Tuesday, 28 December 2010

सफरनामा 2010 नहीं थमी दोहन की रफ्तार, पर बातें होनी तेज हुई

पर्यावरण
-पीपीसीबी का डंडा चला, तो इंडस्ट्री में हलचल हुई
-नहीं रुका पराली का जलना, पर धान की बुआई समय पर आ गई
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्राकृति से पंगा लेने की इंसानी फितरत में पिछले साल की तुलना में इस साल भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। प्राकृति के दोहन की रफ्तार बिलकुल नहीं थमी है अलबत्ता ये शोषण के स्तर पर ही बनी हुई है पर इस साल कुदरत को बचाने की बातें होनी जरूर तेज हुई है। कोपनहेगन का असर पंजाब में कितना हुआ यह तो आंकना तो मुश्किल है पर प्रदेश में भूमिगत जल स्तर को संभालने लागु किए गए सब सोएल एक्ट ने समय से पहले होने वाली धान की बुआई को सफलतापूर्वक रोक दिया है। अगले साल हालांकि चुनावी वर्ष है पर उम्मीद तो की ही जा सकती है कि पटाखे जलाने में आई कमी पराली पर भी लागु हो जाएगी।

नौ बनाम दस
बीते साल की तुलना में इस साल पराली क जलाए जाने पर होने वाल प्रदूषण को रोकने सरकार अथवा प्रशासन की ओर से प्र्रयास नहीं किए ्रए। कारण बताया गया कि मानसून देर तक चला है, सीजन लंबा हो गया गेहूं की बिजाई को समय कम रह गया। हालांकि प्रकृति ने अपने बंदों से अन्याय यहां भी नहीं किया। सर्दी देर से शुरू कर किसान को बिजाई का पूरा टाईम दिया है पर बेचारा इंसान तब तक पर्यावरण में प्रदूषण घोल चुका था। अंग्रेजी महीनों अनुसार खेती करने वाले नुकसान में रहे तो परंपरागत ज्ञान का प्रयोग करने वाले लाभ में रहे।

दस का दम

पौधारोपण के नाम पर चंदा जुटाने वालों को इस साल ज्यादा मौका नहीं मिला। बाढ़ के चलते पौधे प्रैस नोट में ही सिमट कर रह गए, इक्का दुक्का फोटो के बाद पर्यावरण प्रेम समाप्त हो चला लेकिन जंगल का रकबा जरूर बढ़ा, चाहे कुछ दर्जन एकड़ ही सही पर इसके भी कागजों में ही ईजाफा होने के आरोप भी लगे, यह भी पूछा गया कि पिछले साल लगे पौधों में से कितने बचे तो खामोशी भी छा गई। हालांकि हाई वे के बनने व सड़कों के चौड़ा करने से कटने वाले पेड़ों पर वन विभाग को मुआवजे में जमीन ना मिलने का कानून इस साल भी टीस दे गया।
संत सींचेवाल भी कुछ थके थके नजर आए, अब तक पंजाब में नदी प्रदूषण को निर्मल जल में बदलने और एक ही महीने में स्वदेशी तरीके से सस्ता सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने का रिकार्ड अपने नाम कर चुके सींचेवाल ने इस साल यहां तक कहना शुरू कर दिया कि तुम नदी नालों को प्रदूषित करना बंद कर दो ये खुद-ब-खुद साफ हो जाऐंगे। कुछ अति उत्साही पर्यावरण प्रेमीयों ने तो हर पांच सात सालों के अंतराल पर बाढ़ को ही जरूरी बता डाला।

11 में हम
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का डंडा चलाने पर इंडस्ट्री में जो हलचल होनी शुरू हुई है वह आगे भी जारी रहनी चाहिए। कहा जाने लगा है कि मंदी का नाम आगे रख अपना बैंक बैलेंस बनाने आप औरों का मेडिकल बिल नहीं बढ़ा सकते। प्राकृति को मां समझ आप कुछ ले तो सकते है पर उसे नौच नहीं सकते। पर्यावरण संजोने चलाए गए प्रोजेक्ट नन्हीं छांव को जो हैड लाईन मिली उन्हें देख स्टूडेंट्स आर्गेनाईजेशन आफ इंडिया ने भी कुछ कदम बढ़ाए। नए साल ऐसा प्रोजेक्ट कोई और संगठन संगठित हो कर चलाए या कोई दल अपने पूरे दल बल के साथ ऐसा कोई अभियान चलाए कि हमारी कृषि और पर्यावरण की विरासत बची रहे यह कामना की ही जा सकती है।

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