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Friday, 5 October 2012

एक गांव जो सबसे न्यारा, तस्करों को प्यारा, vat, smuggling, village , excise,Haryana-Punjab boarder



 अजीमगढ़ की अजीब दास्तां
-पंजाब के आबकारी विभाग के लिए है किरकिरी
-पैट्रोल-डीजल, शराब के बाद चीनी तस्करों की भी चांदी हुई
-हरियाणा सरकार ने गांव की भौगोलिक स्थिति उठाने हांसी-बुटाना नहर बनाई  
भूपेश चट्ठा, पटियाला

पंजाब के समाना शहर में कुछ सौ मीटर की सड़क और चंद दर्जन दुकानों और घरों का पता राजस्व रिकार्ड में हरियाणा राच्य के कैथल जिले के अजीमगढ़ गांव के नाम से आता है। पंजाब हरियाणा सीमा पर स्थित ये ऐसा गांव है जो अपनी भौगोलिक स्थिति के चलते सबसे न्यारा हो गया है और यही विशेषता इसे कमोडिटी तस्करों के लिए सबसे प्यारा बना देती है।
बात वाहन चलाने के लिए पैट्रोल-डीजल की हो या वाहन चलाते समय बिलकुल प्रयोग ना किए जाने वाली शराब की हो। राच्य सरकार के आबकारी, सेल्स टैक्स व चुंगी के रूप में सबसे च्यादा योगदान देने वाली इन चीजों की खपत यहां की आबादी से कई सौ गुना होती है। हाल ही में इसमें चीनी का नाम भी शामिल हुआ पर वैट हटने के साथ ही हट भी गया।
पंजाब से सात रूपये सस्ता पैट्रोल बेचने वाले दो पंप खूब चांदी बटोर रहे हैं, एक साल पहले तक पंजाब में डीजल हरियाणा की तुलना में सस्ता था, लेकिन हरियाणा सरकार की ओर से डीजल पर भी वैट कम किए जाने के बाद, एक पंप पर डीजल भी खूब बिकने लगा है। दिलचस्प है कि इन पंप की 'सेवाएंÓ लेने में पंजाब के वे अधिकारी कर्मी भी शामिल हैं जिन्होंने राजस्व जुटाना होता है।
शराब के मामले में दोनों जगहों के ठेकेदारों में 'सिंडीकेटÓ बनती बिगड़ती रहती है। पंजाब के अन्य ठेकेदारों के दवाब के चलते आबकारी विभाग ने यहां से शराब थोक में लाने पर सख्ती जरूर कर रखी है पर पटियाला से आधे से भी कम दामों पर मिल रही शराब का 'पर्सनल कंजपंशनÓ के लिए वर्जित नहीं है।
वहीं हरियाणा सरकार भी इस गांव की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाने में पीछे नहीं रही है। मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा ने पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की हिसार बैल्ट से पानी निकाल अपने बंदों के निर्वाचन क्षेत्रों में भाखड़ा नहर का पानी लेजाने तीन सौ करोड़ से च्यादा झोंक दिए। भाखड़ा नहर को इसी गांव से पंक्चर करने वाली हांसी-बुटाना नहर बना दी गई। बात सिरे नहीं चढ़ी पर नहर जरूर बन गई है।
शहर के बाशिंदे शशीपाल बताते हैं कि तीन-चार साल पहले पंजाब में चीनी लाने पर एंट्री टैक्स लगाया गया था। उन दिनों में लगा एंट्री टैक्स चीनी पर लगाए गए हाल ही में लगाए गए साढ़े पांच फीसद के वैट से डेढ़ फीसद कम था लेकिन इसी गंाव में हरियाणा के लिए लाई गई कई ट्रक चीनी हर रोज उतार ली जाती और फिर इसे 'धीरे-धीरेÓ पंजाब की फर्म के बिल लगा कर पटियाला, संगरूर, नाभा, सुनाम, मलेरकोटला, लुधियाना की ओर 'खिसकाÓ दिया जाता। एक बार माल निकल जाता तो बिल का 'उपयोगÓ अगली सप्लाई के लिए हो जाता।    
सर्वे किया, दोनों ओर नाके लगे हैं: एईटीसी
एडीशनल एक्साइज एंड टैक्सेशन कमिश्नर लाजपाल सिंह जाखड़ बताते हैं कि कानूनी व तकनीकि रूप से आप वाहन में पेट्रोल-डीजल भरवा सकते हैं। एक सीमा तक उन अहातों में भी बैठ सकते हैं। जबकि चीनी के मामले में अपने क्षेत्र में स्टाक के संदर्भ में सर्वे किया गया था। एहतियात के तौर पर पंजाब सीमा शुरु होते ही दोनों ओर विभाग के कर्मी नाके  पर मौजूद रहते हैं।

