Friday, 29 July 2011

कांग्रेस की भूमिका नहीं पर मेरा वोट बादल के खिलाफ : कैप्टन अमरिंदर,sgpc, politics, capt. amrinder


कैप्टन बोले 
 कांग्रेसियों पर दर्ज 30 हजार केस रद करवाने के लिए आयोग गठित होगा 
 बूढ़े बादल ही ब्लू स्टार के जिम्मेदार : अमरिंदर 
 बिना नीलामी के दिए प्रोजेक्ट रद करेगी कांग्रेस 
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी(एसजीपीसी) के होने वाले चुनावों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं होगी, पार्टी किसी को भी वोट डालने के लिए निर्देशित नहीं करेगी। कांग्रेस के प्रदेश प्रधान व पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एसजीपीसी चुनावों में शुक्रवार को यहां पार्टी का स्टैंड स्पष्ट करने के साथ यह भी कहा है कि वे वोट बादलों के खिलाफ ही डालेंगे।
एसजीपीसी चुनावों में मतदान वोटर आई कार्ड से करवाए जाने के सवाल पर वे कहते हैं कि सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल(शिअद) ने एसडीएम स्तर के अधिकारियों से वोटें बनवाई, लेकिन यह एक दिखावा मात्र था। सभी वोटें जत्थेदारों के कहने पर बनी हैं, ऐसे में अपनाई गई प्रक्रिया ही गलत है।
वहीं, कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं की शिकायतें सुनने के लिए रखे गए कार्यक्रम में पूर्व मंत्री व विधायक ब्रह्म महिंदरा, लाल सिंह, तेज प्रकाश, पार्टी के जिला प्रधान प्रेम कृष्ण पुरी, हरदयाल कंबोज, केके शर्मा, कबीर दास, अजय थापर की मौजूदगी में कैप्टन अमरिंदर ने आश्वस्त किया कि कांग्रेसियों पर साढ़े चार साल में दर्ज किए गए 30 हजार केस रद करवाने के लिए वे एक आयोग का गठन करेंगे, जो एक ही समय में सारे केस रद करेगा।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के साथ चल रहे आरोप प्रत्यारोप को आगे बढ़ाते हुए कैप्टन सिंह ने कहा कि प्रकाश सिंह बादल बूढ़े हो चुके हैं उन्हें कुछ याद नहीं रहता। संवाददाता सम्मेलन में जब ब्लू स्टार के लिए जिम्मेदार होने का एक नाम पूछा गया तो कैप्टन अमरिंदर ने फिर बादल व अकाली दल का नाम ले दिया और कहा कि बादल नियंत्रित समस्या चाहते हैं। वे कभी धर्म, पानी तो कभी चंडीगढ़ के नाम पर मोर्चे लगाते हैं। खुद गिरफ्तार हो डाक बंगले में जा बैठते हैं और लोगों को पिटवा देते हैं। हांसी बुटाना मामले पर भी वे ये ही कर रहे हैं। जिस मामले पर हाईकोर्ट में जाना चाहिए उस पर वे प्रधानमंत्री और पड़ोस के मुख्यमंत्री को पत्र लिखते हैं।
राज्य में बिना नीलामी के दिए गए बिजली उत्पादन प्रोजेक्ट पर कांग्रेस प्रधान कहते हैं कि ये सब कांग्रेस रद करेगी और पार्टी किसानों के साथ खड़ी है। किसानों को उचित मुआवजा देने के अलावा गलत तरीके से अलाट किए जा रहे हजारों करोड़ के प्रोजेक्टों की चार दिवारी भी नहीं बनेगी और सरकार का शासनकाल समाप्त हो जाएगा।
राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की तैयारियों पर वे कहते हैं कि चुनावी सर्वेक्षण जारी है। अच्छी रिपोर्ट है। जितने वाले की ही टिकट की सिफारिश की जाएगी, यह एक से ज्यादा भी हो सकती हैं। अंतिम निर्णय हाईकमान का होगा। उनकी पसंद में युवा और महिलाएं शामिल हैं।

Thursday, 28 July 2011

हांसी-बुटाना से कैनाल दफ्तर तक बीकेयू एकता डकौंदा सक्रिय, hansi-butana, farmer, union, punjab, politics,



- संस्थापक प्रधान की बरसी के बाद आई गतिविधियों में तेजी
- बिजली, पानी, बाढ़ हर मामले पर हुई सक्रिय
भूपेश चट्ठा, पटियाला
चुनावी साल में हर राजनीतिक दल सक्रिय होता है और हर तरह के दबाव समूह भी उठ आते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति भारतीय किसान यूनियन एकता डकौंदा ने पटियाला में पैदा कर ली है। हांसी बुटाना से एसई कैनाल दफ्तर तक बीकेयू एकता डकौंदा हर तरह सक्रिय हो उठी है।

हांसी बुटाना नहर और इसके साथ बन रही कंकरीट की दीवार के रूप में राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा लगभग राजनीतिक दलों से छीन चुके इस किसान संगठन ने पंजाब व हरियाणा के छह दर्जन गावों को एक मंच पर ला महापंचायत बुलाने की घोषणा कर रखी है।

हरियाणा से लेकर केंद्र सरकार को दी गई चेतावनी कि आठ अगस्त तक नहर व दीवार का काम रोक कर क्षेत्र में बाढ़ की समस्या का निपटारा किया जाए अन्यथा भूख हड़ताल से जाम लगाने तक हर तरह से विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहें। दिलचस्प है कि उक्त घोषणा के बाद से क्षेत्र के लोग बीकेयू के साथ भावनात्मक रूप से जुडऩे लग गए। इसके दो दिन के भीतर ही संगठन के प्रतिनिधि मंडल ने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड से मिलकर किसानों की मोटरों के जारी हो रहे बिजली बिलों को बंद करने की तर्क सहित मांग रखी। साथ ही कृषि क्षेत्र के लिए पूरी आठ घंटे बिजली मांगी।

इतना ही नहीं अगले ही दिन जिले में नहरी पानी का मामला उठा लिया है। यूनियन की सन्नौर ईकाई ने एसई कैनाल के कार्यालय के बाहर धरना लगाया है। याद रहे कि संगठन संस्थापक प्रधान बलकार सिंह डकौंदा की हाल ही में मनाई गई बरसी के बाद गतिविधियों में खासी तेजी आई है।

इसी संबंध में वीरवार को प्रदर्शन करने वाले यूनियन के सन्नौर ब्लाक के प्रधान सुखमिंदर सिंह तुलेवाल मानते हैं कि किसानों की जायज मांगों पर वे आंदोलन कर रहे हैं और चुनावी वर्ष में अगर दबाव बना रहे हैं, तो गलत क्या है। हांसी बुटना सिर्फ मुद्दा नहीं है, इसे हटाया जाना क्षेत्र के लोगों की जरूरत है।

कांवडिय़ों ने कमाया पुण्य, जगाया शिव को,hindu, religion, lord shiv, kanvar, triyodashi


- जलाभिषेक सम्पन्न, रुद्राभिषेक जारी रहेंगे
- सावन में ही शिव ने किया था विषपान, अग्नि शांत करने कांवडिय़े लाते हैं गंगाजल
- निवास के करीबी मंदिरों में भी जाग जाते हैं शिवालय
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
सावन की त्रयोदशी पर वीरवार को शिवलिंग पर गंगा के पवित्र जल को अर्पित कर कांवडिय़ों ने जहां पुण्य कमाया है, वहीं शिव भूमि से दूर दराज के शिवालयों में भगवान शिव को जगा आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले शिवभक्तों के लिए भी पाप से मुक्ति प्राप्ति के रास्ते खोल दिए हैं।
भगवान शिव का सावन में जलाभिषेक करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण व अंतिम दिन पर शहर के हर शिवालय में भक्तों का तांता लगा रहा। मंदिरों में क्षेत्र के कांवडिय़ों के आने से न केवल उनके परिजनों मिलने वालों में खुशी की लहर थी, अपितु शिव भक्त हर की पौड़ी हरिद्वार से लाए गए गंगा जल के उनके करीबी मंदिर में आने से प्रसन्न रहे। राजपुरा रोड स्थित तुंगनाथ मंदिर से लेकर किला चौंक के शिवालय में श्रद्धापूर्वक जलाभिषेक किया गया है।
वहीं त्रयोदशी के महत्व पर महंत रवि कांत जी मुनी कहते हैं कि शास्त्रों अनुसार गौमुख से गंगा जल लेकर पहले नीलकंठ में जलाभिषेक करने और फिर रास्ते के मंदिरों में जलाभिषेक करते हुए त्रयोदशी के दिन उसी मंदिर में आ कर जलाभिषेक करने का प्रावधान है जहां से आपने यात्रा आरंभ की होती है। लेकिन कालांतर में हरिद्वार हर की पौड़ी से जल ला कर जलाभिषेक करने का चलन हो गया है। मंहत कहते हैं कि शिव ने सावन मास में ही विष पान किया था और विष की उस अग्नि को शांत करने के लिए प्रतिमा पर लगातार जल धारा प्रवाहित की जाती है। सावन में इसका महत्व सर्वाधिक होता है। त्रियोदशी को हालांकि कांवड़ से लाए गए गंगा जल का जलाभिषेक करने का अंतिम दिन होता है, लेकिन रुद्राभिषेक करने का क्रम जारी रहता है। वे बताते हैं कि इन दिनों में शहर में प्राचीन वामन अवतार मंदिर परिसर में स्थित पातालेश्वर मंदिर में काशी से विशेष रूप से बुलाए गए आचार्य ये रुद्राभिषेक पूरे विधि विधान से करवा रहे हैं। जिसका लाभ लिया जा सकता है।

Wednesday, 27 July 2011

पंजाब को नहर से आपत्ति पर बनाया पंजाबियों ने, hansi-butana, flood, punjabi emploment,


-'सोना देने वाले की जात नहीं पूछी जाती, ये पवित्र ही होता हैÓ
-बाढ़ पीडि़तों को ही दिया रोजगार बाढ़ लाने वाली नहर ने
 भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी, पटियाला
कहते हैं कि सोना देने वाले की जात नहीं पूछी जाती ये पवित्र ही होता है और रहता भी है। पंजाब-हरियाणा के बीच पानी की लड़ाई में जहां दोनों राज्यों की सरकारों के बीच एक दूसरे को गलत साबित करने और नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है और विशेष रूप से पंजाब को हांसी बुटाना नहर से कड़ी आपत्ति है, लेकिन नाटकीय ढ़ंग से यह भी सही है कि इस नहर को बनाने वाले हाथ चाहे मिस्त्री के हों या मजदूर के दोनों में ही पंजाबियों के हैं। अलबत्ता ठेकेदार जरूर हरियाणा का है।

