-पहले एलर्जी फिर सांस व पेट की बीमारी, इसके बाद गुर्दे व जिगर पर असर
-तेल-खोया सिंथेटिक, जो मिठाई इन दोनों से दूर वहां रसायनिक रंग
भूपेश चट्ठा, पटियाला
त्यौहारों का सीजन शुरु होने को है और इसके साथ ही जेहन में रंग बिरंगी मिठाईयां घूमने लगती है, रंगों के प्राकृतिक स्रोत लुप्त होने के कागार पर हैं। रंगीन चट्टाने गायब हो चुकी हैं और अब रंग के दूसरे सबसे बड़े प्राकृतिक स्रोत फूलों से रंग बनाने होने वाली खेती नाममात्र रह गई है। ऐसे में मिठाईयों में डाले जाने वाले कृत्रिम रंग रसायनों से भरे हैं। इन रसायनों ने सबसे लोकप्रिय व शुभ समझी जाने वाली मिठाई 'लड्डूÓ को भी इतना खतरनाक बना रहे हैं कि इससे इंसान की प्रजनन शक्ति प्रभावित हो सकती है।
कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ डा. अमर सिंह आजाद बताते हैं कि खाने में रसायनिक रंगों से सबसे पहले एलर्जी होती है फिर सांस व पेट की बीमारी, इसके बाद गुर्दे व जिगर पर असर होता है। सिलसिला लगातार और ज्यादा चले तो और भी खतरनाक होता है, आजकल जिन रसायनिक रंगों का प्रयोग हो रहा है, उनसे इंसान की प्रजनन शक्ति प्रभावित हो रही है। ऐसा नहीं है कि इंसान 'इंपोटेंटÓ हो रहा है लेकिन इतना जरूर है कि महिलाओं में बच्चे पैदा करने की क्षमता और पुरुषों में सेक्स करने की इच्छा में कमी आ रही है, लेकिन इसके लिए रसायनिक रंगों के साथ फसल में रसायनिक खाद व स्प्रे और पशुओं को दिया जाने वाला फीड भी बराबर का जिम्मेदार है।
वहीं फार्मास्यूटिक्ल स्ट्रीम में क्लीनिकल सर्जरी के विशेषज्ञ व सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला बताते हैं कि इन दिनों में रेस्पीरेटरी बीमारियों का सबसे ज्यादा रिस्क रहता है। जिन मिठाईयों को तला नहीं जाता वहां खोया है, और जो इन दोनों से दूर हैं वहां रंग का प्रयोग होता है। एडीबल ऑयल और खोये में सिंथेटिक तत्व ज्यादा हैं जबकि प्राकृतिक रंगों के स्थान पर केमिकल रह गए है। शेष बचे पेठे की उम्र बढ़ाने के लिए भी केमिकल मिलने लग गए हैं। चीनी मंहगी है ऐसे में कैंसर का सबसे ज्यादा रिस्क रखने वाली स्क्रीन मिला दी जाती है।
केवल बुश के ही अनुमति प्राप्त रंगों का हो प्रयोग
जिला स्वास्थ्य अधिकारी डा. दलजीत सिंह बताते हैं कि सस्ते के चक्कर में घटिया रंगों का प्रयोग खतरनाक साबित हो सकता है। केवल बुश कंपनी के ही अनुमति प्राप्त रंगों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। अन्य किसी प्रकार के रंग का प्रयोग करने पर कार्रवाई तय है।
क्या है सजा का प्रावधान
फूड सेफ्टी स्टेंडर्ड एक्ट 2006 के अधीन कार्रवाई की जाती है। दिलचस्प है कि रसायनिक रंग पकड़े जाने पर प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर एक रूपये से पांच लाख रूपये का जुर्माना किया जा सकता है। तीन चरणों में होने वाली कार्रवाई में सेहत विभाग के अलावा कुछ केस एडीशनल डिप्टी कमिश्नर के पास भेजे जाते हैं और मामला ज्यादा गंभीर होने पर न्यायालय से सजा का प्रावधान भी है।
खपत एक अरब के पार
खान-पानी के तौर तरीकों व ज्यादा वजन होने की वजह से शूगर व हार्ट के मरीजों की संख्या भी देश में सबसे अधिक है, ऐसे में बेसन से बने लड्डू को खाने के लिए शूगर व हार्ट के मरीज इसे अन्य मिठाईयों की तुलना में कम नुकसान दायक बताते हैं। वहीं पंजाब में बहने वाले छठे दरिया को पीने वालों का औसत राष्ट्रीय औसत दो बोतल से चार गुना ज्यादा है। यानी साल में राज्य में ढ़ाई करोड़ लोगों के लिए 20 करोड़ बोतल। अगर तीज त्यौहार, विवाह, भोग, उद्घाटन के किसी कार्यक्रम में महीने में दो बार भी लड्डू खाया जाए, तो इसकी खपत के एक मोटे अनुमान अनुसार एक अरब के पार है।
पौराणिक महत्व
लड्डू भगवान श्री गणेश जी को खासा प्रिय था, आज भी किसी नए काम की शुरुआत होती है तो श्री गणेश को ही सबसे पहले याद किया जाता है और उन्हें लड्डू का ही भोग लगाया जाता है। वे पौराणिक कथाओं में भी इसे पसंद करते थे। इतिहास में लड्डू पहली बार कब बना और कब खाया गया इसका स्टीक ज्ञान गूगल के युग में संभावित रूप से कहीं नहीं है लेकिन इतना तय है कि इसकी उम्र श्री गणेश जी से ज्यादा ही रही है।