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Thursday, 8 September 2011

नहर से नहीं है मतलब, बाढ़ नहीं आनी चाहिए, hansi-butana, dhermehri, flood protection, farmer's agitation,

-क्षेत्र के हर किसान के पास है बाढ़ रोकने योजना
-नहर बनने से रोकना सरकार का काम, हमे साइफन व घग्गर की समुचित व्यवस्था चाहिए: पंजाब व हरियाणा के किसानों की एक आवाज
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला)
'मारकंडा का पानी घग्गर में ना डाला जाए, इसे एक पुरानी प्राकृतिक ड्रेन को जिंदा करते हुए निकाला जाए और सिंचाई के काम में लिया जाए...Ó। 'चीका से होकर निकलने वाली घग्गर नदी की ब्रांच को फिर से चलाया जाए ताकि पानी का बंटवारा हो और एक जगह पर बाढ़ ना आए...Ó। साइफन चौड़े हों..., 'हांसी बुटाना नहर को चार किलोमीटर तक भूमिगत कर दिया जाए...Ó, घग्गर नदी को एक हजार फुट चौड़ा करने के साथ गहराई तीस फुट की जाए...इत्यादि। 
 पंजाब हरियाणा की सीमा पर पटियाला-चीका रोड पर रहने वाले हर किसान के पास क्षेत्र में बाढ़ रोकने की योजना है। उसने ड्रेनेज सिस्टम पर ये महारथ पीढिय़ों से आती रही बाढ़ से जूझने के बाद सीखी है। उसका अनुभव उसे कहता है कि बाढ़ रोकने के यही कारगर तरीके हैं। इनके विपरीत यदि कुछ किया जाता है तो बाढ़ ज्यादा आएगी और नुकसान कम होने की बजाए बढ़ जाएगा।
दिलचस्प है कि नहर के साथ बन रही दीवार के विरोध में उतरे किसानों से 'दैनिक जागरणÓ की बातचीत में सामने आया कि किसानों को नहर से कोई 'एतराजÓ नही हंै, लेकिन उनके क्षेत्र में बाढ़ नही आनी चाहिए। 


'बाढ़ रोकने के कई उपाय हैं लेकिन सरकारें हैं कि अपनी-अपनी अड़ी पर ही अड़ी हैं हमारी सुनी ही नहीं जा रहीÓ
हरभजन सिंह चट्ठा गांव धर्मेहड़ी, पंजाब


'सरकारें आती हैं, फोटो खिंचवा कर चली जाती हैं, सदियों से संताप झेल रहे हैं, बाढ़ का उपाय तो किया नहीं अब एक और जिन्न ला कर खड़ा कर दिया है, अब उसके भी पंख लगाए जा रहे हैंÓ
गुरनाम सिंह गांव धर्मेहड़ी, पंजाब



'नहर तो बन गई है, उसे हटाना या रखना सरकार का काम है, पर बाढ़ रुकनी ही चाहिए, ये दोनों से ज्यादा जरूरी हैÓ
मुख्तयार सिंह गांव खमेहड़ा हरियाणा




'हम नहर के विरोधी नहीं है पर हट जाए तो अच्छा। सबसे ज्यादा जरूरी है कि पानी की निकासी प्राकृतिक तरीके से ही होनी चाहिए। ये सरकारें चाहे हरियाणा की है या केंद्र की प्राकृति से लड़ रही हैं ओर हमें दांव पर लगा रखाÓ
महल सिंह पूर्व सरपंच




'घग्गर नदी को चौड़ा और गहरा करने के अलावा मानसून के दिनों में आने वाले फ्लैश फ्लड के हिसाब से हांसी बुटाना नहर पर साइफन बनाए जाएं और ये सब हर उस जगह पर हों जहां पिछले सीजनों में नहर टूटी हैÓ
सोहन सिंह गांव राम नगर, पंजाब

पौंग बांध से बिजली उत्पादन गिरा, गलती उजागर, pong, dam reservior , electricity, hydel, flood protection,





भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में उफनती ब्यास की बाढ़ को रोकने के लिए बना पौंग बांध ही इस सीजन में बाढ़ का कारण बना है। बांध से छोड़े गए अतिरिक्त पानी के बाद अब न केवल बांध के जलाशय का जल स्तर गिरना शुरू हो गया है, बल्कि बांध से होने वाले पन बिजली उत्पादन में भी गिरावट आ गई है।