'दैनिक जागरणÓ के समक्ष ये लोग अपना मुंह खोल नाम बताने की बात करना तो दूर कैमरा हाथ से उपर होते ही पांव पकडऩे को हो जाते हैं। कहते हैं कि रोजगार मिला है... वो भी गांव के पास क्यों छीन रहे हो?... मजदूरी कर लेने दो। जबकि पंजाब की सीमा में किंतु नहर के सबसे करीबी गांव धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि आप मजदूर व मिस्त्रीयों की बात करते हो इस नहर की रात में चौकीदारी करने के लिए भी पंजाब के ही लोगों को नौकरी पर रखा गया है। वे बताते है कि उनका 'सीरीÓ रामा भी इनके रात में डयूटी पर जाता रहा है। छह हजार रूपये महीना की बंधी रकम थी पर एक दिन रात में सांप काट गया, फिर तबीयत खराब रहने लगी तो छोड़ दिया। अब भी गांव के ही कुछ लोग रात में नौकरी पर जाते है। याद रहे कि नहर पर पिछली बाढ़ में टटियाना गांव के पास जिस स्थान पर नहर टूटी थी उससे धर्मेहड़ी को ही सबसे ज्यादा राहत मिली थी आरोप ये भी लगे की इसी गांव के लोगों ने 'कार्रवाईÓ की थी।  

जानकार बताते है कि  पहले नहर का निर्माण, फिर साईफन में से मिट्टी निकालने और अब दीवार का निर्माण करने में जिन बड़े ट्रकों, टिपरों की सेवा हरियाणा के ड्रेनेज विभाग की ओर से ली जा रही है, उनमें से कई पटियाला जिले में ही तैनात रहे एक बड़े पुलिस अधिकारी के रिश्तेदार के हैं।

नहर के बाद अब कंकरीट की दीवार बनाने में मजदूर मिस्त्रीयों को रोजगार मिला है, उनमें से ज्यादातर की साइकलें पंजाब के नवां गांव से ही रोज सुबह निकलती हैं। इसी गांव के गुरविंदर सिंह औलख कहते उनका ड्राईवर भी भरे सीजन में ट्रैक्टर छोड़ गया था। नहर पर दिहाड़ी ठीक दी जा रही है मौसम ठीक हो तो ओवर टाइम भी मिलता है। आधा दिन भी काम हो जाए तो पैसे नहीं कटते। ऐसे में हर कोई जाना चाहता है।

दिलचस्प है कि पंजाब के सिंचाई मंत्री के दौरे और मीडिया नहर और दीवार के विवाद की खबरें प्रकाशित होने के बाद नए मजदूर लेने बंद कर दिए गए हैं। हालांकि बाढ़ पीडि़तों को ही रोजगार देने वाली नहर कब बाढ़ लाएगी और नहर से हुई कमाई कितनी बच पाएगी इस पर दबी जुबां से एक मजदूर कहता है कि हमारे पास बाढ़ में खोने के नाम पर इक्का दुक्का पशु हैं या फिर कोठा है। यही हमारी पूंजी है। क्या बचता है? और क्या खो जाता है? ये सब तो कुदरत पर निर्भर करता है, फिलहाल जिंदगी अच्छी चल रही है।

कंपनी से बिके नहीं आईटी प्लाट, अब सरकार बेचेगी, omex, IT park, land,



-ओमेक्स ने कहा उन्होंने तीन बार विज्ञापन दिए पर नहीं आया कोई खरीदार
-चार हजार लोगों को नौकरी देनी थी पर रिहयशी आवास के प्लाट ही बिके
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश की लगातार दो सरकारों के लिए पहले नाक का सवाल और बाद में सरदर्द बने सरहिंद रोड के औमेक्स सूचना तकनीकि प्रोजेक्ट में सात साल बीत जाने के बाद भी आईटी पार्क का एक भी प्लाट नहीं बिक पाया है।

दिलचस्प है कि पंजाब की वर्तमान शिरोमणि अकाली दल की सरकार ने  जहां कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सूचना तकनीकि क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने पटियाला में करीब 350 एकड़ क्षेत्र में आईटी सिटी बनाने का प्रोजेक्ट रियल एस्टेट व आईटी पार्क विकसित करने के क्षेत्र की जानी मानी कंपनी ओमेक्स से वापिस ले लेने का निर्णय ले लिया है। वहीं राज्य सरकार ने अब तय करना है कि आवासीय क्षेत्र विकसित करने वाली पंजाब अर्बन डवेलपमेंट एंड प्लानिंग अथारिटी, पूडा और पटियाला डवलेपमेंट अथारिटी में से किसे आईटी प्लाट बेचने की जिम्मेवारी सौंपे।

पूडा की एडीशनल चीफ एडमिनिस्ट्रेटर अमृत गिल कहती हैं कि ओमेक्स का जवाब उनके पास आ गया है। कंपनी का कहना है कि तीन बार विज्ञापन जारी करने के बाद भी कोई खरीददार नहीं आया है। ग्लोबल मंदी को भी इसका कारण बताया गया है। ओमेक्स से प्रोजेक्ट वापिस लेने के निर्णय में किसी रह की जल्दबाजी के सवाल पर अमृत गिल कहती हैं कि करीब 27 रिमांइडर भेजे गए हैं। ये कम नहीं होते समय भी काफी दिया गया। ग्लोबल मंदी की बात वे स्वीकार करती हैं और कहती हैं कि तय एग्रीमेंट को भी नकारा नहीं जा सकता।
आवासीय क्षेत्र विकसित करता रहा पूडा याद पीडीए किस तरह से कामर्शियल प्रोजेक्ट को सिरे चढ़ा पाएगा? इस पर पूडा की एडीशनल चीफ एडमिनिस्ट्रेटर कहती हैं कि सरकार ने तय करना है कि प्रोजेक्ट किसे सौंपे? लेकिन पूडा इस कार्य में भी सक्षम है।

याद रहे कि सरहिंद रोड पर बने इस प्रोजेक्ट के सभी आवासीय प्लाट अपनी मूल कीमत से करीब तीन गुना दामों पर बिक रहे हैं, लेकिन आईटी से संबधित रोजगार लाने की जिस शर्त पर प्रोजेक्ट सौंपा गया था उसमें से एक भी सिरे नहीं चढ़ा है और ना ही किसी को रोजगार मिला है। किसान से आठ से अट्ठाइस लाख रूपये प्रति एकड़ की दर से ली गई जमीन की कीमत यहां 18 हजार रूपये प्रति गज पर चल रही है।

जबकि पंजाब सरकार और कंपनी के बीच हुए समझौते के बाद जारी हुई संयुक्त घोषणा के मुताबिक आईटी सिटी में सूचना तकनीक क्षेत्र में चार हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना था। रोजगार तो किसी को नहीं मिला अलबत्ता रिहायशी कालोनी जरूर बन गई।

अमर हो गए पटियाला के काले हिरण, black buck, dear park, zoo


-जंगल में कृष्ण मृग की उम्र आठ से 12 साल, यहां 13 साल में एक भी मौत नहीं
-ना मरते हैं ना पैदा होते हैं सरकारी आंकड़ों में
-छतबीड़ में एक नर 13 मादा हैं तो 15 साल में 59 काले हिरण पैदा हुए पटियाला में 125 की आबादी पर 56 ने जन्म लिया
भूपेश चट्ठा, पटियाला
इसे आप आंकड़ों की मृग मरीचिका कहें या फिर कुछ और लेकिन ये सत्य है कि देश में सलमान खान व नवाब पटौदी फैम काले हिरणों की सबसे च्यादा आबादी वाले पटियाला के डीयर पार्क में जो हिरण आए वो 'अमरÓ हो गए हैं। यहां पिछले कई सालों में हिरणों की मौत नहीं हुई है। यह अच्छी खबर हो सकती और यहां कोई हिरण पैदा ही नहीं हुआ इससे परिवार नियोजन वाले सबक भी सीख सकते हैं।

सैंट्रल जू अथारिटी की आधिकारिक वेब साइट अनुसार देश में काले हिरणों की सबसे ज्यादा आबादी पटियाला के डीयर पार्क में और इसके बाद जिले के ही छतबीड़ का नाम आता है। दोनों जगहों में कृष्ण मृग अथवा ब्लैक बग कहे जाने वाले काले हिरणों की जन्म मृत्यु दर में खासा अंतर है। छतबीड़ में एक नर व 13 मादा हैं तो पिछले 15 साल में यहां 59 काले हिरण पैदा हुए  हैं वहीं पटियाला में कुल 125 की आबादी पर मात्र 56 ने ही जन्म लिया है। छतबीड़ में जहां 15 सालों में 70 हिरणों की विभिन्न कारणों के चलते मौतें हुई, वहीं पटियाला में 13 साल में एक भी हिरण नहीं मरा है। दो सालों के आंकड़े दर्ज नहीं हैं।

याद रहे कि जंगल में कृष्ण मृग की उम्र आठ से 12 साल पिंजरें में ये साल दो साल और काट लेता है। दिलचस्प है कि पटियाला में 1995 से 2000 तक हिरणों की संख्या 26 रही और  2004-05 में ये बढ़कर 99 हुई और बीते साल 125 हो गई। अब 58 नर, 63 मादा और चार ऐसे भी हैं जिनके लिंग का अभी पता नहीं है।

वहीं विभागीय सूत्र बताते हैं कि कोई भी ऐसी सर्दी नहीं गुजरती जब ठंड की वजह से आठ से दस हिरण ना मरते हों, प्राकृतिक मौत होना एक अलग बात है। तीसरा सबसे बड़ा कारण पर हिरणों के बीच मादा को लेकर होने वाली लड़ाइयां हैं, जिनमें परस्पर सिर भिडऩे के दौरान जो चूक गया उसके सीने में सींग घुस जाता है, ऐसे में मौत तय हो जाती है। सूत्र कहते हैं कि मरे हुए हिरण का पोस्टमार्टम करवा कर संस्कार करने तक की लंबी प्रक्रिया है। इससे बचने वन अधिकारियों ने श्री भागवत गीता के सिद्धांत को प्रमुखता से अपना लिया कि 'ना कोई पैदा होता है और ना कोई मरता हैÓ। मादा हिरण को गर्भवती ही ना होने दो (सरकारी कागजों में) तो आबादी बढ़ेगी नहीं और वास्तव में जो आबादी बढ़ेगी वो मरने वाले एडजस्ट कर देंगे। सूत्र ये भी बताते हैं कि डीयर पार्क में अपनी निर्धारित संख्या से कई बार च्यादा भी हो जाते हैं। कहां जाते है? ये अभी तक रहस्य ही बना हुआ है।

