थिति में 12685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में होने वाली धान की फसल से जलने वाली पराली में से कार्बन गैसों की मात्रा 34.66 ग्राम प्रति किलो, नाइट्रोजन गैसें 2.63 ग्राम प्रति किलो, मीथेन सीएच4, फासफोरस के अवयवों पीएम10 की मात्रा 3.99 ग्राम प्रति किलो और पौटेशियम के पीएम 2.5 ग्राम होती है। उमेंद्र दत्त कहते है कि बठिंडा के नैशनल फर्टीलाइजर लिमिटेड के प्लांट में पांच लाख टन यूरिया पैदा करने के लिए ढ़ाई लाख टन नाईट्रोजन के साथ काफी मात्रा में ऊर्जा, पानी का प्रयोग होता है। जबकि हम पराली जला कर 38.5 लाख टन आर्गेनिक कार्बन, दो हजार टन फासफोरस और 34 हजार टन पौटेशियम जला देते है।
पीएयू अनुसार
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डा. मंजीत सिंह कंग अनुसार पराली के जलाए जाने से पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वो तो है ही इसके अलावा धरती के बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह हो रहे है। वे बताते है कि एक टन पराली के जलाने छह किलो नाइट्रोजन, एक किलो फासफोरस, और 11 किलो पोटाश भी जल जाती है। और अगर आप डेढ़ लाख टन पराली जलाते है तो दो सौ करोड़ रूपये के न्यूट्रिएंटस हर साल जला रहे है। वे सलाह देते है कि हैप्पीसीडर तकनीक का प्रयोग कर धरती की उर्वरा शक्ति में ये न्यूट्रिएंटस मिलाए जा सकते है।
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के करीब-करीब 70 लाख एकड़ में धान की पराली प्रशासन की आंख झपकते ही जलने को तैयार है विकल्प के रूप में सरकार के पास दस फीसदी से भी ज्यादा बचा पाने की क्षमता नहीं है। और तोल के साधारण अनुसार एक एकड़ में 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या होने वाला है। और इस दिशा में अब तक क्या हुआ है। बीते आठ दस सालों में पर्यावरण संजोने की दिशा में दो फीसदी सालाना की गति से पांचवां हिस्सा भी तय नहीं हुआ है।
कृषि विभाग की ओर से अब लगाए जा रहे अनुमानों अनुसार 196 लाख टन पराली जल ही जाएगी, चाहे गलती से ही सही। इसके साथ कार्बनिक तत्व व धरती के नीचे लगभग हर खेत में चलने वाली प्राकृतिक रूप से खाद बनाने वाली लाखों फैक्ट्रीयां भी जल जाएंगी, जिन्हें मित्र कीट भी कहा जाता है।
वर्ष 1999 में अमेरिकी सेटेलाइट की ओर से ली गइ्र्र तस्वीरों और भारत के मौसम विज्ञान विभाग को दी गई चेतावनी कि पंजाब-हरियाणा के आसमान पर स्मोक व फोग क मिश्रण से स्मोग के बादल बन रहे का कोई असर 12 अक्टूबर 2002 त नहीं हुआ जब लोगों ने खुद को लगातार दो तीन दिनों तक भूरे बादलों की परत से ढका पाया।
इसके बाद आए स्र्वेक्षण में सामने आया राज्य की 80 फीसदी धरती पर धान की खेती होती है। 26 लाख हैक्टेयर से ज्यादा भूमि पर पैदा हुई पराली में से 90 फीसदी को तब भी जला दिया जाता था। इससे 233 लाख टन कार्बन डाई आक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल, फासफोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जल कर आसमान में चले जाते है। हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें होती है जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक 13 फीसदी सूर्य की किरणें भी रोके रखती।
इतना ही नहीं बीते तीन दशक में रातें गर्म और दिन ठंडे होते जा रहे है। लुधियाना केदिन के औसत तापमान में 2.1 की गिरावट और रात के तापमान में छह फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पटियाला व बठिंडा की रातें हर साल 0.03 डिग्री की रफ्तार से गर्म होती जा रही है।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते है कि पराली के जलाए जाने की गति और मात्रा बदलती रहती है पर दे साल पहले सेटेलाइट से उपलब्ध डाटे से सामने आई स्थिति में 12685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में होने वाली धान की फसल से जलने वाली पराली में से कार्बन गैसों की मात्रा 34.66 ग्राम प्रति किलो, नाइट्रोजन गैसें 2.63 ग्राम प्रति किलो, मीथेन सीएच4, फासफोरस के अवयवों पीएम10 की मात्रा 3.99 ग्राम प्रति किलो और पौटेशियम के पीएम 2.5 ग्राम होती है। उमेंद्र दत्त कहते है कि बठिंडा के नैशनल फर्टीलाइजर लिमिटेड के प्लांट में पांच लाख टन यूरिया पैदा करने के लिए ढ़ाई लाख टन नाईट्रोजन के साथ काफी मात्रा में ऊर्जा, पानी का प्रयोग होता है। जबकि हम पराली जला कर 38.5 लाख टन आर्गेनिक कार्बन, दो हजार टन फासफोरस और 34 हजार टन पौटेशियम जला देते है।
पीएयू अनुसार
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डा. मंजीत सिंह कंग अनुसार पराली के जलाए जाने से पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वो तो है ही इसके अलावा धरती के बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह हो रहे है। वे बताते है कि एक टन पराली के जलाने छह किलो नाइट्रोजन, एक किलो फासफोरस, और 11 किलो पोटाश भी जल जाती है। और अगर आप डेढ़ लाख टन पराली जलाते है तो दो सौ करोड़ रूपये के न्यूट्रिएंटस हर साल जला रहे है। वे सलाह देते है कि हैप्पीसीडर तकनीक का प्रयोग कर धरती की उर्वरा शक्ति में ये न्यूट्रिएंटस मिलाए जा सकते है।
Tuesday, 26 October 2010
पटियाला फिर बना सत्ता का केंद्र
दूसरी बार शहर को मुख्यमंत्री मिलने की ओर पहला कदम
अंबिका का मना करना रास आया कैप्टन अमरिंदर को
भूपेश चट्ठा, पटियाला
कैप्टन अमरिंदर के साथ ही पटियाला का भी बनवास खत्म हो गया है। हालांकि शहर ने इस बनवास के दौरान कैप्टन सहित कई मंत्री भी खो दिए थे। खैर महारानी परनीत कौर के विदेश राज्य मंत्री बनने के बाद बीते साल शहर को कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन मोती बाग पैलेस की शान और शहर के कांग्रेसियों की जान में जान आज कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाले जाने की घोषणा के साथ आई है।
इस बारे में मंगलवार को करीब साढ़े पांच बजे आए इस समाचार के साथ ही बधाईयों का सिलसिला शुरू हो गया, दिवाली करीब है और ऐसे में किसी को पटाखों का प्रबंध करने में कोई दिक्कत नहीं आई। नवांशहर जिला कांग्रेस के महासचिव बलाचौर क्षेत्र के एडवोकेट राजपाल चौहान ने पटियाला में होते हुए लड्डू बांटने की शुरुआत कर दी। वह कहते हैं कि पंजाब को इस संकट की घड़ी में से यदि कोई निकाल सकता है, तो कद्दावर नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ही है। वहीं पटियाला के वरिष्ठ नेता एडवोकेट शेलेंद्र मोंटी गर्ग ने आतिशबाजी का ढोल-धमाके के साथ प्रबंध किया और जमकर भंगड़ा डाला।
उधर, राजनीति के जानकार कहते हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का विरोध कांग्रेस के लगभग हर खेमे ने किया। बात जगमीत बराड़ की हो या बीबी भट्ठल और महिंदर केपी और या फिर शमशेर सिंह दूलों की, हर कोई पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का विरोधी हो गया। वहीं केंद्रीय हाईकमान ने भेजी गई पर्यवेक्षक ऊषा ठक्कर ने अपने पैनल में सिर्फ दो नाम डाले, जिनमें कैप्टन के अलावा जगमीत बराड़ का ही नाम आया। बताया जा रहा है कि कांग्रेस में ही अहमद पटेल ने अंबिका सोनी को दस जनपथ से दूर कर पंजाब भेजने के लिए उनका नाम भी पैनल में डाल एक तीर से दो शिकार करने का प्रयास किया पर अंबिका सोनी का मना करना कैप्टन अमरिंदर सिंह को रास आ गया।
उधर, बधाई देने वाले प्रमुख कांग्रेसियों में पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य केके शर्मा, पीआरटीसी के पूर्व प्रधान वेद प्रकाश गुप्ता, जिला परिषद की पूर्व चेयरपर्सन जसविंदर कौर रंधावा, यूथ कांग्रेस के प्रधान सोनू संगर, जिला यूथ कांग्रेस के पूर्व प्रधान संजीव बिट्टू और हाल ही में गठित किए गए एंटी टेररिस्ट फ्रंट के पंजाब प्रधान अजय थापर शामिल हैं।
अंबिका का मना करना रास आया कैप्टन अमरिंदर को
भूपेश चट्ठा, पटियाला
कैप्टन अमरिंदर के साथ ही पटियाला का भी बनवास खत्म हो गया है। हालांकि शहर ने इस बनवास के दौरान कैप्टन सहित कई मंत्री भी खो दिए थे। खैर महारानी परनीत कौर के विदेश राज्य मंत्री बनने के बाद बीते साल शहर को कुछ राहत जरूर मिली, लेकिन मोती बाग पैलेस की शान और शहर के कांग्रेसियों की जान में जान आज कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाले जाने की घोषणा के साथ आई है।
इस बारे में मंगलवार को करीब साढ़े पांच बजे आए इस समाचार के साथ ही बधाईयों का सिलसिला शुरू हो गया, दिवाली करीब है और ऐसे में किसी को पटाखों का प्रबंध करने में कोई दिक्कत नहीं आई। नवांशहर जिला कांग्रेस के महासचिव बलाचौर क्षेत्र के एडवोकेट राजपाल चौहान ने पटियाला में होते हुए लड्डू बांटने की शुरुआत कर दी। वह कहते हैं कि पंजाब को इस संकट की घड़ी में से यदि कोई निकाल सकता है, तो कद्दावर नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ही है। वहीं पटियाला के वरिष्ठ नेता एडवोकेट शेलेंद्र मोंटी गर्ग ने आतिशबाजी का ढोल-धमाके के साथ प्रबंध किया और जमकर भंगड़ा डाला।
उधर, राजनीति के जानकार कहते हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का विरोध कांग्रेस के लगभग हर खेमे ने किया। बात जगमीत बराड़ की हो या बीबी भट्ठल और महिंदर केपी और या फिर शमशेर सिंह दूलों की, हर कोई पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का विरोधी हो गया। वहीं केंद्रीय हाईकमान ने भेजी गई पर्यवेक्षक ऊषा ठक्कर ने अपने पैनल में सिर्फ दो नाम डाले, जिनमें कैप्टन के अलावा जगमीत बराड़ का ही नाम आया। बताया जा रहा है कि कांग्रेस में ही अहमद पटेल ने अंबिका सोनी को दस जनपथ से दूर कर पंजाब भेजने के लिए उनका नाम भी पैनल में डाल एक तीर से दो शिकार करने का प्रयास किया पर अंबिका सोनी का मना करना कैप्टन अमरिंदर सिंह को रास आ गया।
उधर, बधाई देने वाले प्रमुख कांग्रेसियों में पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य केके शर्मा, पीआरटीसी के पूर्व प्रधान वेद प्रकाश गुप्ता, जिला परिषद की पूर्व चेयरपर्सन जसविंदर कौर रंधावा, यूथ कांग्रेस के प्रधान सोनू संगर, जिला यूथ कांग्रेस के पूर्व प्रधान संजीव बिट्टू और हाल ही में गठित किए गए एंटी टेररिस्ट फ्रंट के पंजाब प्रधान अजय थापर शामिल हैं।
Monday, 25 October 2010
करवा चौथ तो ठीक है पर 'लेटेस्ट' क्या है...
चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हुए, 'एग फ्री' केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो
एलोपैथी का असर : ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही दे देती हैं तर्क
गोलगप्पे की रेहड़ी वालों का 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी...
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिंदु कुश पर्वत से लेकर हिंद महासागर के बीच के भूभाग में करवा चौथ की शुरूआत संभवत: वेद लिखे जाने से पहले ही हो किस्से कहानियों के साथ हो गई। इसका सटीक समय तो कहीं नहीं मिलता पर इतना तय है कि कम से कम पांच हजार सालों से ये त्यौहार महिलाएं बिना किसी वैदिक स्क्रिप्ट के एक निश्चित परंपरा के साथ मनाती रही। आज भी वहीं किस्सा और कहानी दोहराई जाती है। पांच हजार साल तक जिस सभ्यता को बिना मॉस मीडिया और कंप्यूटर के संजोए रखा गया वो आज 'लेटेस्ट' क्या है? के चक्कर में गायब हो रही है।
पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला के मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के रिसर्च स्कालर पंकज शुक्ला बताते है कि दिलचस्प इसमें यह है कि ये सब कुछ टीवी के बढऩे के साथ तो बढ़ा, बिंदिया बड़ी से और बड़ी हो गई साड़ी का रंग और ज्यादा चटख हो गया पर इंटरनेट के फैलाव के साथ हाल ही में आए ट्वीटर और फेसबुक ने हमे इतना ज्यादा लिबरल बना दिया कि एक ही मेज-कुर्सी और कमरे में ही बैठ दुनिया देखने लगे है। सोशल नेटवर्किंग ने हमें अंदर तक खोखला कर दिया है तो परंपराएं भी हमारे साथ ही टूटने लगी है।
वहीं लेखक केएस धालीवाल कहते है कि चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हो चुके है, केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो, अगर केक में वाइन और अंडे को लेकर धर्म आड़े आता है तो आप 'एग फ्री' ट्राई कर सकते है पर समय की धारा के विपरीत क्यों चलते है। यही बदलाव है।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि आयुर्वेद में योग है और योग में पेट को खाली रख काफी कुछ दुरूस्त करने के तरीके है लेकिन एलोपैथी में फूड सप्लीमेंट है अगर किसी चीज की शरीर में कमी है तो उसे लैब में बने रसायन से ठीक किया जा सकता है। लेकिन खाली पेट नहीं । ऐसे में ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही ये तर्क दे कर पहले करवा चौथ में ही चाय से लेकर बिस्कुट का डोज दिन में दे देती है। हालांकि इसके पीछे कारण ये होता है कि कईयों ने दो से चार दशक पहले अपने ड्रेसिंग टेबल में छिपा कर रखी मिठाई या मेवे खाए होते हैं, जिसका पति को तो पता होता है लेकिन उसकी अपनी सास की जानकारी में नहीं होता। ऐसा कर वो बीस तीस साल पुरानी गड़बड़ी को तर्क संगत ठहरा रही होती है। यहीं पर आ कर हम सास भी कभी बहू थी का सकारात्मक पहलू सामने आता है। दिलचस्प है कि पांच सात साल पहले तक गोलगप्पे की रेहड़ी वालों के लिए ये दिन 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी आप ग्राहक खड़े देख सकते है। किटी-तंबोला के नाम पर होने वाली जुए बाजी पुरूषों की दिवाली से पहले शुरू हो जाती है। यह भी खुल कर कहा जाता है कि करवा तो ठीक है लेटेस्ट क्या है? सूट नया लिया है? या टॉपस? लंहगा इस बार 'देवदास' नहीं 'मुन्नी बदनाम' वाला चल रहा है।
एलोपैथी का असर : ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही दे देती हैं तर्क
गोलगप्पे की रेहड़ी वालों का 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी...
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिंदु कुश पर्वत से लेकर हिंद महासागर के बीच के भूभाग में करवा चौथ की शुरूआत संभवत: वेद लिखे जाने से पहले ही हो किस्से कहानियों के साथ हो गई। इसका सटीक समय तो कहीं नहीं मिलता पर इतना तय है कि कम से कम पांच हजार सालों से ये त्यौहार महिलाएं बिना किसी वैदिक स्क्रिप्ट के एक निश्चित परंपरा के साथ मनाती रही। आज भी वहीं किस्सा और कहानी दोहराई जाती है। पांच हजार साल तक जिस सभ्यता को बिना मॉस मीडिया और कंप्यूटर के संजोए रखा गया वो आज 'लेटेस्ट' क्या है? के चक्कर में गायब हो रही है।
पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला के मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के रिसर्च स्कालर पंकज शुक्ला बताते है कि दिलचस्प इसमें यह है कि ये सब कुछ टीवी के बढऩे के साथ तो बढ़ा, बिंदिया बड़ी से और बड़ी हो गई साड़ी का रंग और ज्यादा चटख हो गया पर इंटरनेट के फैलाव के साथ हाल ही में आए ट्वीटर और फेसबुक ने हमे इतना ज्यादा लिबरल बना दिया कि एक ही मेज-कुर्सी और कमरे में ही बैठ दुनिया देखने लगे है। सोशल नेटवर्किंग ने हमें अंदर तक खोखला कर दिया है तो परंपराएं भी हमारे साथ ही टूटने लगी है।
वहीं लेखक केएस धालीवाल कहते है कि चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हो चुके है, केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो, अगर केक में वाइन और अंडे को लेकर धर्म आड़े आता है तो आप 'एग फ्री' ट्राई कर सकते है पर समय की धारा के विपरीत क्यों चलते है। यही बदलाव है।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि आयुर्वेद में योग है और योग में पेट को खाली रख काफी कुछ दुरूस्त करने के तरीके है लेकिन एलोपैथी में फूड सप्लीमेंट है अगर किसी चीज की शरीर में कमी है तो उसे लैब में बने रसायन से ठीक किया जा सकता है। लेकिन खाली पेट नहीं । ऐसे में ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही ये तर्क दे कर पहले करवा चौथ में ही चाय से लेकर बिस्कुट का डोज दिन में दे देती है। हालांकि इसके पीछे कारण ये होता है कि कईयों ने दो से चार दशक पहले अपने ड्रेसिंग टेबल में छिपा कर रखी मिठाई या मेवे खाए होते हैं, जिसका पति को तो पता होता है लेकिन उसकी अपनी सास की जानकारी में नहीं होता। ऐसा कर वो बीस तीस साल पुरानी गड़बड़ी को तर्क संगत ठहरा रही होती है। यहीं पर आ कर हम सास भी कभी बहू थी का सकारात्मक पहलू सामने आता है। दिलचस्प है कि पांच सात साल पहले तक गोलगप्पे की रेहड़ी वालों के लिए ये दिन 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी आप ग्राहक खड़े देख सकते है। किटी-तंबोला के नाम पर होने वाली जुए बाजी पुरूषों की दिवाली से पहले शुरू हो जाती है। यह भी खुल कर कहा जाता है कि करवा तो ठीक है लेटेस्ट क्या है? सूट नया लिया है? या टॉपस? लंहगा इस बार 'देवदास' नहीं 'मुन्नी बदनाम' वाला चल रहा है।
Sunday, 24 October 2010
Punjab and Paddy Straw पंजाब और जलती पराली, नहीं छूट रहा साथ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है फिर भी पंजाब और जलती पराली का जानलेवा साथ नहीं छूट रहा।
पराली के जलने से होने वाले प्रदूषण से हर कोई वाकिफ हो चुका है और पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से किसानों की पराली खरीद कर, बोलर मशीनों से गट्ठे बांध इसका प्रयोग बायोमॉस प्लांटों में बिजली बनाने किया जाने लगा है। लेकिन फिर भी जल रही है पराली, दिलचस्प है कि अभी तक धारा 144 लगाए जाने और पराली जलाने पर लगाए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद किसी किसान पर अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।
इसी रोटावेटर जैसी मशीन से पराली को खेत में ही कुतर कर खाद के रूप में इस्तेमाल करने और अगली फसल बेहतर लेने के उपाय भी कृषि विभाग ने सामने रखे है, पर इसका भी सीमित प्रयोग ही हुआ, और किसान अपने अपने तर्क रख जला रहे है पराली। बताया जा रहा है कि जहां पराली ज्यादा हो तो रोटावेटर काम नहीं करता। गीली जमीन हो तो भी बाद में बत्तर नहीं आता। हालांकि अब हैप्पीसीडर के रूप में खासी मंहगी किंतु प्रभावी मशीन बाजार में आई है, इसके कंबाइन बाजार की तरह भारतीयकरण अथवा कई तरह के जुगाड़ लगाए जा रहे है पर कई जिलों में तो इसे देखा ही नहीं है।
प्रदेश में पराली से ही एक हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य रखने वाले पावरकॉम के प्रवक्ता कहते है कि तीन बायोमॉस के प्लांट कमीशन हो गए है, दो दर्जन से ज्यादा पर एग्रीमेंट के बाद काम चल रहा है और इतने ही पाइप लाइन में है। अब पराली के अलावा कृषि क्षेत्र का अन्य कचरा भी पहले से ज्यादा दामों पर बिकने लगा है। हर प्लांट के आस पास के कुछ गांवों में पराली जलाने का रिवाज बिलकुल खत्म हो चुका है।
जलती पराली पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीएस गुरू कहते है कि किसान पर मामले दर्ज करना तो अंतिम विकल्प होना चाहिए बेहतर तो यह कि उसे प्रेरित किया जाए कि वो ऐसा ना करे। हालांकि पराली को लेकर बने कानून को और कड़ा करने अथवा किसी तरह का बदलाव करने पर टिप्पणी नहीं करते, कहते है कि जो है वो लागू रहेगा।
वहीं किसानों का पक्ष रखते हुए धर्मेहड़ी के प्रोग्रेसिव फार्मर गुरप्रीत सिंह कहते है कि कृषि क्षेत्र में पराली को जलाने से बचाने अथवा विकल्प देने के मामले में जितनी भी मशीने आई है वे या तो खासी मंहगी है या फिर बड़े ट्रैक्टर पर लगने वाली है ऐसे में छोटे किसान की पहुंच से बाहर है। साथ ही वे ये भी स्वीकार करते है कि अब उनके क्षेत्र में लोग ये बात भी करने लगे है कि धरती में मित्र कीट भी होते है, जिन्हें नहीं मारा जाना चाहिए। इन्हें मारना कितना खतरनाक है यह किसान को छोटे समूहों में वर्कशाप अथवा गांव में सीजन के दौरान जा कर समझाया जाए तो वे भावुक हो इस पर जल्द अमल भी शुरू कर देंगे पर कोई एसी कमरे में बैठ भाषण देता है तो किसान उल्टा मतलब निकाल देते है उन्हें लगता है कि इसका खुद का भी फायदा होगा। इसीलिए ऐसे अभियान ठंडे पड़ जाते है।
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है फिर भी पंजाब और जलती पराली का जानलेवा साथ नहीं छूट रहा।
पराली के जलने से होने वाले प्रदूषण से हर कोई वाकिफ हो चुका है और पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से किसानों की पराली खरीद कर, बोलर मशीनों से गट्ठे बांध इसका प्रयोग बायोमॉस प्लांटों में बिजली बनाने किया जाने लगा है। लेकिन फिर भी जल रही है पराली, दिलचस्प है कि अभी तक धारा 144 लगाए जाने और पराली जलाने पर लगाए पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद किसी किसान पर अभी तक कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है।
इसी रोटावेटर जैसी मशीन से पराली को खेत में ही कुतर कर खाद के रूप में इस्तेमाल करने और अगली फसल बेहतर लेने के उपाय भी कृषि विभाग ने सामने रखे है, पर इसका भी सीमित प्रयोग ही हुआ, और किसान अपने अपने तर्क रख जला रहे है पराली। बताया जा रहा है कि जहां पराली ज्यादा हो तो रोटावेटर काम नहीं करता। गीली जमीन हो तो भी बाद में बत्तर नहीं आता। हालांकि अब हैप्पीसीडर के रूप में खासी मंहगी किंतु प्रभावी मशीन बाजार में आई है, इसके कंबाइन बाजार की तरह भारतीयकरण अथवा कई तरह के जुगाड़ लगाए जा रहे है पर कई जिलों में तो इसे देखा ही नहीं है।
प्रदेश में पराली से ही एक हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य रखने वाले पावरकॉम के प्रवक्ता कहते है कि तीन बायोमॉस के प्लांट कमीशन हो गए है, दो दर्जन से ज्यादा पर एग्रीमेंट के बाद काम चल रहा है और इतने ही पाइप लाइन में है। अब पराली के अलावा कृषि क्षेत्र का अन्य कचरा भी पहले से ज्यादा दामों पर बिकने लगा है। हर प्लांट के आस पास के कुछ गांवों में पराली जलाने का रिवाज बिलकुल खत्म हो चुका है।
जलती पराली पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव डीएस गुरू कहते है कि किसान पर मामले दर्ज करना तो अंतिम विकल्प होना चाहिए बेहतर तो यह कि उसे प्रेरित किया जाए कि वो ऐसा ना करे। हालांकि पराली को लेकर बने कानून को और कड़ा करने अथवा किसी तरह का बदलाव करने पर टिप्पणी नहीं करते, कहते है कि जो है वो लागू रहेगा।
वहीं किसानों का पक्ष रखते हुए धर्मेहड़ी के प्रोग्रेसिव फार्मर गुरप्रीत सिंह कहते है कि कृषि क्षेत्र में पराली को जलाने से बचाने अथवा विकल्प देने के मामले में जितनी भी मशीने आई है वे या तो खासी मंहगी है या फिर बड़े ट्रैक्टर पर लगने वाली है ऐसे में छोटे किसान की पहुंच से बाहर है। साथ ही वे ये भी स्वीकार करते है कि अब उनके क्षेत्र में लोग ये बात भी करने लगे है कि धरती में मित्र कीट भी होते है, जिन्हें नहीं मारा जाना चाहिए। इन्हें मारना कितना खतरनाक है यह किसान को छोटे समूहों में वर्कशाप अथवा गांव में सीजन के दौरान जा कर समझाया जाए तो वे भावुक हो इस पर जल्द अमल भी शुरू कर देंगे पर कोई एसी कमरे में बैठ भाषण देता है तो किसान उल्टा मतलब निकाल देते है उन्हें लगता है कि इसका खुद का भी फायदा होगा। इसीलिए ऐसे अभियान ठंडे पड़ जाते है।
Friday, 22 October 2010
बदरंग होने पर डैमेज की मात्रा बढ़नी तय
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पश्चिमी गड़बड़ी के चलते मौसम में बीती रात से आए बदलाव के बाद शुक्रवार को चली तेज हवाओं और बारिश ने उन किसानों के जले पर नमक छिड़क दिया है जो जिनकी फसल बाढ़ के चलते देरी से आई और अब तक कटाई नहीं कर पाए। धरती पर उगे सोने पर मानों आसमान से पानी नहीं आग बरस रही हो। बाढ़ प्रभावित पटियाला डिवीजन में मात्र 15 फीसदी ही धान की कटाई हुई है। इनमें संगरूर व बरनाला तो ऐसे जिले है जहां आंकड़ा दहाई में भी नहीं पहुंचा है। जिन किसानों की फसल मंडियों में आ भी गई है नुकसान उनका भी कम नहीं होने वाला। फेडरेशन आफ आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के महासचिव सुभाष बांगा कहते है कि जिस किसान की उपज नहीं बिकी है और धान गीला हो गया है, उसके बिकने में भी खासी दिक्कत आनी है। आढ़ती तो दो दिन लेबर और लगा कर मदद कर देगा पर बात यहां लेबर के दोगुना हो जाने की नहीं है। शैलर वाले ऐसा धान लेना पसंद नहीं करते जिसमें नमी ज्यादा हो और गीली हुई उपज के बदरंग होने व डैमेज होने की संभावना खासी बढ़ जाती है। चावल भी घटिया क्वालिटी का रह जाता है ऐसे में नुकसान तो तय है। लेबर के मामले में एक रुपया प्रति कट्टा प्रति दिन का खर्च बढ़ता जाता है। हालांकि यह भी हजारों क्विंटल पर काफी आ जाता है। कृषि विभाग के पास आज के नुकसान की पूरी रिपोर्ट तो आनी है पर आरंभिक अनुमानों अनुसार खड़ी फसल बड़े क्षेत्र में गिरी है। कई जगहों पर कंबाइन चलने लायक ही खेत नहीं रहा और हाथों से दाने सहेजने के से हालात बन पड़े है। अधिकारी कहते है कि बाढ़ की वजह से पहले ही सीजन देर से शुरू हुआ था और अब इसमें और देरी होगी। याद रहे कि एक फीसदी नमी बढ़ने पर 40 रूपये प्रति क्विंटल का नुकसान हो जाता है। बदरंग अथवा टूटे चावल की कीमत 20 फीसदी रह जाती है।
पश्चिमी गड़बड़ी के चलते मौसम में बीती रात से आए बदलाव के बाद शुक्रवार को चली तेज हवाओं और बारिश ने उन किसानों के जले पर नमक छिड़क दिया है जो जिनकी फसल बाढ़ के चलते देरी से आई और अब तक कटाई नहीं कर पाए। धरती पर उगे सोने पर मानों आसमान से पानी नहीं आग बरस रही हो। बाढ़ प्रभावित पटियाला डिवीजन में मात्र 15 फीसदी ही धान की कटाई हुई है। इनमें संगरूर व बरनाला तो ऐसे जिले है जहां आंकड़ा दहाई में भी नहीं पहुंचा है। जिन किसानों की फसल मंडियों में आ भी गई है नुकसान उनका भी कम नहीं होने वाला। फेडरेशन आफ आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के महासचिव सुभाष बांगा कहते है कि जिस किसान की उपज नहीं बिकी है और धान गीला हो गया है, उसके बिकने में भी खासी दिक्कत आनी है। आढ़ती तो दो दिन लेबर और लगा कर मदद कर देगा पर बात यहां लेबर के दोगुना हो जाने की नहीं है। शैलर वाले ऐसा धान लेना पसंद नहीं करते जिसमें नमी ज्यादा हो और गीली हुई उपज के बदरंग होने व डैमेज होने की संभावना खासी बढ़ जाती है। चावल भी घटिया क्वालिटी का रह जाता है ऐसे में नुकसान तो तय है। लेबर के मामले में एक रुपया प्रति कट्टा प्रति दिन का खर्च बढ़ता जाता है। हालांकि यह भी हजारों क्विंटल पर काफी आ जाता है। कृषि विभाग के पास आज के नुकसान की पूरी रिपोर्ट तो आनी है पर आरंभिक अनुमानों अनुसार खड़ी फसल बड़े क्षेत्र में गिरी है। कई जगहों पर कंबाइन चलने लायक ही खेत नहीं रहा और हाथों से दाने सहेजने के से हालात बन पड़े है। अधिकारी कहते है कि बाढ़ की वजह से पहले ही सीजन देर से शुरू हुआ था और अब इसमें और देरी होगी। याद रहे कि एक फीसदी नमी बढ़ने पर 40 रूपये प्रति क्विंटल का नुकसान हो जाता है। बदरंग अथवा टूटे चावल की कीमत 20 फीसदी रह जाती है।
Thursday, 21 October 2010
धरती के भगवान, बर्बादी से अंजान, बठिंडा में युवक के लिए धुआं बना यमदूत
