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Thursday, 7 February 2013

दक्षिणी एशियाई खेती को एक और 'जुगाड़' देगा पटियाला


 -कोरिया से आए पैडी ट्रांसप्लांटर से करवाई स्प्रे, गुडाई, ट्राली लगा ढोया चारा
-मशीन से स्प्रे में दवा का सौ फीसद उपयोग किया, हाथ से स्प्रे में होता है एक तिहाई उपयोग
-बिना जुगाड़ के 10-12 लाख रूपये की मशीन साल में मात्र 15 दिन काम आती थी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
यूरोप, उत्तरी अमेरिका व आस्ट्रेलिया के खेतों में काम करने वाली करोड़ों रूपये की कंबाइन मशीन पर पटियाला, नाभा व भादसों के ट्रैक्टर मेकेनिकों के हाथ लगे तो कीमत चंद लाख रह गई और हर किसी की पहुंच में भी आ गई। शुरु में कृषि जुगाड़ ही जाने वाले ये यंत्र अब ब्रांड बन गए है। दक्षिणी एशियाई खेती को ठीक ऐसा ही एक  और 'जुगाड़Ó पटियाला आने वाले सीजन में देने जा रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि कंबाइन बनाने की शुरुआत जहां निजी क्षेत्र में निजी लाभ के लिए हुई पर नए जुगाड़ का प्रयास कृषि विभाग के विज्ञानी कर रहे हैं और वो भी पंजाबी किसानों के लिए। देश में मनरेगा के रोजगार बढऩे के बाद प्रदेश में धान की रोपाई करने की पहले मजदूरी बढ़ी फिर मजदूर गायब होने लगे तो पैडी ट्रांसप्लांटर यूरोप से लाए गए। ये खासे मंहगे थे तो इसके बाद चीन व जापान से भी पैडी ट्रांसप्लांटर पंजाब के खेतों में आए हैं। चीन की तकनीक गड़बड़ निकली तो जापानी मंहगी लगी। अब यही मशीन कोरिया से आने लगी।
प्रदेश कृषि विभाग में डिप्टी डायरेक्टर रहे और वर्तमान में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं 10 से 12 लाख रूपये की ये मशीन साल में मात्र 15 दिन काम आती है, ऐसे में इसी मशीन में कुछ बदलाव कर इससे गेहूं व सीधी बिजाई वाले धान के खेत में गोडी करने का जुगाड़ फिट किया है। अब इसीमें खेत में सप्रे करने वाली मशीन भी लगाई जा रही है, जिससे सौ फीसद स्प्रे पौधे पर ही हो सकेगी। पहले वीडीसाइड और फिर पेस्टीसाइड के अलावा किसी प्रकार की बीमारी लगने की सूरत में अन्य दवा का छिड़काव भी संभव है।
डा. सोहल बताते हैं कि हाल ही में समाना ब्लाक के एक किसान के यहां पर उसके सीरी ने गलती से खेत की मेढ़ पर छिड़कने वाली दवा को खेत में गेहूं के पौधे पर छिड़क दिया। होना तो यह चाहिए था कि सारे पौधे जल जाते लेकिन दो तिहाई फिर भी बच गई। स्पष्ट है कि खेत में स्प्रे का पूरा इस्तेमाल नहीं होता, ये वातावरण में प्रदूषण फैलाने व अन्य नुकसान वाले काम च्यादा करती है।
ऐसे में जब ट्रांस्पलांटर के पीछे 25 फीट चौड़ी नोजल लगेगी तो इसके ड्रोप लेट से समान गति से बराबर का छिड़काव होगा और केवल फसल पर ही होगा। अभी तक मौजूद तकनीक में या तो हाथ से किया जाता है, या ट्रैक्टर से, लेकिन धान व गेहूं के पौधे लगने के बाद ट्रैक्टर से ये छिड़काव संभव नहीं है। मशीन से हुए स्प्रे से अरबों रूपये की ना केवल दवा बचेगी अपितु प्रदूषण पर भी रोक लगेगी।
दिलचस्प है कि ट्रांसप्लांटर में टायरों के स्थान पर फाइबर के बने फलोटिंग चक्के लगे हैं। फिशिंग में प्रयोग आने वाले ये पहिये गारे में भी चलते हैं और गुडाई भी करते हैं। ये धान व गेहूं के पौधे की लाइनों में अंतराल पर कुछ ऐसे चलते हैं कि बिना पौधे को कुचले गोडाई भी कर सकेंगे। साल में 10-15 दिन काम आने वाली लाखों की मशीन 365 दिन काम में ली जा सकेगी। जब इसके पीछे छोटी ट्राली लगी होगी तो चारा अथवा अन्य सामान भी ढोह सकेगी।


Thursday, 17 January 2013

खेती में खपत पर खर्च च्यादा, उपज कम




भूपेश चट्ठा, पटियाला
गेहूं के दामों में किसानों के लिए बढ़ोतरी हो या ना हो, या फिर मात्र 65 पैसे प्रति किलो तक ही रह जाए। ऐसे ही धान के दाम 50-60 पैसे प्रति किलो की दर उसे बढ़ जाए लेकिन आटे व चावल के दामों में बढ़ोतरी सिर्फ और सिर्फ रूपये में ही हो रही है। ऐसे में गरीब आदमी को अन्न सस्ता नहीं मिलता और किसान को दाम नहीं मिल पाते। वहीं खेती पर खपत भी लगातार बढ़ रही है। लेकिन उपज के दाम उसी अनुपात में नहीं बढ़े हैं।
गेहूं के एमएसपी में मात्र 65 रूपये की बढ़ोतरी होने से परेशान किसानों की मांग है कि केंद्र सरकार गेहूं का एमएसपी भारतीय किसान आयोग के पूर्व चेयरमैन एमएस स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों अनुसार दो हजार रूपये प्रति क्विंटल से ज्यादा तय करे। डीएपी खाद, यूरीया, बीजों के दाम, बहाई बिजाई का खर्च, नदीननाशक व कीड़ेमार दवाओं के साथ मजदूरी व जमीन का ठेका लगातार बढ़ा है। जबकि एमएसपी उस अनुपात में नहीं बढ़ाया गया।

किसान का कुल खर्च- दस हजार रूपये प्रति एकड़ से ज्यादा

दस एकड़ जमीन का ठेका- 35 हजार प्रति एकड़ सालाना से रबी की फसल गेहूं पर 1.75 लाख रूपये
किसान की मजदूरी-पांच सौ रूपये प्रतिदिन अनुसार छह महीने के 90 हजार रूपये
बहाई-बिजाई-दो हजार प्रति एकड़, 20 हजार रूपये
बीज-एक हजार प्रति एकड़, 10 हजार रूपये
डीएपी खाद- 15 सौ प्रति एकड़, 15 हजार रूपये
कीटनाशक, नदीननाशक व अन्य दवाएं-एक हजार प्रति एकड़, 10 हजार रूपये
यूरिया-एक हजार प्रति एकड़, 10 हजार रूपये
कटाई - एक हजार प्रति एकड़, 10 हजार रूपये
मंडी तक ले जाने का खर्च-आठ सौ रूपये
टयूबवेल का बोर, मोटर, मशीनरी की टूट फूट-एक हजार प्रति एकड़, 10 हजार रूपये
रखरखाव व अन्य खर्च- सात सौ प्रति एकड़, 7 हजार रूपये