इसी संबंध में चीफ वाइल्ड लाईफ वार्डन गुरबाज सिंह कहते हैं कि ये बात उनसे पूछो जो रिकार्ड अपडेट नहीं करते हम तो लगातार आंकड़े भेजते रहते हैं। किसी तरह की कोई गड़बड़ नहीं है। पार्क में संख्या च्यादा हो जाने के सवाल पर वे कहते हैं कि ये तो अच्छी बात है कि ख्याल रखा जा रहा है। अगर कहीं थोड़ा बहुत ऊंच नीच है तो ठीक किया जा सकता है। पर जो लोग निस्वार्थ ढ़ंग से काम ठीक कर रहे हैं उन उपर लांछन लगाना ठीक नहीं है। 

Saturday, 23 July 2011

सर्वदलीय बैठक का कोई औचित्य नहीं : बादल, hansi-butana,

भूपेश चट्ठा, सन्नौर, पटियाला
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा है कि विवादास्पद हांसी बुटाना नहर और इसके साथ बनाई जा रही कंकरीट की दीवार पर सर्वदलीय बैठक बुलाने का कोई औचित्य नहीं है। इससे कोई हल निकलने वाला नहीं है। मुख्यमंत्री शुक्रवार को 'दैनिक जागरण' के साथ विशेष बातचीत कर रहे थे।
सन्नौर विधान सभा क्षेत्र के लिए आयोजित संगत दर्शन कार्यक्रम के पहले दिन उन्होंने बताया कि दोनों ही मामले अब सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे हैं। ऐसे में सर्वदलीय बैठक से कोई हल निकलने वाला नहीं है।
इस मौके पर मुख्यमंत्री पंजाब के कांग्रेसियों को नसीहत देने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा कि बेतुकी बयानबाजी के बजाय कांग्रेसी प्रधानमंत्री के पास जाकर अप्राकृतिक ढंग से बनाई गई नहर और जबरदस्ती बनाई जा रही दीवार का मामला उठाएं और पंजाब के हितों की रक्षा करें।
पंजाब के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों के हरियाणा की सीमा में प्रवेश कर दी गई गिरफ्तारी की चुनौती पर बादल कहते हैं कि क्या हुआ अगर पंजाब का मंत्री हरियाणा में हो आया, यह देश सभी का है, कोई कहीं भी आ-जा सकता है। उन्होंने कहा कि भाखड़ा के पानी में पंजाब, हरियाणा के अलावा राजस्थान की भी हिस्सेदारी है। कोई भी निर्णय लेने से पहले तीनों राज्यों के बीच बात होनी चाहिए, लेकिन हरियाणा अपनी मर्जी चला रहा है।
पंजाब में केंद्रीय यूनिवर्सिटी बनाए जाने पर सरकार की ओर से लिए जा रहे यू टर्न पर मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया की इसकी पंजाब में जरूरत नहीं है। इसी क्रम में पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के पूर्व वाइस चांसलर एसएस बोपाराय के मामले में हाईकोर्ट की ओर से पंजाब सरकार को 20 हजार रुपये जुर्माना किए जाने पर मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन लोगों ने पैरवी ढंग से नहीं की है, वे भुगतेंगे। कानून अपना काम करेगा।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ने संगत दर्शन के दौरान संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि राज्य में जल्द चुनाव करवाए जाने की कोई संभावना नहीं है। हालांकि केंद्र सरकार एक सोची-समझी साजिश के तहत शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनावों में रोड़े अटका रही है। बादल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा से भी अपील की कि वे पंजाब को अपना भाई समझें।
बहुजन समाज पार्टी के साथ समझौते पर मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में कांग्रेस को हराने के लिए किसी भी विचार मिलने वाली पार्टी का साथ लिया जा सकता है, लेकिन मनप्रीत बादल ने गलत किया है। उसकी वापसी नहीं होगी।
कांग्रेस द्वारा राज्य सरकार की आलोचना पर बादल ने कहा कि पिछली कांग्रेस सरकार ने राज्य में सरकारी नौकरियों पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन उन्होंने पढ़े लिखे नौजवानों को नौकरियां देनी शुरू की हैं।

Thursday, 21 July 2011

लुधियाना की 20 डाइंग इकाइयों को नोटिस,pollution, ppcb monitoring,

पीपीसीबी की सख्ती
 प्रदूषण रोकने व ट्रीटमेंट प्लांट लगाने में असफलता पर जारी किया नोटिस
उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) ने लुधियाना की 20 डाइंग इकाइयों को नोटिस जारी कर दिया है। बोर्ड ने यह नोटिस बहादुर-के रोड स्थित इन औद्योगिक इकाइयों द्वारा प्रदूषित पानी के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाने को आवश्यक कदम उठाने में नाकाम रहने पर जारी किया है। बोर्ड की ओर से 15 दिन के भीतर इन इकाइयों को अपना पक्ष रखने को कहा है। यदि इनके जवाब से बोर्ड संतुष्ट नहीं होता है तो पावरकाम को इनके बिजली कनेक्शन काटने के लिए कह सकता है। पीपीसीबी के चेयरमैन केएस पन्नू ने बताया कि लुधियाना की डाइंग इकाइयों ने प्रदूषण रोकने के लिए सामूहिक ट्रीटमेंट प्लांट लगाने पर सहमति जताई थी, लेकिन ऐसा करने में ये लगभग असफल रही हैं। पन्नू के मुताबिक बहादुर-के टेक्सटाइल एंड निटवियर एसोसिएशन लुधियाना के 20 सदस्यों ने एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट पीपीसीबी के समक्ष रखकर वादा किया था कि वे जीरो लिक्विड डिस्चार्ज तकनीक पर आधारित सामूहिक प्रदूषण ट्रीटमेंट प्लांट लगाएंगे। पन्नू कहते हैं कि एसोसिएशन ने 30 नवंबर, 2011 तक प्लांट चालू करने पर सहमति जताई थी, लेकिन अभी तक न तो इसके लिए जमीन खरीदी की गई और न ही यही तय हो पाया है कि किस स्थान पर प्लांट लगाया जाएगा। एसोसिएशन ने अब तक प्रोजेक्ट लगाने के लिए संबंधित विभागों से पर्यावरण क्लीयरेंस भी नहीं ली है। इससे एसोसिएशन की लापरवाही साफ झलकती है। वस्तुस्थिति की समीक्षा के बाद इन 20 इकाइयों को नोटिस जारी किए गए हैं। अब इन सभी इकाइयों के नुमाइंदों को अगले 15 दिनों में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा कि क्यों न पीपीसीबी, पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड को इन इकाइयों के बिजली कनेक्शन काटने के निर्देश दे।

मिट्टी बेचने के लिए होता है साइफन साफ, hansi-butana, flood protection,


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
 दो पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के बीच पानी की लड़ाई कश्मीर का मसला बन चुकी है। वहीं, हांसी-बुटाना नहर का मुद्दा अब किसी तरह से कारगिल से कम नहीं है। ऐसे में जिसके जो हाथ लग रहा है वो कर रहा है। हरियाणा ने तब तब घग्गर नदी पर बने साइफन को साफ किया है जब उसे मिट्टी बेचनी होती है। पहाड़ों से बह कर आई उपजाऊ मिट्टी के जब भी ग्राहक मिले साइफन की सफाई हो गई अन्यथा मौसम को गुनाहगार बता पल्ला झाड़ लिया गया। दिलचस्प है कि साइफन की सफाई कब होती है, इस पर पंजाब का धर्मेहड़ी हो अथवा हरियाणा का सरौला गांव हो, दोनों ही राज्यों की सीमा पर बसे किसान और बाढ़ की मार तले आने वाला हर शख्स गवाह बनने को तैयार है। पटियाला चीका रोड पर धर्मेहड़ी पुलों के पास घग्गर नदी के साथ लगते पहले खेत के मालिक हरदीप सिंह कहते हैं कि जब भी किसी ने खेत में मिट्टी डलवानी होती है तो घग्गर हेड पर खड़े टिप्पर और साइफन के किनारे खड़ी जेसीबी मशीन काम करने लग जाती है। अन्यथा ये लोग बिलकुल नहीं हिलते। ऐसे ही गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि मिट्टी प्रति टिप्पर एक हजार रुपये में बिकती है। ट्राली थोड़ी सस्ती है। सीजन रबी का हो या खरीफ का, कोई फर्क नहीं पड़ता बस मशीन पांव जमा ले इतनी सी जमीन सूखी होनी चाहिए, फिर आर्डर पंजाब का किसान दे या हरियाणा का, सब बराबर है। याद रहे कि हांसी बुटाना नहर को घग्गर नदी पर से निकालने के लिए बनाया गया 1400 फिट चौड़ा और 23 फिट गहरा साइफन इन दिनों में मात्र पांच से छह फिट का रह गया है। शेष सारे में गाद जम आई है। साइफन से पानी की निकासी कितनी होगी इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि 1.66 लाख क्यूसिक क्षमता का साइफन मानसून के दिनों में अपनी एक चौथाई क्षमता का भी नहीं रह गया है। इन दिनों में बाढ़ का अतिरिक्त पानी निकालने के अलावा साइफन की जरूरत पशुओं को छाया उपलब्ध करवाने से ज्यादा नहीं रहती। उल्लेखनीय है कि पंजाब के ड्रेनेज विभाग की ओर से हरियाणा को पत्र लिख कर घग्गर के साइफन की सफाई करने की दो महीने पहले गुहार लगाई गई थी लेकिन हालात नहीं बदले। जून महीने में चंद दिन जेसीबी मशीन चलाने और साइफन की आउटलेट पर से गाद निकालने के बाद से काम रुका हुआ है। उधर, हरियाणा के ड्रेनेज विभाग के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर अरुण मलिक कहते हैं कि हम सफाई करवाते रहते हैं, बारिश के जल्द शुरू होने के चलते मशीनें अब बंद हैं। साइफन से मिट्टी बेचने की बात पंजाब को नहीं करनी चाहिए, वहां भी कुछ अलग नहीं है।

