भूपेश चट्ठा, पटियाला
चीनी के दाम आसमान छूने पर यह चाहे जितनी भी कड़वी लगने लगे पर पंजाब के गन्ना उत्पादक किसानों के लिए राहत भरा तोहफा कर्नाटक से आया है। 50 रुपये किलो पर चल रहा नया गुड़ आने वाले समय में और मीठा हो जाएगा। यदि किसान बेलगांव तकनीक से गन्ने की काश्त करता है। कर्नाटक के जाने माने आर्गेनिक फार्मर क्लब के संस्थापक सदस्यों में से एक सुरेश देसाई खेती विरासत मिशन के निमंत्रण पर पंजाब आए हैं और अपने चार दिवसीय दौरे में उन्होंने शुक्रवार को घनौर के निकट बहावलपुर गांव में इस तकनीक को किसानों के समक्ष रखा है। बेलगांव तकनीक से होने वाली गन्ने की खेती पूरी तरह से प्राकृतिक है और शुरू के दो तीन सालों में ही रसायनिक खादों पर किसान की निर्भरता कम होने लगती है। मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त ने आज यहां बेलगांव तकनीक के बारे में पूछे जाने पर बताया कि फसल पर आने वाले कीट इसकी सेहत को देखकर दूर रहते हैं। बीमारियों के हमले कम होते हैं। मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ने से उपज बढ़ने लगती है। आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु पंजाब से गन्ने की उपज के मामले में प्राकृतिक व भौगोलिक कारणों से आगे हैं। प्रदेश में औसतन 40 टन प्रति एकड़ गन्ने की उपज होती है। इसे सुरेश देसाई की तकनीक से दो से ढाई गुणा तक बढ़ाया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह 120 टन तक पहुंच सकती है। इसी प्रकार फसल अच्छी होने की सूरत में गन्ने से चीनी की पैदावार 13 फीसदी तक बढ़ जाती है। वर्तमान समय में राज्य में गन्ने से चीनी का उत्पादन सात से आठ फीसदी तक हो रहा है। वहीं, प्राकृतिक रूप से ली जाने वाली गन्ने की फसल की तकनीक पर देसाई ने कहा कि गन्ने की फसल करीब 18 महीनों में काटने लायक हो जाती है। ऊपर से गन्ना काटने के बाद कचरे को अक्सर जला दिया जाता है। इससे खेत में बची फसल की जड़ों को नुकसान पहुंचता है। साइकल में होने वाली गन्ने की खेती पर अधिक रसायनिक खादें डालनी पड़ती हैं । पुरानी मान्यता है कि राख कीटनाशकों को दूर रखती है, लेकिन वास्तव में आग से लाभदायक आर्गेनिक तत्व काफी जल चुके होते हैं, किसान इसका अंदाजा नहीं लगा पाता। बेलगांव तकनीक में फसल के कचरे को खेत में ही छोड़ दिया जाता है, लेकिन इसे खाल बना कर व्यवस्थित किया जाता है। एक खाल में पुराना कचरा होता है तो दूसरे का प्रयोग पानी देने में होता है। इससे पानी भाप बन कर नहीं उड़ता और पानी की खपत एक तिहाई रह जाती है। शुरू में पानी एक खाल छोड़ कर एक में लगाया जाता है, लेकिन बाद के वर्षो में पुराना कचरा दो से तीन खालों में होता है और पानी एक में ही रहता है। एक-दो का अनुपात अब एक-चार में लाने के प्रयास हो रहे हैं, ताकि 10-12 दिनों में लगने वाला पानी 20-25 दिनों पर लगे। बकौल देसाई खेतों में चूंकि हरे तत्वों की मात्रा लगातार बढ़ती जाती है, ऐसे में रसायन डालना व्यर्थ हो जाता है। खेती पर खर्च 15 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर से कम हो कर 3700 रुपये प्रति हेक्टेयर रह जाता है। फसल की सेहत के अच्छा होने की स्थिति में कीटनाशकों का प्रयोग बहुत ही कम रह जाता है। उपज में होने वाली बढ़ोत्तरी सीधा लाभ देती है।
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