Tuesday, 15 March 2011

अपणे पंजाब दे 42 पिंड सोफी होए


-72 गांवों की पंचायतों ने आबकारी विभाग को प्रस्ताव भेजा हमारे यहां ठेका बंद हो
-अगले साल भी नीलामी में नहीं होंगे शामिल ये गांव बशर्ते...
भूपेश चट्ठा, पटियाला
अपणा पंजाब होवे, मूली नाल गंडा होवे बाण वाला मंजा होवे...गुरूदास मान का यह लोकप्रिय हिट संभावित रूप से प्रदेश के 42 गांव सोफी हो गए है और इनमें इसे कुछ इस तरह से गाया जाएगा 'अपणा पंजाब होवे ऐथे ना शराब होवे नानक दी बाणी होवे मर्दाने दा रबाब होवेÓ।
प्रदेश के आबकारी विभाग ने 72 गांवों की पंचायतों की ओर से उनके गांवों में शराब ठेके बंद किए जाने के प्रस्ताव में से 30 को रद्द भी कर दिया है जबकि शेष पंचायतों का  उनके यहां शराब का ठेका ना खोला जाने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है।
इनमें से सर्वाधिक पंचायतें संगरूर जिले की हैं। हालांकि इस जिले से 44 पंचायतों ने आवेदन किए थे लेकिन इनमें से 24 की ही याचिका को मंजूरी दी गई है। चार साल पहले जन प्रतिनिधि अधिकारों का उपयोग  नशे के खिलाफ शुरू हुआ लेकिन आज भी प्रदेश में मालवा को छोड़ अन्य क्षेत्रों माझा-दोआब के लोगों ने कम ही दिलचस्पी दिखाई है। बीते साल की संख्या 55 से इस साल आवेदन करने वाली पंचायतें बढ़ कर मात्र 72 ही हो पाई है।
दिलचस्प है कि आबकारी नीति आने से पहले विभाग ने इन पंचायतों के प्रतिनिधियों को बुलवा कर सुनवाई भी की है कि आखिर उन्हें 'एतराज क्या है?Ó, 'हर्ज ही क्या है?Ó यह भी जांचा गया कि कहीं उनके गांव में अवैध शराब पकड़े अथवा बिकने के मामले तो नहीं आए है।
याद रहे कि पंजाब का डोमोसाइल बनते ही पैग के साथ नाता या तो जुड़ जाता है या फिर जोड़ दिया जाता है और आबकारी आयुक्त के मुख्यालय वाले शहर पटियाला में यह नाता कुछ ज्यादा ही गहरा और करीब का है। एक ओर जहां गांव की पंचायतों में शराब के ठेके बंद करवाने प्रति जागरूकता बढ़ी है वहीं विभाग ने भी 'गहराई से छानबीनÓ की है कि कहीं इस सादगी के पीछे अफीम तस्करों या अवैध शराब बेचने वालों का हाथ तो नहीं है। बीते साल विभिन्न तर्क दे कर आवेदन रद्द हुए तो इस बार पंचायतें हाई कोर्ट तक दस्तक देने को तैयार रही।
 संगरूर के ही एडवोकेट कमल आनंद बताते है कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 40 के तहत गांव की पंचायत प्रस्ताव पारित करे तो गांव में से ठेका हटाया जा सकता है या फिर खुलने से ही रोका जा सकता है। पर ज्यादातर को पता ही नहीं है कि लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों को क्या अधिकार है।
उधर आबकारी विभाग के अधिकारी पुष्टि कर कहते है कि इन 42 गांवों में ठेके इस साल नहीं खुलेंगे और संभावित रूप से अगले साल भी इन्हें शराब ठेकों की नीलामी प्रक्रिया में शामिल ना किया जाए बशर्ते इन गावों में शराब का अवैध कारोबार अपने इतिहास के समान ही रहे।

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