Wednesday, 20 July 2011

हांसी बुटाना : ग्राउंड जीरो पंजाब हरियाणा आमने-सामने

हांसी-बुटाना पर जमीनी लड़ाई शुरू
 
 
 
 
 
 
 गिरफ्तार करो मुझे, सिंचाई मंत्री ने दी चुनौती 
 पंजाब के मंत्री को जवाब दिया हरियाणा के इंजीनियरों ने
 
भूपेश चट्ठा, पटियाला : हांसी बुटाना नहर और इसके साथ बन रही दीवार को लेकर अदालत में चल रही पंजाब और हरियाणा की लड़ाई अब न केवल खुलकर आमने सामने आ गई है अपितु जमीनी स्तर पर भी शुरू हो गई है। बुधवार को पंजाब के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों ने हरियाणा के कस्बा गुहला के टिटियाना गांव में हरियाणा को खुल कर चुनौती दी है कि अगर दम है तो उन्हें आ कर गिरफ्तार किया जाए।
वे बार-बार हरियाणा सीमा पर आकर न केवल अपना विरोध जताएंगे, अलबत्ता अगर उन्हें यदि रोका गया तो वे इसी स्थान पर धरना भी देंगे। वहीं, हरियाणा सरकार ने सीमा पर नहर के साथ अपने ड्रेनेज विभाग के कर्मियों के साथ न केवल पुलिस पार्टी की तैनाती कर दी है अपितु साथ ही नायब तहसीलदार स्तर का एक अधिकारी भी लगा दिया है। मौके पर तैनात पुलिस पार्टी से पंजाब के एक डीएसपी स्तर के अधिकारी ने पंजाब के मंत्री को मौके पर जाने की अनुमति भी ली। इसके बाद ही हरियाणा ने मीडिया व मंत्री को जाने की आज्ञा दी। शेष लोगों को वहीं पर रोक दिया गया।
आज दोपहर को जब पंजाब के सिंचाई मंत्री प्रदेश के मीडिया को साथ मौके पर पहुंचे तो हरियाणा ने भी अपने अधिकारियों की टीम मीडिया के साथ वहां भिजवा दी। दिलचस्प है कि पंजाब के मंत्री की ओर से लगाए गए आरोपों का जवाब हरियाणा के सिंचाई विभाग के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर(एसइ) अरुण मलिक ने मौके पर ही आ कर दे दिया। हरियाणा के इंजीनियरों ने तर्क दिया कि किस तरह से बार बार आने वाली बाढ़ को रोकने के लिए हरियाणा सरकार अब घग्गर के पुराने बांध को पक्का करने के रूप में नहर पर दीवार का निमार्ण कर रही है।
 बाद में सेखों ने कहा कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह गुहला में हांसी-बुटाना नहर के साथ बनाई जा रही दीवार से उत्पन्न हुए हरियाणा-पंजाब विवाद में हस्तक्षेप करके शीघ्र सुलझाएं। हांसी-बुटाना नहर पंजाब के लिए अभिशाप है, इसकी जिम्मेदार हरियाणा सरकार है। पंजाब सरकार भरपूर कोशिश करेगी कि यह दीवार न बने।
 इस पानी का तो कोई झगड़ा नहीं :
 सेखों के सत्कार के लिए गुहला प्रशासन ने पूरी तैयारी कर रखी थी पर मंत्री ने उनके सामने पेश किया गया पानी भी नहीं पिया। एक अधिकारी चुटकी लेने से बाज नहीं आए और कहने लगे कि पानी तो पी लीजिए जनाब। इस पानी का तो कोई झगड़ा नहीं दोनों सूबों के बीच।
 सवाल से कन्नी काट गए सेखों :
 जब सेखों हांसी-बुटाना नहर के बारे में प्रदेश में होने वाली संभावित बर्बादी की बातें कर रहे थे, तो एक पत्रकार ने पूछा कि पटियाला से आने वाली तथा हरियाणा से होकर गुजरने वाली मीरांपुर ड्रेन की पिछले कई सालों से सफाई नहीं हुई। इस कारण मामूली बरसात होने पर भी गुहला के आधा दर्जन गांवों के बहुत सारे इलाके में बाढ़ के हालात हो जाते हैं। मंत्री एक पल के लिए सकपकाए फिर बोले ये मसला दूसरा है। इसकी बात फिर कभी करना अभी तो दीवार की बात करो।
जब दोनों तरफ से हुई कहासुनी
: सेखों ने निर्माणाधीन टो-वाल का दौरा करते वक्त अपने पक्ष को मजबूत बताते हुए तर्क देने शुरू कर किए। दीवार को सरासर पंजाब की जनता को तबाह करने वाली बताया। उनकी बात को सुनकर हरियाणा के ¨सचाई विभाग के एसइ अरुण मलिक ने मंत्री की बात को काटते हुए तर्क दिया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दीवार से पंजाब के किसानों को नुकसान होगा। इसमें खास बात यह है कि जब दीवार की दूसरे तरफ हरियाणा के भी दो दर्जन गांव बसे हुए हैं, यदि नुकसान वाली बात होती तो प्रदेश सरकार इसे बनाती ही क्यों। मंत्री ने एसइ की एक न सुनी और अपनी कहानी सुनाते हुए आगे चलते बने।
 हरियाणा के अधिकारियों का घेराव :
 घग्गर नदी पर बने साईफन पर आए हरियाणा के अधिकारियों का आज धर्मेहड़ी गांव के लोगों ने घेराव किया। हरियाणा के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर सहित हरियाणा के सिंचाई विभाग के स्टाफ को इस विरोध के चलते मौके से जाना पड़ा।

Wednesday, 13 July 2011

प्रदेश में टोबे बनेंगे पिकनिक स्पॉट, save rain water, water harvesting, rural punjab,

बदलेगी नुहार

गंदे तालाब में निर्मल जल, गंदगी पर लैंडस्केप भी होगा 
 प्रदेश के चार फीसदी गांवों में वाटर रिचार्जिग की योजना
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 पंजाब के शहरों में टोबा और गांव में छप्पड़ का नाम लेते ही दुर्गध आने लगती है, तीन-चार दशक पहले तक आर्गेनिक कहे जाने वाले इन तालाबों में मछलियां पलती थी और भैंस की पूंछ पकड़ कर बच्चों को तैरते देखना आम था, दिन फिरे तो पानी तेजाबी हो गया, पानी पांव से छू जाए तो गलने लगते हैं, लेकिन अब एक बार फिर हालात बदलने लगे हैं। गांव का टोबा अब पिकनिक स्पॉट होने को है, बस मानसून की फुहारों को जम कर बरस लेने दीजिए।
 पारा थोड़ा कम हुआ और राज्य सरकार के विभागों में खींचतान न हुई या फिर किसी स्वयं सेवी संगठन ने पौधे लगाने का काम अपने हाथ में ले लिया तो गांव का टोबा एक बार फिर पिकनिक स्पॉट बन जाएगा। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड की ओर से चलाई जा रही योजना के तहत पटियाला जिले के पांच गांवों में प्राकृतिक रूप से सदियों से चलते आ रहे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट अथवा टोबे पिकनिक स्पॉट में तबदील होने लग गए हैं।
योजना के तहत इन टोबों को स्वच्छ तालाब की शक्ल दे दी गई है, जबकि 23 पर काम चल रहा है। विभाग के एक्सईएन सुभाष चंद्र गुप्ता कहते हैं कि यदि बीच में बाढ़ जैसी कोई बड़ी अड़चन न आई तो कुछ और गांवों में भी प्रोजेक्ट पूरे हो जाएंगे अन्यथा हमें मानसून के बाद अक्टूबर तक का इंतजार करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि गांवों के तालाबों का जीर्णोद्धार करने के नाम पर आई इस योजना के तहत ढाई-ढाई सौ गांवों में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड प्रदेश की लगभग चार फीसदी ग्रामीण भूमि पर बने इन गंदे तालाबों में सिर्फ ढांचागत बदलाव लाने जा रहे हैं। इससे दूषित पानी को पीने लायक तो नहीं बनाया जा सकेगा पर करीब करीब निर्मल जल के रूप में बदल दिया जाएगा।

क्या है प्रोजेक्ट


पटियाला : सीवरेज बोर्ड के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर आरसी दीवान ने मंगलवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि गांवों की जरूरतों व आबादी के हिसाब से वर्तमान टोबे को एक बार पूरी तरह से सूखा कर तय किया जाएगा कि कितनी जमीन की जरूरत है। इसके बाद शेष भूमि को पंचायत के हवाले कर दिया जाएगा। टोबे को चार बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा। पहले हिस्से में गांव की सीवरेज आउटलेट आ कर सीधे गिरेगी, यहां से मीथेन गैस आसमान में चली जाएगी तो सालिड वेस्ट नीचे जम जाएगी और पानी अगले कुंड में चला जाएगा। इसी क्रम में पानी दूसरे से तीसरे और फिर चौथे कुंड में पहुंचेगा। यहां आया पानी सिंचाई के लायक भी होगा और नीचे जमीन पर किसी तरह की सिल्ट न होने के चलते धरती में भी समां कर भूमिगत जल स्तर को रीचार्ज करने लगेगा। और इसी चौथे कुंड के पानी से टोबे के आसपास अतिरिक्त बची भूमि पर लगाए जाने वाले लैंडस्केप को सींचा जा सकेगा। यह स्वत: चलने वाली प्रक्रिया होगी और सफाई केवल एक कुंड की करनी होगी। भारत सरकार और मनरेगा के तहत आई इस योजना के तहत प्रत्येक जिले के 25 गांवों को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चयनित किया गया है।

