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Friday, 18 May 2012

धान की प्रतिबंधित किस्में पंजाब के खेतों में, Non recommended paddy varieties are in Punjab’s fields


-एचकेआर 47, एचकेआर 127  और पूसा 44 की बिजाई बिलकुल ना करें
-किसान मेलों के बाहर और विशेष कार्यशालाएं लगा बेचे जा रहे हैं बीज
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में उगाई जाने वाली और यहां के कृषि वैज्ञानिकों की ओर से सिफारिश की गई धान की किस्मों को घटिया, कम उपज और च्यादा समय व पानी लेने वाली बता प्रतिबंधित किस्मों को यहां के खेतों में धकेलने की तैयारी की जा रही है।
दिल्ली में ड्राइंग रूम में बैठ कर पंजाब के खेतों से पैसा उगाने की तैयारी कर रही कुछ कंपनियों की भनक प्रदेश के कृषि विभाग को भी लग गई है। ऐसे में विभाग के अलावा पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने अपनी ओर से भी धान की बिजाई व रोपाई करने वाली किस्मों की एक विस्तृत सूची जारी कर दी है।
दिलचस्प है कि निजी क्षेत्र की कंपनियां बिना मिट्टी व पानी की जांच कि अपने बीज बाजार में उतार देती है और हर जलवायु में बेचने के लिए हथकंडे अपनाने लगती है। कुछ ऐसे ही सेमिनार व कार्यशालाएं आयोजित कर कुछ विशेष किस्में प्रचारित की जा रही हैं। पहले ये कंपनियां बीज बेचती हैं फिर खाद और दवा की बारी आती है। कंपनियों के अपने सभी  उत्पाद बेचने के बाद जब किसान की फसल बेचने की बारी आती है तो खरीददार नहीं मिलता कई तरह केंद्र व राइस शेलरों की स्पेसीफिकेशन सामने आती है।
इतना ही नहीं प्रतिबंधित की गई किस्में सरकारी स्तर पर लगने वाले किसान मेलों के स्थल के ठीक बाहर बिकने बड़े पैमाने पर आती है। इस बार निजी कंपनियां एक कदम और आगे बढ़ गई है। अब सोची समझी रणनीति के तहत कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं और बताया जा रहा कि यही एक किस्म है जो पानी की बचत करवाती है।
वहीं पीएयू आगाह करता है कि कुछ निजी व्यापारियों की ओर से सुझाई जा रही एचकेआर 47, एचकेआर 127  और पूसा 44 की बिजाई बिलकुल ना करें। इनमें झुलस रोग से लडऩे की क्षमता बिलकुल नहीं है।
वही कृषि विभाग के उप निदेशक बीज रहे और मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि ट्रेडर अपनी तरह से मुनाफा कमाने के तरीके तलाश लेता है। जिस किस्म तले रकबा बढ़ता है अगले सीजन तक उसी में कमियां निकाल दी जाती है, इससे किसान घाटे में रहता है और बिचौलिए कमाई लूट लेते हैं। इस बार भी कई शेलर मालिक व आढ़तिए प्रतिबंधित पीआर 201 किस्म लगवा रहे है और कह रहे हैं कि उपज सीधी ले आना। इससे एक तो वे मार्केट कमेटी के 12.5 फीसद का शुल्क चोरी कर लेते हैं और बाजार में ना बिकने वाली किस्म के चलते सौ रूपये तक सस्ती भी ले लेते हैं।

पीएयू की सिफारिशों अनुसार

पीएयू की ओर से विकसित की गई और प्रमाणित धान की किस्मों में पीआर 118, पीआर 116, पीआर 114, पीआर 111, पीआर 115 और पीआर 113 को रखा गया है। ये किस्में ना केवल अधिक उपज देती हैं अपितु लगने वाली बीमारियों से भी खुद की सुरक्षा करती हैं। इनमें से पीआर 111, 114 व 116 बीजने से पकने तक 138 से 145 दिनों का समय लेती है और औसत झाड़ 27-28 क्विंटल होता है जबकि पीआर 115 पकने में 125 दिन का समय लेती और 25 क्विंटल का झाड़ देती। इसके बाद आलू की फसल भी ली जा सकती है। जबकि  मोटे दानों वाली 113 से 28 क्विंटल और पीआर 111 व 115 को झुलस रोग नहीं लगता। पीआर 118 पकने में 158 दिन लेती है और झाड़ 29 क्विंटल तक होता है।