भूपेश चट्ठा, पटियाला किसानों ने गेहूं की जल्द बिजाई के लिए इंसानों के साथ-साथ मित्र कीटों की हत्या शुरू कर दी है। किसान द्वारा पराली जलाए जाने से फैले धुएं से जहां वीरवार को बठिंडा में हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई है वहीं इससे असंख्य मित्र कीट भी मर रहे हैं। कृषि विभाग पराली के प्रति किसानों को जागरुक करने के लिए हर साल कई कार्यक्रम आयोजित करता है लेकिन अभी तक किसानों ने पराली जलाने का रास्ता नहीं छोड़ा। किसानों द्वारा जलाई गई पराली के कारण मित्र कीट, एंटी फीड, मिली फीड, नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया और केंचुए आग में जल जाते हैं। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है और हर साल पैदावार पर असर पड़ता है। सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के प्रवक्ता डा. पीपी खोसला का कहना है कि नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया जमीन के दो इंच नीचे चलने वाली प्राकृतिक खाद फैक्टरी है जो कचरे को खाद में बदल देते हैं। उन्होंने कहा कि जमीन में दीमक का होना भी जरूरी है क्योंकि पिछली फसल की जड़ें यदि खत्म नहीं होंगी तो वह बंजर हो सकती है। दीमक पुरानी फसलों के इसी कचरे को ठिकाने लगता है फाइव एलीमेंट्स एंड एजुकेशनल हेल्थ सोसायटी के चेयरमैन डा. जोगेंद्र टाइगर का कहना है कि किसानों को बार-बार जागरुक किए जाने के बावजूद उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा। यदि किसान विशेषज्ञों की राय पर अमल करें तो पैदावार के साथ-साथ पराली को बेच कर आर्थिक लाभ भी ले सकते हैं क्योंकि पराली का इस्तेमाल करने के लिए सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं। अब तो पराली से बिजली उत्पादन भी शुरू हो गया है। किसानों को चाहिए कि अपने पुराने परंपरागत तरीके एक बार याद करें। बुजुर्गो की बातें सुनें और उन पर अमल करें तो ये खेत इंडस्ट्री के रूप में उनको आय देगा। वे कहते हैं कि मंडी में फसल फेंक कर आने की बजाय बेचने की बात सोची जानी चाहिए। फिरोजपुर स्थित सिविल अस्पातल के एसएमओ डाक्टर बलदेव अरोड़ा के मुताबिक जलती पराली से निकलने वाले धुएं से जहां वातावरण दूषित होता है वहीं यह कई प्रकार की बीमारियां फैलाने में अहम भूमिका निभाता है
जानलेवा बनी पराली की आग
बठिंडा : जिले के गांव बंबीहा में किसान द्वारा धान की पराली को लगाई आग एक युवक के लिए काल बन गई। आग से निकलते धुएं के कारण सड़क पर आ रही बस और मोटरसाइकिल की टक्कर हो जाने से युवक की मौके पर ही मौत हो गई। जानकारी के अनुसार गांव बंबीहा के जगसीर सिंह का इकलौता लड़का सेवक सिंह गांव में लकड़ी के दरवाजे, खिड़की बनाता था। पड़ोस की एक महिला ने बुधवार शाम बताया कि उसका लड़का स्कूल से घर नहीं लौटा है। सेवक सिंह उसे ढूंढने अपनी मोटरसाइकिल से निकला। वह गांव से बाहर निकला ही था कि मुख्य सड़क पर धान के खेत में पराली को किसान ने आग लगाई हुई थी। इस वजह से पूरी सड़क धुएं से भरी थी। लिहाजा सेवक को सड़क पर सामने से आती बस नहीं दिखी और वह अपनी रफ्तार से सड़क पर वाहन चलाता गया। परिणामस्वरूप उसका वाहन तेज रफ्तार बस से टकरा गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बस ड्राइवर मौके से फरार हो गया। इसकी सूचना थाना संगत पुलिस को दी गई। पुलिस ने बस के ड्राइवर जसमेल सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। हादसे का कारण बने पराली को आग लगाने वाले किसान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। हालांकि जिला प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर पाबंदी लगाई हुई है
जानलेवा बनी पराली की आग
बठिंडा : जिले के गांव बंबीहा में किसान द्वारा धान की पराली को लगाई आग एक युवक के लिए काल बन गई। आग से निकलते धुएं के कारण सड़क पर आ रही बस और मोटरसाइकिल की टक्कर हो जाने से युवक की मौके पर ही मौत हो गई। जानकारी के अनुसार गांव बंबीहा के जगसीर सिंह का इकलौता लड़का सेवक सिंह गांव में लकड़ी के दरवाजे, खिड़की बनाता था। पड़ोस की एक महिला ने बुधवार शाम बताया कि उसका लड़का स्कूल से घर नहीं लौटा है। सेवक सिंह उसे ढूंढने अपनी मोटरसाइकिल से निकला। वह गांव से बाहर निकला ही था कि मुख्य सड़क पर धान के खेत में पराली को किसान ने आग लगाई हुई थी। इस वजह से पूरी सड़क धुएं से भरी थी। लिहाजा सेवक को सड़क पर सामने से आती बस नहीं दिखी और वह अपनी रफ्तार से सड़क पर वाहन चलाता गया। परिणामस्वरूप उसका वाहन तेज रफ्तार बस से टकरा गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बस ड्राइवर मौके से फरार हो गया। इसकी सूचना थाना संगत पुलिस को दी गई। पुलिस ने बस के ड्राइवर जसमेल सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। हादसे का कारण बने पराली को आग लगाने वाले किसान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। हालांकि जिला प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर पाबंदी लगाई हुई है
पावरकॉम मुख्यालय को पांच घंटे तक रखा बंधक
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के मुख्यालय को वीरवार को लगभग सभी तरह के प्रशासकीय प्रबंधों को नकारा साबित करते हुए और न्यायालय के आदेशों को धत्ता बता बेरोजगार लाईन मैन यूनियन ने पांच घंटे तक बंधक बनाए रखा। यूनियन पावरकॉम में भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए विज्ञापन जारी करने की मांग कर रही है।
दिलचस्प है कि एक ओर जहां 42 सौ कर्मियों वाले पावरकॉम मुख्यालय में चेयरमैन से लेकर सुरक्षा गार्ड तक सभी खुद को असहाय महसूस कर रहा था वहीं यूनियन के कार्यकत्तरा सीना ताने घंटों भाषणबाजी करते रहे।
महर्षि वाल्मीकि के प्रकाश उत्सव पर आज सरकार की ओर से घोषित किए गए हाफ डे के पूरा होने से कुछ देर पहले करीब साढ़े 12 बजे यूनियन के कार्यकत्तराओं ने मुख्यालय के तीनों दरवाजों पर सोची समझी नीति के तहत ताले जड़ दिए। हालांकि पहले घोषित कार्यक्रम अनुसार आज से मरण व्रत शुरू किया जाना था।
इसी दौरान कर्मियों अधिकारियों ने जैसे ही डेढ़ बजे बाहर का रुख किया तो दरवाजे सील देख उच्च अधिकारियों से संपर्क साधा। बात सीएमडी तक पहुंची तो उन्होंने एसएसपी से बात की। विभागीय सूत्र बताते है कि इसके बाद मात्र एक डीएसपी और एक इंस्पेक्टर के साथ कुछ पुलिस वाले भेज दिए गए। इसी बीच एसडीएम ने भी अपनी ओर से ताले खुलवाने का प्रयास किया पर परिवारों सहित धरने पर पहुंचे यूनियन के लोग मुख्यमंत्री से नीचे किसी के साथ बैठक करने पर सहमत नहीं हुए। हालांकि बीते सप्ताह ही जिला प्रशासन ने धरने की जगह तय कर अपनी और से कारवाई पूरी कर दी। और आज यही प्रशासन पांच घंटे मूकदर्शक बना खुद को लाचार पा रहा था। वहीं प्रबंधन ने पहले धरने के खिलाफ कोर्ट से स्टे लिया और फिर कंटेम्ट भी दायर कर जिला प्रशासन को लिखा, इस पर भी कोई कार्यवाई होती नहीं दिखी।
महर्षि वाल्मीकि के प्रकाश उत्सव की पूर्व संध्या पर हाफ डे के चलते 42 सौ कर्मियों में से अधिकतर खाना नहीं लाए और कुछ ऐसा ही अनुमान कैंटीन के प्रबंधकों ने लगाया जिनके दूध-बिस्किट कुछ ही देर में समाप्त हो गए। ज्यादातर कर्मियों की स्थिति बंधकों सी हो कर रह गई। हालांकि जनरल कैटेगरी वेलफेयर ऐसोसिएशन के प्रधान जसवंत सिंह ने इस सब के बावजूद बेरोजगारों को नौकरी दिए जाने का समर्थन किया है।
दूसरी ओर शाम ठीक पांच बजे हुए समझौते पर यूनियन के महासचिव जगतार सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री से सीएमडी की उपस्थिति में 27 अक्टूबर को बैठक होने पर उन्होंने ताले खोल दिए है और मांगें माने जाने तक संघर्ष जारी रहेगा।
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के मुख्यालय को वीरवार को लगभग सभी तरह के प्रशासकीय प्रबंधों को नकारा साबित करते हुए और न्यायालय के आदेशों को धत्ता बता बेरोजगार लाईन मैन यूनियन ने पांच घंटे तक बंधक बनाए रखा। यूनियन पावरकॉम में भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए विज्ञापन जारी करने की मांग कर रही है।
दिलचस्प है कि एक ओर जहां 42 सौ कर्मियों वाले पावरकॉम मुख्यालय में चेयरमैन से लेकर सुरक्षा गार्ड तक सभी खुद को असहाय महसूस कर रहा था वहीं यूनियन के कार्यकत्तरा सीना ताने घंटों भाषणबाजी करते रहे।
महर्षि वाल्मीकि के प्रकाश उत्सव पर आज सरकार की ओर से घोषित किए गए हाफ डे के पूरा होने से कुछ देर पहले करीब साढ़े 12 बजे यूनियन के कार्यकत्तराओं ने मुख्यालय के तीनों दरवाजों पर सोची समझी नीति के तहत ताले जड़ दिए। हालांकि पहले घोषित कार्यक्रम अनुसार आज से मरण व्रत शुरू किया जाना था।
इसी दौरान कर्मियों अधिकारियों ने जैसे ही डेढ़ बजे बाहर का रुख किया तो दरवाजे सील देख उच्च अधिकारियों से संपर्क साधा। बात सीएमडी तक पहुंची तो उन्होंने एसएसपी से बात की। विभागीय सूत्र बताते है कि इसके बाद मात्र एक डीएसपी और एक इंस्पेक्टर के साथ कुछ पुलिस वाले भेज दिए गए। इसी बीच एसडीएम ने भी अपनी ओर से ताले खुलवाने का प्रयास किया पर परिवारों सहित धरने पर पहुंचे यूनियन के लोग मुख्यमंत्री से नीचे किसी के साथ बैठक करने पर सहमत नहीं हुए। हालांकि बीते सप्ताह ही जिला प्रशासन ने धरने की जगह तय कर अपनी और से कारवाई पूरी कर दी। और आज यही प्रशासन पांच घंटे मूकदर्शक बना खुद को लाचार पा रहा था। वहीं प्रबंधन ने पहले धरने के खिलाफ कोर्ट से स्टे लिया और फिर कंटेम्ट भी दायर कर जिला प्रशासन को लिखा, इस पर भी कोई कार्यवाई होती नहीं दिखी।
महर्षि वाल्मीकि के प्रकाश उत्सव की पूर्व संध्या पर हाफ डे के चलते 42 सौ कर्मियों में से अधिकतर खाना नहीं लाए और कुछ ऐसा ही अनुमान कैंटीन के प्रबंधकों ने लगाया जिनके दूध-बिस्किट कुछ ही देर में समाप्त हो गए। ज्यादातर कर्मियों की स्थिति बंधकों सी हो कर रह गई। हालांकि जनरल कैटेगरी वेलफेयर ऐसोसिएशन के प्रधान जसवंत सिंह ने इस सब के बावजूद बेरोजगारों को नौकरी दिए जाने का समर्थन किया है।
दूसरी ओर शाम ठीक पांच बजे हुए समझौते पर यूनियन के महासचिव जगतार सिंह ने बताया कि मुख्यमंत्री से सीएमडी की उपस्थिति में 27 अक्टूबर को बैठक होने पर उन्होंने ताले खोल दिए है और मांगें माने जाने तक संघर्ष जारी रहेगा।
भंडारण क्षमता बढ़ाने टेंडर लिए, जल्द अलाटमेंट
अनाज खराब हुआ माना प्रमुख सचिव ने, दो मामले भी दर्ज, औरों पर भी कार्रवाई का आश्वासन
वर्तमान गति से तो सात महीने बाद गेहूं की फसल आने तक दो साल पुराना स्टाक भी नहीं हिलेगा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
वर्ष 2008-09 का गेहूं पंजाब में पड़ा है, 2009-10 के गेहूं के साथ चावल और धान भी अभी तक यहीं है, डेढ़ सौ लाख धान की आवक होने को है और पांच महीने बाद 124 लाख टन गेहूं की फसल आ जानी है जिस गति से ढुलाई हो रही है उससे यह सर्किल कभी पूरा नहीं हो सकता। प्रदेश में अन्न भंडार की अभी यह अधूरी तस्वीर है चौंकाने वाली बात यह है कि देश भर में ज्यों ज्यों अनाज सडऩे को लेकर हो हल्ला बढ़ रहा है पंजाब से ढुलाई कम होती जा रही है। अब सारा सिस्टम धान को समेटने में लगा है।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के प्रमुख सचिव डीएस गुरू इसी भंडारण समस्या पर कहते है कि राज्य में क्षमता बढ़ाने के अलावा कोई और उपाय नहीं है। 70 लाख टन अनाज भण्डारण करने के टेंडर मांगे है और 101 लाख टन के आवेदन आ चुके है। जल्द ही अलाटमेंट कर दी जाएगी, और अनाज का खराब होना रोका जा सकेगा। राज्य में कितना अनाज पड़ा है इस पर उनका कहना है कि मात्रा खासी है और मुख्यमंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री से भी बात की है और एफसीआई के अधिकारियों भी अब खाद्य आपूर्ति विभाग को भी हर संभव उपाय करने को कहा है।
अनाज खराब होने के जिम्मेदार लोगो पर कार्यवाई के सवाल पर डीएस गुरू कहते है कि दो मामले दर्ज किए जा चुके है शेष पर भी काम हो रहा है। किसी को बक्शा नहीं जाएगा।
सिर्फ मार्कफैड का ही उदाहरण लें तो वर्ष 2008-09 का एक लाख 73 हजार टन, 09-10 का दस लाख 69 हजार टन और इस साल का 21 लाख 66 हजार टन गेहूं अभी भी ढुलाई का इंतजार कर रहा है। जून के बाद से अलाट होने वाली ट्रेनों की संख्या लगातार कम हो रही है। याद रहे कि मार्कफैड के बाद पनसप, फिर पनग्रेन, वेयरहाउस और पंजाब एग्रो का नाम खरीद एजेंसियों के रूप में आता है। किसी के भी हालात अलग नहीं है।
राइस शेलर गेहूं से अटे है धान क्या स्कूलों में...
राज्य में गेहूं भंडारण की समस्या वर्षों से चलती आ रही है पिछले साल से विकराल रूप धारण कर गई तो इस बार अप्रैल में आई नई फसल को धान की मिलिंग कर चावल बनाने वाले शैलरों में स्टोर कर दिया गया। अब तक इन्हें खाली नहीं किया जा सका है, गेहूं से अटे पड़े शैलरों में जगह ना होने पर सवाल उठने लगे हैं कि मंडियों धान की सरकारी खरीद के बाद क्या इसे स्कूलों में रखा जाएगा।
स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के अलावा उपाय
राज्य की खरीद एजेंसियों की कोआर्डीनेशन कमेटी के अध्यक्ष भुपिंदर सिंह कहते है कि मामला एक राच्य या एक एजेंसी का नहीं है पूरे देश का है ऐसे में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। स्टोरेज के लिए गांव में ही किसान व सरपंच को इंतजाम करने के अलावा आढ़ती की सेवाएं ली जा सकती है। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य मासिक आधार पर तय हो जाए जिससे बिना कोई खर्च किए कालाबाजारी और जमाखोरी दोनों रूकेंगे भी और फायदा किसान को भी ले सकता है।
भुपिंदर सिंह सवाल करते हैं कि बीपीएल और एपीएल परिवारों के लिए पहले हम गेहूं खरीद कर गोदाम में भेजते हैं फिर वहां से निकाल कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भेजा जाता है जबकि यह कार्य सीधा भी किया जा सकता है।
2007-08 में 2.90 लाख टन स्टोरेज क्षमता की प्लींथें तोड़ी
इस साल 48 हजार 315 टन अनाज को खाने योग्य ना रहने लायक बताने वाली सरकार की एक नीति के तहत 2007-08 में वेयरहाउसिंग कारपोरेशन ने पंचायती जमीन पर बनी दो लाख टन स्टोरेज क्षमता की प्लींथें तोडऩे के आदेश जारी कर दिए। विभागीय सूत्र बताते हैं कि छहरटा में तो अगले ही साल 40 हजार टन क्षमता की प्लींथें फिर उसी स्थान पर बना भूल सुधार कर लिया गया। जबकि प्रदेश में 30 लाख टन धान, 63 लाख टन चावल और 103 लाख टन गेहूं पड़ा है। राच्य में 95 लाख टन कवर्ड स्टोरेज क्षमता है तो 105 लाख टन खुले आसमान में भंडार करने की व्यवस्था है।
वर्तमान गति से तो सात महीने बाद गेहूं की फसल आने तक दो साल पुराना स्टाक भी नहीं हिलेगा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
वर्ष 2008-09 का गेहूं पंजाब में पड़ा है, 2009-10 के गेहूं के साथ चावल और धान भी अभी तक यहीं है, डेढ़ सौ लाख धान की आवक होने को है और पांच महीने बाद 124 लाख टन गेहूं की फसल आ जानी है जिस गति से ढुलाई हो रही है उससे यह सर्किल कभी पूरा नहीं हो सकता। प्रदेश में अन्न भंडार की अभी यह अधूरी तस्वीर है चौंकाने वाली बात यह है कि देश भर में ज्यों ज्यों अनाज सडऩे को लेकर हो हल्ला बढ़ रहा है पंजाब से ढुलाई कम होती जा रही है। अब सारा सिस्टम धान को समेटने में लगा है।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के प्रमुख सचिव डीएस गुरू इसी भंडारण समस्या पर कहते है कि राज्य में क्षमता बढ़ाने के अलावा कोई और उपाय नहीं है। 70 लाख टन अनाज भण्डारण करने के टेंडर मांगे है और 101 लाख टन के आवेदन आ चुके है। जल्द ही अलाटमेंट कर दी जाएगी, और अनाज का खराब होना रोका जा सकेगा। राज्य में कितना अनाज पड़ा है इस पर उनका कहना है कि मात्रा खासी है और मुख्यमंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री से भी बात की है और एफसीआई के अधिकारियों भी अब खाद्य आपूर्ति विभाग को भी हर संभव उपाय करने को कहा है।
अनाज खराब होने के जिम्मेदार लोगो पर कार्यवाई के सवाल पर डीएस गुरू कहते है कि दो मामले दर्ज किए जा चुके है शेष पर भी काम हो रहा है। किसी को बक्शा नहीं जाएगा।
सिर्फ मार्कफैड का ही उदाहरण लें तो वर्ष 2008-09 का एक लाख 73 हजार टन, 09-10 का दस लाख 69 हजार टन और इस साल का 21 लाख 66 हजार टन गेहूं अभी भी ढुलाई का इंतजार कर रहा है। जून के बाद से अलाट होने वाली ट्रेनों की संख्या लगातार कम हो रही है। याद रहे कि मार्कफैड के बाद पनसप, फिर पनग्रेन, वेयरहाउस और पंजाब एग्रो का नाम खरीद एजेंसियों के रूप में आता है। किसी के भी हालात अलग नहीं है।
राइस शेलर गेहूं से अटे है धान क्या स्कूलों में...
राज्य में गेहूं भंडारण की समस्या वर्षों से चलती आ रही है पिछले साल से विकराल रूप धारण कर गई तो इस बार अप्रैल में आई नई फसल को धान की मिलिंग कर चावल बनाने वाले शैलरों में स्टोर कर दिया गया। अब तक इन्हें खाली नहीं किया जा सका है, गेहूं से अटे पड़े शैलरों में जगह ना होने पर सवाल उठने लगे हैं कि मंडियों धान की सरकारी खरीद के बाद क्या इसे स्कूलों में रखा जाएगा।
स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के अलावा उपाय
राज्य की खरीद एजेंसियों की कोआर्डीनेशन कमेटी के अध्यक्ष भुपिंदर सिंह कहते है कि मामला एक राच्य या एक एजेंसी का नहीं है पूरे देश का है ऐसे में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। स्टोरेज के लिए गांव में ही किसान व सरपंच को इंतजाम करने के अलावा आढ़ती की सेवाएं ली जा सकती है। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य मासिक आधार पर तय हो जाए जिससे बिना कोई खर्च किए कालाबाजारी और जमाखोरी दोनों रूकेंगे भी और फायदा किसान को भी ले सकता है।
भुपिंदर सिंह सवाल करते हैं कि बीपीएल और एपीएल परिवारों के लिए पहले हम गेहूं खरीद कर गोदाम में भेजते हैं फिर वहां से निकाल कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भेजा जाता है जबकि यह कार्य सीधा भी किया जा सकता है।
2007-08 में 2.90 लाख टन स्टोरेज क्षमता की प्लींथें तोड़ी
इस साल 48 हजार 315 टन अनाज को खाने योग्य ना रहने लायक बताने वाली सरकार की एक नीति के तहत 2007-08 में वेयरहाउसिंग कारपोरेशन ने पंचायती जमीन पर बनी दो लाख टन स्टोरेज क्षमता की प्लींथें तोडऩे के आदेश जारी कर दिए। विभागीय सूत्र बताते हैं कि छहरटा में तो अगले ही साल 40 हजार टन क्षमता की प्लींथें फिर उसी स्थान पर बना भूल सुधार कर लिया गया। जबकि प्रदेश में 30 लाख टन धान, 63 लाख टन चावल और 103 लाख टन गेहूं पड़ा है। राच्य में 95 लाख टन कवर्ड स्टोरेज क्षमता है तो 105 लाख टन खुले आसमान में भंडार करने की व्यवस्था है।
Wednesday, 20 October 2010
धान खरीद में एफसीआई को दिलचस्पी नहीं
डैमेज चावल का प्रतिशत 4.75 से घटाकर तीन फीसदी करने से समस्या बढ़ी
चावल पर लेवी 75 फीसदी जबकि देर तक हुई बारिश से नमी काफी ज्यादा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की खरीद में इस साल एफसीआई की कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही है। निजी व्यापारी भी खरीद करने में उतना उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। धान खरीद के आंकड़े चाहे जो कहें और राज्य सरकार की खरीद एजेंसियों ने कितना भी जोर लगा रखा हो पर आंकड़े बता रहे हैं कि स्थिति सुधर नहीं रही है। मंडियों में अब तक आई फसल और बीते साल के आंकड़ों की तुलना बताती है कि इस बार एफसीआई ने मात्र 537 टन धान की खरीद जिले की 97 मंडियों में की है जबकि बीते साल यह आंकड़ा 16 गुना ज्यादा था। इसी प्रकार निजी क्षेत्र अब तक कुल खरीद में 3823 टन का योगदान दिया है जबकि पिछले साल पांच गुना ज्यादा 17 हजार 820 टन धान इस वर्ग ने खरीदा था। धान की कुल खरीद में भी कमी आई है पर ये उतनी नहीं है। जिले में अब तक बीते साल के चार लाख 48 हजार टन के मुकाबले इस साल तीन लाख 45 हजार टन की खरीद की गई है। इस सारे घालमेल पर आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के महासचिव व जिला प्रधान जसविंदर सिंह राणा कहते हैं कि निजी व्यापारी अथवा शैलर मिलर इस बार सहमा हुआ है। सरकार ने डैमेज चावल का प्रतिशत 4.75 से कम कर तीन फीसदी कर दिया है और चावल पर लेवी 75 फीसदी रखी गई है। जबकि इस साल देर तक बारिश होने की वजह से नमी काफी अधिक आ रही है। ऐसे में चावल का टुकड़ा और ज्यादा आने की संभावना है। इसके तीन फीसदी से नीचे रहने की कम ही संभावना है। इस पर लेवी के 75 फीसदी पर होने और एफसीआई के पास स्टोरेज की कमी शैलर मालिकों को साफ दिख रही है। ऐसे में उन्हें ये भी लग रहा है कि मिलिंग के बाद एफसीआई ने चावल रखने में आना कानी करने पर ब्याज का भार उन्हीं पर पड़ेगा। दिलचस्प है कि खु़द एफसीआई की ओर से कम खरीद किए जाने के पीछे प्रदेश के महासचिव जसविंदर सिंह राणा कहते हैं कि कुछ साल पहले तक धान की स्पेसिफिकेशन में नमी का हिस्सा 18 फीसदी हु़आ करता था जिसे कम कर 17 फीसदी कर दिया गया। एफसीआई को पता है कि इन शर्तो पर मिलिंग करवाना खासा मुश्किल है। सो खरीद नहीं कर रही। वे आरोप लगाते हैं कि एफसीआई की नीतियों में हर तरफ ब्लैकमेलिंग की गुंजाइश छोड़ी गई है और इस केंद्रीय एजेंसी को छोड़ कर हर कोई फंसता है। चाहे वो मिलर हो या आढ़ती या फिर राज्य की खरीद एजेंसी का अधिकारी-कर्मचारी।
चावल पर लेवी 75 फीसदी जबकि देर तक हुई बारिश से नमी काफी ज्यादा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की खरीद में इस साल एफसीआई की कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही है। निजी व्यापारी भी खरीद करने में उतना उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। धान खरीद के आंकड़े चाहे जो कहें और राज्य सरकार की खरीद एजेंसियों ने कितना भी जोर लगा रखा हो पर आंकड़े बता रहे हैं कि स्थिति सुधर नहीं रही है। मंडियों में अब तक आई फसल और बीते साल के आंकड़ों की तुलना बताती है कि इस बार एफसीआई ने मात्र 537 टन धान की खरीद जिले की 97 मंडियों में की है जबकि बीते साल यह आंकड़ा 16 गुना ज्यादा था। इसी प्रकार निजी क्षेत्र अब तक कुल खरीद में 3823 टन का योगदान दिया है जबकि पिछले साल पांच गुना ज्यादा 17 हजार 820 टन धान इस वर्ग ने खरीदा था। धान की कुल खरीद में भी कमी आई है पर ये उतनी नहीं है। जिले में अब तक बीते साल के चार लाख 48 हजार टन के मुकाबले इस साल तीन लाख 45 हजार टन की खरीद की गई है। इस सारे घालमेल पर आढ़ती एसोसिएशन पंजाब के महासचिव व जिला प्रधान जसविंदर सिंह राणा कहते हैं कि निजी व्यापारी अथवा शैलर मिलर इस बार सहमा हुआ है। सरकार ने डैमेज चावल का प्रतिशत 4.75 से कम कर तीन फीसदी कर दिया है और चावल पर लेवी 75 फीसदी रखी गई है। जबकि इस साल देर तक बारिश होने की वजह से नमी काफी अधिक आ रही है। ऐसे में चावल का टुकड़ा और ज्यादा आने की संभावना है। इसके तीन फीसदी से नीचे रहने की कम ही संभावना है। इस पर लेवी के 75 फीसदी पर होने और एफसीआई के पास स्टोरेज की कमी शैलर मालिकों को साफ दिख रही है। ऐसे में उन्हें ये भी लग रहा है कि मिलिंग के बाद एफसीआई ने चावल रखने में आना कानी करने पर ब्याज का भार उन्हीं पर पड़ेगा। दिलचस्प है कि खु़द एफसीआई की ओर से कम खरीद किए जाने के पीछे प्रदेश के महासचिव जसविंदर सिंह राणा कहते हैं कि कुछ साल पहले तक धान की स्पेसिफिकेशन में नमी का हिस्सा 18 फीसदी हु़आ करता था जिसे कम कर 17 फीसदी कर दिया गया। एफसीआई को पता है कि इन शर्तो पर मिलिंग करवाना खासा मुश्किल है। सो खरीद नहीं कर रही। वे आरोप लगाते हैं कि एफसीआई की नीतियों में हर तरफ ब्लैकमेलिंग की गुंजाइश छोड़ी गई है और इस केंद्रीय एजेंसी को छोड़ कर हर कोई फंसता है। चाहे वो मिलर हो या आढ़ती या फिर राज्य की खरीद एजेंसी का अधिकारी-कर्मचारी।
Tuesday, 19 October 2010
आंकड़ों का आइना दिखा फील गुड करा गए गुरु
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
धान मंडियों में किसानों की हो रही बेकद्री के आरोपों और किसान संगठनों के रास्ता रोके जाने की खबरों के बीच मंगलवार को मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के प्रमुख सचिव डीएस गुरु ने प्रदेश भर के आंकड़ों पेश कर सबकुछ ठीक होने का दावा पेश किया। उनका कहना था कि राज्य में धान और गेहूं की खरीद करना सबसे बड़ा कार्य है और इसमें पूरी ताकत लगी है। मुख्यमंत्री ने डिप्टी कमिश्नरों को सख्त निर्देश दे रखे हैं कि मंडी में धान की खरीद व व्यवस्था में किसी किस्म की गड़बड़ी ना होने पाए।
आठ जिलों का दौरा करने के बाद नई अनाज मंडी में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में डीएस गुरु ने बताया कि इस बार राज्य में मंडियों की संख्या बढ़ाकर 1718 कर दी गई और सीजन में 142.5 लाख टन धान आने की उम्मीद है। इसमें से 49.5 लाख टन आ चुका है। 47.5 टन की खरीद भी की जा चुकी है। सिर्फ कुछ स्थानों पर गीला और एक दिन का किसान का धान पड़ा है। वे कहते हैं कि आवक का 97 फीसदी धान खरीदा जा चुका है। किसानों को 3620 करोड़ रुपये का चेक से भुगतान किया जा चुका है। यह आंकड़ा 87 फीसदी पर है और 81 फीसदी धान की लिफ्टिंग भी की जा चुकी है। 80 फीसदी संसाधन लिफ्टिंग में झोंके गए हैं। किसान का धान यदि गीला नहीं है तो एक दिन से ज्यादा का समय मंडी में नहीं लग रहा है।
फसल पर मानसून के प्रभाव पर डीएस गुरु कहते हैं कि अमृतसर में 113 फीसदी और तरनतारन में 115 फीसदी धान आ चुका है, लेकिन बाढ़ प्रभावित जिलों पटियाला में 26 फीसदी, बरनाला में तीन और संगरूर में पांच फीसदी आवक ही हो पाई है। मंडी के दौरे के दौरान उनके साथ मार्केट कमेटी के चेयरमैन हरविंदर सिंह हरपालपुर के अलावा पूरा प्रशासन मौजूद था।
धान मंडियों में किसानों की हो रही बेकद्री के आरोपों और किसान संगठनों के रास्ता रोके जाने की खबरों के बीच मंगलवार को मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के प्रमुख सचिव डीएस गुरु ने प्रदेश भर के आंकड़ों पेश कर सबकुछ ठीक होने का दावा पेश किया। उनका कहना था कि राज्य में धान और गेहूं की खरीद करना सबसे बड़ा कार्य है और इसमें पूरी ताकत लगी है। मुख्यमंत्री ने डिप्टी कमिश्नरों को सख्त निर्देश दे रखे हैं कि मंडी में धान की खरीद व व्यवस्था में किसी किस्म की गड़बड़ी ना होने पाए।
आठ जिलों का दौरा करने के बाद नई अनाज मंडी में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में डीएस गुरु ने बताया कि इस बार राज्य में मंडियों की संख्या बढ़ाकर 1718 कर दी गई और सीजन में 142.5 लाख टन धान आने की उम्मीद है। इसमें से 49.5 लाख टन आ चुका है। 47.5 टन की खरीद भी की जा चुकी है। सिर्फ कुछ स्थानों पर गीला और एक दिन का किसान का धान पड़ा है। वे कहते हैं कि आवक का 97 फीसदी धान खरीदा जा चुका है। किसानों को 3620 करोड़ रुपये का चेक से भुगतान किया जा चुका है। यह आंकड़ा 87 फीसदी पर है और 81 फीसदी धान की लिफ्टिंग भी की जा चुकी है। 80 फीसदी संसाधन लिफ्टिंग में झोंके गए हैं। किसान का धान यदि गीला नहीं है तो एक दिन से ज्यादा का समय मंडी में नहीं लग रहा है।
फसल पर मानसून के प्रभाव पर डीएस गुरु कहते हैं कि अमृतसर में 113 फीसदी और तरनतारन में 115 फीसदी धान आ चुका है, लेकिन बाढ़ प्रभावित जिलों पटियाला में 26 फीसदी, बरनाला में तीन और संगरूर में पांच फीसदी आवक ही हो पाई है। मंडी के दौरे के दौरान उनके साथ मार्केट कमेटी के चेयरमैन हरविंदर सिंह हरपालपुर के अलावा पूरा प्रशासन मौजूद था।
Monday, 18 October 2010
भाखड़ा में पानी और खतरा या खजाना?
