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Monday, 29 October 2012

लड्डू खाया तो हो जाओगे नपुंसक!


-पहले एलर्जी फिर सांस व पेट की बीमारी, इसके बाद गुर्दे व जिगर पर असर
-तेल-खोया सिंथेटिक, जो मिठाई इन दोनों से दूर वहां रसायनिक रंग
भूपेश चट्ठा, पटियाला
त्यौहारों का सीजन शुरु होने को है और इसके साथ ही जेहन में रंग बिरंगी मिठाईयां घूमने लगती है, रंगों के प्राकृतिक स्रोत लुप्त होने के कागार पर हैं। रंगीन चट्टाने गायब हो चुकी हैं और अब रंग के दूसरे सबसे बड़े प्राकृतिक स्रोत फूलों से रंग बनाने होने वाली खेती नाममात्र रह गई है। ऐसे में मिठाईयों में डाले जाने वाले कृत्रिम रंग रसायनों से भरे हैं। इन रसायनों ने सबसे लोकप्रिय व शुभ समझी जाने वाली मिठाई 'लड्डूÓ को भी इतना खतरनाक बना रहे हैं कि इससे इंसान की प्रजनन शक्ति प्रभावित हो सकती है।
कम्यूनिटी मेडिसन के विशेषज्ञ डा. अमर सिंह आजाद बताते हैं कि खाने में रसायनिक रंगों से सबसे पहले एलर्जी होती है फिर सांस व पेट की बीमारी, इसके बाद गुर्दे व जिगर पर असर होता है। सिलसिला लगातार और ज्यादा चले तो और भी खतरनाक होता है, आजकल जिन रसायनिक रंगों का प्रयोग हो रहा है, उनसे इंसान की प्रजनन शक्ति प्रभावित हो रही है। ऐसा नहीं है कि इंसान 'इंपोटेंटÓ हो रहा है लेकिन इतना जरूर है कि महिलाओं में बच्चे पैदा करने की क्षमता और पुरुषों में सेक्स करने की इच्छा में कमी आ रही है, लेकिन इसके लिए रसायनिक रंगों के साथ फसल में रसायनिक खाद व स्प्रे और पशुओं को दिया जाने वाला फीड भी बराबर का जिम्मेदार है।
 वहीं फार्मास्यूटिक्ल स्ट्रीम में क्लीनिकल सर्जरी के विशेषज्ञ व सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला बताते हैं कि इन दिनों में रेस्पीरेटरी बीमारियों का सबसे ज्यादा रिस्क रहता है। जिन मिठाईयों को तला नहीं जाता वहां खोया है, और जो इन दोनों से दूर हैं वहां रंग का प्रयोग होता है। एडीबल ऑयल और खोये में सिंथेटिक तत्व ज्यादा हैं जबकि प्राकृतिक रंगों के स्थान पर केमिकल रह गए है। शेष बचे पेठे की उम्र बढ़ाने के लिए भी केमिकल मिलने लग गए हैं। चीनी मंहगी है ऐसे में कैंसर का सबसे ज्यादा रिस्क रखने वाली स्क्रीन मिला दी जाती है।


केवल बुश के ही अनुमति प्राप्त रंगों का हो प्रयोग

जिला स्वास्थ्य अधिकारी डा. दलजीत सिंह बताते हैं कि सस्ते के चक्कर में घटिया रंगों का प्रयोग खतरनाक साबित हो सकता है। केवल बुश कंपनी के ही अनुमति प्राप्त रंगों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। अन्य किसी प्रकार के रंग का प्रयोग करने पर कार्रवाई तय है।

क्या है सजा का प्रावधान

फूड सेफ्टी स्टेंडर्ड एक्ट 2006 के अधीन कार्रवाई की जाती है। दिलचस्प है कि रसायनिक रंग पकड़े जाने पर प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर एक रूपये से पांच लाख रूपये का जुर्माना किया जा सकता है। तीन चरणों में होने वाली कार्रवाई में सेहत विभाग के अलावा कुछ केस एडीशनल डिप्टी कमिश्नर के पास भेजे जाते हैं और मामला ज्यादा गंभीर होने पर न्यायालय से सजा का प्रावधान भी है।