Friday, 11 May 2012

प्रदेश में धान की पनीरी की बिजाई शुरू, As Paddy season begins, electricity demand rises



- पावरकाम ने दी मांगी गई चार घंटे बिजली
- तीन दिनों में मांग ढाई सौ लाख यूनिट बढ़ी
भूपेश चट्ठा, पटियाला
प्रदेश में खरीफ की मुख्य फसल धान की पनीरी की बिजाई शुरु हो गई है। हालांकि राज्य के कृषि विभाग ने इस साल सब सोयल एक्ट में छूट देते हुए एक मई से ही बिजाई करने की अनुमति दे दी थी, लेकिन देर से खत्म हुए गेहूं के सीजन के चलते और कानून में मिली राहत को उचित प्रचार न मिलने की वजह से मालवा के किसानों ने धान की पनीरी की बिजाई दस जून के आसपास ही शुरु की है।
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड की ओर से कृषि क्षेत्र को दी जा रही बिजली के आंकड़े भी बताते हैं कि बिजली की मांग कृषि क्षेत्र में अब बढऩी शुरु हुई है। पावरकाम के डायरेक्टर प्रबंधन गुरबचन सिंह बची कहते हैं कि किसानों की ओर से इन दिनों में चार घंटे बिजली देने की मांग की गई है और प्रदेश में चार घंटे से कम कहीं भी बिजली नहीं दी जा रही है।
जबकि पारे के 40 डिग्री के पार होने और कृषि क्षेत्र में बढ़ी सिंचाई मांग के बाद पिछले तीन दिनों में बिजली की मांग ढाई सौ लाख यूनिट बढ़ी गई है। पावरकाम के आंकड़े बताते हैं कि एक हजार लाख यूनिट के पास चल रही मांग अब 1250 लाख यूनिट पर आ गई है, जबकि बीते 24 घंटों में राज्य में 1240 लाख यूनिट बिजली की सप्लाई की गई है।
इसमें केंद्रीय पूल से हिस्सा, बैंकिंग व बिजली खरीद का कुल आंकड़ा 472 लाख यूनिट का रहा। हालांकि अचानक मांग बढऩे से 16 लाख यूनिट बिजली 2.89 रूपये प्रति यूनिट की दर से उत्तरी ग्रिड खरीदी भी गई है। राज्य में बिजली की किसी किस्म की कमी पर पावरकाम के प्रवक्ता कहते हैं कि जीरो आवर कट से बिजली दी जा रही है।

Saturday, 2 July 2011

मौसम और मजदूरों नै मित्तरां नूं मोटर ते बठाया, farmer, trends, paddy soawing, live from moter