खतरे के निशान से नीचे आया जल स्तर
-एक दिन में 0.13 फीट की रफ्तार से कम हो रहा है पानी
- आवक 15 हजार क्यूसिक से कम हो 14 हजार पर आई 17 हजार क्यूसिक से ज्यादा पानी छोड़ा जा रहा है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
144 वर्ग मील में फैले उत्तर भारत के सबसे बड़े और 1700 फीट ऊंचे भाखड़ा बांध की गोविन्द साग र झील में पानी खतरे के निशान 1680 फीट सेे ठीक नीचे आ गया है। बांध में यों तो 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है लेकिन बांध के निर्माता इंजीनियरों ने इसका खतरे का निशान कुल क्षमता से पांच फीट नीचे 1685 फीट तय किया पर अब इसकी उम्र को देखते हुए बांध में 1680 फीट का नया पैमाना तय कर लिया गया है।
प्राकृति ने हालांकि इस साल बाढ़ के रूप में कहर भी ढाया है पर बांध में पानी का खरीफ सीजन के अंत होने तक अपने चरम पर बने रहना तीन राज्यों के किसानों, दिल्ली की जनता व बिजली का प्रबंध करने वालों के लिए अच्छी खबर है। बांध में पानी की लगातार मानिटरिंग करने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारियों अनुसार शनिवार को जल स्तर 1680.14 पर था जो रविवार को 1680.01 पर आ गया और अब खतरे के निशान से ठीक नीचे है।
बांध में पानी की आवक एक दिन में 15483 क्यूसिक से कम हो कर 14977 क्यूसिक पर आ गई है। हालांकि बांध से पानी छोड़े जाने कर रफ्तार में कमी आने वाले दिनों में की जानी तय है। फिलहाल बांध से 17714 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा है, डिसचार्ज में नाममात्र की ही कमी की गई है।
दिलचस्प है कि बीते साल आज ही के दिन 1640 फीट पर था और पानी की आवक 11443 क्यूसिक थी और 11800 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा था। पावरकॉम के अधिकारी बताते है कि सर्दियों में बिजली बनाने पानी का कम से कम प्रयोग करने का प्रयास होगा जबकि पानी को अगले साल गर्मियों के लिए संभाला जाएगा राज्य में कम मांग के चलते बंद की गई लहरा मुहब्बत की एक यूनिट को अब चालू कर लिया गया है यद्यपि दो अन्य यूनिट भी बंद पड़े है। सर्दियों में थर्मल प्लांटों पर ही अधिक निर्भरता रखी जाएगी
आम तौर पर बांध में जलस्तर बढऩे का सिलसिला भराव सीजन 15 सितंबर को समाप्त होने के साथ थम जाता है लेकिन इस साल पानी को सीमित रखने के लिए मशक्कत करनी पड़ी।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड ने लंबे अनुभव के बाद बनाए बैंच मार्क अनुसार भाखड़ा बांध में एक अग स्त को 1650 फीट और 15 अ"स्त को 1670 फीट और 31 अगस्त को 1680 फीट पानी हो सकता है। और यह आंकड़ा ठीक दो महीने बाद भी दिखाई देना सुखद अहसास की श्रेणी में रखा जा रहा है।
बांध में जल भराव के 1975 से अब तक के आंकड़े गवाह है कि पानी सिर्फ चार बार ही खतरे के निशान 1685 फीट को पार कर पाया है। बांध में पिछले 35 सालों में आए पानी में सर्वाधिक का रिकार्ड 1988 में 1687.55 फीट का है लेकिन तारीख के मामले में यह 13 सितंबर को हो पाया, यानि भराव सीजन समाप्त होने से ठीक दो दिन पहले। इसके अलावा 1975-76 में 1687.36 फीट, 1983-84 में 1686.01 फीट, 1978-79 में 1685.96 फीट मापा गया है। बांध में पानी ने 1680 का जल स्तर अब तक इसके अलावा सात बार छू चुका है। 2005-06 में पानी 1681.40 तब हुआ जब इससे ठीक एक साल पहले 2004-05 में पानी ने सबसे निचला रिकार्ड 1600.82 फीट का बनाया था। साधारणतय झील में पानी 1650 से 1680 फीट के बीच रहता आया है।
where ever'"' that means 'g' ga ga please it is a font praoblem
-एक दिन में 0.13 फीट की रफ्तार से कम हो रहा है पानी
- आवक 15 हजार क्यूसिक से कम हो 14 हजार पर आई 17 हजार क्यूसिक से ज्यादा पानी छोड़ा जा रहा है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
144 वर्ग मील में फैले उत्तर भारत के सबसे बड़े और 1700 फीट ऊंचे भाखड़ा बांध की गोविन्द साग र झील में पानी खतरे के निशान 1680 फीट सेे ठीक नीचे आ गया है। बांध में यों तो 1690 फीट तक पानी भरा जा सकता है लेकिन बांध के निर्माता इंजीनियरों ने इसका खतरे का निशान कुल क्षमता से पांच फीट नीचे 1685 फीट तय किया पर अब इसकी उम्र को देखते हुए बांध में 1680 फीट का नया पैमाना तय कर लिया गया है।
प्राकृति ने हालांकि इस साल बाढ़ के रूप में कहर भी ढाया है पर बांध में पानी का खरीफ सीजन के अंत होने तक अपने चरम पर बने रहना तीन राज्यों के किसानों, दिल्ली की जनता व बिजली का प्रबंध करने वालों के लिए अच्छी खबर है। बांध में पानी की लगातार मानिटरिंग करने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के अधिकारियों अनुसार शनिवार को जल स्तर 1680.14 पर था जो रविवार को 1680.01 पर आ गया और अब खतरे के निशान से ठीक नीचे है।
बांध में पानी की आवक एक दिन में 15483 क्यूसिक से कम हो कर 14977 क्यूसिक पर आ गई है। हालांकि बांध से पानी छोड़े जाने कर रफ्तार में कमी आने वाले दिनों में की जानी तय है। फिलहाल बांध से 17714 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा है, डिसचार्ज में नाममात्र की ही कमी की गई है।
दिलचस्प है कि बीते साल आज ही के दिन 1640 फीट पर था और पानी की आवक 11443 क्यूसिक थी और 11800 क्यूसिक पानी छोड़ा जा रहा था। पावरकॉम के अधिकारी बताते है कि सर्दियों में बिजली बनाने पानी का कम से कम प्रयोग करने का प्रयास होगा जबकि पानी को अगले साल गर्मियों के लिए संभाला जाएगा राज्य में कम मांग के चलते बंद की गई लहरा मुहब्बत की एक यूनिट को अब चालू कर लिया गया है यद्यपि दो अन्य यूनिट भी बंद पड़े है। सर्दियों में थर्मल प्लांटों पर ही अधिक निर्भरता रखी जाएगी
आम तौर पर बांध में जलस्तर बढऩे का सिलसिला भराव सीजन 15 सितंबर को समाप्त होने के साथ थम जाता है लेकिन इस साल पानी को सीमित रखने के लिए मशक्कत करनी पड़ी।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड ने लंबे अनुभव के बाद बनाए बैंच मार्क अनुसार भाखड़ा बांध में एक अग स्त को 1650 फीट और 15 अ"स्त को 1670 फीट और 31 अगस्त को 1680 फीट पानी हो सकता है। और यह आंकड़ा ठीक दो महीने बाद भी दिखाई देना सुखद अहसास की श्रेणी में रखा जा रहा है।
बांध में जल भराव के 1975 से अब तक के आंकड़े गवाह है कि पानी सिर्फ चार बार ही खतरे के निशान 1685 फीट को पार कर पाया है। बांध में पिछले 35 सालों में आए पानी में सर्वाधिक का रिकार्ड 1988 में 1687.55 फीट का है लेकिन तारीख के मामले में यह 13 सितंबर को हो पाया, यानि भराव सीजन समाप्त होने से ठीक दो दिन पहले। इसके अलावा 1975-76 में 1687.36 फीट, 1983-84 में 1686.01 फीट, 1978-79 में 1685.96 फीट मापा गया है। बांध में पानी ने 1680 का जल स्तर अब तक इसके अलावा सात बार छू चुका है। 2005-06 में पानी 1681.40 तब हुआ जब इससे ठीक एक साल पहले 2004-05 में पानी ने सबसे निचला रिकार्ड 1600.82 फीट का बनाया था। साधारणतय झील में पानी 1650 से 1680 फीट के बीच रहता आया है।
where ever'"' that means 'g' ga ga please it is a font praoblem
Saturday, 16 October 2010
Hindi with Devnagari script.written by Shaheed Bahagt Singh
[The Punjab Hindi Sahitya Sammelan had organised an essay competition on the above subject in 1923. It was for that competition that Bhagat Singh wrote this article. The General Secretary of Sahitya Sammelan, Shri Bhim Sen Vidyalankar (now expired) liked the article much and preserved it. Bhagat Singh got a prize of Rs. 50 for this article. Subsequently, it was published in Hindi Sandesh on February 28, 1933]
The article is for the imporatnce of common language for entire India i.e. Hindi with Devnagari script.
Language and Script*
"AN ACQUAINTANCE OF THE LITERATURE OF A society or a country is of prime importance for the understanding of that society or country, because the consciousness of the soul of a society or country, because the consciousness of the soul of a society gets reflected in its literature also." History is witness to the authenticity of the above statement. Countries have followed the direction determined by the flow of their literature. Every nation needs literature of high quality for its own upliftment. As literature of a country attains new heights, the country also develops. Patriots - be they merely social reformers or political leaders-pay highest attention to the literature of their country. If they do not create new literature to meet the requirements of the contemporary issues and situations, all of their efforts will fail and their work will prove unstable.
Perhaps Garibaldi could not have succeeded in mobilising the army with such ease if Mazzini had not invested his thirty years in his mission of cultural and literary renaissance. The revival of Irish language was attempted with the same enthusiasm along with the renaissance in Ireland. The rulers so much wanted to suppress their language for the ultimate suppression of the Irish people that even kids were punished for the crime of keeping a few verses in Gaelic. The French revolution would have been impossible without the literature of Rousseau and Voltaire. Had Tolstoy, Karl Marx and Maxim Gorky not invested years of their lives in the creation of a new literature, Russian revolution would not have taken place, leave alone the propagation and practice of communism.
The same applies to the social and religious reformers. Kabir's ideas have a stable impact because of his literature. Till date, the sweetness and sensitivity of his poems prove captivating to the people.
Exactly the same can be said about Guru Nanak Devji, When the Sikh Gurus started establishing their new order along with the preaching of their beliefs, they felt the need of a new literature and this inspired Guru Angad Devji to evolve the Gurumukhi script. Centuries of continuous warfare and Muslim invasions had dried up the literature of Punjab. The Hindi language was at the verge of extinction. He adopted the Kashmiri script in his search for an Indian language. They took a far-reaching and useful step in this act of creating their own script and literature to perpetuate their beliefs.
Afterwards, as situations changed, the flow of literature also changed. The ceaseless sacrifices and sufferings of the Gurus changed the situation. Whereas we find devotion and self-oblivion in the preaching of the first Guru, and experience a sense of self-effacement.
After his sacrifice, suddenly, we sense a warrior spirit in the preaching of Guru Gobind Singhji. When he realised that a mere spiritual devotion could not do anything, he started Chandi worship and turned Sikh community into a community of worshippers and warriors by synthesising spiritualism and fighting.
And then suddenly, the sword-worship starts.
Carrying the same spirit Baba Banda and other fought Muslim ruler ceaselessly. We find later that when Sikhs are reduced to mere groups of anarchists, declared outlaws, and were continuously compelled to be confined to the forests, no new literature could be created. They had a warrior spirit, a sense of courage and sacrifice and a spirit to continue their war against Muslim rulers, but they could not chalk out their future beyond this . this explains why these warrior groups fought among themselves. It is here that their lack of contemporary spirit worries us. If a warrior and shrewd ruler like Ranjit singh had not emerged afterwards, Sikhs would have gone down bereft of any high ideal or spirit to have mobilised them.
Along with all this, one more point deserves attention. All the Sanskrit literature, put together, failed to revive the Hindu society; new literature had to be written in a contemporary modern language. Till date, we feel only the effect which was created by that literature of contemporary spirit. Even for a person of proper education and comprehension, the hymns of unintelligible Sanskrit and ayats of classical Arabic cannot be as enthusing as is possible by the simple statements in a simple language.
Language is the primary need of literature and this is absent in Punjab. In spite of releasing this handicap for long, the question of language has still remained unresolved. The main reason behind this is the unfortunate communalisation of language in our province, in other provinces, we find that Muslims have fully adopted their provincial languages. In the literary world of Bengal. Poet Nazrul-Islam is a shining star. Latif Hussain 'Natwar' is prominent among the Hindi poets . the same is true of Gujrat also.
But Punjab is unfortunate. Here ,even Hindus and Sikhs are not united, leave the Muslims alone.
Punjabi should have been the language of Punjab, like other provinces, but since this has not happened, as this question is a spontaneous question, Muslims have adopted Urdu. Muslims totally lack Indianness, therefore they want to prorogate Arabic script and Persian language. While failing to understand the importance of Indianness in the whole of India, they fail to understand the importance of one language, which could only be Hindi. That is why they keep repeating the demand for Urdu like a parrot and take an isolated position.
Then comes the turn of the Sikhs. Their whole literature is in the Gurumukhi script. Hindi is very there as a component, but Punjabi constitutes the main component. Therefore, the Sikhs adopted Punjabi written in Gurmukhi as their language. They could not leave that at any cost. They embraced that by making it a communal language.
The Arya Samaj emerged on the other side. Swami Dayanand propagated the feeling for the spread of Hindi throughout Bharatvarsha. Hindi became a religious component of the Arya Samaj movement. These religion attachment benefited the language in one way. That is , while Sikh staunchness secured Punjabi, the insistence of Arya Samajists helped Hindi secure a place of its own.
In the early days of Arya Samaj movement, the Sikhs and Arya Samajists used to have religious gathering at the same place. At that time they had no feelings of being different, but afterwards, a few sentences of Satyartha Prakash caused malice and mutual hatred. The Sikhs, swept in the same stream, started hating even Hindi as well. Other did not take even notice of it.
Afterwards, it is said, an Samaji leader, Mahatma Hansrajji held consultations with many leaders and proposed that if they accept the Hindi script, he would get the Punjabi language in Hindi script, he would get the Punjabi language in Hindi script reognised in the University. But they could not understand the importance of this proposal because of their narrow-mindedness and absence of literary awareness. At this moment, three views prevail in Punjab. Firstly, there is strong attachment for urdu among the Muslims; secondly, for Hindi among Arya Samajis and certain other Hindus; and thirdly, for Punjabi.
It will not be important here to deal with all the languages one by one. First of all, we shall consider the Muslims view. They are staunch supporters of Urdu. At the present time, this language is dominant in Punjab. This is also the language of the court. Then some Muslims say that Urdu scripts saves space. This may be quite right, but the most important question before us at this juncture is to make India a unified nation, but this cannot be done all at once. For this we have to move step by step. If we cannot adopt one language for the whole of India at the moment, we should at least adopt one script. The urdu script cannot be called a perfect one and the most important point is that it is based on the Persian language. The flights of imagination of urdu poets- even if they are hindi (Indian)- reach the saaqis (bar-maids) of Persia and date palms of the Arbs countries. Kazi Nazrul-Islam's poems refer to Dhurjate.vishwamitra and Durvasa quite frequently, but our Punjabi Hindi-Urdu poets could not even think of them. Is it not a matter which makes one sad? Their ignorance of Indianness and Indian literature is the main reason of this. When they cannot imbibe Indianness, how can their literature make us Indian? Students confined to the study of urdu cannot attain the knowledge of the classical literature of India. It is not that these texts cannot be translated into a literary language like urdu, but it will be usefull only to a persian in hia pursuit concerning Indian literature.
It will Suffice to say in support of the above statement that when simple words like Arya and Swarajya are written as 'Ariya' and ;swarajia', what will happen to the deep metaphysical topics? Only a few days back, a government translator, using the urdu script, mistook sage Nachiketa as 'neechi Kutia' which can be translated as a `bitch of low origin', while translating an Urdu book Qaumen kis Tarah Zinda Rah Sakti Hain(How nationalities can survive) by Lala Hardayalji, M.A . it was neither Lalaji's fault nor the translator. It was only a shortcoming of the Urdu script and the dissimilarity between Urdu and Hindi languages and literature.
Indian languages and script prevail in the rest of India. In such a situation, should we get absolutely isolated from India point is that, among Muslim writers, the staunch supporters of Urdu write highly Persianised Urdu. The Muslim newspapers like Zamindar and Siyasat have strong Arabic influence which is quite incomprehensible to common people. How can this be propagated in such a situation? We wish our Muslim brothers, while sticking to their religion, think of Indianising themselves like Kamal the Turk. India's salvation is possible only that way. Instead of making language a communal question, we should adopt a wide perspective.
We will now return to the problem of Hindi and Punjabi. Many idealists entertain a vision of the world turned into one single nation, one global nation. This ideal is beautiful and one should keep it before oneself. But this cannot be achieved today; all of our steps, all of our efforts should be directed towards enhancement of happiness by uniting all nationalities, countries and nations into one strong bond. Before that, we have to realise that ideal in our own country. We have to adopt one language, one script, one literature, one ideal and one nation, but the adoption of a single language precedes all the other unites, so they we can communicate with and comprehend each other. A Punjabi and a Madrasi must not sit together mute at a gathering, but try to communicate their ideas and emotions, and this should be done in our own language, Hindi, rather than in an alien language like English. Even this ideal will take years to be realised. First of all, we should create literary awareness in this endeavor, not among a few but in the masses. The people's own language is essential for creating literary awareness among the people. On the basis of this logic, we say that you can succeed in Punjab only in Punjabi language.
Till now, Punjabi has not been able to become a literary language of the central Punjab, which is written in the Gurmukhi script, is now Known as Punjabi. It is neither widely prevalent nor has any literature or scientific significance. It was left unattended earlier, but even now the deficiency of its script disturbs those who now attending to it. All the words, cannot ending without the sound ' a') and its inability to write compound letter; even the word 'Poorna'(complete) cannot be written. This script is thus even more incomplete than Urdu, but when we already have a scientific and perfect Hindi script, what is there to feel hesitant about adopting it? The Gurmukhi script is only distorted form of the Hindi script. Right from the start All the rules are same, then. How much will we be benefited by our immediate switch over to this. The Punjabi language will start developing immediately by adopting this perfect script. And there is ni problem in its problem in its propagation. Hindu women of Punjab already know this script. The DAV school and Sanatan Dharma schools teach only in Hindi, what could be the problem in such a situation? We shall plead with the supporters of Hindi that, ultimately and certainly, only Hindi will be the language of the whole Bharat, but it will be more convenient to propagate it from now on. Punjabi will become like Hindi by adopting the script and then all the differences will disappear; and it is desirable, too that common people could be educated which is possible only through our own language in our own script. See this Punjabi poem:
O rahiya rahe jandya, sun ja gall meri
Sir to pag tere balait di, ihnun fuk muatara la.
(o passer by, listen to me.Burn that foreign turban Which thou art wearing on thy head, And take to 'Muatara'.)
Even beautiful Hindi poems cannot cast an impression comparable to this, as they have not yet made a place right in the hearts of the people. They still seem somewhat alien. It is so because Hindi is based on Sanskrit. And the Punjab has gone farther away from that. Persian has maintained its dominance in Punjab to a large extent. For example, a collection of things become 'cheezan' here instead of 'cheezain'. This principle prevails throughout. What is being emphasised here is that Hindi is still far from Punjabi heart in spite of being close to Punjabi; of course, Punjabi will come closer to Hindi when it will adopt the Hindi script attempt creating its literature.
By now almost every major issue has been discussed here. Only one thing now remains to be said. Many people argue that the Punjabi language lacks sweetness, beauty and emotions. This is absolutely baseless. Only recently the sweetness, beauty and emotions. This is absolutely baseless. Only recently the sweetness of this song hypnotised Kavindra Ravindra:
Lachhiye, jitthe tu pani doliya,
Utthe ug paye sandal de boote.
( o Lachhi, where you split water at that place sandlewood trees have sprouted.)
many more examples could be cited. Is the following couplet even the least inferior to the poems of any other language?
Pipal de pattya ve kehi khadkhad layee ae,
Patte jhade purane hun rut navayan di aayee ae.
(Pipal leaves, why are you making noise?
The old leaves have fallen and the season for new leaves has come.)
And when Punjab is sitting alone or in the group, will any other language move them to the extent these lines of Gauhar can:
Lam lakkhan to karoran de shah vekhe
Na musafiran koi udhar dende,
Dine raatin de kuch dere,
Na unhan gulan di vasana te
Bhauren bahande gulan di vasana te
Na sappan de muhan te koi pyar denda,
Gauhar same salook han jyuadya de
Moyan giyan un tar koi visar denda.
(i have seen armies of lakhs of millionaires. No one gives loan to the passers-by who never stay, never reside at one place. No one trust them. Black - beetles sit on flowers because of their smell. No one gives love at the hoods of the snakes. O Gauhar, good behavior and welcome is for those who are alive, but everyone says good-bye at the time of death.)
Jeev jyudiyan nu kyon marna ae
Jekar nahintu moyan nn jiaun joga,
Ghar aaye sawali nu kyon ghurna ae
Jekar nahin tu hatthin khair joga;
Mile dilan tu bichhadyan nu milaun joga,
Gauhar barhiya rakh band khaane
Jekar nahin tu nekiyan kumaun joga.
(why kill living beings when you are not able bring the dead back to life? Why do you stare at the beggar who has come to your door when you are not able to give him something? Why break the union of hearts if you are not able to reunite hearts that are separated? O Gauhar, if you cannot do go to others, then keep your good food and room closed.)
And now -a-days brilliant poets like Dard, Mastana, Dewana are enriching the Punjabi's poetry.
It is a pity that such a sweet, such a captivating language has not been adopted even by the Punjabis themselves. They still refuse; and this is the crux of the problem. Everyone backs his arguments on the basis of religious convictions. The only problem concerning the language and script of Punjab is to remove this obstruction, but the hope lies in the increasing literary awareness among the sikhs. Hindu also have it. Why not at all well-meaning people decide by mutual deliberations? This is the only way to arrive at a solution. The question can attended to by renouncing religious considerations. It should be attempled accordingly and the recognition of Punjabi language of a journal like Prem of Amritsar. This way the problem is resolved. After the elimination of this irritant, Punjab will have such beautiful and 'quality' literature that it will also be counted among the good language of India.
The article is for the imporatnce of common language for entire India i.e. Hindi with Devnagari script.
Language and Script*
"AN ACQUAINTANCE OF THE LITERATURE OF A society or a country is of prime importance for the understanding of that society or country, because the consciousness of the soul of a society or country, because the consciousness of the soul of a society gets reflected in its literature also." History is witness to the authenticity of the above statement. Countries have followed the direction determined by the flow of their literature. Every nation needs literature of high quality for its own upliftment. As literature of a country attains new heights, the country also develops. Patriots - be they merely social reformers or political leaders-pay highest attention to the literature of their country. If they do not create new literature to meet the requirements of the contemporary issues and situations, all of their efforts will fail and their work will prove unstable.
Perhaps Garibaldi could not have succeeded in mobilising the army with such ease if Mazzini had not invested his thirty years in his mission of cultural and literary renaissance. The revival of Irish language was attempted with the same enthusiasm along with the renaissance in Ireland. The rulers so much wanted to suppress their language for the ultimate suppression of the Irish people that even kids were punished for the crime of keeping a few verses in Gaelic. The French revolution would have been impossible without the literature of Rousseau and Voltaire. Had Tolstoy, Karl Marx and Maxim Gorky not invested years of their lives in the creation of a new literature, Russian revolution would not have taken place, leave alone the propagation and practice of communism.
The same applies to the social and religious reformers. Kabir's ideas have a stable impact because of his literature. Till date, the sweetness and sensitivity of his poems prove captivating to the people.
Exactly the same can be said about Guru Nanak Devji, When the Sikh Gurus started establishing their new order along with the preaching of their beliefs, they felt the need of a new literature and this inspired Guru Angad Devji to evolve the Gurumukhi script. Centuries of continuous warfare and Muslim invasions had dried up the literature of Punjab. The Hindi language was at the verge of extinction. He adopted the Kashmiri script in his search for an Indian language. They took a far-reaching and useful step in this act of creating their own script and literature to perpetuate their beliefs.
Afterwards, as situations changed, the flow of literature also changed. The ceaseless sacrifices and sufferings of the Gurus changed the situation. Whereas we find devotion and self-oblivion in the preaching of the first Guru, and experience a sense of self-effacement.
After his sacrifice, suddenly, we sense a warrior spirit in the preaching of Guru Gobind Singhji. When he realised that a mere spiritual devotion could not do anything, he started Chandi worship and turned Sikh community into a community of worshippers and warriors by synthesising spiritualism and fighting.
And then suddenly, the sword-worship starts.
Carrying the same spirit Baba Banda and other fought Muslim ruler ceaselessly. We find later that when Sikhs are reduced to mere groups of anarchists, declared outlaws, and were continuously compelled to be confined to the forests, no new literature could be created. They had a warrior spirit, a sense of courage and sacrifice and a spirit to continue their war against Muslim rulers, but they could not chalk out their future beyond this . this explains why these warrior groups fought among themselves. It is here that their lack of contemporary spirit worries us. If a warrior and shrewd ruler like Ranjit singh had not emerged afterwards, Sikhs would have gone down bereft of any high ideal or spirit to have mobilised them.
Along with all this, one more point deserves attention. All the Sanskrit literature, put together, failed to revive the Hindu society; new literature had to be written in a contemporary modern language. Till date, we feel only the effect which was created by that literature of contemporary spirit. Even for a person of proper education and comprehension, the hymns of unintelligible Sanskrit and ayats of classical Arabic cannot be as enthusing as is possible by the simple statements in a simple language.
Language is the primary need of literature and this is absent in Punjab. In spite of releasing this handicap for long, the question of language has still remained unresolved. The main reason behind this is the unfortunate communalisation of language in our province, in other provinces, we find that Muslims have fully adopted their provincial languages. In the literary world of Bengal. Poet Nazrul-Islam is a shining star. Latif Hussain 'Natwar' is prominent among the Hindi poets . the same is true of Gujrat also.
But Punjab is unfortunate. Here ,even Hindus and Sikhs are not united, leave the Muslims alone.
Punjabi should have been the language of Punjab, like other provinces, but since this has not happened, as this question is a spontaneous question, Muslims have adopted Urdu. Muslims totally lack Indianness, therefore they want to prorogate Arabic script and Persian language. While failing to understand the importance of Indianness in the whole of India, they fail to understand the importance of one language, which could only be Hindi. That is why they keep repeating the demand for Urdu like a parrot and take an isolated position.
