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Saturday, 4 August 2012

पापुलर ने दिया एफडी से च्यादा रिर्टन, Popular gives batter returns then bank FDR



-चार साल में दोगुने हुए दाम
-बैंक दे रहे बिना किश्त का नौ साल के लिए लोन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में गेहूं-धान की द्वी-फसलीय चक्र चाहे किसी से ना टूटा हो पर राज्य में खेतों की मेढ़ पर लगने वाला पापुलर खासा पापुलर होने लगा है। कारण सरकार के किसी विभाग अथवा डाईवर्सिफीकेशन  प्रेमियों के प्रयास नहीं है। इसे सिर्फ और सिर्फ आर्थिक कारणों ने लोकप्रिय कर दिया है। हालांकि पहली नजर में पापुलर की बढ़ रही कटाई इसका क्षेत्र कम होने की ओर इशारा कर रही थी, लेकिन सामने आया कि एफडी से ना केवल च्यादा रिर्टन दे रहा है बल्कि लोगों में और च्यादा 'पापुलरÓ हो रहा है।
इसकी कीमतें पिछले चार सालों में दोगुनी हो गई है। 300 रुपये क्विंटल तक बिकने वाला पॉपलर 500 रुपये से लेकर 800 रुपये क्विंटल तक पहुंच गया और पंजाब से बाहर इसके दाम 12 सौ रूपये क्विंटल भी हैं। हरियाणा के जगाधरी, यमुनानगर क्षेत्र में ये दाम अच्छी क्वालिटी और मात्रा होने पर मिलते हें। ऐसे में बैंक एफडी से कहीं अधिक रिर्टन दे रहा है।
नैशनल नर्सरी के एमडी अब्दुल वाहिद बताते हैं कि किसान को सवार्धिक फायदा देने वाला पेड़ है।  20 फुट का तो नर्सरी, में ही किया जा सकता है। पांच साल में किसान को अतिरिक्त आय दे देता है। वे ही हर साल 20 हजार पौधे बेच रहे हैं। उत्पादन च्यादा हो तो च्यादा भी बिक जाऐंगे।
दिलचस्प है कि 90 सेमी. मोटाई पर बिकना आम है पर इसे ढ़ाई मीटर तक फैलने दिया जा सकता है। प्रदेश में सर्दी के दिनों में झड़े इसके पत्ते सूरज की किरणें नहीं रोकते और खेत में ही खाद बन जाते है। तो गर्मी में हर फसल को राहत देते है। यों आठ नौ साल बाद फसल ली जाती है पर कुछ लोग तीन साल बाद ही इसकी कटाई के बारे में सोचने लग जाते हैं।
 प्रदेश में बैंक भी पॉपुलर के नाम पर लोन देने को तैयार है। कम से कम 150 पेड़ो के लिए दिए जाने वाले इस लोन की वापसी के लिए ना तो किश्तें है और ना ही किसी को पहले आठ साल लोन के बारे में पूछा जाता है, साल बाद केवल ब्याज के रूप में मामूली भुगतान करना होता है। फार्म की जमीन में कोई बड़ी गड़बड़ ना हो तो नौ सालों के लिए पॉपुलर पर लोन दिए जा रहे है। सिर्फ जनवरी-फरवरी मं लगने वाले पॉपुलर पर वन विभाग की ओर से सबसिडी पर 12 से 15 फीट के पौधे दिए जाते है और बैंक किसान के नाम पर बैंक को ही भुगतान कर देता है। इतना ही नहीं बैंक आठ सालों तक लगातार लोन भी देते है अगर किसी ने एक हैक्टेयर में पांच हजार पौधे लगाने हों।
वन विभाग अगले साल से हरियाली मिशन के तहत खेतों में मोटर के पास, पानी की खाल व मेढ़ पर लगाने के लिए कुछ इसी तरह के पौधे लगाने जा रहा है जिनमें साधारण मिट्टी पर पापुलर और टाली जबकि सेम वाले क्षेत्रों में सफेदा प्रमुख होगा। हालांकि इसे वन विभाग किसी बीड़ में नहीं लगवाता, लेकिन किसानों के लिए कामर्शियल रूप से खेती करवाने पौधे जरूर उपलब्ध करवाता है।

क्या कहते हैं प्रमुख सचिव

राच्य के वन व वन्य प्राणी विभाग के प्रमुख सचिव डीएस बैंस पापूलर के सवाल पर अपना निजी उदाहरण देते हैं कहते हैं कि वे छोटे किसान हैं और मुक्तसर जिले में उन्होंने अपने फार्म पर पापूलर के पौधे 11 साल पहले लगाए थे और दो साल पहले 17 लाख रूपये की कमाई हुई पिछले साल ये आंकड़ा 15 लाख रूपये रहा और इतनी ही और कमाई होने की उम्मीद अभी और है। ये पौधे भी सिर्फ खेत की मेढ़ पर लगाए गए हैं। किसान चाहे तो अतिरिक्त कमाई इस पौधे से की जा सकती है।


कहां आता है काम
पेंसिल, माचिस की तिल्लीयां, खेेलों का सामान, पैकेजिंग, के अलावा इससे पलाईवुड तैयार होता है। वर्तमान में राज्य में प्लाईवुड की करीब 100 इकाइयां चल रही हैं। जिनमें वार्षिक औसतन 30 लाख क्यूबिक लकड़ी की खपत हो रही है। पड़ोसी राज्य हरियाणा में लकड़ी की बड़ी मंडी है। इसके चलते पंजाब से बड़े स्तर पर लकड़ी बाहर जाती है। हालांकि लकड़ी बाहर भेजने पर दो फीसदी टैक्स लगा हुआ है इसके बावजूद बाहर से आ रहे व्यापारी बिना टैक्स के ही लकड़ी ले जा रहे हैं। हरियाणा से तैयार माल बिलों में जम्मु-कश्मीर के नाम पर चलता है लेकिन बिकता पंजाब में है। जिससे यहां के उद्यमी 12.5 फीसदी वैट बचा रहे हैं। राज्य के व्यापारियों को पॉपुलर कुछ ऐसे लाभ दे रहा है तो किसानों के लिए मुनाफाखोरी के रास्ते पॉपुलर ने खोले है। पंजाब वन निगम सूत्र बताते है कि हरियाणा में किसानों को पंजाब के मुकाबले लकड़ी की ज्यादा कीमत मिलती है। इसके चलते हरियाणा के साथ लगते इलाकों के किसान अपनी लकड़ी हरियाणा में बेच रहे हैं।


कहां से आया पापुलर?
सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला पॉपुलर के पंजाब में पापुलर होने के पीछे अलग से तर्क देते है कहते है कि पंजाबियों को कनाडा से इतना प्यार हुआ कि खुद तो वहां जा बसे पर वहां का पेड़ यहां भेज दिया। याद रहे कि उत्तरी अमेरिका से चला ये पेड़ यूरोप होता हुआ पश्चिमी एशिया के रास्ते पंजाब आया है और इसके ठीक विपरीत यही वो रास्ता है जहां से उल्टे पांव कबूतर बाजी होती है।

Tuesday, 8 May 2012

खेती से ऊबने लगा पंजाबी!, trends; Punjabi farmer loosing interest in farming


-गेहूं का उत्पादन रिकार्ड बनाया पर प्राकृति से सहमा है किसान
-धान की 1121 किस्म के दामों में आए उतार चढ़ाव ने भी दिया योगदान
भूपेश चट्ठा, पटियाला
एक जमाना था जब बुजुर्ग खेती को उत्तम, व्यापार को मध्यम और नौकरी को निकम्मी बताया करते थे। हालात बदले तो खेत का बादशाह किसान 'नौकरीÓ को 'गुलामीÓ कहना बंद कर गया बच्चों को पढ़ लिख कर 'नौकरÓ होने की सलाह देने लगा पर खुद खेती करता रहा। वहीं अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि गेहूं उत्पादन का रिकार्ड बनाने वाला पंजाबी खेती से ही ऊबने लगा है।
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वालों के रूझान में इस साल आई कमी है। एक ओर पराई जमीन पर खेती करने वाला किसान प्राकृति से सहमा है वहीं शहर जा कर मजदूरी करने में अधिक दिलचस्पी लेने लगा है। पिछले साल बड़े क्षेत्र में धान पर बाढ़ की मार पड़ी तो दूसरी बार पनीरी लगाने अमृतसर से हरियाणा के करनाल तक के दौरों ने खर्च बढ़ा दिया। अब गेहूं की कटाई पर बारिश की मार पड़ी तो कई लोगों को झटका लगा।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डा. बीएस सोहल बताते हैं कि एक अन्य कारण में पिछले सालों में न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी पड़ी है पर लागत मूल्य बढ़ा है। खाद, डीजल, बीज, पेस्टिीसाइड और डीएपी व यूरिया के दामों में भारी बढ़ोतरी  से  लगी है। तुलनात्मक रूप से धान की किस्म 1121 के दामों में शेयर बाजार की तरह आए उतार चढ़ाव ने भी किसानों को डरा दिया है।
वहीं नयागांव के लखविंदर सिंह औलख बताते हैं कि दो सीजन पहले तक धान की 1121 किस्म के दाम नई उंचाई छू रहे थे और यही वजह थी कि प्रति एकड़ ठेका 35 हजार के पार चला गया लेकिन पिछले साल इस किस्म के प्रतिबंधित हो जाने पर धान के सीजन में होने वाली कमाई आधी रह गई है। वे याद करते हैं कि साधारण धान की तुलना में तीन गुना दामों पर बिकने वाली और अधिक झाड़ देने वाली किस्म ने ठेके पर खेत के रेट बढ़ाए थे पर अब वैसी उपज व दाम देने वाली किस्म नहीं है और एमएसपी बढऩे की रफ्तार भी कम है। ऐसे में बचत ना होने की स्थिति में ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वाले दिखाई नहीं दे रहे। उनके यहां भी पुराने बंदे इस बार कोई बात नहीं कर रहे।
जबकि संगरूर रोड पर संसारपुर के हरजिंदर सिंह बदेशां बताते हैं कि पिछले तीन चार सीजन से हर बार दो सौ रूपये प्रति बीघा ठेका बढ़ रहा था और खेत लेने वाले खुद संपर्क करते थे पर अब वे देख रहें हैं कि खेती करने वाले लोग बिना बात किए पास से गुजर जाते हैं और बात भी नहीं करते। पूछने पर पता चलता है कि अमुक व्यक्ति शहर में दिहाड़ी करने लग गया है।
इसी क्रम में सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम में डा. बलजीत सिंह बताते हैं कि मंहगाई बढऩे के साथ ही दिहाड़ी भी बढ़ी है। तीन साल पहले डेढ़ सौ रूपये में मजदूर मिल जाता था पर अब तीन सौ से कम पर उपलब्ध नहीं है। शहर में अगर कोई दिहाड़ी करता है और गांव में रहता है तो निसंदेह खर्च कम होता है। दाने के अलावा सब्जी और पशुओं से दूध दही, लस्सी मिल जाती है और चिकन-समोसे से लेकर फिल्म-लिपिस्टिक पर खर्चा आए दिन नहीं होता। ऐसे में छह महीने में पूरे परिवार के पास आने वाली उपज की तुलना में मुखिया के पास हर दिन आते पैसे किसे अच्छे नहीं लगते?

