Thursday, 20 January 2011

बूढ़े हुए पंजाब के पंप, पानी खींचने पीने लगे बिजली

- अनावश्यक रूप से चलने पर पानी की हो रही है बर्बादी, माना पावरकॉम ने
-विश्व बैंक की टीम ने किया है स्र्वे पाया बठिंडा, मुक्तसर, फिरोजपुर को छोड़ शेष पंजाब में 148 फीसदी अनावश्यक दोहन जारी, जालंधर में 254 फीसदी
भूपेश चट्ठा पटियाला
पंजाब में कृषि की लाइफ लाइन कहे जाने वाले नलकूपों में से कुछ बूढ़े हो चले है तो कुछ अपाहिज है कुल मिला कर राज्य में सिंचाई का दो तिहाई जिम्मा रखने वाले ज्यादातर नलकूप अक्षम है और इनमें से ज्यादातर 33 फीसदी ही पंपिंग कर पा रहे है और कुछ का हिस्सा तो इससे भी कम है। इससे बिजली का करोड़ों यूनिट का नुकसान है तो लगातार चलने की वजह से पानी भी आवश्यकता से ज्यादा जाया हो रहा है।
उत्तरी भारत के राज्यों में कृषि क्षेत्र में गिरते भूमिगत जल स्तर का सर्वेक्षण को आई विश्व बैंक की एक टीम के सामने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने माना है कि अक्षम नलकूपों की वजह से करीब 12 सौ करोड़ रूपये की बिजली हरसाल बर्बाद हो रही है। इसके अलावा पावरकॉम ने यह भी आखिरकार स्वीकार कर लिया है कि राज्य में पानी के अतिरिक्त दोहन से ही भूमिगत जल स्तर गिर रहा है।
याद रहे कि राज्य में 12 लाख 86 हजार नलकूप है इनमें से 11.34 बिजली से चलने वाले है। पावरकॉम के अधिकारी बताते है कि ज्यादातर नलकूप जरूरत से अधिक क्षमता के है, जो ज्यादा गहराई से पानी खींचते है। किसान भविष्य की संभावना पर अधिक ध्यान दे बड़ी मोटर लगाता है, तो सबमर्सिबल पंप का बढ़ा चलन और अधिक बिजली पी रहा है।
पावरकॉम के ही एक अधिकारी बताते है कि कृषि में सालाना एक हजार करोड़ यूनिट बिजली की खपत होती है तो चार सौ करोड़ यूनिट इसमें से फिजूल जाती है। साधारण गणित अनुसार ये 12सौ करोड़ रूपये से कम की नहीं है और ये सब कुछ अक्षम पंप सैट की वजह से है। हालांकि यहां यह भी कहा गया है कि सिस्टम दुरूस्त करने मात्र एक हजार करोड़ रूपये की आवश्यक्ता है।
दिलचस्प है कि बठिंडा, मुक्तसर, फिरोजपुर को छोड़ शेष पंजाब में भूमिगत जल स्तर का औसतन 148 फीसदी ज्यादा दोहन जारी है जबकि जालंधर में यह आंकड़ा 254 फीसदी पर है। ऐसे में नहरी पानी का पूरा सदुपयोग करने ढ़ांचागत बदलाव की सलाह भी पावरकाम की ओर से दी गई है। स्र्वे टीम को बताया गया है कि 72 फीसदी सिंचाई अब नलकूपों से होती है तो नहरों पर निर्भरता 23 फीसदी की है, जबकि पांच फीसदी बारिश के पानी से है। 141 ब्लाक में से 103 डार्क जोन में है।

Tuesday, 18 January 2011

नेट पर कैट से ज्यादा हिट प्याज?