Thursday, 29 March 2012

पंच नहीं पब्लिक होगी परमेश्वर, village general body will be supreme


-पंचों को दबाव में ला कर सरपंच को कठपुतली बना दिया गया था
-अब गांव में सीधे तौर पर होंगे दो धड़े
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 पंजाब में सरपंच का चुनाव करने वाली ग्राम सभा एक बार फिर जिंदा हो गई है। जबकि परमेश्वर की भूमिका में आ गए पंच अब धरातल पर आ गए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति के समान सरपंच का प्रत्यक्ष चुनाव 80 के दशक में फिर शुरू किया था, अब फिर चलन में आएगा।
राज्य विधान सभा में ताजा पारित किए गए प्रस्ताव के बाद स्थानीय निकाय स्तर पर संसदीय प्रणाली लागू करने ग्रामसभा अथवा पूरे गांव के मतदाताओं के बहुमत की जरूरत पड़ेगी। जबकि इससे पहले के  एक्ट अनुसार सिर्फ पंच ही बहुमत के आधार पर सरपंच को बना और बदल सकते थे। ग्रामीण राजनीति के जानकार बताते हैं कि ग्राम सभा की ओर से सरपंच चुने जाने के बाद हालांकि पूरा गांव दो गुटों में बंट जाएगा।
इतना ही नहीं पंचों को चुनाव भी अब वार्ड के आधार पर होगा। जिससे हर किसी को अपनी भूमिका का पता होगा और किस धड़े से संबंधित है यह भी तय हो जाएगा। दिलचस्प है कि पिछले पांच सालों के दौरान पंचायत सचिव, डायरेक्टर और सबसे अधिक शिरोमणि अकाली दल की ओर से पार्टी स्तर पर नियुक्त किए गए विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी, चाहे वे हारे उम्मीदवार हों या जीते हुए विधायक, के समर्थकों का पलड़ा जिस ओर झुका हो वही सरपंच बन रहा है।
गांव की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वाले बताते हैं कि पंचायत की ओर से पहली बार चुने गए सरपंच के दो साल पूरे होते ही राजनीति शुरू हो जाती है और इसके बड़े खिलाड़ी पंच ना होकर सत्ताधारी दल के क्षेत्रीय नेता होते हैं। उन्हीं के इशारे पर सचिव व डायरेक्टर भी एक तरह से राजनीतिक प्यादे की भूमिका निभाते हैं। पंचों की संख्या 'समÓ हो तो भी बैठक बुला ली जाती है और अपने बंदे पूरे व सामने वाले के एक कम होने पर भी फटाफट पहले से तैयार किया हुआ प्रस्ताव पारित कर अपना बंदा सरपंच बना दिया जाता है। हालात ऐसे हो गए कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक सरपंचों की संख्या 80 फीसदी के पार होने के बाद भी बढ़ती रही। बीडीओ, पंचायत सचिवों को बाकायदा निर्देश देकर सत्ताधारी दल के हल्का इंचार्ज की पसंद थोपी गई।
 यहां यह भी बताना जरूरी है कि ग्राम सभा की भूमिका सीमित करने प्रक्रिया इससे पहले आई कांग्रेस सरकार ने के कार्यकाल में शुरू हुई और अकालियों ने प्रक्रिया पूरी कर व्यवस्था का पूरा लाभ लिया। जबकि अप्रत्यक्ष चुनाव का प्रयोग पहले भी राज्य में किया गया और असफल रही थी बदलाव के नाम पर इसमें सरपंच का न्यूनतम कार्यकाल तय किया गया लेकिन अब अकाली-भाजपा सरकार ने इसे संशोधित कर पुन: लागू कर दिया है।
इसी संबंध में रुड़की गांव के अवतार सिंह और कामीकलां गांव के मंजीत सिंह कहते हैं कि ये स्वागत योग्य कदम है।

