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Wednesday, 13 July 2011

प्रदेश में टोबे बनेंगे पिकनिक स्पॉट, save rain water, water harvesting, rural punjab,

बदलेगी नुहार

गंदे तालाब में निर्मल जल, गंदगी पर लैंडस्केप भी होगा 
 प्रदेश के चार फीसदी गांवों में वाटर रिचार्जिग की योजना
भूपेश चट्ठा, पटियाला
 पंजाब के शहरों में टोबा और गांव में छप्पड़ का नाम लेते ही दुर्गध आने लगती है, तीन-चार दशक पहले तक आर्गेनिक कहे जाने वाले इन तालाबों में मछलियां पलती थी और भैंस की पूंछ पकड़ कर बच्चों को तैरते देखना आम था, दिन फिरे तो पानी तेजाबी हो गया, पानी पांव से छू जाए तो गलने लगते हैं, लेकिन अब एक बार फिर हालात बदलने लगे हैं। गांव का टोबा अब पिकनिक स्पॉट होने को है, बस मानसून की फुहारों को जम कर बरस लेने दीजिए।
 पारा थोड़ा कम हुआ और राज्य सरकार के विभागों में खींचतान न हुई या फिर किसी स्वयं सेवी संगठन ने पौधे लगाने का काम अपने हाथ में ले लिया तो गांव का टोबा एक बार फिर पिकनिक स्पॉट बन जाएगा। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड की ओर से चलाई जा रही योजना के तहत पटियाला जिले के पांच गांवों में प्राकृतिक रूप से सदियों से चलते आ रहे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट अथवा टोबे पिकनिक स्पॉट में तबदील होने लग गए हैं।
योजना के तहत इन टोबों को स्वच्छ तालाब की शक्ल दे दी गई है, जबकि 23 पर काम चल रहा है। विभाग के एक्सईएन सुभाष चंद्र गुप्ता कहते हैं कि यदि बीच में बाढ़ जैसी कोई बड़ी अड़चन न आई तो कुछ और गांवों में भी प्रोजेक्ट पूरे हो जाएंगे अन्यथा हमें मानसून के बाद अक्टूबर तक का इंतजार करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि गांवों के तालाबों का जीर्णोद्धार करने के नाम पर आई इस योजना के तहत ढाई-ढाई सौ गांवों में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब जलापूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड प्रदेश की लगभग चार फीसदी ग्रामीण भूमि पर बने इन गंदे तालाबों में सिर्फ ढांचागत बदलाव लाने जा रहे हैं। इससे दूषित पानी को पीने लायक तो नहीं बनाया जा सकेगा पर करीब करीब निर्मल जल के रूप में बदल दिया जाएगा।

क्या है प्रोजेक्ट


पटियाला : सीवरेज बोर्ड के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर आरसी दीवान ने मंगलवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि गांवों की जरूरतों व आबादी के हिसाब से वर्तमान टोबे को एक बार पूरी तरह से सूखा कर तय किया जाएगा कि कितनी जमीन की जरूरत है। इसके बाद शेष भूमि को पंचायत के हवाले कर दिया जाएगा। टोबे को चार बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा। पहले हिस्से में गांव की सीवरेज आउटलेट आ कर सीधे गिरेगी, यहां से मीथेन गैस आसमान में चली जाएगी तो सालिड वेस्ट नीचे जम जाएगी और पानी अगले कुंड में चला जाएगा। इसी क्रम में पानी दूसरे से तीसरे और फिर चौथे कुंड में पहुंचेगा। यहां आया पानी सिंचाई के लायक भी होगा और नीचे जमीन पर किसी तरह की सिल्ट न होने के चलते धरती में भी समां कर भूमिगत जल स्तर को रीचार्ज करने लगेगा। और इसी चौथे कुंड के पानी से टोबे के आसपास अतिरिक्त बची भूमि पर लगाए जाने वाले लैंडस्केप को सींचा जा सकेगा। यह स्वत: चलने वाली प्रक्रिया होगी और सफाई केवल एक कुंड की करनी होगी। भारत सरकार और मनरेगा के तहत आई इस योजना के तहत प्रत्येक जिले के 25 गांवों को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चयनित किया गया है।

Tuesday, 5 April 2011

प्राकृति: भाखड़ा में पानी भरपूर, मानसून तक नहीं किल्लत, nature, dam, save rain water, mansoon,


-भाखड़ा में पिछले साल से 75 फीट और  पौंग में 40 फीट ज्यादा है पानी
- एक अप्रैल से शुरू हुए भराव सीजन में दोगुना दिया जा रहा है पानी
-डेहर व रणजीत सागर में पानी बीते साल के आसपास
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गर्मी की दस्तक चाहे राजस्थान से पंजाब या हिमाचल प्रदेश ना भी पहुंची हो लेकिन हिमाचल के बांधों से पंजाब होते हुए राजस्थान-दिल्ली-हरियाणा जाने वाले पानी की मांग यहां जरूर पहुंच गई है। लेकिन वर्षों बाद उत्तर भारत के चार बड़े बांधों में से दो की स्थिति ऐसी है कि कम से कम इस साल गर्मियों में मानसून आने तक पानी की किल्लत नहीं होने वाली है।