खपत एक अरब के पार

 खान-पानी के तौर तरीकों व ज्यादा वजन होने की वजह से शूगर व हार्ट के मरीजों की संख्या भी देश में सबसे अधिक है, ऐसे में बेसन से बने लड्डू को खाने के लिए शूगर व हार्ट के मरीज इसे अन्य मिठाईयों की तुलना में कम नुकसान दायक बताते हैं। वहीं पंजाब में बहने वाले छठे दरिया को पीने वालों का औसत राष्ट्रीय औसत दो बोतल से चार गुना ज्यादा है। यानी साल में राज्य में ढ़ाई करोड़ लोगों के लिए 20 करोड़ बोतल। अगर तीज त्यौहार, विवाह, भोग, उद्घाटन के किसी कार्यक्रम में महीने में दो बार भी लड्डू खाया जाए, तो इसकी खपत के एक मोटे अनुमान अनुसार एक अरब के पार है।

पौराणिक महत्व

लड्डू भगवान श्री गणेश जी को खासा प्रिय था, आज भी किसी नए काम की शुरुआत होती है तो श्री गणेश को ही सबसे पहले याद किया जाता है और उन्हें लड्डू का ही भोग लगाया जाता है। वे पौराणिक कथाओं में भी इसे पसंद करते थे। इतिहास में लड्डू पहली बार कब बना और कब खाया गया इसका स्टीक ज्ञान गूगल के युग में संभावित रूप से कहीं नहीं है लेकिन इतना तय है कि इसकी उम्र श्री गणेश जी से ज्यादा ही रही है।