Then comes the turn of the Sikhs. Their whole literature is in the Gurumukhi script. Hindi is very there as a component, but Punjabi constitutes the main component. Therefore, the Sikhs adopted Punjabi written in Gurmukhi as their language. They could not leave that at any cost. They embraced that by making it a communal language.
The Arya Samaj emerged on the other side. Swami Dayanand propagated the feeling for the spread of Hindi throughout Bharatvarsha. Hindi became a religious component of the Arya Samaj movement. These religion attachment benefited the language in one way. That is , while Sikh staunchness secured Punjabi, the insistence of Arya Samajists helped Hindi secure a place of its own.
In the early days of Arya Samaj movement, the Sikhs and Arya Samajists used to have religious gathering at the same place. At that time they had no feelings of being different, but afterwards, a few sentences of Satyartha Prakash caused malice and mutual hatred. The Sikhs, swept in the same stream, started hating even Hindi as well. Other did not take even notice of it.
Afterwards, it is said, an Samaji leader, Mahatma Hansrajji held consultations with many leaders and proposed that if they accept the Hindi script, he would get the Punjabi language in Hindi script, he would get the Punjabi language in Hindi script reognised in the University. But they could not understand the importance of this proposal because of their narrow-mindedness and absence of literary awareness. At this moment, three views prevail in Punjab. Firstly, there is strong attachment for urdu among the Muslims; secondly, for Hindi among Arya Samajis and certain other Hindus; and thirdly, for Punjabi.
It will not be important here to deal with all the languages one by one. First of all, we shall consider the Muslims view. They are staunch supporters of Urdu. At the present time, this language is dominant in Punjab. This is also the language of the court. Then some Muslims say that Urdu scripts saves space. This may be quite right, but the most important question before us at this juncture is to make India a unified nation, but this cannot be done all at once. For this we have to move step by step. If we cannot adopt one language for the whole of India at the moment, we should at least adopt one script. The urdu script cannot be called a perfect one and the most important point is that it is based on the Persian language. The flights of imagination of urdu poets- even if they are hindi (Indian)- reach the saaqis (bar-maids) of Persia and date palms of the Arbs countries. Kazi Nazrul-Islam's poems refer to Dhurjate.vishwamitra and Durvasa quite frequently, but our Punjabi Hindi-Urdu poets could not even think of them. Is it not a matter which makes one sad? Their ignorance of Indianness and Indian literature is the main reason of this. When they cannot imbibe Indianness, how can their literature make us Indian? Students confined to the study of urdu cannot attain the knowledge of the classical literature of India. It is not that these texts cannot be translated into a literary language like urdu, but it will be usefull only to a persian in hia pursuit concerning Indian literature.
It will Suffice to say in support of the above statement that when simple words like Arya and Swarajya are written as 'Ariya' and ;swarajia', what will happen to the deep metaphysical topics? Only a few days back, a government translator, using the urdu script, mistook sage Nachiketa as 'neechi Kutia' which can be translated as a `bitch of low origin', while translating an Urdu book Qaumen kis Tarah Zinda Rah Sakti Hain(How nationalities can survive) by Lala Hardayalji, M.A . it was neither Lalaji's fault nor the translator. It was only a shortcoming of the Urdu script and the dissimilarity between Urdu and Hindi languages and literature.
Indian languages and script prevail in the rest of India. In such a situation, should we get absolutely isolated from India point is that, among Muslim writers, the staunch supporters of Urdu write highly Persianised Urdu. The Muslim newspapers like Zamindar and Siyasat have strong Arabic influence which is quite incomprehensible to common people. How can this be propagated in such a situation? We wish our Muslim brothers, while sticking to their religion, think of Indianising themselves like Kamal the Turk. India's salvation is possible only that way. Instead of making language a communal question, we should adopt a wide perspective.
We will now return to the problem of Hindi and Punjabi. Many idealists entertain a vision of the world turned into one single nation, one global nation. This ideal is beautiful and one should keep it before oneself. But this cannot be achieved today; all of our steps, all of our efforts should be directed towards enhancement of happiness by uniting all nationalities, countries and nations into one strong bond. Before that, we have to realise that ideal in our own country. We have to adopt one language, one script, one literature, one ideal and one nation, but the adoption of a single language precedes all the other unites, so they we can communicate with and comprehend each other. A Punjabi and a Madrasi must not sit together mute at a gathering, but try to communicate their ideas and emotions, and this should be done in our own language, Hindi, rather than in an alien language like English. Even this ideal will take years to be realised. First of all, we should create literary awareness in this endeavor, not among a few but in the masses. The people's own language is essential for creating literary awareness among the people. On the basis of this logic, we say that you can succeed in Punjab only in Punjabi language.
Till now, Punjabi has not been able to become a literary language of the central Punjab, which is written in the Gurmukhi script, is now Known as Punjabi. It is neither widely prevalent nor has any literature or scientific significance. It was left unattended earlier, but even now the deficiency of its script disturbs those who now attending to it. All the words, cannot ending without the sound ' a') and its inability to write compound letter; even the word 'Poorna'(complete) cannot be written. This script is thus even more incomplete than Urdu, but when we already have a scientific and perfect Hindi script, what is there to feel hesitant about adopting it? The Gurmukhi script is only distorted form of the Hindi script. Right from the start All the rules are same, then. How much will we be benefited by our immediate switch over to this. The Punjabi language will start developing immediately by adopting this perfect script. And there is ni problem in its problem in its propagation. Hindu women of Punjab already know this script. The DAV school and Sanatan Dharma schools teach only in Hindi, what could be the problem in such a situation? We shall plead with the supporters of Hindi that, ultimately and certainly, only Hindi will be the language of the whole Bharat, but it will be more convenient to propagate it from now on. Punjabi will become like Hindi by adopting the script and then all the differences will disappear; and it is desirable, too that common people could be educated which is possible only through our own language in our own script. See this Punjabi poem:
O rahiya rahe jandya, sun ja gall meri
Sir to pag tere balait di, ihnun fuk muatara la.
(o passer by, listen to me.Burn that foreign turban Which thou art wearing on thy head, And take to 'Muatara'.)
Even beautiful Hindi poems cannot cast an impression comparable to this, as they have not yet made a place right in the hearts of the people. They still seem somewhat alien. It is so because Hindi is based on Sanskrit. And the Punjab has gone farther away from that. Persian has maintained its dominance in Punjab to a large extent. For example, a collection of things become 'cheezan' here instead of 'cheezain'. This principle prevails throughout. What is being emphasised here is that Hindi is still far from Punjabi heart in spite of being close to Punjabi; of course, Punjabi will come closer to Hindi when it will adopt the Hindi script attempt creating its literature.
By now almost every major issue has been discussed here. Only one thing now remains to be said. Many people argue that the Punjabi language lacks sweetness, beauty and emotions. This is absolutely baseless. Only recently the sweetness, beauty and emotions. This is absolutely baseless. Only recently the sweetness of this song hypnotised Kavindra Ravindra:
Lachhiye, jitthe tu pani doliya,
Utthe ug paye sandal de boote.
( o Lachhi, where you split water at that place sandlewood trees have sprouted.)
many more examples could be cited. Is the following couplet even the least inferior to the poems of any other language?
Pipal de pattya ve kehi khadkhad layee ae,
Patte jhade purane hun rut navayan di aayee ae.
(Pipal leaves, why are you making noise?
The old leaves have fallen and the season for new leaves has come.)
And when Punjab is sitting alone or in the group, will any other language move them to the extent these lines of Gauhar can:
Lam lakkhan to karoran de shah vekhe
Na musafiran koi udhar dende,
Dine raatin de kuch dere,
Na unhan gulan di vasana te
Bhauren bahande gulan di vasana te
Na sappan de muhan te koi pyar denda,
Gauhar same salook han jyuadya de
Moyan giyan un tar koi visar denda.
(i have seen armies of lakhs of millionaires. No one gives loan to the passers-by who never stay, never reside at one place. No one trust them. Black - beetles sit on flowers because of their smell. No one gives love at the hoods of the snakes. O Gauhar, good behavior and welcome is for those who are alive, but everyone says good-bye at the time of death.)
Jeev jyudiyan nu kyon marna ae
Jekar nahintu moyan nn jiaun joga,
Ghar aaye sawali nu kyon ghurna ae
Jekar nahin tu hatthin khair joga;
Mile dilan tu bichhadyan nu milaun joga,
Gauhar barhiya rakh band khaane
Jekar nahin tu nekiyan kumaun joga.
(why kill living beings when you are not able bring the dead back to life? Why do you stare at the beggar who has come to your door when you are not able to give him something? Why break the union of hearts if you are not able to reunite hearts that are separated? O Gauhar, if you cannot do go to others, then keep your good food and room closed.)
And now -a-days brilliant poets like Dard, Mastana, Dewana are enriching the Punjabi's poetry.
It is a pity that such a sweet, such a captivating language has not been adopted even by the Punjabis themselves. They still refuse; and this is the crux of the problem. Everyone backs his arguments on the basis of religious convictions. The only problem concerning the language and script of Punjab is to remove this obstruction, but the hope lies in the increasing literary awareness among the sikhs. Hindu also have it. Why not at all well-meaning people decide by mutual deliberations? This is the only way to arrive at a solution. The question can attended to by renouncing religious considerations. It should be attempled accordingly and the recognition of Punjabi language of a journal like Prem of Amritsar. This way the problem is resolved. After the elimination of this irritant, Punjab will have such beautiful and 'quality' literature that it will also be counted among the good language of India.
Friday, 15 October 2010
राज्य के एक तिहाई पुल बठिंडा क्षेत्र में
45 में से नौ पूरे हुए, नौ पर काम चालू, शेष योजना में, कुछ का अध्यन तो कुछ के टैंडर मांगे
हमने अपना काम किया अब रेलवे की बारी, बजट से उम्मीदें : ढ़ीढ़सा
भूपेश चट्ठा पटियाला:
राजनीती की मूल परिभाषा है कि योग्य व्यक्ति को हटा कर उसके स्थान पर अपने बंदे को बिठाना है आजकल इसमें उसको योग्य साबित करना भी जुड़ गया है। पंजाब में दोनों राजनीतिक दल करते भी कुछ ऐसा ही रहे है कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में बनी पिछली कांग्र्रेस सरकार में जितने रेलवे ओवर ब्रिजों पर काम शुरू हुआ, वे लगभग सभी कांग्र्रेसियों के चुनाव क्षेत्रों को ध्यान में रख कर बने। ठीक इसी रास्ते पर शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार चल निकली है।
कांग्र्रेस की तुलना में अकाली-भाजपा सरकार तीन गुना पुल राज्य में बनवाने जा रही है। इनमें से इक्का-दुक्का पुलों का एक हिस्सा किसी कांग्र्रेसी विधानसभा क्षेत्र में संभवत: उतरता हो इससे इनकार नहीं है, लेकिन बंटवारा पूरी तरह से पार्टी लाइन को ध्यान में रखकर किया गया है। इन आरओबी का नाम ही स्पष्ट कर देता है। इतना ही नहीं विकास का बड़ा हिस्सा उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर के लोकसभा क्षेत्र बठिंडा के खाते में आया है। इस क्षेत्र में दस आरओबी व अंडर ब्रिज प्रस्तावित हैं। दिलचस्प है कि बठिंडा शहर में परसराम नगर व मुलतानियां में दो पुल चल रहे हैं। मानसा फाटक व डबवाली की ओर दो पर काम चल रहा है। शहर में अंडर ब्रिज भी हैं।
राज्य में बिकने वाले पेट्रोल पर लगने वाले अतिरिक्त कर से होने वाली आमदनी से पंजाब इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड राज्य में मूलभूत ढांचागत सुविधाओं का निर्माण करवाता है। 25 से 30 करोड़ रुपये के खर्च वाला एक आरओबी का निर्माण अगर लोक निर्माण विभाग करवाता है तो बिल्ट आन आपरेट का सिद्धांत जुड़ जाता है। यानी पुल की लागत बाद में वसूली जाती है।
वहीं पीआईडीबी की ओर से प्रदेश में चल रहे आरओबी पर फाइलें बोलती हैं कि नौ आरओबी को वर्तमान सरकार ने चालू किया है। इनमें दो धूरी, एक लहरागागा, फगवाड़ा, पटियाला, दसूहा, अबोहर, व सुच्ची मंडी शामिल हैं। जबकि जिन आरओबी पर काम चल रहा है, उनमें तीन बठिंडा, एक-एक मानसा, मलोट, डबवाली रोड, गिद्दड़बाहा, बीबीपुर फाटक के पास सूरानासी (बठिंडा) के नाम शामिल हैं। तलवंडी साबो रोड पर बनने वाले आरओबी की फिजीबिल्टी रिपोर्ट मांगी गई है।
राज्य में बनने वाले, योजना में शामिल करीब 36 आरओबी व अंडर ब्रिजों में कुछ का सर्वेक्षण जारी है तो कुछ के टेंडर मांग लिए गए हैं। इनमें एक धूरी, मकसूदां (जालंधर शहर), खालसा कालेज (जालंधर), टांडा, अमृतसर में ज्वाला फ्लोर मिल के पास, ब्लास, बटाला, मोरिंडा बाइपास, जगरांव, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर के अलावा समराला रोड पैल, एसडी कालेज के पास बरनाला, ललहोड़ी रोड खन्ना, फिल्लौर रोड बंगा, मुकेरियां, रायकोट रोड मलेरकोटला, भीखी रोड अमृतसर, शंभू यार्ड, रतिया रोड वुडलाडा, छजली के निकट सुनाम, गोरेना रोड जाखल, अनाज मंडी पास सुनाम, साइंस सिटी कपूरथला व गोबिंदगढ़ के नाम प्रमुख हैं।
राज्य में बन रहे ओवर ब्रिज पर लोक निर्माण मंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा कहते हैं कि दस के करीब और योजना में हैं। कइयों पर हमने अपना काम पूरा कर दिया है। अब रेलवे की बारी है। उन्होंने अपना हिस्सा बनाना है। वे कहते हैं कि रेलवे से उपमुख्यमंत्री व मुख्यमंत्री ने भी बार-बार गुहार लगाई है कि राज्य में ट्रैफिक की स्थित को सुधारने पुलों का निर्माण जल्दी निपटाया जाए। ढींडसा कहते हैं कि उन्हें रेलवे बजट से खासी उम्मीदें हैं। वहीं बठिंडा के नाम आरओबी की संख्या अधिक होने के सवाल पर वे कहते हैं कि मालवा क्षेत्र पिछड़ा हुआ है और सरकार की जिम्मेदारी पूरे प्रदेश का विकास करने की है।
हमने अपना काम किया अब रेलवे की बारी, बजट से उम्मीदें : ढ़ीढ़सा
भूपेश चट्ठा पटियाला:
राजनीती की मूल परिभाषा है कि योग्य व्यक्ति को हटा कर उसके स्थान पर अपने बंदे को बिठाना है आजकल इसमें उसको योग्य साबित करना भी जुड़ गया है। पंजाब में दोनों राजनीतिक दल करते भी कुछ ऐसा ही रहे है कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में बनी पिछली कांग्र्रेस सरकार में जितने रेलवे ओवर ब्रिजों पर काम शुरू हुआ, वे लगभग सभी कांग्र्रेसियों के चुनाव क्षेत्रों को ध्यान में रख कर बने। ठीक इसी रास्ते पर शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार चल निकली है।
कांग्र्रेस की तुलना में अकाली-भाजपा सरकार तीन गुना पुल राज्य में बनवाने जा रही है। इनमें से इक्का-दुक्का पुलों का एक हिस्सा किसी कांग्र्रेसी विधानसभा क्षेत्र में संभवत: उतरता हो इससे इनकार नहीं है, लेकिन बंटवारा पूरी तरह से पार्टी लाइन को ध्यान में रखकर किया गया है। इन आरओबी का नाम ही स्पष्ट कर देता है। इतना ही नहीं विकास का बड़ा हिस्सा उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर के लोकसभा क्षेत्र बठिंडा के खाते में आया है। इस क्षेत्र में दस आरओबी व अंडर ब्रिज प्रस्तावित हैं। दिलचस्प है कि बठिंडा शहर में परसराम नगर व मुलतानियां में दो पुल चल रहे हैं। मानसा फाटक व डबवाली की ओर दो पर काम चल रहा है। शहर में अंडर ब्रिज भी हैं।
राज्य में बिकने वाले पेट्रोल पर लगने वाले अतिरिक्त कर से होने वाली आमदनी से पंजाब इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड राज्य में मूलभूत ढांचागत सुविधाओं का निर्माण करवाता है। 25 से 30 करोड़ रुपये के खर्च वाला एक आरओबी का निर्माण अगर लोक निर्माण विभाग करवाता है तो बिल्ट आन आपरेट का सिद्धांत जुड़ जाता है। यानी पुल की लागत बाद में वसूली जाती है।
वहीं पीआईडीबी की ओर से प्रदेश में चल रहे आरओबी पर फाइलें बोलती हैं कि नौ आरओबी को वर्तमान सरकार ने चालू किया है। इनमें दो धूरी, एक लहरागागा, फगवाड़ा, पटियाला, दसूहा, अबोहर, व सुच्ची मंडी शामिल हैं। जबकि जिन आरओबी पर काम चल रहा है, उनमें तीन बठिंडा, एक-एक मानसा, मलोट, डबवाली रोड, गिद्दड़बाहा, बीबीपुर फाटक के पास सूरानासी (बठिंडा) के नाम शामिल हैं। तलवंडी साबो रोड पर बनने वाले आरओबी की फिजीबिल्टी रिपोर्ट मांगी गई है।
राज्य में बनने वाले, योजना में शामिल करीब 36 आरओबी व अंडर ब्रिजों में कुछ का सर्वेक्षण जारी है तो कुछ के टेंडर मांग लिए गए हैं। इनमें एक धूरी, मकसूदां (जालंधर शहर), खालसा कालेज (जालंधर), टांडा, अमृतसर में ज्वाला फ्लोर मिल के पास, ब्लास, बटाला, मोरिंडा बाइपास, जगरांव, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर के अलावा समराला रोड पैल, एसडी कालेज के पास बरनाला, ललहोड़ी रोड खन्ना, फिल्लौर रोड बंगा, मुकेरियां, रायकोट रोड मलेरकोटला, भीखी रोड अमृतसर, शंभू यार्ड, रतिया रोड वुडलाडा, छजली के निकट सुनाम, गोरेना रोड जाखल, अनाज मंडी पास सुनाम, साइंस सिटी कपूरथला व गोबिंदगढ़ के नाम प्रमुख हैं।
राज्य में बन रहे ओवर ब्रिज पर लोक निर्माण मंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा कहते हैं कि दस के करीब और योजना में हैं। कइयों पर हमने अपना काम पूरा कर दिया है। अब रेलवे की बारी है। उन्होंने अपना हिस्सा बनाना है। वे कहते हैं कि रेलवे से उपमुख्यमंत्री व मुख्यमंत्री ने भी बार-बार गुहार लगाई है कि राज्य में ट्रैफिक की स्थित को सुधारने पुलों का निर्माण जल्दी निपटाया जाए। ढींडसा कहते हैं कि उन्हें रेलवे बजट से खासी उम्मीदें हैं। वहीं बठिंडा के नाम आरओबी की संख्या अधिक होने के सवाल पर वे कहते हैं कि मालवा क्षेत्र पिछड़ा हुआ है और सरकार की जिम्मेदारी पूरे प्रदेश का विकास करने की है।
Wednesday, 13 October 2010
मुर्गे को अब गाय का बोवीन हार्मोन
भूपेश चट्ठा , पटियाला
दुधारू पशुओं के प्रजनन के लिए प्रतिबंधित आक्सीटोसीन के टीके लगाकर अधिक दूध प्राप्त करने की शिकायतों के बाद अब मुर्गो का वजन बढ़ाने के लिए उन्हें गाय से बनने वाला बोवीन हार्मोन दिया जाने लगा है। दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार या सरकारी निकायों के पास निजी पोल्ट्री फार्मो में मुर्गो को दी जाने वाली इन दवाओं को रोकने का कोई कानून अथवा नियम नहीं है। इसके चलते राज्य में अभी तक न तो कोई जांच हो पाई है, न ही कोई चालान काटा गया है। राज्य और राज्य के बाहर के पोल्ट्री फार्मो के मालिक जल्द कमाने के लिए मुर्गो पर एस्ट्रोजिन, टेस्ट्रोसिरोन तथा अन्य संबंधित कंपाउंडों का प्रयोग कर रहे हैं। इनसेउत्पन्न हार्मोन से मुर्गो का वजन पहले 10-12 दिनों में इतना बढ़ जाता है कि मुर्गा खुद अपना वजन नहीं उठा पाता। परिणामस्वरूप उसके जोड़ों से ब्लीडिंग होने लगती है। मुर्गो के खून के माध्यम से ये हार्मोस मांसाहारी लोगों के शरीर में जा मिलते हैं। प्रभावित होती है सेक्स क्षमता : महिला रोग विशेषज्ञ डा. मनजीत ने बताया कि इन दवाओं के अधिक मात्रा में सेवन से पुरुषों की सेक्स क्षमता में कमी आ जाती है, जबकि महिलाओं की प्रजनन क्षमता में कमी के साथ-साथ उनके शरीर पर बाल आने लगते हैं। सोशल साइंसेज तथा हेल्थ फोरम के डा. बलजीत सिंह बताते हैं कि चिकन खाने वालों का ब्लड पे्रशर एवं वजन बढ़ने लगता है। इसके संदर्भ में पशुपालन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पोल्ट्री फार्म स्थापित करने वाले व्यक्ति को आरंभ में ही सभी प्रकार की जानकारी दे दी जाती है। फीड के सैंपल प्रयोगशालाओं से पास होने के बाद ही फीड दी जाती है। जांच के अधिकार नहीं : डा. बलजीत सिंह के अनुसार, निजी पोल्ट्री फार्मो में मुर्गो को कौन से हार्मोस दिए जा रहे हैं, इसकी जांच का अधिकार पोल्ट्री इंस्पेक्टर के पास भी नहीं है। पटियाला के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) का कहना है कि वह चिकन के बाजार में आने के बाद साफ-सफाई को ध्यान में रखकर बेचने के आदेश दे सकते हैं, लेकिन पोल्ट्री फार्मो की जांच करने के अधिकार उनके पास नहीं हैं। इस विषय पर नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी डा. बांगा कहते हैं कि मुर्गो को दी जाने वाली इन दवाओं को रोकने का कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है। दुधारू पशुओं को प्रजनन के आक्सीटोसीन के टीके लगाने तथा बेचने पर प्रतिबंध जरूर है। वे हैं कि पशुपालन विभाग को ही अधिक जानकारी होती है सिविल स्वास्थ्य के महकमे को पशुओं के बारे में पता नहीं होता। राज्य में हर साल खाए जाते हैं 1200 करोड़ से अधिक मुर्गे : केवल पटियाला जोन के चार जिलों में ही, सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 800 से अधिक पोल्ट्री फार्मों में 1.46 करोड़ से अधिक मुर्गे (चिकन) हैं तथा राज्य में 1200 करोड़ से अधिक मुर्गे प्रतिवर्ष खाए जा रहे हैं। वहीं, पोल्ट्री डाइग्नोटीशियन डा. नवदीप कहते हैं कि मुर्गो को कुछ एंटी-बायोटिक जरूर दिए जाते हैं लेकिन हार्मोस का पोल्ट्री फीड में काम नहीं है।