Tuesday, 31 January 2012

पटियाला जिले में मतदान से चार दिन पहले के हालात, punjab election, trends, 4 days before election


 
कांग्रेस- 4 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, नाभा, सनौर
अकाली-4 समाना, शुतराणा, घनौर, राजपुरा

कड़ा मुकाबला- घनौर, राजपुरा, सनौर


पिछला रिकार्ड
कांग्रेस-6 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, समाना, शुतराणा, सनौर, घनौर, नाभा
भाजपा- 1 राजपुरा
 अकाली- 1 बनूड़ अब डेरा बस्सी हुई




1 पटियाला शहर
मुकाबला एकतरफा व कैप्टन अमरिंदर के पक्ष में है। 

अकाली उम्मीदवार सुरजीत सिंह कोहली व उनके मेयर पुत्र की ओर से भी हल्का प्रचार ही किया जा रहा है। मेयर एक घंटे में एक ही स्थान पर जा रहे हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर की बेटी रोजाना और पत्नि एक दिन छोड़ कर आ रही हैं।

2 पटियाला ग्रामीण
मुकाबला त्रिकोणीय पर कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा की बढ़त

निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आक्रमक प्रचार के चलते ग्रामीण व युवा वर्ग का वोट बैंक अकालियों कुलदीप कौर टोहड़ा के हाथ से फिसल रहा है, शहर में रूझान उन्हें समझ नहीं आ रहा। जबकि ब्रहम महिंदरा शहर के त्रिपड़ी टाउन में बहावलपुर बिरादरी के अलावा पुराने लोगों को साथ लेने में सफल हो गए हैं।  

3 समाना
अकाली उम्मीदवार सुरजीत रखड़ा बढ़त बनाए हुए हैं। 

कांग्रेस के रणइंद्र सिंह अपने बठिंडा क लोगों को साथ लेने के अलावा दो पूर्व अकालियों पूर्व विधायकजगतार सिंह राजला और गुरकीरत सिंह थूही को साथ लिए घूम रहे है। उनकी उम्मीद परनीत कौर पर ही टिकी है जबकि रखड़ा घबराए हुए जरूर हैं और बेहद संभल कर कदम रख रहे हैं।  

4 सनौर
मुकाबला फंसा है कांग्रेस के लाल सिंह परेशान

अकाली तेजिदंर पाल संधू ने घाघ सियासतदान कांग्रेस के लाल सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी है। उम्मीद के विपरीत परीसीमन के बाद जुड़े गांवों में लाल सिंह कमजोर हैं तो पुराने क्षेत्र में उनके विरोध में भी आवाजें आ रही  हैं। इस बार अकाली दल से कोई भी बागी नहीं है।

5 शुतराणा

अकाली दल के पक्ष में हवा बनने लगी
 
कैप्टन अमरिंदर की रैली से उम्मीदें लगाए बैठे निर्मल सिंह शुतराणा दो बार भावनाओं के सहारे जीते हैं लेकिन इस बार अकाली दल का टिकट चुनाव, बनिंदर कौर लूंबा, खासा सही साबित हो रहा है। अकाली बहुल मानी जाती सीट पर परनीत कौर के आने के बाद से हालात बदले रहे थे पर अब सुखबीर का असर दिख रहा है। एसओआई मुद्दा बन रही है।

6घनौर
मुकाबला त्रिकोणीय, गणित अकालियों के पक्ष में आने लगा

अकाली दल के बागी हुए और कैप्टन अमरिंदर के पुराने सहयोगी भाउ भाईचारा के प्रधान बलविंदर सिंह सैफदीपुर ने दोनों के समीकरण बिगाड़ रखे हैं। परीसीमन के बाद दो साल पहले तक अकाली दल के लिए पक्की समझी जा रही सीट का गणित अब अकालियों के पक्ष में आरहा है। भाउ भाईचारा कांग्रेस के वोट ज्यादा तोड़ रहा है, कामरेड व जसजीत रंधावा के समर्थक मदन लाल जलालपुर से दूरी बनाए हुए हैं।

7 राजपुरा
भाजपा के राजखुराना असहज पर अब हालात पक्ष में

बहावलपुरी बिरादरी में कुछ लोगों की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई, कांग्रेस के कंबोज पर लगा बाहरी का ठप्पा अब हल्का पड़ गया है, आसपास के गांवों विशेष रूप से बनूड़ के पास, में कांग्रेस को समर्थन मिल रहा है।    

8 नाभा

लोगों को नही है दिलचस्पी, हवा कांग्रेस के पक्ष में

दोनों ही उम्मीदवारों के बाहर से आने पर स्थानीय वोटर को दिलचस्पी नहीं है। कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत का खुला विरोध नहीं है वहीं अकाली दल में लालका को टिकट ना दिया जाना चर्चा में है।    

पटियाला जिले में मतदान से दस दिन पहले के हालात,punjab election, trends, 10 days


कांग्रेस- 2 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण
अकाली-2 समाना, शुतराणा
मुकाबले में- 3 सनौर, घनौर, राजपुरा
सुस्त रुझान- 1 नाभा

पिछला रिकार्ड
कांग्रेस-6 पटियाला शहर, पटियाला ग्रामीण, समाना, शुतराणा, सनौर, घनौर, नाभा
भाजपा- 1 राजपुरा
 अकाली- 1 बनूड़ अब डेरा बस्सी हुई




1 पटियाला शहर
मुकाबला एकतरफा व कैप्टन अमरिंदर के पक्ष में है। 

अकाली उम्मीदवार सुरजीत सिंह कोहली व उनके मेयर पुत्र की ओर से भी हल्का प्रचार ही किया जा रहा है। मेयर एक घंटे में एक ही स्थान पर जा रहे हैं, जबकि कैप्टन अमरिंदर की बेटी रोजाना और पत्नि एक दिन छोड़ कर आ रही हैं।

2 पटियाला ग्रामीण
मुकाबला त्रिकोणीय पर कांग्रेस के ब्रहम महिंदरा की बढ़त

निर्दलीय सतबीर सिंह खटड़ा के आक्रमक प्रचार के चलते ग्रामीण व युवा वर्ग का वोट बैंक अकालियों कुलदीप कौर टोहड़ा के हाथ से फिसल रहा है, शहर में रूझान उन्हें समझ नहीं आ रहा। जबकि ब्रहम महिंदरा शहर के त्रिपड़ी टाउन में बहावलपुर बिरादरी के अलावा पुराने लोगों को साथ लेने में सफल हो गए हैं।  

3 समाना
अकाली उम्मीदवार सुरजीत रखड़ा बढ़त बनाए हुए हैं। 

कांग्रेस के रणइंद्र सिंह अपने बठिंडा क लोगों को साथ लेने के अलावा दो पूर्व अकालियों पूर्व विधायकजगतार सिंह राजला और गुरकीरत सिंह थूही को साथ लिए घूम रहे है। उनकी उम्मीद परनीत कौर पर ही टिकी है जबकि रखड़ा घबराए हुए जरूर हैं और बेहद संभल कर कदम रख रहे हैं।  

4 सनौर
मुकाबला फंसा है कांग्रेस के लाल सिंह परेशान

अकाली तेजिदंर पाल संधू ने घाघ सियासतदान कांग्रेस के लाल सिंह को कड़ी टक्कर दे रखी है। उम्मीद के विपरीत परीसीमन के बाद जुड़े गांवों में लाल सिंह कमजोर हैं तो पुराने क्षेत्र में उनके विरोध में भी आवाजें आ रही  हैं। इस बार अकाली दल से कोई भी बागी नहीं है।

5 शुतराणा

कांग्रेस के पक्ष में अभी हवा नहीं
कैप्टन अमरिंदर की रैली से उम्मीदें लगाए बैठे निर्मल सिंह शुतराणा दो बार भावनाओं के सहारे जीते हैं लेकिन इस बार अकाली दल का टिकट चुनाव, बनिंदर कौर लूंबा, खासा सही साबित हो रहा है। अकाली बहुल मानी जाती सीट पर परनीत कौर के आने के बाद से हालात बदले हैं।

6घनौर
मुकाबला त्रिकोणीय, गणित समझना मुश्किल 

अकाली दल के बागी हुए और कैप्टन अमरिंदर के पुराने सहयोगी भाउ भाईचारा के प्रधान बलविंदर सिंह सैफदीपुर ने दोनों के समीकरण बिगाड़ रखे हैं। परीसीमन के बाद दो साल पहले तक अकाली दल के लिए पक्की समझी जा रही सीट का गणित समझना अब मुश्किल है। लेकिन भाउ भाईचारा कांग्रेस के वोट ज्यादा तोड़ रहा है।

7 राजपुरा
भाजपा के राजखुराना असहज हुए

बहावलपुरी बिरादरी में कुछ लोगों की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई, कांग्रेस के कंबोज पर लगा बाहरी का ठप्पा अब हल्का पड़ गया है, आसपास के गांवों में कांग्रेस को समर्थन मिल रहा है।    

8 नाभा

लोगों को नही है दिलचस्पी

दोनों ही उम्मीदवारों के बाहर से आने पर स्थानीय वोटर को दिलचस्पी नहीं है। कांग्रेस के साधु सिंह धर्मसोत का खुला विरोध नहीं है वहीं अकाली दल में लालका को टिकट ना दिया जाना चर्चा में है।    