Monday, 11 July 2011

खरबूजे पर चढ़ा अमेरिकी रंग, गायब होंगे बीज, patent, seeds, GM crops, muskmalen

अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनी मानसेंटो ने कहा, हमने खोजा खरबूजे को, पेटेंट भी लिया
 यूरोप में विरोध हुआ पर पंजाब व केंद्र सरकार सोई रही
 खेती विरासत मिशन ने जागरूक करना शुरू किया
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हकीम की तरह काम करने वाले भारतीय नीम के अमेरिका के हाथों में जाने और देश में सदियों से हाथ पीले करती आ रही हल्दी को कॉसमेटिक कंपनियों की ओर से टर्मरिक बता सारी परिस्थितियों को अपने पक्ष में तोड़ने मोड़ने की साजिशों के बीच विशुद्ध रूप से भारतीय कहा जाने वाला फल खरबूजा भी हमारा अपना नहीं रहा। इसने रंग बदल अमेरिकी कर लिया है। आने वाली पीढि़यां इसे अमेरिकी आविष्कार के रूप में देखेंगी।
पंजाब में पर्यावरण के साथ परंपरागत ज्ञान बचाने के प्रयास में लगे डा. अर्नेस्ट अलबर्ट विश्र्व बाजार में चल रही ताजा गतिविधियों पर बताते हैं कि रासायनिक खादों व बीजों का व्यापार करने वाली कंपनी मानसेंटो ने हाल ही में यूरोप में खरबूजे को अपना आविष्कार बता इसका पेटेंट ईपी 1962 578 भी ले लिया है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि खरबूजा मूलत भारतीय बीज अथवा पौधा है। वे कहते हैं कि यूरोप में मानसेंटो का विरोध हो रहा है जबकि हम सोए हुए हैं। मानसेंटो का दावा बायो-पायरेसी या वनस्पति लूट खसूट का बनता है और यूरोप की किसान यूनियनें व संस्थाएं इसका विरोध भी कर रही हैं।
इसी संबंध में सोशल साइंसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला बताते हैं कि प्रकृति में किसी चीज के बारे में ज्ञान प्राप्त कर लेने का मतलब यह नहीं है कि यह उक्त व्यक्ति की धरोहर हो गई है। कल ये लोग गीता का श्लोक पढ़ कर उसका भी पेटेंट करवाएंगे जबकि यह मान्य नहीं है। प्रकृति में जो कुछ मौजूद है वो सभी का है, किसी एक का नहीं हो सकता।
 दूसरी ओर, पंजाब में परंपरागत खेती पर काम कर रहे स्वयं सेवी संगठन खेती विरासत मिशन ने इस ओर लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया है। मिशन का कहना है कि ये लोग सबसे पहले खरबूजे के बीज गायब करेंगे। पपीते में तो दिखने बंद हो ही गए हैं। हमें लाल टमाटर दिखा हमारे देसी टमाटरों को फिंकवाने वाली स्थिति में लाने वाली कंपनियों से लड़ने का एक ही तरीका है कि हम देसी बीजों को अपनी ही बाल्कनी के गमले में सुरक्षित कर लें या किसी खाली पड़े प्लाट में उगा कर अगली पीढ़ी को प्लाट के साथ सौंप सकते हैं। कम से कम यह कोशिश तो हो ही सकती है कि हम वो पपीता अथवा खरबूजा ही खाएं जिसमें बहुत सारे बीज हों।

Tuesday, 5 July 2011

पावरकॉम को नहीं हुआ सब्सिडी का भुगतान, याचिका दायर, pawercom, pserc, subsidy,

मामला
 पूर्व इंजीनियर ने पीएसईआरसी के पास दायर की याचिका
 या तो सब्सिडी एडवांस में दी जाए या पूरा शुल्क लगे : याचिकाकर्ता

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : कृषि क्षेत्र, अनुसूचित जाति और घरेलू क्षेत्र के कुछ अन्य वर्गो को मुफ्त बिजली देने के बदले में पंजाब सरकार की ओर से पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड को हर महीने एडवांस में दी जाने वाली सब्सिडी का भुगतान न किए जाने पर पंजाब स्टेट इलेक्टि्रसिटी रेगुलेटरी कमिशन के पास सरकार के खिलाफ याचिका दायर की गई है।
 बिजली निगम के ही एक पूर्व सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर इंजी. गुरनेक सिंह बराड़ ने पीएसईआरसी के पास याचिका दायर कर मांग की है कि या तो सरकार सब्सिडी की राशि एडवांस में पावरकॉम को दे अन्यथा उपभोक्ताओं से पूरा शुल्क वसूलने के लिए आदेश जारी करे। चालू वित्त वर्ष के लिए इसी साल नौ मई को जारी किए गए शुल्क आदेश में कृषि व विभिन्न प्रकार के घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 4188.92 करोड़ रुपये की सालाना सब्सिडी बनती है, जिसे कि अग्रिम मासिक किस्तों में दिया जाना है। इसी स्थिति में सरकार मुफ्त में बिजली दे सकती है। दिलचस्प है कि इसके विपरीत राज्य सरकार 24 मई को एक अन्य आदेश जारी कर 981.93 करोड़ रुपये पिछले बकाये के रूप में एडजस्ट कर चुकी है। इंजी. गुरनेक सिंह ने पीएसईआरसी के आदेशों का हवाला देकर अपनी याचिका में कहा है कि हर महीने सरकार की ओर से 349.08 करोड़ रुपये एडवांस सब्सिडी के रूप में दिए जाने होते हैं। इस साल अप्रैल व मई माह में पावरकॉम को मात्र 380 करोड़ रुपये ही मिले हैं। 190 करोड़ प्रतिमाह सिर्फ दो महीने तक देने के बाद जून में एक पैसा भी जारी नहीं किया गया है। बिजली अधिनियम 2003 की धारा 65 के अनुसार यदि एडवांस में सरकार सब्सिडी की राशि नहीं देती है तो पीएसईआरसी सब्सिडी वापस लेने और पूरा शुल्क लगाने के आदेश जारी कर सकता है। 13 सितंबर 2007 के एक आदेश में पीएसईआरसी ने कहा है कि सब्सिडी का अग्रिम भुगतान कानूनन जरूरी है, जबकि लोन के खिलाफ सब्सिडी एडजस्ट करने की बात कहीं नहीं आती है। केंद्र सरकार की एक योजना के अनुसार पीएसईबी के केंद्रीय कंपनियों पर पड़े बकाये के लिए लंबे समय के बांड जारी करने को अधिकृत किया गया था और ये राशियां एक अक्टूबर 2001 से पहले की हैं। अब त्रिपक्षीय समझौते के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता।

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राज्य में 102 लाख टन अनाज पड़ा है खुले में संकट :
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून दस्तक दे चुका है, पर पंजाब के अनाज गोदामों और खेतों में खुले में बनाई गई प्लींथों से अनाज को इस साल भी मुक्ति नहीं मिल पाई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य में कहां और कितना अनाज सड़ेगा, इस बात की केंद्र से लेकर राज्य के अधिकारियों को पूरी खबर भी है। आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि केंद्र सरकार के संस्थान फूड कारपोरेशन आफ इंडिया (एफसीआई) ने पंजाब में संभावित रूप से खराब होने वाले अनाज पर गहन सर्वेक्षण जून से पहले ही कर लिया था कि राज्य सरकार की कौन सी एजेंसी के पास क्षमता से ज्यादा अनाज है और उचित तरीके से भंडारण नहीं किया गया है।
 इस बारे में एफसीआई के डिप्टी जनरल मैनेजर स्टोरेज असीम छाबड़ा ने बताया कि एफसीआई ने जिन स्थानों को चिन्हित किया है, वहां से अनाज की ट्रांसपोर्टेशन शुरू कर दी गई है। यह कार्य जून से ही चल रहा है। बाढ़ प्रभावित और निचले क्षेत्रों में स्टोर किए गए गेहूं को पहले हटाया जा रहा है, पर यह कार्य जुलाई अंत तक ही मुकम्मल हो पाएगा। उन्होंने बताया कि राज्य में कुल 135 लाख टन गेहूं आज भी मौजूद है। इसमें से एक चौथाई हिस्सा बंद गोदामों में है, जबकि 102 लाख टन खुले में स्टोर किया गया है। खुले में रखे करीब आठ लाख टन अनाज को बरसात से ज्यादा खतरा है। इसी प्रकार 26 लाख टन चावल को भी ढुलाई का इंतजार है। राइस शैलर मिलर्स के पास मिलिंग के लिए पड़ा धान इससे अलग है। एफसीआई रेलवे के माध्यम से एक महीने में आठ से नौ लाख टन की ढुलाई कर पा रही है। उन्होंने बताया कि एफसीआई की कस्टडी में दस लाख टन अनाज है, जो पूरी तरह से सुरक्षित है। इसे फिलहाल हटाने की जरूरत नहीं है। चिंता खुले में रखे अनाज की है जिसे अगली फसल आने तक निपटा लिया जाएगा, यदि वर्तमान गति को थोड़ा और बल मिल जाए।

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आयोजन 
 कनाडा, अमेरिका व यूरोप से आए करीब दो दर्जन एयरक्राफ्ट इंजीनियर
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला :
 पटियाला एविएशन परिसर में चल रहे पंजाब एयर क्राफ्ट मेंटेनेंस एंड इंजीनियरिंग कालेज (पैमेक) ने अपने इतिहास में पहली बार एल्यूमीनी का आयोजन किया। 1962 से चले आ रहे उत्तर भारत के अपनी किस्म के सबसे पुराने कालेज में 1981 बैच के विद्यार्थियों ने कनाडा के वेनकूवर और टोरंटो से सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के माध्यम से पहल कर खुद को संगठित करते हुए इसकी शुरुआत की। चंद माह पहले बने ग्रुप में इसके साथ ही उत्तरी अमेरिका व इंग्लैंड में बसे पैमेक के पूर्व विद्यार्थी जुड़ते चले गए। टोरंटो में रह रही नवजिंदर संधू ने बताया कि पहले पहल एल्यूमीनी का आयोजन उत्तरी अमेरिका में ही करने की बात चली। लेकिन ज्यादा संख्या भारत व एशियाई देशों से होने और कालेज के दिनों की याद ताजा करने के लिए पटियाला ही लाया गया है। वहीं पंजाब सरकार के वीवीआईपी एयर क्राफ्ट के पूर्व चीफ इंजीनियर और 1981 बैच के इंजी. मनमोहन सिंह ने कहा कि वे निसंदेह बहुत खुश हैं और भविष्य में ऐसे आयोजन करने और करवाने में जुटे रहेंगे। वेनकूवर में रह रही और पहले बैच की छात्रा रही तरुणवीर कौर ने बताया कि चाहे उन्होंने ये लाईन छोड़ दी है पर आज भी कालेज के तीन साल भुलाए नहीं भूलते। बड़ी फर्म में एचआर मैनेजर होने के नाते उनके अच्छे संपर्क हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में ये प्रयास भी किया जाएगा कि कालेज के वर्तमान विद्यार्थियों के लिए गाइडेंस से लेकर उपकरणों इत्यादि की व्यवस्था एल्यूमीनी कर सकें और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध करवा सकें। पहली एल्यूमीनी मीट में जहां कनाडा, अमेरिका व यूरोप से आए करीब दो दर्जन एयर क्राफ्ट इंजीनियरों सहित 90 से ज्यादा एयर क्राफ्ट इंजीनियरों ने अपने परिवारों सहित धमाल किया। वहीं राज्य सरकार के सिविल एविएशन विभाग के अधिकारियों और अध्यापकों का भी मान सम्मान किया गया।

