भूपेश चट्ठा, पटियाला
जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां हर साल नए नलकूप खोदने पड़ते हैं, पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है। क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। घग्गर नदी में कभी मछली पकडऩे के ठेके होते थे आज जल जीवन तो दूर कई पक्षियों की किस्में ही अब दिखाई देनी बंद हो गई। हालात अब इस कदर बदतर हो चुके हैं कि नदी किनारे लगे नलकूपों का पानी प्रदूषित हो चुका है और गांव व आसपास बसे डेरों के लोगों ने इससे तौबा कर ली है।
ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है। पंजाब हरियाणा सीमा पर किसान पीने के पानी के तौर पर इसका पानी इस्तेमाल नहीं करते हैं।
पटियाला चीका रोड़ पर पंजाब की ओर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि धर्मेहड़ी पुलों के पास क्षेत्र में घग्गर किनारे की पहली दो मोटरों का पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता और इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा पर कोशिश होती है कि सब्जी को ना लगाया जाए। वहीं गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का अहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।
वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग़ से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये उपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग ना करें। डा. चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी 240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है। हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।