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Tuesday, 31 January 2012

नई सीट, दिलचस्प हुआ मुकाबला, punjab election, patiala, rural, constituency,


विधानसभा क्षेत्र- पटियाला ग्रामीण
मतदाता-एक लाख 77 हजार 283
पुरुष-92 हजार 826
महिला-84 हजार 457

मतदान केंद्र-182, अति संवेदनशील-13, संवेदनशील-50

भूपेश चट्ठा, पटियाला
परीसीमन के बाद से आस्तित्व में आया पटियाला ग्रामीण क्षेत्र पुराने समाना और नाभा विधान सभा क्षेत्रों के गांवों और पटियाला शहर के करीब 20 वार्डों से मिलकर बना है। पहली नजर में शहरी क्षेत्र कांग्रेस बहुल और ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस व शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन में बराबरी का सा अहसास दिलाने वाले इस क्षेत्र में निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
इस क्षेत्र में 2007 चुनाव प्रचार की शुरुआत किसी आम चुनाव की तरह 'विकास के मुद्देÓ से ही हुई थी लेकिन चुनाव के शिखर तक पहुंचने तक 'डेरा सच्चा सौदा के प्रेमियों से समर्थन व विरोधÓ के बीच ही अंत हुआ। हालांकि इस बार डेरा फैक्टर यहां से नदारद है।
अकाली-भाजपा की उम्मीदवार पंथ रत्न स्व. जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा की पुत्री कुलदीप कौर टोहड़ा शहरी क्षेत्र में भारी मशक्कत का सामना कर रही हैं तो कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा को अपने शहर के पुराने समर्थकों का पूरा नेटवर्क तैयार मिला है, उनके लिए नाभा क्षेत्र से आए करीब 32 गांवों में ही पहचान ले जाने की जरूरत है।
दिलचस्प है कि अकाली सरकार के कार्यकाल में जहां क्षेत्र की बाहरी कालोनियों में पहली बार सीवरेज डाला गया तो कांग्रेसी इस बात को भी टूटी सड़कों के रूप में प्रचारित करने में सफल हो रहे हैं, जबकि अकाली दल सिर्फ और सिर्फ टक्साली वोटों के सहारे है।
माइक्रो स्तर पर विधायक ब्रहम महिंदरा को एंटी इंकंबेंसी का सामना करना पड़ रहा है। पांच साल ना दिखाई देने के आरोप भी उन पर लग रहे हैं। हालांकि मिलते ही वे ये दुख दूर भी कर रहे हैं। वहीं प्रदेश सरकार के चलते कुलदीप कौर टोहड़ा स्वयं ही कटघरे में खड़ी हो रही हैं।
मुकाबले को खटड़ा के नेटवर्क ने दिलचस्प बना रखा है। गांवों में यूथ कल्बों के सहारे टीम खड़ी करने वाले खटड़ा किसके कितने वोट तोड़ते हैं? इस पर परिणाम तय होंगे।
क्षेत्र के लोग दुकानदारों की ओर से अपनी हद से बाहर जा कर किए गए नाजायज कब्जों से परेशान हैं। आम राय है कि त्रिपड़ी मैन बाजार की सड़क दुरुस्त होने के बावजूद हालात नहीं बदले हैं। त्रिपड़ी में आधे अधूरे मन से अस्पताल चालू हुआ जबकि सिवरेज सिस्टम दुरुस्त करने लाया गया प्रोजेक्ट भी अभी पूरी तरह से सिरे नहीं चढ़ा है।
हालांकि क्षेत्र में डीएमडब्ल्यू के पास फलाई ओवर की मांग नहीं हुई पूरी, दुख निवारण साहिब के पास एलिवेटिड रोड बना ट्रैफिक समस्या का हल करने पर अभी चर्चा ही हो रही है। छोटी नदी को दुरुस्त किया जाना और बंधा रोड पर से अवैध कब्जे हटा कर डबल रोड उपलब्ध करवाई जानी शेष है।

कांग्रेस:-ब्रहम महिंदरा
ताकत-बहावलपुर बिरादरी का समर्थन व पुराना नेटवर्क
कमजोरी-टक्साली सिख वोटरों में हिंदू की छवि
अवसर-सत्ता में आने पर बड़ी जिम्मेदारी तय
चुनौती-वोट बैंक को संभालना

