Friday, 28 October 2011

नदी किनारे प्रदूषित नलकूप, गांव वालों ने की तौबा, river ghagger, water pollution, tubewell,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
 जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां हर साल नए नलकूप खोदने पड़ते हैं, पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है। क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। घग्गर नदी में कभी मछली पकडऩे के ठेके होते थे आज जल जीवन तो दूर कई पक्षियों की किस्में ही अब दिखाई देनी बंद हो गई। हालात अब इस कदर बदतर हो चुके हैं कि नदी किनारे लगे नलकूपों का पानी प्रदूषित हो चुका है और गांव व आसपास बसे डेरों के लोगों ने इससे तौबा कर ली है।

ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है। पंजाब हरियाणा सीमा पर किसान पीने के पानी के तौर पर इसका पानी इस्तेमाल नहीं करते हैं।

पटियाला चीका रोड़ पर पंजाब की  ओर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि धर्मेहड़ी पुलों के पास क्षेत्र में घग्गर किनारे की पहली दो मोटरों का पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता और इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा पर कोशिश होती है कि सब्जी को ना लगाया जाए। वहीं गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का अहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।

 वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग़ से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये उपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग ना करें। डा. चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

दूध नहीं 'डेयरी व्हाइटनर' है ये, dairy, whitener, milk, adultration, febrication,


दूध में उलटा पुलटा
दूध में पानी चलेगा पर पानी में दूध?

भूपेश चट्ठा, पटियाला
दूध में पानी मिलाना पुरानी बात हुई आजकल किसी को पानी मिले दूध से एतराज भी नहीं है। मल्टी नैशनल कंपनियों ने तो गाय, भैंस या बकरी के  'दूध' को 'दूध' कहना ही बंद कर दिया। इसका नाम 'डेयरी व्हाइटनर' (एक ऐसा पदार्थ जिसे सफेद रंग का पेय पदार्थ जिसे डेयरी में तैयार किया गया हो) बना दिया गया है। ऐसे में आप किसी तरह के भी सफेद रंग के पदार्थ में शुद्ध दूध के सभी गुण नहीं तलाश सकते।

झाग के हैं 10 से 15 फीसदी दाम
दूध के मामले में 'दैनिक जागरणÓ ने मिलावट के रूप में हो रही ठगी पर पाया कि आपके ठीक सामने यदि गाय या भैंस से दूध की धार तेजी से निकाल कर तुरंत ही आपके बर्तन में डाल रहा है तो समझ लीजिए 10 से 15 फीसदी की कुंडी तय है। ग्राहक के बर्तन में झाग ही इतने भर दिए जाते हैं कि बर्तन से बाहर निकलने को होते हैं। कहने पर बताया जाता है कि सारी ताकत ही इसमें है। दिलचस्प है कि इसके लिए जिस बर्तन में दूध निकालना हो उसमें थन धोने के नाम पर गर्म पानी मिला बर्तन को गर्म कर लिया जाता है। वहीं कोई भी डेयरी मालिक धीरे धार निकालने वाले कर्मी से या तो अपने घर के लिए दूध निकलवाता है, या फिर उन लोगों के लिए जो पांच-सात रूपये प्रति लीटर ज्यादा देते हों या फिर वे ग्राहक जो फैट पर आधारित दूध लेते हों।

छोटा ही रहेगा पैमाना 
दूध मापने के लिए पैमाना एक लीटर का भी हो सकता है लेकिन हर दूध देने वाला आधा लीटर का ही प्रयोग करता है। चाहे दो या चार लीटर दूध देना हो फिर भी आधा लीटर का ही पैमाना काम में लिया जाता है। अलबत्ता ये कभी पूरा भरता नहीं भर भी जाए तो उड़ेले जाने तक हर बार दो से चार फीसदी की कुंडी मार जाता है।

