Tuesday, 28 December 2010

टोबों को पिकनिक स्पॉट बनाने की कवायद

भूपेश चट्ठा, पटियाला
विश्व बैंक की ओर से पंजाब के पांच सौ गांवों के गंदे तालाबों (टोबों) को दुरुस्त करने की योजना को अब पंजाब सरकार ने प्रदेश के हर गांव में लागू करने की कवायद शुरू कर दी है।
गौरतलब है कि राज्य के हर जिले में मौजूद ऐसे 20 गांवों के टोबों को पिकनिक स्पॉट में बदल कर पानी को सिंचाई के अलावा भूजल के स्तर को सुधारने में प्रयोग करने पर दैनिक जागरण में विशेष रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। इस पर चर्चा में आई केंद्र की इस योजना पर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के निर्देश पर अमल शुरू हो गया है। मिले विवरण के अनुसार जिलों के डिप्टी कमिश्नरों (डीसी) को जहां संभावनाएं तलाशने के निर्देश दिए गए हैं।
वहीं, जलापूर्ति एंड सीवरेज बोर्ड से भी चल रही योजना की रिपोर्ट तलब की गई है। इस संबंध में वीरवार को पूछे जाने पर बोर्ड के अधीक्षक अभियंता आरसी दीवान ने बताया कि उनके विभाग के पास 250 गांव हैं जबकि इतने ही ग्राम पंचायती राज विभाग के पास हैं। समीक्षा रिपोर्ट उनसे मांगी जरूर गई है लेकिन प्रदेश भर में इसे लागू करने में खर्च काफी आना है। यहां 12 हजार से ज्यादा गांव हैं। अगर यह स्कीम लागू हो जाती है तो पंजाब यूरोप के किसी देश या कैलिफोर्निया से कम नजर नहीं आएगा।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के शहरों में टोबा और गांव में छप्पड़ का नाम लेते ही दुर्गध की याद आती है, तीन-चार दशक पहले तक के आर्गेनिक कहे जाने वाले इन तालाबों में मछलियां पलती थी और भैंसों की पूंछ पकड़ कर बच्चों को तैरते आम देखा जा सकता था, लेकिन आज यदि किसी के पांव भी इनके पानी से छू जाएं, तो गलने लगते हैं। इनकी सूरत और सीरत दोनों बदलने वाली हैं। इन गांवों के प्राकृतिक रूप से सदियों से चलते आ रहे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट पिकनिक स्पॉट में तबदील होने जा रहे हैं।
प्रदेश की लगभग चार फीसदी ग्रामीण भूमि पर बने इन गंदे तालाबों में सिर्फ ढांचागत बदलाव लाने जा रहे हैं। इससे दूषित पानी को पीने लायक तो नहीं बनाया जा सकेगा पर करीब करीब निर्मल जल के रूप में तबदील होने लगेगा। इतना ही नहीं, यह सारा काम 31 मार्च तक निपट जाएगा और अगली गर्मियों में यहां लगने वाले पौधे चाहे छाया न भी प्रदान कर पाएं लेकिन मानसून में गांव की गंदगी के ढेर पर लैंडस्कैप चमकने लगेंगे।

चार हिस्सों में बांटा जाएगा टोबे  को

पटियाला : गांव की जरूरतों व आबादी के हिसाब से वर्तमान टोबे  को एक बार पूरी तरह से सुखा कर तय किया जाएगा कि कितनी जमीन की जरूरत है। इसके बाद शेष भूमि को पंचायत के हवाले कर दिया जाएगा। आज के लिहाज से यह भूमि 50 लाख रुपये से कहीं भी कम नहीं है। टोबों को चार बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा। पहले हिस्से में गांव की सीवरेज आउटलेट आ कर सीधे गिरेगी, यहां से मीथेन गैस आसमान में चली जाएगी तो सॉलिड वेस्ट नीचे जम जाएगा और पानी अगले कुंड में चला जाएगा। इसी क्रम में दूसरे से तीसरे और फिर चौथे कुंड में पहुंचेगा। यहां आया पानी सिंचाई के लायक भी होगा और नीचे जमीन पर किसी तरह की सिल्ट न होने के चलते धरती में भी समां कर भूजल स्तर को री चार्ज करने लगेगा। ढाई से चार लाख रुपये की लागत में बदबू समाप्त हो जाएगी और इसी चौथे कुंड के पानी से टोबे के आसपास अतिरिक्त बची भूमि पर लगाए जाने वाले लैंडस्कैप को सींचा जा सकेगा। यह स्वत: चलने वाली प्रक्रिया होगी और सफाई केवल एक कुंड की करनी होगी।

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