बांधों के पानी से पन बिजली उत्पादन करने वाले पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड के पास आ रही सूचनाएं बताती है कि उत्तर के सबसे बड़े भाखड़ा बांध में तो पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में  75 फीट ज्यादा है और राजस्थान को पानी भेजने वाले पौंग बांध में जल स्तर बीते साल की तुलना में 40 फीट से भी ज्यादा है।

 बांधों में जल भराव का सीजन अप्रैल से शुरू हो कर सितंबर अंत तक चलता है। वर्ष 2010 में मानसून के रूप में प्राकृति खूब मेहरबान रही तो खेतों में भी सिंचाई को नहरी पानी की जरूरत कम ही रही तो बांधों में आवक 50 हजार क्यूसिक का आंकड़ा काफी समय तक पार किए रखी। भाखड़ा बांध में खतरे भराव क्षमता के निकट और खतरे के निशान तक भी आया और फ्लड गेट टेस्ट भी हुए और खोल भी दिए गए।

पावरकाम के आंकड़े बताते है कि सतलुज व व्यास नदियों पर बने बांधों में एक अप्रैल से तकनीकि रूप से शुरू हुए भराव सीजन के पांचवें दिन भाखड़ा का जल स्तर 1592.44 फीट पर है, जबकि पिछले साल इसी दिन ये 1517.00 फीट पर था। इसी प्रकार पौंग में पानी का स्तर 1345 फीट पर है तो पिछले साल यहां पर 1297 फीट पर पानी था। हालांकि डेहर में पानी पिछले साल से दो फीट कम 2922 फीट पर है जबकि रावी नदी पर बने रणजीत सागर बांध में पानी पिछले साल से छह मीटर ज्यादा है यहां स्तर 504 मीटर से उपर है।

दिलचस्प है कि भाखड़ा बांध से इस साल पानी छोड़े जाने का सिलसिला भी बीते साल से करीब दोगुना है। पानी की आवक जहां आठ हजार क्यूसिक पर है तो डिसचार्ज 16 हजार के पार। याद रहे कि इन दिनों में पिछले सा भी पानी की आवक सात हजार क्यूसिक के पास ही थी। पंजाब में ही प्रयोग होने वाले रणजीत सागर बांध से हालांकि पानी काफी कम छोड़ा जा रहा है यहां सात हजार की आवक पर डिसचार्ज चार हजार क्यूसिक से उपर रखा गया है। याद रहे कि पंजाब में पानी की जरूरत दस जून से धान की रोपाई के बाद ही पड़ती है और मानसून में भी जारी रहती है जबकि दिल्ली-राजस्थान में पानी की मांग मानसून आने तक सबसे ज्यादा रहती है। क्षेत्र में सामान्य मानसून जून अंत में आ जाता है।

Thursday, 6 January 2011

उम्मीद 2011 जल संरक्षण, बने कानून पूरी इच्छा शक्ति से लागू हों

भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोकतंत्र में चुनावी वर्ष को लूटतंत्र के एक हिस्से के रूप में हर कोई देखता है और चाहता है कि कोई भी उसे कुछ ना कहे बाकि जिसका जो नुकसान होता है हो जाए। ऐसे में प्राकृतिक स्रोतों की खामोशी को उनकी कमजोरी समझ लिया जाता है और इंसान इनके दोहन से आगे निकल कर शोषण की ओर चल पड़ता है।  पंजाब के पास खनिज के नाम पर पानी ही रह जाता है। लेकिन पानी को पिता तुल्य बताने वाले पंजाबियों के पास पिछले समय में पानी का खासा निरादर हुआ है। पानी का महत्व समझ ना पाने के चलते कानूनों का सहारा लेना पड़ रहा है। ऐसे में नए साल में ये उम्मीद तो की ही जा सकती है कि जल संरक्षण को बने कानून पूरी इच्छा शक्ति के साथ लागू किए जाएं और प्रदेश का समझदार वोटर भी प्रशासन पर अपना गुस्सा ना निकाले, जिससे पानी का महत्व फिर से बरकरार हो जाए।

ग्रामीणों की समझ में आई बात पर शहरी...