दूध से बनाया पनीर और पनीर के पानी से दूध
दूध से पनीर बनाए जाने के बाद बचे पानी को एक बार फिर से दूध बनाए जाने की कवायद इस कदर चल रही है कि हलावाइयों की दुकानों के बाहर फेंका जाने वाला पनीर का पानी अब दिखाई नहीं देता है। इस पानी में रिफांइड मिला कर चिकनाई बनाई जाती है तो हीट देने के लिए यूरिया और फिर थोड़ा सा सूखे दूध का पाउडर जरूरत अनुसार मिलाया जाता है। ऐसे तैयार किए गए सफेद पदार्थ को सस्ते दूध के नाम पर चलते ग्राहक को थमाया जा रहा है। देसी तरीके में इसे पकडऩे के लिए देखा जा सकता है कि जिस बर्तन में आधा घंटा भी बिना गर्म किए रह जाए तो बर्तन चिकना हो जाता है। एक परत पूरे बर्तन में महसूस की जा सकती है। आम अंगुली लगाने भर से ही चिकनाहट महसूस की जा सकती है।

क्रीम निकलवा कर थमाया जाता है सपरेटा 
दूध को दूध ही रखते हुए, कुल दूध में से आधे में पहले क्रीम निकाल कर बेच दी जाती है और फिर शेष दूध मिला कर कम फैट का दूध तैयार कर दिया जाता है। ऐसे दूध को कोई भी उपकरण पकड़ नहीं पाता और ठगी जारी रहती है।

मलाई वाला दही या अरारोट या फिर ब्लोंिटंग पैपर
 हर किसी को पसंद है कि बाजार से दही लिया जाए तो इसमें अच्छी सी फुटी हो या फिर कड़ाही में गर्म हो रहे दूध में से मलाई की परत हो। दिलचस्प है कि ये दोनों ही आपको दारा सिंह बनाने के लिए नहीं होती बल्कि आपकी छाती को जमा देने वाले आरारोट से तैयार की जाती हैं। दही जमाने के लिए  रखे गए दूध में हल्का गर्म कर आरारोट मिला दिया जाता है तो गर्म दूध पर ब्लोटिंग पेपर की परत फैला दी जाती है। ये दोनों ही आर्गेनिक हैं ऐसे में पकडऩे के लिए खासे अनुभव की जरूरत होती है, या दक्षता की बेहतर हो की मलाई का ऐसा लालच ही छोड़ दिया जाए।

महंगाई बनी पर्यावरण संरक्षक, diwali, pollution,


भूपेश चट्ठा, पटियाला
 पटाखे बनाने के सीजन में शिवाकाशी में बेमौसमी बारिश हुई हो या मजदूरों की कमी या फिर मालभाड़े में बढ़ोतरी, पटाखे क्यों महंगे हुए, इसके और भी कारण हो सकते हैं, लेकिन इसका सीधा लाभ इस बार पर्यावरण को मिला है। पर्यावरण के प्रति इंसान को जागरूक करने का जो काम स्वयंसेवी संस्थाएं, सरकारें और सरकारी संस्थान नहीं कर सके, वो काम आखिरकार महंगाई ने कर दिखाया है। 
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) की ओर से दीपावली से पहले, दीपावली की रात और अगली सुबह राज्य में 22 स्थानों पर की गई मॉनीटरिंग के आंकड़ों का हालांकि विश्लेषण अभी किया जाना है, लेकिन दीपावली की अगली सुबह दमा के किसी भी मरीज के चेहरे की रौनक देखकर आप बता सकते हैं कि इस बार प्रदूषण के मामले में राहत है। 
सोशल साइंसिस एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि नि:संदेह पटाखे कम चले और प्रदूषण कम हुआ है, कारण जो भी रहा हो पर लोगों को ज्ञान प्राप्त हो गया है। जो बजट पटाखों के लिए रखा जाता था, वह खाने-पीने की चीजों की तरफ गया और महिलाओं का रुझान एक बार फिर बर्तन से बेकरी की ओर बढ़ा है। नोट तुरंत जला कर धमाका करने के बजाय आम आदमी ने इसे कुछ दिन ज्यादा चलाने को महत्व दिया है। 
पटाखा कारोबारी अमित शर्मा बताते हैं कि पिछले साल जितने पटाखे छह सौ में आते थे उसके लिए अब नौ सौ रुपये तक खर्च हो रहे हैं। पटाखों के लिफाफे का साइज वही है लेकिन लिफाफों की संख्या खासी कम रही है। पटाखे महंगे होने के कारण कुल व्यापार 30 फीसदी कम रहा है। साफ है कि पटाखे फोड़ने का चलन पिछले साल के मुकाबले 40 फीसदी तक गिरा है।
 दिलचस्प है कि दीपावली की रात को चली तेज हवा ने कई शहरों में प्रदूषण से और राहत दे दी है। पीपीसीबी के डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह नाभा बताते हैं कि हवा चलने से रेस्पीरेटरी सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल इधर उधर फैल जाता है। ऐसे ही नाइट्रेट व सल्फर गैसों के साथ हुआ है। शांत वातावरण में ये चीजें एक ही जगह पर या तो बैठ जाती हैं या मंडराती रहती हैं। हवा न चलती तो गर्द जमाने के लिए बारिश का इंतजार रहता। महंगाई के असर को लेकर वे इंकार नहीं करते लेकिन जागरुकता के मामले में डा. नाभा कहते हैं कि कड़ी मेहनत हो रही है, असर भी दिखेगा। संभव है कि प्रदेश के पांच प्रमुख शहरों से संवेदनशील, कामर्शियल अथवा आवासीय व इंडस्टि्रयल क्षेत्रों में की गई मॉनीटरिंग के आने वाले आंकड़े आपको चौंका दें।

