भूपेश चट्ठा, पटियाला
गैस चैंबर बने पंजाब को पराली के जलने से छुटकारा दिलाने, किसान को लगातार हर सप्ताह आय के अलावा धरती के गिरते भूजल स्तर को संभालने के साथ-साथ मंहगे रसायनिक फर्टीलाईजर के स्थान पर आर्गेनिक खाद धरती में डालने के सस्ते, साधारण और टिकाऊ ज्ञान को दबा दिया गया है। जबकि किसान इन दिनों में सिर्फ एक बिजाई में ही दो फसलें लगा कर तीन गुना मुनाफा कमा सकता है। ऐसा करने से पर्यावरण भी लगभग पूरी तरह से हरा भरा रहेगा।
इन दिनों में गेहूं के स्थान पर गन्ने की बिजाई और साथ में सब्जियां, विशेष रूप से खरबूजा व अन्य बेलों के रूप में लगने वाली, खीरा घीया, टिंडे के अलावा, बैंगन, शिमला मिर्च और फली वाली लगभग हर दाल-सब्जी को गन्ने की कतारों अथवा घेरों के बीच गन्ने की बिजाई के साथ लगाया जा सकता है। गन्ने की बिजाई 15 जनवरी के तक होती रहती है। ऐसे में आनन फानन में खेत खाली करने पराली जलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। इतने समय में पराली पांच-छह बहाई में स्वत: गल जाती है। इसी दौरान लगी खरबूजे की फसल अप्रैल अंत व मई आरंभ में आने पर खासे अधिक दाम दिलाती है। जून के बाद होने वाली गुडाई में सब्जियों के पौधे गन्ने के लिए आर्गेनिक खाद का काम कर जाते है। कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते है कि अमृतसर क्षेत्र में इसका खासा चलन था पर अब काफी कम है। सब्जियों से किसान को लगातार आय होती है एक ही बिजाई से दो फसलें आने पर खर्च में कटौती हो जाती है, वैसे भी इन्हें खाद-पानी की कम ही जरूरत पड़ती है। इनका अपना इनबिल्ड सिस्टम है।
ध्यान रहे की गेहूं में किसान को बचत 20 हजार प्रति एकड़ से ज्यादा नहीं है जबकि गन्ना दो लाख के पार जाता है और सब्जियों से रूटीन में आय होती है। चंडीगढ़ के निकट तेपला गांव और पंजाब सीमा से सटे हरियाणा के अजीमगढ़ गांव में कुछ इसी तरह की खेती कर रहे फाइव ऐलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी फन विल के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है चूंकि धान की फसल लेने के बाद किसान पराली इसलिए जलाता है क्योंकि नवंबर मध्य में गेहूं की सीजन शुरू होता है, लेकिन इस मामले में पराली को खेत में ही गल कर खाद बनने और खेत को गन्ने के लिए एक ही खर्च में तैयार होने का पूरा समय मिलता है।
अनुदान दे बढ़ावा देना दूर शक्कर बनाने की मंजूरी ही आसान नहीं
सरकार दो से तीन लाख रूपये में लगने वाले छोटे भूरी शक्कर बनाने वाले प्लांट लगाने में आर्थिक सहायता दे इस डाइवर्सिफिकेशन को बढ़ावा दे सकती है। लेकिन नाटकीय किंतु सत्य है कि प्रदेश में गन्ने के रस से गुड़ अथवा शक्कर बनाने के लिए गन्ना आयुक्त से मंजूरी का लाइसेंस लेना ही आसान काम नहीं है। राज्य में चीनी मिलों के लिए गन्ने की खासी कमी है। ऐसे में कुल्हाड़ी से गुड़ बनाने का ज्यादातर कारोबार अवैध की श्रेणी में ही आता है।
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