गेहूं पर मेहनत व खर्च 1921 रूपये प्रति क्विंटल

राज्य में गेहूं का औसत उत्पादन 19 क्विंटल प्रति एकड़ है। ऐसे में दस एकड़ पर फसल से कमाई 1285 रूपये प्रति क्विंटल के हिसाब से दो लाख 44 हजार 150 रूपये हुई जबकि खर्च तीन लाख 65 हजार रूपये हो गया। ऐसे में एक लाख 11 हजार 850 रूपये का घाटा होना तय है। गेहूं पर किसान की मेहनत व खर्च 1921 रूपये प्रति क्विंटल बैठती है। भारतीय किसान यूनियन एकता डकौंदा के डा. दर्शन पाल बताते हैं कि यह औसत दस एकड़ जमीन के टुकड़े पर आती है जबकि खेत छोटा होने की स्थिति में यह खर्च बढ़ता जाता है। इस औसत में 25 या 50 फीसद मुनाफा जोड़ा जाए तो न्यूनतम समर्थन मुल्य 2130 रूपये या 2500 हजार रूपये प्रति क्विंटल हो जाता है।

क्या सोचता है किसान
वकालत छोड़ किसान बने परविंदर सिंह ढिल्लों कहते हैं कि मंडी में किसान की फसल से जुड़े लोग जिसमें आढ़ती, शैलर मालिक, अनाज के व्यापारी, फूड एजेंसियों के अधिकारी व इंस्पेक्टर, रसायनिक खाद व दवा बनाने वाली कंपनियां, कृषि मशीनरी बनाने वाली फैक्ट्रियां और वर्कशाप के मालिक करोड़पति से अरबपति होते जा रहे हैं। जबकि किसान कर्ज से पीडि़त हो खुदकुशी करने को मजबूर होता है।

Friday, 4 January 2013

ना जले पराली; बिक जाए या खेत में मिल जाए

उम्मीद-2013 पर्यावरण संरक्षण
ना जले पराली; बिक जाए या खेत में मिल जाए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हर क्षेत्र के अपने गुण अवगुण होते हैं उत्तर भारत के दूसरे सबसे कम प्रदूषण वाले शहर पटियाला में भी पर्यावरण संबंधी समस्याएं हैं। लेकिन प्रमुख रूप से ये खेत खलिहान व ट्रैफिक के आसपास ही घूमती है। 2012 में पराली को जलने से पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है लेकिन 2013 में यह उम्मीद अवश्य है कि पराली या तो बिक जाए नहीं तो खेत में ही मिल जाए।
जिले में बायो मास आधारित किसी नए बिजली उत्पादन करने वाले प्लांट के चालू होने की संभावना नहीं है, ऐसे में पराली को खेत में ही मिलाने पर च्यादा जोर रहेगा। शहर में इंडस्ट्री का नाममात्र होना इसे अन्य शहरों से अलग करता है। साल भर चाहे आटो रिक्शा का धुंआ लोगों को तंग करे लेकिन असली परीक्षा सितंबर अंत में शुरु हो कर अक्टूबर तक जारी रहती है जब जिले के ढ़ाई लाख हैक्टेयर से च्यादा रकबे पर लगी धान की फसल की पराली जलने लगती है।
 2012 के अक्टूबर में जिला गैस चैंबर बना था, हालांकि 2011 की तुलना में हालात कुछ बेहतर थे, लेकिन 2014 में होने वाले लोक सभा चुनावों को देखते हुए कम ही उम्मीद है कि पराली को जलाने से रोकने वाला कानून कड़ाई से इस साल लागू हो पाएगा। फिर भी उम्मीद की जा सकती है कि किसान खुद जागरुक होगा और खेती करने का तरीका बदल कर पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाएगा।

हैप्पी सीडरों की संख्या बढ़ेगी
मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि पराली को जलाने से पूरी तरह से मुक्ति देने वाले हैप्पीसीडर की संख्या डेढ़ दर्जन हो पाई है। उम्मीद की जा सकती है कि ये अगले साल गेहूं की बिजाई तक दो गुनी हो जाएगी इससे बड़े क्षेत्र में धान की पराली बिना जलाए किसान को बेहतर विकल्प मिल सकेगा।


मिलचिंग से है फायदा बताया किसानों को

नाभा-भवानी गढ़ रोड पर माझी गांव में खेती करते 50 वर्षीय जरनैल सिंह यों तो पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से जियोग्राफी में एमए हैं लेकिन उन्होंने कृषि का खानदानी पेशा अपनाया और उसे किया भी परंपरागत ढ़ंग से, इससे पहले खुद लाभ लिया और अब औरों के  बीच प्रसारित कर रहे हैं। खेती विरासत मिशन के महासचिव के रूप में कार्य करते हुए जरनैल सिंह माझी ने पिछले छह सात सालों से किसानों को बताया है कि धान की पराली हो या गन्ने के कचरा अगर किसान इसका सौ फीसद प्रयोग खेत में ही कर देता है तो इस मिलचिंग से क्या फायदा है? वे बताते हैं कि खेत में बिछा ये कचरा पानी का वाष्पीकरण रोक देता है और खेत में मौजूद माइक्रो आर्गेनिक तत्वों को अंधेरा अथवा छाया मिलने की वजह से वे अधिक विकसित होते है। पराली व अन्य कचरे को ना जलाने से जहां वायु प्रदूषण रुकता है वहीं जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहने से रसायनिक खाद व अन्य स्प्रे भी कम करने पड़ते हैं। इससे पानी में जहर नहीं घुलता है और वातावरण शुद्ध रहता है। 

31 मार्च तक 25 लाख पौधरोपण होगी
जिले में पौधरोपण का अभियान पिछले साल मानसून में शुरु किया गया था और चालू वित्तिय वर्ष में 31 मार्च तक कुल 25 लाख पौधरोपण करने का लक्ष्य रखा गया है। बीते साल लक्ष्य में से दो तिहाई हिस्सा पा लिया गया है। पिछले अभियान शहर व स्कूलों, सरकारी कार्यालयों व अन्य संस्थानों के परिसरों में चलाया गया था। अब इस साल फरवरी-मार्च के महिनों में खेतों में टयूबवेलों  तक जरूर पहुंचेगा। इसके साथ ही मानसून के शुरु होने से पहले 25 लाख पौधरोपण का अगले वित्तिय वर्ष के लक्ष्य एक बार फिर से काम शुरु होगा। वन विभाग के अमन अरोड़ा कहते हैं कि पहले तीन साल किसी पौधे के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और इसमें गर्मी का पहला सीजन निकालना सबसे ज्यादा जरूरी। ऐसे में इस साल देख भाल पर भी ज्यादा जोर दिया जाएगा।