Saturday, 15 October 2011

बादाम भी बदनाम, adultration, festival, febrication


बादाम की जगह खुर्मानी और आड़ू की गिरी? 
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 मिठाई के मिलावटी और खोए के सिंथेटिक होने की आए दिन आ
रही  खबरों से सहमा आम आदमी दिवाली पर शुद्धता के चक्कर में ड्राई
फ्रूट की ओर भागता है और इसमें बादाम को  खासी शिद्दत से देखा
जाता है। सलाह दी जाती है कि बादाम की गिरी छोटी होनी
चाहिए... कैलीर्फोनिया के बड़े बादाम में बादाम का  खास गुण
'एमीनो एसिडÓ नहीं होता... ऐसे में अफगानी और कश्मीरी ही
च्यादा बेहतर है। ये तुलनात्मक रूप से छोटा भी  होता है।
दिलचस्प है कि यहां पर अब तक बादाम का तेल निकालने वाले उपकरण
ही मौजूद थे जो तेल निकाल कर थोथा बादाम बाजार में धकेल रहे
थे। अब इससे भी  दो कदम आगे निकलते हुए। आड़ू की गिरी को
बादामों में मिलाया जाने लगा। बात अमेरिका के बड़े बादामों की
बदनामी की हुई तो छोटी गिरी के लिए अब खु र्मानी की बोरियां
कश्मीर से आने लगी हैं।
आयुर्वेदिक अस्पताल के मेडिकल सुपरडेंट डा. वीके कौशिक कहते
हैं कि बादाम में विटामिन ए व ई होता है इसके अलावा एमीनो एसिड
ही प्रमुख  गुण है। यह किसी में कम तो किसी में च्यादा होता है,
अगर किसी में नहीं है तो वो बादाम नहीं है।
ऐसे में सबसे बेहतर तरीका यही है कि अखरोट हो या बादाम घर
पर छिलके सहित लाए जाएं और घर पर तोड़ कर या छील कर  खाए
जाएं।



