Monday, 25 October 2010

करवा चौथ तो ठीक है पर 'लेटेस्ट' क्या है...

चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हुए, 'एग फ्री' केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो
एलोपैथी का असर : ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही दे देती हैं तर्क
गोलगप्पे की रेहड़ी वालों का 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी...

भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिंदु कुश पर्वत से लेकर हिंद महासागर के बीच के भूभाग में करवा चौथ की शुरूआत संभवत: वेद लिखे जाने से पहले ही हो किस्से कहानियों के साथ हो गई। इसका सटीक समय तो कहीं नहीं मिलता पर इतना तय है कि कम से कम पांच हजार सालों से ये त्यौहार महिलाएं बिना किसी वैदिक स्क्रिप्ट के एक निश्चित परंपरा के साथ मनाती रही। आज भी वहीं किस्सा और कहानी दोहराई जाती है। पांच हजार साल तक जिस सभ्यता को बिना मॉस मीडिया और कंप्यूटर के संजोए रखा गया वो आज 'लेटेस्ट' क्या है? के चक्कर में गायब हो रही है।
पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला के मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के रिसर्च स्कालर पंकज शुक्ला बताते है कि दिलचस्प इसमें यह है कि ये सब कुछ टीवी के बढऩे के साथ तो बढ़ा, बिंदिया बड़ी से और बड़ी हो गई साड़ी का रंग और ज्यादा चटख हो गया पर इंटरनेट के फैलाव के साथ हाल ही में आए ट्वीटर और फेसबुक ने हमे इतना ज्यादा लिबरल बना दिया कि एक ही मेज-कुर्सी और कमरे में ही बैठ दुनिया देखने लगे है। सोशल नेटवर्किंग ने हमें अंदर तक खोखला कर दिया है तो परंपराएं भी हमारे साथ ही टूटने लगी है।
वहीं लेखक केएस धालीवाल कहते है कि चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हो चुके है, केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो, अगर केक में वाइन और अंडे को लेकर धर्म आड़े आता है तो आप 'एग फ्री' ट्राई कर सकते है पर समय की धारा के विपरीत क्यों चलते है। यही बदलाव है।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि आयुर्वेद में योग है और योग में पेट को खाली रख काफी कुछ दुरूस्त करने के तरीके है लेकिन एलोपैथी में फूड सप्लीमेंट है अगर किसी चीज की शरीर में कमी है तो उसे लैब में बने रसायन से ठीक किया जा सकता है। लेकिन खाली पेट नहीं । ऐसे में ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही ये तर्क दे कर पहले करवा चौथ में ही चाय से लेकर बिस्कुट का डोज दिन में दे देती है। हालांकि इसके पीछे कारण ये होता है कि कईयों ने दो से चार दशक पहले अपने ड्रेसिंग टेबल में छिपा कर रखी मिठाई या मेवे खाए होते हैं, जिसका पति को तो पता होता है लेकिन उसकी अपनी सास की जानकारी में नहीं होता। ऐसा कर वो बीस तीस साल पुरानी गड़बड़ी को तर्क संगत ठहरा रही होती है। यहीं पर आ कर हम सास भी कभी बहू थी का सकारात्मक पहलू सामने आता है। दिलचस्प है कि पांच सात साल पहले तक गोलगप्पे की रेहड़ी वालों के लिए ये दिन 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी आप ग्राहक खड़े देख सकते है। किटी-तंबोला के नाम पर होने वाली जुए बाजी पुरूषों की दिवाली से पहले शुरू हो जाती है। यह भी खुल कर कहा जाता है कि करवा तो ठीक है लेटेस्ट क्या है? सूट नया लिया है? या टॉपस? लंहगा इस बार 'देवदास' नहीं 'मुन्नी बदनाम' वाला चल रहा है।

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