-प्याज को लेकर इंटर नेट पर झक मारने लगे लोग, चर्चा के साथ अफवाहें भी
-गूगल पर आनियन लिखते ही आते हैं 33 करोड़ रिजल्ट
-किसी ने तलाशा टीयर फ्री आनियन, तो किसी को मिला पाव का प्याज
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मुन्नी कितनी बदनाम हुई और शीला का क्या हाल है जैसी इंटरनेट पर होने वाली सर्फिंग पर अब कैटरीना व सचिन की जगह प्याज ने ले ली है। दुनिया के आंकड़े जब आएंगे तब आएंगे पर पंजाब में प्याज का ही राज चल रहा है। प्याज उगाने, खाने, बेचने से लेकर आयात-निर्यात में लगे पंजाबियों ने प्याज की तलाश में दुनिया को खंगाल डाला है।
प्याज को लेकर इंटर नेट पर झक मारने का सिलसिला इस कदर बढ़ा है कि नेट पर चिपके रहने वाले लोग चर्चा के साथ अफवाहें भी फैलाने लगे है। दिलचस्प है कि गूगल पर आनियन लिखते ही मात्र आठ सेकंड मेंं 33 करोड़ 60 लाख रिजल्ट सामने आ जाते है। मोदी कालेज के पास साइबर फेंटेसी के मालिक हरदमन सिंह कहते है कि किसी ने टीयर फ्री आनियन की तलाश की है,तो किसी को मिला है एक किलो में तीन से चार चढऩे वाला पाव का प्याज।
जीएम फसलों का विरोध करने वालों के लिए राहत की बात ये है कि न्यूजीलेंड में एक कंपनी द्वारा तैयार किए गए पहले जेनेटिकली माडीफाईड प्याज का विरोध वहां के लोगों ने शुरू कर दिया है। यूरोप में कई रंगों में प्याज आता है तो मिश्र में धरती के बाहर पौधे पर गुच्छे में उगता है। हालांकि कुछ को आनियन की तलाश में मेग्जीन व टेलीविजन चैनल भी मिले है।

शहर में एक विशेष पसंद रखने वालों के बीच खासे लोकप्रिय त्रिपड़ी क्षेत्र के दिल्ली ढ़ाबे के मालिक महींदर सिंह गांधी कहते है कि आजकल प्याज की कमी है और कहीं किसी केमिकल के मिलाने से तो इसका साइज बड़ा नहीं किया जा रहा। उनका तर्क है कि प्याज तड़के के दौरान ज्यादा तेल पीने लगा है। वहीं पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह कहते है कि अब प्याज खोखला हो चुका है। स्वाद तो गया ही, सेहत के लायक भी नहीं रहा। केलेस्ट्राल कम कर हार्ट अटैक रोकने वाला नहीं रहा है, अब प्याज। इसके लिए खेतों में डाली जा रही दवाएं दोषी है यही वो केमिकल है।

दिलचस्प है कि प्याज के औषधी गुण सबसे ज्यादा शोध का विषय है दाम का यहां कोई महत्व नहीं है। पंजाबी युनिवर्सिटी के शोध छात्र गुरजीत सिंह बताते है कि ऐसा माना जाता है कि प्याज की उत्पत्ति ईरान, पश्चिमी पाकिस्तान और उत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों में हुई है। प्याज की प्राचीनता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिरामिड निर्माता भी प्याज खाते थे। प्याज प्राचीन मिस्र में प्रिय भोजन सामग्री था। वहां के मकबरों पर इसे उकेरा गया है। यही नहीं ममियों के साथ भी प्याज मिले हैं। प्याज का जिक्र बाइबल और कुरान में भी आया है। कहने का आशय यह है कि प्याज का जिक्र हिप्पोक्रेटस से आज तक होता आया है।

प्याज में केलिसिन और रायबोफ्लेविन (विटामिन बी) पर्याप्त मात्रा में होता है। इसमें 11 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है और इसकी गंध एन-प्रोपाइल-डाय सल्फाइड के कारण आती है। यह पदार्थ पानी में घुलनशील अमीनों अम्लों पर एन्जाइम की क्रिया के कारण बनता है। यही कारण है कि प्याज को काटने पर ही आँसू आते हैं। यह एक बेहतरीन औषधि भी है। प्याज अजीर्ण और पतले दस्त में लाभकारी है। यह जीवाणुरोधी, तनावरोधी व दर्द निवारक,मधुमेह नियंत्रक, प्रदाह निवारक, पथरी हटाने वाला और गठियारोधी भी है। त्वचा पर घिसने से यह बालों में वृद्धि करता है। लू-लपट में घर से निकलने से पूर्व जेब में प्याज रखकर निकलने की हिदायत तो बुजुर्ग देते ही रहते हैं।