याद रहे कि 'दैनिक जागरण' ने दो सितंबर के संस्करण में ही बता दिया था कि गलती हो चुकी है और बिजली के 49 करोड़ यूनिट बहाने के अलावा अनावश्यक रूप से छोड़े गए पानी की वजह से कई इलाकों में बाढ़ का कारण भी यही पानी बना है।
गौरतलब है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से बिजली के करीब 27 करोड़ यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे, जो नहीं बने।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड(बीबीएमबी) का यह पौंग बांध का ऊपर वाला हिस्सा 1430 फीट पर है, जबकि इसके डिजाइन के अनुसार अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट रखी गई है, जबकि पूर्ण जलाशय 1400 फीट पर है। टर्बाइन के सभी छह यूनिट पूरी क्षमता पर चलाने के लिए इससे 17हजार 500 क्यूसिक पानी छोड़ा जाता है। पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन लेने वाला स्तर 1480 फीट पर आता है, जबकि 207 मेगावाट क्षमता के मुकेरियां हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए डिस्चार्ज 11हजार 500 क्यूसिक चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के इंजी.पदमजीत सिंह की ओर केंद्रीय ऊर्जा सचिव पी. उमा शंकर को लिखा गया है कि वर्ष 2010 में बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया और 15 से 18 सितंबर के बीच बहुत कम पानी छोड़ा गया, जबकि इस साल अगस्त मध्य में ही 1480 फीट के आंकड़े से पहले ही डैम से पानी रिलीज करना शुरू कर दिया गया, जबकि बांध का भराव सीजन 21 सिंतबर तक है।
इंजी. पदमजीत कहते हैं कि गलती हो चुकी है। पानी का बहाव कम हो गया है। उम्मीद थी कि जल स्तर सात सितंबर तक 1386 फुट पर आ जाएगा लेकिन यह 1378 फुट रह गया है। बीबीएमबी को अब भी पानी को सहेजना चाहिए। किसी तरह से 26 सितंबर तक पानी भरने दिया जाए।
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किस दिन कितना हुआ उत्पादन?
पटियाला : 396 मेगावाट क्षमता के बांध से पन बिजली उत्पादन एक सितंबर को 396 मेगावाट, दो को 368 मेगावाट, तीन को 370 मेगावाट, चार को 370 मेगावाट, पांच को 370 मेगावाट और छह सितंबर को 295 मेगावाट रह गया है।

Thursday, 1 September 2011

बाढ़ रोकने बने बांध से निकली बाढ़, बिजली गई बेकार, dam, flood protection, reservior , pong, hydel,