मसाले ऐसे  भी होते हैं

काली मिर्च में पपीते के बीज तो धनिये में कुछ ओर मिला कर चार
पैसे बनाने की बात अब पुरानी हो चली है, इसमें पकड़े जाने और
जुर्म साबित होने की संभावना कहीं च्यादा होती है, लेकिन आजकल
मंहगे मसाले में बिना रिस्क लिए ना केवल मिलावट हो रही, बल्कि
पकड़े जाने के  खतरे  भी   खासे कम कर लिए हैं, हालांकि इससे
मसालों की गुणवत्ता से कहीं अधिक समझौता किया जाता है। बाजार
के जानकार बताते हैं कि लौंग के पाउडर में लौंग कम और लौंग
के पौधे के पत्ते, जड़ और डंडी की लकड़ी इत्यादि मिलाई जा
रही है। ऐसा ही कुछ आलम हल्दी से लेकर आंवले तक का है।
मेथी, धनिया और पौदीने का पाउडर पत्ते का कम और डंडी का
च्यादा होता है।
फाइव एलीमेंट हैल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर
टाइगर कहते हैं कि आंवले का सबसे अधिक गुणकारी हिस्सा उसका
गुद्दा होता है। जबकि चूर्ण के मामले में बाजार में गुठली सबसे
च्यादा चलाई जा रही है। ये त्रिफला से लेकर हर दवा में शामिल है।
कंपनी के ब्रांडेड प्रोडक्ट  भी  इसमें अनछुए नहीं हैं। वे सलाह
देते हैं कि  अच्छा होगा यदि आप साबुत मसाले लेकर घर पर पीसने का
प्रबंध करें। इसमें हल्दी से लेकर मिर्च व गरम मसाला सभी  कुछ
ग्राइंडर में डाला जा सकता है।


लुधियाना में प्रदूषण ढाई गुणा ज्यादा


-इंडस्ट्री नहीं, सबसे बड़ा कारण वाहनों का धुंआ है, देश का सर्वाधिक वाहन सघनता वाला शहर है लुधियाना
-पीपीसीबी के मास्टर प्लान पर नहीं हुई कार्रवाई
-डीजल के आटो चरणबद्ध तरीके से हटा सिटी बसें शुरू करने और सीएनजी वाहन लाने का है प्रस्ताव
-कामर्शियल क्षेत्र है सबसे ज्यादा प्रभावित
भूपेश चट्ठा, पटियाला
देश में सबसे अधिक प्रदूषित शहर का कलंक अपने माथे पर लेने वाले भारत के मैनचेस्टर लुधियाना शहर के प्रदूषण में पिछले सालों की तुलना में आंशिक रूप से गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन आज भी वातावरण के नजरिए से स्वच्छ कहे जाने वाले शहर से यहां का प्रदूषण ढ़ाई गुणा ज्यादा है।
 पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों पर आधारित शोध बताता है कि शहर में रेस्पीरेटरी सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटेरियल की अधिकतम मात्रा 100 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए जबकि लुधियाना में यह 234 पर चल रही है। हालांकि पिछले साल इन दिनों में यह आंकड़ा 250 पर रहा था।
इसी प्रकार सल्फर डाई आक्साइड की अधिकतम सीमा 80 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है और लुधियाना में यह 10 से ज्यादा नहीं है। जबकि नाइट्रोजन गैसों की मात्रा आठ चल रही है, जबकि पिछले साल ये 30 से 35 माइक्रो ग्राम के बीच थी।
शहर में पीपीसीबी चार स्थानों पर प्रदूषण की मानीटरिंग करता है। इनमें विश्वकर्मा मंदिर, मिल्क प्लांट, नाहर स्पीनिंग मिल और पीपीसीबी के शाम नगर स्थित क्षेत्रिय कार्यालय शामिल हैं। इनमें बस स्टैंड के साथ लगता शामनगर का कामर्शियल क्षेत्र है जहां आरएसपीएम की मात्रा 350 के भी पार है। इंडस्ट्री की तुलना में ये कामर्शियल क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है।
दिलचस्प है कि आम धारणा के विपरीत  शहर की आबोहवा में जहर घोलने का काम अब इंडस्ट्री कम कर रही है और आम आदमी के वाहनों का योगदान इसमें अब कहीं ज्यादा हो रहा है। पीपीसीबी के लुधियाना में तैनात पर्यावरण इंजीनियर करुनेश गर्ग अनुसार इंडस्ट्री प्रदूषण का एक स्थान पर टिका रहने वाला स्रोत है लेकिन इस पर एयर पाल्यूशन कंट्रोल डिवाइस लगे हैं और सभी पर सख्ती से कार्रवाई भी हो रही है। जबकि चलते फिरते वाहनों के प्रदूषण का उपाय नहीं है। शहर में इनकी संख्या लगातार और तेजी से बढ़ रही है।  सबसे बड़ा कारण इन वाहनों का धुंआ है। लुधियाना देश का सबसे ज्यादा वाहन सघनता वाला शहर भी है।
दिलचस्प है कि पीपीसीबी ने लुधियाना को प्रदूषण से मुक्त करवाने मास्टर प्लान तैयार कर रखा है। आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि राज्य सरकार के पास इसे भेजे हुए अरसा हो गया है लेकिन इस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि डीजल इंजन से चलने वाले आटो रिक्शा को चरणबद्ध तरीके से हटा कर सिटी बसें शुरू करने की योजना मेट्रो की बात करने वाली सरकार के पास पड़ी है। इसी क्रम में दिल्ली की ही तर्ज पर सीएनजी वाहन विशेष रूप से कामर्शियल क्षेत्र में लाने का प्रस्ताव भी मास्टर प्लान के तहत ही है। पीपीसीबी के सचिव कहते हैं कि ये पाइप लाइन में है और जल्द ही शुरु हो जाएगी।
इसी क्रम में पीपीसीबी के चेयरमैन केएस पन्नू से लुधियाना के देश के सबसे अधिक प्रदूषण वाला शहर होने के संबंध में पूछे जाने पर वे स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि प्रदूषण तो निसंदेह ज्यादा ही है और इसे छिपाया नहीं जा सकता। बोर्ड के प्रयास जारी हैं और जल्द परिणाम सामने होंगे।

