-एचकेआर 47, एचकेआर 127 और पूसा 44 की बिजाई बिलकुल ना करें
-किसान मेलों के बाहर और विशेष कार्यशालाएं लगा बेचे जा रहे हैं बीज
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब में उगाई जाने वाली और यहां के कृषि वैज्ञानिकों की ओर से सिफारिश की गई धान की किस्मों को घटिया, कम उपज और च्यादा समय व पानी लेने वाली बता प्रतिबंधित किस्मों को यहां के खेतों में धकेलने की तैयारी की जा रही है।
दिल्ली में ड्राइंग रूम में बैठ कर पंजाब के खेतों से पैसा उगाने की तैयारी कर रही कुछ कंपनियों की भनक प्रदेश के कृषि विभाग को भी लग गई है। ऐसे में विभाग के अलावा पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने अपनी ओर से भी धान की बिजाई व रोपाई करने वाली किस्मों की एक विस्तृत सूची जारी कर दी है।
दिलचस्प है कि निजी क्षेत्र की कंपनियां बिना मिट्टी व पानी की जांच कि अपने बीज बाजार में उतार देती है और हर जलवायु में बेचने के लिए हथकंडे अपनाने लगती है। कुछ ऐसे ही सेमिनार व कार्यशालाएं आयोजित कर कुछ विशेष किस्में प्रचारित की जा रही हैं। पहले ये कंपनियां बीज बेचती हैं फिर खाद और दवा की बारी आती है। कंपनियों के अपने सभी उत्पाद बेचने के बाद जब किसान की फसल बेचने की बारी आती है तो खरीददार नहीं मिलता कई तरह केंद्र व राइस शेलरों की स्पेसीफिकेशन सामने आती है।
इतना ही नहीं प्रतिबंधित की गई किस्में सरकारी स्तर पर लगने वाले किसान मेलों के स्थल के ठीक बाहर बिकने बड़े पैमाने पर आती है। इस बार निजी कंपनियां एक कदम और आगे बढ़ गई है। अब सोची समझी रणनीति के तहत कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं और बताया जा रहा कि यही एक किस्म है जो पानी की बचत करवाती है।
वहीं पीएयू आगाह करता है कि कुछ निजी व्यापारियों की ओर से सुझाई जा रही एचकेआर 47, एचकेआर 127 और पूसा 44 की बिजाई बिलकुल ना करें। इनमें झुलस रोग से लडऩे की क्षमता बिलकुल नहीं है।
वही कृषि विभाग के उप निदेशक बीज रहे और मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल बताते हैं कि ट्रेडर अपनी तरह से मुनाफा कमाने के तरीके तलाश लेता है। जिस किस्म तले रकबा बढ़ता है अगले सीजन तक उसी में कमियां निकाल दी जाती है, इससे किसान घाटे में रहता है और बिचौलिए कमाई लूट लेते हैं। इस बार भी कई शेलर मालिक व आढ़तिए प्रतिबंधित पीआर 201 किस्म लगवा रहे है और कह रहे हैं कि उपज सीधी ले आना। इससे एक तो वे मार्केट कमेटी के 12.5 फीसद का शुल्क चोरी कर लेते हैं और बाजार में ना बिकने वाली किस्म के चलते सौ रूपये तक सस्ती भी ले लेते हैं।
पीएयू की सिफारिशों अनुसार
पीएयू की ओर से विकसित की गई और प्रमाणित धान की किस्मों में पीआर 118, पीआर 116, पीआर 114, पीआर 111, पीआर 115 और पीआर 113 को रखा गया है। ये किस्में ना केवल अधिक उपज देती हैं अपितु लगने वाली बीमारियों से भी खुद की सुरक्षा करती हैं। इनमें से पीआर 111, 114 व 116 बीजने से पकने तक 138 से 145 दिनों का समय लेती है और औसत झाड़ 27-28 क्विंटल होता है जबकि पीआर 115 पकने में 125 दिन का समय लेती और 25 क्विंटल का झाड़ देती। इसके बाद आलू की फसल भी ली जा सकती है। जबकि मोटे दानों वाली 113 से 28 क्विंटल और पीआर 111 व 115 को झुलस रोग नहीं लगता। पीआर 118 पकने में 158 दिन लेती है और झाड़ 29 क्विंटल तक होता है।
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