दुधारू पशुओं के प्रजनन के लिए प्रतिबंधित आक्सीटोसीन के टीके लगाकर अधिक दूध प्राप्त करने की शिकायतों के बाद अब मुर्गो का वजन बढ़ाने के लिए उन्हें गाय से बनने वाला बोवीन हार्मोन दिया जाने लगा है। दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार या सरकारी निकायों के पास निजी पोल्ट्री फार्मो में मुर्गो को दी जाने वाली इन दवाओं को रोकने का कोई कानून अथवा नियम नहीं है। इसके चलते राज्य में अभी तक न तो कोई जांच हो पाई है, न ही कोई चालान काटा गया है। राज्य और राज्य के बाहर के पोल्ट्री फार्मो के मालिक जल्द कमाने के लिए मुर्गो पर एस्ट्रोजिन, टेस्ट्रोसिरोन तथा अन्य संबंधित कंपाउंडों का प्रयोग कर रहे हैं। इनसेउत्पन्न हार्मोन से मुर्गो का वजन पहले 10-12 दिनों में इतना बढ़ जाता है कि मुर्गा खुद अपना वजन नहीं उठा पाता। परिणामस्वरूप उसके जोड़ों से ब्लीडिंग होने लगती है। मुर्गो के खून के माध्यम से ये हार्मोस मांसाहारी लोगों के शरीर में जा मिलते हैं। प्रभावित होती है सेक्स क्षमता : महिला रोग विशेषज्ञ डा. मनजीत ने बताया कि इन दवाओं के अधिक मात्रा में सेवन से पुरुषों की सेक्स क्षमता में कमी आ जाती है, जबकि महिलाओं की प्रजनन क्षमता में कमी के साथ-साथ उनके शरीर पर बाल आने लगते हैं। सोशल साइंसेज तथा हेल्थ फोरम के डा. बलजीत सिंह बताते हैं कि चिकन खाने वालों का ब्लड पे्रशर एवं वजन बढ़ने लगता है। इसके संदर्भ में पशुपालन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पोल्ट्री फार्म स्थापित करने वाले व्यक्ति को आरंभ में ही सभी प्रकार की जानकारी दे दी जाती है। फीड के सैंपल प्रयोगशालाओं से पास होने के बाद ही फीड दी जाती है। जांच के अधिकार नहीं : डा. बलजीत सिंह के अनुसार, निजी पोल्ट्री फार्मो में मुर्गो को कौन से हार्मोस दिए जा रहे हैं, इसकी जांच का अधिकार पोल्ट्री इंस्पेक्टर के पास भी नहीं है। पटियाला के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) का कहना है कि वह चिकन के बाजार में आने के बाद साफ-सफाई को ध्यान में रखकर बेचने के आदेश दे सकते हैं, लेकिन पोल्ट्री फार्मो की जांच करने के अधिकार उनके पास नहीं हैं। इस विषय पर नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी डा. बांगा कहते हैं कि मुर्गो को दी जाने वाली इन दवाओं को रोकने का कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है। दुधारू पशुओं को प्रजनन के आक्सीटोसीन के टीके लगाने तथा बेचने पर प्रतिबंध जरूर है। वे हैं कि पशुपालन विभाग को ही अधिक जानकारी होती है सिविल स्वास्थ्य के महकमे को पशुओं के बारे में पता नहीं होता। राज्य में हर साल खाए जाते हैं 1200 करोड़ से अधिक मुर्गे : केवल पटियाला जोन के चार जिलों में ही, सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 800 से अधिक पोल्ट्री फार्मों में 1.46 करोड़ से अधिक मुर्गे (चिकन) हैं तथा राज्य में 1200 करोड़ से अधिक मुर्गे प्रतिवर्ष खाए जा रहे हैं। वहीं, पोल्ट्री डाइग्नोटीशियन डा. नवदीप कहते हैं कि मुर्गो को कुछ एंटी-बायोटिक जरूर दिए जाते हैं लेकिन हार्मोस का पोल्ट्री फीड में काम नहीं है।
कर्नाटक से आया तोहफा sugercane
भूपेश चट्ठा, पटियाला
चीनी के दाम आसमान छूने पर यह चाहे जितनी भी कड़वी लगने लगे पर पंजाब के गन्ना उत्पादक किसानों के लिए राहत भरा तोहफा कर्नाटक से आया है। 50 रुपये किलो पर चल रहा नया गुड़ आने वाले समय में और मीठा हो जाएगा। यदि किसान बेलगांव तकनीक से गन्ने की काश्त करता है। कर्नाटक के जाने माने आर्गेनिक फार्मर क्लब के संस्थापक सदस्यों में से एक सुरेश देसाई खेती विरासत मिशन के निमंत्रण पर पंजाब आए हैं और अपने चार दिवसीय दौरे में उन्होंने शुक्रवार को घनौर के निकट बहावलपुर गांव में इस तकनीक को किसानों के समक्ष रखा है। बेलगांव तकनीक से होने वाली गन्ने की खेती पूरी तरह से प्राकृतिक है और शुरू के दो तीन सालों में ही रसायनिक खादों पर किसान की निर्भरता कम होने लगती है। मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त ने आज यहां बेलगांव तकनीक के बारे में पूछे जाने पर बताया कि फसल पर आने वाले कीट इसकी सेहत को देखकर दूर रहते हैं। बीमारियों के हमले कम होते हैं। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ने से उपज बढ़ने लगती है। आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु पंजाब से गन्ने की उपज के मामले में प्राकृतिक व भौगोलिक कारणों से आगे हैं। प्रदेश में औसतन 40 टन प्रति एकड़ गन्ने की उपज होती है। इसे सुरेश देसाई की तकनीक से दो से ढाई गुणा तक बढ़ाया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह 120 टन तक पहुंच सकती है। इसी प्रकार फसल अच्छी होने की सूरत में गन्ने से चीनी की पैदावार 13 फीसदी तक बढ़ जाती है। वर्तमान समय में राज्य में गन्ने से चीनी का उत्पादन सात से आठ फीसदी तक हो रहा है। वहीं, प्राकृतिक रूप से ली जाने वाली गन्ने की फसल की तकनीक पर देसाई ने कहा कि गन्ने की फसल करीब 18 महीनों में काटने लायक हो जाती है। ऊपर से गन्ना काटने के बाद कचरे को अक्सर जला दिया जाता है। इससे खेत में बची फसल की जड़ों को नुकसान पहुंचता है। साइकल में होने वाली गन्ने की खेती पर अधिक रसायनिक खादें डालनी पड़ती हैं । पुरानी मान्यता है कि राख कीटनाशकों को दूर रखती है, लेकिन वास्तव में आग से लाभदायक आर्गेनिक तत्व काफी जल चुके होते हैं, किसान इसका अंदाजा नहीं लगा पाता। बेलगांव तकनीक में फसल के कचरे को खेत में ही छोड़ दिया जाता है, लेकिन इसे खाल बना कर व्यवस्थित किया जाता है। एक खाल में पुराना कचरा होता है तो दूसरे का प्रयोग पानी देने में होता है। इससे पानी भाप बन कर नहीं उड़ता और पानी की खपत एक तिहाई रह जाती है। शुरू में पानी एक खाल छोड़ कर एक में लगाया जाता है, लेकिन बाद के वर्षो में पुराना कचरा दो से तीन खालों में होता है और पानी एक में ही रहता है। एक-दो का अनुपात अब एक-चार में लाने के प्रयास हो रहे हैं, ताकि 10-12 दिनों में लगने वाला पानी 20-25 दिनों पर लगे। बकौल देसाई खेतों में चूंकि हरे तत्वों की मात्रा लगातार बढ़ती जाती है, ऐसे में रसायन डालना व्यर्थ हो जाता है। खेती पर खर्च 15 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर से कम हो कर 3700 रुपये प्रति हेक्टेयर रह जाता है। फसल की सेहत के अच्छा होने की स्थिति में कीटनाशकों का प्रयोग बहुत ही कम रह जाता है। उपज में होने वाली बढ़ोत्तरी सीधा लाभ देती है।
चीनी के दाम आसमान छूने पर यह चाहे जितनी भी कड़वी लगने लगे पर पंजाब के गन्ना उत्पादक किसानों के लिए राहत भरा तोहफा कर्नाटक से आया है। 50 रुपये किलो पर चल रहा नया गुड़ आने वाले समय में और मीठा हो जाएगा। यदि किसान बेलगांव तकनीक से गन्ने की काश्त करता है। कर्नाटक के जाने माने आर्गेनिक फार्मर क्लब के संस्थापक सदस्यों में से एक सुरेश देसाई खेती विरासत मिशन के निमंत्रण पर पंजाब आए हैं और अपने चार दिवसीय दौरे में उन्होंने शुक्रवार को घनौर के निकट बहावलपुर गांव में इस तकनीक को किसानों के समक्ष रखा है। बेलगांव तकनीक से होने वाली गन्ने की खेती पूरी तरह से प्राकृतिक है और शुरू के दो तीन सालों में ही रसायनिक खादों पर किसान की निर्भरता कम होने लगती है। मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त ने आज यहां बेलगांव तकनीक के बारे में पूछे जाने पर बताया कि फसल पर आने वाले कीट इसकी सेहत को देखकर दूर रहते हैं। बीमारियों के हमले कम होते हैं। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ने से उपज बढ़ने लगती है। आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु पंजाब से गन्ने की उपज के मामले में प्राकृतिक व भौगोलिक कारणों से आगे हैं। प्रदेश में औसतन 40 टन प्रति एकड़ गन्ने की उपज होती है। इसे सुरेश देसाई की तकनीक से दो से ढाई गुणा तक बढ़ाया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह 120 टन तक पहुंच सकती है। इसी प्रकार फसल अच्छी होने की सूरत में गन्ने से चीनी की पैदावार 13 फीसदी तक बढ़ जाती है। वर्तमान समय में राज्य में गन्ने से चीनी का उत्पादन सात से आठ फीसदी तक हो रहा है। वहीं, प्राकृतिक रूप से ली जाने वाली गन्ने की फसल की तकनीक पर देसाई ने कहा कि गन्ने की फसल करीब 18 महीनों में काटने लायक हो जाती है। ऊपर से गन्ना काटने के बाद कचरे को अक्सर जला दिया जाता है। इससे खेत में बची फसल की जड़ों को नुकसान पहुंचता है। साइकल में होने वाली गन्ने की खेती पर अधिक रसायनिक खादें डालनी पड़ती हैं । पुरानी मान्यता है कि राख कीटनाशकों को दूर रखती है, लेकिन वास्तव में आग से लाभदायक आर्गेनिक तत्व काफी जल चुके होते हैं, किसान इसका अंदाजा नहीं लगा पाता। बेलगांव तकनीक में फसल के कचरे को खेत में ही छोड़ दिया जाता है, लेकिन इसे खाल बना कर व्यवस्थित किया जाता है। एक खाल में पुराना कचरा होता है तो दूसरे का प्रयोग पानी देने में होता है। इससे पानी भाप बन कर नहीं उड़ता और पानी की खपत एक तिहाई रह जाती है। शुरू में पानी एक खाल छोड़ कर एक में लगाया जाता है, लेकिन बाद के वर्षो में पुराना कचरा दो से तीन खालों में होता है और पानी एक में ही रहता है। एक-दो का अनुपात अब एक-चार में लाने के प्रयास हो रहे हैं, ताकि 10-12 दिनों में लगने वाला पानी 20-25 दिनों पर लगे। बकौल देसाई खेतों में चूंकि हरे तत्वों की मात्रा लगातार बढ़ती जाती है, ऐसे में रसायन डालना व्यर्थ हो जाता है। खेती पर खर्च 15 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर से कम हो कर 3700 रुपये प्रति हेक्टेयर रह जाता है। फसल की सेहत के अच्छा होने की स्थिति में कीटनाशकों का प्रयोग बहुत ही कम रह जाता है। उपज में होने वाली बढ़ोत्तरी सीधा लाभ देती है।
पंजाबी शेर होने लगे ढेर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
जेहड़े अधरिड़के दा छन्नना मुंह नूं लांउदे ने, थापी मार हाणियां ओही कौडी पांउदे ने। टीकेयां ते सूटेयां ने चूस लए, लालीयां चेहरे ते कित्थे छानीयां। कहंदे ने सियाने गल्लां सच्चीयां खादीयां खुराकां कम्म आणगीयां। अपनी कद काठी के लिए सेना में भर्ती के लिए अंग्रेजों की पहली पसंद रहे पंजाबियों के अब न तो वे चौड़े सीने रहे हैं और न ही लंबे कद। नियमित व्यायाम और खान-पान में आए अंतर के साथ-साथ नशे की लत ने उनकी स्थिति ऐसी बना दी कि आज 78 फीसदी पंजाबी सेना में भर्ती होने के लायक ही नहीं रहे। सैन्य भर्ती रैलियों से मिले आंकड़े साबित करते हैं कि पंजाबियों के स्वास्थ्य की स्थिति 21वीं सदी में ही ज्यादा खराब हुई है। वर्ष 1971 के युद्ध के तुरंत बाद करीब 60 फीसदी पंजाबी सेना में भर्ती होने लायक होते थे। 80 के दशक में यह औसत लुढ़क कर 40 फीसदी पर आ गया जो आज 22 फीसदी तक रह गया है।
पटियाला, मोहाली, फतेहगढ़ साहिब, बरनाला, संगरूर व मानसा जिलों के नौजवानों के लिए आयोजित सैन्य भर्ती रैलियों में सामने आया है कि सेना में भर्ती के लिए होने वाली 400 मीटर गुणा 4 रेस युवाओं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है। एक-तिहाई लड़के 400 मीटर के चार चक्कर ही पूरे नहीं कर पाते। चौथा चक्कर समय पर पूरा करने वालों की गिनती 28 से ऊपर कभी नहीं जा पाई। निचले स्तर पर यह आंकड़ा 15 के आसपास तक आता रहा है। कर्नल कटोच कहते हैं कि यह आंकड़ा 22 फीसदी के आसपास रह गया है। संगरूर और मानसा के लड़के यदि कुछ आगे हैं तो मोहाली, पटियाला के उतना ही पीछे रह जाते हैं। दौड़ की बाधा पार करने वाले का समझो 95 फीसदी सपना पूरा हो गया। पुलअप, पंपिंग अथवा अन्य कसरतों में उसके निकलने की संभावना खासी कम रह जाती है। दस्तावेजों की जांच में दो से चार फीसदी लड़के और बाहर हो जाते हैं।
कर्नल (रिटायर्ड) प्रताप इंदर सिंह फुलका बताते हैं कि वर्ष 1972 में वह पटियाला में बतौर कैप्टन तैनात थे। उन दिनों सेना में भर्ती की इच्छा से आने वाले 60 फीसदी लड़के सफल रहते थे, पर 72 की जवानी और आज के लड़कों में बड़ा अंतर है। गांव जाने को सिर्फ साइकिल की मांग रखी जाती थी। 10-15 किलोमीटर का चक्कर पैदल यों ही लगा लेते थे पर आज के बच्चे गली के मोड़ पर ब्रेड लाने भी मोटरसाइकिल निकालते हैं। अब वैसे शारीरिक खेल भी रहे नहीं। सैन्य भर्ती रैलियों का जमीनी स्तर पर प्रबंध कर चुके कर्नल फुलका कहते हैं कि 80 के दशक के मध्य की भर्ती रैलियों में उन्होंने देखा कि कड़े नियमों ने यह औसत 40 फीसदी पर ला खड़ा किया। सेना को अच्छे लड़के चाहिए, जो देश की रक्षा कर सकें, यह सही है पर इसके लिए भर्ती से पहले प्रशिक्षण का इंतजाम बड़े स्तर पर नियमित रूप से प्रशासन को करना चाहिए।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. प्रेम प्रकाश खोसला कहते हैं कि पंजाब में पांच में से दो नदियां तो पाकिस्तान चली गई पर यहां छठे दरिया के रूप में शराब बहने लगी है। ढाई करोड़ की आबादी में यदि एक-चौथाई युवा और मर्द हैं तो सालाना 16 करोड़ बोतल शराब वैध रूप से यहां पी जा रही है। एक व्यक्ति के हिस्से हर महीने शराब की दो बोतल आ रही है। इसे सामाजिक मान्यता कुछ ऐसी मिली कि मना करने वाला ही कोई नहीं रह गया। इसमें अवैध शराब इसमें शामिल नहीं है। इतना तेजाब जिस किसी सभ्यता अथवा संस्कृति पर उडे़ला जाएगा, वह दौड़ना तो क्या चलने लायक भी नहीं रहेगी।
सेना के डिप्टी डायरेक्टर (भर्ती उत्तर पश्चिम) ब्रिगेडियर केडी मल्होत्रा कहते हैं कि यदि लड़के तीन महीने ढंग से मेहनत कर लें और थोड़ा तकनीक का प्रयोग देसी खुराक के साथ कर लें तो सेना में भर्ती प्रतिस्पर्धा कोई खास मुश्किल नहीं है। दौड़ते समय मुंह बंद रख नाक से ही सांस ले ली जाए तो आप की रेस का समय कम भी होगा और यह पूरी भी होगी। सेना में बेहिसाब पद खाली हैं। अपार संभावनाएं हैं। सिग्नल कोर, पंजाब व सिख रेजिमेंट, नर्सिग, तकनीकी इत्यादि.. हर वर्ग में अवसर हैं। पंजाब में यह मौका अब साल में पांच बार दिया जाने लगा है।
जेहड़े अधरिड़के दा छन्नना मुंह नूं लांउदे ने, थापी मार हाणियां ओही कौडी पांउदे ने। टीकेयां ते सूटेयां ने चूस लए, लालीयां चेहरे ते कित्थे छानीयां। कहंदे ने सियाने गल्लां सच्चीयां खादीयां खुराकां कम्म आणगीयां। अपनी कद काठी के लिए सेना में भर्ती के लिए अंग्रेजों की पहली पसंद रहे पंजाबियों के अब न तो वे चौड़े सीने रहे हैं और न ही लंबे कद। नियमित व्यायाम और खान-पान में आए अंतर के साथ-साथ नशे की लत ने उनकी स्थिति ऐसी बना दी कि आज 78 फीसदी पंजाबी सेना में भर्ती होने के लायक ही नहीं रहे। सैन्य भर्ती रैलियों से मिले आंकड़े साबित करते हैं कि पंजाबियों के स्वास्थ्य की स्थिति 21वीं सदी में ही ज्यादा खराब हुई है। वर्ष 1971 के युद्ध के तुरंत बाद करीब 60 फीसदी पंजाबी सेना में भर्ती होने लायक होते थे। 80 के दशक में यह औसत लुढ़क कर 40 फीसदी पर आ गया जो आज 22 फीसदी तक रह गया है।
पटियाला, मोहाली, फतेहगढ़ साहिब, बरनाला, संगरूर व मानसा जिलों के नौजवानों के लिए आयोजित सैन्य भर्ती रैलियों में सामने आया है कि सेना में भर्ती के लिए होने वाली 400 मीटर गुणा 4 रेस युवाओं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है। एक-तिहाई लड़के 400 मीटर के चार चक्कर ही पूरे नहीं कर पाते। चौथा चक्कर समय पर पूरा करने वालों की गिनती 28 से ऊपर कभी नहीं जा पाई। निचले स्तर पर यह आंकड़ा 15 के आसपास तक आता रहा है। कर्नल कटोच कहते हैं कि यह आंकड़ा 22 फीसदी के आसपास रह गया है। संगरूर और मानसा के लड़के यदि कुछ आगे हैं तो मोहाली, पटियाला के उतना ही पीछे रह जाते हैं। दौड़ की बाधा पार करने वाले का समझो 95 फीसदी सपना पूरा हो गया। पुलअप, पंपिंग अथवा अन्य कसरतों में उसके निकलने की संभावना खासी कम रह जाती है। दस्तावेजों की जांच में दो से चार फीसदी लड़के और बाहर हो जाते हैं।
कर्नल (रिटायर्ड) प्रताप इंदर सिंह फुलका बताते हैं कि वर्ष 1972 में वह पटियाला में बतौर कैप्टन तैनात थे। उन दिनों सेना में भर्ती की इच्छा से आने वाले 60 फीसदी लड़के सफल रहते थे, पर 72 की जवानी और आज के लड़कों में बड़ा अंतर है। गांव जाने को सिर्फ साइकिल की मांग रखी जाती थी। 10-15 किलोमीटर का चक्कर पैदल यों ही लगा लेते थे पर आज के बच्चे गली के मोड़ पर ब्रेड लाने भी मोटरसाइकिल निकालते हैं। अब वैसे शारीरिक खेल भी रहे नहीं। सैन्य भर्ती रैलियों का जमीनी स्तर पर प्रबंध कर चुके कर्नल फुलका कहते हैं कि 80 के दशक के मध्य की भर्ती रैलियों में उन्होंने देखा कि कड़े नियमों ने यह औसत 40 फीसदी पर ला खड़ा किया। सेना को अच्छे लड़के चाहिए, जो देश की रक्षा कर सकें, यह सही है पर इसके लिए भर्ती से पहले प्रशिक्षण का इंतजाम बड़े स्तर पर नियमित रूप से प्रशासन को करना चाहिए।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. प्रेम प्रकाश खोसला कहते हैं कि पंजाब में पांच में से दो नदियां तो पाकिस्तान चली गई पर यहां छठे दरिया के रूप में शराब बहने लगी है। ढाई करोड़ की आबादी में यदि एक-चौथाई युवा और मर्द हैं तो सालाना 16 करोड़ बोतल शराब वैध रूप से यहां पी जा रही है। एक व्यक्ति के हिस्से हर महीने शराब की दो बोतल आ रही है। इसे सामाजिक मान्यता कुछ ऐसी मिली कि मना करने वाला ही कोई नहीं रह गया। इसमें अवैध शराब इसमें शामिल नहीं है। इतना तेजाब जिस किसी सभ्यता अथवा संस्कृति पर उडे़ला जाएगा, वह दौड़ना तो क्या चलने लायक भी नहीं रहेगी।
सेना के डिप्टी डायरेक्टर (भर्ती उत्तर पश्चिम) ब्रिगेडियर केडी मल्होत्रा कहते हैं कि यदि लड़के तीन महीने ढंग से मेहनत कर लें और थोड़ा तकनीक का प्रयोग देसी खुराक के साथ कर लें तो सेना में भर्ती प्रतिस्पर्धा कोई खास मुश्किल नहीं है। दौड़ते समय मुंह बंद रख नाक से ही सांस ले ली जाए तो आप की रेस का समय कम भी होगा और यह पूरी भी होगी। सेना में बेहिसाब पद खाली हैं। अपार संभावनाएं हैं। सिग्नल कोर, पंजाब व सिख रेजिमेंट, नर्सिग, तकनीकी इत्यादि.. हर वर्ग में अवसर हैं। पंजाब में यह मौका अब साल में पांच बार दिया जाने लगा है।
वन की जगह बसाए कंकरीट के जंगल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के चिकित्सा क्षेत्र में चलते आ रहे गोलमाल की परतें सीबीआई ने एक बार क्या उधेड़नी शुरू की, हमाम में कई नंगे चमकने लगे हैं। गोलमाल कितने समय से चलता आ रहा है, यह भी सामने आने लगा है। सीबीआई की जांच में खुल रही कालेज की गुत्थी पर सामने आया कि बनूड़ के पास रामनगर की जिस जमीन पर ज्ञान सागर मेडिकल कालेज बनाया गया है, उसे वन क्षेत्र विकसित करने के नाम पर खरीदा गया था लेकिन अब दर्जनों एकड़ में फैली इसी जमीन पर कंकरीट के जंगल फैल गए हैं। जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि राज्य में पर्ल गोल्डन फारेस्ट (पीजीएफ) नाम की कंपनी का शानदार तरीके से उदय हुआ। कंपनी ने पंजाब व राज्य से बाहर भी लोगों से कृषि व वन क्षेत्र विकसित करने के नाम पर पैसे लिए और मोटी कमाई की। शुरू के दिनों में खूब नाम व पैसा कमाने वाली यह कंपनी जल्दी ही विवादों में आ गई। सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के पास शिकायत हुई और मामला दर्ज हो गया। इसी तरह की शिकायत पर एक मुकदमा विचाराधीन भी है, वहीं पीजीएफ के विवादों में आते ही कंपनी के मालिकों ने एक अन्य कंपनी बना चिट फंड से जुटाया पैसा ट्रांसफर कर दिया। पर्ल ने पंजाब एग्रीकल्चर कंपनी के नाम से बनाई पर्ल पीएसीएल पर पैसा ट्रांसफर कर दिया गया। पैसे के अकाउंट बदलने का क्रम यहीं नहीं थमा। इस धन का बड़ा हिस्सा पंजाब इंफ्रास्टक्चर प्राइवेट लिमिटेड में तब्दील कर लिया गया। इसी पैसे का कुछ हिस्सा ज्ञान सागर चैरिटेबल एंड एजुकेशनल सोसाइटी के हिस्से में चला गया। कालेज बनाने के लिए ऐसे में उसी जमीन का प्रयोग कर लिया गया जिसे एक चिट फंड कंपनी ने वन क्षेत्र विकसित करने के लिए खरीदा था। यह एमसीआई की मूल शर्तो का उल्लंघन है। ऐसी स्थिति में कालेज की मान्यता पर भी सवाल खड़े होने तय है। वैसे सूत्र यह भी बताते हैं कि वन क्षेत्र के नाम पर यह अकेली जायदाद नहीं है जिस पर कंकरीट के जंगल बसाए गए हैं। रामनगर के अलावा मोहाली, लुधियाना, चंडीगढ़, जयपुर, बठिंडा, पुणे भी हैं जहां आवासीय कालोनी से लेकर होटल तक बने हैं। केंद्र की घोषणा से पंजाब में सांसें थमी पटियाला। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की सोमवार की घोषणा ने पंजाब के मेडिकल एजुकेशन के छात्रों की सांसें अटका दी हैं। घोषणा के अनुसार हाल के ही के वर्षो में जिन कालेजों की सीटें बढ़ी हैं या जिन्होंने बढ़वाई हैं, उन सभी की नए सिरे से जांच होगी और गड़बड़ी पाए जाने पर मान्यता रद करने की घोषणा ने बीते तीन सालों में एडमिशन लेने वालों को बुरी तरह से डरा दिया है। याद रहे कि इसी अवधि में प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का विकास हुआ है। उधर, बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के वाइस चांसलर डा. एसएस गिल कहते हैं कि किसी भी कालेज को डी-रिकोग्नाइज नहीं किया जा रहा। यदि किसी परिस्थिति में ऐसा होता भी है तो ये छात्र यूनिवर्सिटी के हैं। हमारे पास छह अन्य कालेज भी है।
पंजाब के चिकित्सा क्षेत्र में चलते आ रहे गोलमाल की परतें सीबीआई ने एक बार क्या उधेड़नी शुरू की, हमाम में कई नंगे चमकने लगे हैं। गोलमाल कितने समय से चलता आ रहा है, यह भी सामने आने लगा है। सीबीआई की जांच में खुल रही कालेज की गुत्थी पर सामने आया कि बनूड़ के पास रामनगर की जिस जमीन पर ज्ञान सागर मेडिकल कालेज बनाया गया है, उसे वन क्षेत्र विकसित करने के नाम पर खरीदा गया था लेकिन अब दर्जनों एकड़ में फैली इसी जमीन पर कंकरीट के जंगल फैल गए हैं। जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि राज्य में पर्ल गोल्डन फारेस्ट (पीजीएफ) नाम की कंपनी का शानदार तरीके से उदय हुआ। कंपनी ने पंजाब व राज्य से बाहर भी लोगों से कृषि व वन क्षेत्र विकसित करने के नाम पर पैसे लिए और मोटी कमाई की। शुरू के दिनों में खूब नाम व पैसा कमाने वाली यह कंपनी जल्दी ही विवादों में आ गई। सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के पास शिकायत हुई और मामला दर्ज हो गया। इसी तरह की शिकायत पर एक मुकदमा विचाराधीन भी है, वहीं पीजीएफ के विवादों में आते ही कंपनी के मालिकों ने एक अन्य कंपनी बना चिट फंड से जुटाया पैसा ट्रांसफर कर दिया। पर्ल ने पंजाब एग्रीकल्चर कंपनी के नाम से बनाई पर्ल पीएसीएल पर पैसा ट्रांसफर कर दिया गया। पैसे के अकाउंट बदलने का क्रम यहीं नहीं थमा। इस धन का बड़ा हिस्सा पंजाब इंफ्रास्टक्चर प्राइवेट लिमिटेड में तब्दील कर लिया गया। इसी पैसे का कुछ हिस्सा ज्ञान सागर चैरिटेबल एंड एजुकेशनल सोसाइटी के हिस्से में चला गया। कालेज बनाने के लिए ऐसे में उसी जमीन का प्रयोग कर लिया गया जिसे एक चिट फंड कंपनी ने वन क्षेत्र विकसित करने के लिए खरीदा था। यह एमसीआई की मूल शर्तो का उल्लंघन है। ऐसी स्थिति में कालेज की मान्यता पर भी सवाल खड़े होने तय है। वैसे सूत्र यह भी बताते हैं कि वन क्षेत्र के नाम पर यह अकेली जायदाद नहीं है जिस पर कंकरीट के जंगल बसाए गए हैं। रामनगर के अलावा मोहाली, लुधियाना, चंडीगढ़, जयपुर, बठिंडा, पुणे भी हैं जहां आवासीय कालोनी से लेकर होटल तक बने हैं। केंद्र की घोषणा से पंजाब में सांसें थमी पटियाला। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की सोमवार की घोषणा ने पंजाब के मेडिकल एजुकेशन के छात्रों की सांसें अटका दी हैं। घोषणा के अनुसार हाल के ही के वर्षो में जिन कालेजों की सीटें बढ़ी हैं या जिन्होंने बढ़वाई हैं, उन सभी की नए सिरे से जांच होगी और गड़बड़ी पाए जाने पर मान्यता रद करने की घोषणा ने बीते तीन सालों में एडमिशन लेने वालों को बुरी तरह से डरा दिया है। याद रहे कि इसी अवधि में प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का विकास हुआ है। उधर, बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज के वाइस चांसलर डा. एसएस गिल कहते हैं कि किसी भी कालेज को डी-रिकोग्नाइज नहीं किया जा रहा। यदि किसी परिस्थिति में ऐसा होता भी है तो ये छात्र यूनिवर्सिटी के हैं। हमारे पास छह अन्य कालेज भी है।
कौन है खुदकुशी पर उतारू, पता करेगी सरकार
भूपेश चट्ठा, पटियाला :
पंजाब के किसान अपनी संपन्नता के लिए जाने जाते हैं। पर किसान खुदकुशी भी कर हैं, आखिर क्यों? केंद्र सरकार के गले कर्ज के कारण तीन हजार आत्महत्याओं की बात नहीं उतरती तो स्थानीय प्रशासन एफआईआर में खुदकुशी का कारण नशे से लेकर घरेलू कलह तक साबित करने की कोशिश में लग जाता है। पर अब वस्तुस्थिति पता करने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) के सौजन्य से अपनी तरह का पहला प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है। इसमें प्रदेश के 18 जिलों का सर्वेक्षण कर किसानों और कृषि मजदूरों के उस वर्ग का पता लगाया जाएगा जो खुदकुशी का रास्ता चुन सकते हैं। इससे पहले इस बात के तो अध्ययन होते रहे हैं कि वे कौन से कारण थे जिनकी वजह से खुदकुशी की गई। लेकिन खुदकुशी की कगार पर कौन खड़ा है अथवा कौन कर सकता है, इसका पता करने का प्रयास कभी नहीं किया गया है। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर केसर सिंह भंगू ने इस संबंध में बताया कि एक जिलेमें करीब 500 लोगों का चार चरणों में अलग-अलग साक्षात्कार किया जाएगा। इसमें खुदकुशी कर चुके किसान व खेत मजदूर के पीडि़त परिवार और वैसे ही हालात से जूझ रहे परिवार के एक-एक सदस्य से मिला जाएगा। ऐसे परिवारों का पता लगाने के लिए पहले चरण में एक सर्वे भी किया जाएगा। जिन गांवों में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं उन्हीं गांवों के किसानों से भी साक्षात्कार किया जाएगा। ऐसे लोगों की मजबूरी, इच्छाएं और उम्मीदों का भी पता लगाया जाएगा। रिपोर्ट आने में साल भर का समय लग सकता है। अध्ययन में कर्ज के अलावा सामाजिक पहलुओं, पारिवारिक दबाव और ड्रग्स को भी अलग से रखा गया है। प्रोफसर भंगू के अनुसार इस अध्ययन से भविष्य में बनने वाली नीतियों की रूपरेखा भी तय करने में मदद मिलेगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का यह प्रयास तनाव भरे हालात से किसानों को निकालने के लिए है। याद रहे कि आईसीएसएसआर के पास ऐसे प्रस्ताव भेजे जाने से पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले संगरूर के लहरा, भवानीगढ़ और अंदाना ब्लाक में ऐसा ही सर्वेक्षण किया गया है। इन क्षेत्रों में सबसे अधिक संख्या में किसान व खेत मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. लखविंदर सिंह, यूनिवर्सिटी के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. केसर सिंह भंगू को सबसे अधिक आत्महत्याओं वाली मालवा यानी काटन बेल्ट के तीन जिलों संगरूर, बठिंडा व मानसा में अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा गया है। आईसीएसएसआर ने ऐसे ही दो और प्रोजेक्ट पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना और श्री गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को भी क्रमश: दोआबा व माझा क्षेत्रों के लिए दिए हैं।