पीपीसीबी का 108 अस्पतालों में छापा, biomedical waste, pollution, ppcb

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) ने बायो मेडिकल वेस्ट को बेहतर ढंग से ठिकाने न लगाने की मिल रही शिकायतों के मद्देनजर प्रदेश के 108 सरकारी व निजी अस्पतालों में छापामारी की। सबसे ज्यादा गड़बड़ी वाले क्षेत्रों में मोहाली, लुधियाना, पठानकोट, अमृतसर व बठिंडा के नाम शामिल हैं। पीपीसीबी की ओर से रविवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार शनिवार को हुई इस रेड में आठ बड़े सरकारी अस्पताल, 12 बड़े निजी अस्पताल और 34 छोटे अस्पतालों में बायो मेडिकल वेस्ट नियमों का उल्लंघन पाया गया है। बोर्ड के चेयरमैन केएस पन्नू ने बताया कि बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तांतरण नियमों के उल्लंघन की मिल रही शिकायतों पर हुई इस कार्रवाई में कई बड़े नाम भी शामिल हैं। इनमें टैगोर अस्पताल जालंधर, अमरदीप अस्पताल अमृतसर, मोहन दाई कैंसर अस्पताल लुधियाना, आदेश इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड रिसर्च बठिंडा प्रमुख हैं। पन्नू कहते हैं कि बायो मेडिकल वेस्ट नियमों के उल्लंघन की मिल रही शिकायतों पर यह कार्रवाई मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग नियम 1988 के तहत हुई है। ये अपना वेस्ट उचित तरीके से ठिकाने नहीं लगाते थे अथवा म्यूनिसिपल वेस्ट के साथ ही अपना मेडिकल कचरा भेज रहे थे या फिर इसे इधर-उधर फेंक देते थे जबकि इस तरह के कचरे को नियमानुसार एक निश्चित रंग के बैग में डाल कर पांच स्थानों पर बनाई गई कॉमन ट्रीटमेंट सुविधा में ट्रांसपोर्ट किया जाना चाहिए। अनैतिक तरीके से अस्पताल के आसपास ही डम्प किए गए कचरे से खतरनाक प्रदूषण फैलने की आशंका पनपती है।

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फायदा
लेवलिंग पर प्रति एकड़ 15 सौ रुपये की आ रही लागत
पानी की बचत को देख किसानों में बढ़ा इसका प्रचलन
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पांच-छह सालों से पंजाब के किसानों को खेत समतल करने की आधुनिक लेजर लेवलिंग तकनीक पर भाषण देते रहने के बाद अब कृषि विभाग का जागरूकता अभियान रंग लाने लगा है। दिलचस्प है कि किसानों ने शुरुआत में इसे सरकारी अफसरों का ड्रामा बता कर नकार दिया। जिन गांवों में पिछले साल इसे आंशिक रूप से अपनाया गया, वहां के किसान इस साल लेजर लेवलिंग पर पूरी तरह से फिदा हो गए हैं। प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में लेजर लेवलिंग को जल सरंक्षण की बेहतरीन तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। इससे उबड़-खाबड़ खेत को बराबर कर पानी का पूरी तरह से खेत में समान रूप से फैलने के लाभ गिनवाए गए। बताया गया कि चंद रुपये खर्च कर किसान इसका भरपूर लाभ ले सकते हैं। इससे धान की रोपाई में पानी कम खर्च होगा तो गेहूं की बिजाई के बाद इसके मरने के खतरे भी कम होंगे। धर्मेहड़ी गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि पहले पहल तो लगा था कि सरकारी बाबू अपने कमीशन के चक्कर में एक और जुगाड़ उन पर थोप रहे हैं, लेकिन अब उन्हें इसके लाभ दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आठ में से तीन एकड़ में लेवलिंग करवाई है और ये तीनों ही फर्श के समान हो गए हैं। मात्र दो ही घंटे में एक एकड़ में पानी फैल गया है। रोपाई के बाद हर जगह पर धान बराबर उंचाई पर दिखाई दे रहा है। मेहनत भी कम लगी है। कद्दू करने में ट्रैक्टर भी कम चला तो डीजल भी बचा है। इसकी तीन साल की मियाद कम और 15 सौ रुपये प्रति एकड़ का खर्च ज्यादा लग रहा है। इसी संबंध में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इससे पानी की बचत हो रही है। तीन सालों के बाद फिर से लेवलिंग करवाने की बात पर डा. सोहल कहते हैं कि तवी चलने पर बाहर की मिट्टी अंदर की ओर गिराने पर ये असमतल होने लगता है। पहली बार में लेवलिंग करने पर जहां ढाई घंटे का समय लगता है, वहीं बाद में आधा घंटा ही रह जाता है। ऐसे में पैसे भी कम हो जाते हैं। सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी पर डा. सोहल कहते हैं कि साढ़े तीन लाख की मशीन पर डेढ़ लाख रुपये की सब्सिडी दी जा रही है।

घग्गर साफ कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवाई, river ghagger, hansi-butana,

राजनीति
पंजाब के कांग्रेसी दिल्ली के साथ
उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर की साफ सफाई कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवा दी हैं। यह खुलासा शिअद के महासचिव एवं पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने किया है। वह शुक्रवार को यहां पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। पंजाब की भूमि पर बाढ़ नियंत्रण के उपाय कर रही इन मशीनों को उठवाने व कार्य रोकने पर किसी तरह का मामला दर्ज करवाने के सवाल पर कहा कि ये सब हरियाणा ने अपने वकीलों की सलाह से तकनीकी रूप से किया है। हांसी-बुटाना नहर और इसके साथ बनाई जा रही दीवार पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से अकालियों पर लगाए गए आरोपों पर कहा कि उनके पास अपनी उपलब्धियां गिनाने को हैं नहीं, अपने शासनकाल में उन्होंने हांसी बुटाना नहर को बनने दिया और अब दोषारोपण गठबंधन पर कर रहे हैं। पंजाब के कांग्रेसी हमेशा से ही दिल्ली के साथ रहे हैं, जबकि अकाली दल ने नहर के खिलाफ प्रधानमंत्री तक का दरवाजा खटखटाया और दीवार बनना शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसी मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की पूर्व डिप्टी स्पीकर बीर दविंदर की मांग पर चंदूमाजरा ने कहा कि अब मामला न्यायालय में है ऐसे में सर्वदलीय मीटिंग का ज्यादा औचित्य नहीं रह जाता। प्रो. चंदूमाजरा ने प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हरियाणा से ज्यादा होने के सवाल पर राज्य के पास कम संसाधन होने का हवाला दिया।

Saturday, 2 July 2011

बाढ़ से नुकसान हुआ तो केंद्र जिम्मेदार : सेखों,after flood, hansi-butana,

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भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला) :
 प्रकृति के विपरीत पहले हरियाणा के ड्रेनेज विभाग ने पानी के बहाव के उलट हांसी बुटाना नहर का निर्माण कर एक गलती की और अब घग्गर नदी का कुदरती रास्ता रोक कर दूसरी गलती की जा रही है। पंजाब के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों ने बुधवार को पंजाब-हरियाणा सीमा पर स्थित विवादास्पद हांसी-बुटाना नहर के साथ बन रही दीवार का जायजा लेने के दौरान यह बात कही। साथ ही केंद्र से मांग की कि हरियाणा के चीफ इंजीनियर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाए। उन्होंने कहा कि हांसी-बुटाना नहर के साथ बन रही दीवार बाढ़ के पानी के लिए बांध का काम करेगी और इससे पटियाला जिले के सैंकड़ों गांव डूब जाएंगे। पानी की मार से हरियाणा का अंबाला जिला भी नहीं बच पाएगा। उन्होंने ब्लू प्रिंट दिखा कर बताया कि नहर के निर्माण में किस तरह से तकनीकि खामियां छोड़ी गई हैं। नियंत्रित पानी को नीचे से गुजारने की बजाय नदी के ऊपर से निकाला गया जबकि बरसाती नदी घग्गर, जहां पानी सीजन में दो लाख क्यूसिक के पार हो जाता है और आम दिनों में दस हजार क्यूसिक ही रहता है, ऐसे में इसे नियंत्रित करना और बह कर आए कचरे के साइफन में फंसने से रोकना असंभव कार्य है। सेखों ने कहा कि यदि इसकी बाढ़ से नुकसान हुआ तो केंद्र सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार होगी, जो हरियाणा को रोकने में नाकाम रही है। सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका का हवाला देते हुए सेखों ने कहा कि वह हर दरवाजे पर गए। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने प्रधानमंत्री से भी मुलाकात की है। राज्य में विपक्ष की नेता राजिंदर कौर भट्ठल और कांग्रेस के प्रदेश प्रधान कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ चलकर प्रधानमंत्री से मिलने की अपील भी कर चुके हैं। लोगों की ओर से सीधी कार्रवाई करने की चेतावनी पर वे इसे कानून व्यवस्था का मामला बताते हुए खारिज करते हैं।

पहले भड़के मंत्री जी, फिर मीडिया से सहायता मांगी
पटियाला : क्षेत्र में ड्रेनेज की सफाई न होने का सवाल उठाने पर सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों भड़क उठे। कहने लगे कि क्या ड्रेनेज साफ होने से उल्टा तेजी से पानी आकर बाढ़ ला देगा। मंत्री जी ने सफाई न होने को उचित ठहरा दिया। हालांकि कुछ ही देर में मीडिया से वे सहायता भी मांगने लगे कि यदि ठीक ढ़ंग से मामला उठाया जाए तो सुनवाई हो सकती है।