-पौंग बांध से बहा दिए 49 करोड़ बिजली यूनिट, बाढ़ आई सो अलग
-बांध 1430 फीट का, अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट, रिजरवायर 1400 फीट पर पानी छोड़ दिया 1380.4 फीट पर
-बीते साल बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया था
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मानसून के दिनों में उफनती ब्यास नदी की बाढ़ को रोकने बना पौंग बांध ही इस सीजन में बाढ़ का कारण बना है। बांध से छोड़े गए पानी के आंकड़े बताते हैं और कहते हैं कि भराव के पिछले इतिहास को  देख थोड़ा संयम बरता होता तो ना केवल पौंग बांध से बही 49 करोड़ यूनिट बिजली बची होती अपितु सिंचाई के लिए पानी भी। वहीं अनावश्यक रूप से पानी छोड़े जाने से बाढ़ आई सो अलग।
दिलचस्प है कि बांध के स्पिल-वे गेटों को 14 अगस्त को खोला गया और 31 अगस्त तक इन्होंने 5.4 लाख क्यूसिक पानी नदी में उड़ेल दिया। इस पानी के साथ ही 396 मेगावाट क्षमता के बांध से करीब 27 करोड़ बिजली के यूनिट भी बह गए। पौंग पावर प्लांट से पानी नहीं गुजरा तो मुकेरिंयां हाइड्रो प्रोजेक्ट से भी 22 करोड़ यूनिट बनने थे।
भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड का यह पौंग बांध का उपरी हिस्सा 1430 फीट पर है जबकि इसके डिजाइन अनुसार अधिकतम भराव क्षमता 1421 फीट रखी गई है जबकि पूर्ण रिजरवायर 1400 फीट पर है। सभी छह यूनिट पूरी क्षमता पर चलाने इससे 17500 क्यूसिक पानी छोड़ा जाता है, पूरी क्षमता पर बिजली उत्पादन लेने वाला स्तर 1480 फीट पर आता है, जबकि 207 मेगावाट क्षमता के मुकेरिंयां हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए डिसचार्ज 11500 क्यूसिक चाहिए।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फैडरेशन के इंजी. पदमजीत सिंह की ओर केंद्रीय ऊर्जा सचिव सहित सभी संबंधित पक्षों को भेजे गए श्वेत पत्र में लिखा गया है कि वर्ष 2010 में बांध को 1394.5 फीट तक भरा गया और 15 से 18 सितंबर के बीच बहुत कम पानी छोड़ा गया, जबकि इस साल ये शुरुआत ना केवल अगस्त मध्य में ही 1480 के आंकड़े से पहले ही रिलीज करना शुरू कर दिया गया। जबकि बांध का भराव सीजन 21 सिंतबर तक है, इसके बाद पानी बहुत कम रिलीज किया जाता रहा है।
बाक्स : मापदंड 
महीना,   मिलीयन यूनिट,  लोड, स्तर
-अक्टूबर 10 को,140, 52 फीसदी, 1388 फीट
-नवंबर, 172, 66 फीसदी, 1379 फीट
-दिसंबर, 170, 63 फीसदी, 1368 फीट
-जनवरी 11 को, 114, 43 फीसदी, 1361 फीट
-फरवरी, 165, 68 फीसदी, 1351 फीट
-मार्च,    103,38 फीसदी, 1345 फीट
-अप्रैल,  12,  पांच फीसदी, 1349 फीट
-मई,     71,  27 फीसदी,  1350 फीट
-जून,    135, 52 फीसदी,  1351 फीट

पौंग बांध का न्यूनतम जल स्तर 1260 फीट है इसके अब तक के सबसे कम जल स्तरों में 26 अप्रैल 1982 में 1311 फीट, 25 जून 1978 में 1315 फीट रहा है। इसके बाद मानसून के दिनों में बांध फिर से भरने लगता है। इस साल जुलाई में प्लांट 81 फीसदी लोड फैक्टर पर चला, जबकि एक से 12 अगस्त के बीच इसे 65 फीसदी कर दिया। 14 अगस्त को सुबह नौ बजे गेट खोलने के बाद दोपहर तीन बजे 100 फीसदी लोड पर चलाया गया। 
बांध से 70 हजार क्यूसिक तक पानी छोड़े जाने ने भारी तबाही मचाई। 15 से 19 अगस्त के बीच प्रदेश भर में भारी बारिश हुई और 17 अगस्त से 21 अगस्त के बीच जल स्तर 1388.02 फीट से गिरता हुआ 1386.83 फीट पर आ गया। जबकि 1400 फीट तक का गैप भविष्य की बाढ़ की संभावनाएं रोकने के लिए होता है। इंजी. पदमजीत कहते हैं कि उन्होंने लगातार ऊर्जा मंत्रालय के अलावा बीबीएमबी को 22, 23, 25, 29, 30 अगस्त को ईमैल किए हैं कि बांध को पिछले साल के स्तर तक भरने दो पर नहीं हुआ। कम से कम चार रूपये यूनिट की 50 करोड़ यूनिट बिजली के अलावा बहुमूल्य पानी बह गया। 