ध्वनि प्रदूषण के 62 मामले दर्ज
साल 2012 के दौरान जिला पुलिस ने ध्वनि प्रदूषण के 62 मामले जिला पुलिस ने दर्ज किए। इनमें सबसे ज्यादा संख्या आटो रिक्शा और उन ट्रैक्टरों की थी, जिनके चालकों ने ट्रैक्टरों पर ऊंची आवाज में म्यूजिक सिस्टम लगा लगा रखा था। जिला पुलिस के रिकार्ड अनुसार दो ऐसे मामले भी हैं, जिनमें पुलिस ने सड़क किनारे खड़े दो कार चालकों पर ऊंची आवाज में गाने बजाकर डांस करते हुए काबू किया।
जहरीला धुंआ छोडऩे वाले 240 वाहनों के हुए चालान
जिला पुलिस ने वर्ष 2012 के दौरान जिले भर में प्रदूषण सर्टिफिकेट न होने वाले 240 वाहनों के चालान किए। यही नहीं जहरीला धुआं छोडऩे वाले दो दर्जन से ज्यादा आटो रिक्शा को पुलिस ने मोटर व्हीकल एक्ट 207 के तहत बंद भी किए। सड़क सुरक्षा सप्ताह में व्यस्त डीएसपी ट्रैफिक नाहर सिंह का कहना है कि वह वर्ष 2013 के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर पैनी नजर रखते हुए उन पर कड़ी कार्रवाई करेंगे। बिना प्रदूषण सर्टिफिकेट वाले किसी भी वाहन चालक को बख्शा नहीं जाएगा।

Thursday, 27 December 2012

पंजाब से छोटा किसान हुआ गायब



-बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में कृषि योग्य जमीन का रकबा चाहे कम हो रहा है और कंकरीट के जंगल भी बस रहे हैं लेकिन राज्य में बड़े किसानों की संख्या बढ़ रही वहीं छोटा किसान तेजी से गायब हो रहा है। किसानों की जनगणना पर जुटाए गए व संग्रहित किए जा रहे आंकड़ों में देश के रूझान के विपरीत जानकारी सामने आ रही है।
दिलचस्प है कि देश भर में जहां छोटे किसानों की गिनती बढ़ रही है। कृषि विभाग के सांख्यकि विभाग से जुड़े अधिकारी बताते हैं कि इससे पहले पंजाब में परिवारों के टूटने के पांच एकड़ तक के किसानों की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पर अब बड़े खेत बढ़ रहे हैं और स्वभाविक है कि कई दशकों के बाद बड़े जागीरदार भी एक बार फिर से समाज में फलने फूलने लगे हैं।
जनगणना के आंकड़े औपचारिक रूप से अगले साल मार्च-अप्रैल तक ही प्रकाशित होंगे लेकिन आरंभिक संग्रह करने वाले अधिकारी बताते हैं कि पंजाब में छोटा किसान जहां ठेके पर जमीन दे कर खुद खेती से किनारा कर रहा है। ऐसे लीज पर जमीन देने वाले छोटे व मध्यम किसानों की संख्या एक लाख 30 हजार पर आ गई है। जबकि ऐसे ही जमीन बेच देने वालों का आंकड़ा भी 72 हजार है जो अब जमींदार नहीं रहे।
वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के आने वाले परिणाम जहां बड़े किसानों की संख्या के मामले में चौंकाने जा रहे हैं वहीं उत्पादन के मामले में भी कम आश्चर्यजनक नहीं होंगे। पंजाब की तुलना में गेहूं उत्पादन अन्य राज्यों में बढ़ रहा है जबकि यहां पर लगभग स्थिर है। दस साल पहले मध्यप्रदेश में गेहूं उत्पादन जहां 57 हजार टन था वहीं अब 80 लाख टन है।
वहीं मक्की उत्पादन पर जोर देते मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि अभी तो सारा धान व गेहंू सरकारी खरीद एजेंसियां खरीद रही हैं, लेकिन तब क्या होगा जब यह आपूर्ति अन्य राज्यों से होने लगेगी। सारा सिस्टम निजीकरण की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए अभी से जागने की जरूरत है। केंद्र हमारी मक्की नहीं खरीद रहा पर बाजार में बिक रही है, धान का यही एकमात्र सही विकल्प है। वे कहते हैं कि पंजाबियों को अब एक बार चावल खाना कम कर मक्की की रोटी को तवज्जो देनी होगी।
वहीं सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला कहते हैं कि ये किसान कहीं गायब नहीं हो रहे ये लो अब खेत मजदूर व दिहाड़ीदार हो गए हैं। कर्ज में डूबे किसानों की जमीनें बिक रही हैं। पंजाब के किसान की हालत ठीक वैसी ही हो गई है जैसी देश की सीमा पर लड़ते हुए सिपाही की जो घायल हो गया है। देश का पेट भरने किसान ने अकाल, बाढ़, आतंकवाद जैसे हर हालात में फसल को पाला, हरित क्रांति ने किसानी का लागत मूल्य बढ़ा दिया और खर्चे किसान ने खुद बढ़ा लिए। ऐसे में अब देश की जिम्मेदारी बनती है कि घायल हुए किसान व कृषि का इलाज करे। जबकि बड़े किसानों का फायदा केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को होगा जिनकी निगाहें बड़े ट्रेक्टर, उपकरण व प्रोसेसिंग सिस्टम बेचने पर लगी हैं।

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 कृषि जनगणना वर्ष 2010-11

-पंजाब में बड़े किसानों की संख्या बढ़कर 10.28 लाख
-मध्यम किसानों की संख्या घटकर 1.01 लाख रह गई
-20 एकड़ से ज्यादा भूमि वाले किसानों की संख्या 2.79 लाख से ज्यादा
-तीन से चार एकड़ जमीन वाले किसानों की संख्या 3.43 लाख

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 2000-01 में 65 फीसद थे छोटे किसान

वर्ष 2000-01 में हुई जनगणना का हवाला दे पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. रणजीत सिंह घुम्मन की ओर से किए गए शोध में सामने आया है कि दस साल पहले पंजाब में किसानों की कुल संख्या 18.44 लाख थी, इसमें से पांच एकड़ से कम भूमि वाले छोटे किसान 32 फीसद और पांच से दस एकड़ भूमि वाले मध्यम किसानों का हिस्सा कुल आबादी का 33 फीसद था। शेष बड़े किसानों थे।

Friday, 21 December 2012

पंजाबी पानी के बाद मिट्ïटी भी हुई बेदम!