प्याज से आंसू गायब हुए तो इसका रस सांप के काटे जाने पर सरसों के तेल में मिला पिलाने लायक रहेगा और ना ही विद्यार्थियों के काख में दबाने पर बुखार ही चढ़ाएगा, फिर प्याज प्याज नहीं आलू हो जाएगा। याद रहे कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है और इन दोनों ही देशों ने दुनिया की आबादी खूब बढ़ाई है।

Friday, 14 January 2011

बारिश ने धोया कोहरा, बंपर फसल की उम्मीद जगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश में ठीक एक पखवाड़े के अंतराल पर आई सीजन की दूसरी बारिश ने फसलों पर चिपके कोहरे को धो दिया है। हर लिहाज से बेहतर कही जा रही बारिश ने इस बार बंपर फसल की उम्मीद जगा दी है।
रबी के मौसम की मुख्य फसल गेहूं के लिए सोने पर सुहागा कही जा रही बारिश पर गांव संसारपुर के किसान हरजिंदर सिंह बिदेशां कहते हैं कि इसने पौधे के पत्तों को करीने से साफ कर दिया है मानों किसी ने हर पौधे को नहलाया हो। गेहूं के अलावा खड़ी सब्जियों को ज्यादा लाभ दिख रहा है। बीमारी न लगने से पेस्टीसाइड का खर्च भी कम रह जाना है।
गांव धर्मेड़ी के किसान गुरप्रीत सिंह का कहना है कि एक निश्चित अंतराल के बाद लगातार बारिश से मारू फसलों को आराम मिलना तय हो गया है।
वहीं, मुख्य कृषि अधिकारी सुभाष चंद्र खुराना बताते हैं कि गेहूं के अतिरिक्त आलू, गोभी व मटर की खड़ी फसल को भी बारिश से अच्छा लाभ मिला है, चने अथवा किसी मारू फसल पर बारिश के नुकसान की आशंका को वे निर्मूल करार देते कहते हैं कि अभी वो स्टेज नहीं आई है। अब अगर कोहरा पड़ भी जाए तो नुकसान नहीं करेगा।
गौरतलब है कि बारिश के बाद कुछ दिन कोहरे का न होना और तापमान का कम रहना गेहूं के लिए बेहतर बताया जाता है। बारिश के बाद कोहरे का स्थान ओस ले लेती है। कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते हैं कि बारिश इन दिनों में सोने पर सुहागा का काम करती है। हर फसल को इससे लाभ है। गेहूं का पौधा कम पारे में लंबाई कम लेगा और इसकी शाखाएं ज्यादा फूटेंगी।
उधर, सोशल सांइसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि सूखी सर्दी से निजात दिलाने वाली इस बारिश से जैसे इंसान को फेफड़ों और छाती रोगों से राहत मिलेगी वैसे ही फसलों, पेड़ पौधों को भी लाभ होगा।

