Thursday, 3 March 2011

गरीब पंचायतों की जमीन लीज पर, हुई कंगाल


-33 सालों के लिए चहेते निजी हाथों में, खाली करवाने का कोई प्रावधान नहीं
-हाई-वे के निकट और कामर्शियल महत्व की जमीनों पर सबकी निगाहें
भूपेश चट्ठा, पटियाला
किसान कंगाल हो, कर्ज तले डूबा हो तो आत्महत्या की बात सोचता है, कभी कर भी लेता है पर पंजाब की गरीब पंचायतों के पास यह विकल्प भी नहीं है, गांव की सामुहिक जमीनें औने पौने दामों पर लीज पर दे गांव को हमेशा के लिए कंगाली में धकेला जा रहा है। लीज पर लेने वाले या तो 'अपने बंदे' होने का टेग धारण किए है या फिर 'गांधी जी की तस्वीर हाथ में थामे वे व्यापारी' है जिनकी हर सरकार में चलती है। 
 
याद रहे कि पंचायती कानून के तहत ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके तहत गांव की जमीन को 33 सालो के लिए दिया जा सके अलबत्ता  शहरों में म्यूनिसिपल कमेटियां अपने अधिकार क्षेत्र में 99 सालो के लिए जमीन देती रही है पर देश की आजादी के बाद से अब तक ऐसी किसी भी जमीन को नगरीय क्षेत्र में खाली नहीं करवाया जा सका है।
 विभागीय सूत्र बताते है कि राज्य में अब लीज पर दी जा रही पंचायती जमीन को खाली करवाने का उपाय लीज डीड में दर्ज ही नहीं है। हाई वे के निकट की एक करोड़ रूपये प्रति एकड़ मूल्य से अधिक की पंचायती जमीन को दो से पांच लाख रूपये में 33 सालों के लिए चढ़ाया जा रहा है। जबकि ये आसानी से एक से दो लाख रूपये सालाना की आय दे सकती है। सूत्र कहते है कि 33 साल बाद इन जमीनों पर इंफ्रास्ट्रक्चर बना होने के नाम पर कोर्ट से आसानी से स्टे लिया जा सकता है। ऐसा नगरीय कानून की आड़ में चल भी रहा है।

 हाई-वे के निकट और कामर्शियल महत्व की जमीनों पर अब सबकी निगाहें टिकी है। हालांकि खेती के नाम पहले भी ठेके पर गांव के लोग जमीन लेते रहे है पर इसका आधार दो चार साल का ही रहता आया है और शुल्क लगभग बाजार भाव के पास ही रहता है। अब लगभग हमेशा के लिए ही जमीन एक पार्टी की जमीन होकर रहने की गुंजाइश बढ़ गई है। इतना ही नहीं ये जमीन खुली निलामी में भी नहीं दी जा रही। ऐसे ही अपना नाम ना प्रकाशित किए जाने की शर्त पर शहर के साथ लगते गांव के एक सरपंच कहते है कि उन पर स्र्वोच्च प्रशासन का भारी दवाब होता है और ना कहने की स्थिति में प्रशासक लगा वही काम करवा लिया जाता है।  

दूसरी ओर इस संबंध में वित्त कमीश्नर व सचिव ग्रामीण विकास व पंचायत जगपाल सिंह संधू और ग्रामीण विकास व पंचायत विभाग के डायरेक्टर व प्रशासनिक सचिव गुरदेव सिंह सिद्धू से संपर्क नहीं किया जा सका। बताया गया कि वे न्यायालय की कारवाई के चलते व्यस्त है। और कैबिनेट मंत्री रणजीत सिंह ब्रहमपुरा अपने विधान सभा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों में मसरूफीयत के चलते प्रतिक्रिया नहीं दे सके।

पूर्व मंत्री व विधायक विक्रमजीत सिंह मजीठीया कहते है कि उनके पर्यावरण एंव प्रोद्योगिकी मंत्रालय के कार्यकाल में कुछ बायोमॉस प्रोजेक्टों के लिए पंचायतों की जमीनें लीज पर जरूर दी हैं अन्यथा कोई जमीन लीज पर नहीं दी जा रही। अलबत्ता कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में रिलायंस की फार्म टू फोर्क योजना के तहत पंचायतों की जमीनें हवाले करनी थी जिसका उन्हीं के बंदों ने विरोध किया और अब बादल सरकार ने इसे रद्द कर दिया था।  
उपमुख्य मंत्री सुखबीर सिंह बादल से इस संबंध में बात करने पर वे सवाल करते है कि ऐसा कहां हुआ है... किसने किया है...किस काम के लिए जमीन दी गई है...अब तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश है। राज्य में हाई-वे पर स्थित गांवों की शामलाट जमीनों को लीज पर देने के सवाल पर वे कहते है कि अगर ऐसा है ते रिव्यू करेंगे।


2 comments:

  1. True, correct observation. Individual interpretation is tossed and twisted according to suitability.

    ReplyDelete