Tuesday, 5 July 2011

लेजर लेवलिंग पर किसान फिदा, farmaline, trends, save water, lazer levelling,

फायदा
लेवलिंग पर प्रति एकड़ 15 सौ रुपये की आ रही लागत
पानी की बचत को देख किसानों में बढ़ा इसका प्रचलन
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पांच-छह सालों से पंजाब के किसानों को खेत समतल करने की आधुनिक लेजर लेवलिंग तकनीक पर भाषण देते रहने के बाद अब कृषि विभाग का जागरूकता अभियान रंग लाने लगा है। दिलचस्प है कि किसानों ने शुरुआत में इसे सरकारी अफसरों का ड्रामा बता कर नकार दिया। जिन गांवों में पिछले साल इसे आंशिक रूप से अपनाया गया, वहां के किसान इस साल लेजर लेवलिंग पर पूरी तरह से फिदा हो गए हैं। प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में लेजर लेवलिंग को जल सरंक्षण की बेहतरीन तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। इससे उबड़-खाबड़ खेत को बराबर कर पानी का पूरी तरह से खेत में समान रूप से फैलने के लाभ गिनवाए गए। बताया गया कि चंद रुपये खर्च कर किसान इसका भरपूर लाभ ले सकते हैं। इससे धान की रोपाई में पानी कम खर्च होगा तो गेहूं की बिजाई के बाद इसके मरने के खतरे भी कम होंगे। धर्मेहड़ी गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि पहले पहल तो लगा था कि सरकारी बाबू अपने कमीशन के चक्कर में एक और जुगाड़ उन पर थोप रहे हैं, लेकिन अब उन्हें इसके लाभ दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आठ में से तीन एकड़ में लेवलिंग करवाई है और ये तीनों ही फर्श के समान हो गए हैं। मात्र दो ही घंटे में एक एकड़ में पानी फैल गया है। रोपाई के बाद हर जगह पर धान बराबर उंचाई पर दिखाई दे रहा है। मेहनत भी कम लगी है। कद्दू करने में ट्रैक्टर भी कम चला तो डीजल भी बचा है। इसकी तीन साल की मियाद कम और 15 सौ रुपये प्रति एकड़ का खर्च ज्यादा लग रहा है। इसी संबंध में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इससे पानी की बचत हो रही है। तीन सालों के बाद फिर से लेवलिंग करवाने की बात पर डा. सोहल कहते हैं कि तवी चलने पर बाहर की मिट्टी अंदर की ओर गिराने पर ये असमतल होने लगता है। पहली बार में लेवलिंग करने पर जहां ढाई घंटे का समय लगता है, वहीं बाद में आधा घंटा ही रह जाता है। ऐसे में पैसे भी कम हो जाते हैं। सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी पर डा. सोहल कहते हैं कि साढ़े तीन लाख की मशीन पर डेढ़ लाख रुपये की सब्सिडी दी जा रही है।

Saturday, 2 July 2011

मौसम और मजदूरों नै मित्तरां नूं मोटर ते बठाया, farmer, trends, paddy soawing, live from moter

खेत से लाइव, आपसी सहयोग
सेवा ट्रैक्टर की हो या पड़ोसी की, मोटर के पानी की सब हाजिर है
 एक-दूसरे की मदद को पहुंच रहे हैं दोस्त और रिश्तेदार
भूपेश चट्ठा, पटियाला : गर्मियों की छुट्टियों के इन दिनों में बच्चे वेस्टइंडीज में क्रिकेट के सपने देख रहे हैं और आसमान में बादल आते ही शहर में बच्चे बैट बॉल लेकर निकल पड़ते हैं तो गांव में बच्चे ट्रैक्टर के आगे पीछे होने लगते हैं। मौसम में नमी और एक-आध दिन छोड़कर आ रही बारिश ने किसानों के चेहरे इस कदर खिला दिए हैं कि प्रभाव घर परिवार में दिखने लगा है। खुशनुमा माहौल में किसान धान की रोपाई जल्द निपटाने में लगा है।
दिलचस्प है कि मौसम की मेहरबानी और अन्य राज्यों से धान की रोपाई को आने वाले मजदूरों की कमी ने किसानों के दोस्तों-रिश्तेदारों को एक ही मोटर पर ला बिठाया है। डकाला ब्लाक के खेड़ी, रामगढ़ सपेड़ा, धर्मेहड़ी इत्यादि गांवों के रविवार को किए दौरे में पाया गया कि आजकल न केवल किसान अपितु उनके परिवार के सभी सदस्य पूरे जी जान से धान की रोपाई में लगे हैं। बीते सालों को याद करते हुए गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अक्सर जून के महीने में किसान चिलचिलाती गर्मी में बिजली की मांग के लिए धरने प्रदर्शन कर रहा होता था या फिर सरकार को कोस रहा होता था और लड़के ग्रिड फूंकने और बिजली वालों को उठा लाने जैसी स्कीमें गढ़ रहे होते थे, पर इस बार कम से कम अब तक कुदरत की मेहरबानी से ऐसा कुछ नहीं है। वाहेगुरु की मेहर है। अरदास है कि सीजन अच्छे से निकल जाए।
वहीं रामनगर नाके पर जमे नवां गांव के गुरविंदर सिंह पूरी तरह से विकास की बातें करते हैं कि पहले एक बार ट्रांसफार्मर क्या जलता कई दिनों तक बिजली की उम्मीद नहीं होती थी पर अब लगता है कि शायद आज रात ही आ जाए। बीते साल के अच्छे मानसून से बांधों में भरे पानी से मिल रही बिजली और बिजली चोरी के कम हो रहे साधन की बात जब उन्हें बताई जाती है और पूछा जाता है कि सरकार का कम और प्रकृति व जागरूक हुए लोगों का इसमें ज्यादा योगदान है तो तपाक से कहा जाता है कि रब्ब भी वही है और लोग भी वही। फर्क बस इतना है कि तन पर कच्छहरे का स्थान शॉर्ट व लोवर ने ले लिया है। गड्डा नहीं दिखता तो मोटरसाइकिल आम हो गए हंै।
लगभग हर गांव में आलम यह है कि लोग एक दूसरे की मदद को अन्य स्थानों से भी पहुंच रहे हैं। जिस दोस्त का काम पहले हो गया है वो फोन कर टै्रक्टर सहित सेवा में तैयार होने की बात करता है। बस राशन कैंटीन से हो जाए तो बेहतर नहीं तो सोडा कम से कम साथ होने का आश्र्वासन जरूर चाहता है, हालांकि मौका देख कर स्वदेशी शक्ति वाटर से भी एतराज नहीं करता। मजदूरों की कमी क्या हुई शहर में अफसरी करने वाले भी तंबे में आ कर बहन, बुआ व मासी के यहां रिश्तेदारी में मदद करने को आ गए हैं। सेवा ट्रैक्टर की लगी हो या पड़ोसी की मोटर के पानी की सब हाजिर हो रहा है।

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फायदा
 लेवलिंग पर प्रति एकड़ 15 सौ रुपये की आ रही लागत
: पानी की बचत को देख किसानों में बढ़ा इसका प्रचलन
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पांच-छह सालों से पंजाब के किसानों को खेत समतल करने की आधुनिक लेजर लेवलिंग तकनीक पर भाषण देते रहने के बाद अब कृषि विभाग का जागरूकता अभियान रंग लाने लगा है। दिलचस्प है कि किसानों ने शुरुआत में इसे सरकारी अफसरों का ड्रामा बता कर नकार दिया। जिन गांवों में पिछले साल इसे आंशिक रूप से अपनाया गया, वहां के किसान इस साल लेजर लेवलिंग पर पूरी तरह से फिदा हो गए हैं। प्रदेश में सिंचाई क्षेत्र में लेजर लेवलिंग को जल सरंक्षण की बेहतरीन तकनीक के रूप में देखा जा रहा है। इससे उबड़-खाबड़ खेत को बराबर कर पानी का पूरी तरह से खेत में समान रूप से फैलने के लाभ गिनवाए गए। बताया गया कि चंद रुपये खर्च कर किसान इसका भरपूर लाभ ले सकते हैं। इससे धान की रोपाई में पानी कम खर्च होगा तो गेहूं की बिजाई के बाद इसके मरने के खतरे भी कम होंगे। धर्मेहड़ी गांव के हरदीप सिंह कहते हैं कि पहले पहल तो लगा था कि सरकारी बाबू अपने कमीशन के चक्कर में एक और जुगाड़ उन पर थोप रहे हैं, लेकिन अब उन्हें इसके लाभ दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आठ में से तीन एकड़ में लेवलिंग करवाई है और ये तीनों ही फर्श के समान हो गए हैं। मात्र दो ही घंटे में एक एकड़ में पानी फैल गया है। रोपाई के बाद हर जगह पर धान बराबर उंचाई पर दिखाई दे रहा है। मेहनत भी कम लगी है। कद्दू करने में ट्रैक्टर भी कम चला तो डीजल भी बचा है। इसकी तीन साल की मियाद कम और 15 सौ रुपये प्रति एकड़ का खर्च ज्यादा लग रहा है। इसी संबंध में मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि इससे पानी की बचत हो रही है। तीन सालों के बाद फिर से लेवलिंग करवाने की बात पर डा. सोहल कहते हैं कि तवी चलने पर बाहर की मिट्टी अंदर की ओर गिराने पर ये असमतल होने लगता है। पहली बार में लेवलिंग करने पर जहां ढाई घंटे का समय लगता है, वहीं बाद में आधा घंटा ही रह जाता है। ऐसे में पैसे भी कम हो जाते हैं। सरकार की ओर से दी जा रही सब्सिडी पर डा. सोहल कहते हैं कि साढ़े तीन लाख की मशीन पर डेढ़ लाख रुपये की सब्सिडी दी जा रही है।