सस्ती सब्जियों के लिए किसानों को सब्सिडी, plan, vegitables, diversification, farmer, subsidy,


पहल :

 केंद्र की योजना में लुधियाना, जालंधर, पटियाला व फतेहगढ़ शामिल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गांव के खेतों की मिट्टी में बिखरने और शहर में मुर्गे से महंगी बिकने वाली मूंगी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आ ही चुकी है। अब बड़े शहरों में सब्जियां आउट ऑफ सीजन में भी सस्ती करने के लिए किसानों को केंद्र सरकार की योजना के तहत भारी-भरकम सब्सिडी दी जाएगी। केंद्र की राष्ट्रीय बागवानी के तहत शुरू होने वाली इस योजना को उन जिलों में लागू किया जा रहा है, जिसका मुख्यालय या तो घनी आबादी वाला बड़ा शहर है या फिर राज्य की राजधानी के निकट है। दैनिक जागरण से बात करते हुए बागवानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. रणधीर सिंह ने बताया कि अक्सर देखा जाता है कि साल के कुछ विशेष महीनों में सब्जी की किल्लत हो जाती है। शहरों में इसके दाम तो अब दो अंकों से निकल कर तीन में भी जाने लगे हैं, जबकि कुछ महीने ऐसे होते हैं, जब किसान को सब्जी के उचित दाम नहीं मिलते। मांग-सप्लाई के अंतर को पाटने और ट्रांसपोर्ट खर्च कम करने के साथ ही ताजा सब्जी को उपभोक्ता तक साल भर उचित मूल्य में पहुंचाने के लिए ही यह योजना बनाई गई है। योजना के तहत पंजाब के चार अर्बन जिले पटियाला, लुधियाना, जालंधर और फतेहगढ़ साहिब को चुना गया है। डॉ. रणधीर सिंह बताते हैं कि योजना में हर किसान समूह को दो लाख रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। 10 से 15 किसानों के एक समूह के पास कम से कम 50 हेक्टेयर जमीन होनी चाहिए। ये किसान सोसायटी बना कर विभाग के पास आ सकते हैं। इसके अलावा सब्जियों की मार्केटिंग बेहतर ढ़ंग से हो सके, इसके लिए भी प्रबंध किए जा रहे हैं। एक बार में मिलने वाली उक्त सब्सिडी के अलावा सब्जियों की प्लांटिंग करने वाले उपकरणों और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए भी 50 फीसदी सब्सिडी दिए जाने की योजना है।

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नुकसान
बारिश से मिर्च के पौधों की जड़ें हुईं कमजोर गलने की आशंका 
 किसान नुकसान को लेकर चिंतित
भूपेश चट्ठा, पटियाला
धान की रोपाई करने वाला किसान चाहे बारिश का स्वागत करने को एक पैर पर खड़ा हो पर अब यही बारिश उसे रुलाने लगी है। साल में दो फसलों के चक्र से निकल कर सब्जियों से डायवर्सिफिकेशन करने वाले किसान अब मिर्च की फसल को लेकर परेशान हैं। दो दिनों से लगातार हुई बारिश और उससे पहले चली तेज हवाओं ने मिर्च के पौधों की जड़ें कमजोर कर दी हैं। वहीं इनके गलने के आसार भी बढ़ गए हैं। याद रहे कि मानसून की बारिश के साथ ही पहाड़ी व शिमला मिर्च गलकर गायब हो जाती है। वहीं साधारण मिर्च बारिश के पानी से और तीखी हो जाती है। नतीजा बाजार में इसकी मांग में गिरावट और दामों में भी कमी हो जाती है। मांग व सप्लाई के सिद्धांत को ठेंगा दिखाते हुए मिर्च के कारोबार पर सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. बलजीत सिंह कहते हैं कि बारिश के बाद न तो ये आचार के लायक रहती है और न इसे सुखाकर लाल ही किया जा सकता है। अलबत्ता इसे थोड़ी मात्रा में ही सही पर खाया जरूर जाना चाहिए। वहीं सन्नौर मंडी में आढ़त का काम करने वाले सुभाष बांगा कहते हैं कि यहां की आबो-हवा और मिट्टी की ही खासियत है कि मिर्च तीखी और बेर बहुत मीठा होता है। लोगों ने अपने यहां खानदानी बीज संजोकर रखे हैं, जो पीढि़यों से लगाए जा रहे हैं, हालांकि अब लोग सन्नौरी मिर्च को छोड़ हाइब्रिड किस्मों की ओर जा रहे हैं। दिखने में बेहद छोटी इस मिर्च का फल यदि फूल से निकलने के साथ ही नीचे यानी धरती की ओर मुड़ जाए तो यह गजब की कड़वी होती है। वहीं हार्टीकल्चर विभाग के डिप्टी डायरेक्टर रंधीर सिंह कहते हैं कि मिर्च की क्वालिटी ही उसके तीखेपन पर निर्भर करती है। बारिश से मिर्च का तीखा होना एक भ्रांति है, लेकिन यदि पौधे की जड़ों में पानी रुक जाए और इसकी निकासी समय रहते न हो तो नुकसान तय है। ऐसे में जड़ों का गलना शुरू हो जाता है। पटियाला में करीब एक हजार एकड़ क्षेत्र में इसकी बिजाई हो रही है। नाभा, भादसों व पातड़ां में इसके अधीन रकबा ज्यादा है। नाभा क्षेत्र में किसान प्लास्टिक शीट का प्रयोग कर अनचाही बारिश से इसका बचाव कर रहे हैं।

घग्गर को साफ कर रही मशीनें पंजाब ने वापस बुलाई, river ghagger, drainage, punjab,


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर में साफ सफाई का काम कर रही पंजाब की मशीनें जहां पहले हरियाणा ने उठवा दी थी वहीं आज शेष बची मशीनरी को पंजाब ने वापस बुला लिया है। पंजाब की भूमि पर घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित करने के किए जा रहे उपायों के तहत काम कर रही मशीनरी अब कम से कम इस सीजन में नहीं दिखाई देगी, इसे एक तरह से हांसी-बुटाना नहर का जिन्न निगल गया है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि न्यायालय की अवमानना के डर से पंजाब ने यह कदम उठाया है। इसके चलते मकरोड़ साहिब से कराली तक 16.5 किमी की घग्गर में बाढ़ नियंत्रण अथवा नदी को चैनेलाइज करने का काम अब पूरी तरह से बंद हो गया है। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार घग्गर नदी की सफाई का कार्य दोनों राज्यों की सहमति से ही करवाया जा सकता है। दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों की सहमति जरूरी है। बताया जा रहा है कि यह बैठक सिर्फ इसीलिए नहीं हो पा रही है कि हरियाणा के मुख्य सचिव ने घग्गर के मुद्दे पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसकी वजह से अब मशीनरी उठा ली गई है।
दिलचस्प है कि पंजाब के ड्रेनेज विभाग ने इससे पहले भी जून में वकीलों की सलाह लेने के साथ ही इस क्षेत्र में सर्वे करवाया है। तब भी किसी तरह का कार्य आगे ना बढ़ाने की सलाह सामने आई थी लेकिन जनता के दवाब में कुछ कार्य किए भी गए पर अब बात आगे बढ़ती देख पंजाब पीछे हट गया है।

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हांसी बुटाना नहर का मामला : क्षेत्र के लोग दायर करेंगे सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोग आते हैं। हालात देखते हैं और फोटो खिंचवाकर चलते बनते हैं। मंत्री-संत्री सब जानते हैं, हांसी बुटाना नहर पर दीवार बनने से क्या होगा। हम कुछ कहते हैं तो भड़क उठते हैं करें तो क्या करें? ये व्यथा पंजाब-हरियाणा सीमा पर बसे एक या दो नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों की है, जो दो राज्यों सरकारों की राजनीतिक शक्तियों के बीच अपने अपने वोट बैंक के एजेंडे की लड़ाई में पिस रहे हैं। पंजाब के धर्मेहड़ी, ससी ससा, अलीपुर, करतारपुर, अलीपुर थेह, नौगांवा जैसे गांव पहले से ही हांसी बुटाना नहर की मार तले हैं। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि बीते साल तो नहर के टूटने से पानी निकल गया पर अब तो बाढ़ की मार को स्थायी करने के लिए दीवार बनाई जा रही है। दिलचस्प है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा के ड्रीम प्रोजेक्ट कही जाने वाली इसी नहर के इस ओर हरियाणा के सौगलपुर, कसौली, पपराला, गगड़पुर, घमेड़ी, विवादास्पद साइफन के ठीक निकट घमेड़ा जैसे गांव भी मार तले हैं। वहीं धर्मेहड़ी के सरपंच कश्मीर सिंह सीधे सीधे आरोप लगाते हैं कि सरकार के नुमाइंदे फोटो खिंचवाकर चले जाते हैं, हम कुछ करते हैं तो पर्चे दर्ज किए जाते हैं। ड्रेन में साफ सफाई का काम अपने हाथ में लिया तो आज जिला प्रशासन मानसून आने के बाद आ खड़ा हुआ और कह रहा है कि मौसम साफ होते ही पुल के नीचे का फर्श खोद कर गहरा कर अन्य ड्रेन भी साफ कर दिए जाएंगे। यहां धरना लगाए बिना कोई सुनवाई ही नहीं होती है। याद रहे कि नहर के निर्माण के शुरुआती दिनों में जहां संघर्ष समिति का गठन किया गया था आंदोलन से बात न बनी तो बाढ़ का पानी चढ़ने पर लोगों ने इसका किनारा तोड़ डाला, नुकसान हरियाणा के चीका शहर तक जा पहुंचा था। लोगों ने सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका के अलावा जनहित याचिका दायर करने मन बना लिया है। इन्हें डायरेक्ट एक्शन से भी गुरेज नहीं है। क्षेत्र का हर बाशिंदा दीवार ढहाने के लिए तैयार बैठा है। हालांकि पानी देने से किसी को एतराज नहीं है। दूसरी ओर क्षेत्र में शनिवार को एसडीएम गुरमीत सिंह ने पटवारियों को साथ लेकर इलाके का दौरा किया और खराब हुई फसल की तुरंत गिरदावरी करने के आदेश भी दिए हैं।