Wednesday, 12 January 2011

अब तारें-ट्रांसफार्मर बदलने लगने लगे कट

-31 मार्च तक चलेगा बिजली कटों का सिलसिला
-सिस्टम में बदलाव लाकर ही गर्मियों में हर आम तक पहुंचाई जा सकती है बिजली: डायरेक्टर
-68 फीसदी ओवर लोड है पावरकॉम का ढांचा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गर्मियों में बिजली की कमी के चलते कट लगना आम बात है और हर किसी की समझ में भी आ जाती है, लेकिन पंजाब में कई क्षेत्रों को सिर्फ इसी वजह से बिजली कटों में झोंक दिया जाता है कि यदि गर्मी व धान के सीजन में जिस अनुपात में बिजली की मांग की जा रही है यदि वह दे दी जाए तो सारा सिस्टम ही बैठ जाएगा। ट्रांसफार्मर जल जाएंगे और तारें शार्ट सर्किट हो जाएंगी, ऐसे में मांग बढऩे पर कट लगा कर काम चला दिया जाता है। दिलचस्प है कि सिस्टम के ओवरलोड होने का सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा है और बीते साल बढ़ कर इसके 68 फीसदी पर आ जाने के बाद अब इस पर काम चालू हुआ है। कंडक्टर अथवा तारें और ट्रांसफार्मर बदलने का कार्य शुरू होने के साथ ही राज्य की जनता दो घंटे के घोषित कटों के साथ कई-कई घंटों के अघोषित कटों की मार तले आ गई है।
वहीं पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के
डायरेक्टर प्रबंधन गुरबचन सिंह बची कहते है कि सिस्टम में बदलाव किए बिना सुधार लाना खासा मुश्किल है, ऐसे में इन दिनों के कट हर क्षेत्र में बर्दाश्त किए जा सकते हैं पर गर्मियों में ये खासा परेशान करते है। वे स्वीकार करते है कि पिछले साल के अलावा, बिजली होने पर भी हम बिजली नहीं दे पाए थे। हालांकि वे दावा करते हैं कि सारा काम 31 मार्च से पहले निपटा दिया जाएगा। और इसके बाद कम से कम किसी को बिजली होने पर कट का सामना करना पड़े, ऐसा बिलकुल नहीं होगा। चुनावी वर्ष में ही कार्य के सिरे चढऩे के सवाल पर वे बताते है कि 2003 के बाद से ओवर लोडिंग लगातार बढ़ी है और पावरकॉम के आंतरिक सर्वेक्षण अनुसार 34 हजार 822 ट्रांसफार्मर ओवर लोड हो चुके है। इतना ही नहीं साढ़े पांच हजार किलोमीटर लंबी तारे जिन्हें ट्रांसमिशन की भाषा में कंडक्टर कहा जाता है को बदलना एक लंबी पेचीदा प्रक्रिया रही है। इस साल भी एक हजार करोड़ रूपये का बजट रखा गया है।
पावरकॉम क डायरेक्टर कहते हैं कि सभी टेंडर इत्यादि हो चुके है जनवरी अंत तक मोटे तार पर बीस हजार ट्रांसफार्मर बदल दिए जाएंगे जबकि दो हजार किलोमीटर लाईनें बदली जा चुकी है। चालू वित्तिय वर्ष में सारा काम निपटा दिया जाएगा। साथ ही वे यह भी कहते है कि ग्रिड सब स्टेशनों के बड़े ट्रांसफार्मर बदलने का कार्य इससे अलग है।

Saturday, 8 January 2011

पंजाब में पॉपुलर हुआ पॉपुलर

मुनाफे का सौदा
तीन साल में हुई लकड़ी की कीमत में 40 फीसदी वृद्धि
पापुलर के नाम पर बैंक आसानी से दे देते हैं लोन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में किसान ने गेहूं और धान से ज्यादा लाभ न मिलते देख पॉपुलर की ओर रुख कर लिया है। इसकी देखभाल भी कम करनी पड़ती है और मुनाफा ज्यादा मिलता है। पिछले तीन साल में इसकी कीमत में 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। 300 रुपये प्रति क्विंटल तक बिकने वाला पॉपुलर 500 से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है और बैंक एफडी से कहीं अधिक रिटर्न दे रहा है।
सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला का कहना है कि उत्तरी अमेरिका से चला यह पेड़ यूरोप होता हुआ पश्चिमी एशिया के रास्ते पंजाब आया है और इसके ठीक विपरीत यही वो रास्ता है जहां से उल्टे पांव कबूतरबाजी होती है।
फाइव एलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते हैं कि किसान को सर्वाधिक फायदा देने वाला पेड़ है। इसे 20 फुट का तो नर्सरी में ही किया जा सकता है। पांच साल में किसान को अतिरिक्त आय दे देता है। 90 सेंटीमीटर मोटाई पर बिकना आम है पर इसे ढाई मीटर तक फैलने दिया जा सकता है। प्रदेश में सर्दी के दिनों में झड़े इसके पत्ते सूरज की किरणें नहीं रोकते और खेत में ही खाद बन जाते हैं। साथ ही गर्मी में हर फसल को राहत भी देते हैं।
बैंक भी पॉपुलर के नाम पर लोन देने को तैयार हैं। कम से कम 150 पेड़ों के लिए दिए जाने वाले इस लोन की वापसी के लिए ना तो किस्तें हैं और ना ही किसी को पहले आठ साल लोन के बारे में पूछा जाता है, साल बाद केवल ब्याज के रूप में मामूली भुगतान करना होता है।