Thursday, 16 June 2011

राज मिस्त्री-ड्राइवर हो गए खेत मजदूर, paddy soawing, trends, rural employment


चलो पिंड चल्लिये

पंजाबी मजदूरों को लुभाने लगा पुराना काम धान की रोपाई में मोटी कमाई के चलते पंजाबी परिवारों की बनी टीम
घर में दो सौ की बजाय आ रही दो हजार रुपये दिहाड़ी
भूपेश चट्ठा पटियाला
 धान की रोपाई के शुरुआती दिनों में हो रही बारिश और लेबर रेट के आसमान छूने के साथ ही पंजाब के किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं धान की रोपाई कम मजदूरी के चलते छोड़ चुके पंजाबी खेत मजदूर को पुराना काम लुभाने लगा है। पांच सालों में साढ़े पांच गुणा बढ़ चुके धान की रोपाई के रेट से पंजाबी मजदूरों की टीमें बनने लगी हैं। पूर्ण रूप से टकसाली पंजाबी तकनीक व जुमलों से लैस 10 से 12 बंदों की टीमों में ज्यादातर वह नए लड़के शामिल हैं, जिनके बुजुर्ग बीते जमाने में धान की रोपाई करते रहे हैं। यह लोग गांव छोड़ चुके हैं। सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते हैं कि पहले शहर का ग्लैमर खींच रहा था। अब महंगाई में जरूरतों को पूरा करने के लिए गांव की ओर लौट रहे हैं। इनमें राज मिस्त्री से लेकर, खराद पर काम करने वाले मैकेनिक तक सब शामिल हैं। इसके अलावा कुनबे अथवा बेहड़े की महिलाएं भी टीमें बना कुछ ऐसे ही उपाय कर रही हैं, जो दिहाड़ी चार सौ रुपये तक ले रही हैं। बत्ता गांव के सरपंच व प्रोग्रेसिव किसान अश्वनी बत्ता कुछ अलग कारण बताते हैं। कहते हैं कि यह काम पूरी तरह से पारिवारिक है। आम दिनों में घर का एक पुरुष सदस्य शहर जा कर 150 से 200 रुपये की दिहाड़ी ला पाता है, जबकि खेत मजदूरी करने वालों का ठीक वही सीजन है, जो व्यापारियों व कंज्यूमर डयूरेबल बनाने वाली कंपनियों के लिए दिवाली के दिनों में होता है। इन दिनों में पूरा परिवार, जिसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग व अपाहिज भी शामिल हैं। सभी एक टीम के रूप में काम करते हैं। पांच से सात सदस्य मिल कर एक दिन में एक एकड़ में रोपाई कर लेते हैं, ऐसे में घर की दिहाड़ी दो हजार के पार हो जाती है। दिलचस्प है कि राज्य सरकार के कृषि विभाग ने चीन से लेकर जापान तक से पैडी ट्रांसप्लांटर आयात किए निजी क्षेत्र में भी ठीक ठाक सब्सिडी दे दी, लेकिन इनकी राज्य में कुल संख्या छह सौ भी पार नहीं कर पाई है और 70 लाख एकड़ में धान की रोपाई की जानी है। एक मशीन दिन भर में चार से छह एकड़ में ही धान की पनीरी लगा पाती है। ट्रांसप्लांटरों की गिनती का कम होना और इनके लिए पनीरी लगाने की विशेष तकनीक सीखने में पंजाब के किसानों की दिलचस्पी ना होना, परंपरागत तरीके प्रति बढ़ा आकर्षण है। कृषि विशेषज्ञ डा.बीएस सोहल कहते हैं कि आप तीन साल पहले के 15 सौ रुपये प्रति एकड़ की बात भूल जाएं। इससे भी दो साल पहले तो दाम मात्र छह सौ रुपये प्रति एकड़ ही थे। इस साल ढ़ाई हजार पर भी आ जाए तो गलत नहीं होगा। पंजाब के लिए एक महीने चलने वाला यही नरेगा है।

Monday, 9 May 2011

सोने-चांदी में भारी गिरावट से अक्षय तृतीया पर असमंजस, gold, silver, trends

-एक ही दिन में चांदी 14 फीसदी फिसली

- सोना अपनी उंचाई से पखवाड़े में दस फीसदी नीचे आया

भूपेश चट्ठा, पटियाला

विवाह के गहने हो या निवेश, सोना-चांदी खरीदना हमेशा से ही नगद राशि की तुलना में अच्छा माना जाता रहा है, ये सस्ता मिल जाए और इसके लिए वर्ष का सबसे शुभ महूर्त हो तो सोने पे सुहागा वाली बात हो जाती है लेकिन इस साल अक्षय तृतीया जैसे शुभ महूर्त पर सभी आदर्श परिस्थितियों के एक साथ आ जाने के बावजूद खरीदारी शगुन से आगे नहीं बढ़ी है। लोग असमंजस में हैं कि क्या सोना-चांदी यहां से ओर गिरेगा या एक बार फिर उपर का रुख करेगा। इसी उधेड़बुन ने आम आदमी के हाथ बांध दिए है।

बाजार पर करीब से निगाह रखने वाले बताते है कि पिछले आठ सालों से सोना अप्रैल सात से 20 के बीच अपना वर्ष भर की नई उंचाई बनाता आ रहा है। इस बार भी अप्रैल में 23 हजार 600 के पार जाने के बाद अक्षय तृतीया से ठीक एक दिन पहले भारी गिरावट के बाद भारत में सोना खरीदने के सबसे पवित्र दिन यह एक बार फिर अपनी उंचाई से करीब दस फीसदी नीचे आ गिरा है।

ठीक ऐसे ही हालात चांदी के बन पड़े है, चांदी भी 73 हजार से एक ही दिन में 14 फीसदी टूट कर 54 हजार पर आ गई है। कमोडिटी बाजार में कच्चा तेल वीरवार की शाम दस डालर गिरा तो अक्षय तृतीया पर इसमें चार डालर प्रति बैरल की गिरावट के साथ ये 95 डालर तक सिमट चुका है। विश्व भर में लगभग सभी मुद्राओं के मुकाबले डालर का मजबूत होना इन धातुओं को नीचे ला रहा है।

जानकार कहते है कि अक्षय तृतीया को इस बार शगुन के रूप में सोना खरीदना है तो ठीक अन्यथा त्यौहारी सीजन या विवाहों के अगले सीजन को ध्यान में रख खरीदारी करनी हो तो जून का इंतजार जरूर कर लेना चाहिए। आने वाले समय में बढ़ी ब्याज दरों के चलते इन मूल्यवान धातुओं पर दवाब बना रह सकता है।

वहीं स्र्वणकार एसोसिएशन पटियाला के प्रधान सतपाल वर्मा कहते है कि कृषि अर्थ व्यवस्था वाले पंजाब के कुछ बड़े शहरों के हाई-फाई लोगों को छोड़ दें तो रबी के सीजन के इन दिनों में सोना च्यादा नहीं बिकता, अलबत्ता दिवाली से पहले आई धनतेरस का जरूर महत्व है। गेहूं की उपज मंडियों में आ बिक तो गई है पर पैसा अभी किसान से होता हुआ मार्केट में नहीं आया है। पहले बैंक से चेक क्लीयर होंगे फिर किसान आढ़ती का चुकाएगा और इसके बाद बाजार की ओर निकलेगा। चूंकि अगली धान की फसल की बिजाई पर तुलनात्मक रूप से च्यादा खर्च होता है,ये बचत भी सोने पर निवेश पर रोक लगा देती है।

Tuesday, 26 April 2011

एमएसपी नूं छड्ड, मनप्रीत दा की बनूं...farmer, MSP, politics, trends,


सर्दी  की उधारी चुकाते ही...जट्ट फिर यमला हुआ
-आज भी मंडी में किसान उपज फेंकने आ रहा है बेचने नहीं
-चुनावी खुमारी हावी हुई प्राकृतिक आपदा पर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
'टिल्सबरी का आटा 22 रूपये आर्शीवाद लो तो 20...गली की चक्की से चावल का रूला मिला... भी 15 से कम नहीं पर गेहूं 1120 रूपये...50 का बोनस जोड़ भी बात नहीं बनती, सरकार किसान से धक्का करती ही है' सरहिंद रोड स्थित नई अनाज मंडी में जींस के साथ चैक शर्ट पहने आंख पर रै-बन के ग्लास और एक हाथ में स्क्रीन टच मोबाइल तो दूसरे में एसयूवी की चाबी घुमाता 'धरती पुत्र' का यह पुत्र केंद्र व राज्य सरकार की आधुनिक तर्कशील भाषा में कलई खोल रहा है। बता रहा है कि जिस एमएसपी को मिनिमम स्र्पोट प्राइस बता किसान के लिए फायदे का सौदा लीडर समझाते है दरअसल वो ही किसानी को व्यापार या इंडस्ट्री नहीं बनने देती और एमएसपी के पहले 'एम' का मतलब मैक्सीमम हो जाता है।
मंडी के शैड के पास काके दी रेहड़ी के पास चल रहे इस वार्तालाप में कुर्ता-पायजामाधारी ठाकुर सिंह भी अपना परना ठीक करता हुआ कूद जाता है। प्रोग्रेसिव 'काका किसान' के समान आज उसने भी ट्राली मंडी में खाली की है। आंखें थोड़ी लाल जरूर है पर चाय का गिलास उसने अभी अभी खाली किया है, हाथ में कुछ मल...मुंह साफ करता हुआ वो भी 'सथ दी बहस' में तीर सा सवाल दाग देता है, 'एमएसपी नूं छड्ïïड, मनप्रीत दा की बनूं...' और इसके साथ ही देश का अन्नदाता अपने आर्थिक मुद्दे छोड़ कर पूरी तरह से राजनीतिक विश्लेषण शुरू करने लगता है।
'काका किसान' के मोबाइल पर ब्रैन एडम्स की धुन बजती है स्क्रीन पर तस्वीर देखते ही चेहरा चमक उठता है, एक ओर वो स्वदेशी किसान को 'बाई जी, मनप्रीत दा वी हो जू...राजे दा वी, ते...ऐना बादलां दा वी...तुस्सी घर पौंचो'। साथ ही नसीहत दी जाती है कि जब तक आप लोग मंडी में कणक-जीरी सिट्दे रहोगे हालात नहीं बदलेंगे। अपनी उपज को बेचना सीखो।
इसी दौरान मोबाईल की तरफ फिर देखता है काल वेटिंग में देख 'सी यू ब्रदर का फोन है... बाय' अब काका किसान घर पर खड़ी लंडी जीप के लिए एलाय व्हील और टयूबलैस टायर  पर आ जाते है। जबकि ठाकुर सिंह के साथ उसका एक और जोड़ी दार आ जाता है। आगे से उठे कुर्ते पर हाथ मार गुरी कहता है, 'राशन  आ गया है, शामा पै गईयां ने, लीडरां दा तां ऐवें ही चल्लू अपनी संभाल'।
काके दी रेहड़ी पर सिर्फ किरदार बदलते है टापिक नहीं। चुनावी साल में खुमारी अभी से चढ़ गई है। प्रदेश में बहुसंख्यक लोगों किसान और आढ़ती दोनों के पास वर्ष में दो ही महीने काम होता है। एक राजनीति में लगा रहता है तो दूसरा गुनाह माफ करवाने तीर्थ पर जाया करता है।  सर्दी की उधारी उतारते ही किसान यमला हो जाता है, हालांकि अपने घर और पशुओं लायक गेहूं छोड़ सारी पहले ही दिन खा गया है। लेकिन सल्तनत बदलने और तख्त पर बैठने का जनून शायद हमेशा कायम रहे। संभवत यही वजह है कि प्राकृतिक आपदा पर इंश्योरेंस लेने की बजाए किस्मत से लडऩा ही उसे ठीक लगता है।