 प्रदेश के 20 जिलों के  12 हजार से अधिक गांवों में दस मई से पहले धान की पनीरी तथा दस जून से पहले किसने धान की रोपाई कर दी है। पूरे राज्य को खबर हो जाती है, ट्रैक्टर भी फिरवा दिया जाता है लेकिन हर शहर में हर रोज कितने नक्शे बिल्डिंग बाई लॉ का उल्लघंन कर पास हो गए और भवन निर्माण भी हो गया इसकी कोई कानो कान खबर नहीं होने देता। याद रहे कि ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल के  स्तर में गिरावट अगर 23 सेमी. प्रति वर्ष की है तो कंक्रीट के जंगलों में यह आंकड़ा 54 सेमी. पर आ जाता है। पंजाब में रेन वाटर हार्वेस्टिंग नई अवधारणा नहीं है, धरती के नीचे पानी उगाओ, और फिर जरूरत पडऩे पर इसकी फसल ले लो। इस संबंध में कानून 1972 में बने आर्कीटेक्ट एक्ट के  समय से बनते आ रहे हैं और हर कानून बनने के साथ ही छूट दिए जाने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है और फिर से कड़े कानून की बात भी शुरू हो जाती है। लेकिन शहरी क्षेत्रों में पंजाब स्टेट वाटर रिर्सोसिस कमेटी के सुझाव पर 1998 में पंजाब ग्राउंड वाटर कंट्रोल एंड रेगुलेशन एक्ट आस्तित्व में आया और पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसकी शुरुआत पटियाला से ही की गई। शहरी क्षेत्रों में दूसरा कानून विशुद्ध रूप से बारिश के पानी को लेकर बना, रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग इन बिल्डिंग बाई लॉ है। वहीं, अनुमान के विपरीत 2008 में बना प्रिजर्वेशन ऑफ सब सायल एक्ट बेहतरीन तरीके से लागू हो भी गया। उम्मीद है स्थानीय निकाय इस साल जागते रहेंगे। सरकार ने ही लिख भेजा कि शर्तें खासी कड़ी हैं,

किसानों को इंसेंटिव देना ही ठीक

प्रदेश में भूजल का प्रयोग कैसे हो, कैसे इसे संजोया जाए और कैसे बचाया जाए जैसे मुद्दों को ध्यान में रख पंजाब स्टेट वाटर रिसोर्स कमेटी के मॉडल बिल पर आधारित ग्राउंड वाटर कंट्रोल (कंट्रोल एंड रेगुलेशन) एक्ट 1998 बनाया गया। दिलचस्प है कि कमेटी ने ही ड्राफ्ट को उपभोक्ताओं के लिए खासा कड़ा बताया। इस पर यह भी कहा गया कि यह बिल किसानों के  हित में च्यादा नहीं है, परामर्श दिया गया कि किसानों के  लिए इंसेंटिव देने का सिस्टम ही बेहतर है। 

नक्शे से बाहर निकलते ही बेसमेंट, गोदाम और पार्किंग ना बने वाटर टैंक

प्रदेश में इस समय सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की है तो इन्हीं की चलेगी, कांग्रेस की थी तो कांग्रेसियों की चलती थी इसमें कोई दो राय नहीं है, पर राजनीति से ऊपर रह अर्थव्यवस्था हर शासन में चलती रहती है। शायद यही वजह है कि राष्ट्रपिता की तस्वीर वाले नोट को देखकर हर कोई राजनीति से ऊपर उठकर विकास व आर्थिकता की बात करता है। कुछ ऐसे ही तौर तरीके अपना कर रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के होने वाले आवश्यक उपायों को धत्ता बताया जा रहा है। सारे नियम कानून सिर्फ किताबों तक सिमटाते जाते रहे हैं। एक बार नक्शा पास करवाने के बाद रेन वाटर टैंक के नक्शे से निकल कर बेसमेंट, गोदाम, पार्किंग और कभी कभी बैंकुएट हाल का हिस्सा ना बने और लोगों की मानसिकता में थोड़ा बदलाव तो आए, वास्तविकता यह है कि इन चीजों का सबसे पहले व सीधा लाभ तो उसी व्यक्ति को है जिसने इन्हें बनवाया हो। 