कहां आता है
काम पेंसिल, माचिस, खेलों का सामान, पैकेजिंग के अलावा इससे प्लाईवुड तैयार होता है। राज्य में इस समय प्लाईवुड की करीब 100 इकाइयां चल रही हैं जिनमें वार्षिक औसतन 30 लाख क्यूबिक लकड़ी की खपत हो रही है। पंजाब से बड़ी मात्रा में लकड़ी हरियाणा में भेजी जाती है। हरियाणा से तैयार माल बिलों में जम्मू-कश्मीर के नाम पर चलता है लेकिन बिकता पंजाब में है जिससे यहां के उद्यमी 12.5 फीसदी वैट बचा रहे हैं।

Thursday, 6 January 2011

उम्मीद 2011 जल संरक्षण, बने कानून पूरी इच्छा शक्ति से लागू हों

भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोकतंत्र में चुनावी वर्ष को लूटतंत्र के एक हिस्से के रूप में हर कोई देखता है और चाहता है कि कोई भी उसे कुछ ना कहे बाकि जिसका जो नुकसान होता है हो जाए। ऐसे में प्राकृतिक स्रोतों की खामोशी को उनकी कमजोरी समझ लिया जाता है और इंसान इनके दोहन से आगे निकल कर शोषण की ओर चल पड़ता है।  पंजाब के पास खनिज के नाम पर पानी ही रह जाता है। लेकिन पानी को पिता तुल्य बताने वाले पंजाबियों के पास पिछले समय में पानी का खासा निरादर हुआ है। पानी का महत्व समझ ना पाने के चलते कानूनों का सहारा लेना पड़ रहा है। ऐसे में नए साल में ये उम्मीद तो की ही जा सकती है कि जल संरक्षण को बने कानून पूरी इच्छा शक्ति के साथ लागू किए जाएं और प्रदेश का समझदार वोटर भी प्रशासन पर अपना गुस्सा ना निकाले, जिससे पानी का महत्व फिर से बरकरार हो जाए।

ग्रामीणों की समझ में आई बात पर शहरी...

 प्रदेश के 20 जिलों के  12 हजार से अधिक गांवों में दस मई से पहले धान की पनीरी तथा दस जून से पहले किसने धान की रोपाई कर दी है। पूरे राज्य को खबर हो जाती है, ट्रैक्टर भी फिरवा दिया जाता है लेकिन हर शहर में हर रोज कितने नक्शे बिल्डिंग बाई लॉ का उल्लघंन कर पास हो गए और भवन निर्माण भी हो गया इसकी कोई कानो कान खबर नहीं होने देता। याद रहे कि ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल के  स्तर में गिरावट अगर 23 सेमी. प्रति वर्ष की है तो कंक्रीट के जंगलों में यह आंकड़ा 54 सेमी. पर आ जाता है। पंजाब में रेन वाटर हार्वेस्टिंग नई अवधारणा नहीं है, धरती के नीचे पानी उगाओ, और फिर जरूरत पडऩे पर इसकी फसल ले लो। इस संबंध में कानून 1972 में बने आर्कीटेक्ट एक्ट के  समय से बनते आ रहे हैं और हर कानून बनने के साथ ही छूट दिए जाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है और फिर से कड़े कानून की बात भी शुरू हो जाती है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में पंजाब स्टेट वाटर रिर्सोसिस कमेटी के सुझाव पर 1998 में पंजाब ग्राउंड वाटर कंट्रोल एंड रेगुलेशन एक्ट आस्तित्व में आया और पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसकी शुरुआत पटियाला से ही की गई। शहरी क्षेत्रों में दूसरा कानून विशुद्ध रूप से बारिश के पानी को लेकर बना, रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग इन बिल्डिंग बाई लॉ है। वहीं, अनुमान के विपरीत 2008 में बना प्रिजर्वेशन ऑफ सब सायल एक्ट बेहतरीन तरीके से लागू हो भी गया। उम्मीद है स्थानीय निकाय इस साल जागते रहेंगे। सरकार ने ही लिख भेजा कि शर्तें खासी कड़ी हैं,