पंजाब के किसान अपनी संपन्नता के लिए जाने जाते हैं। पर किसान खुदकुशी भी कर हैं, आखिर क्यों? केंद्र सरकार के गले कर्ज के कारण तीन हजार आत्महत्याओं की बात नहीं उतरती तो स्थानीय प्रशासन एफआईआर में खुदकुशी का कारण नशे से लेकर घरेलू कलह तक साबित करने की कोशिश में लग जाता है। पर अब वस्तुस्थिति पता करने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च (आईसीएसएसआर) के सौजन्य से अपनी तरह का पहला प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है। इसमें प्रदेश के 18 जिलों का सर्वेक्षण कर किसानों और कृषि मजदूरों के उस वर्ग का पता लगाया जाएगा जो खुदकुशी का रास्ता चुन सकते हैं। इससे पहले इस बात के तो अध्ययन होते रहे हैं कि वे कौन से कारण थे जिनकी वजह से खुदकुशी की गई। लेकिन खुदकुशी की कगार पर कौन खड़ा है अथवा कौन कर सकता है, इसका पता करने का प्रयास कभी नहीं किया गया है। पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर केसर सिंह भंगू ने इस संबंध में बताया कि एक जिलेमें करीब 500 लोगों का चार चरणों में अलग-अलग साक्षात्कार किया जाएगा। इसमें खुदकुशी कर चुके किसान व खेत मजदूर के पीडि़त परिवार और वैसे ही हालात से जूझ रहे परिवार के एक-एक सदस्य से मिला जाएगा। ऐसे परिवारों का पता लगाने के लिए पहले चरण में एक सर्वे भी किया जाएगा। जिन गांवों में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं उन्हीं गांवों के किसानों से भी साक्षात्कार किया जाएगा। ऐसे लोगों की मजबूरी, इच्छाएं और उम्मीदों का भी पता लगाया जाएगा। रिपोर्ट आने में साल भर का समय लग सकता है। अध्ययन में कर्ज के अलावा सामाजिक पहलुओं, पारिवारिक दबाव और ड्रग्स को भी अलग से रखा गया है। प्रोफसर भंगू के अनुसार इस अध्ययन से भविष्य में बनने वाली नीतियों की रूपरेखा भी तय करने में मदद मिलेगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का यह प्रयास तनाव भरे हालात से किसानों को निकालने के लिए है। याद रहे कि आईसीएसएसआर के पास ऐसे प्रस्ताव भेजे जाने से पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले संगरूर के लहरा, भवानीगढ़ और अंदाना ब्लाक में ऐसा ही सर्वेक्षण किया गया है। इन क्षेत्रों में सबसे अधिक संख्या में किसान व खेत मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं। पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. लखविंदर सिंह, यूनिवर्सिटी के बठिंडा स्थित क्षेत्रीय केंद्र के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. केसर सिंह भंगू को सबसे अधिक आत्महत्याओं वाली मालवा यानी काटन बेल्ट के तीन जिलों संगरूर, बठिंडा व मानसा में अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा गया है। आईसीएसएसआर ने ऐसे ही दो और प्रोजेक्ट पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना और श्री गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को भी क्रमश: दोआबा व माझा क्षेत्रों के लिए दिए हैं।
विविधीकरण वालों ने फूंकी ज्यादा नाड़
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
गेहूं-धान के फसली चक्र में किसी तरह से तीसरी फसल लेने का मादा रखने वाला मेहनतकश और जागरूक किसान ही आज पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। दैनिक जागरण की ओर से जुटाई जानकारी में सामने आया कि गेहूं के बाद और धान की फसल से पहले जिन किसानों ने मूंग के बाजार भाव 85 रुपये प्रति किलो देखकर एक-दो सप्ताह पहले मूंग की बिजाई की थी, वे ही नाड़ जलाने वालों में सबसे आगे रहे हैं। कोरजीवाला गांव की शैलर रोड के किनारे आधुनिक डेयरी फार्म चला रहे परविंदर सिंह बताते हैं कि आज किसान को सब पता है। अंजान नहीं है। फिर भी सफाई का मारा अपना ही नुकसान करने पर तुला है। पहले आग लगाकर अपना और अपने खेत का सत्यानाश करते हैं और फिर यूरिया और डाया जैसी खादें डाल जेब भी ढीली करते हैं। गेहूं के नाड़ से बनी तूड़ी वे इन दिनों में भी 350 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर खरीद रहे हैं। फरवरी का महीना आते आते दाम 500 के पार हो जाते हैं। आंकड़ों की पृष्ठभूमि में वह कहते हैं कि एक एकड़ से 12-13 क्विंटल तूड़ी निकलती है। ऐसे में यह कमाई का जरिया भी हो सकती है। अपने पशुओं के लिए मक्की व चरी की खेती कर रहे बलबीर सिंह तर्क देते हैं कि गेहूं के बाद समय नहीं होता, इसलिए नाड़ जला देते हैं। हालांकि इससे बचा जा सकता है। यदि बेहतर ढंग से गेहूं की ही कटाई कर ली जाए। थोड़ी मेहनत हो जाए तो कमाई भी हो जाती है। पर मंहगा डीजल और मंहगी हो गई लेबर थोड़ा अडं़गा जरूर बनती है। ऐसे में लोग सिर्फ अपने घर में प्रयोग के लायक ही तूड़ी बनाते हैं और शेष को आग के हवाले कर देते हैं। वहीं फायर ब्रिगेड के आंकड़े बताते हैं कि पटियाला के आसपास के ही क्षेत्रों में इस साल रबी की फसल लेने के बाद जिले के विभिन्न हिस्सों में कुल 248 आग लगने की घटनाएं फायर ब्रिगेड के सामने आई। दिलचस्प है कि बीते माह 25 व 28 अप्रैल को 25 से 30 घटनाएं एक ही दिन में लगीं। कमजोर आधारभूत ढांचे के चलते फायर ब्रिगेड इनमें से पांच स्थानों पर ही आग बुझाने के लिए पहुंच सका। बिजली कटों के दौरान फायर ब्रिगेड के पास अपनी गाडि़यों में पानी भरने का कोई समाधान नहीं है। हालांकि पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड से बीते साल इसी सीजन में आग से मुआवजा लेने वालों की पूरे राज्य में संख्या 318 थी। इस साल बढ़ी घटनाओं के पीछे मौसम को भी बड़ा जिम्मेवार माना जा रहा है। मौसम में नमी के बजाय इस साल आंधियां चली हैं और पारा 44 के पार भी पहंुचा है।
गेहूं-धान के फसली चक्र में किसी तरह से तीसरी फसल लेने का मादा रखने वाला मेहनतकश और जागरूक किसान ही आज पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। दैनिक जागरण की ओर से जुटाई जानकारी में सामने आया कि गेहूं के बाद और धान की फसल से पहले जिन किसानों ने मूंग के बाजार भाव 85 रुपये प्रति किलो देखकर एक-दो सप्ताह पहले मूंग की बिजाई की थी, वे ही नाड़ जलाने वालों में सबसे आगे रहे हैं। कोरजीवाला गांव की शैलर रोड के किनारे आधुनिक डेयरी फार्म चला रहे परविंदर सिंह बताते हैं कि आज किसान को सब पता है। अंजान नहीं है। फिर भी सफाई का मारा अपना ही नुकसान करने पर तुला है। पहले आग लगाकर अपना और अपने खेत का सत्यानाश करते हैं और फिर यूरिया और डाया जैसी खादें डाल जेब भी ढीली करते हैं। गेहूं के नाड़ से बनी तूड़ी वे इन दिनों में भी 350 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर खरीद रहे हैं। फरवरी का महीना आते आते दाम 500 के पार हो जाते हैं। आंकड़ों की पृष्ठभूमि में वह कहते हैं कि एक एकड़ से 12-13 क्विंटल तूड़ी निकलती है। ऐसे में यह कमाई का जरिया भी हो सकती है। अपने पशुओं के लिए मक्की व चरी की खेती कर रहे बलबीर सिंह तर्क देते हैं कि गेहूं के बाद समय नहीं होता, इसलिए नाड़ जला देते हैं। हालांकि इससे बचा जा सकता है। यदि बेहतर ढंग से गेहूं की ही कटाई कर ली जाए। थोड़ी मेहनत हो जाए तो कमाई भी हो जाती है। पर मंहगा डीजल और मंहगी हो गई लेबर थोड़ा अडं़गा जरूर बनती है। ऐसे में लोग सिर्फ अपने घर में प्रयोग के लायक ही तूड़ी बनाते हैं और शेष को आग के हवाले कर देते हैं। वहीं फायर ब्रिगेड के आंकड़े बताते हैं कि पटियाला के आसपास के ही क्षेत्रों में इस साल रबी की फसल लेने के बाद जिले के विभिन्न हिस्सों में कुल 248 आग लगने की घटनाएं फायर ब्रिगेड के सामने आई। दिलचस्प है कि बीते माह 25 व 28 अप्रैल को 25 से 30 घटनाएं एक ही दिन में लगीं। कमजोर आधारभूत ढांचे के चलते फायर ब्रिगेड इनमें से पांच स्थानों पर ही आग बुझाने के लिए पहुंच सका। बिजली कटों के दौरान फायर ब्रिगेड के पास अपनी गाडि़यों में पानी भरने का कोई समाधान नहीं है। हालांकि पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड से बीते साल इसी सीजन में आग से मुआवजा लेने वालों की पूरे राज्य में संख्या 318 थी। इस साल बढ़ी घटनाओं के पीछे मौसम को भी बड़ा जिम्मेवार माना जा रहा है। मौसम में नमी के बजाय इस साल आंधियां चली हैं और पारा 44 के पार भी पहंुचा है।
वहा रे किसान! पहले शिकायत, फिर हिमायत
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बिजली बोर्ड के जमाने से कर्मचारियों व किसानों में भ्रष्टाचार व मारपीट का रिश्ता गर्मियों और धान के सीजन में कुछ ज्यादा ही गहरा हो जाता है। पहले तो किसान शिकायत करते हैं। जब कार्रवाई की बारी आती है तो वही अधिकारी या कर्मचारी उनका खास निकल आता है। उसे छोड़ने की हिमायत होने लगती है। इसका सबसे दिलचस्प पहलू मंगलवार को पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के साथ शिअद की अंतरराष्ट्रीय किसान विंग की बैठक में सामने आया। एक ओर जहां किसानों ने पावर कॉम के अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप यह कह कर लगाए कि पैसे के बिना कोई बात नहीं सुनता वहीं पावर कॉम प्रबंधन का स्पष्टीकरण भी कुछ कम नहीं था। पावर कॉम कहता है कि किसान प्रतिनिधिमंडल के रूप में आते हैं। शिकायत करते हैं और कई बार लिखकर भी दे जाते हैं, लेकिन जब जांच के बाद सजा की बात आती है तो वही किसान उसी अफसर का सबसे करीबी हिमायती हो जाता है। केस वापस लेने भी आ पहुंचते हैं। ऐसे में शिकायत करने वाले किसानों में जागने वाली दया की इस भावना के चलते भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। किसानों से धान के सीजन से पहले उनकी मुश्किलें सुनने और फीड बैक लेने को बुलाई गई बैठक में पावर कॉम के प्रबंधकों ने स्पष्ट किया कि सिस्टम ओवरलोड है। इसे दुरुस्त करने के प्रयास जारी हैं। ट्रांसफार्मरों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है और नई लाइनें भी बिछाकर डी-लोड किया जा रहा है। सिस्टम इस बार फेल नहीं होगा इसकी इस साल कोई गारंटी तो नहीं दी जा सकती पर अगले साल तक यह सामान्य की तरह चलता रहेगा। बिजली की उपलब्धता पर वे कहते हैं कि मौसम पर बहुत कुछ निर्भर करता है। इसमें मानसून अहम है। यह ठीक रहा तो कट बहुत कम लगेंगें, हो सकता है न भी लगें। धान के सीजन में बिजली की खरीद से लेकर अन्य उपाय किए गए हैं। अनुमान है सबकुछ ठीक ही रहेगा। बैठक में पावर कॉम के मेंबर डिस्ट्रीब्यूशन इंजीनियर केडी चौधरी, प्रबंधकीय सदस्य गुरबचन सिंह बची, वीके गुप्ता, मुख्य आईआर आरपी पांडव ने भाग लिया। वहीं किसान संगठन के प्रतिनिधिमंडल में बूटा सिंह शादीपुर, राम सिंह, परमजीत सिंह, बलविंदर सिंह मलकपुर, हरजिंदर सिंह बल, जसपाल सिंह कवातरा, बलबीर सिंह उपली, सवर्ण सिंह रताखेड़ा, हरदयाल सिंह आदि मौजूद थे।
बिजली बोर्ड के जमाने से कर्मचारियों व किसानों में भ्रष्टाचार व मारपीट का रिश्ता गर्मियों और धान के सीजन में कुछ ज्यादा ही गहरा हो जाता है। पहले तो किसान शिकायत करते हैं। जब कार्रवाई की बारी आती है तो वही अधिकारी या कर्मचारी उनका खास निकल आता है। उसे छोड़ने की हिमायत होने लगती है। इसका सबसे दिलचस्प पहलू मंगलवार को पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के साथ शिअद की अंतरराष्ट्रीय किसान विंग की बैठक में सामने आया। एक ओर जहां किसानों ने पावर कॉम के अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप यह कह कर लगाए कि पैसे के बिना कोई बात नहीं सुनता वहीं पावर कॉम प्रबंधन का स्पष्टीकरण भी कुछ कम नहीं था। पावर कॉम कहता है कि किसान प्रतिनिधिमंडल के रूप में आते हैं। शिकायत करते हैं और कई बार लिखकर भी दे जाते हैं, लेकिन जब जांच के बाद सजा की बात आती है तो वही किसान उसी अफसर का सबसे करीबी हिमायती हो जाता है। केस वापस लेने भी आ पहुंचते हैं। ऐसे में शिकायत करने वाले किसानों में जागने वाली दया की इस भावना के चलते भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। किसानों से धान के सीजन से पहले उनकी मुश्किलें सुनने और फीड बैक लेने को बुलाई गई बैठक में पावर कॉम के प्रबंधकों ने स्पष्ट किया कि सिस्टम ओवरलोड है। इसे दुरुस्त करने के प्रयास जारी हैं। ट्रांसफार्मरों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है और नई लाइनें भी बिछाकर डी-लोड किया जा रहा है। सिस्टम इस बार फेल नहीं होगा इसकी इस साल कोई गारंटी तो नहीं दी जा सकती पर अगले साल तक यह सामान्य की तरह चलता रहेगा। बिजली की उपलब्धता पर वे कहते हैं कि मौसम पर बहुत कुछ निर्भर करता है। इसमें मानसून अहम है। यह ठीक रहा तो कट बहुत कम लगेंगें, हो सकता है न भी लगें। धान के सीजन में बिजली की खरीद से लेकर अन्य उपाय किए गए हैं। अनुमान है सबकुछ ठीक ही रहेगा। बैठक में पावर कॉम के मेंबर डिस्ट्रीब्यूशन इंजीनियर केडी चौधरी, प्रबंधकीय सदस्य गुरबचन सिंह बची, वीके गुप्ता, मुख्य आईआर आरपी पांडव ने भाग लिया। वहीं किसान संगठन के प्रतिनिधिमंडल में बूटा सिंह शादीपुर, राम सिंह, परमजीत सिंह, बलविंदर सिंह मलकपुर, हरजिंदर सिंह बल, जसपाल सिंह कवातरा, बलबीर सिंह उपली, सवर्ण सिंह रताखेड़ा, हरदयाल सिंह आदि मौजूद थे।
कैसी मशीनें, किसानों को खबर तक नही
धान की पनीरी की रोपाई मशीनों प्रति सुस्त है किसान
नरेगा ने रोकी लैबर की आमद, शहर में दिहाड़ी भी बढ़ी
भूपेश चट्ठा, पटियाला : धान की रोपाई सीधे मशीन से कर मजदूरों की कमी पर पार पाने के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाने के पंजाब कृषि विभाग के प्रयासों में संभवत: किसानों की कोई खास दिलचस्पी नहीं है। हालांकि मजदूरी की तुलना में सस्ती पड़ने वाली मशीन से भी उन्हीं का फायदा है और उत्पादन बढ़ने से भी उन्ही को सीधा लाभ मिलेगा। आलम यह है कि कई ऐसे पूरे के पूरे ब्लाक हैं जहां किसानों ने न तो मशीन अभी तक देखी है और न ही इसमें कोई मतलब है। बात प्रोग्रेसिव किसानों कि करें तो भी परिणाम अच्छे नहीं आते। धर्मेड़ी गांव के किसान गुरप्रीत सिंह पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित उनके गांव में अभी तक किसी ने बात नहीं की है, लेबर की कमी है, इसका अनुभव बीते साल हो चुका है। पर हमारे किसान भाई पहले नहीं सोचते, आज भी कोई नाम लेवा नहीं है। जब सिर पर पड़ेगी, फिर हो हल्ला होगा। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने मशीन नहीं देखी न ही इस दिशा में कोई प्रयास ही किया है और उनके जैसे लोगों की संख्या खासी ज्यादा है। वहीं कृषि विशेषज्ञ डा. बाएस सोहल कहते हैं कि शहर में दिहाड़ी 200 के पार जा चुकी है। गांव में 130 रुपये आम है तो सीजन में यह 150 के पार होती है। मजदूरी ने मंहगाई के साथ ही बढ़ना है और इसे बढ़ते ही रहना है। बीते साल खेत में धान की रोपाई की मजदूरी प्रति एकड़ 1500 चली है। इस बार भी नहीं लगता कि नरेगा प्रभाव खत्म हो गया है। अनुमान है कि इस साल धान की रोपाई दो हजार पर आ जाए। ऐसे में मशीनों की ओर हमे ठीक वैसे ही रुख करना होगा जैसे हमने हल छोड़ कर ट्रैक्टर संभाल लिए। डा. सोहल कहते हैं कि जापान की एक कंपनी कम्बोटो पंजाब के खेतों में जा कर इस मशीन का प्रर्दशन कर भी रही है। लाख से डेढ़ लाख रुपये कि ये मशीने एक घंटे में दो से ढ़ाई एकड़ में रोपाई करने में सक्षम हैं। कुछ मशीने पूरी तरह से आटोमेटिक हैं तो कुछ के पीछे चलना पड़ता है, चार से आठ लाइनों में रोपाई करने वाली इन मशीनों के साथ कहां कैसे और कितनी गड़बड़ी हुई, आपरेट करने में जहां दिक्कत आई उसे भी किसानों को विभाग बता रहा है। रकबा बीते साल तो काफी कम था, लेकिन इसे लगातार बढ़ते रहना है।
क्या कहते हैं मुख्य कृषि अधिकारी
मशीन से धान की रोपाई करने से ठीक एक महीना पहले होने वाली धान की बिजाई की समझ खासी जरूरी है। धान की बिजाई यदि किसान एक समान तरीके से मैट पर करता है तभी मशीन का प्रयोग किया जा सकेगा, इसके लिए उचित जानकारी होनी जरूरी है। कृषि विभाग विभिन्न स्थानों पर शिविर लगा कर तकनीक को प्रदर्शित कर भी रहा है। पिछले कड़वे अनुभवों पर वह कहते हैं कि मशीनों में कोई खराबी नहीं थी, किसानों को ढ़ंग से पनीरी लगानी नहीं आ सकी इसी वजह से गड़बड़ी हुई। इसका समाधान किया जा रहा है। किसानों में लोकप्रियता पर वह कहते है कि जिले में तीन मशीनें चल रही है और इतने ही किसानों ने खरीदने की इच्छा जताई है। इस साल इनसे रोपाई का रकबा पांच हजार से ऊपर जा सकता है।
नरेगा ने रोकी लैबर की आमद, शहर में दिहाड़ी भी बढ़ी
भूपेश चट्ठा, पटियाला : धान की रोपाई सीधे मशीन से कर मजदूरों की कमी पर पार पाने के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाने के पंजाब कृषि विभाग के प्रयासों में संभवत: किसानों की कोई खास दिलचस्पी नहीं है। हालांकि मजदूरी की तुलना में सस्ती पड़ने वाली मशीन से भी उन्हीं का फायदा है और उत्पादन बढ़ने से भी उन्ही को सीधा लाभ मिलेगा। आलम यह है कि कई ऐसे पूरे के पूरे ब्लाक हैं जहां किसानों ने न तो मशीन अभी तक देखी है और न ही इसमें कोई मतलब है। बात प्रोग्रेसिव किसानों कि करें तो भी परिणाम अच्छे नहीं आते। धर्मेड़ी गांव के किसान गुरप्रीत सिंह पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित उनके गांव में अभी तक किसी ने बात नहीं की है, लेबर की कमी है, इसका अनुभव बीते साल हो चुका है। पर हमारे किसान भाई पहले नहीं सोचते, आज भी कोई नाम लेवा नहीं है। जब सिर पर पड़ेगी, फिर हो हल्ला होगा। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने मशीन नहीं देखी न ही इस दिशा में कोई प्रयास ही किया है और उनके जैसे लोगों की संख्या खासी ज्यादा है। वहीं कृषि विशेषज्ञ डा. बाएस सोहल कहते हैं कि शहर में दिहाड़ी 200 के पार जा चुकी है। गांव में 130 रुपये आम है तो सीजन में यह 150 के पार होती है। मजदूरी ने मंहगाई के साथ ही बढ़ना है और इसे बढ़ते ही रहना है। बीते साल खेत में धान की रोपाई की मजदूरी प्रति एकड़ 1500 चली है। इस बार भी नहीं लगता कि नरेगा प्रभाव खत्म हो गया है। अनुमान है कि इस साल धान की रोपाई दो हजार पर आ जाए। ऐसे में मशीनों की ओर हमे ठीक वैसे ही रुख करना होगा जैसे हमने हल छोड़ कर ट्रैक्टर संभाल लिए। डा. सोहल कहते हैं कि जापान की एक कंपनी कम्बोटो पंजाब के खेतों में जा कर इस मशीन का प्रर्दशन कर भी रही है। लाख से डेढ़ लाख रुपये कि ये मशीने एक घंटे में दो से ढ़ाई एकड़ में रोपाई करने में सक्षम हैं। कुछ मशीने पूरी तरह से आटोमेटिक हैं तो कुछ के पीछे चलना पड़ता है, चार से आठ लाइनों में रोपाई करने वाली इन मशीनों के साथ कहां कैसे और कितनी गड़बड़ी हुई, आपरेट करने में जहां दिक्कत आई उसे भी किसानों को विभाग बता रहा है। रकबा बीते साल तो काफी कम था, लेकिन इसे लगातार बढ़ते रहना है।
क्या कहते हैं मुख्य कृषि अधिकारी
मशीन से धान की रोपाई करने से ठीक एक महीना पहले होने वाली धान की बिजाई की समझ खासी जरूरी है। धान की बिजाई यदि किसान एक समान तरीके से मैट पर करता है तभी मशीन का प्रयोग किया जा सकेगा, इसके लिए उचित जानकारी होनी जरूरी है। कृषि विभाग विभिन्न स्थानों पर शिविर लगा कर तकनीक को प्रदर्शित कर भी रहा है। पिछले कड़वे अनुभवों पर वह कहते हैं कि मशीनों में कोई खराबी नहीं थी, किसानों को ढ़ंग से पनीरी लगानी नहीं आ सकी इसी वजह से गड़बड़ी हुई। इसका समाधान किया जा रहा है। किसानों में लोकप्रियता पर वह कहते है कि जिले में तीन मशीनें चल रही है और इतने ही किसानों ने खरीदने की इच्छा जताई है। इस साल इनसे रोपाई का रकबा पांच हजार से ऊपर जा सकता है।
किसका करें दोहन, उलझन में मन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
इसे भूल-भुलैया अथवा कुछ भी कहा जाए, लेकिन यह कहना सही होगा कि पंजाब का किसान इस समय दोहरी सरकारी नीतियों से परेशान है। भूजल का सर्वाधिक दोहन करने वाली धान की परंपरागत तकनीक से खेती करने वाले किसान इस समय यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे भूजल बचाने के लिए धान की सीधी बिजाई करें अथवा (विदेश से मंगवाई मशीन) पैडी ट्रांसप्लांटर की मदद लें। जहां कृषि विभाग सीधी बिजाई की वकालत कर रहा है, वहीं खेत मजदूरों की कमी का हवाला देकर वह पैडी ट्रांसप्लांटर भी आयात कर रहा है। यह सही है कि हरित क्रांति से प्रभावित होकर प्रदेश में अधिक पानी-अधिक खाद-अधिक उपज के सिद्धांत को लागू करने के लिए ग्राफ्टिंग तकनीक अपनाई गई। इसमें पहले बिजाई कर, तैयार पनीरी की खेत में रोपाई की जाने लगी। कहा गया कि इससे पौधा जल्दी पनपता है। चार दशकों से चली आ रही इस तकनीक ने भूजल का घातक दोहन किया। नदियों के बाद नहरों को सुखा दिया। प्राकृतिक संसाधनों के भरपूर दोहन और मजदूरों की किल्लत ने अन्य प्रयोग करने को मजबूर किया तो सीधी बिजाई (खेत में बीज छिड़क कर खेती करना) की तकनीक सामने आई। इससे उपज एक-दो क्विंटल अधिक निकली और खर्च भी प्रति एकड़ 6-7 हजार रुपये कम हो गया। इसके अंतर्गत रकबा भी बढ़ रहा है। मगर त्रासदी है कि इसके बावजूद जापान से पैडी ट्रांसप्लांटर नामक मशीनें आयात की जा रही हैं। प्राइवेट कंपनियां हर ब्लाक में इनका प्रदर्शन भी कर रही हैं। ऐसे में किसान असमंजस में हैं कि वे क्या करें? अगर सीधी बिजाई इतनी ही अच्छी है तो सरकार मशीनों का प्रचार क्यों कर रही है? बीते बुधवार को एनजीओ खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त ने कहा कि सरकार की कोई कृषि प्रौद्योगिकी नीति ही नहीं है। हरित क्रांति से पहले बिना रोपाई के धान की फसल ली जाती थी, जिसे हरित क्रांति ने भुला दिया। कृषि विभाग के निदेशक डा. बीएस सिद्धू स्पष्ट करते हैं कि सरकार असमंजस में नहीं है। विभाग ने किसानों को दो तरह के विकल्प दिए हैं-सीधी बिजाई नई तकनीक है, जिसके लोकप्रिय होने में थोड़ा समय लग सकता है। पानी की बचत को खुल कर स्वीकार करते हुए वह कहते हैं कि हर मिट्टी की अपनी समस्याएं होती हैं। विभाग हल्की जमीन पर सीधी बिजाई की अभी सिफारिश नहीं कर रहा है। पैडी ट्रांसप्लांटरों के आयात पर डा. सिद्धू कहते हैं कि पंजाब है, यहां सब कुछ चलेगा। हाथ से रोपाई भी होगी, सीधी बिजाई भी और मशीन से खेती भी।
इसे भूल-भुलैया अथवा कुछ भी कहा जाए, लेकिन यह कहना सही होगा कि पंजाब का किसान इस समय दोहरी सरकारी नीतियों से परेशान है। भूजल का सर्वाधिक दोहन करने वाली धान की परंपरागत तकनीक से खेती करने वाले किसान इस समय यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे भूजल बचाने के लिए धान की सीधी बिजाई करें अथवा (विदेश से मंगवाई मशीन) पैडी ट्रांसप्लांटर की मदद लें। जहां कृषि विभाग सीधी बिजाई की वकालत कर रहा है, वहीं खेत मजदूरों की कमी का हवाला देकर वह पैडी ट्रांसप्लांटर भी आयात कर रहा है। यह सही है कि हरित क्रांति से प्रभावित होकर प्रदेश में अधिक पानी-अधिक खाद-अधिक उपज के सिद्धांत को लागू करने के लिए ग्राफ्टिंग तकनीक अपनाई गई। इसमें पहले बिजाई कर, तैयार पनीरी की खेत में रोपाई की जाने लगी। कहा गया कि इससे पौधा जल्दी पनपता है। चार दशकों से चली आ रही इस तकनीक ने भूजल का घातक दोहन किया। नदियों के बाद नहरों को सुखा दिया। प्राकृतिक संसाधनों के भरपूर दोहन और मजदूरों की किल्लत ने अन्य प्रयोग करने को मजबूर किया तो सीधी बिजाई (खेत में बीज छिड़क कर खेती करना) की तकनीक सामने आई। इससे उपज एक-दो क्विंटल अधिक निकली और खर्च भी प्रति एकड़ 6-7 हजार रुपये कम हो गया। इसके अंतर्गत रकबा भी बढ़ रहा है। मगर त्रासदी है कि इसके बावजूद जापान से पैडी ट्रांसप्लांटर नामक मशीनें आयात की जा रही हैं। प्राइवेट कंपनियां हर ब्लाक में इनका प्रदर्शन भी कर रही हैं। ऐसे में किसान असमंजस में हैं कि वे क्या करें? अगर सीधी बिजाई इतनी ही अच्छी है तो सरकार मशीनों का प्रचार क्यों कर रही है? बीते बुधवार को एनजीओ खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त ने कहा कि सरकार की कोई कृषि प्रौद्योगिकी नीति ही नहीं है। हरित क्रांति से पहले बिना रोपाई के धान की फसल ली जाती थी, जिसे हरित क्रांति ने भुला दिया। कृषि विभाग के निदेशक डा. बीएस सिद्धू स्पष्ट करते हैं कि सरकार असमंजस में नहीं है। विभाग ने किसानों को दो तरह के विकल्प दिए हैं-सीधी बिजाई नई तकनीक है, जिसके लोकप्रिय होने में थोड़ा समय लग सकता है। पानी की बचत को खुल कर स्वीकार करते हुए वह कहते हैं कि हर मिट्टी की अपनी समस्याएं होती हैं। विभाग हल्की जमीन पर सीधी बिजाई की अभी सिफारिश नहीं कर रहा है। पैडी ट्रांसप्लांटरों के आयात पर डा. सिद्धू कहते हैं कि पंजाब है, यहां सब कुछ चलेगा। हाथ से रोपाई भी होगी, सीधी बिजाई भी और मशीन से खेती भी।
मधुमक्खी को मानव का डंक
भूपेश चट्ठा, पटियाला
जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन की दशकों पहले की गई भविष्यवाणी कि आखिरी मधुमक्खी के मरने के बाद समूची मानवता के पास सात-आठ साल से अधिक नहीं बचेंगे, पंजाब की काटन बेल्ट में कुछ लोगों को याद आनी शुरू हो गई है। इस बार अनुभव किया गया है कि मधुमक्खियां बीटी काटन के खेतों के पास भी नहीं फटक रहीं। बीटी काटन के बीज प्रयोगशाला में बनाए जेनेटिकली मॉडीफाइड (जीएम) सीड्स की श्रेणी में आते हैं। पटियाला के राजिंदरा अस्पताल में एसएमओ व कम्युनिटी मेडिसन में एमडी डा. अमर सिंह आजाद बताते हैं कि बीटी काटन से मधुमक्खियों का नर्वस सिस्टम प्रभावित होने से इनकी छत्ते पर लौटने की सेंस खत्म होती जा रही है, इसे तकनीकी भाषा में कालोनी क्लैप्सकहते हैं। कोई भी मधुमक्खी कालोनी के बिना नहीं रह सकती। वापस न पहुंचने की सूरत में वे मर जाती हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ जीएम फसलें ही जिम्मेवार नहीं हैं। हर तरफ पेड़-पौधों, फसलों पर जहरीली दवाओं का छिड़काव हो रहा है, जड़ों में रसायन डाले जा रहे हैं। ऐसे में इनका खाना अब पेस्टिसाइड्स से बनने लगा है और प्रजनन की क्षमता कम होती जा रही है। वे बताते हैं कि अभी आस्ट्रेलियन मधुमक्खी बची हुई है, इस पालतू मक्खी की कालोनियां पास-पास होने के चलते प्रभाव में उतनी नहीं आई हैं। उल्लेखनीय है कि राज्य के मालवा इलाके में संगरूर-मानसा से शुरू हो फरीदकोट, अबोहर, फाजिल्का व राजस्थान में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ तक की बेल्ट में नरमे के खेतों में कभी इन्हीं मधुमक्खियों के छत्ते खूब लगा करते थे, लेकिन अब सिर्फ पंजाब भर में ही साढ़े पांच लाख हेक्टेयर में कपास की खेती करने के तय किए गए लक्ष्य में से 85 फीसदी के बीटी काटन के जरिए हासिल किए जाने की पूरी उम्मीद है। फाइव एलिमेंट्स हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि प्रकृति में जितने भी फल, फूल और हैं, वे सब इन्हीं की देन हैं। अगर मधुमक्खियां पॉलीनेशन (परागण) प्रक्रिया में पराग के कण एक पौधे से दूसरे पौधे तक न ले जाएं तो कुछ भी नहीं पनपने वाला। सब कुछ समाप्त हो जाएगा, इसमें सबसे पहले प्रकृति में से रंग गायब होंगे। मालवा क्षेत्र में खेती पर नजर रखने वाले खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त कहते हैं कि नरमे की खेती वाला क्षेत्र अब काटन बेल्ट हो गया है, कभी यहां नरमे में ही मधुमक्खियों के छत्ते लग जाया करते थे, कपास के फलने फूलने का सबसे बड़ा कारण ही यह देसी मधुमक्खी हुआ करती थी, जो आज पास नहीं फटक रहीं। वे बताते हैं कि शुरुआत में उनके पास हरियाणा के जींद जिले से बीते साल ऐसी खबरें आई थीं। वहीं, अमृतसर के पर्यावरण लेखक डा. अर्नेस्ट कहते हैं कि वे बचपन में 10 से 15 फीट तक के छत्ते देखते आए हैं अब तीन से चार फीट से अधिक का नहीं दिखता। वे बताते है कि गुरदासपुर क्षेत्र में फलों के बाग से शहद निकालने का अलग से पांच-सात हजार रुपये का ठेका हुआ करता था, पर अब यह चलन सुनाई ही नहीं दे रहा। डा. अर्नेस्ट के अनुसार खेती, पर्यावरण, वाणिज्य व अर्थशास्त्र में जो काम मधुमक्खियां करती हैं, वह यदि इंसान या मशीन को करना पड़े तो विश्र्व भर में 32 बिलियन डालर का खर्च आए।
जाने माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन की दशकों पहले की गई भविष्यवाणी कि आखिरी मधुमक्खी के मरने के बाद समूची मानवता के पास सात-आठ साल से अधिक नहीं बचेंगे, पंजाब की काटन बेल्ट में कुछ लोगों को याद आनी शुरू हो गई है। इस बार अनुभव किया गया है कि मधुमक्खियां बीटी काटन के खेतों के पास भी नहीं फटक रहीं। बीटी काटन के बीज प्रयोगशाला में बनाए जेनेटिकली मॉडीफाइड (जीएम) सीड्स की श्रेणी में आते हैं। पटियाला के राजिंदरा अस्पताल में एसएमओ व कम्युनिटी मेडिसन में एमडी डा. अमर सिंह आजाद बताते हैं कि बीटी काटन से मधुमक्खियों का नर्वस सिस्टम प्रभावित होने से इनकी छत्ते पर लौटने की सेंस खत्म होती जा रही है, इसे तकनीकी भाषा में कालोनी क्लैप्सकहते हैं। कोई भी मधुमक्खी कालोनी के बिना नहीं रह सकती। वापस न पहुंचने की सूरत में वे मर जाती हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ जीएम फसलें ही जिम्मेवार नहीं हैं। हर तरफ पेड़-पौधों, फसलों पर जहरीली दवाओं का छिड़काव हो रहा है, जड़ों में रसायन डाले जा रहे हैं। ऐसे में इनका खाना अब पेस्टिसाइड्स से बनने लगा है और प्रजनन की क्षमता कम होती जा रही है। वे बताते हैं कि अभी आस्ट्रेलियन मधुमक्खी बची हुई है, इस पालतू मक्खी की कालोनियां पास-पास होने के चलते प्रभाव में उतनी नहीं आई हैं। उल्लेखनीय है कि राज्य के मालवा इलाके में संगरूर-मानसा से शुरू हो फरीदकोट, अबोहर, फाजिल्का व राजस्थान में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ तक की बेल्ट में नरमे के खेतों में कभी इन्हीं मधुमक्खियों के छत्ते खूब लगा करते थे, लेकिन अब सिर्फ पंजाब भर में ही साढ़े पांच लाख हेक्टेयर में कपास की खेती करने के तय किए गए लक्ष्य में से 85 फीसदी के बीटी काटन के जरिए हासिल किए जाने की पूरी उम्मीद है। फाइव एलिमेंट्स हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि प्रकृति में जितने भी फल, फूल और हैं, वे सब इन्हीं की देन हैं। अगर मधुमक्खियां पॉलीनेशन (परागण) प्रक्रिया में पराग के कण एक पौधे से दूसरे पौधे तक न ले जाएं तो कुछ भी नहीं पनपने वाला। सब कुछ समाप्त हो जाएगा, इसमें सबसे पहले प्रकृति में से रंग गायब होंगे। मालवा क्षेत्र में खेती पर नजर रखने वाले खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त कहते हैं कि नरमे की खेती वाला क्षेत्र अब काटन बेल्ट हो गया है, कभी यहां नरमे में ही मधुमक्खियों के छत्ते लग जाया करते थे, कपास के फलने फूलने का सबसे बड़ा कारण ही यह देसी मधुमक्खी हुआ करती थी, जो आज पास नहीं फटक रहीं। वे बताते हैं कि शुरुआत में उनके पास हरियाणा के जींद जिले से बीते साल ऐसी खबरें आई थीं। वहीं, अमृतसर के पर्यावरण लेखक डा. अर्नेस्ट कहते हैं कि वे बचपन में 10 से 15 फीट तक के छत्ते देखते आए हैं अब तीन से चार फीट से अधिक का नहीं दिखता। वे बताते है कि गुरदासपुर क्षेत्र में फलों के बाग से शहद निकालने का अलग से पांच-सात हजार रुपये का ठेका हुआ करता था, पर अब यह चलन सुनाई ही नहीं दे रहा। डा. अर्नेस्ट के अनुसार खेती, पर्यावरण, वाणिज्य व अर्थशास्त्र में जो काम मधुमक्खियां करती हैं, वह यदि इंसान या मशीन को करना पड़े तो विश्र्व भर में 32 बिलियन डालर का खर्च आए।
बचेगा पानी, धरा होगी धानी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के भूमिगत जल स्तर का दिवाला निकालने वाली धान की खेती में ही अब जल संरक्षण की किरण दिखाई देने लगी है। किसानों में बेहतरीन परिणाम दे रही धान की सीधी बिजाई तकनीक हर साल तीन सौ फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। शुरूआती झटकों के बाद इसकी लोकप्रियता की गति इतनी तेज हो गई है कि कृषि विभाग को सीधी बिजाई करने अथवा किराये पर मशीन दे करवाने के लिए इस साल मशीनों की संख्या को बढ़ा कर दो गुना करना पड़ा है। हालांकि धान का बीज छिड़ककर सीधी बिजाई अभी प्रोग्रेसिव हो चुके किसानों के गले नहीं उतर रही है। एक जून से शुरू हो गई सीधी बिजाई पर मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना बताते हैं कि बीते साल यहां रकबा 17 सौ एकड़ था जो इस बार पांच हजार एकड़ के पार जाना तय है। वे कहते हैं कि पिछले साल विभाग के पास मात्र तीन मशीनें थी लेकिन इस साल मांग को देखते हुए हर ब्लाक के लिए एक मशीन का प्रबंध कर इन्हें बढ़ा कर छह कर दिया गया है। आत्मा योजना के तहत खरीदी गई इस मशीन से बिजाई करवाने पर किसान से मात्र 50 रुपये प्रति एकड़ की वसूली की जाती है जबकि मजदूरों से रोपाई करवाने पर 15 सौ से दो हजार रुपये तक चुकाने पड़ते हैं। सीधी बिजाई का लाभ ही लाभ है। पर्यावरण के लिहाज से देखें तो 5500 लीटर पानी पी जाने वाला एक किलो चावल सीधी बिजाई से आधा ही पानी पीएगा। इस विधि से फसल में कमी बिलकुल नहीं देखी गई अलबत्ता इसके बढ़ने की उम्मीद जरूर बन पड़ी है। खुराना के अनुसार 35-40 हजार रुपये की ड्रिल मशीन एक दिन में आठ से दस एकड़ में आसानी से बिजाई कर देती है। जून के पहले दो सप्ताह में यदि आप धान की पीआर अथवा पूसा किस्में लगा सकते हैं तो 15 जून के बाद से बासमती व 1121 जैसी अधिक मुनाफा देने वाली मंहगी किस्मों की बिजाई कर सकते हैं। खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त कहते हैं कि इस तकनीक से पानी की बचत होती है। यह साबित हो गया है। कई मामलों में तो पानी की खपत मात्र एक तिहाई ही रह रही है, लेकिन इसमें खरपतवार की समस्या है इसे दूर किया जाना है। वे कहते हैं कि खेत में अनावश्यक रूप से उगे वीड्स को समाप्त करने के लिए हमें वीड्ीसाइड डालने से बचना चाहिए। तकनीक चूंकि इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीटयूट मनीला से आई है। ऐसे में हमे इसे पंजाब लायक बनाने में थोड़े प्रयोग करने पड़ेंगे। इसके लिए जरूरी है कि राइस इंटेंसिफाई तकनीक का मिश्रण इसमें किया जाए। खेत में ही वीड्स की गुड़ाई करने से वे आर्गेनिक खाद के रूप में फसल के काम आएंगे और मंहगी तथा कथित दवाओं पर किसानों का खर्च भी नहीं होगा। इस तरह से बिजाई करने पर पौधा न केवल जल्दी पनपता और फसल पकती है, बल्कि धान के बाद गेहूं की बिजाई करने को समय भी अधिक मिलता है। पर्यावरण में मिथेन गैसों का रिसाव बहुत कम होता है। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने मंगलवार से कृषि क्षेत्र को बिजली सप्लाई बढ़ा कर चार घंटे कर दी है, यह सप्लाई धान की इस तरह से बिजाई करने वालों के लिए कितनी फायदेमंद रहेगी इस पर कृषि विभाग तो खामोश पर अब यह मांग भी उठने लगी है कि सीधी बिजाई करने वाले किसानों को एक जून से ही आठ घंटे बिजली सप्लाई दी जाए, बोनस के रूप में दिया जाने वाला लाभ किसानों को इस ओर आकर्षित ही करेगा।
पंजाब के भूमिगत जल स्तर का दिवाला निकालने वाली धान की खेती में ही अब जल संरक्षण की किरण दिखाई देने लगी है। किसानों में बेहतरीन परिणाम दे रही धान की सीधी बिजाई तकनीक हर साल तीन सौ फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। शुरूआती झटकों के बाद इसकी लोकप्रियता की गति इतनी तेज हो गई है कि कृषि विभाग को सीधी बिजाई करने अथवा किराये पर मशीन दे करवाने के लिए इस साल मशीनों की संख्या को बढ़ा कर दो गुना करना पड़ा है। हालांकि धान का बीज छिड़ककर सीधी बिजाई अभी प्रोग्रेसिव हो चुके किसानों के गले नहीं उतर रही है। एक जून से शुरू हो गई सीधी बिजाई पर मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना बताते हैं कि बीते साल यहां रकबा 17 सौ एकड़ था जो इस बार पांच हजार एकड़ के पार जाना तय है। वे कहते हैं कि पिछले साल विभाग के पास मात्र तीन मशीनें थी लेकिन इस साल मांग को देखते हुए हर ब्लाक के लिए एक मशीन का प्रबंध कर इन्हें बढ़ा कर छह कर दिया गया है। आत्मा योजना के तहत खरीदी गई इस मशीन से बिजाई करवाने पर किसान से मात्र 50 रुपये प्रति एकड़ की वसूली की जाती है जबकि मजदूरों से रोपाई करवाने पर 15 सौ से दो हजार रुपये तक चुकाने पड़ते हैं। सीधी बिजाई का लाभ ही लाभ है। पर्यावरण के लिहाज से देखें तो 5500 लीटर पानी पी जाने वाला एक किलो चावल सीधी बिजाई से आधा ही पानी पीएगा। इस विधि से फसल में कमी बिलकुल नहीं देखी गई अलबत्ता इसके बढ़ने की उम्मीद जरूर बन पड़ी है। खुराना के अनुसार 35-40 हजार रुपये की ड्रिल मशीन एक दिन में आठ से दस एकड़ में आसानी से बिजाई कर देती है। जून के पहले दो सप्ताह में यदि आप धान की पीआर अथवा पूसा किस्में लगा सकते हैं तो 15 जून के बाद से बासमती व 1121 जैसी अधिक मुनाफा देने वाली मंहगी किस्मों की बिजाई कर सकते हैं। खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त कहते हैं कि इस तकनीक से पानी की बचत होती है। यह साबित हो गया है। कई मामलों में तो पानी की खपत मात्र एक तिहाई ही रह रही है, लेकिन इसमें खरपतवार की समस्या है इसे दूर किया जाना है। वे कहते हैं कि खेत में अनावश्यक रूप से उगे वीड्स को समाप्त करने के लिए हमें वीड्ीसाइड डालने से बचना चाहिए। तकनीक चूंकि इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीटयूट मनीला से आई है। ऐसे में हमे इसे पंजाब लायक बनाने में थोड़े प्रयोग करने पड़ेंगे। इसके लिए जरूरी है कि राइस इंटेंसिफाई तकनीक का मिश्रण इसमें किया जाए। खेत में ही वीड्स की गुड़ाई करने से वे आर्गेनिक खाद के रूप में फसल के काम आएंगे और मंहगी तथा कथित दवाओं पर किसानों का खर्च भी नहीं होगा। इस तरह से बिजाई करने पर पौधा न केवल जल्दी पनपता और फसल पकती है, बल्कि धान के बाद गेहूं की बिजाई करने को समय भी अधिक मिलता है। पर्यावरण में मिथेन गैसों का रिसाव बहुत कम होता है। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने मंगलवार से कृषि क्षेत्र को बिजली सप्लाई बढ़ा कर चार घंटे कर दी है, यह सप्लाई धान की इस तरह से बिजाई करने वालों के लिए कितनी फायदेमंद रहेगी इस पर कृषि विभाग तो खामोश पर अब यह मांग भी उठने लगी है कि सीधी बिजाई करने वाले किसानों को एक जून से ही आठ घंटे बिजली सप्लाई दी जाए, बोनस के रूप में दिया जाने वाला लाभ किसानों को इस ओर आकर्षित ही करेगा।
नदिया बिक गई माटी के मोल ghagger river is just 10 km. long, rest is severage
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के बंटवारे में झेलम और चेनाब अलग हुई तो दुख सहलाने को मालवा व बांगर को अलग करने वाले घग्गर दरिया को याद कर कहा जाने लगा कि आज भी हमारे पास चार नदियां तो हैं। लेकिन बंटवारे को एक शताब्दी भी न बीती कि सदियों से मालवा की लाइफ लाइन बनी घग्गर नदी गंदे नाले में कब बदल गई किसी को खबर नहीं हुई। मुनाफा कमाने वाले उद्योगों ने इसकी दुगर्ति कर दी। इसे प्रदूषित करके। रही-सही कसर रेत बजरी के धंधेबाजों ने पूरी कर दी। अवैध खनन खनन करके। घग्गर बिखर गई, बिलख गई। हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की डगशाई की 1927 मीटर की ऊंचाई के अपने उद्गम स्थल से मात्र 10 किलोमीटर आगे बढ़ते ही यह फैक्टि्रयों के प्रदूषित व स्थानीय निकाय के अनट्रीटेड सीवरेज से गंदे नाले में बदलना शुरू होती है। पंजाब में इसका स्वागत एसएएस नगर के सुखना चो (नाले) के साथ आए मनीमाजरा, पंचकुला, जीरकपुर और अंबाला-चंडीगढ़ के सीवरेज भी आ मिलते हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से किए गए एक सर्वे के अनुसार यहां पुल पर बीओडी व सीओडी की मात्रा 132 व 240 एमजी और कैल्शियम व मैग्नीशियम 160 व 52 एमजी पर आ जाता है। इससे पहले नाईकेटा पेपर मिल मुबारिकपुर से पहले लिए गए सैंपलों में आर्गेनिक तत्वों में बीओडी, सीओडी की मात्रा क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम, जिंक 0.46एमजी, कैल्शियम 28 एमजी,व मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। चंडीगढ़ के ढ़कांसू नाले के इसमें मिलने के बाद जल जीवन 60 फीसदी से गिर कर 20 फीसदी रह जाता है। इस पानी में किसी भी तरह की मछली 96 घंटे में मर जाती है। स्पष्ट है कि अपनी शुरूआत से दस किलोमीटर पर सीवरेज में बदलना शुरू हुई घग्गर का पानी यहां तक आते आते तेजाबी हो चुका है। राजस्व विभाग पंजाब के आंकड़े बताते हैं कि घग्गर नदी में पटियाला के समाना शहर से आगे गुरदयाल पुरा बीड़ तक में भी मछलियां पकड़ने के ठेके दिए जाते रहे हैं। खन्नौरी व मूणक के सीवरेज, शराब फैक्टि्रयों, गन्ना मिलों के अपशिष्ट पदार्थो के मिलने के बाद पानी की हालत इस कदर बिगड़ जाती है कि इसके सींचे जल से पैदा हुई सब्जियों में शीशा, कैडमियम, क्रोमियम, लोहा तय सीमा से कहीं अधिक पाया गया। नदी के दोनो ओर 250 मीटर की सीमा में नलकूपों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, हालांकि धरती अभी बची हुई है। बारिश के दिनों में इसके तेजाबीपन में 20 फीसदी की कमी आ जाती है। इन दिनों में कीड़े मकोड़ों के रूप में जीवन पलना शुरू होता है लेकिन इस सीजन के अलावा हरियाणा से आने वाले बुड्ढा नाला के गांव सागरा के पास मिलने के बाद इसमें से जीवन सौ फीसदी समाप्त है। जानवरों के खुर तक गला देने वाला पानी पंजाब ही नहीं, राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में पीलिया फैलने, पशुओं में मुंह-खुर की बीमारियों का कारण बनता है। प्रदूषण की मार तो पड़ी ही, कमाई के चक्कर में अवैध खनन करने वालों ने भी इस नदी के किनारों को खोखला कर दिया। पहाड़ से उतर तलहटी में आते ही इसके किनारे दिन रात चोरी छिपे लगे ट्रैक्टरों- ट्रालियों ने नदी का वेग बिगाड़ा।
पंजाब के बंटवारे में झेलम और चेनाब अलग हुई तो दुख सहलाने को मालवा व बांगर को अलग करने वाले घग्गर दरिया को याद कर कहा जाने लगा कि आज भी हमारे पास चार नदियां तो हैं। लेकिन बंटवारे को एक शताब्दी भी न बीती कि सदियों से मालवा की लाइफ लाइन बनी घग्गर नदी गंदे नाले में कब बदल गई किसी को खबर नहीं हुई। मुनाफा कमाने वाले उद्योगों ने इसकी दुगर्ति कर दी। इसे प्रदूषित करके। रही-सही कसर रेत बजरी के धंधेबाजों ने पूरी कर दी। अवैध खनन खनन करके। घग्गर बिखर गई, बिलख गई। हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की डगशाई की 1927 मीटर की ऊंचाई के अपने उद्गम स्थल से मात्र 10 किलोमीटर आगे बढ़ते ही यह फैक्टि्रयों के प्रदूषित व स्थानीय निकाय के अनट्रीटेड सीवरेज से गंदे नाले में बदलना शुरू होती है। पंजाब में इसका स्वागत एसएएस नगर के सुखना चो (नाले) के साथ आए मनीमाजरा, पंचकुला, जीरकपुर और अंबाला-चंडीगढ़ के सीवरेज भी आ मिलते हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से किए गए एक सर्वे के अनुसार यहां पुल पर बीओडी व सीओडी की मात्रा 132 व 240 एमजी और कैल्शियम व मैग्नीशियम 160 व 52 एमजी पर आ जाता है। इससे पहले नाईकेटा पेपर मिल मुबारिकपुर से पहले लिए गए सैंपलों में आर्गेनिक तत्वों में बीओडी, सीओडी की मात्रा क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम, जिंक 0.46एमजी, कैल्शियम 28 एमजी,व मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। चंडीगढ़ के ढ़कांसू नाले के इसमें मिलने के बाद जल जीवन 60 फीसदी से गिर कर 20 फीसदी रह जाता है। इस पानी में किसी भी तरह की मछली 96 घंटे में मर जाती है। स्पष्ट है कि अपनी शुरूआत से दस किलोमीटर पर सीवरेज में बदलना शुरू हुई घग्गर का पानी यहां तक आते आते तेजाबी हो चुका है। राजस्व विभाग पंजाब के आंकड़े बताते हैं कि घग्गर नदी में पटियाला के समाना शहर से आगे गुरदयाल पुरा बीड़ तक में भी मछलियां पकड़ने के ठेके दिए जाते रहे हैं। खन्नौरी व मूणक के सीवरेज, शराब फैक्टि्रयों, गन्ना मिलों के अपशिष्ट पदार्थो के मिलने के बाद पानी की हालत इस कदर बिगड़ जाती है कि इसके सींचे जल से पैदा हुई सब्जियों में शीशा, कैडमियम, क्रोमियम, लोहा तय सीमा से कहीं अधिक पाया गया। नदी के दोनो ओर 250 मीटर की सीमा में नलकूपों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, हालांकि धरती अभी बची हुई है। बारिश के दिनों में इसके तेजाबीपन में 20 फीसदी की कमी आ जाती है। इन दिनों में कीड़े मकोड़ों के रूप में जीवन पलना शुरू होता है लेकिन इस सीजन के अलावा हरियाणा से आने वाले बुड्ढा नाला के गांव सागरा के पास मिलने के बाद इसमें से जीवन सौ फीसदी समाप्त है। जानवरों के खुर तक गला देने वाला पानी पंजाब ही नहीं, राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में पीलिया फैलने, पशुओं में मुंह-खुर की बीमारियों का कारण बनता है। प्रदूषण की मार तो पड़ी ही, कमाई के चक्कर में अवैध खनन करने वालों ने भी इस नदी के किनारों को खोखला कर दिया। पहाड़ से उतर तलहटी में आते ही इसके किनारे दिन रात चोरी छिपे लगे ट्रैक्टरों- ट्रालियों ने नदी का वेग बिगाड़ा।
देसी बाथू ने किया कमाल
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
साठ के दशक में हरित क्रांति से ठीक पहले देश में अन्न की कमी पर अमेरिका के साथ पीएल-480 जैसे शर्मनाक समझौते हुए इनके साथ ही भारत को गेहूं दिया गया, इसी गेहूं के साथ अमेरिका से आए जहाजों पर बिन बुलाए मेहमान कोकरोज इस धरती पर आए और तोहफे में मिली कांग्रेस घास। इन दोनों को ही लाइलाज बीमारी मान लिया गया। कोकरोज तो खत्म नहीं हुए अलबत्ता कांग्रेस घास का इलाज जरूर तलाश लिया गया है। यह कारनामा कर दिखाया जोगिंदर टाइगर ने। उन्होंने देसी बाथू के साथ प्रयोग किया और बरसात के दो ही सीजन में देखा गया कि जहां बाथू के बीज छिड़के थे वहां से कांग्रेस घास बिलकुल गायब है डकाला रोड पर फनविल स्थित फाइव एलिमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी चला रहे जोगिंदर टाइगर बताते है कि हर बीमारी का इलाज आसपास ही मौजूद होता है, लेकिन हम अपने जुकाम का इलाज अमेरिका में बनी दवा से तो दांत का दर्द चीन से ठीक करवाना चाहते हैं। यहीं से त्रासदी शुरू होती है और फिर नहीं रुकती। इसे रोक पाना खासा मुश्किल हो जाता है। वे याद करते हैं कि वर्ष 2002 में जब उनके पास सांस, दमा, चमड़ी, फेंफड़ों में इन्फेक्शन जैसी बीमारियों के रोगियों की संख्या बढ़ी तो इस ओर ध्यान गया, अध्ययन के बाद सामने आया कि 1993 की बाढ़ के बाद कांग्रेस घास का फैलाव तेजी से हुआ है और बीमारियां भी बढ़ी। 2004 आते-आते सब कुछ स्पष्ट हो गया। दो सालों के परीक्षणों के बाद सामने आया कि जहां कहीं बाथू लगा है वहां कांग्रेस घास नहीं उगी है। इसके बाद जोगिंदर टाइगर ने बाथू की खेती शुरू की, बारिशों से ठीक पहले इसके बीजों को सड़क किनारे छिड़कना शुरू किया। दो ही सीजन में सकारात्मक परिणाम आ गए। आज पटियाला-डकाला, पटियाला-समाना, पटियाला-चंडीगढ़ रोड पर हर बरसात के बाद बाथू के पौधों को देखा जा सकता है, कांग्रेस घास नहीं। दिलचस्प है कि जोगिंदर टाइगर के मित्र जहां कहीं भी रहते हैं उनके घरों के आस पास भी कांग्रेस घास नहीं है। दो से तीन साल के इस क्रम के बाद अब नदी किनारे हर मानसून में थोड़ी थोड़ी मात्रा में बाथू के बीज रखे जा रहे है। यहीं से फैलाव हो रहा है।उधर, पर्यावरण दिवस का नाम लेते ही जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि गोल्फ कोर्स व इको टूरिजम के नाम पर आज जंगल उजाड़े जा रहे है। चंडीगढ़ का गोल्फ कोर्स कुछ इसी तरह से फैल रहा है, जो लोग आज सौ-सौ एकड़ जंगल लीज पर ले इको टूरिजम की बात करते हैं वे ही इसका सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे हंै। कुछ ही सालों में यहां होटलें, कालोनियां, फार्म हाउस दिखाई देंगी। हमारे वन अधिकारी बड़े- बड़े सेमिनार करते है, शाही दावतों की तरह से खेत खलियान की चर्चा एसी कमरों में बैठकर करते है। वे देशी हैबीटाट उजाड़ कर विदेशी पौधे मंगवाते है। चार-पांच साल बाद वो तो चलता नहीं और अपने पौधे भी मर जाते है। ऐसे ही धरती बंजर होती जा रही है।
साठ के दशक में हरित क्रांति से ठीक पहले देश में अन्न की कमी पर अमेरिका के साथ पीएल-480 जैसे शर्मनाक समझौते हुए इनके साथ ही भारत को गेहूं दिया गया, इसी गेहूं के साथ अमेरिका से आए जहाजों पर बिन बुलाए मेहमान कोकरोज इस धरती पर आए और तोहफे में मिली कांग्रेस घास। इन दोनों को ही लाइलाज बीमारी मान लिया गया। कोकरोज तो खत्म नहीं हुए अलबत्ता कांग्रेस घास का इलाज जरूर तलाश लिया गया है। यह कारनामा कर दिखाया जोगिंदर टाइगर ने। उन्होंने देसी बाथू के साथ प्रयोग किया और बरसात के दो ही सीजन में देखा गया कि जहां बाथू के बीज छिड़के थे वहां से कांग्रेस घास बिलकुल गायब है डकाला रोड पर फनविल स्थित फाइव एलिमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी चला रहे जोगिंदर टाइगर बताते है कि हर बीमारी का इलाज आसपास ही मौजूद होता है, लेकिन हम अपने जुकाम का इलाज अमेरिका में बनी दवा से तो दांत का दर्द चीन से ठीक करवाना चाहते हैं। यहीं से त्रासदी शुरू होती है और फिर नहीं रुकती। इसे रोक पाना खासा मुश्किल हो जाता है। वे याद करते हैं कि वर्ष 2002 में जब उनके पास सांस, दमा, चमड़ी, फेंफड़ों में इन्फेक्शन जैसी बीमारियों के रोगियों की संख्या बढ़ी तो इस ओर ध्यान गया, अध्ययन के बाद सामने आया कि 1993 की बाढ़ के बाद कांग्रेस घास का फैलाव तेजी से हुआ है और बीमारियां भी बढ़ी। 2004 आते-आते सब कुछ स्पष्ट हो गया। दो सालों के परीक्षणों के बाद सामने आया कि जहां कहीं बाथू लगा है वहां कांग्रेस घास नहीं उगी है। इसके बाद जोगिंदर टाइगर ने बाथू की खेती शुरू की, बारिशों से ठीक पहले इसके बीजों को सड़क किनारे छिड़कना शुरू किया। दो ही सीजन में सकारात्मक परिणाम आ गए। आज पटियाला-डकाला, पटियाला-समाना, पटियाला-चंडीगढ़ रोड पर हर बरसात के बाद बाथू के पौधों को देखा जा सकता है, कांग्रेस घास नहीं। दिलचस्प है कि जोगिंदर टाइगर के मित्र जहां कहीं भी रहते हैं उनके घरों के आस पास भी कांग्रेस घास नहीं है। दो से तीन साल के इस क्रम के बाद अब नदी किनारे हर मानसून में थोड़ी थोड़ी मात्रा में बाथू के बीज रखे जा रहे है। यहीं से फैलाव हो रहा है।उधर, पर्यावरण दिवस का नाम लेते ही जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि गोल्फ कोर्स व इको टूरिजम के नाम पर आज जंगल उजाड़े जा रहे है। चंडीगढ़ का गोल्फ कोर्स कुछ इसी तरह से फैल रहा है, जो लोग आज सौ-सौ एकड़ जंगल लीज पर ले इको टूरिजम की बात करते हैं वे ही इसका सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे हंै। कुछ ही सालों में यहां होटलें, कालोनियां, फार्म हाउस दिखाई देंगी। हमारे वन अधिकारी बड़े- बड़े सेमिनार करते है, शाही दावतों की तरह से खेत खलियान की चर्चा एसी कमरों में बैठकर करते है। वे देशी हैबीटाट उजाड़ कर विदेशी पौधे मंगवाते है। चार-पांच साल बाद वो तो चलता नहीं और अपने पौधे भी मर जाते है। ऐसे ही धरती बंजर होती जा रही है।
Tuesday, 12 October 2010
आसमानी आफत ने दी धरती को राहत
भूपेश चट्ठा, पटियाला
राज्य में तीन महीने पहले पंजाब और हरियाणा में आसमान से टपकी आफत से अब किसान को राहत मिल रही है क्योंकि किसानों को नुकसान का मुआवजा मिल चुका है। इस दौरान भूजल स्तर में सुधार किसानों को डिविडेंट के रूप में मिला है।
भूजल स्तर को नापने वाले प्रमुख किसान गुरप्रीत सिंह का कहना है कि धरती के नीचे, जो पानी 55 फुट नीचे से मिल रहा था, अब 53 फुट पर मिल रहा है। उनका कहना है कि अभी दो-तीन महीने रिसाव जारी रहेगा और भूजल स्तर में सुधार होगा।
धान की फसल को पांच से सात बार पानी की दरकार होती है और इस साल कई बार बीस मिलीमीटर से ज्यादा पानी एक ही दिन में बरसा है। ऐसे में नलकूप कम चले। कृषि विभाग के अधिकारी बताते हैं कि इस साल धरती रीचार्ज हुई या नहीं, यह तो अगले महीने ही पता चलेगा पर अच्छी बारिश ने यह जरूर तय कर दिया है कि हमने दोहन नहीं किया यही बचत है। वैसे इस क्षेत्र में रिसाव ज्यादा नहीं होता उस पर धान के लिए हुए 'कद्दू' ने धरातल को और ज्यादा पथरीला कर दिया। गिरते जलस्तर पर वे कहते हैं कि पटियाला जिले में ही पिछले दस सालों में औसतन 0.99 मीटर पानी नीचे की ओर खिसक रहा है। हाल ही के सालों में तो यह सवा मीटर के भी पार चला गया है। इस बार उम्मीद है कि यह औसत सुधरेगा जरूर।