Saturday, 8 October 2011

चिडि़यों का चहचहना .. गया वो जमाना, pesticide, birds,


 कपास पर 27-28, धान 7-8, गेहूं पर तीन बार पेस्टीसाइड का छिड़काव 
 पहले खुराक घटी, फिर बच्चे मरे और फिर चिडि़या ही विलुप्त
भूपेश चट्ठा, पटियाला पीपल की ऊंची डाली पर, बैठी चिडि़या गाती है, सुन लो वो अपनी बोली में, क्या संदेश सुनाती है..? प्रदेश में कविता की ये पंक्तियां अब बस किताबों में ही सीमित रह गईं हैं क्योंकि हमारे सामने से देखते ही देखते गौरेया (देसी चिडि़या) गायब हो गई है और हमें खबर ही नहीं हुई। 
जी हां! हम थार के रेगिस्तान की बात नहीं कर रहे जहां पानी और खुराक की कमी हो। हम उस पंजाब की बात कर रहे हैं जहां सूनी धरती बिलकुल नहीं है। हर तरफ साल भर फसलें लहरा रही होती हैं, पानी भी भरपूर है, फिर भी नन्ही गौरेया के बच्चे भूख से बिलख कर मरने लगे..बच्चे होने कम हुए..एक बार बच्चों की खुराक गायब हुई तो देसी अथवा जंगली कही जाने वाली गौरेया गायब हो गई।
 राज्य के खेतों में कपास पर 27-28 बार, धान की फसल पर कम से कम सात से आठ बार पेस्टीसाइड का स्प्रे किया जाता है। जहरीली दवाओं के ये वो छिड़काव हैं जो बिना किसी तरह की बीमारी के ही किए जाते हैं। गेहूं की फसलों पर हालांकि 24 घंटे वीडीसाइड का ही स्प्रे किया जाता है, पेस्टीसाइड के छिड़काव यहां पर तेला इत्यादि के लिए ही किए जाते हैं।
 फाइव एलीमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर ने शुक्रवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि चिडि़या के बच्चे की खुराक हमने छीन ली है। फसल पर लगने वाली सुंडियां अब मर गई हैं। दिलचस्प है कि एक चिडि़या अपने चूजे को उड़ना सीखने तक सिर्फ सीजनल फसलों के पत्तों पर लगने वाली नरम किंतु हाई प्रोटीन सुंडी ही खिलाती है और एक घोसले में चिडि़या के बच्चे के लिए लाई जाने वाली सुंडियों की एक दिन में संख्या पांच सौ तक हो सकती है। ऐसे में राज्य में पहले गौरेया के बच्चे की खुराक गायब हुई अब गौरेया की पूरी नस्ल खत्म हो चुकी है। अब यह चिडि़या राजस्थान और मध्यप्रदेश के केवल उन क्षेत्रों में मौजूद है जहां पेस्टीसाइड का स्प्रे न के बराबर होता है।
 पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेतों में मौजूद पानी के जिन स्रोतों से गौरेया या अन्य पक्षियों ने पानी पीना होता है उनका प्रयोग हम जहरीली दवाएं डालने के लिए करने लगे हैं। इस विषैले पानी को पीने से ही पक्षी मर रहे हैं। हालांकि खुराक की कमी की बात से वे इंकार करते हैं। वहीं, वन्य जीवों पर अत्याचार के खिलाफ काम करने वाले प्रदेश के वाइल्ड लाइफ वार्डन रवि आहलुवालिया भी स्वीकार करते हैं कि गौरेया गायब है, यह तो दिखाई दे रहा है पर क्यों गायब हुई इस बात की खबर उन्हें नहीं है और न ही इस दिशा में किए गए किसी शोध की जानकारी उनके पास है।

