पराली में आर्गेनिक तत्व कम और जहर ज्यादा हो गया है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में धान की फसल जल्द पक जाए तो अक्टूबर का शुरू नहीं तो मध्य तक बच्चों, बुजुर्गों और दमे-एलर्जी के मरीजों को खुली हवा में गैस चैंबर का सा अहसास होता है, बचते तंदरुस्त कहे जाने वाले भी नहीं आंखों में जलन, गले में खराश, जुकाम-खुजली तो आम हो जाता है। इन सब के पीछे कारण क्या है? यह भी सब को पता है कि खेतों में पराली जलाई जा रही है। इस पराली के साथ जल रहे केमिकल फर्टीलाइजर और पेस्टिसाइड ने इसके धुएं को इस कदर जहरीला बना दिया है कि बारूद का धुआं भी हलका लगने लगा है।
सोशल सांइसेज एंउड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि थोड़ी बहुत यह पहले भी जलती थी पर इतना बुरा हाल नहीं था कि आपको सांस लेने के लिए भी जगह की तलाश करनी पड़ती है। दोपहिया वाहन पर है तो सड़क युद्ध का मैदान नजर आती है और किसी काम को हाथ में लेते है तो आंख के साथ नाक भी टपकने लगती है। वे कहते है कि महत्वपूर्ण यह है कि जब गरीब बेघर तेज सर्दी से बचने के लिए घास फूस एकत्र कर अलाव तप रहा होता है तो आग में से एक भीनी सी खुशबू आ रही होती है। कुछ ऐसा ही अहसास गांव में चुल्हे पर पक रहे भोजन की बात हो या घर को धुंध कोहरे के दिनों में घर के आस पास पेड़ पौधों का कचरा जलाने की हो हमें धुआं परेशान करता। गोबर के उपले जलने को तो मेडिकेटिड धुएं तक का नाम दे उपचार तक करने के दावे होने लगते है।
वहीं लेखक केएस धालीवल कहते है कि आज पराली का नाम आते ही अस्थमे का तंदरुस्त हुआ मरीज भी दहल जाता है। एलर्जी की दवा बनाने वाली कंपनियों के लिए तो दिवाली का सीजन ही पंजाब हरियाणा में जलने वाली पराली से निकलता है और साल भर की कमाई इन्हीं दो महीनों में हो जाती है। एंटी एलर्जी दवाओं से कुछ नहीं होने वाला बेहतर है कि किसान या तो पेस्टिसाइड व केमिकल फर्टीलाइजर का प्रयोग छोड़ दें या फिर पराली जलाना छोड़ दें। वे कहते है कि इसमें पौधे वाली बात ही नहीं रही। आर्गेनिक तत्व कम ओर जहर ज्यादा हो गया है।
दिलचस्प है कि पराली के स्मोग से परेशान लोगों ने भी एक नायाब तरीका तलाश लिया है वे डाक्टरों के पिछले सालों में लिखी पर्ची को किसी मंत्र की तरह अपने पर्स में रखते है और सांस के उखडऩे के पहले अहसास में ही दवा शुरू कर देते है। जुकाम और आंखों में जलन बर्दाश्त करने की बड़ों को आदत हो गई है कि इन दिनों म त्योहारें की तरह ये भी होना है। जबकि बच्चों के लिए कोई हल नहीं निकला है।
पराली न जलाने वाले किसान सम्मानित
संवाद सूत्र, सन्नौर : गांव बावलपुर में संरपच गुरमीत सिंह की अध्यक्षता में आयोजित समारोह के दौरान पराली न जलाने वाले किसानों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि डिप्टी डायरेक्टर पंचायत विभाग पुशपिंदर सिंह उपस्थित हुए। उन्होंने उन गांवों के किसानों को सम्मानित किया, जिन्होंने धान की फसल की कटाई करने के बाद बाकी बचे पराली को आग नहीं लगाई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि ने कहा कि धान की फसल को आग लगाने से गंदा धुंआ निकलता है, इससे तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं। हमें अपने खेतों में आग न लगाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाना चाहिए। इस अवसर पर गांव के उन स्कूली बच्चों को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने ने शिक्षा में नाम रोशन किया है। इस मौके पर गांव के सभी लोग उपस्थित थे।
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