Thursday, 21 July 2011

मिट्टी बेचने के लिए होता है साइफन साफ, hansi-butana, flood protection,


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
 दो पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा के बीच पानी की लड़ाई कश्मीर का मसला बन चुकी है। वहीं, हांसी-बुटाना नहर का मुद्दा अब किसी तरह से कारगिल से कम नहीं है। ऐसे में जिसके जो हाथ लग रहा है वो कर रहा है। हरियाणा ने तब तब घग्गर नदी पर बने साइफन को साफ किया है जब उसे मिट्टी बेचनी होती है। पहाड़ों से बह कर आई उपजाऊ मिट्टी के जब भी ग्राहक मिले साइफन की सफाई हो गई अन्यथा मौसम को गुनाहगार बता पल्ला झाड़ लिया गया। दिलचस्प है कि साइफन की सफाई कब होती है, इस पर पंजाब का धर्मेहड़ी हो अथवा हरियाणा का सरौला गांव हो, दोनों ही राज्यों की सीमा पर बसे किसान और बाढ़ की मार तले आने वाला हर शख्स गवाह बनने को तैयार है। पटियाला चीका रोड पर धर्मेहड़ी पुलों के पास घग्गर नदी के साथ लगते पहले खेत के मालिक हरदीप सिंह कहते हैं कि जब भी किसी ने खेत में मिट्टी डलवानी होती है तो घग्गर हेड पर खड़े टिप्पर और साइफन के किनारे खड़ी जेसीबी मशीन काम करने लग जाती है। अन्यथा ये लोग बिलकुल नहीं हिलते। ऐसे ही गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि मिट्टी प्रति टिप्पर एक हजार रुपये में बिकती है। ट्राली थोड़ी सस्ती है। सीजन रबी का हो या खरीफ का, कोई फर्क नहीं पड़ता बस मशीन पांव जमा ले इतनी सी जमीन सूखी होनी चाहिए, फिर आर्डर पंजाब का किसान दे या हरियाणा का, सब बराबर है। याद रहे कि हांसी बुटाना नहर को घग्गर नदी पर से निकालने के लिए बनाया गया 1400 फिट चौड़ा और 23 फिट गहरा साइफन इन दिनों में मात्र पांच से छह फिट का रह गया है। शेष सारे में गाद जम आई है। साइफन से पानी की निकासी कितनी होगी इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि 1.66 लाख क्यूसिक क्षमता का साइफन मानसून के दिनों में अपनी एक चौथाई क्षमता का भी नहीं रह गया है। इन दिनों में बाढ़ का अतिरिक्त पानी निकालने के अलावा साइफन की जरूरत पशुओं को छाया उपलब्ध करवाने से ज्यादा नहीं रहती। उल्लेखनीय है कि पंजाब के ड्रेनेज विभाग की ओर से हरियाणा को पत्र लिख कर घग्गर के साइफन की सफाई करने की दो महीने पहले गुहार लगाई गई थी लेकिन हालात नहीं बदले। जून महीने में चंद दिन जेसीबी मशीन चलाने और साइफन की आउटलेट पर से गाद निकालने के बाद से काम रुका हुआ है। उधर, हरियाणा के ड्रेनेज विभाग के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर अरुण मलिक कहते हैं कि हम सफाई करवाते रहते हैं, बारिश के जल्द शुरू होने के चलते मशीनें अब बंद हैं। साइफन से मिट्टी बेचने की बात पंजाब को नहीं करनी चाहिए, वहां भी कुछ अलग नहीं है।

Wednesday, 20 July 2011

हांसी बुटाना : ग्राउंड जीरो पंजाब हरियाणा आमने-सामने

हांसी-बुटाना पर जमीनी लड़ाई शुरू
 
 
 
 
 
 
 गिरफ्तार करो मुझे, सिंचाई मंत्री ने दी चुनौती 
 पंजाब के मंत्री को जवाब दिया हरियाणा के इंजीनियरों ने
 