Saturday, 1 October 2011

प्रशासनिक बदहाली; जलने को तैयार पराली,paddy straw, pollution

भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश के करीब 70 लाख एकड़ में धान की पराली प्रशासन की आंख झपकते ही जलने को तैयार है। सरकार के पास मात्र दस फीसदी पराली का सदुपयोग करने की क्षमता है। बायोमास प्लांटों से पराली पूरी तरह से ठिकाने लगाने और बिजली बनाने का लक्ष्य पाने में समय लगना है, एक अनुमान के अनुसार एक एकड़ में से 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या होने वाला है।
कृषि विभाग की ओर से अब लगाए जा रहे अनुमानों के अनुसार राज्य में 196 लाख टन पराली जल ही जाएगी। इसके साथ कार्बनिक तत्व व धरती के नीचे लगभग हर खेत में चलने वाली प्राकृतिक खाद के लाखों कारखाने (मित्र कीट) भी राख हो जाएंगे।
वर्ष 1999 में अमेरिकी सेटेलाइट की ओर से ली गई तस्वीरों और दी गई चेतावनी कि पंजाब-हरियाणा के आसमान पर 'स्मोक' व 'फॉग' के मिश्रण से 'स्मोग' के बादल बन रहे हैं, के बाद आए सर्वेक्षण में आया है कि राज्य की 80 फीसदी धरती पर धान की खेती होती है। 26 लाख हेक्टेयर से ज्यादा भूमि पर पैदा हुई पराली में से 90 फीसदी को तब भी जला दिया जाता था। इससे 233 लाख टन कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं, बीते तीन दशकों में लुधियाना के दिन के औसत तापमान में 2.1 डिग्री सेल्सियस की गिरावट और रात के तापमान में छह फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पटियाला व बठिंडा की रातें हर साल 0.03 डिग्री सेल्सियस की रफ्तार से गर्म होती जा रही हैं।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त ने शनिवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि पराली के जलाए जाने की गति और मात्रा बदलती रहती है, पर दो साल पहले सेटेलाइट से उपलब्ध आंकड़ों में सामने आया कि 12 हजार 685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जलने वाली पराली से कार्बन गैसों की मात्रा 34.66 ग्राम प्रति किलो, नाइट्रोजन गैसें 2.63 ग्राम प्रति किलो, मीथेन सीएच4 व फास्फोरस के अवयवों पीएम 10 की मात्रा 3.99 ग्राम प्रति किलो और पोटाशियम के पीएम 2.5 ग्राम प्रति किलो होते हैं। बठिंडा के नेशनल फर्टीलाइजर लिमिटेड में पांच लाख टन यूरिया पैदा करने के लिए ढाई लाख टन नाईट्रोजन के साथ काफी मात्रा में ऊर्जा व पानी का प्रयोग होता है। जबकि हम पराली जलाकर 38.5 लाख टन आर्गेनिक कार्बन, दो हजार टन फास्फोरस और 34 हजार टन पोटाशियम जला देते हैं।
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बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह : पीएयू
पटियाला : पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी(पीएयू) के अनुसार पराली के जलाए जाने से पर्यावरण के नुकसान के अलावा धरती के बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह हो रहे हैं। एक टन पराली के जलाने से छह किलो नाइट्रोजन, एक किलो फास्फोरस और 11 किलो पोटाश भी जल जाती है। डेढ़ लाख टन पराली जलाने पर दो सौ करोड़ रुपये के न्यूट्रिएंटस हर साल जल रहे हैं।