किसानों को इंसेंटिव देना ही ठीक

प्रदेश में भूजल का प्रयोग कैसे हो, कैसे इसे संजोया जाए और कैसे बचाया जाए जैसे मुद्दों को ध्यान में रख पंजाब स्टेट वाटर रिसोर्स कमेटी के मॉडल बिल पर आधारित ग्राउंड वाटर कंट्रोल (कंट्रोल एंड रेगुलेशन) एक्ट 1998 बनाया गया। दिलचस्प है कि कमेटी ने ही ड्राफ्ट को उपभोक्ताओं के लिए खासा कड़ा बताया। इस पर यह भी कहा गया कि यह बिल किसानों के  हित में च्यादा नहीं है, परामर्श दिया गया कि किसानों के  लिए इंसेंटिव देने का सिस्टम ही बेहतर है। 

नक्शे से बाहर निकलते ही बेसमेंट, गोदाम और पार्किंग ना बने वाटर टैंक

प्रदेश में इस समय सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की है तो इन्हीं की चलेगी, कांग्रेस की थी तो कांग्रेसियों की चलती थी इसमें कोई दो राय नहीं है, पर राजनीति से ऊपर रह अर्थव्यवस्था हर शासन में चलती रहती है। शायद यही वजह है कि राष्ट्रपिता की तस्वीर वाले नोट को देखकर हर कोई राजनीति से ऊपर उठकर विकास व आर्थिकता की बात करता है। कुछ ऐसे ही तौर तरीके अपना कर रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के होने वाले आवश्यक उपायों को धत्ता बताया जा रहा है। सारे नियम कानून सिर्फ किताबों तक सिमटाते जाते रहे हैं। एक बार नक्शा पास करवाने के बाद रेन वाटर टैंक के नक्शे से निकल कर बेसमेंट, गोदाम, पार्किंग और कभी कभी बैंकुएट हाल का हिस्सा ना बने और लोगों की मानसिकता में थोड़ा बदलाव तो आए, वास्तविकता यह है कि इन चीजों का सबसे पहले व सीधा लाभ तो उसी व्यक्ति को है जिसने इन्हें बनवाया हो। 

Wednesday, 5 January 2011

पंजाब के खेतों में मिली केले को राह

उत्पादन व क्षमता 6 600 करोड़ का है राज्य का बाजार, अपना योगदान मात्र दो करोड़ का
प्रदेश में 450 हेक्टेयर तक पहुंचा इस फल का रकबा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
केले का नाम आते ही केरल की याद आ जाती है जहां समोसे में भी आलू की जगह केला डाल दिया जाता है। पंजाबी पकौड़ों में तो आलू प्याज ही रहेगा पर अब यहां केले अधीन रकबा बढ़ने लगा है।
राज्य में 450 हेक्टेयर में केले की खेती हो रही है। पिछले दो साल से इसके अधीन रकबा बढ़ रहा है। साल में दो बार होने वाली बिजाई में अब फरवरी के सीजन में केले का रकबा 600 हेक्टेयर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। लुधियाना, मोगा, कोटकपुरा क्षेत्र में केले की खेती की ओर झुकाव ज्यादा रहा है तो पटियाला, फतेहगढ़ साहिब में भी उत्पादक बढ़े हैं।
पंजाब को भले ही एक अर्से से केले की फसल के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता रहा है। पर अब सोच बदलने के पीछे आर्थिक कारण ज्यादा आगे आए है। बाजार के जानकारों के अनुसार पिछले साल 600 करोड़ रुपये के केले की खपत की हुई थी। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी दो करोड़ रुपये से भी कम रही है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2007 में ग्रेंड नेनो नामक टीशू कल्चर किस्म तैयार की थी। इसे दो साल तक सिर्फ प्रयोग के रूप में ही विभिन्न जगहों पर उगा कर देखा गया। इसके काफी अच्छे नतीजे सामने आये है। पिछले साल अगस्त में पंजाब में करीब 200 हेक्टेयर रकबे पर केले की बुआई हुई है। केले की बुवाई अगस्त-सितंबर माह में करनी ज्यादा ठीक रहता है। इससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 से 13 टन तक आने की संभावना है। वहीं फरवरी माह में केले की बुवाई करने से यह उत्पादन 9 से 10 टन तक रहता है।
राज्य में अब बनाना ग्रोअर एसोसिएशन भी बन गई है जिसे धान व गेहूं के मुकाबले केले की खेती काफी लाभदायक लग रही है। व्रत-त्योहारों के अलावा भी मंडियों में उन्हे केला बेचने में कोई दिक्कत नही हो रही। खर्चे निकाल प्रति एकड़ सवा लाख रुपये की आमदनी दे रहे केले अधीन हर उत्पादक अपना रकबा दोगुना कर रहा है।
पंजाब फार्मर कमीशन के सलाहकर डॉ. पी.एस रंगी के अनुसार केले के अधीन पंजाब के लुधियाना, पटियाला, अमृतसर में केले के अधीन रकबा ज्यादा बढ़ रहा है। इस साल किसानों को करीब 2.5 लाख केले के पौधे दिए गए है। किसानों को सब्सिडी के रूप में पहले दस हजार रूपये की सहायता आयोग की ओर से दी जा रही थी लेकिन अब इसे राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अधीन लाए जाने के बाद करीब 18 हजार रूपये का लाभ दिया जा रहा है। केले का पौधा करीब 14 माह के बाद फल देना शुरु कर देता है। प्रति हेक्टेयर 3000 से 3500 पौधे लगाए जा सकते है।