Saturday, 24 March 2012

जब देसी तरीके हैं तो विदेशी क्यों अपनाएं, organic crop; inorganic storage


जागरण एक्सक्लूसिव
नीम, हींग व मिर्च से स्टोरेज, राख और सरसों से बीज का ट्रीटमेंट
-एफसीआई धरती पर, गेहूं की बोरी में, बोरियों के उपर, हवा में एयर चार्जिंग के लिए मैलाथीन महीने में दो बार, डीडीवीपी 21 दिनों पर, डेल्टा मैथलीन तीन महीने पर और सल्फास सदा के लिए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
नीम के पत्तों से लेकर मिर्च, हींग का प्रयोग गेहूं को कीटों से बचाने के बेहद कारगर देसी तरीके परंपरागत ज्ञान में मौजूद हैं लेकिन जल्दबाजी के आलम में इंसान अपनी ही सेहत से खिलवाड़ कर रहा है। दिलचस्प है कि आर्गेनिक तरीके से उगाई गई फसल को भी रसायनों में 'संभालनेÓ की कोशिश में लगा है।
उपज विशेष रूप से गेहूं की आने वाली फसल के भंडारण को लेकर जहां केंद्र व पंजाब में आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं, वहीं आम पंजाबी अब एक बार फिर देसी तरीकों की ओर खिसकने लगा है। इसमें थोड़े रसायनिक तरीकों में माचिस की डिब्बी का प्रयोग सल्फास की जगह करने का चलन बढ़ रहा है। घरों में होने वाली खुदकुशी एक कारण है तो सेहत का भी ख्याल किया जाने लगा है।
दिलचस्प है कि किसान भी बीज के लिए अलग से नीम के पत्तों व डंडियों को जला कर झाड़ा लगा गेहूं को अगले साल के लिए ट्रीट कर रखने लगा है, जिससे ना केवल खराब होने से बचा रहता है अपितु गुणवत्ता भी बनी रहे।
खेती विरासत मिशन के डायरेक्टर उमेंद्र दत्त बताते हैं कि मलमल के कपड़े की तीन-चार तह के बीच हींग रख कर गेहूं में डाल देते हैं तो कीड़े इसकी सुगंध से पास नहीं फटकते और किसी तरह का नुकसान भी नहीं है। इसी प्रकार अगर बीज संजो कर रखने हैं तो आप इन्हें सरसों अथवा कड़वे तेल में मल कर राख में रखते हैं तो सालों साल किसी तरह की समस्या नहीं है, ये लॉकर की तरह काम करता है।
वहीं पंजाब कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बीज डा. बीएस सोहल बताते हैं कि लोग सल्फास का प्रयोग भी अनावश्यक रूप से करते हैं, गेहूं आने के साथ ही रसायन डाल देते हैं जबकि किसी तरह का कीट इन दिनों के ज्यादा तापमान में नहीं  लगता। बरसात के दिनों की नमी ही कीटों को बुलावा देती है। ऐसे में पूरी तरह सुखा कर गेहूं को स्टोर किया जाए और टूटे हुए दाने अलग कर लिए जाएं तो हल्के देसी तरीके बेहद कारगर हैं और गुणवत्ता बनी रहती है। हींग के अलावा मिर्च व नीम के पत्ते डालना शामिल है।
दूसरी ओर एफसीआई के गोदामों में रखी गई बोरियों में दवा डालने के अलावा इसकी जमीन व हवा को भी 'सुरक्षितÓ रखने के चक्कर में पूरा वातावरण जहरीला किया जाता है। एफसीआई के वीके बत्ता बताते हैं कि बोरी रखते ही इस पर डेल्टा मैथलीन का स्प्रे कर दिया जाता है। हर तीन महीने पर यह प्रक्रिया दोहराई जाती है। इसके तुरंत बाद खाली जगह में डीडीवीपी का छिड़काव होता है, एयर चार्जिंग के नाम पर किसी पतंगे को भी ना फटकने देने वाला यह स्प्रे 21 दिनों के अंतराल पर रिपीट होता है। हवा में उड़ती 'भुंडीÓ, 'भमक्कड़Ó इस वायु के संपर्क में आते ही जमीन पर ऐसे गिरते हैं मानों किसी ने एंटी एयरक्राफ्ट गन से गिराया हो।
इन सबके बावजूद यदि कीड़ा लगने की संभावना होने पर एल्मोनियम फास्फेट का प्रयोग होता है। ये वो गेहूं की बदनाम गोली है जिसे सल्फास कहते हैं और पंजाब में खुदकुशी करने वालों में प्रचलित रही है। बात यहीं समाप्त नहीं धरती के नीचे से कार्रवाई करने वाले दीमक अथवा दाने में पैदा होने वाली 'सुसरीÓ के लिए मैलाथीन का स्प्रे महीने में दो बार जरूरी है, तभी गेहूं को बचाया जा सकता है कीट पतंगों और कीड़े मकौड़ों की जान लेने वाले ये रसायन इंसानों के लिए भी कम घातक नहीं हैं।
  कम्यूनिटी मेडिसीन में एमडी और एपिडमोलोजिस्ट डा. अमर सिंह आजाद कहते हैं कि इन रसायनों से इंसान की बीमारी से लडऩे की क्षमता ही खत्म हो जाती है। जुकाम से लेकर कैंसर तक की हर बीमारी की पकड़ में ऐसा व्यक्ति जल्दी आता है। प्राकृति से हमें तोहफे में मिले इम्यून सिस्टम में कमजोरी आती जाती है। जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण हो जाती है।

Wednesday, 13 April 2011

खाद की भी हो खेती तो तंदरुस्त रहे धरती organic, fertilizer, agriculture, trends, tradition,



-खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए तैयार किया जा रहा नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया
-हरी जैविक खाद पैदाकर मंहगी रसायनिक खादों से किनारा करने की ओर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  शताब्दियों के अपने अनुभव भरे ज्ञान को अमेरिकियों के पास चंद रसायनों के लिए बेचने वाला पंजाब का किसान अब एक बार फिर जैविक खेती की ओर लौटने लगा है। उपज कम न हो इसके लिए आधुनिक मशीनरी का प्रयोग तो किया जा रहा है, लेकिन रसायनों की खपत कम कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति दुरूस्त करने को खेत मे हरी खाद उगाई जा रही है। ऐसे में खाद की भी हो खेती तो धरती का तंदरुस्त रहना तय है।

