गंदे तालाब में निर्मल जल, गंदगी पर लैंडस्केप भी होगा
प्रदेश के चार फीसदी गांवों में वाटर रिचार्जिग की योजना
पंजाब के शहरों में टोबा और गांव में छप्पड़ का नाम लेते ही दुर्गध आने लगती है, तीन-चार दशक पहले तक आर्गेनिक कहे जाने वाले इन तालाबों में मछलियां पलती थी और भैंस की पूंछ पकड़ कर बच्चों को तैरते देखना आम था, दिन फिरे तो पानी तेजाबी हो गया, पानी पांव से छू जाए तो गलने लगते हैं, लेकिन अब एक बार फिर हालात बदलने लगे हैं। गांव का टोबा अब पिकनिक स्पॉट होने को है, बस मानसून की फुहारों को जम कर बरस लेने दीजिए।
पारा थोड़ा कम हुआ और राज्य सरकार के विभागों में खींचतान न हुई या फिर किसी स्वयं सेवी संगठन ने पौधे लगाने का काम अपने हाथ में ले लिया तो गांव का टोबा एक बार फिर पिकनिक स्पॉट बन जाएगा। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड की ओर से चलाई जा रही योजना के तहत पटियाला जिले के पांच गांवों में प्राकृतिक रूप से सदियों से चलते आ रहे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट अथवा टोबे पिकनिक स्पॉट में तबदील होने लग गए हैं।
योजना के तहत इन टोबों को स्वच्छ तालाब की शक्ल दे दी गई है, जबकि 23 पर काम चल रहा है। विभाग के एक्सईएन सुभाष चंद्र गुप्ता कहते हैं कि यदि बीच में बाढ़ जैसी कोई बड़ी अड़चन न आई तो कुछ और गांवों में भी प्रोजेक्ट पूरे हो जाएंगे अन्यथा हमें मानसून के बाद अक्टूबर तक का इंतजार करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि गांवों के तालाबों का जीर्णोद्धार करने के नाम पर आई इस योजना के तहत ढाई-ढाई सौ गांवों में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड प्रदेश की लगभग चार फीसदी ग्रामीण भूमि पर बने इन गंदे तालाबों में सिर्फ ढांचागत बदलाव लाने जा रहे हैं। इससे दूषित पानी को पीने लायक तो नहीं बनाया जा सकेगा पर करीब करीब निर्मल जल के रूप में बदल दिया जाएगा।
क्या है प्रोजेक्ट
पटियाला : सीवरेज बोर्ड के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर आरसी दीवान ने मंगलवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि गांवों की जरूरतों व आबादी के हिसाब से वर्तमान टोबे को एक बार पूरी तरह से सूखा कर तय किया जाएगा कि कितनी जमीन की जरूरत है। इसके बाद शेष भूमि को पंचायत के हवाले कर दिया जाएगा। टोबे को चार बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा। पहले हिस्से में गांव की सीवरेज आउटलेट आ कर सीधे गिरेगी, यहां से मीथेन गैस आसमान में चली जाएगी तो सालिड वेस्ट नीचे जम जाएगी और पानी अगले कुंड में चला जाएगा। इसी क्रम में पानी दूसरे से तीसरे और फिर चौथे कुंड में पहुंचेगा। यहां आया पानी सिंचाई के लायक भी होगा और नीचे जमीन पर किसी तरह की सिल्ट न होने के चलते धरती में भी समां कर भूमिगत जल स्तर को रीचार्ज करने लगेगा। और इसी चौथे कुंड के पानी से टोबे के आसपास अतिरिक्त बची भूमि पर लगाए जाने वाले लैंडस्केप को सींचा जा सकेगा। यह स्वत: चलने वाली प्रक्रिया होगी और सफाई केवल एक कुंड की करनी होगी। भारत सरकार और मनरेगा के तहत आई इस योजना के तहत प्रत्येक जिले के 25 गांवों को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चयनित किया गया है।