Tuesday, 4 January 2011

उम्मीद 2011 ना जले पराली, पटाखों में आई कमी रहे जारी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब और जलती पराली का साथ इस साल थोड़ा कम हो यह उम्मीद हर पर्यावरण विद कर रहा है। 70 लाख एकड़ में उगने वाली धान की फसल का बेहतर बदल अगर कृषि वैज्ञानिक दे दें तो इससे आगे दुआ मांगना भी गलत होगा। लेकिन नए साल में यह उम्मीद किसान से तो की ही जा सकती है कि वो अपनी ही धरती पर अपने मित्र किटों व खुद के खेत में लगी प्राकृतिक रूप से खाद बनाने वाली फैक्ट्री को ना जलाएं। हालांकि अक्टूबर में जलने वाली पराली को रोकने राज्य सरकार दो साल पहले की तरह मामले दर्ज करेगी। ऐसी कामना आदर्श चुनाव आचार संहिता लगने से ठीक दो महीने पहले वोटतंत्र में करना बेतुका ही कहा जाएगा।
पराली के जलने से होने वाले प्रदूषण की खबर किसान को अब हो चुकी है बात तो बस इतनी सी है कि जिस तरह से पंजाब में पटाखे जलाने के चलन में पिछली दिवाली पर समझदारी दिखाई गई है, ठीक उसी तरह से पराली जलाने पर भी स्वैच्छिक रूप से प्रतिबंध लगाना होगा। पराली के मामले में 10 साल में मात्र 20 फीसदी क्षेत्र में ही पराली का जलना रूका है। इस बार चाहे कारण हैप्पी सीडर बने या कोई जुगाड़ तकनीक काम करे हर किसी की इच्छा है कि यह आंकड़ा कम से कम दोगुना हो जाए।
शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन जिस तरह से भूमिगत जल स्तर को संजोने-संभालने बनाए व सफलता पूर्वक लागू किए गए सब सोएल एक्ट के रूप में पर्यावरण संरक्षण के लिए जाना जाएगा। इसमें धान की पराली को बायो फ्यूल के रूप में प्रयोग करने लग रहे प्रोजेक्टों के कमीशन होने में तेजी आए तो पीठ थपथपाने के कारण दो हो जाएंगे।
धान की बिजाई 10 मई और रोपाई 10 जून से करने के सकारात्मक परिणाम आने लगे हैं। बीते साल प्रदेश में 10 जून से दो दिन पहले हुई बारिश के चलते लिए गए लाभ को छोड़ दें तो कहीं भी रोपाई नहीं हुई है। ऐसे में बिजली पानी दोनों की बचत हुई। नए साल में धार्मिक लोगों से प्राकृति प्रति अपना धर्म निभाने और लिखने-पढ़ने वाले व बीमार, बुजुर्गो के प्रति अपना फर्ज निभाने की आस की जा रही है। ध्वनि प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पुलिस व प्रशासन को याद रहें और लोगों को समझाने से ही इसकी शुरूआत की जा सकती है।