 हरित क्रांति आने से पहले भी पंजाब हरियाणा का किसान 'चीझणÓ अथवा 'ढांचाÓ नाम से ऐसे पौधों की बिजाई साल से एक बार किया करता था। मुख्य फसल की बिजाई अथवा रोपाई से पहले 28-30 दिनों के लिए इन पौधों के बीजों का छिड़काव खेतों मे कर दिया जाता है और मुख्य फसल उगाने से पहले इन पौधों को खेत में बाहकर नष्ट कर दिया जाता है। पौधों के अवशेष मिट्टी मे मिलकर खाद का कार्य करते है।
घग्गर नदी की बेल्ट पर अब 60 दिनों तक पकने वाली धान की किस्म नही उगाए जाने के चलते किसान का ध्यान पानी व पर्यावरण बचाने की ओर लगा है। वहीं उपज में आ रहे ठहराव के चलते किसान अब लागत मूल्य कम कर मार्जन बढ़ाना चाहता है।

  धर्महेड़ी गांव के नंबरदार राजवंत सिंह बताते है कि 10-15 किलो बीज प्रति एकड़ में एक बार बहाई के बाद छिड़क दिया जाता है। पानी देकर फिर दो तीन दिन बाद पानी लगाया जाता है। फिर सप्ताह में एक दिन पानी लगाया जाता है। ऐसे ही 28-30 दिनों मे ढाई तीन फुट का चीझण का पौधा उग जाता है। खेतों मे अप्रैल से जून मध्य तक करने के लिए कुछ नही होता। ऐसे में मिट्टी की ताकत बढ़ाने वाले ये उपाय साल मे एक बार आराम से किये जा सकते है। जीरी रोपाई करने से पहले इन पौधों को बहा दिया जाता है फिर पानी लगा, कद्दू कर रोपाई हो जाती है। राजवंत सिंह अपना अनुभव बताते है कि 100 रूपये प्रति एकड़ से अधिक का खर्च इस कार्य में नही आता।

 वही गुरप्रीत सिंह कहते है कि हरी खाद की खेती के बाद डीएपी जैसी रसायनिक खाद के कम से कम डाले जाने वाले एक थैले के खर्च की बचत हो जाती है। जहां ढ़ाई तीन थैले यूरिया के डालने होते है वहीं यह दो थैले तक  सिमट जाता है। मिïट्टी को साल भर पूरी ताकत रहती है। हरी खाद की खेती से गेहूं की उपज भी अच्छी होती है। पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह बताते है कि अब ट्रैक्टर आम होने से चीझण की बिजाई आसानी से हो सकती है। याद रहे कि चीझण की खेती के लिए गहराई पर ट्रैक्टर चलाना होता है। भारी साधन आज की कृषि मशीनरी में मौजूद है। ऐसे में इन जैविक तकनीकों का लाभ लेना चाहिये। इससे पर्यावरण को सुधारा जा सकता है। खर्च कम किया जा सकता है और फसल भी अच्छी होती है।

 कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते है कि सरकार भी हर जिले में चीझण के बीज मुफ्त बांटती है। पूर्व में धान की 60 दिनों में पकने वाली सट्ठी  किस्म न लगाने वाले किसानों को यह बीज दिए जाते थे अब सभी के लिए है। वे बताते है कि इस पौधे से मिïïट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। पानी की  पकड़ बढ़ाने की क्षमता भी बढ़ती है। इस के अलावा पौधे की जड़ मे बनी गांठें नाईट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया पैदा करती है। यह मिट््टी की ढांचा मजबूत कर देता है जिससे रसायनिक खाद की आवश्यक्ता काफी कम हो जाती है।

