भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश के करीब 70 लाख एकड़ में धान की पराली प्रशासन की आंख झपकते ही जलने को तैयार है। सरकार के पास मात्र दस फीसदी पराली का सदुपयोग करने की क्षमता है। बायोमास प्लांटों से पराली पूरी तरह से ठिकाने लगाने और बिजली बनाने का लक्ष्य पाने में समय लगना है, एक अनुमान के अनुसार एक एकड़ में से 25 से 30 क्विंटल पराली निकलती है। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि क्या होने वाला है।
कृषि विभाग की ओर से अब लगाए जा रहे अनुमानों के अनुसार राज्य में 196 लाख टन पराली जल ही जाएगी। इसके साथ कार्बनिक तत्व व धरती के नीचे लगभग हर खेत में चलने वाली प्राकृतिक खाद के लाखों कारखाने (मित्र कीट) भी राख हो जाएंगे।
वर्ष 1999 में अमेरिकी सेटेलाइट की ओर से ली गई तस्वीरों और दी गई चेतावनी कि पंजाब-हरियाणा के आसमान पर 'स्मोक' व 'फॉग' के मिश्रण से 'स्मोग' के बादल बन रहे हैं, के बाद आए सर्वेक्षण में आया है कि राज्य की 80 फीसदी धरती पर धान की खेती होती है। 26 लाख हेक्टेयर से ज्यादा भूमि पर पैदा हुई पराली में से 90 फीसदी को तब भी जला दिया जाता था। इससे 233 लाख टन कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं, बीते तीन दशकों में लुधियाना के दिन के औसत तापमान में 2.1 डिग्री सेल्सियस की गिरावट और रात के तापमान में छह फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पटियाला व बठिंडा की रातें हर साल 0.03 डिग्री सेल्सियस की रफ्तार से गर्म होती जा रही हैं।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त ने शनिवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि पराली के जलाए जाने की गति और मात्रा बदलती रहती है, पर दो साल पहले सेटेलाइट से उपलब्ध आंकड़ों में सामने आया कि 12 हजार 685 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जलने वाली पराली से कार्बन गैसों की मात्रा 34.66 ग्राम प्रति किलो, नाइट्रोजन गैसें 2.63 ग्राम प्रति किलो, मीथेन सीएच4 व फास्फोरस के अवयवों पीएम 10 की मात्रा 3.99 ग्राम प्रति किलो और पोटाशियम के पीएम 2.5 ग्राम प्रति किलो होते हैं। बठिंडा के नेशनल फर्टीलाइजर लिमिटेड में पांच लाख टन यूरिया पैदा करने के लिए ढाई लाख टन नाईट्रोजन के साथ काफी मात्रा में ऊर्जा व पानी का प्रयोग होता है। जबकि हम पराली जलाकर 38.5 लाख टन आर्गेनिक कार्बन, दो हजार टन फास्फोरस और 34 हजार टन पोटाशियम जला देते हैं।
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बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह : पीएयू
पटियाला : पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी(पीएयू) के अनुसार पराली के जलाए जाने से पर्यावरण के नुकसान के अलावा धरती के बेहद जरूरी न्यूट्रिएंटस भी तबाह हो रहे हैं। एक टन पराली के जलाने से छह किलो नाइट्रोजन, एक किलो फास्फोरस और 11 किलो पोटाश भी जल जाती है। डेढ़ लाख टन पराली जलाने पर दो सौ करोड़ रुपये के न्यूट्रिएंटस हर साल जल रहे हैं।
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