Saturday, 8 October 2011

चिडि़यों का चहचहना .. गया वो जमाना, pesticide, birds,


 कपास पर 27-28, धान 7-8, गेहूं पर तीन बार पेस्टीसाइड का छिड़काव 
 पहले खुराक घटी, फिर बच्चे मरे और फिर चिडि़या ही विलुप्त
भूपेश चट्ठा, पटियाला पीपल की ऊंची डाली पर, बैठी चिडि़या गाती है, सुन लो वो अपनी बोली में, क्या संदेश सुनाती है..? प्रदेश में कविता की ये पंक्तियां अब बस किताबों में ही सीमित रह गईं हैं क्योंकि हमारे सामने से देखते ही देखते गौरेया (देसी चिडि़या) गायब हो गई है और हमें खबर ही नहीं हुई। 
जी हां! हम थार के रेगिस्तान की बात नहीं कर रहे जहां पानी और खुराक की कमी हो। हम उस पंजाब की बात कर रहे हैं जहां सूनी धरती बिलकुल नहीं है। हर तरफ साल भर फसलें लहरा रही होती हैं, पानी भी भरपूर है, फिर भी नन्ही गौरेया के बच्चे भूख से बिलख कर मरने लगे..बच्चे होने कम हुए..एक बार बच्चों की खुराक गायब हुई तो देसी अथवा जंगली कही जाने वाली गौरेया गायब हो गई।
 राज्य के खेतों में कपास पर 27-28 बार, धान की फसल पर कम से कम सात से आठ बार पेस्टीसाइड का स्प्रे किया जाता है। जहरीली दवाओं के ये वो छिड़काव हैं जो बिना किसी तरह की बीमारी के ही किए जाते हैं। गेहूं की फसलों पर हालांकि 24 घंटे वीडीसाइड का ही स्प्रे किया जाता है, पेस्टीसाइड के छिड़काव यहां पर तेला इत्यादि के लिए ही किए जाते हैं।
 फाइव एलीमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर ने शुक्रवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि चिडि़या के बच्चे की खुराक हमने छीन ली है। फसल पर लगने वाली सुंडियां अब मर गई हैं। दिलचस्प है कि एक चिडि़या अपने चूजे को उड़ना सीखने तक सिर्फ सीजनल फसलों के पत्तों पर लगने वाली नरम किंतु हाई प्रोटीन सुंडी ही खिलाती है और एक घोसले में चिडि़या के बच्चे के लिए लाई जाने वाली सुंडियों की एक दिन में संख्या पांच सौ तक हो सकती है। ऐसे में राज्य में पहले गौरेया के बच्चे की खुराक गायब हुई अब गौरेया की पूरी नस्ल खत्म हो चुकी है। अब यह चिडि़या राजस्थान और मध्यप्रदेश के केवल उन क्षेत्रों में मौजूद है जहां पेस्टीसाइड का स्प्रे न के बराबर होता है।
 पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेतों में मौजूद पानी के जिन स्रोतों से गौरेया या अन्य पक्षियों ने पानी पीना होता है उनका प्रयोग हम जहरीली दवाएं डालने के लिए करने लगे हैं। इस विषैले पानी को पीने से ही पक्षी मर रहे हैं। हालांकि खुराक की कमी की बात से वे इंकार करते हैं। वहीं, वन्य जीवों पर अत्याचार के खिलाफ काम करने वाले प्रदेश के वाइल्ड लाइफ वार्डन रवि आहलुवालिया भी स्वीकार करते हैं कि गौरेया गायब है, यह तो दिखाई दे रहा है पर क्यों गायब हुई इस बात की खबर उन्हें नहीं है और न ही इस दिशा में किए गए किसी शोध की जानकारी उनके पास है।

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