Tuesday, 30 November 2010

500 गंदे पानी के तालाब बनेंगे पिकनिक स्पॉट

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के शहरों में टोबा और गांवों में छप्पड़ का नाम लेते ही दुर्गध आने लगती है, करीब चार दशक पहले तक के आर्गेनिक कहे जाने वाले इन तालाबों में मछलियां पलती थीं और भैंस की पूंछ पकड़ कर बच्चों को तैरते आम देखा जा सकता था, लेकिन अब पांव भी पानी से छू जाए तो गलने लगते हैं। कारण चाहे जो भी रहे हों, लेकिन राज्य के 12 हजार से ज्यादा गांवों में से ठीक पांच सौ गांवों की सूरत और सीरत दोनों बदलने वाली है। इन गांवों के प्राकृतिक रूप से सदियों से चलते आ रहे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट पिकनिक स्पाट में तबदील होने जा रहे हैं।
गांव के तालाब का जिर्णोद्वार करने के नाम पर आई इस योजना के तहत ढाई-ढाई सौ गांवों में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग और पंजाब वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड प्रदेश की लगभग चार फीसदी ग्रामीण भूमि पर बने इन गंदे तालाबों में सिर्फ ढ़ांचागत बदलाव लाने जा रहे हैं। इससे दूषित पानी पीने लायक तो नहीं बनाया जा सकेगा पर करीब निर्मल जल के रूप में तबदील होने लगेगा। इतना ही नहीं ये सारा काम 31 मार्च तक निपट जाएगा और अगली गर्मियों में चाहे छाया ना भी प्रदान कर पाएं, लेकिन मानसून में गांव की गंदगी के ढेर पर लेंड स्केप चमकने लगेंगे।
बोर्ड के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर आरसी दीवान ने कहा कि गांव की जरूरतों व आबादी के हिसाब से वर्तमान टोबे को एक बार पूरी तरह से सुखाकर तय किया जाएगा कि कितनी जमीन की जरूरत है। इसके बाद शेष भूमि को पंचायत के हवाले कर दिया जाएगा। आज के लिहाज से ये भूमि 50 लाख रुपये से कहीं भी कम नहीं है। टोबे को चार बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा। पहले हिस्से में गांव की सीवरेज आउटलेट आकर सीधे गिरेगी, यहां से मीथेन गैस आसमान में चली जाएगी तो सालिड वेस्ट नीचे जम जाएगी और पानी अगले कुंड में चला जाएगा। इसी क्रम में दूसरे से तीसरे और फिर चौथे कुंड में पहुंचेगा। यहां आया पानी सिंचाई के लायक भी होगा और नीचे जमीन पर किसी तरह की सिल्ट ना होने के चलते धरती में भी समा कर भूमिगत जल स्तर को रीचार्ज करने लगेगा। ढाई से चार लाख रुपये की लागत में बदबू समाप्त हो जाएगी और इसी चौथे कुंड के पानी से टोबे के आसपास अतिरिक्त बची भूमि पर लगाए जाने वाले लेंड स्केप को सींचा जा सकेगा। यह स्वत: चलने वाली प्रक्रिया होगी और सफाई केवल एक कुंड की करनी होगी। भारत सरकार और नरेगा के तहत आई इस योजना के तहत प्रत्येक जिले के 25 गांवों को पायलेक्ट प्रोजेक्ट के रूप में चयनित किया गया है।
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आने लगी हैं सिफारिशें
बोर्ड के ही एक अन्य अधिकारी ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में लोगों की दिलचस्पी का आलम ये है कि राज्य अथवा केंद्र की किसी भी योजना को लागू करने से पहले अपना की फायदा देखने वाली ग्रामीण राजनीति इस प्रोजेक्ट की ओर उत्साहित होकर देखने लगी है। पटियाला जिले के 25 में 16 गांवों की पहचान कर काम चालू कर दिया गया है। और तो और सत्ताधारी दल द्वारा योजना में अपने गांव का नाम शामिल किए जाने की सिफारिशें भी पहले चरण के पूरी होने से पहले आने लगी हैं।

Sunday, 14 November 2010

अब जिलों में पहुंची पानी की लड़ाई

भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिमाचल प्रदेश वर्सेज पंजाब, पंजाब वर्सेज हरियाणा, पंजाब वर्सेज राजस्थान अथवा हरियाणा वर्सेज दिल्ली.. ये किसी खेल प्रतियोगिता के लिए होने वाले मैच नहीं हैं अलबत्ता गर्मियों के दिनों में पानी के लिए इन राज्यों के बीच होने वाली अधिकारों की लड़ाई है। अब यह एक पायदान नीचे गिर कर एक ही राज्य की सरकार के अधीन शुरू होने जा रही है और इसका बिगुल पटियाला जिले से बज गया है। यहां के डिप्टी कमिश्नर ने जिले के किसानों के लिए अधिक पानी की मांग कर डाली है।
डिप्टी कमिश्नर दीप इंदर सिंह ने सिंचाई विभाग के सचिव को पत्र लिख कर मांग की है कि वर्तमान समय में मिल रहा पानी काफी नहीं है, इससे जिले की सिंचाई जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में अधिक पानी दिया जाए। उन्होंने मांग की है कि वर्तमान कोटे को बढ़ा कर कम से कम दोगुना किया जाए। हाल ही में जिला स्तर पर हुई किसानों व अधिकारियों की बैठक में किसानों की ओर से पानी कम मिलने व सिंचाई जरूरतें पूरा ना होने के उठाए गए मुद्दे के बाद जिला प्रशासन ने अपनी बात राज्य सरकार के पास रखी गई है। आंकड़ों के हवाले से तर्क दिया गया है कि पटियाला जिले को राज्य में सबसे कम पानी अलाट किया गया है, इसे समय की जरूरत अनुसार बढ़ाया नहीं जा सकता तो कम से कम अन्य जिलों के बराबर जरूर किया जाए।
अधिकारी बताते हैं कि जिले के 5.72 लाख एकड़ क्षेत्र में सिंचाई के लिए 8.5 क्यूसिक पानी दिया जा रहा है, जबकि इसे दोगुना किया जाना चाहिए। यही राज्य के अन्य जिलों की धरती व पानी का औसत है। याद रहे कि पटियाला जिले में बीते समय में मक्की की पैदावार खासी हुआ करती थी, इसके अलावा यहां गन्ने के अधीन भी रकबा बहुत ज्यादा था, लेकिन अब यह तबदील हो कर धान और सिर्फ धान में बदलता गया। जिले में कई क्षेत्रों में जल भराव की समस्या इस कदर हावी थी की चार दशक पहले दलदल खत्म करने को सफेदा अथवा यूकेलिप्टस लगाए गए। नहरों के किनारे मजबूत करने को कीकर बहुतायात में लगे पर आज कुल आठ जोन में से चार समाना, पातड़ां, नाभा और पटियाला डार्क जोन में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में पहले अलाट किया गया पानी का कोटा अब पुराने हिसाब से ठीक तो हो सकता है पर मौजूदा स्थिति में नहीं।
बाढ़ व सूखे दोनों की ही मार झेलने वाले सतलुज-यमुना लिंक नहर और हरियाणा की ओर जाने वाली भाखड़ा मेन लाइन के साथ लगते लाछड़ू, सराला कलां, खुर्द, कपूरी जैसे कई गांव हैं जहां पानी 12 सौ फुट से खोद कर निकाला जा रहा है पर साथ लगती नहर के पानी को नहीं छेड़ सकते। बीएमएल के अलावा भाखड़ा की ही नरवाना ब्रांच, सप्लाई लाइन, सरहिंद नहर और घग्गर फीडर जैसी नहरों के अलावा सीजनल नदियों में घग्गर, मारकंडा, टांगरी, पटियाला की राव, मिआंपुर चौ ऐसे बरसाती नाले हैं जो मानसून में मार तो करते हैं पर सिंचाई में नाममात्र ही योगदान करते हैं।
दिलचस्प है कि किसानों के पास नहरी पानी के बिल तो आते हैं पर पानी नहीं आता। कौरजीवाला गांव के पास डेयरी चला रहे परविंदर सिंह कहते हैं कि उन्हें नहरी पानी अलाट है सुआ भी सामने से गुजर रहा है पर पानी देखे हुए जमाना गुजर गया।