Wednesday, 13 April 2011

खाद की भी हो खेती तो तंदरुस्त रहे धरती organic, fertilizer, agriculture, trends, tradition,



-खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए तैयार किया जा रहा नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया
-हरी जैविक खाद पैदाकर मंहगी रसायनिक खादों से किनारा करने की ओर
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  शताब्दियों के अपने अनुभव भरे ज्ञान को अमेरिकियों के पास चंद रसायनों के लिए बेचने वाला पंजाब का किसान अब एक बार फिर जैविक खेती की ओर लौटने लगा है। उपज कम न हो इसके लिए आधुनिक मशीनरी का प्रयोग तो किया जा रहा है, लेकिन रसायनों की खपत कम कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति दुरूस्त करने को खेत मे हरी खाद उगाई जा रही है। ऐसे में खाद की भी हो खेती तो धरती का तंदरुस्त रहना तय है।

 हरित क्रांति आने से पहले भी पंजाब हरियाणा का किसान 'चीझणÓ अथवा 'ढांचाÓ नाम से ऐसे पौधों की बिजाई साल से एक बार किया करता था। मुख्य फसल की बिजाई अथवा रोपाई से पहले 28-30 दिनों के लिए इन पौधों के बीजों का छिड़काव खेतों मे कर दिया जाता है और मुख्य फसल उगाने से पहले इन पौधों को खेत में बाहकर नष्ट कर दिया जाता है। पौधों के अवशेष मिट्टी मे मिलकर खाद का कार्य करते है।
घग्गर नदी की बेल्ट पर अब 60 दिनों तक पकने वाली धान की किस्म नही उगाए जाने के चलते किसान का ध्यान पानी व पर्यावरण बचाने की ओर लगा है। वहीं उपज में आ रहे ठहराव के चलते किसान अब लागत मूल्य कम कर मार्जन बढ़ाना चाहता है।

  धर्महेड़ी गांव के नंबरदार राजवंत सिंह बताते है कि 10-15 किलो बीज प्रति एकड़ में एक बार बहाई के बाद छिड़क दिया जाता है। पानी देकर फिर दो तीन दिन बाद पानी लगाया जाता है। फिर सप्ताह में एक दिन पानी लगाया जाता है। ऐसे ही 28-30 दिनों मे ढाई तीन फुट का चीझण का पौधा उग जाता है। खेतों मे अप्रैल से जून मध्य तक करने के लिए कुछ नही होता। ऐसे में मिट्टी की ताकत बढ़ाने वाले ये उपाय साल मे एक बार आराम से किये जा सकते है। जीरी रोपाई करने से पहले इन पौधों को बहा दिया जाता है फिर पानी लगा, कद्दू कर रोपाई हो जाती है। राजवंत सिंह अपना अनुभव बताते है कि 100 रूपये प्रति एकड़ से अधिक का खर्च इस कार्य में नही आता।

 वही गुरप्रीत सिंह कहते है कि हरी खाद की खेती के बाद डीएपी जैसी रसायनिक खाद के कम से कम डाले जाने वाले एक थैले के खर्च की बचत हो जाती है। जहां ढ़ाई तीन थैले यूरिया के डालने होते है वहीं यह दो थैले तक  सिमट जाता है। मिïट्टी को साल भर पूरी ताकत रहती है। हरी खाद की खेती से गेहूं की उपज भी अच्छी होती है। पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह बताते है कि अब ट्रैक्टर आम होने से चीझण की बिजाई आसानी से हो सकती है। याद रहे कि चीझण की खेती के लिए गहराई पर ट्रैक्टर चलाना होता है। भारी साधन आज की कृषि मशीनरी में मौजूद है। ऐसे में इन जैविक तकनीकों का लाभ लेना चाहिये। इससे पर्यावरण को सुधारा जा सकता है। खर्च कम किया जा सकता है और फसल भी अच्छी होती है।

 कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते है कि सरकार भी हर जिले में चीझण के बीज मुफ्त बांटती है। पूर्व में धान की 60 दिनों में पकने वाली सट्ठी  किस्म न लगाने वाले किसानों को यह बीज दिए जाते थे अब सभी के लिए है। वे बताते है कि इस पौधे से मिïïट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। पानी की  पकड़ बढ़ाने की क्षमता भी बढ़ती है। इस के अलावा पौधे की जड़ मे बनी गांठें नाईट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया पैदा करती है। यह मिट््टी की ढांचा मजबूत कर देता है जिससे रसायनिक खाद की आवश्यक्ता काफी कम हो जाती है।

Wednesday, 6 April 2011

भोग समारोहों से लग रहे 'सियासी' निशाने, politics, bhog, congres, akali, trends,

-अब राजला कर रहे हैं प्रचार कि अमरिंदर करेंगे समाना की टिकट की घोषणा
-स्व. जसदेव संधू व पंथ रत्न जत्थेदार टोहरा की बरसी पर चली है राजनीति
भूपेश चट्ठा, पटियाला,
 लोकसभा चुनाव से पहले अकाली दल को अलविदा कह कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व विधायक जगतार ङ्क्षसह राजला के पिता स्व. हरदयाल ङ्क्षसह राजला वीरवार सात अप्रैल को मनाई जा रही बरसी कई सियासी निशाने लगने तय हो गए है। कांग्रेस के किसी नेता के यहां भोग समारोह पर होने वाली राजनीति से पहले इसी पखवाड़े में जिले में शिरोमणि अकाली दल के दो टिकट दावेदारों के यहां आयोजित हुए ऐसे ही श्रद्धांजलि समारोह में हो चुका है।

 वैसे तो जगतार ङ्क्षसह राजला प्रत्येक वर्ष ही अपने स्व. पिता की बरसी मनाते हैं परंतु इस बार बरसी समारोह को 2012 में होने वाले विधान सभा चुनावों के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है।  समाना में होने वाले इस समारोह में भीड़ जुटाने जहां पूर्व विधायक राजला खुद जुटे हैं, वहीं पूर्व वित्त मंत्री व डकाला के विधायक लाल ङ्क्षसह ने समारोह को सफल बनाने पूरी कमान खुद संभाली है। जानकारी के मुताबिक लाल ङ्क्षसह की कोठी से जिले भर के कांग्रेसियों को फोन किए जा रहे हैं कि इस बरसी समारोह में कैप्टन अमरिंदर ङ्क्षसह पहुंच रहे हैं इसलिए वे इसमें जरूर शामिल हों। दूसरी तरफ पिछले 15 दिनों से जगतार राजला खुद गांव-गांव बैठकें कर लोगों से समारोह में शामिल होने की अपील कर रहे हैं। वे यहां तक कहते हैं कि कैप्टन अमरिंदर ङ्क्षसह इस कार्यक्रम दौरान समाना से उनकी टिकट की घोषणा करेंगे।

 कांग्रेसी राजनीति को करीब से जानने वाले कहते हैं कि मंत्री लाल ङ्क्षसह एक तीर से कई निशाने साधना चाहते हैं। आगामी विधान सभा चुनावों में लाल ङ्क्षसह अपने पुत्र व पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मैंबर काका रजिंदर सिंह  को पार्टी की टिकट दिलवाना चाहते हैं। घर परिवार से भी उन पर दबाव है कि इस चुनाव में बेटे को चुनाव लड़ाएं बेशक खुद मैदान से हट जाएं परंतु लाल ङ्क्षसह खुद चुनावी राजनीति से हटने को राजी नहीं हैं।  कारण भी तर्क संगत है कि लाल ङ्क्षसह  विधायक बनते हैं तो कांग्रेस की सरकार बनने पर वे सबसे सीनियर विधायक होने के चलते केबिनेट मंत्री बनेंगे जबकि बेटा पहली बार विधायक बनने के चलते मंत्री नहीं बन पाएगा। लिहाजा गोटियां फिट हो रही हैं कि वे खुद पुराने क्षेत्र से  चुनाव लड़ें जबकि बेटे को समाना से टिकट दिलवाई जाए। उनके पुराने विधान सभा क्षेत्र के  52 गांव अब समाना विधान सभा क्षेत्र में आ गए हैं। लिहाजा दावा ठोका जा रहा हैं। 

दूसरी ओर अब डकाला से सन्नौर हो विधान सभा क्षेत्र से पिछला चुनाव निर्दलीय के रूप में अपने पुत्र को लड़ा 20 हजार से ज्यादा वोट दिलवाने वाले आबकारी विभाग के पूर्व कमिश्नर गुरबंस ङ्क्षसह पूनिया भी अकाली दल को अलविदा कह कांग्रेस में हैं। पूनिया का सनौर के साथ समाना में काफी आधार है। जो 52 गांव समाना में शामिल हुए हैं उनमें पूनिया की गहरी पैठ है।

हालांकि स्व. राजला के पिछले बरसी समारोह में कैप्टन अमरिंदर ङ्क्षसह नहीं गए लेकिन अब लाल ङ्क्षसह ने राजला को कैप्टन का समय लेकर दिया है। ऐसे में माना जा रहा है कि समय आने पर राजला उनके साथ खड़े हों। एक तीर से दो शिकार वाली स्थिति अब यहां भी होगी। स्व. जसदेव संधू और अकाली दल के ही पंथ रत्न स्व. जत्थेदार टोहरा  के श्रद्धांजलि समारोह की तरह यहां भी भोग की राजनीति जारी रहेगी।

