-खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए तैयार किया जा रहा नाइट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया
-हरी जैविक खाद पैदाकर मंहगी रसायनिक खादों से किनारा करने की ओरभूपेश चट्ठा, पटियाला
शताब्दियों के अपने अनुभव भरे ज्ञान को अमेरिकियों के पास चंद रसायनों के लिए बेचने वाला पंजाब का किसान अब एक बार फिर जैविक खेती की ओर लौटने लगा है। उपज कम न हो इसके लिए आधुनिक मशीनरी का प्रयोग तो किया जा रहा है, लेकिन रसायनों की खपत कम कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति दुरूस्त करने को खेत मे हरी खाद उगाई जा रही है। ऐसे में खाद की भी हो खेती तो धरती का तंदरुस्त रहना तय है।
हरित क्रांति आने से पहले भी पंजाब हरियाणा का किसान 'चीझणÓ अथवा 'ढांचाÓ नाम से ऐसे पौधों की बिजाई साल से एक बार किया करता था। मुख्य फसल की बिजाई अथवा रोपाई से पहले 28-30 दिनों के लिए इन पौधों के बीजों का छिड़काव खेतों मे कर दिया जाता है और मुख्य फसल उगाने से पहले इन पौधों को खेत में बाहकर नष्ट कर दिया जाता है। पौधों के अवशेष मिट्टी मे मिलकर खाद का कार्य करते है।
घग्गर नदी की बेल्ट पर अब 60 दिनों तक पकने वाली धान की किस्म नही उगाए जाने के चलते किसान का ध्यान पानी व पर्यावरण बचाने की ओर लगा है। वहीं उपज में आ रहे ठहराव के चलते किसान अब लागत मूल्य कम कर मार्जन बढ़ाना चाहता है।
धर्महेड़ी गांव के नंबरदार राजवंत सिंह बताते है कि 10-15 किलो बीज प्रति एकड़ में एक बार बहाई के बाद छिड़क दिया जाता है। पानी देकर फिर दो तीन दिन बाद पानी लगाया जाता है। फिर सप्ताह में एक दिन पानी लगाया जाता है। ऐसे ही 28-30 दिनों मे ढाई तीन फुट का चीझण का पौधा उग जाता है। खेतों मे अप्रैल से जून मध्य तक करने के लिए कुछ नही होता। ऐसे में मिट्टी की ताकत बढ़ाने वाले ये उपाय साल मे एक बार आराम से किये जा सकते है। जीरी रोपाई करने से पहले इन पौधों को बहा दिया जाता है फिर पानी लगा, कद्दू कर रोपाई हो जाती है। राजवंत सिंह अपना अनुभव बताते है कि 100 रूपये प्रति एकड़ से अधिक का खर्च इस कार्य में नही आता।
वही गुरप्रीत सिंह कहते है कि हरी खाद की खेती के बाद डीएपी जैसी रसायनिक खाद के कम से कम डाले जाने वाले एक थैले के खर्च की बचत हो जाती है। जहां ढ़ाई तीन थैले यूरिया के डालने होते है वहीं यह दो थैले तक सिमट जाता है। मिïट्टी को साल भर पूरी ताकत रहती है। हरी खाद की खेती से गेहूं की उपज भी अच्छी होती है। पर्यावरणविद् अमरदीप सिंह बताते है कि अब ट्रैक्टर आम होने से चीझण की बिजाई आसानी से हो सकती है। याद रहे कि चीझण की खेती के लिए गहराई पर ट्रैक्टर चलाना होता है। भारी साधन आज की कृषि मशीनरी में मौजूद है। ऐसे में इन जैविक तकनीकों का लाभ लेना चाहिये। इससे पर्यावरण को सुधारा जा सकता है। खर्च कम किया जा सकता है और फसल भी अच्छी होती है।
कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल बताते है कि सरकार भी हर जिले में चीझण के बीज मुफ्त बांटती है। पूर्व में धान की 60 दिनों में पकने वाली सट्ठी किस्म न लगाने वाले किसानों को यह बीज दिए जाते थे अब सभी के लिए है। वे बताते है कि इस पौधे से मिïïट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। पानी की पकड़ बढ़ाने की क्षमता भी बढ़ती है। इस के अलावा पौधे की जड़ मे बनी गांठें नाईट्रोजन फिक्सेशन बैक्टीरिया पैदा करती है। यह मिट््टी की ढांचा मजबूत कर देता है जिससे रसायनिक खाद की आवश्यक्ता काफी कम हो जाती है।