खेत से लाइव, आपसी सहयोग
सेवा ट्रैक्टर की हो या पड़ोसी की, मोटर के पानी की सब हाजिर है
 एक-दूसरे की मदद को पहुंच रहे हैं दोस्त और रिश्तेदार
भूपेश चट्ठा, पटियाला : गर्मियों की छुट्टियों के इन दिनों में बच्चे वेस्टइंडीज में क्रिकेट के सपने देख रहे हैं और आसमान में बादल आते ही शहर में बच्चे बैट बॉल लेकर निकल पड़ते हैं तो गांव में बच्चे ट्रैक्टर के आगे पीछे होने लगते हैं। मौसम में नमी और एक-आध दिन छोड़कर आ रही बारिश ने किसानों के चेहरे इस कदर खिला दिए हैं कि प्रभाव घर परिवार में दिखने लगा है। खुशनुमा माहौल में किसान धान की रोपाई जल्द निपटाने में लगा है।
दिलचस्प है कि मौसम की मेहरबानी और अन्य राज्यों से धान की रोपाई को आने वाले मजदूरों की कमी ने किसानों के दोस्तों-रिश्तेदारों को एक ही मोटर पर ला बिठाया है। डकाला ब्लाक के खेड़ी, रामगढ़ सपेड़ा, धर्मेहड़ी इत्यादि गांवों के रविवार को किए दौरे में पाया गया कि आजकल न केवल किसान अपितु उनके परिवार के सभी सदस्य पूरे जी जान से धान की रोपाई में लगे हैं। बीते सालों को याद करते हुए गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अक्सर जून के महीने में किसान चिलचिलाती गर्मी में बिजली की मांग के लिए धरने प्रदर्शन कर रहा होता था या फिर सरकार को कोस रहा होता था और लड़के ग्रिड फूंकने और बिजली वालों को उठा लाने जैसी स्कीमें गढ़ रहे होते थे, पर इस बार कम से कम अब तक कुदरत की मेहरबानी से ऐसा कुछ नहीं है। वाहेगुरु की मेहर है। अरदास है कि सीजन अच्छे से निकल जाए।
वहीं रामनगर नाके पर जमे नवां गांव के गुरविंदर सिंह पूरी तरह से विकास की बातें करते हैं कि पहले एक बार ट्रांसफार्मर क्या जलता कई दिनों तक बिजली की उम्मीद नहीं होती थी पर अब लगता है कि शायद आज रात ही आ जाए। बीते साल के अच्छे मानसून से बांधों में भरे पानी से मिल रही बिजली और बिजली चोरी के कम हो रहे साधन की बात जब उन्हें बताई जाती है और पूछा जाता है कि सरकार का कम और प्रकृति व जागरूक हुए लोगों का इसमें ज्यादा योगदान है तो तपाक से कहा जाता है कि रब्ब भी वही है और लोग भी वही। फर्क बस इतना है कि तन पर कच्छहरे का स्थान शॉर्ट व लोवर ने ले लिया है। गड्डा नहीं दिखता तो मोटरसाइकिल आम हो गए हंै।
लगभग हर गांव में आलम यह है कि लोग एक दूसरे की मदद को अन्य स्थानों से भी पहुंच रहे हैं। जिस दोस्त का काम पहले हो गया है वो फोन कर टै्रक्टर सहित सेवा में तैयार होने की बात करता है। बस राशन कैंटीन से हो जाए तो बेहतर नहीं तो सोडा कम से कम साथ होने का आश्र्वासन जरूर चाहता है, हालांकि मौका देख कर स्वदेशी शक्ति वाटर से भी एतराज नहीं करता। मजदूरों की कमी क्या हुई शहर में अफसरी करने वाले भी तंबे में आ कर बहन, बुआ व मासी के यहां रिश्तेदारी में मदद करने को आ गए हैं। सेवा ट्रैक्टर की लगी हो या पड़ोसी की मोटर के पानी की सब हाजिर हो रहा है।

डीजल कब हुआ महंगा! प्रकृति ने दी राहत, punjabi, farmer's expences, paddy soawing,