-मिट्टी को कौनसी चाहिए टॉनिक? बताएगा कृषि विभाग
-किसान का नुकसान कम करने फसलें भी सुझाई जाएंगी और कुछ से दूर रहने को भी कहा जाएगा: विशेषज्ञ
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पांच पानियों की धरती पंजाब का पानी गड़बड़ हुआ तो पहले शहरों के घरों में फिल्टर लगे और अब गांवों में पीने का साफ पानी उपलब्ध करवाने पंचायतों में आरओ लग रहे हैं। आलम ये है कि देश के अन्न भंडार में दो तिहाई तक हिस्सा डालने वाले पंजाब की मिट्टी भी बेदम हो गई है। यूरिया, फास्फेट जैसे हरित क्राति के ताकतवर तत्व अब बेमानी हो गए हैं। ऐसे में कृषि विभाग आने वाले दिनों में इससे एक कदम आगे की मिट्टी की टॉनिक सुझाने जा रहा है।
विभागीय अधिकारियों अनुसार अभी तक कृषि विभाग मिट्टी का परीक्षण केवल तीन तत्वों का ही करता था अब इसे माइक्रो न्यूट्रीएंट्स स्तर पर ले जाया जाएगा। नाइट्रोजन, फास्फोरस, केलशियम व जैविक तत्वों की मात्रा ही जांची जाती थी अब बदले हालात में मैग्नीज, जिंक, आयरन व गंधक  की जांच की जाएगी।
डिप्टी डायरेक्टर बीज रह चुके मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि खेती जिस स्तर पर पहुंच गई है वहां से इसे लाभदायक बनाने के लिए या तो हमे शोध कर लागत कम करनी होगी या फिर उपज के उत्पादन के स्तर को बनाया रखना होगा। इसके लिए जिन तत्वों की कमी है केवल उन्हें ही खेत में डालने की सिफारिश की जाएगी। यह मिट्टी की जांच के दौरान ही पता चल जाएगा। इसके लिए फसल पर एक तत्व विशेष की कमी का असर देखे जाने तक का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इसी के आधार पर किसान को सुझाया जाएगा कि कौनसी फसल की बिजाई करे अथवा किस फसल से बिलकुल दूर रहें। संभव है कि मिट्टी के परीक्षण के बाद किसान को कुछ नुकसान करने वाली फसलें हमेशा के लिए छोडऩी पड़ें।
डा. सोहल कहते हैं कि अभी तक कई किसानों ने सिर्फ एक दूसरे से सुन कर ही यूरिया खेत में डाल लिया, इसने खेत के जिंक तत्वों को खासा नुकसान पहुंचाया है। जहां जरूरत नहीं थी वहां भी प्रयोग करने से पहले किसान ने यूरिया पर पैसे खर्चे और अब जिंक पर करेगा। ऐसे ही हम एक तय माप अनुसार रसायनिक खादों का प्रयोग करते जाते हैं, जिसका प्रभाव हम 15 दिनों अथवा कई बार तो एक महीने बाद फसल पर बीमारी के रूप में या फिर पौधे की ग्रोथ के रूप में देखते हैं, जबकि पहले माइक्रो न्यूट्रीएंटस की जांच करने पर हमे इस तरह के मंहगे व रिस्की तर्जुबे नहीं करने पड़ेंगे।

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बदलती है टॉनिक की मात्रा, पर होता है विपरीत प्रयोग
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां मिट्टी में ज्यादा नमी है वहां नहरी पानी की तुलना में खाद का प्रयोग मात्र दो तिहाई हिस्सा ही करना होता है जबकि रेतली जमीन पर ये एक तिहाई रह जाता है। जबकि किसान रेतली जमीन में ज्यादा खाद डाल कर अधिक उपज लेने का प्रयास करता है। इसी प्रकार अगर गेहूं को सिफारिश की गई फास्फोरस वाली खाद डाली गई हो तो उन खेतों में धान, कपास, मक्की, मूंगफली आदि के लिए इस खाद की जरूरत नहीं होती लेकिन ऐसी स्थिति में अगर टेस्ट में नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा आ जाए तो इसका प्रयोग करना पड़ता है।

Monday, 19 November 2012

चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ा था पराली प्रदूषण अभियान

भूपेश चट्ठा, पटियाला
कृषि व कृषक हितैषी कही जाने वाली पंजाब सरकार पिछले साल पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण की रोकथाम करने में पूरी तरह से असफल रही थी। कारण सिर्फ और सिर्फ चुनावी था। इस साल हुए विधान सभा चुनाव से ठीक पहले के सीजन में सरकार और प्रशासन ने किसानों को सिर्फ 'जागरुकÓ ही किया है। किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने से बचती रही।
बीते साल ही मोगा के गांव में खेत में जल रही पराली में एक आटो रिक्शा में बैठे तीन बच्चों के चपेट में आने से मौत हो गई थी। दिलचस्प है कि उन दिनों पंजाब सरकार के लिए धान की खरीद व लिफ्टिंग में जुटे विशेष सचिव दरबारा सिंह गुरु लगातार कहते रहे कि 'पहले लोगों को जागरुक करना जरूरी है।Ó हालांकि बाद में उन्होंने भी चुनाव लड़ा।
कांग्रेस के शब्दों में शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में चाहे कुछ ना किया हो लेकिन वर्ष 2007 से 2011 तक की सरकार ने पंजाब में सब सोयल एक्ट(धान की बिजाई 10 मई से और रोपाई 10 जून से करवाना) को सफलता पूर्वक लागू करने के अलावा पराली को जलाए जाने प्रति कड़ाई से कानून की पालना करवाना। दो महत्वपूर्ण कामों के लिए जाना जाएगा। फिर भी चुनावी साल में अपने सबसे बड़े वोट बैंक के आगे यह सरकार भी पिछले साल नतमस्तक हो गई थी।


पराली जलाने की रोकथाम पर कानूनी
 कानून अनुसार अभी तक केवल धारा 144 के तहत ही कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सिफारिश पर जिले में तैनात डिप्टी कमिश्नर अपने जिला मैजिस्ट्रेट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिबंध लगाता है और इसी धारा के तहत कृषि अधिकारी व एसडीएम के माध्यम से पराली जलाए जाने वालों पर एफआईआर दर्ज करवाता है।

दो दशक में सफलता मात्र 20 फीसद

90 के दशक में पराली जलाए जाने से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और वर्तमान में पीपीसीबी में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत डा. चरणजीत सिंह नाभा कहते हैं कि दो दशक तक लोगों को समझाने के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाए हैं और आज भी केवल जागरुक ही कर रहे हैं। सफलता का परिणाम 20 फीसद से थोड़ा ही ज्यादा है।
क्या है विकल्प
पराली से गत्ता बनाने और बायोमॉस प्लांट लगा कर बिजली बनाने वाले कामर्शियल उपयोग के अलावा पराली को खेत में ही खुर्द-बुर्द कर खाद में तबदील करने वाले उपायों पर मुख्य कृषि अधिकारी  डा. बीएस सोहल कहते हैं कि अभी में मिनी टिल ड्रिल अथवा रोटावेटर ही चलन में। इससे किसान आंशिक तौर पर मोटे किरचे जला कर शेष को खेत में कुतर लेता है। पूरी तरह से जलाए बिना पराली को खेत में खपा देने वाले हैप्पी सीडरों की संख्या ज्यादा नहीं है। इनके सस्ता होने अथवा कंबाईन की तरह लोकप्रिय होने के बाद आपको पराली कहीं जलती हुई नहीं दिखेगी।