Tuesday, 9 November 2010

बिजाई एक, फसलें दो, और मुनाफा तीन गुणा

भूपेश चट्ठा, पटियाला
गैस चैंबर बने पंजाब को पराली के जलने से छुटकारा दिलाने, किसान को लगातार हर सप्ताह आय के अलावा धरती के गिरते भूजल स्तर को संभालने के साथ-साथ मंहगे रसायनिक फर्टीलाईजर के स्थान पर आर्गेनिक खाद धरती में डालने के सस्ते, साधारण और टिकाऊ ज्ञान को दबा दिया गया है। जबकि किसान इन दिनों में सिर्फ एक बिजाई में ही दो फसलें लगा कर तीन गुना मुनाफा कमा सकता है। ऐसा करने से पर्यावरण भी लगभग पूरी तरह से हरा भरा रहेगा।
इन दिनों में गेहूं के स्थान पर गन्ने की बिजाई और साथ में सब्जियां, विशेष रूप से खरबूजा व अन्य बेलों के रूप में लगने वाली, खीरा घीया, टिंडे के अलावा, बैंगन, शिमला मिर्च और फली वाली लगभग हर दाल-सब्जी को गन्ने की कतारों अथवा घेरों के बीच गन्ने की बिजाई के साथ लगाया जा सकता है। गन्ने की बिजाई 15 जनवरी के तक होती रहती है। ऐसे में आनन फानन में खेत खाली करने पराली जलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। इतने समय में पराली पांच-छह बहाई में स्वत: गल जाती है। इसी दौरान लगी खरबूजे की फसल अप्रैल अंत व मई आरंभ में आने पर खासे अधिक दाम दिलाती है। जून के बाद होने वाली गुडाई में सब्जियों के पौधे गन्ने के लिए आर्गेनिक खाद का काम कर जाते है। कृषि विशेषज्ञ डा. बीएस सोहल कहते है कि अमृतसर क्षेत्र में इसका खासा चलन था पर अब काफी कम है। सब्जियों से किसान को लगातार आय होती है एक ही बिजाई से दो फसलें आने पर खर्च में कटौती हो जाती है, वैसे भी इन्हें खाद-पानी की कम ही जरूरत पड़ती है। इनका अपना इनबिल्ड सिस्टम है।
ध्यान रहे की गेहूं में किसान को बचत 20 हजार प्रति एकड़ से ज्यादा नहीं है जबकि गन्ना दो लाख के पार जाता है और सब्जियों से रूटीन में आय होती है। चंडीगढ़ के निकट तेपला गांव और पंजाब सीमा से सटे हरियाणा के अजीमगढ़ गांव में कुछ इसी तरह की खेती कर रहे फाइव ऐलीमेंट हेल्थ एंड एजूकेशनल सोसायटी फन विल के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है चूंकि धान की फसल लेने के बाद किसान पराली इसलिए जलाता है क्योंकि नवंबर मध्य में गेहूं की सीजन शुरू होता है, लेकिन इस मामले में पराली को खेत में ही गल कर खाद बनने और खेत को गन्ने के लिए एक ही खर्च में तैयार होने का पूरा समय मिलता है।
अनुदान दे बढ़ावा देना दूर शक्कर बनाने की मंजूरी ही आसान नहीं

सरकार दो से तीन लाख रूपये में लगने वाले छोटे भूरी शक्कर बनाने वाले प्लांट लगाने में आर्थिक सहायता दे इस डाइवर्सिफिकेशन को बढ़ावा दे सकती है। लेकिन नाटकीय किंतु सत्य है कि प्रदेश में गन्ने के रस से गुड़ अथवा शक्कर बनाने के लिए गन्ना आयुक्त से मंजूरी का लाइसेंस लेना ही आसान काम नहीं है। राज्य में चीनी मिलों के लिए गन्ने की खासी कमी है। ऐसे में कुल्हाड़ी से गुड़ बनाने का ज्यादातर कारोबार अवैध की श्रेणी में ही आता है।