 बारिश के कारण किसानों ने नहीं चलाया ट्यूबवेल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
सरकार ने डीजल के दाम बढ़ा दिए। इस मुद्दे पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा हंगामा होने की संभावना थी, पर ऐसा नहीं हुआ। खेती का लागत मूल्य या खर्चे बढ़ने की दुहाई देने वाले किसान संगठन भी लगभग खामोश ही रहे। इस शांति का श्रेय केंद्र या राज्यों की सरकारों को नहीं, अपितु प्रकृति की कृपा को मिला है।
 बिजली, पानी के बाद डीजल की बात करने वाला किसान कह रहा है डीजल कब हुआ महंगा? इस साल मानसून पूर्व की बौछारों ने किसान को खेत में रौणी करने फिर और पानी छोड़ कद्दू करने के लिए किसी तरह का जेनरेटर चलाने की जरूरत नहीं पड़ने दी। इससे पहले एक एकड़ में आठ घंटे ट्यूबवेल चला कर सिंचाई करनी पड़ती थी। मानसून पांच दिन पहले आया और लगातार बरसा, तो बिजली से भी ट्यूबवेल चलाने की जरूरत नहीं पड़ी जेनरेटर तो दूर की बात।
 प्रदेश के कृषि विभाग के मुख्य अधिकारी डा. बीएस सोहल ने वीरवार को बताया कि इस साल अगर कोई साधारण सा हिसाब भी जोड़े तो अंदाजा लगा सकता है कि प्रदेश का कितना धन प्रकृति की मेहरबानी से बचा है। उन्होंने कहा कि एक हेक्टेयर खेत को तैयार करने में आम हालात में किसान मुफ्त की बिजली के अलावा 35 से 40 लीटर डीजल की खपत अपना ट्यूबवेल चलाने में कर देता है। पंजाब में 25 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में धान की रोपाई हो रही है।
परिस्थितियां बता रही हैं कि 40 रुपये प्रति लीटर पर आया डीजल यदि जला होता तो अब तक प्रदेश के किसान चार सौ करोड़ रुपये का डीजल जला चुके होते। मरम्मत के खर्च अलग होने थे। गौर हो कि पंजाब में बिजली कनेक्शन वाले 12 लाख ट्यूबवेल हैं और इतने ही बिना कनेक्शन के हैं जिन्हें धान के सीजन में ही चलाया जाता है।

Monday, 20 June 2011

धान की रोपाई जल्द निपटाने में लगा किसान, paddy soawing, farmer,

सचेत अन्नदाता 
 बासमती व पूसा-1121 को छोड़ हर किस्म की हो रही रोपाई 
 ..ताकि बाढ़ आने से पहले पकड़ लें पौधे जड़
उपमुख्य संवाददाता, पटियाला :
 मजदूरों की कमी और धान पर खर्च को बचाने के लिए सचेत किसान जल्द से जल्द धान की रोपाई करने में लगा है। धान पर पानी के अतिरिक्त खर्च को बचाने के लिए प्रत्येक किसान बारिश से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की सोच रहा है। जिले भर में अभी तक आधे से क्षेत्र में धान की रोपाई हो चुकी है। मौसमी मजदूरों की कमी खेत मजदूरों की कमी के चलते प्रत्येक किसान धान की रोपाई को लेकर परेशान है। उधर प्रत्येक साल बिजली कटों से किसान के लिए महंगी हो चुकी धान की खेती अब किसान को प्रोडक्शन कास्ट कम करने के लिए मजबूर कर चुकी है। यही कारण है कि हरेक किसान जल्द से जल्द धान की रोपाई कर बारिश से लाभ लेने की सोच रहा है। फ‌र्स्ट कम फ‌र्स्ट सर्व धीरे ही सही लेकिन इंडस्ट्री का रूप धारण करती जा रही पंजाब की कृषि पहले आओ पहले पाओ के फार्मूले को अपनाती जा रही है। धान की रोपाई के लिए जिस किसान ने खेत को पहले तैयार किया उसे लेबर मिलने के साथ-साथ सिंचाई विभाग से मिलने वाली पानी की सुविधा भी मिली। धान की रोपाई का काम जल्द निपटाने का फायदा धान की कटाई में मिलना तय होगा। कटाई के समय कंबाइन मशीन और लेबर का समय से मिलना तय होगा। इसके बाद हरियाणा सीमा से सटे सैला प्लांटों में अच्छे किसान अच्छे दाम में अपना धान बेच सकेंगे। पंजाब की मंडियों में धान बेचने के लिए लंबे इंतजार और आढ़ती से पैसे मिलने का इंतजार से राहत मिलेगी। माडर्न किसान अपने धान को जल्द निपटाने के बाद अपने कृषि यंत्रों से किराया बटोर अपनी आर्थिक स्थित को मजबूत कर पाएगा। क्षेत्र का किसान बासमती व पूसा- 1121 जैसी देरी से लगने वाली किस्मों को छोड़ कर हर अगेती किस्म की रोपाई करने में लगा है। किसान को लग रहा है कि जुलाई मध्य में आने वाले फ्लैश फ्लड व अगस्त में आने वाली बाढ़ से पहले रोपे गए पौधे जड़ पकड़ लें तो बेहतर है। फिर अगर दो-चार दिन डूबे भी रहें तो कोई गम नहीं।