Tuesday, 22 March 2011

गेहूं परंपरागत समय पर, बंपर फसल होगी wheat, , trends, vesakhi, MSP


-वैसाखी मनेगी गेहूं कटाई से एमएसपी से नहीं
-लंबी चली सर्दी ने दी राहत, पौधे पर ज्यादा शाखाएं फूटी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हरित क्रांति के बाद से किसान रबी के मौसम वैसाखी  की का कम और एमएसपी का ज्यादा याद कराता आया है, लेकिन इस साल पंजाब का किसान वास्तव में खेत में गेहूं की फसल की कटाई वैसाखी  मनाने जा रहा है। जी हां कुदरत ने सालों बाद पंजाब को पंजाब का मौसम बक्शा है जब लगातार और लंबी चली सर्दी के चलते गेहूं का पौधा अपनी उपज मार्च अंत में ना देकर अप्रैल के दूसरे सप्ताह में देने जा रहा है और हालात साफ तौर पर कह रहे है कि गेहूं बंपर होगी और इसकी उपज पिछले सारे रिकार्ड तोडऩे जा रही है। कृषि  विभाग ने इन दिनों लगने वाले उपज के अनुमान को ही  आगे बढ़ा दिया है।

पिछले साल मानसून के लंबा चलने और फिर नवंबर में पारे के चढ़े रहने के चलते गेहूँ की बिजाई में आधुनिक कृषि अनुसार देरी हुई लेकिन परंपरागत अनुभव व ज्ञान में यकीन करने वाले फाईव एलीमेंट हैल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि पंजाब में देसी किस्मों की बिजाई लोहड़ी तक चलती थी और वैसाखी  पर शगुन के तौर पर 'टक' लगाया जाता था पर अब एमएसपी एक अप्रैल से आता है तो किसान गीली उपज ही  मंडियों में फैंक आता है। जो हर किसी के लिए सरदर्द बनती है। आजकल उठे बादलों पर वे कहते है कि ये बारिश भी  नुकसान नहीं करने वाली बशर्ते ओले ना पड़े। दिसंबर अंत तक चली बिजाई और फिर बराबर अंतराल पर आई बारिश कोहरे को ओस में बदलती रही, पारा कम रहा जिससे शाखाएं ज्यादा फूटी, लंबी चली सर्दी ने गेहूं की बल्लीयों को भी  बड़ा होने का मौका मिला तो दाने ज्यादा आने तय है।
 
वहीं कृषि विशेषज्ञ डा.  बीएस सोहल कहते है कि इस साल गेहूं पर पीली कुंगी की मार पड़ी और तेला या अन्य कोई बीमारी नहीं लगी है। पीली कुंगी का असर  सभी  जगहों पर नहीं हुआ। यह पहाड़ी क्षेत्रों विशेष रूप से जम्मू  कश्मीर से होती हुई पंजाब में आती है। रोपड़ और गुरूदासपुर इसके एंट्री पवांइट है। पीली कुंगी की मार ऐसे ही कुछ क्षेत्रों में पड़ी है। जहां पर गेहूं की उपज पर प्रभाव पडऩा तय है। शेष क्षेत्रों में फसल पिछले साल की तुलना में बढऩे की संभावना ज्यादा है। सरकार ने भी  सबसीडी पर एक लाख  लीटर दवा बंटी है जिससे बीमारी नियंत्रित रही। अक्सर फरवरी के तीसरे सप्ताह में तापमान बढ़ता है लेकिन इस बार मार्च के दूसरे सप्ताह तक मौसम ठंडा रहा। वे कहते है कि सब कुछ ठीक रहा तो पिछले साल से उपज काफी अधिक रहेगी।

वहीं मुख्य  कृषि अधिकारी एससी खुराना कहते है कि कृषि  विभाग ने अभी  अनुमान नहीं लगाएं है। लेकिन पिछले साल की तुलना गेहूं अच्छी रहनी चाहिए। अगले सप्ताह तक यदि कोई बड़ी मार नहीं पड़ती है तो सब कुछ ठीक ही रहेगा। 

Saturday, 19 March 2011

लोकां ने पीती तुपका तुपका मैं तां...हुण उतरुं किंवे festival, holi, trends, whisky,


भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोकां ने पीती तुपका तुपका मैं तां पीती बाटे नाल... मै क्हया चड़ गई ओए छराटे नाल...विवाह शादी की पार्टी हो या किसी खास के साथ शाम का समां तो बब्बू मान की ये पंक्तियां खासी लुभावनी हो थिरकने को कहती है। बात होली की हो तो सुबह-शाम का बंधन नहीं रहता, हर आम खास हो जाता है। ऐसे में पीने पिलाने के नाप तौल दर किनार हो जाते है या फिर कर दिए जाते है पर इसके बाद का वक्त होली के मतवालों और घरवालों दोनों के लिए मुसीबत लाया होता है।
होली पर शराब से भाग और अफीम से गंजा तक का सेवन होता है और  दिलचस्प तथ्य है कि इनमें से कुछ तो एक दूसरे के लिए दवा का काम भी  करते है पर यह भी  सही है कि जो खुद को शिव भक्त बताते है वो मां काली के पुजारी नहीं हो पाते। फाईव ऐलीमेंट हैल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर बताते है कि भाग या अफीम ज्यादा हो जाए तो एक या दो पैग पिलाने से उनका नशा उतर जाता है ऐसे ही शराब ज्यादा हो जाए तो अफीम कारगर होती है लेकिन किसी तरह की दवा लेने से बचना चाहिए। आम तौर पर नशा ज्यादा होने पर  नीबूं पिलाने लग जाते है जो गलत है। भाग के नशे को तो यह कई गुणा बढ़ा देता है। शराब और नींबू दोनों में ही एसिड है ऐसे में ये उछल पड़ती है और कई बार ब्लड प्रैशर बहुत कम कर देता है। इसकी बजाए ज्यादा पानी पिला बाहर निकालनी ज्यादा ठीक है।
शराबी हालात होने पर ताजा कच्चे दूध के दो गिलास हों यदि ना मिले तो फ्रिज का ठंडा दूध कारगर है पर बिना चीनी के। अक्सीजन मॉस्क के चार बड़े सांस भी  शराब उतार देते है। एंटासीड के दो-दो च मच एक एक घंटे के अंतराल पर दिए जा सकते है।
अगर व्यक्ति मदहोशी की हालत में आ जाए तो दोनों नाक के दोनों नथुनों के बीच के स्थान को दबाने से होश आ जाता है और उपर के दोनों बीच के दांतों के बीच से शुरू होने वाली नस यहीं से गुजरती है।
दूसरी ओर शराबी को पंजाब में प्यास लगने आधा रिड़का हुआ दही और टोपी तोड़ दांत में दबाए हुए दो लौंग तेजाबीपन कम करने और हिचकी रोकने में कारगर माने जाते है। उल्टी आने पर काले नमक की चुटकी या फिर सिर्फ सोडे में नींबू नमक बर्फ के साथ पिलाने का नुस्खा  चलन में है। जबकि भाग चढऩे पर साधारण चने सर्वश्रेष्ठ उपाय है। गला तेजी से सूखता है पर कुछ ही मिनट में व्यक्ति कैलाश पर्वत से उतर आता है।
वहीं फार्माकालोजी क्षेत्र के जाने माने नाम डा. पीपी खोसला कहते है किसी तरह का टोटका नहीं आजमाना चाहिए। यह बहुत ही रिस्की होता है। ये लोग कई तरह के जुगाड़ करते है हर आदमी नुक्ते समझा रहा होता है। लेकिन बेहतर तो अस्पताल में भर्ती करवाना और मेडीकल केयर उपलब्ध करवाना ही है। हालांकि ले ाक केएस धलीवाल इससे इत्तेफाक नहीं करते वे कहते है कि ड्रिंक्स के साथ डाइट जरूरी है। नशा ठीक ठाक भी हो तो हैंग ओवर उतारने बर्फ बराबर ठंडे पानी के साथ रेस्ट इज बेस्ट।
लेकिन बेहतर तो ये है की पीने से पहले मखन या नारियल खा ले


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Tuesday, 15 March 2011

अपणे पंजाब दे 42 पिंड सोफी होए


-72 गांवों की पंचायतों ने आबकारी विभाग को प्रस्ताव भेजा हमारे यहां ठेका बंद हो
-अगले साल भी नीलामी में नहीं होंगे शामिल ये गांव बशर्ते...
भूपेश चट्ठा, पटियाला
अपणा पंजाब होवे, मूली नाल गंडा होवे बाण वाला मंजा होवे...गुरूदास मान का यह लोकप्रिय हिट संभावित रूप से प्रदेश के 42 गांव सोफी हो गए है और इनमें इसे कुछ इस तरह से गाया जाएगा 'अपणा पंजाब होवे ऐथे ना शराब होवे नानक दी बाणी होवे मर्दाने दा रबाब होवेÓ।
प्रदेश के आबकारी विभाग ने 72 गांवों की पंचायतों की ओर से उनके गांवों में शराब ठेके बंद किए जाने के प्रस्ताव में से 30 को रद्द भी कर दिया है जबकि शेष पंचायतों का  उनके यहां शराब का ठेका ना खोला जाने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया है।
इनमें से सर्वाधिक पंचायतें संगरूर जिले की हैं। हालांकि इस जिले से 44 पंचायतों ने आवेदन किए थे लेकिन इनमें से 24 की ही याचिका को मंजूरी दी गई है। चार साल पहले जन प्रतिनिधि अधिकारों का उपयोग  नशे के खिलाफ शुरू हुआ लेकिन आज भी प्रदेश में मालवा को छोड़ अन्य क्षेत्रों माझा-दोआब के लोगों ने कम ही दिलचस्पी दिखाई है। बीते साल की संख्या 55 से इस साल आवेदन करने वाली पंचायतें बढ़ कर मात्र 72 ही हो पाई है।
दिलचस्प है कि आबकारी नीति आने से पहले विभाग ने इन पंचायतों के प्रतिनिधियों को बुलवा कर सुनवाई भी की है कि आखिर उन्हें 'एतराज क्या है?Ó, 'हर्ज ही क्या है?Ó यह भी जांचा गया कि कहीं उनके गांव में अवैध शराब पकड़े अथवा बिकने के मामले तो नहीं आए है।
याद रहे कि पंजाब का डोमोसाइल बनते ही पैग के साथ नाता या तो जुड़ जाता है या फिर जोड़ दिया जाता है और आबकारी आयुक्त के मुख्यालय वाले शहर पटियाला में यह नाता कुछ ज्यादा ही गहरा और करीब का है। एक ओर जहां गांव की पंचायतों में शराब के ठेके बंद करवाने प्रति जागरूकता बढ़ी है वहीं विभाग ने भी 'गहराई से छानबीनÓ की है कि कहीं इस सादगी के पीछे अफीम तस्करों या अवैध शराब बेचने वालों का हाथ तो नहीं है। बीते साल विभिन्न तर्क दे कर आवेदन रद्द हुए तो इस बार पंचायतें हाई कोर्ट तक दस्तक देने को तैयार रही।
 संगरूर के ही एडवोकेट कमल आनंद बताते है कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 40 के तहत गांव की पंचायत प्रस्ताव पारित करे तो गांव में से ठेका हटाया जा सकता है या फिर खुलने से ही रोका जा सकता है। पर ज्यादातर को पता ही नहीं है कि लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों को क्या अधिकार है।
उधर आबकारी विभाग के अधिकारी पुष्टि कर कहते है कि इन 42 गांवों में ठेके इस साल नहीं खुलेंगे और संभावित रूप से अगले साल भी इन्हें शराब ठेकों की नीलामी प्रक्रिया में शामिल ना किया जाए बशर्ते इन गावों में शराब का अवैध कारोबार अपने इतिहास के समान ही रहे।

Tuesday, 8 February 2011

अपणा पंजाब होवे.. पर न शराब होवे

अपणा पंजाब होवे पर दारू दी दुकान ना होवे
-71 गांवों की पंचायतों ने आबकारी विभाग को प्रस्ताव भेजा हमारे यहां ठेका बंद हो
-विभाग ने पूछा आखिर ऐतराज क्या है, हर्ज क्या है?