Saturday, 13 November 2010

छत पर किचन गार्डन, सब्जी हुई पेस्टीसाइड मुक्त

गमले में गार्डन:
-जहरीले रसायनों से दूर आर्गेनिक की चाहत से चलन बढ़ा
-एक गमला महीने मे दो बार सब्जी मंडी जाने से छुटकारा दिलाएगा, पूरी तरह से यूरो फाइव स्टैंर्डड की सब्जी
-शुरू में पोट्स में लगाने और खुद काम करने की सलाह
भूपेश चट्ठा, पटियाला
'पहले गार्डन में गमले हुआ करते थे, अब गमलों में ही गार्डन सिमट गया है।' बहुमंजिला फ्लैट के कमरे में रखे गमलों में पौधे दिखाता यह विज्ञापन मैट्रो शहरों का लाइफ स्टाइल दर्शाता है। पंजाब में कुछ साल पहले तो ऐसा सोचने वाले को ही पागल समझा जाता था। कृषि प्रधान राज्य में कम हो रहे कृषि क्षेत्र और आर्गेनिक सब्जियों के बढ़ रहे चलन ने अब छतों पर ही किचन गार्डन की शुरुआत करवा दी है।
यदि 600 वर्गफीट में विभिन्न किस्म की छह सब्जियों का प्रति सप्ताह दस से 15 किलो उत्पादन होता हो तो 1200 वर्ग फीट का गार्डन पांच लोगों के परिवार के लिए काफी है। अर्बन फार्मिग के विशेषज्ञ डा. बीएन विश्वनाथ कहते हैं कि रसायन मुक्त सब्जी, शुद्ध हवा के अलावा आपकी रसोई के कचरे को भी ठिकाने लगाएगी। सालभर के लिए आप आलू से बैंगन और टमाटर से नींबू तक का प्रबंध कर सकते है। उनका कहना है कि पहले महिलाएं और रिटायर्ड लोग ही बागवानी का काम करते थे लेकिन अब प्रोफेशनल लोग ज्यादा करने लगे है।
फूलों के बीजों के निर्यातक और सब्जियों के उत्पादन करवा डाईवर्सीफिकेशन की दिशा में काम और लाभदायक व्यापार चला रहे प्लांट्समैन सीड्स के एमडी अब्दुल वाहिद सलाह देते है कि बर्मी कंपोस्ट और केंचुए की खाद को मिट्टी में मिलाकर आप शुरुआत में एक फीट गहरे, डेढ़ फीट चौड़े और तीन फीट लंबे पॉट्स के साथ मेथी, पालक, धनिया, पोदीना, लहसुन, प्याज, हरी मिर्च आदि पैदा कर सकते है। लेकिन माली पर निर्भरता आपका अनुभव खराब कर सकती है। यह पश्चिमी देशों की अवधारणा है, इसलिए आपको भी खुद ही काम करने पर सफलता मिलेगी। समय और धूप का ख्याल ठीक से रहे तो एक गमला आपको महीने में दो बार सब्जी मंडी जाने से छुटकारा दिला देगा वो भी पूरी तरह से यूरो फाइव स्टैंडर्ड की सब्जी देगा।
कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते है कि प्रदेश के लगभग हर शहर में किचन गार्डन का चलन बढ़ा है, लोग बाथरूम के टब से लेकर बैटरी के खोल तक का प्रयोग कर रहे हैं। इसमें ध्यान रखने योग्य बात यही है कि बेल वाली सब्जी से परहेज करें इसे संभालने में दिक्कत आ सकती है। खर्च के नाम पर वे कहते हैं कि बीज के अलावा आपकी देखभाल ही इस पर आने वाला खर्च है और यह 15 मिनट से ज्यादा नहीं है बशर्ते शौक हो।
रसोई की वेस्ट को खाद के रूप में इस्तेमाल करने वाले पावरकॉम में सुपरिंटेंडेंट श्रीकांत शर्मा कहते हैं कि सब्जियों के जायके में ही तबदीली आ गई है। अपने बाग की गाजर मूली को खाकर उन्हें अपने गांव के खेत की याद आ जाती है।