 शिअद-भाजपा:-कुलदीप कौर टोहड़ा
ताकत-टक्साली अकाली वोट बैंक
कमजोरी-शहरी वोटों पर कम पकड़
अवसर-जीतने और सत्ता में आने पर मंत्री पद
चुनौती-खुद को साबित करना


निर्दलीय:-सतबीर सिंह खटड़ा
ताकत-द पटियाला वेलफेयर सोसायटी का नेटवर्क
कमजोरी-पार्टी का साथ नहीं
अवसर-राजनीतिक शक्ति पाना
चुनौती-चुनावी लोकतंत्र का पहला अनुभव

Friday, 9 December 2011

विकास से शुरु हुआ चुनाव डेरे पर अटका,punjab election, 2012, samana, patiala, rural



विधान सभा क्षेत्र-पटियाला ग्रामीण-समाना
भूपेश चट्ठा, पटियाला
2007 में हुए विधान सभा चुनावों में समाना विधान सभा क्षेत्र अब बंट कर समाना के अलावा पटियाला ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र भी हो गई है। इसमें चुनाव प्रचार की शुरुआत किसी आम चुनाव की तरह 'विकास के मुद्देÓ से ही हुई लेकिन चुनाव के शिखर तक पहुंचने तक तत्कालीन समाना विधान सभा क्षेत्र का हिस्सा रहे और नए बने व इस बार पहली बार आस्तित्व में आए पटियाला ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र ने राच्य स्तर के सबसे प्रमुख मुद्दे 'डेरा सच्चा सौदा के प्रेमियों से समर्थन व विरोधÓ की शुरुआत हो गई।
दिलचस्प है कि क्षेत्र के लोग दुकानदारों की ओर से अपनी हद से बाहर जा कर किए गए नाजायज कब्जों से परेशान हैं तो दुकानदार क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं की कमी से खिन्न हैं। आम राय है कि त्रिपड़ी मैन बाजार की सड़क दुरुस्त होने के बावजूद हालात नहीं बदले हैं। त्रिपड़ी में आधे अधूरे मन से अस्पताल चालू हुआ जबकि समाना में ब्यूटिफीकेशन कुछ क्षेत्रों में हुआ है। इसी प्रकार सिवरेज सिस्टम दुरुस्त करने लाया गया प्रोजेक्ट भी अभी पूरी तरह से सिरे नहीं चढ़ा है। पटियाला ग्रामीण क्षेत्र में आज भी कई क्षेत्र हैं जहां पानी का बिल आता है पर नल में पानी नहीं आता।


बाक्स
फोटो भेजी जाएगी
विपक्ष में रहते हाथ बंधे: विधायक ब्रहम महिंदरा
सरकार ही इन लोगों की है हम भला क्या कर सकते थे? लेकिन हर व्यक्ति के दुख दर्द में उन्होंने साथ दिया है। कांग्रेस से विधायक ब्रहम महिंदरा कहते हैं कि यह सवाल ही उनके लिए बेमानी है। वे विपक्ष में रहे हैं। यह सवाल सत्ता पक्ष के लिए है। हालांकि मुद्दे की बात पर वे यह भी स्पष्ट करते हैं निसंदेह पार्टी के मैनीफेस्टो पर चुनाव लड़ा गया है।

बाक्स
फोटो भेजी जाएगी
विकास के नाम पर लड़े और करवाया: रखड़ा
शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन से चुनाव लड़े सुरजीत सिंह रखड़ा कहते हैं कि वे विकास का मुद्दा लेकर ही चुनाव में उतरे थे, क्योंकि इससे पहले के पांच सालों में कांग्रेस ने बिलकुल भी धन राशि जारी नहीं की, जिसके चलते क्षेत्र पिछड़ा रहा अब हालांकि वे विधायक नहीं हैं लेकिन पार्टी के प्रभारी होने व जिला योजना बोर्ड का चेयरमैन होने के नाते समाना में सड़क से सीवरेज तक बिलडिंग से ब्यूटीफिकेशन के अलावा एक आईटीआई, लड़कियों का कालेज, चार ग्रिड, दो पुल, प्रदेश का पहला वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, समाना में पूरा सीवरेज इसके अलावा गांवों के विकास के अनगिनत मुद्दे हैं।