Thursday, 3 March 2011

गरीब पंचायतों की जमीन लीज पर, हुई कंगाल


-33 सालों के लिए चहेते निजी हाथों में, खाली करवाने का कोई प्रावधान नहीं
-हाई-वे के निकट और कामर्शियल महत्व की जमीनों पर सबकी निगाहें
भूपेश चट्ठा, पटियाला
किसान कंगाल हो, कर्ज तले डूबा हो तो आत्महत्या की बात सोचता है, कभी कर भी लेता है पर पंजाब की गरीब पंचायतों के पास यह विकल्प भी नहीं है, गांव की सामुहिक जमीनें औने पौने दामों पर लीज पर दे गांव को हमेशा के लिए कंगाली में धकेला जा रहा है। लीज पर लेने वाले या तो 'अपने बंदे' होने का टेग धारण किए है या फिर 'गांधी जी की तस्वीर हाथ में थामे वे व्यापारी' है जिनकी हर सरकार में चलती है। 
 
याद रहे कि पंचायती कानून के तहत ऐसा कोई नियम नहीं है जिसके तहत गांव की जमीन को 33 सालो के लिए दिया जा सके अलबत्ता  शहरों में म्यूनिसिपल कमेटियां अपने अधिकार क्षेत्र में 99 सालो के लिए जमीन देती रही है पर देश की आजादी के बाद से अब तक ऐसी किसी भी जमीन को नगरीय क्षेत्र में खाली नहीं करवाया जा सका है।
 विभागीय सूत्र बताते है कि राज्य में अब लीज पर दी जा रही पंचायती जमीन को खाली करवाने का उपाय लीज डीड में दर्ज ही नहीं है। हाई वे के निकट की एक करोड़ रूपये प्रति एकड़ मूल्य से अधिक की पंचायती जमीन को दो से पांच लाख रूपये में 33 सालों के लिए चढ़ाया जा रहा है। जबकि ये आसानी से एक से दो लाख रूपये सालाना की आय दे सकती है। सूत्र कहते है कि 33 साल बाद इन जमीनों पर इंफ्रास्ट्रक्चर बना होने के नाम पर कोर्ट से आसानी से स्टे लिया जा सकता है। ऐसा नगरीय कानून की आड़ में चल भी रहा है।

 हाई-वे के निकट और कामर्शियल महत्व की जमीनों पर अब सबकी निगाहें टिकी है। हालांकि खेती के नाम पहले भी ठेके पर गांव के लोग जमीन लेते रहे है पर इसका आधार दो चार साल का ही रहता आया है और शुल्क लगभग बाजार भाव के पास ही रहता है। अब लगभग हमेशा के लिए ही जमीन एक पार्टी की जमीन होकर रहने की गुंजाइश बढ़ गई है। इतना ही नहीं ये जमीन खुली निलामी में भी नहीं दी जा रही। ऐसे ही अपना नाम ना प्रकाशित किए जाने की शर्त पर शहर के साथ लगते गांव के एक सरपंच कहते है कि उन पर स्र्वोच्च प्रशासन का भारी दवाब होता है और ना कहने की स्थिति में प्रशासक लगा वही काम करवा लिया जाता है।  

दूसरी ओर इस संबंध में वित्त कमीश्नर व सचिव ग्रामीण विकास व पंचायत जगपाल सिंह संधू और ग्रामीण विकास व पंचायत विभाग के डायरेक्टर व प्रशासनिक सचिव गुरदेव सिंह सिद्धू से संपर्क नहीं किया जा सका। बताया गया कि वे न्यायालय की कारवाई के चलते व्यस्त है। और कैबिनेट मंत्री रणजीत सिंह ब्रहमपुरा अपने विधान सभा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियों में मसरूफीयत के चलते प्रतिक्रिया नहीं दे सके।

पूर्व मंत्री व विधायक विक्रमजीत सिंह मजीठीया कहते है कि उनके पर्यावरण एंव प्रोद्योगिकी मंत्रालय के कार्यकाल में कुछ बायोमॉस प्रोजेक्टों के लिए पंचायतों की जमीनें लीज पर जरूर दी हैं अन्यथा कोई जमीन लीज पर नहीं दी जा रही। अलबत्ता कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में रिलायंस की फार्म टू फोर्क योजना के तहत पंचायतों की जमीनें हवाले करनी थी जिसका उन्हीं के बंदों ने विरोध किया और अब बादल सरकार ने इसे रद्द कर दिया था।  
उपमुख्य मंत्री सुखबीर सिंह बादल से इस संबंध में बात करने पर वे सवाल करते है कि ऐसा कहां हुआ है... किसने किया है...किस काम के लिए जमीन दी गई है...अब तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश है। राज्य में हाई-वे पर स्थित गांवों की शामलाट जमीनों को लीज पर देने के सवाल पर वे कहते है कि अगर ऐसा है ते रिव्यू करेंगे।


