Thursday, 20 January 2011

बूढ़े हुए पंजाब के पंप, पानी खींचने पीने लगे बिजली

- अनावश्यक रूप से चलने पर पानी की हो रही है बर्बादी, माना पावरकॉम ने
-विश्व बैंक की टीम ने किया है स्र्वे पाया बठिंडा, मुक्तसर, फिरोजपुर को छोड़ शेष पंजाब में 148 फीसदी अनावश्यक दोहन जारी, जालंधर में 254 फीसदी
भूपेश चट्ठा पटियाला
पंजाब में कृषि की लाइफ लाइन कहे जाने वाले नलकूपों में से कुछ बूढ़े हो चले है तो कुछ अपाहिज है कुल मिला कर राज्य में सिंचाई का दो तिहाई जिम्मा रखने वाले ज्यादातर नलकूप अक्षम है और इनमें से ज्यादातर 33 फीसदी ही पंपिंग कर पा रहे है और कुछ का हिस्सा तो इससे भी कम है। इससे बिजली का करोड़ों यूनिट का नुकसान है तो लगातार चलने की वजह से पानी भी आवश्यकता से ज्यादा जाया हो रहा है।
उत्तरी भारत के राज्यों में कृषि क्षेत्र में गिरते भूमिगत जल स्तर का सर्वेक्षण को आई विश्व बैंक की एक टीम के सामने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड ने माना है कि अक्षम नलकूपों की वजह से करीब 12 सौ करोड़ रूपये की बिजली हरसाल बर्बाद हो रही है। इसके अलावा पावरकॉम ने यह भी आखिरकार स्वीकार कर लिया है कि राज्य में पानी के अतिरिक्त दोहन से ही भूमिगत जल स्तर गिर रहा है।
याद रहे कि राज्य में 12 लाख 86 हजार नलकूप है इनमें से 11.34 बिजली से चलने वाले है। पावरकॉम के अधिकारी बताते है कि ज्यादातर नलकूप जरूरत से अधिक क्षमता के है, जो ज्यादा गहराई से पानी खींचते है। किसान भविष्य की संभावना पर अधिक ध्यान दे बड़ी मोटर लगाता है, तो सबमर्सिबल पंप का बढ़ा चलन और अधिक बिजली पी रहा है।
पावरकॉम के ही एक अधिकारी बताते है कि कृषि में सालाना एक हजार करोड़ यूनिट बिजली की खपत होती है तो चार सौ करोड़ यूनिट इसमें से फिजूल जाती है। साधारण गणित अनुसार ये 12सौ करोड़ रूपये से कम की नहीं है और ये सब कुछ अक्षम पंप सैट की वजह से है। हालांकि यहां यह भी कहा गया है कि सिस्टम दुरूस्त करने मात्र एक हजार करोड़ रूपये की आवश्यक्ता है।
दिलचस्प है कि बठिंडा, मुक्तसर, फिरोजपुर को छोड़ शेष पंजाब में भूमिगत जल स्तर का औसतन 148 फीसदी ज्यादा दोहन जारी है जबकि जालंधर में यह आंकड़ा 254 फीसदी पर है। ऐसे में नहरी पानी का पूरा सदुपयोग करने ढ़ांचागत बदलाव की सलाह भी पावरकाम की ओर से दी गई है। स्र्वे टीम को बताया गया है कि 72 फीसदी सिंचाई अब नलकूपों से होती है तो नहरों पर निर्भरता 23 फीसदी की है, जबकि पांच फीसदी बारिश के पानी से है। 141 ब्लाक में से 103 डार्क जोन में है।

2 comments:

  1. भूपेश जी जो आपने लिखा काफी हद तक सटीक और आर्थक...पर गहरा दुःख आक्रोश तब होता है की नयी कोलोनीज़ जो बन रही हैं , उनमें भी यदि एक लाइन में दस घर हैं तो दस के दस अपना अपना सबमर्सीबल-पम्प क्यों लगाते, कैसे लगा पाते हैं ? क्या दस कोठियों के लिए एक से काम नहीं चल सकता , जिसका स्विच बेशक हरेक के घर में लगा हो ! जनता लुंज-पुंज हो चुकी और जो खुद कर सकती है उसके लिए भी सरकार की ओर देखती है ! शुक्रिया जी !

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