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खेत से लाइव, आपसी सहयोग
सेवा ट्रैक्टर की हो या पड़ोसी की, मोटर के पानी की सब हाजिर है
 एक-दूसरे की मदद को पहुंच रहे हैं दोस्त और रिश्तेदार
भूपेश चट्ठा, पटियाला : गर्मियों की छुट्टियों के इन दिनों में बच्चे वेस्टइंडीज में क्रिकेट के सपने देख रहे हैं और आसमान में बादल आते ही शहर में बच्चे बैट बॉल लेकर निकल पड़ते हैं तो गांव में बच्चे ट्रैक्टर के आगे पीछे होने लगते हैं। मौसम में नमी और एक-आध दिन छोड़कर आ रही बारिश ने किसानों के चेहरे इस कदर खिला दिए हैं कि प्रभाव घर परिवार में दिखने लगा है। खुशनुमा माहौल में किसान धान की रोपाई जल्द निपटाने में लगा है।
दिलचस्प है कि मौसम की मेहरबानी और अन्य राज्यों से धान की रोपाई को आने वाले मजदूरों की कमी ने किसानों के दोस्तों-रिश्तेदारों को एक ही मोटर पर ला बिठाया है। डकाला ब्लाक के खेड़ी, रामगढ़ सपेड़ा, धर्मेहड़ी इत्यादि गांवों के रविवार को किए दौरे में पाया गया कि आजकल न केवल किसान अपितु उनके परिवार के सभी सदस्य पूरे जी जान से धान की रोपाई में लगे हैं। बीते सालों को याद करते हुए गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अक्सर जून के महीने में किसान चिलचिलाती गर्मी में बिजली की मांग के लिए धरने प्रदर्शन कर रहा होता था या फिर सरकार को कोस रहा होता था और लड़के ग्रिड फूंकने और बिजली वालों को उठा लाने जैसी स्कीमें गढ़ रहे होते थे, पर इस बार कम से कम अब तक कुदरत की मेहरबानी से ऐसा कुछ नहीं है। वाहेगुरु की मेहर है। अरदास है कि सीजन अच्छे से निकल जाए।
वहीं रामनगर नाके पर जमे नवां गांव के गुरविंदर सिंह पूरी तरह से विकास की बातें करते हैं कि पहले एक बार ट्रांसफार्मर क्या जलता कई दिनों तक बिजली की उम्मीद नहीं होती थी पर अब लगता है कि शायद आज रात ही आ जाए। बीते साल के अच्छे मानसून से बांधों में भरे पानी से मिल रही बिजली और बिजली चोरी के कम हो रहे साधन की बात जब उन्हें बताई जाती है और पूछा जाता है कि सरकार का कम और प्रकृति व जागरूक हुए लोगों का इसमें ज्यादा योगदान है तो तपाक से कहा जाता है कि रब्ब भी वही है और लोग भी वही। फर्क बस इतना है कि तन पर कच्छहरे का स्थान शॉर्ट व लोवर ने ले लिया है। गड्डा नहीं दिखता तो मोटरसाइकिल आम हो गए हंै।
लगभग हर गांव में आलम यह है कि लोग एक दूसरे की मदद को अन्य स्थानों से भी पहुंच रहे हैं। जिस दोस्त का काम पहले हो गया है वो फोन कर टै्रक्टर सहित सेवा में तैयार होने की बात करता है। बस राशन कैंटीन से हो जाए तो बेहतर नहीं तो सोडा कम से कम साथ होने का आश्र्वासन जरूर चाहता है, हालांकि मौका देख कर स्वदेशी शक्ति वाटर से भी एतराज नहीं करता। मजदूरों की कमी क्या हुई शहर में अफसरी करने वाले भी तंबे में आ कर बहन, बुआ व मासी के यहां रिश्तेदारी में मदद करने को आ गए हैं। सेवा ट्रैक्टर की लगी हो या पड़ोसी की मोटर के पानी की सब हाजिर हो रहा है।

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 बारिश के कारण किसानों ने नहीं चलाया ट्यूबवेल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
सरकार ने डीजल के दाम बढ़ा दिए। इस मुद्दे पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा हंगामा होने की संभावना थी, पर ऐसा नहीं हुआ। खेती का लागत मूल्य या खर्चे बढ़ने की दुहाई देने वाले किसान संगठन भी लगभग खामोश ही रहे। इस शांति का श्रेय केंद्र या राज्यों की सरकारों को नहीं, अपितु प्रकृति की कृपा को मिला है।
 बिजली, पानी के बाद डीजल की बात करने वाला किसान कह रहा है डीजल कब हुआ महंगा? इस साल मानसून पूर्व की बौछारों ने किसान को खेत में रौणी करने फिर और पानी छोड़ कद्दू करने के लिए किसी तरह का जेनरेटर चलाने की जरूरत नहीं पड़ने दी। इससे पहले एक एकड़ में आठ घंटे ट्यूबवेल चला कर सिंचाई करनी पड़ती थी। मानसून पांच दिन पहले आया और लगातार बरसा, तो बिजली से भी ट्यूबवेल चलाने की जरूरत नहीं पड़ी जेनरेटर तो दूर की बात।
 प्रदेश के कृषि विभाग के मुख्य अधिकारी डा. बीएस सोहल ने वीरवार को बताया कि इस साल अगर कोई साधारण सा हिसाब भी जोड़े तो अंदाजा लगा सकता है कि प्रदेश का कितना धन प्रकृति की मेहरबानी से बचा है। उन्होंने कहा कि एक हेक्टेयर खेत को तैयार करने में आम हालात में किसान मुफ्त की बिजली के अलावा 35 से 40 लीटर डीजल की खपत अपना ट्यूबवेल चलाने में कर देता है। पंजाब में 25 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में धान की रोपाई हो रही है।
परिस्थितियां बता रही हैं कि 40 रुपये प्रति लीटर पर आया डीजल यदि जला होता तो अब तक प्रदेश के किसान चार सौ करोड़ रुपये का डीजल जला चुके होते। मरम्मत के खर्च अलग होने थे। गौर हो कि पंजाब में बिजली कनेक्शन वाले 12 लाख ट्यूबवेल हैं और इतने ही बिना कनेक्शन के हैं जिन्हें धान के सीजन में ही चलाया जाता है।

घग्गर साफ कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवाई, hansi-butana, flood protection,

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर की साफ सफाई कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवा दी हैं। यह खुलासा शिअद के महासचिव एवं पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने किया है।
 वह शुक्रवार को यहां पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। पंजाब की भूमि पर बाढ़ नियंत्रण के उपाय कर रही इन मशीनों को उठवाने व कार्य रोकने पर किसी तरह का मामला दर्ज करवाने के सवाल पर कहा कि ये सब हरियाणा ने अपने वकीलों की सलाह से तकनीकी रूप से किया है।
हांसी-बुटाना नहर और इसके साथ बनाई जा रही दीवार पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से अकालियों पर लगाए गए आरोपों पर कहा कि उनके पास अपनी उपलब्धियां गिनाने को हैं नहीं, अपने शासनकाल में उन्होंने हांसी बुटाना नहर को बनने दिया और अब दोषारोपण गठबंधन पर कर रहे हैं। पंजाब के कांग्रेसी हमेशा से ही दिल्ली के साथ रहे हैं, जबकि अकाली दल ने नहर के खिलाफ प्रधानमंत्री तक का दरवाजा खटखटाया और दीवार बनना शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसी मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की पूर्व डिप्टी स्पीकर बीर दविंदर की मांग पर चंदूमाजरा ने कहा कि अब मामला न्यायालय में है ऐसे में सर्वदलीय मीटिंग का ज्यादा औचित्य नहीं रह जाता। प्रो. चंदूमाजरा ने प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हरियाणा से ज्यादा होने के सवाल पर राज्य के पास कम संसाधन होने का हवाला दिया।

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फायदा
 लेवलिंग पर प्रति एकड़ 15 सौ रुपये की आ रही लागत
: पानी की बचत को देख किसानों में बढ़ा इसका प्रचलन
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पांच-छह सालों से पंजाब के किसानों को खेत समतल करने की आधुनिक लेजर लेवलिंग तकनीक पर भाषण देते रहने के बाद अब कृषि विभाग का जागरूकता अभियान रंग लाने लगा है। दिलचस्प है कि किसानों ने शुरुआत में इसे सरकारी अफसरों का ड्रामा बता कर नकार दिया। जिन गांवों में पिछले साल इसे आंशिक रूप से अपनाया गया, वहां के किसान इस साल लेजर लेवलिंग पर पूरी तरह से फिदा हो गए हैं। प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में लेजर लेवलिंग को जल सरंक्षण की बेहतरीन तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। इससे उबड़-खाबड़ खेत को बराबर कर पानी का पूरी तरह से खेत में समान रूप से फैलने के लाभ गिनवाए गए। बताया गया कि चंद रुपये खर्च कर किसान इसका भरपूर लाभ ले सकते हैं। इससे धान की रोपाई में पानी कम खर्च होगा तो गेहूं की बिजाई के बाद इसके मरने के खतरे भी कम होंगे। धर्मेहड़ी गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि पहले पहल तो लगा था कि सरकारी बाबू अपने कमीशन के चक्कर में एक और जुगाड़ उन पर थोप रहे हैं, लेकिन अब उन्हें इसके लाभ दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आठ में से तीन एकड़ में लेवलिंग करवाई है और ये तीनों ही फर्श के समान हो गए हैं। मात्र दो ही घंटे में एक एकड़ में पानी फैल गया है। रोपाई के बाद हर जगह पर धान बराबर उंचाई पर दिखाई दे रहा है। मेहनत भी कम लगी है। कद्दू करने में ट्रैक्टर भी कम चला तो डीजल भी बचा है। इसकी तीन साल की मियाद कम और 15 सौ रुपये प्रति एकड़ का खर्च ज्यादा लग रहा है। इसी संबंध में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इससे पानी की बचत हो रही है। तीन सालों के बाद फिर से लेवलिंग करवाने की बात पर डा. सोहल कहते हैं कि तवी चलने पर बाहर की मिट्टी अंदर की ओर गिराने पर ये असमतल होने लगता है। पहली बार में लेवलिंग करने पर जहां ढाई घंटे का समय लगता है, वहीं बाद में आधा घंटा ही रह जाता है। ऐसे में पैसे भी कम हो जाते हैं। सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी पर डा. सोहल कहते हैं कि साढ़े तीन लाख की मशीन पर डेढ़ लाख रुपये की सब्सिडी दी जा रही है।