भूपेश चट्ठा, पटियाला : हांसी बुटाना नहर और इसके साथ बन रही दीवार को लेकर अदालत में चल रही पंजाब और हरियाणा की लड़ाई अब न केवल खुलकर आमने सामने आ गई है अपितु जमीनी स्तर पर भी शुरू हो गई है। बुधवार को पंजाब के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों ने हरियाणा के कस्बा गुहला के टिटियाना गांव में हरियाणा को खुल कर चुनौती दी है कि अगर दम है तो उन्हें आ कर गिरफ्तार किया जाए।
वे बार-बार हरियाणा सीमा पर आकर न केवल अपना विरोध जताएंगे, अलबत्ता अगर उन्हें यदि रोका गया तो वे इसी स्थान पर धरना भी देंगे। वहीं, हरियाणा सरकार ने सीमा पर नहर के साथ अपने ड्रेनेज विभाग के कर्मियों के साथ न केवल पुलिस पार्टी की तैनाती कर दी है अपितु साथ ही नायब तहसीलदार स्तर का एक अधिकारी भी लगा दिया है। मौके पर तैनात पुलिस पार्टी से पंजाब के एक डीएसपी स्तर के अधिकारी ने पंजाब के मंत्री को मौके पर जाने की अनुमति भी ली। इसके बाद ही हरियाणा ने मीडिया व मंत्री को जाने की आज्ञा दी। शेष लोगों को वहीं पर रोक दिया गया।
आज दोपहर को जब पंजाब के सिंचाई मंत्री प्रदेश के मीडिया को साथ मौके पर पहुंचे तो हरियाणा ने भी अपने अधिकारियों की टीम मीडिया के साथ वहां भिजवा दी। दिलचस्प है कि पंजाब के मंत्री की ओर से लगाए गए आरोपों का जवाब हरियाणा के सिंचाई विभाग के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर(एसइ) अरुण मलिक ने मौके पर ही आ कर दे दिया। हरियाणा के इंजीनियरों ने तर्क दिया कि किस तरह से बार बार आने वाली बाढ़ को रोकने के लिए हरियाणा सरकार अब घग्गर के पुराने बांध को पक्का करने के रूप में नहर पर दीवार का निमार्ण कर रही है।
 बाद में सेखों ने कहा कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह गुहला में हांसी-बुटाना नहर के साथ बनाई जा रही दीवार से उत्पन्न हुए हरियाणा-पंजाब विवाद में हस्तक्षेप करके शीघ्र सुलझाएं। हांसी-बुटाना नहर पंजाब के लिए अभिशाप है, इसकी जिम्मेदार हरियाणा सरकार है। पंजाब सरकार भरपूर कोशिश करेगी कि यह दीवार न बने।
 इस पानी का तो कोई झगड़ा नहीं :
 सेखों के सत्कार के लिए गुहला प्रशासन ने पूरी तैयारी कर रखी थी पर मंत्री ने उनके सामने पेश किया गया पानी भी नहीं पिया। एक अधिकारी चुटकी लेने से बाज नहीं आए और कहने लगे कि पानी तो पी लीजिए जनाब। इस पानी का तो कोई झगड़ा नहीं दोनों सूबों के बीच।
 सवाल से कन्नी काट गए सेखों :
 जब सेखों हांसी-बुटाना नहर के बारे में प्रदेश में होने वाली संभावित बर्बादी की बातें कर रहे थे, तो एक पत्रकार ने पूछा कि पटियाला से आने वाली तथा हरियाणा से होकर गुजरने वाली मीरांपुर ड्रेन की पिछले कई सालों से सफाई नहीं हुई। इस कारण मामूली बरसात होने पर भी गुहला के आधा दर्जन गांवों के बहुत सारे इलाके में बाढ़ के हालात हो जाते हैं। मंत्री एक पल के लिए सकपकाए फिर बोले ये मसला दूसरा है। इसकी बात फिर कभी करना अभी तो दीवार की बात करो।
जब दोनों तरफ से हुई कहासुनी
: सेखों ने निर्माणाधीन टो-वाल का दौरा करते वक्त अपने पक्ष को मजबूत बताते हुए तर्क देने शुरू कर किए। दीवार को सरासर पंजाब की जनता को तबाह करने वाली बताया। उनकी बात को सुनकर हरियाणा के ¨सचाई विभाग के एसइ अरुण मलिक ने मंत्री की बात को काटते हुए तर्क दिया कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दीवार से पंजाब के किसानों को नुकसान होगा। इसमें खास बात यह है कि जब दीवार की दूसरे तरफ हरियाणा के भी दो दर्जन गांव बसे हुए हैं, यदि नुकसान वाली बात होती तो प्रदेश सरकार इसे बनाती ही क्यों। मंत्री ने एसइ की एक न सुनी और अपनी कहानी सुनाते हुए आगे चलते बने।
 हरियाणा के अधिकारियों का घेराव :
 घग्गर नदी पर बने साईफन पर आए हरियाणा के अधिकारियों का आज धर्मेहड़ी गांव के लोगों ने घेराव किया। हरियाणा के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर सहित हरियाणा के सिंचाई विभाग के स्टाफ को इस विरोध के चलते मौके से जाना पड़ा।

