Thursday, 7 February 2013

दक्षिणी एशियाई खेती को एक और 'जुगाड़' देगा पटियाला


 -कोरिया से आए पैडी ट्रांसप्लांटर से करवाई स्प्रे, गुडाई, ट्राली लगा ढोया चारा
-मशीन से स्प्रे में दवा का सौ फीसद उपयोग किया, हाथ से स्प्रे में होता है एक तिहाई उपयोग
-बिना जुगाड़ के 10-12 लाख रूपये की मशीन साल में मात्र 15 दिन काम आती थी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
यूरोप, उत्तरी अमेरिका व आस्ट्रेलिया के खेतों में काम करने वाली करोड़ों रूपये की कंबाइन मशीन पर पटियाला, नाभा व भादसों के ट्रैक्टर मेकेनिकों के हाथ लगे तो कीमत चंद लाख रह गई और हर किसी की पहुंच में भी आ गई। शुरु में कृषि जुगाड़ ही जाने वाले ये यंत्र अब ब्रांड बन गए है। दक्षिणी एशियाई खेती को ठीक ऐसा ही एक  और 'जुगाड़Ó पटियाला आने वाले सीजन में देने जा रहा है।
फर्क सिर्फ इतना है कि कंबाइन बनाने की शुरुआत जहां निजी क्षेत्र में निजी लाभ के लिए हुई पर नए जुगाड़ का प्रयास कृषि विभाग के विज्ञानी कर रहे हैं और वो भी पंजाबी किसानों के लिए। देश में मनरेगा के रोजगार बढऩे के बाद प्रदेश में धान की रोपाई करने की पहले मजदूरी बढ़ी फिर मजदूर गायब होने लगे तो पैडी ट्रांसप्लांटर यूरोप से लाए गए। ये खासे मंहगे थे तो इसके बाद चीन व जापान से भी पैडी ट्रांसप्लांटर पंजाब के खेतों में आए हैं। चीन की तकनीक गड़बड़ निकली तो जापानी मंहगी लगी। अब यही मशीन कोरिया से आने लगी।
प्रदेश कृषि विभाग में डिप्टी डायरेक्टर रहे और वर्तमान में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं 10 से 12 लाख रूपये की ये मशीन साल में मात्र 15 दिन काम आती है, ऐसे में इसी मशीन में कुछ बदलाव कर इससे गेहूं व सीधी बिजाई वाले धान के खेत में गोडी करने का जुगाड़ फिट किया है। अब इसीमें खेत में सप्रे करने वाली मशीन भी लगाई जा रही है, जिससे सौ फीसद स्प्रे पौधे पर ही हो सकेगी। पहले वीडीसाइड और फिर पेस्टीसाइड के अलावा किसी प्रकार की बीमारी लगने की सूरत में अन्य दवा का छिड़काव भी संभव है।
डा. सोहल बताते हैं कि हाल ही में समाना ब्लाक के एक किसान के यहां पर उसके सीरी ने गलती से खेत की मेढ़ पर छिड़कने वाली दवा को खेत में गेहूं के पौधे पर छिड़क दिया। होना तो यह चाहिए था कि सारे पौधे जल जाते लेकिन दो तिहाई फिर भी बच गई। स्पष्ट है कि खेत में स्प्रे का पूरा इस्तेमाल नहीं होता, ये वातावरण में प्रदूषण फैलाने व अन्य नुकसान वाले काम च्यादा करती है।
ऐसे में जब ट्रांस्पलांटर के पीछे 25 फीट चौड़ी नोजल लगेगी तो इसके ड्रोप लेट से समान गति से बराबर का छिड़काव होगा और केवल फसल पर ही होगा। अभी तक मौजूद तकनीक में या तो हाथ से किया जाता है, या ट्रैक्टर से, लेकिन धान व गेहूं के पौधे लगने के बाद ट्रैक्टर से ये छिड़काव संभव नहीं है। मशीन से हुए स्प्रे से अरबों रूपये की ना केवल दवा बचेगी अपितु प्रदूषण पर भी रोक लगेगी।
दिलचस्प है कि ट्रांसप्लांटर में टायरों के स्थान पर फाइबर के बने फलोटिंग चक्के लगे हैं। फिशिंग में प्रयोग आने वाले ये पहिये गारे में भी चलते हैं और गुडाई भी करते हैं। ये धान व गेहूं के पौधे की लाइनों में अंतराल पर कुछ ऐसे चलते हैं कि बिना पौधे को कुचले गोडाई भी कर सकेंगे। साल में 10-15 दिन काम आने वाली लाखों की मशीन 365 दिन काम में ली जा सकेगी। जब इसके पीछे छोटी ट्राली लगी होगी तो चारा अथवा अन्य सामान भी ढोह सकेगी।


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