रेड क्रास दिवस पर विशेष
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- 2007 के बाद से नहीं आया है सरकारी अनुदान
- रेडक्रास पटियाला अब देने लगा कर्मियों को वेतन तो स्टेट बैंक आफ पटियाला देता है छुटकल सामान की ग्रांट
भूपेश चट्ठा, पटियाला
किसी इंसान का कोई हाथ या पांव कट जाए तो जितनी तकलीफ उस व्यक्ति को अथवा उसके परिवार के करीबी सदस्यों को होती है, उससे कहीं ज्यादा अफसोस तब होता है जब वो नकली अंग लगवाने के लिए इधर से उधर भिखारियों की तरह भटकने के बाद कृत्रिम अंग के मंहगा होने के चलते नहीं खरीद पाता है।
बाजार में निजी किंतु बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार किया गया एक कृत्रिम हाथ सवा लाख रूपये से शुरु होता है और पांच सात लाख रूपये तक एक-एक कृत्रिम अंग अलग अलग देशों की करंसी के हिसाब से मिलते हैं। इनकी उम्र दो से तीन साल की ही होती है। इसके बाद फिर बढ़ी दरों पर खरीदना ऐसे जरूरतमंदों की मजबूरी बन जाती है। कुछ ऐसे ही लाचार करने वाले हालातों से निपटने के लिए केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एंव सशक्तिकरण मंत्रालय ने नवंबर 2000 में अंगहीन पुनर्वासन केंद्र की शुरुआत की। दिलचस्प है कि पहले सात सालों में 1.62 करोड़ रूपये के अंग व अन्य सामान अपाहिजों को देने वाले इस केंद्र ने हजारों को लाभ पहुंचाया, लेकिन फिर ये ठंडा पड़ गया।
2007 में अंतिम 3.85 लाख की ग्रांट के बाद से केंद्रीय मंत्रालय से कोई अनुदान नहीं मिला है, हालांकि हर साल सभी तरह के एस्टीमेट बन कर जाते हैं। लगभग ठप हो चुके केंद्र को अब एक बार फिर बैसाखियां देने की कोशिश की जा रही है।
केंद्र के संचालक मानते हैं कि बुरे दिनों की शुरुआत दाहिने हाथ की कमी से हुई और फिर बढ़ती चली गई। कर्मियों ने महीनों वेतन न मिलने पर आना बंद किया तो कई काम छोटी सी तार, क्लिप, फोम, चमड़े के टुकड़े, रेजिन या प्लास्टिक की पट्टी की वजह से ही रुक जाते थे। पर अब रेडक्रास पटियाला ने कर्मियों को वेतन देने का जिम्मा उठाया है तो स्टेट बैंक आफ पटियाला छुटकल कच्चे माल के लिए ग्रांट देने लगा है। ऐसे में पुरानी पड़ी किटों का प्रयोग होने लगा है।
केंद्र के प्रभारी व युनाइटेड किंगडम से पीएचडी व प्रोस्थेटिक विशेषज्ञ प्रितपाल सिंह सिद्धू बताते हैं कि इस साल 31 मार्च तक उन्होंने दो लाख 90 हजार रूपये मूल्य के सामान व सहायता उपकरण 123 लोगों का कृत्रिम अंग से लेकर क्लीपर आदि दिए हैं। हालांकि व्हील चेयर अथवा ट्राई साइकिल देने की स्थिति में अभी केंद्र नहीं आया है। मंडी बोर्ड की ओर से भेजे गए केस में किसी को खाली हाथ नहीं लौटाया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि मालवा क्षेत्र के पटियाला डिवीजन के पांच जिलों के लिए बने इस केंद्र में हरियाणा व हिमाचल प्रदेश से भी मरीज आते रहे हैं। संभव है केंद्र के आंखे मूंद लेने के बाद पंजाब सरकार इस ओर अपनी सीधी निगाह करे और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आटोबक जैसे ब्रांड न सही, पर बेहतर जुगाड़ तो उपलब्ध करवा ही सकती हैं।
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