Thursday, 2 December 2010

मुर्दे के केमिकल से फिश पर फेशियल

मछली को सडऩे से बचाने और बदबू रोकने लग रहा फार्मालीन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
सर्दियां आते ही पंजाबियों का सारा जोर मुर्गे से हट कर मछली पर चला जाता है, इन दिनों आलम ये होता है कि पंजाबी और बंगाली की पहचान करनी मुश्किल हो जाती है, लेकिन पंजाब में रहने वाले किसी भी व्यक्ति की इसी लालसा का फायदा ट्रेडर उठा रहा है। फिश पर मुर्दे पर लगने वाले रसायन का फेशियल कर खुद तो मोटी कमाई कर रहा है पर इंसानों को हाई प्रोटीन डाइट के नाम पर कैंसर परोस रहा है। ऐसी मछली खाने वालों की किडनियां फेल होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
मछली को सडऩे से बचाने और दुर्गंध देने से रोकने व ताजा दिखाने मोर्चरी में मुर्दे को लगाने वाले फार्मालीन से होने वाले नुकसान पर फाईव ऐलीमैंट हैल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर बताते है कि यह मालफंक्शिनिंग को सुस्त कर देता है। लीवर जब टॉक्सिक मैटर के चलते ज्यादा लोड लेता है तो इसके 20 फीसदी काम किडनी के पास चले जाते हैं। मछली खाने से यूरिक एसिड वैसे ही बनता है, फार्मालीन के असर से ये लगातार बनने लगता है और किडनी के करेटिनन बढऩे से सूजन आ जाती है फिर धीरे धीरे काम करना बंद कर देती है। इससे काला मोतिया भी उतर आता है।
इसे मानव सेहत के लिए खतरनाक बता पंजाब एकेडमी आफ फारेंसिक मेडिसीन एंड टाक्सिकालॉजी के चेयरमैन डा. डीएस भुल्लर कहते है कि जितना फार्मालीन अमेरिका से आ रहा है उसका प्रयोग कहां हो रहा है, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
वहीं व्यवसाय से जुड़े गुरजीत सिंह वालीया कहते है कि मुंबई और गुजरात से दो-ढ़ाई हजार किलोमीटर से आने वाली उस हर मछली पर ये रसायन लग रहा है जो पांच दिन से ज्यादा पुरानी हो चली है। पानी में नमक ना होने पर समुद्री मछली की तुलना पंजाब में पौंड फिश जल्दी खराब होती है, ऐसे में इसे भी लपेटा जा रहा है। वालिया कहते है कि साफ करने के बाद बाजार भाव छह सौ रूपये किलो पर आ पहुंचा है तो भला कौन रिस्क लेगा। एयरकंडीशनर कंटेनर हैं नहीं और पांच दिन से ज्यादा बर्फ के सहारे नहीं निकल सकते। पहचान के नाम पर वे कहते है कि पानी में डालने तक इसकी स्किन खासी चमकदार रहती है, बाहर से सफेद दिखने वाली फार्मलीन लगी मछली अंदर पीलापन लिए होती है, धोते समय ये टूट कर बिखरने लगती है।
उधर मछली पालन विभाग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वीके डोगरा ऐसे किसी तरह के केमिकल लगाए जाने की जानकारी होने से इंकार करते है। वे कहते है कि प्रिजरव करने के लिए एक्वेरियम में तो प्रयोग होता है पर मछली जैसी किसी खाने वाली चीजों में नहीं हो रहा है।

सेहत विभाग की नहीं है भूमिका

सिविल सर्जन एसएल महाजन मछलियों पर छिड़के जा रहे अप्राकृतिक रसायनों के सवाल पर कहते है कि सेहत विभाग की मछलियों के मामले में कोई भूमिका नहीं होती। कौनसी मछली खाने लायक है अथवा नहीं यह बताना, और जांच करना मछली पालन विभाग का काम है।

1 comment:

  1. पहली बार सुना ,पता लगाते हैं !

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