Saturday, 2 July 2011

सरकार फोटो खिंचवाकर चली जाती है.., hansi-butana, river ghagger, flood protection,



हांसी बुटाना नहर का मामला : क्षेत्र के लोग दायर करेंगे सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोग आते हैं। हालात देखते हैं और फोटो खिंचवाकर चलते बनते हैं। मंत्री-संत्री सब जानते हैं, हांसी बुटाना नहर पर दीवार बनने से क्या होगा। हम कुछ कहते हैं तो भड़क उठते हैं करें तो क्या करें? ये व्यथा पंजाब-हरियाणा सीमा पर बसे एक या दो नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों की है, जो दो राज्यों सरकारों की राजनीतिक शक्तियों के बीच अपने अपने वोट बैंक के एजेंडे की लड़ाई में पिस रहे हैं। पंजाब के धर्मेहड़ी, ससी ससा, अलीपुर, करतारपुर, अलीपुर थेह, नौगांवा जैसे गांव पहले से ही हांसी बुटाना नहर की मार तले हैं। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि बीते साल तो नहर के टूटने से पानी निकल गया पर अब तो बाढ़ की मार को स्थायी करने के लिए दीवार बनाई जा रही है। दिलचस्प है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा के ड्रीम प्रोजेक्ट कही जाने वाली इसी नहर के इस ओर हरियाणा के सौगलपुर, कसौली, पपराला, गगड़पुर, घमेड़ी, विवादास्पद साइफन के ठीक निकट घमेड़ा जैसे गांव भी मार तले हैं। वहीं धर्मेहड़ी के सरपंच कश्मीर सिंह सीधे सीधे आरोप लगाते हैं कि सरकार के नुमाइंदे फोटो खिंचवाकर चले जाते हैं, हम कुछ करते हैं तो पर्चे दर्ज किए जाते हैं। ड्रेन में साफ सफाई का काम अपने हाथ में लिया तो आज जिला प्रशासन मानसून आने के बाद आ खड़ा हुआ और कह रहा है कि मौसम साफ होते ही पुल के नीचे का फर्श खोद कर गहरा कर अन्य ड्रेन भी साफ कर दिए जाएंगे। यहां धरना लगाए बिना कोई सुनवाई ही नहीं होती है। याद रहे कि नहर के निर्माण के शुरुआती दिनों में जहां संघर्ष समिति का गठन किया गया था आंदोलन से बात न बनी तो बाढ़ का पानी चढ़ने पर लोगों ने इसका किनारा तोड़ डाला, नुकसान हरियाणा के चीका शहर तक जा पहुंचा था। लोगों ने सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका के अलावा जनहित याचिका दायर करने मन बना लिया है। इन्हें डायरेक्ट एक्शन से भी गुरेज नहीं है। क्षेत्र का हर बाशिंदा दीवार ढहाने के लिए तैयार बैठा है। हालांकि पानी देने से किसी को एतराज नहीं है। दूसरी ओर क्षेत्र में शनिवार को एसडीएम गुरमीत सिंह ने पटवारियों को साथ लेकर इलाके का दौरा किया और खराब हुई फसल की तुरंत गिरदावरी करने के आदेश भी दिए हैं।

घग्गर साफ कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवाई, hansi-butana, flood protection,