Thursday, 21 October 2010

धरती के भगवान, बर्बादी से अंजान, बठिंडा में युवक के लिए धुआं बना यमदूत

भूपेश चट्ठा, पटियाला किसानों ने गेहूं की जल्द बिजाई के लिए इंसानों के साथ-साथ मित्र कीटों की हत्या शुरू कर दी है। किसान द्वारा पराली जलाए जाने से फैले धुएं से जहां वीरवार को बठिंडा में हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई है वहीं इससे असंख्य मित्र कीट भी मर रहे हैं। कृषि विभाग पराली के प्रति किसानों को जागरुक करने के लिए हर साल कई कार्यक्रम आयोजित करता है लेकिन अभी तक किसानों ने पराली जलाने का रास्ता नहीं छोड़ा। किसानों द्वारा जलाई गई पराली के कारण मित्र कीट, एंटी फीड, मिली फीड, नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया और केंचुए आग में जल जाते हैं। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है और हर साल पैदावार पर असर पड़ता है। सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के प्रवक्ता डा. पीपी खोसला का कहना है कि नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया जमीन के दो इंच नीचे चलने वाली प्राकृतिक खाद फैक्टरी है जो कचरे को खाद में बदल देते हैं। उन्होंने कहा कि जमीन में दीमक का होना भी जरूरी है क्योंकि पिछली फसल की जड़ें यदि खत्म नहीं होंगी तो वह बंजर हो सकती है। दीमक पुरानी फसलों के इसी कचरे को ठिकाने लगता है फाइव एलीमेंट्स एंड एजुकेशनल हेल्थ सोसायटी के चेयरमैन डा. जोगेंद्र टाइगर का कहना है कि किसानों को बार-बार जागरुक किए जाने के बावजूद उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा। यदि किसान विशेषज्ञों की राय पर अमल करें तो पैदावार के साथ-साथ पराली को बेच कर आर्थिक लाभ भी ले सकते हैं क्योंकि पराली का इस्तेमाल करने के लिए सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं। अब तो पराली से बिजली उत्पादन भी शुरू हो गया है। किसानों को चाहिए कि अपने पुराने परंपरागत तरीके एक बार याद करें। बुजुर्गो की बातें सुनें और उन पर अमल करें तो ये खेत इंडस्ट्री के रूप में उनको आय देगा। वे कहते हैं कि मंडी में फसल फेंक कर आने की बजाय बेचने की बात सोची जानी चाहिए। फिरोजपुर स्थित सिविल अस्पातल के एसएमओ डाक्टर बलदेव अरोड़ा के मुताबिक जलती पराली से निकलने वाले धुएं से जहां वातावरण दूषित होता है वहीं यह कई प्रकार की बीमारियां फैलाने में अहम भूमिका निभाता है
जानलेवा बनी पराली की आग
बठिंडा : जिले के गांव बंबीहा में किसान द्वारा धान की पराली को लगाई आग एक युवक के लिए काल बन गई। आग से निकलते धुएं के कारण सड़क पर आ रही बस और मोटरसाइकिल की टक्कर हो जाने से युवक की मौके पर ही मौत हो गई। जानकारी के अनुसार गांव बंबीहा के जगसीर सिंह का इकलौता लड़का सेवक सिंह गांव में लकड़ी के दरवाजे, खिड़की बनाता था। पड़ोस की एक महिला ने बुधवार शाम बताया कि उसका लड़का स्कूल से घर नहीं लौटा है। सेवक सिंह उसे ढूंढने अपनी मोटरसाइकिल से निकला। वह गांव से बाहर निकला ही था कि मुख्य सड़क पर धान के खेत में पराली को किसान ने आग लगाई हुई थी। इस वजह से पूरी सड़क धुएं से भरी थी। लिहाजा सेवक को सड़क पर सामने से आती बस नहीं दिखी और वह अपनी रफ्तार से सड़क पर वाहन चलाता गया। परिणामस्वरूप उसका वाहन तेज रफ्तार बस से टकरा गया और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बस ड्राइवर मौके से फरार हो गया। इसकी सूचना थाना संगत पुलिस को दी गई। पुलिस ने बस के ड्राइवर जसमेल सिंह के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। हादसे का कारण बने पराली को आग लगाने वाले किसान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। हालांकि जिला प्रशासन द्वारा पराली जलाने पर पाबंदी लगाई हुई है