क्या नहीं हुआ

-डीएमडब्ल्यू के पास फलाई ओवर की मांग नहीं हुई पूरी,
-समाना शहर से रेलवे लिंक का सपना पूरा नहीं
-दुख निवारण साहिब के पास एलिवेटिड रोड बना ट्रैफिक समस्या का हल
-छोटी नदी को दुरुस्त किया जाना

Tuesday, 15 March 2011

अपणे पंजाब दे 42 पिंड सोफी होए


-72 गांवों की पंचायतों ने आबकारी विभाग को प्रस्ताव भेजा हमारे यहां ठेका बंद हो
-अगले साल भी नीलामी में नहीं होंगे शामिल ये गांव बशर्ते...
भूपेश चट्ठा, पटियाला
अपणा पंजाब होवे, मूली नाल गंडा होवे बाण वाला मंजा होवे...गुरूदास मान का यह लोकप्रिय हिट संभावित रूप से प्रदेश के 42 गांव सोफी हो गए है और इनमें इसे कुछ इस तरह से गाया जाएगा 'अपणा पंजाब होवे ऐथे ना शराब होवे नानक दी बाणी होवे मर्दाने दा रबाब होवेÓ।
प्रदेश के आबकारी विभाग ने 72 गांवों की पंचायतों की ओर से उनके गांवों में शराब ठेके बंद किए जाने के प्रस्ताव में से 30 को रद्द भी कर दिया है जबकि शेष पंचायतों का  उनके यहां शराब का ठेका ना खोला जाने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है।
इनमें से सर्वाधिक पंचायतें संगरूर जिले की हैं। हालांकि इस जिले से 44 पंचायतों ने आवेदन किए थे लेकिन इनमें से 24 की ही याचिका को मंजूरी दी गई है। चार साल पहले जन प्रतिनिधि अधिकारों का उपयोग  नशे के खिलाफ शुरू हुआ लेकिन आज भी प्रदेश में मालवा को छोड़ अन्य क्षेत्रों माझा-दोआब के लोगों ने कम ही दिलचस्पी दिखाई है। बीते साल की संख्या 55 से इस साल आवेदन करने वाली पंचायतें बढ़ कर मात्र 72 ही हो पाई है।
दिलचस्प है कि आबकारी नीति आने से पहले विभाग ने इन पंचायतों के प्रतिनिधियों को बुलवा कर सुनवाई भी की है कि आखिर उन्हें 'एतराज क्या है?Ó, 'हर्ज ही क्या है?Ó यह भी जांचा गया कि कहीं उनके गांव में अवैध शराब पकड़े अथवा बिकने के मामले तो नहीं आए है।
याद रहे कि पंजाब का डोमोसाइल बनते ही पैग के साथ नाता या तो जुड़ जाता है या फिर जोड़ दिया जाता है और आबकारी आयुक्त के मुख्यालय वाले शहर पटियाला में यह नाता कुछ ज्यादा ही गहरा और करीब का है। एक ओर जहां गांव की पंचायतों में शराब के ठेके बंद करवाने प्रति जागरूकता बढ़ी है वहीं विभाग ने भी 'गहराई से छानबीनÓ की है कि कहीं इस सादगी के पीछे अफीम तस्करों या अवैध शराब बेचने वालों का हाथ तो नहीं है। बीते साल विभिन्न तर्क दे कर आवेदन रद्द हुए तो इस बार पंचायतें हाई कोर्ट तक दस्तक देने को तैयार रही।
 संगरूर के ही एडवोकेट कमल आनंद बताते है कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 40 के तहत गांव की पंचायत प्रस्ताव पारित करे तो गांव में से ठेका हटाया जा सकता है या फिर खुलने से ही रोका जा सकता है। पर ज्यादातर को पता ही नहीं है कि लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों को क्या अधिकार है।
उधर आबकारी विभाग के अधिकारी पुष्टि कर कहते है कि इन 42 गांवों में ठेके इस साल नहीं खुलेंगे और संभावित रूप से अगले साल भी इन्हें शराब ठेकों की नीलामी प्रक्रिया में शामिल ना किया जाए बशर्ते इन गावों में शराब का अवैध कारोबार अपने इतिहास के समान ही रहे।