वक्त बदला मंजर नहीं

पटियाला के मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल अनुसार जिले में 2.33 लाख हैक्टेयर में धान की फसल लगी है। इसकी कटाई की शुरुआत हो चुकी है। मोटे अनुमान अनुसार धान का पौधा ठीक ठाक रहे तो प्रति हैक्टेयर 15-16 टन पराली पैदा होती है। ऐसे में साधारण गणित अनुसार 30 से 35 लाख टन पराली का बनना तय है।
वहीं पराली से उपजने वाली गैसों पर कृषि विज्ञानी बताते हैं कि पराली के जलाने से वातावरण में कार्बन डाईआक्साइड, सस्पेंडिड पार्टीक्यूलेट मैटीरियल, फास्फोरस, पोटाश व नाइट्रोजन जलकर आसमान में चले जाते हैं हालांकि इसमें 70 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड और कार्बन मोनो आक्साइड, 2.09 फीसदी नाइट्रेट आक्साइड, 0.66 फीसदी मीथेन व अन्य जहरीली गैसें भी होती हैं, जो इसके जलने के बाद आने वाली अच्छी बारिश तक सूर्य की किरणों को 33 फीसदी तक रोके रखती हैं।
इतना ही नहीं पराली जलने से खेत में मित्र कीटों के साथ धरती के नीचे खाद बनाने वाली प्राकृतिक फैक्ट्री को भी हर साल जल जाती हैं। पराली जलाने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के अलावा धरती की उर्वरा शक्ति भी क्षीण होने लगी है।
पटियाला में अभी धान की कटाई शुरु ही हुई है और डिप्टी कमिश्नर जीके सिंह ने धारा 144 के तहत पराली का जलाया जाना प्रतिबंध कर रखा है। फिलहाल किसी तरह की दुर्घटना सामने नहीं आई है।

Saturday, 4 August 2012

पापुलर ने दिया एफडी से च्यादा रिर्टन, Popular gives batter returns then bank FDR



-चार साल में दोगुने हुए दाम
-बैंक दे रहे बिना किश्त का नौ साल के लिए लोन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में गेहूं-धान की द्वी-फसलीय चक्र चाहे किसी से ना टूटा हो पर राज्य में खेतों की मेढ़ पर लगने वाला पापुलर खासा पापुलर होने लगा है। कारण सरकार के किसी विभाग अथवा डाईवर्सिफीकेशन  प्रेमियों के प्रयास नहीं है। इसे सिर्फ और सिर्फ आर्थिक कारणों ने लोकप्रिय कर दिया है। हालांकि पहली नजर में पापुलर की बढ़ रही कटाई इसका क्षेत्र कम होने की ओर इशारा कर रही थी, लेकिन सामने आया कि एफडी से ना केवल च्यादा रिर्टन दे रहा है बल्कि लोगों में और च्यादा 'पापुलरÓ हो रहा है।
इसकी कीमतें पिछले चार सालों में दोगुनी हो गई है। 300 रुपये क्विंटल तक बिकने वाला पॉपलर 500 रुपये से लेकर 800 रुपये क्विंटल तक पहुंच गया और पंजाब से बाहर इसके दाम 12 सौ रूपये क्विंटल भी हैं। हरियाणा के जगाधरी, यमुनानगर क्षेत्र में ये दाम अच्छी क्वालिटी और मात्रा होने पर मिलते हें। ऐसे में बैंक एफडी से कहीं अधिक रिर्टन दे रहा है।
नैशनल नर्सरी के एमडी अब्दुल वाहिद बताते हैं कि किसान को सवार्धिक फायदा देने वाला पेड़ है।  20 फुट का तो नर्सरी, में ही किया जा सकता है। पांच साल में किसान को अतिरिक्त आय दे देता है। वे ही हर साल 20 हजार पौधे बेच रहे हैं। उत्पादन च्यादा हो तो च्यादा भी बिक जाऐंगे।
दिलचस्प है कि 90 सेमी. मोटाई पर बिकना आम है पर इसे ढ़ाई मीटर तक फैलने दिया जा सकता है। प्रदेश में सर्दी के दिनों में झड़े इसके पत्ते सूरज की किरणें नहीं रोकते और खेत में ही खाद बन जाते है। तो गर्मी में हर फसल को राहत देते है। यों आठ नौ साल बाद फसल ली जाती है पर कुछ लोग तीन साल बाद ही इसकी कटाई के बारे में सोचने लग जाते हैं।
 प्रदेश में बैंक भी पॉपुलर के नाम पर लोन देने को तैयार है। कम से कम 150 पेड़ो के लिए दिए जाने वाले इस लोन की वापसी के लिए ना तो किश्तें है और ना ही किसी को पहले आठ साल लोन के बारे में पूछा जाता है, साल बाद केवल ब्याज के रूप में मामूली भुगतान करना होता है। फार्म की जमीन में कोई बड़ी गड़बड़ ना हो तो नौ सालों के लिए पॉपुलर पर लोन दिए जा रहे है। सिर्फ जनवरी-फरवरी मं लगने वाले पॉपुलर पर वन विभाग की ओर से सबसिडी पर 12 से 15 फीट के पौधे दिए जाते है और बैंक किसान के नाम पर बैंक को ही भुगतान कर देता है। इतना ही नहीं बैंक आठ सालों तक लगातार लोन भी देते है अगर किसी ने एक हैक्टेयर में पांच हजार पौधे लगाने हों।
वन विभाग अगले साल से हरियाली मिशन के तहत खेतों में मोटर के पास, पानी की खाल व मेढ़ पर लगाने के लिए कुछ इसी तरह के पौधे लगाने जा रहा है जिनमें साधारण मिट्टी पर पापुलर और टाली जबकि सेम वाले क्षेत्रों में सफेदा प्रमुख होगा। हालांकि इसे वन विभाग किसी बीड़ में नहीं लगवाता, लेकिन किसानों के लिए कामर्शियल रूप से खेती करवाने पौधे जरूर उपलब्ध करवाता है।

क्या कहते हैं प्रमुख सचिव

राच्य के वन व वन्य प्राणी विभाग के प्रमुख सचिव डीएस बैंस पापूलर के सवाल पर अपना निजी उदाहरण देते हैं कहते हैं कि वे छोटे किसान हैं और मुक्तसर जिले में उन्होंने अपने फार्म पर पापूलर के पौधे 11 साल पहले लगाए थे और दो साल पहले 17 लाख रूपये की कमाई हुई पिछले साल ये आंकड़ा 15 लाख रूपये रहा और इतनी ही और कमाई होने की उम्मीद अभी और है। ये पौधे भी सिर्फ खेत की मेढ़ पर लगाए गए हैं। किसान चाहे तो अतिरिक्त कमाई इस पौधे से की जा सकती है।


कहां आता है काम
पेंसिल, माचिस की तिल्लीयां, खेेलों का सामान, पैकेजिंग, के अलावा इससे पलाईवुड तैयार होता है। वर्तमान में राज्य में प्लाईवुड की करीब 100 इकाइयां चल रही हैं। जिनमें वार्षिक औसतन 30 लाख क्यूबिक लकड़ी की खपत हो रही है। पड़ोसी राज्य हरियाणा में लकड़ी की बड़ी मंडी है। इसके चलते पंजाब से बड़े स्तर पर लकड़ी बाहर जाती है। हालांकि लकड़ी बाहर भेजने पर दो फीसदी टैक्स लगा हुआ है इसके बावजूद बाहर से आ रहे व्यापारी बिना टैक्स के ही लकड़ी ले जा रहे हैं। हरियाणा से तैयार माल बिलों में जम्मु-कश्मीर के नाम पर चलता है लेकिन बिकता पंजाब में है। जिससे यहां के उद्यमी 12.5 फीसदी वैट बचा रहे हैं। राज्य के व्यापारियों को पॉपुलर कुछ ऐसे लाभ दे रहा है तो किसानों के लिए मुनाफाखोरी के रास्ते पॉपुलर ने खोले है। पंजाब वन निगम सूत्र बताते है कि हरियाणा में किसानों को पंजाब के मुकाबले लकड़ी की ज्यादा कीमत मिलती है। इसके चलते हरियाणा के साथ लगते इलाकों के किसान अपनी लकड़ी हरियाणा में बेच रहे हैं।