Friday, 24 September 2010

last-सिर्फ औपचारिकता और दिखावा

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=46&category=&articleid=87540673344440
शहर के बड़े भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की समुचित व्यवस्था नहीं
हमारा सीवरेज सिस्टम सूखे मौसम के लिए, लेकिन इसमें धकेला जाता है बरसाती पानी : गिल
रेन वाटर हार्वेस्टिंग से बारिश के सीजन के अलावा डेढ़ सौ दिनों तक काम चल सकता है : गिल
भूपेश चट्ठा, पटियाला : शहर में छह मंजिला पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड का मुख्यालय हो या फिर पांच मंजिला कोर्ट कांप्लेक्स, सिटी सेंटर हो या फिर मिनी सचिवालय, छोटी बारांदरी का बेअंत सिंह काम्पलेक्स हो या फिर दूरसंचार भवन, कहीं भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग नहीं होती है। सिर्फ परीक्षण, लोक दिखावे व सरकारी ग्रांट लेने भर से ज्यादा किसी भवन का डिजाइन नहीं है। पंजाब वाटर सप्लाई सीवरेज बोर्ड से सेवानिवृत्त एमडी व चीफ इंजीनियर बीएस गिल पुष्टि कर कहते हैं कि रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग न होने की वजह से सीवरेज सिस्टम पर लोड पड़ता है। सीवरेज अनावश्यक रूप से ब्लाक हो बैक फ्लो करता है। जबकि सीवरेज सूखे मौसम के लिए डिजाइन किए हुए हैं फिर भी हम बारिश का पानी इसमें धकेल देते हैं। आम घरों में भी ऐसा ही किया जा रहा है। जिन लोगों ने चार से आठ इंच के बोर जमीन में कर कुएं तैयार भी किए हैं वे तीन से ज्यादा सीजन चले नहीं। इंजीनियर गिल कहते हैं कि इस मामले में देसी जुगाड़ खासा कामयाब रहा है। घरों में तीन से पांच वर्ग फुट की रेता निकलने तक खोदी गई हौदी के प्रयोग खासे सफल रहे हैं। वहीं शहर में मौसम के आंकड़े बताते हैं कि साल में औसतन 677 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है, इसमें से 79 फीसदी जुलाई से सितंबर के तीन महीनों में है। रेन वाटर हार्वेस्टिंग से बारिश के सीजन के अलावा सौ से डेढ़ सौ दिनों तक काम चलाया जा सके। इतना पानी आ जाता है कि साल के छह से आठ महीने बैक्टीरिया की दृष्टि से सुरक्षित और बिना आर्गेनिक तत्वों के पानी मिले। यह पानी अगर धरती में मौके पर ही चला जाए तो धरती में भूमिगत जल में फ्लोराइड व नाइट्रेट की अतिरिक्त मात्रा कम हो सकती है। टॉयलेट के बाहर, कपड़े धोने, बर्तन साफ करने, कार-स्कूटर धोने से लेकर बगीचे में छिड़कने के लिए ये सबसे उपयुक्त है, इसमें साबुन का उपयोग भी कम करना पड़ता है। याद रहे कि पटियाला के सभी आठ ब्लाक ज्यादा शोषित जोन में आ चुके हैं। फ्लोराइड के अलावा सेलेनिटी भी बढ़ रही है। इसे डायल्यूट कर ही सुधारा जा सकता है।