पंजाब में पिछले साल खराब बारिश के बावजूद धान का रकबा 28.02 लाख हैक्टेयर था जबकि इस साल यह कम हो कर 27 लाख पर आ गया है। पंजाब में बर्बाद हुई और देरी से बिजाई वाली धान की फसल का आंकड़ा तीन लाख हैक्टेयर से कम नहीं है। ऐसे ही साथ लगती हरियाणा की सीमा पर दो लाख 59 हजार हैक्टेयर धान की फसल बर्बाद हुई है।
उधर सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड उत्तर क्षेत्र के आंकड़ों अनुसार 17 जिलों के 138 ब्लाक में औसतन 780 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की बारिश होती है। पर 103 ब्लाक ओवर एक्सपलोएटिड, पांच क्रिटीकल और चार सेमी क्रिटीकल की श्रेणी में आ चुके है। दिलचस्प है कि इस बार बाढ़ की मार तले आने वाले जिलों में बारिश पंजाब के औसत के खासी नीचे रहती रही है। इनमें पटियाला का औसत 631 मिमी., संगरूर का 552 मिमी., लुधियाना का 681 मिमी., मोगा 463 मिमी., फिरोजपुर 437 मिमी., फतेहगढ़ साहिब 635 मिमी. और फरीदकोट का वार्षिक औसत 450 मिमी. है। और पंजाब के इन जिलों में ऐसा कोई भी नहीं है जहां इस बार सिर्फ मानसून तक एक हजार मिमी. का आंकड़ा परा ना किया हो, चंडीगढ़ से पटियाला, फतेहगढ़ साहिब, लुधियाना, रोपड़ जैसे पंजाब के जिलों और हरियाणा के साथ लगते व बाढ़ प्रभावित अंबाला, कैथल में तो एक ही दिन में सौ से दो सौ मिमी. के रिकार्ड भी कायम हुए है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6810066.html
राज्य में तीन महीने पहले पंजाब और हरियाणा में आसमान से टपकी आफत से अब किसान को राहत मिल रही है क्योंकि किसानों को नुकसान का मुआवजा मिल चुका है। इस दौरान भूजल स्तर में सुधार किसानों को डिविडेंट के रूप में मिला है।
भूजल स्तर को नापने वाले प्रमुख किसान गुरप्रीत सिंह का कहना है कि धरती के नीचे, जो पानी 55 फुट नीचे से मिल रहा था, अब 53 फुट पर मिल रहा है। उनका कहना है कि अभी दो-तीन महीने रिसाव जारी रहेगा और भूजल स्तर में सुधार होगा।
धान की फसल को पांच से सात बार पानी की दरकार होती है और इस साल कई बार बीस मिलीमीटर से ज्यादा पानी एक ही दिन में बरसा है। ऐसे में नलकूप कम चले। कृषि विभाग के अधिकारी बताते हैं कि इस साल धरती रीचार्ज हुई या नहीं, यह तो अगले महीने ही पता चलेगा पर अच्छी बारिश ने यह जरूर तय कर दिया है कि हमने दोहन नहीं किया यही बचत है। वैसे इस क्षेत्र में रिसाव ज्यादा नहीं होता उस पर धान के लिए हुए 'कद्दू' ने धरातल को और ज्यादा पथरीला कर दिया। गिरते जलस्तर पर वे कहते हैं कि पटियाला जिले में ही पिछले दस सालों में औसतन 0.99 मीटर पानी नीचे की ओर खिसक रहा है। हाल ही के सालों में तो यह सवा मीटर के भी पार चला गया है। इस बार उम्मीद है कि यह औसत सुधरेगा जरूर।
पंजाब में पिछले साल खराब बारिश के बावजूद धान का रकबा 28.02 लाख हैक्टेयर था जबकि इस साल यह कम हो कर 27 लाख पर आ गया है। पंजाब में बर्बाद हुई और देरी से बिजाई वाली धान की फसल का आंकड़ा तीन लाख हैक्टेयर से कम नहीं है। ऐसे ही साथ लगती हरियाणा की सीमा पर दो लाख 59 हजार हैक्टेयर धान की फसल बर्बाद हुई है।
उधर सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड उत्तर क्षेत्र के आंकड़ों अनुसार 17 जिलों के 138 ब्लाक में औसतन 780 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की बारिश होती है। पर 103 ब्लाक ओवर एक्सपलोएटिड, पांच क्रिटीकल और चार सेमी क्रिटीकल की श्रेणी में आ चुके है। दिलचस्प है कि इस बार बाढ़ की मार तले आने वाले जिलों में बारिश पंजाब के औसत के खासी नीचे रहती रही है। इनमें पटियाला का औसत 631 मिमी., संगरूर का 552 मिमी., लुधियाना का 681 मिमी., मोगा 463 मिमी., फिरोजपुर 437 मिमी., फतेहगढ़ साहिब 635 मिमी. और फरीदकोट का वार्षिक औसत 450 मिमी. है। और पंजाब के इन जिलों में ऐसा कोई भी नहीं है जहां इस बार सिर्फ मानसून तक एक हजार मिमी. का आंकड़ा परा ना किया हो, चंडीगढ़ से पटियाला, फतेहगढ़ साहिब, लुधियाना, रोपड़ जैसे पंजाब के जिलों और हरियाणा के साथ लगते व बाढ़ प्रभावित अंबाला, कैथल में तो एक ही दिन में सौ से दो सौ मिमी. के रिकार्ड भी कायम हुए है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6810066.html
Friday, 8 October 2010
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
: पंजाबियों ने विदेशों में राजनीति के साथ-साथ खेलों में भी अपने जलवे बिखेरे हैं। इंग्लैंड की क्रिकेट टीम में मोंटी पनेसर हों, या कनाडा की हाकी टीम में खेल रहे पंजाबी खिलाड़ी, विदेश के लिए खेलने के बावजूद उनका दिल भारत के लिए ही धड़कता है। पटियाला के जतिंदर संधू ने 96 किलो वर्ग न्यूजीलैंड सीनियर फ्री स्टाइल कुश्ती में अपने हर विरोधी को पछाड़ न केवल चैंपियन होने का गौरव हासिल किया, बल्कि राष्ट्रीय टीम में भी जगह बना ली है। उन्हें फख्र है कि वे विदेशों में बसे भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे है। वे पहले भारतीय हैं जिसने न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय कुश्ती टीम में जगह बनाई है। मांउट रोसकिल के बॉटनी स्टोर में मैनेजर के तौर पर कार्यरत संधू बताते हैं कि इस साल उन्होंने हैमिलटन में आल न्यूजीलैंड क्लब चैंपियनशिप जीतने के अलावा नार्थ आइलैंड चैंपियनशिप, ऑकलैंड चैंपियनशिप, हुनुआ काउंटीस चैंपियनशिप भी जीती है पर ये सबसे बड़ा सम्मान है। जतिंदर कहते हैं कि जब वे न्यूजीलैंड आए तो डिलवर्थ रेस्लिंग क्लब के मालिक इयान एडमंड्स ने उन्हें क्लब में आने को प्रेरित किया। फिर ईरान के पूर्व पहलवान अमीर ने उनकी ट्रेनिंग देख कर कुश्ती को गंभीरता से लेने को कहा और फिर सिलसिला चल निकला। वे याद करते हैं कि उनकी मां जीवन में सफलता का रास्ता कई साल पहले ही तय कर दिया था। जतिंदर के पिता गुरमुख पहलवान कहते हैं कि दो साल पहले ही जतिंदर न्यूजीलैंड गया है, परमानेंट रेजीडेंटशिप तो हाल में मिली है। उन्हें इस बात की खुशी है कि उनके बेटे ने विदेश में जाकर देश का नाम रोशन किया है। पेशे से कुश्ती के कोच सन्नौरी अड्डा के निकट अखाड़ा चलाते गुरमुख पहलवान कहते हैं संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है जब वाईपीएस स्कूल का कोई बच्चा कुश्ती में इस स्तर पर पहुंचा हो। जब उनसे कहा गया कि यदि जतिंदर न्यूजीलैंड की बजाए भारत से खेलता तो ज्यादा अच्छा होता तो उनका कहना था कि उनका पूरा परिवार पीढि़यों से कुश्ती से जुड़ा है और बहुत कुछ देखा है, ऐसे में अब यह सवाल मत उठाओ पर बच्चा देश का ही है। खेल के साथ पढ़ाई में भी अच्छा है, और वो आगे की पढ़ाई करने ही गया था, कुश्ती में न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय टीम में खास तैर शामिल होने नहीं गया था। ये तो बस इत्तेफाक है कि खेला और आगे बढ़ता चला गया और वहां के अखबारों की सुर्खियों में इंडियन
ब्वाय छाया हुआ है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6796778_1.html
: पंजाबियों ने विदेशों में राजनीति के साथ-साथ खेलों में भी अपने जलवे बिखेरे हैं। इंग्लैंड की क्रिकेट टीम में मोंटी पनेसर हों, या कनाडा की हाकी टीम में खेल रहे पंजाबी खिलाड़ी, विदेश के लिए खेलने के बावजूद उनका दिल भारत के लिए ही धड़कता है। पटियाला के जतिंदर संधू ने 96 किलो वर्ग न्यूजीलैंड सीनियर फ्री स्टाइल कुश्ती में अपने हर विरोधी को पछाड़ न केवल चैंपियन होने का गौरव हासिल किया, बल्कि राष्ट्रीय टीम में भी जगह बना ली है। उन्हें फख्र है कि वे विदेशों में बसे भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे है। वे पहले भारतीय हैं जिसने न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय कुश्ती टीम में जगह बनाई है। मांउट रोसकिल के बॉटनी स्टोर में मैनेजर के तौर पर कार्यरत संधू बताते हैं कि इस साल उन्होंने हैमिलटन में आल न्यूजीलैंड क्लब चैंपियनशिप जीतने के अलावा नार्थ आइलैंड चैंपियनशिप, ऑकलैंड चैंपियनशिप, हुनुआ काउंटीस चैंपियनशिप भी जीती है पर ये सबसे बड़ा सम्मान है। जतिंदर कहते हैं कि जब वे न्यूजीलैंड आए तो डिलवर्थ रेस्लिंग क्लब के मालिक इयान एडमंड्स ने उन्हें क्लब में आने को प्रेरित किया। फिर ईरान के पूर्व पहलवान अमीर ने उनकी ट्रेनिंग देख कर कुश्ती को गंभीरता से लेने को कहा और फिर सिलसिला चल निकला। वे याद करते हैं कि उनकी मां जीवन में सफलता का रास्ता कई साल पहले ही तय कर दिया था। जतिंदर के पिता गुरमुख पहलवान कहते हैं कि दो साल पहले ही जतिंदर न्यूजीलैंड गया है, परमानेंट रेजीडेंटशिप तो हाल में मिली है। उन्हें इस बात की खुशी है कि उनके बेटे ने विदेश में जाकर देश का नाम रोशन किया है। पेशे से कुश्ती के कोच सन्नौरी अड्डा के निकट अखाड़ा चलाते गुरमुख पहलवान कहते हैं संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है जब वाईपीएस स्कूल का कोई बच्चा कुश्ती में इस स्तर पर पहुंचा हो। जब उनसे कहा गया कि यदि जतिंदर न्यूजीलैंड की बजाए भारत से खेलता तो ज्यादा अच्छा होता तो उनका कहना था कि उनका पूरा परिवार पीढि़यों से कुश्ती से जुड़ा है और बहुत कुछ देखा है, ऐसे में अब यह सवाल मत उठाओ पर बच्चा देश का ही है। खेल के साथ पढ़ाई में भी अच्छा है, और वो आगे की पढ़ाई करने ही गया था, कुश्ती में न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय टीम में खास तैर शामिल होने नहीं गया था। ये तो बस इत्तेफाक है कि खेला और आगे बढ़ता चला गया और वहां के अखबारों की सुर्खियों में इंडियन
ब्वाय छाया हुआ है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6796778_1.html
Tuesday, 5 October 2010
जर-जोरू के झगड़े ओके, पर जमीन के क्यों
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पुरानी कहावत है कि झगड़े के सिर्फ तीन कारण होते हैं जर यानी रुपया, जोरू यानी महिला और जमीन यानी जायदाद। इनमें से जर-जोरू वाले झगड़े तो संभवत कम नहीं किए जा सकते पर जमीन वाले विवाद राजस्व कानून पूरी तरह से लागू कर और जिम्मेदारिया तय करने से सीमित किए जा सकते हैं।
पंजाब सरकार द्वारा जमीन के मालिकाना हक को लेकर पिता की संपत्ति विशेष रूप से कृषि जमीन में लड़कियों के नाम दर्ज करने का काूनन बनने के बाद जमीन-जायदाद को लेकर बढ़ रही मल्टीपल लीटीगेशन पर फाईव एलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी ने पाया कि राजस्व कानून का स्पष्ट रूप से पालन न करना या होना इन झगड़ों का मूल कारण है, जबकि अचल संपत्ति पर लागू होने वाला ये सबसे स्पष्ट कानून है। अन्य मामलों में व्यक्ति का बदलने वाला व्यवहार शामिल होता है।
सोसाइटी के चेयरमैन डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि जो रिकार्ड दर्ज करने का काम पटवारी और राजस्व अधिकारियों ने खुद करने होते हैं वे लोगों को कार्यालयों में जाकर करवाने पड़ते हैं। कई बार इनके रह जाने पर दावे और प्रति दावे होते हैं। कुर्सीनामे का हवाला दे डा. टाइगर बताते हैं कि दादा की मृत्यु के बाद उनकी जमीन उसके बच्चों अथवा आश्रितों के नाम राजस्व कानून के मुताबिक पटवारी ने गांव में जाकर दर्ज करनी होती है और नबंरदार मौत की पुष्टि करने को होता है। प्रक्रिया सही चल रही है यह सुनिश्चत करना तहसीलदार का काम होता है। ये सिलसिला चले तो कोई विवाद नहीं है पर विरासत इंतकाल का सारा काम लोगों को पटवारखाने में जाकर करवाना पड़ता है। जिसका रह गया तो भविष्य में मालिकाना हक का विवाद भी तय हो गया। राजस्व मामले बढ़ रहे हैं। आजादी से पहले यदा कदा ही जमीन जायदाद के केस न्यायालय तक जाते थे पर अब हर मामूली बात अदालत पहुंचती है और दशकों निपटारा नहीं होता। तभी आपराधिक मामले भी दर्ज होते हैं और अदालतों पर बोझ बढ़ता है।
ऐसे ही बिना मालिक की इच्छा जमीन की गिरदावरी काश्तकार के नाम नहीं की जा सकती और न बदली जा सकती है पर कर दी जाती है। सीजन खत्म होने के बाद भी चलती रहती है। कब्जा तक घोषित कर दिया जाता है। डा. टाइगर कहते हैं कि यदि पटवारी से तहसीलदार तक की जिम्मेदारी तय हो जाए तो अदालतों का बोझ स्वत: घट जाएगा।
वहीं बार काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट मनोज सोइन बताते हैं कि अदालत में 20 से 30 फीसदी मामले सिर्फ राजस्व रिकार्ड पूरे न होने से आते हैं। ये सेशन स्तर से सुप्रीम कोर्ट तक चलते रहते हैं। मजीठिया कालोनी के निकट एक कालोनी का हवाला दे उन्होंने बताया कि परिवार के मात्र एक सदस्य का नाम कुर्सीनामे में न होने से पूरी कालोनी निवासी अदालत जाने को मजबूर होते हैं। सेल डीड चैलेंज हो जाती है और लोन ब्लाक हो जाता है। ऐसी जमीन खरीदने वाला भी अकसर उलझ जाता है। कई बार तो रिकार्ड पटवारी से दर्ज नहीं होता तो कई बार इसमें कोई पक्ष गड़बड़ी करवाता है जो अंतत: सिविल से फौजदारी तक के मामलों के रूप में अदालतों में पहुंचते हैं।
पुरानी कहावत है कि झगड़े के सिर्फ तीन कारण होते हैं जर यानी रुपया, जोरू यानी महिला और जमीन यानी जायदाद। इनमें से जर-जोरू वाले झगड़े तो संभवत कम नहीं किए जा सकते पर जमीन वाले विवाद राजस्व कानून पूरी तरह से लागू कर और जिम्मेदारिया तय करने से सीमित किए जा सकते हैं।
पंजाब सरकार द्वारा जमीन के मालिकाना हक को लेकर पिता की संपत्ति विशेष रूप से कृषि जमीन में लड़कियों के नाम दर्ज करने का काूनन बनने के बाद जमीन-जायदाद को लेकर बढ़ रही मल्टीपल लीटीगेशन पर फाईव एलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी ने पाया कि राजस्व कानून का स्पष्ट रूप से पालन न करना या होना इन झगड़ों का मूल कारण है, जबकि अचल संपत्ति पर लागू होने वाला ये सबसे स्पष्ट कानून है। अन्य मामलों में व्यक्ति का बदलने वाला व्यवहार शामिल होता है।
सोसाइटी के चेयरमैन डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि जो रिकार्ड दर्ज करने का काम पटवारी और राजस्व अधिकारियों ने खुद करने होते हैं वे लोगों को कार्यालयों में जाकर करवाने पड़ते हैं। कई बार इनके रह जाने पर दावे और प्रति दावे होते हैं। कुर्सीनामे का हवाला दे डा. टाइगर बताते हैं कि दादा की मृत्यु के बाद उनकी जमीन उसके बच्चों अथवा आश्रितों के नाम राजस्व कानून के मुताबिक पटवारी ने गांव में जाकर दर्ज करनी होती है और नबंरदार मौत की पुष्टि करने को होता है। प्रक्रिया सही चल रही है यह सुनिश्चत करना तहसीलदार का काम होता है। ये सिलसिला चले तो कोई विवाद नहीं है पर विरासत इंतकाल का सारा काम लोगों को पटवारखाने में जाकर करवाना पड़ता है। जिसका रह गया तो भविष्य में मालिकाना हक का विवाद भी तय हो गया। राजस्व मामले बढ़ रहे हैं। आजादी से पहले यदा कदा ही जमीन जायदाद के केस न्यायालय तक जाते थे पर अब हर मामूली बात अदालत पहुंचती है और दशकों निपटारा नहीं होता। तभी आपराधिक मामले भी दर्ज होते हैं और अदालतों पर बोझ बढ़ता है।
ऐसे ही बिना मालिक की इच्छा जमीन की गिरदावरी काश्तकार के नाम नहीं की जा सकती और न बदली जा सकती है पर कर दी जाती है। सीजन खत्म होने के बाद भी चलती रहती है। कब्जा तक घोषित कर दिया जाता है। डा. टाइगर कहते हैं कि यदि पटवारी से तहसीलदार तक की जिम्मेदारी तय हो जाए तो अदालतों का बोझ स्वत: घट जाएगा।
वहीं बार काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट मनोज सोइन बताते हैं कि अदालत में 20 से 30 फीसदी मामले सिर्फ राजस्व रिकार्ड पूरे न होने से आते हैं। ये सेशन स्तर से सुप्रीम कोर्ट तक चलते रहते हैं। मजीठिया कालोनी के निकट एक कालोनी का हवाला दे उन्होंने बताया कि परिवार के मात्र एक सदस्य का नाम कुर्सीनामे में न होने से पूरी कालोनी निवासी अदालत जाने को मजबूर होते हैं। सेल डीड चैलेंज हो जाती है और लोन ब्लाक हो जाता है। ऐसी जमीन खरीदने वाला भी अकसर उलझ जाता है। कई बार तो रिकार्ड पटवारी से दर्ज नहीं होता तो कई बार इसमें कोई पक्ष गड़बड़ी करवाता है जो अंतत: सिविल से फौजदारी तक के मामलों के रूप में अदालतों में पहुंचते हैं।
Monday, 4 October 2010
prince charles kingdom still exists शाही शहर में प्रिंस चार्ल्स की दूसरी पारी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पांच साल के भीतर दूसरी बार ऐतिहासिक शहर पटियाला आए शाही मेहमान प्रिंस चार्ल्स का सैन्य सम्मान के साथ स्वागत किया गया है। हवाई अड्डे पर उनका स्वागत राज्य सरकार के लोक संपर्क व प्रवासी मामलों के मंत्री सेवा सिंह सेखवां, मेयर अजीत पाल सिंह कोहली और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किया जबकि उनकी पत्नी कैमिला पार्कर को विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर व सेवा सिंह सेखवां ने रीसीव किया। प्रिंस हालांकि अपने तय समय से करीब बीस मिनट जल्दी तो कैमिला दस मिनट देरी से दो अलग अलग हेलीकाप्टरों में आए है।
पूर्व पटियाला रियासत के इस शाही मेहमान को वायु सेना का हेलीकाप्टर पटियाला लाया तो उनके स्वागत में सेना का घुड़सवार दस्ता और बैंड भी तैनात किया गया, सैन्य अधिकारियों ने भी पूरे सैनिक अंदाज में ही उनका स्वागत किया। हालांकि कैप्टन अमरिंदर के मेहमानों की सूची में बड़ी संख्या फौजी अफसरों की ही है। दावत में शामिल होने वालों के लिए ड्रेस कोड भी रखा गया है। टाई सूट न पहनने वाले भारतीय बंद गले की शेरवानी अथवा अचकन में नजर आए जबकि सेना के अधिकारी अपनी वर्दी में मेडल के साथ आए।
मोती बाग पैलेस के सूत्र बताते है कि शाम होने से पहले ही पहुंचने वाले मेहमानों में हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा और पटियाला जिले व कैप्टन अमरिंदर के करीबी चार-पांच एमएलए भी शामिल है। इनके अलावा हाईकोर्ट के कुछ जज भी इसी सूची में है। दिलचस्प है कि शाही मेहमान का स्वागत करने वाले मेयर व लोक संपर्क मंत्री को भी पार्टी में आने का न्यौता दिया गया लेकिन राजनैतिक कारणों के चलते उन्होंने मना कर दिया।
वहीं मेहमानों की सूची लेने सोमवार को इंटेलिजेंस ब्यूरो के दो ज्वाइंट डायरेक्टर व दो डिप्टी डायरेक्टर भी पैलेस आ पहुंचे जिन्होंने अपने स्तर पर भी सुरक्षा की समीक्षा की है। इसी बीच प्रिंस के आने से पहले पटियाला-संगरूर मार्ग को पूरी तरह से बंद कर दिया गया हालांकि उन्हें इस ओर से नहीं गुजरना था।
पांच साल के भीतर दूसरी बार ऐतिहासिक शहर पटियाला आए शाही मेहमान प्रिंस चार्ल्स का सैन्य सम्मान के साथ स्वागत किया गया है। हवाई अड्डे पर उनका स्वागत राज्य सरकार के लोक संपर्क व प्रवासी मामलों के मंत्री सेवा सिंह सेखवां, मेयर अजीत पाल सिंह कोहली और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किया जबकि उनकी पत्नी कैमिला पार्कर को विदेश राज्यमंत्री परनीत कौर व सेवा सिंह सेखवां ने रीसीव किया। प्रिंस हालांकि अपने तय समय से करीब बीस मिनट जल्दी तो कैमिला दस मिनट देरी से दो अलग अलग हेलीकाप्टरों में आए है।
पूर्व पटियाला रियासत के इस शाही मेहमान को वायु सेना का हेलीकाप्टर पटियाला लाया तो उनके स्वागत में सेना का घुड़सवार दस्ता और बैंड भी तैनात किया गया, सैन्य अधिकारियों ने भी पूरे सैनिक अंदाज में ही उनका स्वागत किया। हालांकि कैप्टन अमरिंदर के मेहमानों की सूची में बड़ी संख्या फौजी अफसरों की ही है। दावत में शामिल होने वालों के लिए ड्रेस कोड भी रखा गया है। टाई सूट न पहनने वाले भारतीय बंद गले की शेरवानी अथवा अचकन में नजर आए जबकि सेना के अधिकारी अपनी वर्दी में मेडल के साथ आए।
मोती बाग पैलेस के सूत्र बताते है कि शाम होने से पहले ही पहुंचने वाले मेहमानों में हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा और पटियाला जिले व कैप्टन अमरिंदर के करीबी चार-पांच एमएलए भी शामिल है। इनके अलावा हाईकोर्ट के कुछ जज भी इसी सूची में है। दिलचस्प है कि शाही मेहमान का स्वागत करने वाले मेयर व लोक संपर्क मंत्री को भी पार्टी में आने का न्यौता दिया गया लेकिन राजनैतिक कारणों के चलते उन्होंने मना कर दिया।
वहीं मेहमानों की सूची लेने सोमवार को इंटेलिजेंस ब्यूरो के दो ज्वाइंट डायरेक्टर व दो डिप्टी डायरेक्टर भी पैलेस आ पहुंचे जिन्होंने अपने स्तर पर भी सुरक्षा की समीक्षा की है। इसी बीच प्रिंस के आने से पहले पटियाला-संगरूर मार्ग को पूरी तरह से बंद कर दिया गया हालांकि उन्हें इस ओर से नहीं गुजरना था।
Sunday, 3 October 2010
State guest, Punjab govt. mere spectator विदेश मंत्रालय ने मांगी मेहमानों की सूची
प्रिंस चार्ल्स का पटियाला दौरा
पाकिस्तान से भी शामिल हो सकते हैं कुछ मेहमान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
: विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के अपने घर मोती बाग पैलेस में हो रही शाही दावत को लेकर विदेश मंत्रालय ने प्रिंस चार्ल्स व उनकी पत्नी कैमिला पार्कर के सम्मान में होने वाले डिनर में शामिल होने वाले मेहमानों की सूची मांग ली है। इस हाई प्रोफाइल दावत को लेकर जहां राज्य की पुलिस और देश की सेना अपने काम में लगी है, वहीं प्रिंस चार्ल्स के इंग्लैंड से रवाना होने से पहले रक्षा खरीद सौदों को लेकर माहौल बनाने की आई खबरों के चलते इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) भी पूरी हरकत में है। बताते चलें की प्रिंस चार्ल्स के आगमन पर सोमवार की शाम होने होने वाली पार्टी में कई बड़े सैन्य अधिकारी भी शामिल होने जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान से तीन खानसामे पहले ही आ चुके हैं और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के कुछ मित्र भी पाकिस्तान से भारत में आए हुए हैं और अभी तक अटारी सीमा के इसी ओर हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार प्रिंस चार्ल्स को राज्य का मेहमान घोषित करने के बावजूद मूक दर्शक बन कर रह गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के एविएशन क्लब अथवा हवाई पट्टी पर महल के अपने फोटोग्राफरों के अलावा सिर्फ एक कैमरा जिला लोक संपर्क अधिकारी को ले जाने की अनुमति दी गई है। सूत्रों का कहना है कि शाही मेहमानों के आने के दौरान पटियाला-संगरूर रोड को पूरी तरह से आम आदमियों के लिए बंद रखा जाएगा। हालांकि हवाई अड्डे पर प्रिंस के उतरने के बाद वे इस सड़क से न गुजर कर छावनी क्षेत्र से होते हुए मोती बाग पैलेस में पहुंचेंगे। उधर, आज घोषित किए गए कार्यक्रम व तैयारियों का जायजा लेने के लिए प्रशासन ने पूरी मॉक ड्रिल की है, कुछ मेहमान आ भी चुके हैं। बताया गया है कि सोमवार अपराह्न साढ़े तीन बजे कैमिला पार्कर पंजाब सरकार के हेलीकॉप्टर से पटियाला के एविएशन क्लब के हवाई अड्डे पर उतरेंगी, उनका स्वागत परनीत कौर करेंगी, जबकि प्रिंस का स्वागत लोक संपर्क मंत्री सेवा सिंह सेखवां, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, मेयर अजीतपाल सिंह कोहली व डिप्टी कमिश्नर गुरविंदर सिंह ग्रेवाल करेंगे। वे फतेहगढ़ साहिब से एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से पटियाला के एविएशन क्लब आएंगे। पांच अक्टूबर की सुबह एयर फोर्स के ही हेलीकॉप्टर से चंडीगढ़ को रवाना हो जाएंगे जहां से विमान से जोधपुर जाएंगे।
पाकिस्तान से भी शामिल हो सकते हैं कुछ मेहमान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
: विदेश राज्य मंत्री परनीत कौर के अपने घर मोती बाग पैलेस में हो रही शाही दावत को लेकर विदेश मंत्रालय ने प्रिंस चार्ल्स व उनकी पत्नी कैमिला पार्कर के सम्मान में होने वाले डिनर में शामिल होने वाले मेहमानों की सूची मांग ली है। इस हाई प्रोफाइल दावत को लेकर जहां राज्य की पुलिस और देश की सेना अपने काम में लगी है, वहीं प्रिंस चार्ल्स के इंग्लैंड से रवाना होने से पहले रक्षा खरीद सौदों को लेकर माहौल बनाने की आई खबरों के चलते इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) भी पूरी हरकत में है। बताते चलें की प्रिंस चार्ल्स के आगमन पर सोमवार की शाम होने होने वाली पार्टी में कई बड़े सैन्य अधिकारी भी शामिल होने जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान से तीन खानसामे पहले ही आ चुके हैं और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के कुछ मित्र भी पाकिस्तान से भारत में आए हुए हैं और अभी तक अटारी सीमा के इसी ओर हैं। दूसरी ओर, राज्य सरकार प्रिंस चार्ल्स को राज्य का मेहमान घोषित करने के बावजूद मूक दर्शक बन कर रह गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के एविएशन क्लब अथवा हवाई पट्टी पर महल के अपने फोटोग्राफरों के अलावा सिर्फ एक कैमरा जिला लोक संपर्क अधिकारी को ले जाने की अनुमति दी गई है। सूत्रों का कहना है कि शाही मेहमानों के आने के दौरान पटियाला-संगरूर रोड को पूरी तरह से आम आदमियों के लिए बंद रखा जाएगा। हालांकि हवाई अड्डे पर प्रिंस के उतरने के बाद वे इस सड़क से न गुजर कर छावनी क्षेत्र से होते हुए मोती बाग पैलेस में पहुंचेंगे। उधर, आज घोषित किए गए कार्यक्रम व तैयारियों का जायजा लेने के लिए प्रशासन ने पूरी मॉक ड्रिल की है, कुछ मेहमान आ भी चुके हैं। बताया गया है कि सोमवार अपराह्न साढ़े तीन बजे कैमिला पार्कर पंजाब सरकार के हेलीकॉप्टर से पटियाला के एविएशन क्लब के हवाई अड्डे पर उतरेंगी, उनका स्वागत परनीत कौर करेंगी, जबकि प्रिंस का स्वागत लोक संपर्क मंत्री सेवा सिंह सेखवां, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, मेयर अजीतपाल सिंह कोहली व डिप्टी कमिश्नर गुरविंदर सिंह ग्रेवाल करेंगे। वे फतेहगढ़ साहिब से एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से पटियाला के एविएशन क्लब आएंगे। पांच अक्टूबर की सुबह एयर फोर्स के ही हेलीकॉप्टर से चंडीगढ़ को रवाना हो जाएंगे जहां से विमान से जोधपुर जाएंगे।
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