कहां से आया पापुलर?
सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला पॉपुलर के पंजाब में पापुलर होने के पीछे अलग से तर्क देते है कहते है कि पंजाबियों को कनाडा से इतना प्यार हुआ कि खुद तो वहां जा बसे पर वहां का पेड़ यहां भेज दिया। याद रहे कि उत्तरी अमेरिका से चला ये पेड़ यूरोप होता हुआ पश्चिमी एशिया के रास्ते पंजाब आया है और इसके ठीक विपरीत यही वो रास्ता है जहां से उल्टे पांव कबूतर बाजी होती है।

Tuesday, 24 July 2012

घोषित कट ढ़ाई गुना, कृषि की बिजली भी कटी, Cut increases and less electricity to agriculture too, Powercom banned AC in its offices


-रोपड़ का तीन नंबर यूनिट चालू पर चार नंबर बंद
-बिजली की मांग जहां की तहां पर आपूर्ति कम हुई
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से घोषित किए गए बिजली कटों को बढ़ाकर अब ढ़ाई गुना कर दिया गया है। मानसून के आज भी सक्रिय ना होने के चलते और मांग व आपूर्ति का अंतर पाटने, कृषि क्षेत्र को दी जा रही आठ घंटे की बिजली में भी कटौती हो गई है।
कृषि क्षेत्र में रेग्यूलर सप्लाई सात घंटे दी जा रही है, ओवर लोडेड ग्रिडों पर कृषि क्षेत्र में छह घंटे आपूर्ति की जा रही है तो बार्डर एरिया में टयूबवेल को साढ़े छह घंटे बिजली मिल रही है। महत्वपूर्ण शहरों में पावरकाम ने दो घंटे की घोषित कटौती की थी अब ये बढ़ कर साढ़े पांच घंटे हो गई है। इसी प्रकार जिला मुख्यालयों, अर्बन इंडस्ट्रीयल फीडर पर साढ़े सात घंटे के कट लगाए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 24 घंटे तीन तार सप्लाई पर छह घंटे का और चार तार सप्लाई पर छह घंटे 20 मिनट के कट लगाए गए हैं। इंडस्ट्री पर तीन घंटे का पीक लोड प्रतिबंध और बड़ी आर्क इंडक्शन फर्नेस के अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश बढ़ा कर लगातार तीन दिन कर दिए गए है। पावरकाम ने अपनी ओर से एसी पर किसी तरह के दिशा निर्देश जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन इतना तय है कि एक दिन भी बारिश ना हुई तो अन्य उपाय भी किए जा सकते हैं।
वहीं बिजली उत्पादन पर पावरकाम के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि रोपड़ के श्री गुरु गोबिंद सिंह सुपर थर्मल प्लांट के बंद हुए तीन नंबर यूनिट को चालू कर लिया गया है, पर अब बुआयलर टयूब लीकेज के चलते चार नंबर यूनिट ने उत्पादन बंद कर दिया है।
राज्य में कुछ क्षेत्रों में हुई बारिश को छोड़ कर प्रदेश भर में चल रहे सूखे के चलते बिजली की मांग जहां की तहां है। यह अब भी 2210 लाख यूनिट पर है जबकि आपूर्ति कम होकर 1837 लाख यूनिट पर आ गई है। केंद्रीय पूल व अन्य संसाधनों से खरीद व बैंकिंग के समझौतों से पंजाब को कुल एक हजार लाख यूनिट ही बिजली मिल रही है, एक सप्ताह पहले तक यह आंकड़ा 11 सौ लाख यूनिट पर था। उत्तरी ग्रिड में भी फ्रिक्वेंसी के कम होने की वजह से अनशैडयूल इंटरचैंज में पंजाब 37 लाख यूनिट बिजली ही ले पाया है।
पंजाब के पास शानन पन बिजली पावर प्रोजेक्ट से मिल रही 27 लाख यूनिट बिजली कम होकर 14 लाख यूनिट ही रह गई है, हालांकि पन बिजली उत्पादन को दुरुस्त रखने रणजीत सागर बांध से उत्पादन बढ़ाया गया है। प्रदेश का कुल पन बिजली उत्पादन 195 लाख यूनिट पर है जबकि भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड से 145 लाख यूनिट और थर्मल का उत्पादन 474 लाख यूनिट है।

पावरकाम ने एसी पर प्रतिबंध लगाया
 पंजाब सरकार से भी ऐसा ही करने की अपील
- पीक लोड में दी गई छूट वापिस ली
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड पावरकाम के चेयरमैन इंजी. केडी चौधरी ने बताया कि बारिश ना होने और पारे के लगातार उपर बने रहने के चलते मांग व आपूर्ति के बीच का अंतर पूरा नहीं हो रहा ऐसे में आवश्यक कदम उठाने के अलावा पावरकाम के अपने कार्यालयों में एसी प्रतिबंधित कर दिए गए हैं। पंजाब स्टेट पावर ट्रासंमिशन कारपोरेशन लिमिटेड और पंजाब सरकार से भी अपने कार्यालयों में एसी ना चलाने की अपील की है और कहा है कि कि ऐसे ही निर्देश जारी कर दें।
 साथ ही उन्होंने लोगों से सजावटी लाइटें ना चलाने और एसी का प्रयोग कम से कम करने की अपील की है। इसी प्रकार  इंडस्ट्री को पीक लोड में दी गई छूट अस्थाई रूप से वापिस ली है और आर्क इंडक्शन फर्नेस व रोलिंग मिलों पर तीन दिन का अनिवार्य अवकाश जारी रखते हुए जनरल इंडस्ट्री कैटागिरी दो फीडर्स पर दो दिन का अनिवार्य साप्ताहिक अवकाश लगा दिया है। चैयरमैन का कहना है कि मानसून के आने वाले दिनों में सक्रिय होते ही इंडस्ट्री पर लगाए गए प्रतिबंध हटा लिए जाएंगे।