rain water harvesting-6सबसे आसान प्राकृतिक तरीका

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/article/index.php?page=article&choice=print_article&location=46&category=&articleid=87482173417304
खेत को ढक कर रखने से नहीं होता पानी का वाष्पीकरण
फसल के अवशेषों से पैदा हुए सूक्ष्म जीव जमीन में सुराख कर पानी रिसने के रास्ते खोलते हैं
पटियाला-संगरूर जिलों की सीमा पर छह साल पहले इसे अपनाया तो पानी में नाइट्रेट कम होना शुरू हुआ
भूपेश चट्ठा, पटियाला : रेन वाटर हार्वेस्टिंग, रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग और ग्राउंड वाटर रीचार्ज जैसे शब्द हरित क्रांति के आने के बाद आए, इससे पहले के सालों में अतिरिक्त पानी समस्या हुआ करता था। चाहे वह धरती के ऊपर हो या फिर धरती के नीचे इसी से निपटने के उपाय सोचे जाते थे। कारण था कि पानी को धरती में जाने के असंख्य रास्ते चूहे-सांप से लेकर केंचुए तक ने बना रखे थे। इनके बंद होने से भूमि का जायका बिगड़ गया तो नए रास्ते तलाशे जाने लगे। किसान के अब फिर प्रकृति की ओर मुड़ने के साथ ही हालत बदलने के संकेत आने लगे हैं। पटियाला-संगरूर जिलों की सीमा पर स्थित मांझी गांव में आज से पांच-छह साल पहले जरनैल सिंह ने प्राकृतिक खेती कर साबित किया कि गिरते भूमिगत जल स्तर को ऊपर लाने और इसकी गुणवत्ता संवारने का सबसे आसान तरीका भी प्राकृतिक ही है और यह हीरे की तरह है भी सदा के लिए। इसके साथ कई और लाभ बोनस में भी मिलते हैं। जरनैल सिंह बताते हैं कि खेती एक ऐसा माध्यम है जिससे हम हवा, पानी और मिट्टी तीन तत्वों को दुरूस्त कर सकते हैं, इन्हें प्रदूषण मुक्त भी किया जा सकता है। लेकिन सिर्फ इनके साथ चल कर, इनसे कुश्ती लड़कर हराया नहीं जा सकता। वे कहते हैं कि यूनिवर्सिटियों ने किसान को धान की खेती पडलिंग अथवा कद्दू करके करना सिखाया और किसानों ने इसे अपना भी लिया, लेकिन पानी का प्रयोग बहुत ज्यादा होने के साथ साथ इसने जमीन को बहुत कड़ा भी कर दिया। धरातल सख्त होने से धरती में पानी रिस कर जाना बंद हो गया। खेतों में फसल के अवशेष जलाने से वाष्पीकरण बढ़ गया। हमने पानी ऊपर जाने के रास्ते तो खोल दिए और भूमि में पानी भेजने के रास्ते बंद करते चले गए।
जमीन को ढककर रखें प्राकृतिक तरीके से खेती करने वाले माझी गांव के जरनैल सिंह बताते हैं कि जमीन को नंगा ना छोड़ कर इसे ढक कर रखा जाए। इसके लिए मल्चिंग विधि को अपनाया जा सकता है। एक फसल लेने के बाद बची घास-फूस, रहंद या कचरे को खेत में आग ना लगा कर इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए। खेतों में पड़ी पराली से न्यूट्रिएंट्स खाद माइक्रो आर्गेनिज्म के लिए खुराक का काम करेगी। खेत ढका होने के चलते पानी का वाष्पीकरण नहीं होगा, तो धरती में नमी बनी रहेगी। जहां फसल को चार पानी लगने हैं वहां दो की ही जरूरत पड़ेगी। खेत में सूक्ष्म जीवाणुओं से जीवों का सिलसिला शुरू होगा, ये जीव जमीन में सुराख कर देते हैं, इससे पानी का रिसाव नीचे की ओर तेज हो जाता है। धरती नरम रहती है तो आया अतिरिक्त पानी इसकी कोख में समाता रहता है। अब दिखने लगा है असर जरनैल सिंह कहते हैं कि उन्होंने पांच-छह साल पहले इस तरीके को अपनाया था। खेती पर खर्च कम हो सिर्फ मेहनत रह गई, मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। भूमिगत जलस्तर पर हुए प्रभावों पर वे कहते हैं कि भवानीगढ़ ब्लाक में उनके गांव के चार-पांच पढ़े लिखे लड़के अब इसी तरह से खेती करने लगे हैं। 15 एकड़ खुद की जमीन के साथ करीब सौ एकड़ में ऐसे ही खेती होने लगी है। हजारों एकड़ में गिरते जल स्तर को थामने में समय लगेगा, लेकिन हाल ही में चेन्नई के एक एनजीओ ने पानी के नमूने लिए हैं। पांच-सात साल पहले जहां जमीन में बढ़े नाइट्रेट से वे परेशान थे वो अब कम हो गया है। साफ है कि असर तो हुआ है। नाइट्रेट का डाइल्यूट होना प्रदूषण मुक्ति का सुखद संकेत

