क्या पोजीशन है?
नेता, कार्यकर्ता, समर्थक से लेकर वो आम आदमी जो हर सरकार से दुखी है और वोट देने की बजाए घर बैठ कर टेलीविजन का आनंद लेना चाहता है, आज एकमत से एक ही सवाल लिए खड़ा है कि क्या पोजीशन है? सही भी है आपे राच्य में आपके उपर हुकूमत करने एक सरकार बनने जा रही है और आपको खबर दही ना हो तो ये यही नहीं है।
लेकिन चटारे तब शुरु हो जाते हैं जब घाघ सियासतदान भी अदने से व्यक्ति से सवाल करने लग जाते है कि पोजीशन क्या है? और वो बंदा भी टीवी एक्सपर्ट बन पूरा विश्लेषण देता है और फिर किसी ओर से पूछता है कि यार पजीशन की है? एंवे ही है ना।
नाम रिसोर्ट का ही बताओ कुल्चे चाहे बाहर रेहड़ी पर हो जाएं
चुनावी सीजन में अपने बंदों के रिश्तेदारों को एक विधान सभा क्षेत्र विशेष में ले जाकर उम्मीदवार से मिलवाने का पूरा जोर लग रहा है। डोर-टू-डोर से कहीं आगे हो कर चल रही पर्सन-टू-पर्सन की मार्किंग में खर्च भी खासा हो रहा है।और आदर्श चुनाव आचार संहता पर तीखी निगाह रखने वाले किसी आब्जर्वर के बूते की भी बात नहीं है कि इस तरह के खर्च को दर्ज कर सके। लेकिन अपने बंदे ठहरे अपने बंदे वे भी 'शरीफ प्रचारकोंÓ का पूरा ख्याल रखे हुए हैं। किसी जमाने में लंच करने वाले अब जब भोजन पर आ गए हैं तो नाम लिया जाने लगा कि रास्ते में पड़ते रिसार्ट पर रुकते हैं। हुआ भी कुछ ऐसा ही लेकिन चटकारे तब शुरु हुए जब कुछ ने रिसार्ट के अंदर लंच किया तो कुछ ने रिसार्ट के बाहर रेहड़ी पर कुल्चे से पेट की च्वाला शांत की, पर नाम दोनों ही पक्षों ने रिसार्ट का लिया।
फोटो में वोटर का चेहरा ना आए
एक जमाना था जब लीडर अपने वोटरों की पहचान सार्वजनिक कर दावा करते थे कि ये उसके वोटर हैं जिसके दम पर वो चुनाव जीतेगा। दांव पेच कीद राजनीति हालांकि चलती रहती थी पर वो बड़े लीडरों अथवा रणनीतिक बढ़त देने वाले समर्थकों को तोडऩे तक सीमित रहती थी, लेकिन अब आलम ये है कि जो काम समर्थक आपके नाम पर किया करते थे और वोटर को किसी एफडी की तरह कैश किया करते थे अब वो सौदे सीधे होने लगे हैं तो लीडरों ने मीडिया पर ही पाबंदी लगाने के प्रयास शुरु कर दिए हैं। शहर के साथ लगते एक क्षेत्र में नेता जी ने जैसे तैसे समर्थक तो जुटा लिए पर फोटो में वोटर का चेहरा ना आए इसके निर्देश लगातार देते रहे। अब या तो वोटर फिसलने का डर था या फिर आउट सोर्सिंग से मंगवाया गया वोटर पकड़े जाने का डर।
ओ बक्श दो यारों...
कार की किश्तें एक ही चुनाव से पूरी करने के इच्छुक एक ब्रोकर को सुबह की सैर करने वालों का एक समूह यार कम और बगार च्यादा कहता रहा है। आलम ये है कि उनके आने से पहले ही यार...बगार, यार...बगार के नारे लगने लगते हैं। जनाब का दिल तो पहले ही चुनाव आयोग की आर्दश चुनाव आचार संहिता तोड़ चुकी है, अब जब घर पर भी ताने सुनने सुनते समझ आने लगे तो जनाब भी दुहाई देने लगे हैं। ओ बक्श दो यारों...बस करो यारों...
इधर जाउं या उधर जाउं...
मतदान होने में दस तो चुनाव प्रचार खत्म होने में एक सप्ताह से कुछ च्यादा समय ही बचा है। लेकिन देरी से होमवर्क करने वाले कुछ लोगों के लिए अब भी सोचने का ही समय चल रहा है। पहले पहल सेफ प्ले का नारा देने वाले ये लोग अब पूरी तरह से उलझन में हैं ऊंठ किस करवट बैठेगा पहले इस आंकलन में समय निकाल दिया और अब सुबह उठते ही शुरु हो जाते हैं कि इधर जाउं कि उधर जाउं... जनाब गाड़ी छूट चुकी है अब कहीं ना जाइए और शांति से बैठ जाइए।
उनकी भी कुछ मजबूरियां रही होंगी
हर तरफ बटोरने का सीजन चल रहा है, कोई वोट बटोर रहा है तो कोई बोटी और कोई वोट के नाम पर रोट बटोर रहा है। मतलब हर किसी को अपने धंधे पानी से है। लोकतंत्र में अगले पांच साल क्या होगा? ये सब बाद में देखा जाएगा अभी तो अपना काम निकलवाना ही सर्वोपरि है। लेकिन इंसान को झटका तब लगता है जब उम्मीद टूटती है। ऐसा ही झटका एक सलाहकार को लगा जब वो बेगानों को तो दुरुस्त करता चल गया पर 'अपनोंÓ को ग्रेस अंक देता कहता चला गया, आखिर उनकी भी कुछ मजबूरियां रही होंगी।
माघ है देखते हैं किसने तिल खाएं हैं और दान किए हैं