भूपेश चट्ठा, पटियाला
अपणा पंजाब होवे, घर दी शराब होवे, मूली नाल गंडा (प्याज) होवे, बाण वाला मंजा होवे..।
गुरूदास मान के इस लोकप्रिय हिट का पंजाब के गांवों विशेष रूप से मालवा क्षेत्र की पंचायतों ने नकारना शुरू कर दिया है। आबकारी नीति आने से पहले 71 गांवों की पंचायतों ने आबकारी विभाग को प्रस्ताव पारित कर दिया है कि उनके यहां शराब का ठेका ना खोला जाए और विभाग ने आज कुछ पंचायतों के प्रतिनिधियों को बुलवा कर सुनवाई भी की है कि आखिर उन्हें 'एतराज क्या है?Ó, 'हर्ज ही क्या है?Ó
पंजाब का डोमोसाइल बनते ही पैग के साथ नाता या तो जुड़ जाता है या फिर जोड़ दिया जाता है और आबकारी आयुक्त के मुख्यालय वाले शहर पटियाला में यह नाता कुछ ज्यादा ही गहरा और करीब का है। एक ओर जहां गांव की पंचायतों में शराब के ठेके बंद करवाने प्रति जागरूकता बढ़ी है वहीं विभाग ने भी 'गहराई से छानबीनÓ शुरू कर दी है कि कहीं इस सादगी के पीछे अफीम तस्करों या अवैध शराब बेचने वालों का हाथ तो नहीं है।
प्रदेश में पिछले साल ऐसी पंचायतों की संख्या 55 थी और अब बढ़ कर 71 हो गई है। सबसे अधिक जागरुकता लाने वालों में संगरूर जिला है जहां सेे 44 पंचायतों ने ऐसे आवेदन किए है। दिलचस्प है कि पिछले साल आबकारी विभाग ने कुछ पंचायतों का यह आवेदन विभिन्न तर्क दे कर रद्द कर दिया था।
संगरूर के ही एडवोकेट कमल आनंद बताते है कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 40 के तहत गांव की पंचायत प्रस्ताव पारित करे तो गांव में से ठेका हटाया जा सकता है या फिर खुलने से ही रोका जा सकता है। पर ज्यादातर को पता ही नहीं है कि लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों को क्या अधिकार है। संगरूर के कुछ एनजीओ ने लोगों को बताया तो इस दिशा में प्रगति हुई है, पिछले साल कि तुलना में इस बार संख्या भी बढ़ी है।
वहीं सकरोदी गांव के सरपंच हरिंदर सिंह कहते है कि अभी तो उनके पंच को आबकारी कमीश्नर ने 'देखते हैÓ का ही आश्वासन मिला है। हम से पूछा गया कि आप गांव का शराब का ठेका क्यों बंद करवाना चाहते हो। तुम्हारे गांव में तो अवैध शराब पकड़ी गई थी मामला भी दर्ज है, लेकिन हमने उन्हें बताया कि ऐसा कुछ भी नही हुआ हम तो बस इस बीमारी को ही दूर रखना चाहते है।
उधर आबकारी कमीश्नर वैणु प्रसाद बताते है कि इस साल अभी तक उनके पास 71 आवेदन आए है और कुछ पंचायतों के प्रतिनिधियों से बुलवा कर बात की गई है लेकिन अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। वे मामला देख रहे है।

पंजाब में वर्ष 2009-10 में अंग्रेजी व देशी शराब की करीब 29 करोड़ बोतलें बिकीं। सरकार को शराब बिक्री से वर्ष 2007-08 में शराब से 1800 करोड़ रुपये, 2008-09 में 2000 करोड़ व वर्ष 2010 में 2500 करोड़ रुपये का टैक्स प्राप्त हुआ। (स्रोत : विभागीय आंकड़े

Tuesday, 18 January 2011

नेट पर कैट से ज्यादा हिट प्याज?


-प्याज को लेकर इंटर नेट पर झक मारने लगे लोग, चर्चा के साथ अफवाहें भी
-गूगल पर आनियन लिखते ही आते हैं 33 करोड़ रिजल्ट
-किसी ने तलाशा टीयर फ्री आनियन, तो किसी को मिला पाव का प्याज
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मुन्नी कितनी बदनाम हुई और शीला का क्या हाल है जैसी इंटरनेट पर होने वाली सर्फिंग पर अब कैटरीना व सचिन की जगह प्याज ने ले ली है। दुनिया के आंकड़े जब आएंगे तब आएंगे पर पंजाब में प्याज का ही राज चल रहा है। प्याज उगाने, खाने, बेचने से लेकर आयात-निर्यात में लगे पंजाबियों ने प्याज की तलाश में दुनिया को खंगाल डाला है।
प्याज को लेकर इंटर नेट पर झक मारने का सिलसिला इस कदर बढ़ा है कि नेट पर चिपके रहने वाले लोग चर्चा के साथ अफवाहें भी फैलाने लगे है। दिलचस्प है कि गूगल पर आनियन लिखते ही मात्र आठ सेकंड मेंं 33 करोड़ 60 लाख रिजल्ट सामने आ जाते है। मोदी कालेज के पास साइबर फेंटेसी के मालिक हरदमन सिंह कहते है कि किसी ने टीयर फ्री आनियन की तलाश की है,तो किसी को मिला है एक किलो में तीन से चार चढऩे वाला पाव का प्याज।
जीएम फसलों का विरोध करने वालों के लिए राहत की बात ये है कि न्यूजीलेंड में एक कंपनी द्वारा तैयार किए गए पहले जेनेटिकली माडीफाईड प्याज का विरोध वहां के लोगों ने शुरू कर दिया है। यूरोप में कई रंगों में प्याज आता है तो मिश्र में धरती के बाहर पौधे पर गुच्छे में उगता है। हालांकि कुछ को आनियन की तलाश में मेग्जीन व टेलीविजन चैनल भी मिले है।

शहर में एक विशेष पसंद रखने वालों के बीच खासे लोकप्रिय त्रिपड़ी क्षेत्र के दिल्ली ढ़ाबे के मालिक महींदर सिंह गांधी कहते है कि आजकल प्याज की कमी है और कहीं किसी केमिकल के मिलाने से तो इसका साइज बड़ा नहीं किया जा रहा। उनका तर्क है कि प्याज तड़के के दौरान ज्यादा तेल पीने लगा है। वहीं पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह कहते है कि अब प्याज खोखला हो चुका है। स्वाद तो गया ही, सेहत के लायक भी नहीं रहा। केलेस्ट्राल कम कर हार्ट अटैक रोकने वाला नहीं रहा है, अब प्याज। इसके लिए खेतों में डाली जा रही दवाएं दोषी है यही वो केमिकल है।

दिलचस्प है कि प्याज के औषधी गुण सबसे ज्यादा शोध का विषय है दाम का यहां कोई महत्व नहीं है। पंजाबी युनिवर्सिटी के शोध छात्र गुरजीत सिंह बताते है कि ऐसा माना जाता है कि प्याज की उत्पत्ति ईरान, पश्चिमी पाकिस्तान और उत्तर के पहाड़ी क्षेत्रों में हुई है। प्याज की प्राचीनता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिरामिड निर्माता भी प्याज खाते थे। प्याज प्राचीन मिस्र में प्रिय भोजन सामग्री था। वहां के मकबरों पर इसे उकेरा गया है। यही नहीं ममियों के साथ भी प्याज मिले हैं। प्याज का जिक्र बाइबल और कुरान में भी आया है। कहने का आशय यह है कि प्याज का जिक्र हिप्पोक्रेटस से आज तक होता आया है।

प्याज में केलिसिन और रायबोफ्लेविन (विटामिन बी) पर्याप्त मात्रा में होता है। इसमें 11 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है और इसकी गंध एन-प्रोपाइल-डाय सल्फाइड के कारण आती है। यह पदार्थ पानी में घुलनशील अमीनों अम्लों पर एन्जाइम की क्रिया के कारण बनता है। यही कारण है कि प्याज को काटने पर ही आँसू आते हैं। यह एक बेहतरीन औषधि भी है। प्याज अजीर्ण और पतले दस्त में लाभकारी है। यह जीवाणुरोधी, तनावरोधी व दर्द निवारक,मधुमेह नियंत्रक, प्रदाह निवारक, पथरी हटाने वाला और गठियारोधी भी है। त्वचा पर घिसने से यह बालों में वृद्धि करता है। लू-लपट में घर से निकलने से पूर्व जेब में प्याज रखकर निकलने की हिदायत तो बुजुर्ग देते ही रहते हैं।

प्याज से आंसू गायब हुए तो इसका रस सांप के काटे जाने पर सरसों के तेल में मिला पिलाने लायक रहेगा और ना ही विद्यार्थियों के काख में दबाने पर बुखार ही चढ़ाएगा, फिर प्याज प्याज नहीं आलू हो जाएगा। याद रहे कि चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है और इन दोनों ही देशों ने दुनिया की आबादी खूब बढ़ाई है।