Tuesday, 8 May 2012

खेती से ऊबने लगा पंजाबी!, trends; Punjabi farmer loosing interest in farming


-गेहूं का उत्पादन रिकार्ड बनाया पर प्राकृति से सहमा है किसान
-धान की 1121 किस्म के दामों में आए उतार चढ़ाव ने भी दिया योगदान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
एक जमाना था जब बुजुर्ग खेती को उत्तम, व्यापार को मध्यम और नौकरी को निकम्मी बताया करते थे। हालात बदले तो खेत का बादशाह किसान 'नौकरीÓ को 'गुलामीÓ कहना बंद कर गया बच्चों को पढ़ लिख कर 'नौकरÓ होने की सलाह देने लगा पर खुद खेती करता रहा। वहीं अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि गेहूं उत्पादन का रिकार्ड बनाने वाला पंजाबी खेती से ही ऊबने लगा है।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वालों के रूझान में इस साल आई कमी है। एक ओर पराई जमीन पर खेती करने वाला किसान प्राकृति से सहमा है वहीं शहर जा कर मजदूरी करने में अधिक दिलचस्पी लेने लगा है। पिछले साल बड़े क्षेत्र में धान पर बाढ़ की मार पड़ी तो दूसरी बार पनीरी लगाने अमृतसर से हरियाणा के करनाल तक के दौरों ने खर्च बढ़ा दिया। अब गेहूं की कटाई पर बारिश की मार पड़ी तो कई लोगों को झटका लगा।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डा. बीएस सोहल बताते हैं कि एक अन्य कारण में पिछले सालों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी पड़ी है पर लागत मूल्य बढ़ा है। खाद, डीजल, बीज, पेस्टिीसाइड और डीएपी व यूरिया के दामों में भारी बढ़ोतरी  से  लगी है। तुलनात्मक रूप से धान की किस्म 1121 के दामों में शेयर बाजार की तरह आए उतार चढ़ाव ने भी किसानों को डरा दिया है।
वहीं नयागांव के लखविंदर सिंह औलख बताते हैं कि दो सीजन पहले तक धान की 1121 किस्म के दाम नई उंचाई छू रहे थे और यही वजह थी कि प्रति एकड़ ठेका 35 हजार के पार चला गया लेकिन पिछले साल इस किस्म के प्रतिबंधित हो जाने पर धान के सीजन में होने वाली कमाई आधी रह गई है। वे याद करते हैं कि साधारण धान की तुलना में तीन गुना दामों पर बिकने वाली और अधिक झाड़ देने वाली किस्म ने ठेके पर खेत के रेट बढ़ाए थे पर अब वैसी उपज व दाम देने वाली किस्म नहीं है और एमएसपी बढऩे की रफ्तार भी कम है। ऐसे में बचत ना होने की स्थिति में ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वाले दिखाई नहीं दे रहे। उनके यहां भी पुराने बंदे इस बार कोई बात नहीं कर रहे।
जबकि संगरूर रोड पर संसारपुर के हरजिंदर सिंह बदेशां बताते हैं कि पिछले तीन चार सीजन से हर बार दो सौ रूपये प्रति बीघा ठेका बढ़ रहा था और खेत लेने वाले खुद संपर्क करते थे पर अब वे देख रहें हैं कि खेती करने वाले लोग बिना बात किए पास से गुजर जाते हैं और बात भी नहीं करते। पूछने पर पता चलता है कि अमुक व्यक्ति शहर में दिहाड़ी करने लग गया है।
इसी क्रम में सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम में डा. बलजीत सिंह बताते हैं कि मंहगाई बढऩे के साथ ही दिहाड़ी भी बढ़ी है। तीन साल पहले डेढ़ सौ रूपये में मजदूर मिल जाता था पर अब तीन सौ से कम पर उपलब्ध नहीं है। शहर में अगर कोई दिहाड़ी करता है और गांव में रहता है तो निसंदेह खर्च कम होता है। दाने के अलावा सब्जी और पशुओं से दूध दही, लस्सी मिल जाती है और चिकन-समोसे से लेकर फिल्म-लिपिस्टिक पर खर्चा आए दिन नहीं होता। ऐसे में छह महीने में पूरे परिवार के पास आने वाली उपज की तुलना में मुखिया के पास हर दिन आते पैसे किसे अच्छे नहीं लगते?

Saturday, 3 September 2011

जामुन नहीं रहेंगे सिर्फ जामुनी,होंगे लाल, सफेद, काले...agriculture, trees, trend, farmer, blackberry


-पायलेट प्रोजेक्ट के तहत महाराष्ट्र और गुजरात से मंगवाए गए पौधे
-छोटी गुठली और बहुतयात में होता है गुदा, तीन साल में फल देने लगता है
भूपेश चट्ठा, पटियाला
बैंगन जब बैंगनी नहीं रहा और सफेद होते ही ये 'बै-गुणÓ से 'ताज वालीÓ एकलौती सब्जी हो गया ऐसे में जामुन भला क्यों जामुनी ही रहने वाली थी। आने वाले सालों में पंजाब में लाल, सफेद, काले और यहां तक की नीले रंग में भी दिखाई देंगी। संभवत तब भी इन्हें जामुन ही कहा जाएगा, लेकिन रस और गुदे के मामले में पेड़ों पर लगने वाली ये जामुनें किसी हलवाई की जामुनों को भी पीछे छोड़ती नजर आएंगी।    

पंजाब में इन रंग बिरंगी जामुनों को लाने के पीछे भी मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की दिखाई गई दिलचस्पी है। प्रदेश वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि प्रकाश सिंह बादल के बीते साल गुजरात व महाराष्ट्र में किए गए दौरे के दौरान उनका सामना रंग बिरंगी जामुनों से हुआ तो पंजाब में ऐसी ही जामुने उगाने की इच्छा जताई गई।

अधिकारी बताते हैं कि हार्टीकल्चर विभाग की तुलना में वन विभाग को जिम्मी सौंपा गया जिसके तहत पायलेट प्रोजेक्ट बनाया गया और महाराष्ट्र और गुजरात से एक हजार पौधे लाए गए। बीते साल लाए गए पौधों में से ज्यादातर का प्रयोग सिंबल के रूप में हुआ, वीवीआईपी की ओर से कहीं स्मृति के रूप में लगवाने के अलावा गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर बांटे भी गए हैं। याद रहे कि फलों के पौधे लगाने फरवरी के अलावा सितंबर ही बेहतरीन महीना होता है।

प्रोजेक्ट की शुरुआत करने वाले व वर्तमान में कंजरवेटर के पद पर तैनात धर्मेंद्र शर्मा ने 'दैनिक जागरणÓ को बताया कि  इन जामुनों का बीज अथवा गुठली खासी छोटी होती है और गुदा बहुतयात में होता है। आम जामुन की तुलना में इसका पेड़ जल्द फल देने लगता है। तीन साल में ही ये अच्छा खासा फल देने लगता है।
रंग बिरंगी जामुने हाईब्रिड वेरायटी में आती है। आमतौर पर ये विदेशी किस्मों की श्रेणी में ही रखी जाती है, जिसे ग्राफटिंग से तैयार किया जाता है। धर्मेंद्र शर्मा याद करते हैं कि पंजाब में साधारण तय जमोए हुआ करते थे जिनकी गुठली खासी बड़ी होती है। बड़े साइज में ज्यादा गुदे और छोटी गुठली के साथ फिरोजपुर क्षेत्र में ऐसी ही एक किस्म पाई जाती है लेकिन उसकी रंग जामुनी ही होता है

याद रहे कि महाराजा पटियाला के पास भी ऐसी ही किस्म के जामुनों के प्लांट रहे हैं। जिनकी कलमें चोरी छिपे मोती बाग से बाहर जाती रही लेकिन जामुनों की उक्त रसभरी वेरायटी भी अब ज्यादा नहीं दिखाई देती है।

Monday, 8 August 2011

पटियालवी करेंगे इथियोपिया में एक लाख एकड़ में खेती agriculture, etiopia, amaricain attack and punjabi rettaliation, fun ville, joginder tyger











