Friday, 17 December 2010

rti मत करो संशोधन, दब जाएगी आम जन की आवाज

भूपेश चट्ठा, पटियाला
आम आदमी के लिए इंसाफ के दरवाजे खोलने, करार दिया जाने वाला सूचना का अधिकार (आरटीआई) अब आम नहीं रहेगा। भारत सरकार के कार्मिक (पर्सोनल) विभाग के सुझावों को अगर स्वीकार कर लिया गया तो भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े रहस्योद्घाटन कर चुका यह अधिकार आम आदमी के लिए दूर की कौड़ी बनकर रह जाएगा। आरटीआई में प्रस्तावित संशोधन करने से आम जन की आवाज दब कर रह जाएगी।
आरटीआई के प्रति आम आदमी को जागरूक कर रही संस्था 'संकल्प' के अध्यक्ष जतिंदर जैन ने शुक्रवार को इस संबंध में पूछे जाने पर कहा कि केंद्र सरकार के नोडल कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने प्रस्तावित परिवर्तन पर आम लोगों की प्रतिक्रियाएं 27 दिसंबर तक मागी है। प्रस्तावित बदलाव में आरटीआई के तहत दिए जाने वाले आवेदनों में अधिकतम शब्द सीमा 250 होनी चाहिए। इसमें अधिकारियों और आवेदकों के पते शामिल नहीं होंगे। इसके अलावा आवेदक को अपने आवेदन में सिर्फ एक ही विषय रखना होगा। इसके साथ ही सूचना मुहैया करवाने के लिए किसी उपकरण के इस्तेमाल पर प्रशासन की ओर से की व्यय की जाने वाली वास्तिवक राशि भी आवेदक को ही अदा करनी पड़ेगी।
'संकल्प' के अध्यक्ष जतिंदर जैन का कहना है कि कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए यह सब मुश्किलों का सबब बनेगा, क्योंकि देश का आम आदमी कंप्यूटर की पढ़ाई में निपुण नहीं है। आम जन की ओर से दिया जाने वाला आरटीआई का आवेदन हाथ से लिखा होता है। हाथ से लिखते हुए आम आवेदक को इस बात का पता ही नहीं चलता कि 250 शब्दों की सीमा कब खत्म होगी, और इससे किसी न किसी बहाने सूचना न देने वाले अधिकारियों को आवेदन को खारिज करना आसान हो जाएगा।
'संकल्प' के समन्वयको पवन गुजरा, चन्द्र मोहन व भरत हरि शर्मा ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन जिसमें सूचना मुहैया करवाने के लिए खर्च होने वाले वास्तिवक खर्च को आवेदक से लेना शामिल है, सरासर बेइसाफी साबित होगा। सूचना देने के लिए हर विभाग की जिम्मेवारी तय करना सरकार का काम है, संशोधन से लोगों में सरकार के खिलाफ अविश्वास बढ़ेगा।
वर्णननीय है कि देश में सूचना का अधिकार केंद्र की यूपीए सरकार द्वारा लाया गया था इससे पहले भी इस कानून में फेरबदल करने का प्रस्ताव लाया गया था, इस पर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाधी ने दस नवंबर 2009 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर संशोधन खारिज करने की सिफारिश करते हुए यह तक कहा था कि सरकारी मुलाजिमों को इस कानून की सही जानकारी न होने से आम आदमी को परेशानी उठानी पड़ रही है और इसका समाधान जल्दी होना चाहिए। सोनिया के अनुसार 'सूचना का अधिकार आम जनता की जिंदगी में बदलाव ला रहा है, इस कानून में बदलाव की जरूरत नहीं है'।
'संकल्प' के अध्यक्ष जतिंदर जैन ने कहा कि इस कानून में बदलाव के प्रस्ताव को खारिज करने के लिए देश की समाज सेवी संस्थाओं व बुद्धिजीवियों को इस संबंध में विरोध दर्ज करना चाहिए।

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