Tuesday, 28 December 2010

टोबों को पिकनिक स्पॉट बनाने की कवायद

भूपेश चट्ठा, पटियाला
विश्व बैंक की ओर से पंजाब के पांच सौ गांवों के गंदे तालाबों (टोबों) को दुरुस्त करने की योजना को अब पंजाब सरकार ने प्रदेश के हर गांव में लागू करने की कवायद शुरू कर दी है।
गौरतलब है कि राज्य के हर जिले में मौजूद ऐसे 20 गांवों के टोबों को पिकनिक स्पॉट में बदल कर पानी को सिंचाई के अलावा भूजल के स्तर को सुधारने में प्रयोग करने पर दैनिक जागरण में विशेष रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इस पर चर्चा में आई केंद्र की इस योजना पर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के निर्देश पर अमल शुरू हो गया है। मिले विवरण के अनुसार जिलों के डिप्टी कमिश्नरों (डीसी) को जहां संभावनाएं तलाशने के निर्देश दिए गए हैं।
वहीं, जलापूर्ति एंड सीवरेज बोर्ड से भी चल रही योजना की रिपोर्ट तलब की गई है। इस संबंध में वीरवार को पूछे जाने पर बोर्ड के अधीक्षक अभियंता आरसी दीवान ने बताया कि उनके विभाग के पास 250 गांव हैं जबकि इतने ही ग्राम पंचायती राज विभाग के पास हैं। समीक्षा रिपोर्ट उनसे मांगी जरूर गई है लेकिन प्रदेश भर में इसे लागू करने में खर्च काफी आना है। यहां 12 हजार से ज्यादा गांव हैं। अगर यह स्कीम लागू हो जाती है तो पंजाब यूरोप के किसी देश या कैलिफोर्निया से कम नजर नहीं आएगा।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के शहरों में टोबा और गांव में छप्पड़ का नाम लेते ही दुर्गध की याद आती है, तीन-चार दशक पहले तक के आर्गेनिक कहे जाने वाले इन तालाबों में मछलियां पलती थी और भैंसों की पूंछ पकड़ कर बच्चों को तैरते आम देखा जा सकता था, लेकिन आज यदि किसी के पांव भी इनके पानी से छू जाएं, तो गलने लगते हैं। इनकी सूरत और सीरत दोनों बदलने वाली हैं। इन गांवों के प्राकृतिक रूप से सदियों से चलते आ रहे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट पिकनिक स्पॉट में तबदील होने जा रहे हैं।
प्रदेश की लगभग चार फीसदी ग्रामीण भूमि पर बने इन गंदे तालाबों में सिर्फ ढांचागत बदलाव लाने जा रहे हैं। इससे दूषित पानी को पीने लायक तो नहीं बनाया जा सकेगा पर करीब करीब निर्मल जल के रूप में तबदील होने लगेगा। इतना ही नहीं, यह सारा काम 31 मार्च तक निपट जाएगा और अगली गर्मियों में यहां लगने वाले पौधे चाहे छाया न भी प्रदान कर पाएं लेकिन मानसून में गांव की गंदगी के ढेर पर लैंडस्कैप चमकने लगेंगे।

चार हिस्सों में बांटा जाएगा टोबे  को

पटियाला : गांव की जरूरतों व आबादी के हिसाब से वर्तमान टोबे  को एक बार पूरी तरह से सुखा कर तय किया जाएगा कि कितनी जमीन की जरूरत है। इसके बाद शेष भूमि को पंचायत के हवाले कर दिया जाएगा। आज के लिहाज से यह भूमि 50 लाख रुपये से कहीं भी कम नहीं है। टोबों को चार बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा। पहले हिस्से में गांव की सीवरेज आउटलेट आ कर सीधे गिरेगी, यहां से मीथेन गैस आसमान में चली जाएगी तो सॉलिड वेस्ट नीचे जम जाएगा और पानी अगले कुंड में चला जाएगा। इसी क्रम में दूसरे से तीसरे और फिर चौथे कुंड में पहुंचेगा। यहां आया पानी सिंचाई के लायक भी होगा और नीचे जमीन पर किसी तरह की सिल्ट न होने के चलते धरती में भी समां कर भूजल स्तर को री चार्ज करने लगेगा। ढाई से चार लाख रुपये की लागत में बदबू समाप्त हो जाएगी और इसी चौथे कुंड के पानी से टोबे के आसपास अतिरिक्त बची भूमि पर लगाए जाने वाले लैंडस्कैप को सींचा जा सकेगा। यह स्वत: चलने वाली प्रक्रिया होगी और सफाई केवल एक कुंड की करनी होगी।