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर की साफ सफाई कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवा दी हैं। यह खुलासा शिअद के महासचिव एवं पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने किया है।
 वह शुक्रवार को यहां पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। पंजाब की भूमि पर बाढ़ नियंत्रण के उपाय कर रही इन मशीनों को उठवाने व कार्य रोकने पर किसी तरह का मामला दर्ज करवाने के सवाल पर कहा कि ये सब हरियाणा ने अपने वकीलों की सलाह से तकनीकी रूप से किया है।
हांसी-बुटाना नहर और इसके साथ बनाई जा रही दीवार पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से अकालियों पर लगाए गए आरोपों पर कहा कि उनके पास अपनी उपलब्धियां गिनाने को हैं नहीं, अपने शासनकाल में उन्होंने हांसी बुटाना नहर को बनने दिया और अब दोषारोपण गठबंधन पर कर रहे हैं। पंजाब के कांग्रेसी हमेशा से ही दिल्ली के साथ रहे हैं, जबकि अकाली दल ने नहर के खिलाफ प्रधानमंत्री तक का दरवाजा खटखटाया और दीवार बनना शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसी मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की पूर्व डिप्टी स्पीकर बीर दविंदर की मांग पर चंदूमाजरा ने कहा कि अब मामला न्यायालय में है ऐसे में सर्वदलीय मीटिंग का ज्यादा औचित्य नहीं रह जाता। प्रो. चंदूमाजरा ने प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हरियाणा से ज्यादा होने के सवाल पर राज्य के पास कम संसाधन होने का हवाला दिया।

Friday, 17 June 2011

नाबार्ड से पंजाब को नहीं मिला धेला, flood protection, nabard, river ghagger,

नाबार्ड से मांगे थे 101 करोड़ रुपये
 राज्य ने अपने संसाधनों से 26 करोड़ जुटाए, 30 तक निपटाएगा काम
उप-मुख्य संवाददाता, पटियाला : नहरी पानी व ट्यूबवेलों से सिंचाई की व्यवस्था के चलते पंजाब में बहुत कम किसान हैं, जिन्हें बारिश की ज्यादा चिंता रहती है, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या खासी ज्यादा है, जिन्हें मानसून में बाढ़ का फिक्र ज्यादा सताता है। ऐसे हालात में पंजाब व पंजाबियों को नेशनल बैंक फार एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) से करारा झटका मिला है। पंजाब की ओर से मानसून पूर्व बाढ़ रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपायों के लिए मांगी गई धन राशि में से एक धेला भी नहीं मिला है। गौरतलब है कि मई-जून के दिनों में उत्तर भारत के ज्यादातर क्षेत्रों में खेत खलिहान खाली रहते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया करवाने की दिशा में पेयजल योजनाओं में कुआं और तालाब खोदने से लेकर सड़क निमार्ण तक के कार्य नाबार्ड की ओर से करवाए जाते हैं, जबकि पंजाब में टोबों से लेकर नदी नालों की साफ सफाई और उनके तटबंध मजबूत करने का काम होता है। बाढ़ रोकने के उपाय भी इनमें शामिल हैं। पंजाब ने अपनी जरूरतें बता नाबार्ड के पास इस बार बाढ़ रोकथाम उपायों के लिए 101 करोड़ रुपये के एस्टीमेट भेजे, लेकिन मानसून आने में एक पखवाड़े से भी कम समय रहने के बावजूद एक पैसा भी पंजाब के लिए जारी नहीं किया गया है, जबकि हर काम के लिए विज्ञापन से टेंडर जारी कर पूरी प्रक्रिया अपनानी होती है और इसमें खासा समय लगता है। उधर, बाढ़ रोकथाम के लिए ड्रेनेज विभाग की ओर से किए जा रहे उपायों पर शुक्रवार को पूछे जाने पर सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर पीएस भोगल कहते हैं कि विभाग प्रदेश में नदियों के उफान व बाढ़ का समय एक जुलाई से 20 सितंबर तक मानकर चलता है, बाढ़ रोकथाम के उपाय 30 जून तक निपटा लिए जाएंगे। राज्य सरकार ने इसके लिए 26 करोड़ रुपये की राशि विभाग को आवंटित की है। इसमें से पिछले साल बुरी तरह से प्रभावित होने वाले पटियाला जिले के लिए चार करोड़ रुपये रखे गए हैं। पटियाला की राव, टांगरी, मारकंडा का कुछ हिस्सा, मीरांपुर चौ सहित घग्गर में सफाई चल रही है। जहां जरूरत है वहां पत्थर भी लगाए जा रहे हैं और कमजोर कडि़यों को पक्का करने के लिए किनारों को मजबूती दी जा रही है। वे कहते हैं कि घग्गर नदी में ही पिछले साल 30 कटाव आए थे। ये सभी पूरी तरह से बंद कर लिए गए हैं। संगरूर जिले में एक दो स्थानों पर काम चल रहा है, उसे भी निपटा लिया जाएगा।