Saturday, 2 July 2011

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खेत से लाइव, आपसी सहयोग
सेवा ट्रैक्टर की हो या पड़ोसी की, मोटर के पानी की सब हाजिर है
 एक-दूसरे की मदद को पहुंच रहे हैं दोस्त और रिश्तेदार
भूपेश चट्ठा, पटियाला : गर्मियों की छुट्टियों के इन दिनों में बच्चे वेस्टइंडीज में क्रिकेट के सपने देख रहे हैं और आसमान में बादल आते ही शहर में बच्चे बैट बॉल लेकर निकल पड़ते हैं तो गांव में बच्चे ट्रैक्टर के आगे पीछे होने लगते हैं। मौसम में नमी और एक-आध दिन छोड़कर आ रही बारिश ने किसानों के चेहरे इस कदर खिला दिए हैं कि प्रभाव घर परिवार में दिखने लगा है। खुशनुमा माहौल में किसान धान की रोपाई जल्द निपटाने में लगा है।
दिलचस्प है कि मौसम की मेहरबानी और अन्य राज्यों से धान की रोपाई को आने वाले मजदूरों की कमी ने किसानों के दोस्तों-रिश्तेदारों को एक ही मोटर पर ला बिठाया है। डकाला ब्लाक के खेड़ी, रामगढ़ सपेड़ा, धर्मेहड़ी इत्यादि गांवों के रविवार को किए दौरे में पाया गया कि आजकल न केवल किसान अपितु उनके परिवार के सभी सदस्य पूरे जी जान से धान की रोपाई में लगे हैं। बीते सालों को याद करते हुए गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि अक्सर जून के महीने में किसान चिलचिलाती गर्मी में बिजली की मांग के लिए धरने प्रदर्शन कर रहा होता था या फिर सरकार को कोस रहा होता था और लड़के ग्रिड फूंकने और बिजली वालों को उठा लाने जैसी स्कीमें गढ़ रहे होते थे, पर इस बार कम से कम अब तक कुदरत की मेहरबानी से ऐसा कुछ नहीं है। वाहेगुरु की मेहर है। अरदास है कि सीजन अच्छे से निकल जाए।
वहीं रामनगर नाके पर जमे नवां गांव के गुरविंदर सिंह पूरी तरह से विकास की बातें करते हैं कि पहले एक बार ट्रांसफार्मर क्या जलता कई दिनों तक बिजली की उम्मीद नहीं होती थी पर अब लगता है कि शायद आज रात ही आ जाए। बीते साल के अच्छे मानसून से बांधों में भरे पानी से मिल रही बिजली और बिजली चोरी के कम हो रहे साधन की बात जब उन्हें बताई जाती है और पूछा जाता है कि सरकार का कम और प्रकृति व जागरूक हुए लोगों का इसमें ज्यादा योगदान है तो तपाक से कहा जाता है कि रब्ब भी वही है और लोग भी वही। फर्क बस इतना है कि तन पर कच्छहरे का स्थान शॉर्ट व लोवर ने ले लिया है। गड्डा नहीं दिखता तो मोटरसाइकिल आम हो गए हंै।
लगभग हर गांव में आलम यह है कि लोग एक दूसरे की मदद को अन्य स्थानों से भी पहुंच रहे हैं। जिस दोस्त का काम पहले हो गया है वो फोन कर टै्रक्टर सहित सेवा में तैयार होने की बात करता है। बस राशन कैंटीन से हो जाए तो बेहतर नहीं तो सोडा कम से कम साथ होने का आश्र्वासन जरूर चाहता है, हालांकि मौका देख कर स्वदेशी शक्ति वाटर से भी एतराज नहीं करता। मजदूरों की कमी क्या हुई शहर में अफसरी करने वाले भी तंबे में आ कर बहन, बुआ व मासी के यहां रिश्तेदारी में मदद करने को आ गए हैं। सेवा ट्रैक्टर की लगी हो या पड़ोसी की मोटर के पानी की सब हाजिर हो रहा है।

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