अब न चांदी चंगी , न सोना खरा, business, gold, silver, trading


भूपेश चट्ठा, पटियाला : कहते हैं कि सोना कभी सस्ता नहीं होता, लेकिन यह कभी महंगा भी नहीं लगता। जब कभी जरूरत होती है तो चाहे जो दाम हों, इसकी खरीदारी जरूर की जाती है। दाम के मामले में ये हमेशा ऊपर की ओर ही रुख करता है, हालांकि इसके दाम कभी-कभार एक स्तर पर टिककर महंगाई कम होने का अहसास जरूर करवाते हैं, लेकिन इन दिनों में सोने-चांदी की अंगड़ाइयों से सर्राफा कारोबारी बुरी तरह त्रस्त हो चुके हैं।

सोने-चांदी के दामों में आ रहे उतार चढ़ाव पर पटियाला स्वर्णकार एसोसिएशन के प्रधान सतपाल वर्मा कहते हैं कि ये किसी भी तरह से स्वर्णकारों के हित में नहीं है। ग्राहक को दाम कोई और बताए जाते हैं तो खरीद किसी और दाम पर होती है। ऐसे में सौदा हमेशा खरा नहीं रहता। उतार-चढ़ाव को वह माफिया के हत्थे चढ़ने और सट्टेबाजी के साथ जोड़ते हैं। वह कहते हैं कि संकट एक दो देशों में होता है पर दाम सारी दुनिया को झेलना पड़ता है।
श्राद्ध के दिनों में खरीदारी करने के सवाल पर सतपाल वर्मा कहते हैं कि सोमवार को चांदी के दाम कम हुए तो तीन लोगों को तो वे जानते हैं, जो 15-15 किलो चांदी खरीदना चाहते थे, लेकिन फिजीकल चांदी बाजार में मौजूद ही नहीं थी।
वहीं ब्रोकर आशीष गोयल कहते हैं कि डेरीवेटिव सेगमेंट में कुछ भी हो सकता है। इसमें रिस्क खासा रहता है। एक-दो लाट में कमाई तो एक-दो लाट में नुकसान जारी है। आजकल आए कुछ साफ्टवेयर भी वस्तु को कभी खरीदने तो कभी बेचने की सलाह देते हैं। जबकि चीज मौजूद नहीं होती। डालर के दामों में रुपये की तुलना में हुई बढ़ोतरी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं।
ट्रेडिंग में भाग लेने वाले गुरजीत वालिया कहते हैं कि श्राद्ध के बाद नवरात्र-त्यौहारों व विवाह सीजन से फिजीकल गोल्ड-सिल्वर में खरीदारी तेज हो जाएगी। इससे कुछ स्थायित्व जरूर आएगा, लेकिन बाकी उतार-चढ़ाव जारी रहेंगे। एक दिन पहले सोना 15 सौ रुपये गिरा है तो आज हजार रुपये चढ़ा भी है। संभव है कि अगले साल मार्च तक सोना 32 हजार के पार हो। ऐसे में सोना कभी महंगा नहीं होता जब मिले, ले लेना चाहिए।