 
सुविधा : 18 फीट पर है पानी, साल भर बारिश और 8 डालर में एक हैक्टेयर जमीन 99 वर्ष की लीज पर













 15 अगस्त को इथियोपिया में सहमति पत्र पर हस्ताक्षर होंगे 
डकाला रोड में एक स्थान पर राजदूत ने की मुलाकात
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला : स्वतंत्रता दिवस पर एक और नई सुबह होने जा रही है। पंजाब के ही एक किसान डा.जोगिंदर टाइगर अफ्रीका महाद्वीप के इथियोपिया देश में एक लाख एकड़ जमीन पर खेती करने जा रहे हैं। यह साधारण खेती न होकर एग्रोटेक खेती होगी, इसमें अनाज की फसल उगाने से लेकर दाल, फल, सब्जियां, पोल्ट्री, पिगरी व डेयरी प्रमुख रूप से शामिल होंगी। इसी संबंध में रविवार को डकाला रोड स्थित एक स्थान पर दक्षिण अफ्रीकी देश इथियोपिया के राजदूत दोरजे एस्फा ने क्षेत्र के किसानों से बात करने के अलावा डा.टाइगर के आर्गेनिक फार्म का भी अवलोकन किया। राजदूत ने बताया कि 15 अगस्त को इथियोपिया में सहमति पत्र पर हस्ताक्षर होंगे। डा.टाइगर की ओर से रखा गया प्रोजेक्ट हमारी सरकार ने मंजूर कर लिया है। इथियोपिया में 33 लाख हेक्टेयर भूमि खेती का इंतजार कर रही है और वे चाहते हैं कि पंजाबी इस काम में आगे आएं। संवाददाताओं के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि वे पंजाबियों की कृषि में मेहनत के मुरीद हैं और वे चाहेंगे कि और पंजाबी उनके दूतावास से संपर्क करें। जमीन की कीमतों पर दोरजे एस्फा कहते हैं कि उनके देश के पश्चिमी व केंद्रीय हिस्से में 18 फीट पर पानी है। साल भर बारिश होती है और 8 से 28 डिग्री के बीच तापमान रहता है। खेती के लिए बेहतरीन जगह है। दाम के मामले में आठ डालर में एक हेक्टेयर जमीन 99 साल की लीज पर दी जा रही है। इसमें से भी प्रोजेक्ट की कुल कीमत का 30 फीसदी ही देना होगा जबकि शेष 70 फीसदी फाइनांस हो जाता है। अफ्रीकी देशों में सुरक्षा और अकाल के सवाल पर वे कहते हैं कि 14 फीसदी विकास दर है। लोकतांत्रिक देश बने 20 साल हो गए हैं।

Wednesday, 13 April 2011

खाद की भी हो खेती तो तंदरुस्त रहे धरती organic, fertilizer, agriculture, trends, tradition,



-खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए तैयार किया जा रहा नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया
-हरी जैविक खाद पैदाकर मंहगी रसायनिक खादों से किनारा करने की ओर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  शताब्दियों के अपने अनुभव भरे ज्ञान को अमेरिकियों के पास चंद रसायनों के लिए बेचने वाला पंजाब का किसान अब एक बार फिर जैविक खेती की ओर लौटने लगा है। उपज कम न हो इसके लिए आधुनिक मशीनरी का प्रयोग तो किया जा रहा है, लेकिन रसायनों की खपत कम कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति दुरूस्त करने को खेत मे हरी खाद उगाई जा रही है। ऐसे में खाद की भी हो खेती तो धरती का तंदरुस्त रहना तय है।

 हरित क्रांति आने से पहले भी पंजाब हरियाणा का किसान 'चीझणÓ अथवा 'ढांचाÓ नाम से ऐसे पौधों की बिजाई साल से एक बार किया करता था। मुख्य फसल की बिजाई अथवा रोपाई से पहले 28-30 दिनों के लिए इन पौधों के बीजों का छिड़काव खेतों मे कर दिया जाता है और मुख्य फसल उगाने से पहले इन पौधों को खेत में बाहकर नष्ट कर दिया जाता है। पौधों के अवशेष मिट्टी मे मिलकर खाद का कार्य करते है।
घग्गर नदी की बेल्ट पर अब 60 दिनों तक पकने वाली धान की किस्म नही उगाए जाने के चलते किसान का ध्यान पानी व पर्यावरण बचाने की ओर लगा है। वहीं उपज में आ रहे ठहराव के चलते किसान अब लागत मूल्य कम कर मार्जन बढ़ाना चाहता है।

  धर्महेड़ी गांव के नंबरदार राजवंत सिंह बताते है कि 10-15 किलो बीज प्रति एकड़ में एक बार बहाई के बाद छिड़क दिया जाता है। पानी देकर फिर दो तीन दिन बाद पानी लगाया जाता है। फिर सप्ताह में एक दिन पानी लगाया जाता है। ऐसे ही 28-30 दिनों मे ढाई तीन फुट का चीझण का पौधा उग जाता है। खेतों मे अप्रैल से जून मध्य तक करने के लिए कुछ नही होता। ऐसे में मिट्टी की ताकत बढ़ाने वाले ये उपाय साल मे एक बार आराम से किये जा सकते है। जीरी रोपाई करने से पहले इन पौधों को बहा दिया जाता है फिर पानी लगा, कद्दू कर रोपाई हो जाती है। राजवंत सिंह अपना अनुभव बताते है कि 100 रूपये प्रति एकड़ से अधिक का खर्च इस कार्य में नही आता।

 वही गुरप्रीत सिंह कहते है कि हरी खाद की खेती के बाद डीएपी जैसी रसायनिक खाद के कम से कम डाले जाने वाले एक थैले के खर्च की बचत हो जाती है। जहां ढ़ाई तीन थैले यूरिया के डालने होते है वहीं यह दो थैले तक  सिमट जाता है। मिïट्टी को साल भर पूरी ताकत रहती है। हरी खाद की खेती से गेहूं की उपज भी अच्छी होती है। पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह बताते है कि अब ट्रैक्टर आम होने से चीझण की बिजाई आसानी से हो सकती है। याद रहे कि चीझण की खेती के लिए गहराई पर ट्रैक्टर चलाना होता है। भारी साधन आज की कृषि मशीनरी में मौजूद है। ऐसे में इन जैविक तकनीकों का लाभ लेना चाहिये। इससे पर्यावरण को सुधारा जा सकता है। खर्च कम किया जा सकता है और फसल भी अच्छी होती है।

 कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते है कि सरकार भी हर जिले में चीझण के बीज मुफ्त बांटती है। पूर्व में धान की 60 दिनों में पकने वाली सट्ठी  किस्म न लगाने वाले किसानों को यह बीज दिए जाते थे अब सभी के लिए है। वे बताते है कि इस पौधे से मिïïट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। पानी की  पकड़ बढ़ाने की क्षमता भी बढ़ती है। इस के अलावा पौधे की जड़ मे बनी गांठें नाईट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया पैदा करती है। यह मिट््टी की ढांचा मजबूत कर देता है जिससे रसायनिक खाद की आवश्यक्ता काफी कम हो जाती है।