Showing posts with label contract. Show all posts
Showing posts with label contract. Show all posts

Tuesday, 8 May 2012

खेती से ऊबने लगा पंजाबी!, trends; Punjabi farmer loosing interest in farming


-गेहूं का उत्पादन रिकार्ड बनाया पर प्राकृति से सहमा है किसान
-धान की 1121 किस्म के दामों में आए उतार चढ़ाव ने भी दिया योगदान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
एक जमाना था जब बुजुर्ग खेती को उत्तम, व्यापार को मध्यम और नौकरी को निकम्मी बताया करते थे। हालात बदले तो खेत का बादशाह किसान 'नौकरीÓ को 'गुलामीÓ कहना बंद कर गया बच्चों को पढ़ लिख कर 'नौकरÓ होने की सलाह देने लगा पर खुद खेती करता रहा। वहीं अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि गेहूं उत्पादन का रिकार्ड बनाने वाला पंजाबी खेती से ही ऊबने लगा है।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वालों के रूझान में इस साल आई कमी है। एक ओर पराई जमीन पर खेती करने वाला किसान प्राकृति से सहमा है वहीं शहर जा कर मजदूरी करने में अधिक दिलचस्पी लेने लगा है। पिछले साल बड़े क्षेत्र में धान पर बाढ़ की मार पड़ी तो दूसरी बार पनीरी लगाने अमृतसर से हरियाणा के करनाल तक के दौरों ने खर्च बढ़ा दिया। अब गेहूं की कटाई पर बारिश की मार पड़ी तो कई लोगों को झटका लगा।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डा. बीएस सोहल बताते हैं कि एक अन्य कारण में पिछले सालों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी पड़ी है पर लागत मूल्य बढ़ा है। खाद, डीजल, बीज, पेस्टिीसाइड और डीएपी व यूरिया के दामों में भारी बढ़ोतरी  से  लगी है। तुलनात्मक रूप से धान की किस्म 1121 के दामों में शेयर बाजार की तरह आए उतार चढ़ाव ने भी किसानों को डरा दिया है।
वहीं नयागांव के लखविंदर सिंह औलख बताते हैं कि दो सीजन पहले तक धान की 1121 किस्म के दाम नई उंचाई छू रहे थे और यही वजह थी कि प्रति एकड़ ठेका 35 हजार के पार चला गया लेकिन पिछले साल इस किस्म के प्रतिबंधित हो जाने पर धान के सीजन में होने वाली कमाई आधी रह गई है। वे याद करते हैं कि साधारण धान की तुलना में तीन गुना दामों पर बिकने वाली और अधिक झाड़ देने वाली किस्म ने ठेके पर खेत के रेट बढ़ाए थे पर अब वैसी उपज व दाम देने वाली किस्म नहीं है और एमएसपी बढऩे की रफ्तार भी कम है। ऐसे में बचत ना होने की स्थिति में ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वाले दिखाई नहीं दे रहे। उनके यहां भी पुराने बंदे इस बार कोई बात नहीं कर रहे।
जबकि संगरूर रोड पर संसारपुर के हरजिंदर सिंह बदेशां बताते हैं कि पिछले तीन चार सीजन से हर बार दो सौ रूपये प्रति बीघा ठेका बढ़ रहा था और खेत लेने वाले खुद संपर्क करते थे पर अब वे देख रहें हैं कि खेती करने वाले लोग बिना बात किए पास से गुजर जाते हैं और बात भी नहीं करते। पूछने पर पता चलता है कि अमुक व्यक्ति शहर में दिहाड़ी करने लग गया है।
इसी क्रम में सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम में डा. बलजीत सिंह बताते हैं कि मंहगाई बढऩे के साथ ही दिहाड़ी भी बढ़ी है। तीन साल पहले डेढ़ सौ रूपये में मजदूर मिल जाता था पर अब तीन सौ से कम पर उपलब्ध नहीं है। शहर में अगर कोई दिहाड़ी करता है और गांव में रहता है तो निसंदेह खर्च कम होता है। दाने के अलावा सब्जी और पशुओं से दूध दही, लस्सी मिल जाती है और चिकन-समोसे से लेकर फिल्म-लिपिस्टिक पर खर्चा आए दिन नहीं होता। ऐसे में छह महीने में पूरे परिवार के पास आने वाली उपज की तुलना में मुखिया के पास हर दिन आते पैसे किसे अच्छे नहीं लगते?