Saturday, 8 January 2011

पंजाब में पॉपुलर हुआ पॉपुलर

मुनाफे का सौदा
तीन साल में हुई लकड़ी की कीमत में 40 फीसदी वृद्धि
पापुलर के नाम पर बैंक आसानी से दे देते हैं लोन
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में किसान ने गेहूं और धान से ज्यादा लाभ न मिलते देख पॉपुलर की ओर रुख कर लिया है। इसकी देखभाल भी कम करनी पड़ती है और मुनाफा ज्यादा मिलता है। पिछले तीन साल में इसकी कीमत में 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। 300 रुपये प्रति क्विंटल तक बिकने वाला पॉपुलर 500 से 800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है और बैंक एफडी से कहीं अधिक रिटर्न दे रहा है।
सोशल साइंसेज एंड हैल्थ फोरम के डा. पीपी खोसला का कहना है कि उत्तरी अमेरिका से चला यह पेड़ यूरोप होता हुआ पश्चिमी एशिया के रास्ते पंजाब आया है और इसके ठीक विपरीत यही वो रास्ता है जहां से उल्टे पांव कबूतरबाजी होती है।
फाइव एलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते हैं कि किसान को सर्वाधिक फायदा देने वाला पेड़ है। इसे 20 फुट का तो नर्सरी में ही किया जा सकता है। पांच साल में किसान को अतिरिक्त आय दे देता है। 90 सेंटीमीटर मोटाई पर बिकना आम है पर इसे ढाई मीटर तक फैलने दिया जा सकता है। प्रदेश में सर्दी के दिनों में झड़े इसके पत्ते सूरज की किरणें नहीं रोकते और खेत में ही खाद बन जाते हैं। साथ ही गर्मी में हर फसल को राहत भी देते हैं।
बैंक भी पॉपुलर के नाम पर लोन देने को तैयार हैं। कम से कम 150 पेड़ों के लिए दिए जाने वाले इस लोन की वापसी के लिए ना तो किस्तें हैं और ना ही किसी को पहले आठ साल लोन के बारे में पूछा जाता है, साल बाद केवल ब्याज के रूप में मामूली भुगतान करना होता है।

कहां आता है
काम पेंसिल, माचिस, खेलों का सामान, पैकेजिंग के अलावा इससे प्लाईवुड तैयार होता है। राज्य में इस समय प्लाईवुड की करीब 100 इकाइयां चल रही हैं जिनमें वार्षिक औसतन 30 लाख क्यूबिक लकड़ी की खपत हो रही है। पंजाब से बड़ी मात्रा में लकड़ी हरियाणा में भेजी जाती है। हरियाणा से तैयार माल बिलों में जम्मू-कश्मीर के नाम पर चलता है लेकिन बिकता पंजाब में है जिससे यहां के उद्यमी 12.5 फीसदी वैट बचा रहे हैं।

Wednesday, 5 January 2011

पंजाब के खेतों में मिली केले को राह

उत्पादन व क्षमता 6 600 करोड़ का है राज्य का बाजार, अपना योगदान मात्र दो करोड़ का
प्रदेश में 450 हेक्टेयर तक पहुंचा इस फल का रकबा
भूपेश चट्ठा, पटियाला
केले का नाम आते ही केरल की याद आ जाती है जहां समोसे में भी आलू की जगह केला डाल दिया जाता है। पंजाबी पकौड़ों में तो आलू प्याज ही रहेगा पर अब यहां केले अधीन रकबा बढ़ने लगा है।
राज्य में 450 हेक्टेयर में केले की खेती हो रही है। पिछले दो साल से इसके अधीन रकबा बढ़ रहा है। साल में दो बार होने वाली बिजाई में अब फरवरी के सीजन में केले का रकबा 600 हेक्टेयर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। लुधियाना, मोगा, कोटकपुरा क्षेत्र में केले की खेती की ओर झुकाव ज्यादा रहा है तो पटियाला, फतेहगढ़ साहिब में भी उत्पादक बढ़े हैं।
पंजाब को भले ही एक अर्से से केले की फसल के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता रहा है। पर अब सोच बदलने के पीछे आर्थिक कारण ज्यादा आगे आए है। बाजार के जानकारों के अनुसार पिछले साल 600 करोड़ रुपये के केले की खपत की हुई थी। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी दो करोड़ रुपये से भी कम रही है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2007 में ग्रेंड नेनो नामक टीशू कल्चर किस्म तैयार की थी। इसे दो साल तक सिर्फ प्रयोग के रूप में ही विभिन्न जगहों पर उगा कर देखा गया। इसके काफी अच्छे नतीजे सामने आये है। पिछले साल अगस्त में पंजाब में करीब 200 हेक्टेयर रकबे पर केले की बुआई हुई है। केले की बुवाई अगस्त-सितंबर माह में करनी ज्यादा ठीक रहता है। इससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 से 13 टन तक आने की संभावना है। वहीं फरवरी माह में केले की बुवाई करने से यह उत्पादन 9 से 10 टन तक रहता है।
राज्य में अब बनाना ग्रोअर एसोसिएशन भी बन गई है जिसे धान व गेहूं के मुकाबले केले की खेती काफी लाभदायक लग रही है। व्रत-त्योहारों के अलावा भी मंडियों में उन्हे केला बेचने में कोई दिक्कत नही हो रही। खर्चे निकाल प्रति एकड़ सवा लाख रुपये की आमदनी दे रहे केले अधीन हर उत्पादक अपना रकबा दोगुना कर रहा है।
पंजाब फार्मर कमीशन के सलाहकर डॉ. पी.एस रंगी के अनुसार केले के अधीन पंजाब के लुधियाना, पटियाला, अमृतसर में केले के अधीन रकबा ज्यादा बढ़ रहा है। इस साल किसानों को करीब 2.5 लाख केले के पौधे दिए गए है। किसानों को सब्सिडी के रूप में पहले दस हजार रूपये की सहायता आयोग की ओर से दी जा रही थी लेकिन अब इसे राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अधीन लाए जाने के बाद करीब 18 हजार रूपये का लाभ दिया जा रहा है। केले का पौधा करीब 14 माह के बाद फल देना शुरु कर देता है। प्रति हेक्टेयर 3000 से 3500 पौधे लगाए जा सकते है।

Monday, 25 October 2010

करवा चौथ तो ठीक है पर 'लेटेस्ट' क्या है...

चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हुए, 'एग फ्री' केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो
एलोपैथी का असर : ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही दे देती हैं तर्क
गोलगप्पे की रेहड़ी वालों का 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी...

भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिंदु कुश पर्वत से लेकर हिंद महासागर के बीच के भूभाग में करवा चौथ की शुरूआत संभवत: वेद लिखे जाने से पहले ही हो किस्से कहानियों के साथ हो गई। इसका सटीक समय तो कहीं नहीं मिलता पर इतना तय है कि कम से कम पांच हजार सालों से ये त्यौहार महिलाएं बिना किसी वैदिक स्क्रिप्ट के एक निश्चित परंपरा के साथ मनाती रही। आज भी वहीं किस्सा और कहानी दोहराई जाती है। पांच हजार साल तक जिस सभ्यता को बिना मॉस मीडिया और कंप्यूटर के संजोए रखा गया वो आज 'लेटेस्ट' क्या है? के चक्कर में गायब हो रही है।
पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला के मॉस कम्यूनिकेशन विभाग के रिसर्च स्कालर पंकज शुक्ला बताते है कि दिलचस्प इसमें यह है कि ये सब कुछ टीवी के बढऩे के साथ तो बढ़ा, बिंदिया बड़ी से और बड़ी हो गई साड़ी का रंग और ज्यादा चटख हो गया पर इंटरनेट के फैलाव के साथ हाल ही में आए ट्वीटर और फेसबुक ने हमे इतना ज्यादा लिबरल बना दिया कि एक ही मेज-कुर्सी और कमरे में ही बैठ दुनिया देखने लगे है। सोशल नेटवर्किंग ने हमें अंदर तक खोखला कर दिया है तो परंपराएं भी हमारे साथ ही टूटने लगी है।
वहीं लेखक केएस धालीवाल कहते है कि चाय-मट्ठी, मिल्क केक-गुलाब जामुन पुराने हो चुके है, केक-पेस्ट्री और काफी की बात करो, अगर केक में वाइन और अंडे को लेकर धर्म आड़े आता है तो आप 'एग फ्री' ट्राई कर सकते है पर समय की धारा के विपरीत क्यों चलते है। यही बदलाव है।
सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते है कि आयुर्वेद में योग है और योग में पेट को खाली रख काफी कुछ दुरूस्त करने के तरीके है लेकिन एलोपैथी में फूड सप्लीमेंट है अगर किसी चीज की शरीर में कमी है तो उसे लैब में बने रसायन से ठीक किया जा सकता है। लेकिन खाली पेट नहीं । ऐसे में ज्यादा देर खाली पेट रहना सेहत के लिए ठीक नहीं होता, खुद सास ही ये तर्क दे कर पहले करवा चौथ में ही चाय से लेकर बिस्कुट का डोज दिन में दे देती है। हालांकि इसके पीछे कारण ये होता है कि कईयों ने दो से चार दशक पहले अपने ड्रेसिंग टेबल में छिपा कर रखी मिठाई या मेवे खाए होते हैं, जिसका पति को तो पता होता है लेकिन उसकी अपनी सास की जानकारी में नहीं होता। ऐसा कर वो बीस तीस साल पुरानी गड़बड़ी को तर्क संगत ठहरा रही होती है। यहीं पर आ कर हम सास भी कभी बहू थी का सकारात्मक पहलू सामने आता है। दिलचस्प है कि पांच सात साल पहले तक गोलगप्पे की रेहड़ी वालों के लिए ये दिन 'ड्राई डे' हुआ करता था पर अब लाल चूड़े में भी आप ग्राहक खड़े देख सकते है। किटी-तंबोला के नाम पर होने वाली जुए बाजी पुरूषों की दिवाली से पहले शुरू हो जाती है। यह भी खुल कर कहा जाता है कि करवा तो ठीक है लेटेस्ट क्या है? सूट नया लिया है? या टॉपस? लंहगा इस बार 'देवदास' नहीं 'मुन्नी बदनाम' वाला चल रहा है।