Thursday, 16 June 2011

राज मिस्त्री-ड्राइवर हो गए खेत मजदूर, paddy soawing, trends, rural employment


चलो पिंड चल्लिये

पंजाबी मजदूरों को लुभाने लगा पुराना काम धान की रोपाई में मोटी कमाई के चलते पंजाबी परिवारों की बनी टीम
घर में दो सौ की बजाय आ रही दो हजार रुपये दिहाड़ी
भूपेश चट्ठा पटियाला
 धान की रोपाई के शुरुआती दिनों में हो रही बारिश और लेबर रेट के आसमान छूने के साथ ही पंजाब के किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं धान की रोपाई कम मजदूरी के चलते छोड़ चुके पंजाबी खेत मजदूर को पुराना काम लुभाने लगा है। पांच सालों में साढ़े पांच गुणा बढ़ चुके धान की रोपाई के रेट से पंजाबी मजदूरों की टीमें बनने लगी हैं। पूर्ण रूप से टकसाली पंजाबी तकनीक व जुमलों से लैस 10 से 12 बंदों की टीमों में ज्यादातर वह नए लड़के शामिल हैं, जिनके बुजुर्ग बीते जमाने में धान की रोपाई करते रहे हैं। यह लोग गांव छोड़ चुके हैं। सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा. खोसला कहते हैं कि पहले शहर का ग्लैमर खींच रहा था। अब महंगाई में जरूरतों को पूरा करने के लिए गांव की ओर लौट रहे हैं। इनमें राज मिस्त्री से लेकर, खराद पर काम करने वाले मैकेनिक तक सब शामिल हैं। इसके अलावा कुनबे अथवा बेहड़े की महिलाएं भी टीमें बना कुछ ऐसे ही उपाय कर रही हैं, जो दिहाड़ी चार सौ रुपये तक ले रही हैं। बत्ता गांव के सरपंच व प्रोग्रेसिव किसान अश्वनी बत्ता कुछ अलग कारण बताते हैं। कहते हैं कि यह काम पूरी तरह से पारिवारिक है। आम दिनों में घर का एक पुरुष सदस्य शहर जा कर 150 से 200 रुपये की दिहाड़ी ला पाता है, जबकि खेत मजदूरी करने वालों का ठीक वही सीजन है, जो व्यापारियों व कंज्यूमर डयूरेबल बनाने वाली कंपनियों के लिए दिवाली के दिनों में होता है। इन दिनों में पूरा परिवार, जिसमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग व अपाहिज भी शामिल हैं। सभी एक टीम के रूप में काम करते हैं। पांच से सात सदस्य मिल कर एक दिन में एक एकड़ में रोपाई कर लेते हैं, ऐसे में घर की दिहाड़ी दो हजार के पार हो जाती है। दिलचस्प है कि राज्य सरकार के कृषि विभाग ने चीन से लेकर जापान तक से पैडी ट्रांसप्लांटर आयात किए निजी क्षेत्र में भी ठीक ठाक सब्सिडी दे दी, लेकिन इनकी राज्य में कुल संख्या छह सौ भी पार नहीं कर पाई है और 70 लाख एकड़ में धान की रोपाई की जानी है। एक मशीन दिन भर में चार से छह एकड़ में ही धान की पनीरी लगा पाती है। ट्रांसप्लांटरों की गिनती का कम होना और इनके लिए पनीरी लगाने की विशेष तकनीक सीखने में पंजाब के किसानों की दिलचस्पी ना होना, परंपरागत तरीके प्रति बढ़ा आकर्षण है। कृषि विशेषज्ञ डा.बीएस सोहल कहते हैं कि आप तीन साल पहले के 15 सौ रुपये प्रति एकड़ की बात भूल जाएं। इससे भी दो साल पहले तो दाम मात्र छह सौ रुपये प्रति एकड़ ही थे। इस साल ढ़ाई हजार पर भी आ जाए तो गलत नहीं होगा। पंजाब के लिए एक महीने चलने वाला यही नरेगा है।