rain water harvesting-5पटियाला को पानी से नहीं पानी की पड़ेगी मार

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शहर को चाहिए 95 कुएं और हर घर का योगदान
भूपेश चट्ठा, पटियाला : थोड़ी सी बारिश चाहे जिस मौसम में हो जाए शहर में दो दर्जन से ज्यादा ऐसे स्थान हैं जहां पानी ही पानी होता है और अगले दिन मीडिया में नगर निगम की पोल खुलने से लेकर, नालों की साफ सफाई के दावों की नकारात्मक हेड लाइनें स्थानीय प्रशासन को मुंह चिढ़ा रही होती हैं, तो मेयर साहब रिक्शा पर चढ़ ऐसे क्षेत्रों का दौरा कर तस्वीरें भी खिंचवा रहे होते हैं सिलसिला नगर निगम बनने के पहले से चला आ रहा है। सिस्टम को दुरुस्त करने के एक दो प्रयास हुए, पर रखरखाव की कमी ने सब बराबर कर दिया। गौरतलब है कि शहर को सुनियोजित ढंग से पानी की मार से बचाने और एक गरीब के हैंडपंप में पानी साल भर बनाए रखने के लिए शहर को चाहिए 95 ग्राउंड वाटर रिचार्ज कुएं और हर घर से योगदान ऐसा होता है तो किसी को टुल्लू पंप से न तो चोरी छिपे पानी लेना पड़ेगा और न ही मंहगे सबमर्सिबल पंपों पर पैसा और बिजली फूंकनी पड़ेगी। ससटेनेबल अर्बन वाटर रिर्सोस मैनेजमेंट पॉलिसी पटियाला के नाम से आईआईटी रुड़की के आर्किटेक्ट एंड प्लानिंग विभाग के तीन वैज्ञानिकों रिसर्च स्कॉलर टीएस बराड़, एसोसिएट प्रोफेसर आरके जैन, यहीं के ही डब्लूआरडीएम विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डी. खारे के शोध में विस्तृत रूप से दर्शाया गया है कि पंजाब के साढ़े तीन लाख की आबादी के चौथे बड़े शहर में रोजाना 206.03 एमएलडी पानी की मांग है और 35 फीसदी विकास दर को देखते हुए यह 400 एमएलडी का आंकड़ा पार कर जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1980 में 3.3 मीटर पर रहा भूजल 2004 में 24.9 मीटर तक गिर चुका है। शहर में सौ नलकूप सुबह शाम पानी खींच रहे हैं, यही पानी का एकमात्र साधन भी है। पानी पर खर्च हर साल 20 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। 90 सेमी की गति से जल स्तर हर साल नीचे को गिरता भी जा रहा है। शहर से 131.31 एमएलडी दूषित पानी बिना ट्रीटमेंट के बहता जा रहा है इसके 2021 तक 317 एमएलडी के पार होने की पूरी उम्मीद है। औसतन आठ सौ मिली मीटर सालाना की बारिश भी इसी खाते चढ़ रही है। शहर में चार मीटर डाया और छह मीटर गहराई के रिचार्ज कुएं खोद उनमें 300 मीटर की शाफ्ट लगा इनकी संख्या कॉमर्शियल क्षेत्रों में दस, सार्वजनिक क्षेत्रों में 30, स्र्कुलेशन में 50 और रीक्रिएशनल में पांच रखी गई है, इसके अलावा हर घर से योगदान के रूप में 300 मीटर की एक शाफ्ट पानी को जमीन में धकेलने लगानी होगी अन्यथा पटियाला को पानी से नहीं, पानी की पड़ेगी मार यह तय है। शोध पत्र शहर के सीवरेज सिस्टम को भी केंद्रीयकृत न रख कर इसे विकेंद्रीयकरण की ओर ले जाने की सलाह देता है। गैर परंपरागत तकनीकों का प्रयोग कर रेन वाटर हार्वेस्टिंग, ग्राउंड वाटर रिचार्ज सिस्टम, डीसंेंट्रेलाइजड वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट और री साइकलिंग ऑफ

rain water harveting-4मानसून की बेरुखी को दिखा दिया ठेंगा

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बड़ी नदी, मीरांपुर चो के पानी का हुआ पुन: उपयोग

भूपेश चट्ठा, पटियाला : कृत्रिम रूप से बरसाती पानी को धरती के नीचे भेज कर भूमिगत जल के स्तर को सुधारे जाने अथवा बरसात के मौसम के अलावा साल भर में कभी कभार आने वाली बारिश के पानी का पूरी तरह से दोहन करने के लिए यदि प्रदेश में एक दर्जन पायलेट प्रोजेक्ट बने और चालू हुए हैं तो इनमें से दो पर पटियाला जिले का नाम लिखा है। जिले में घग्गर की सहायक नदियों पटियाला की राव अथवा बड़ी नदी और मीरांपुर चो में पानी के बहाव को कृत्रिम तरीके से थाम कर एक तरह से बहुत छोटे चेक डैम बना कर पानी को न केवल धरती के नीचे उस वक्त के लिए भेजा गया जब बादल आसपास भी नहीं होते अपितु मानसून के रूठने पर धान के सीजन में जरूरत पड़ने पर एक-आध पानी लग जाए इसका उपाय भी किया गया है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के खातों में दर्ज सफल प्रोजेक्टों में पटियाला ब्लॉक में बड़ी नदी में बहते पानी का प्रयोग धरती के पानी को रिचार्ज करने में किया गया है। इस प्रोजेक्ट की अवधारणा के अनुसार प्रदेश में 70 के दशक में जमीन के ऊपर व भीतर पानी रुकने की समस्या से निपटने के लिए बड़ी संख्या में ड्रेनों का निर्माण किया गया लेकिन समय के साथ भूजल के स्तर में आई गिरावट ने इन बनी बनाई ड्रेनों की उपयोगिता खत्म कर दी जिस काम के लिए ये बनी थी वह नजदीक भी न रहा। परिणाम हुआ कि प्राकृतिक रूप से धरती में होने वाला रिचार्ज बंद हो गया। इसे पुन: प्रयोग में लाने और भूमि को रिचार्ज करने के लिए एक मात्र उपाय बचा था कि इनमें बहते पानी को नियंत्रित कर जमीन में एक स्थान पर भेजा जाए। बड़ी नदी में एक लंबी ट्रेंच के साथ 20 छोटी ट्रेंचें बनाई गई, लंबी ट्रेंच में दस छोटे कुएं और प्रत्येक छोटी ट्रेंच में एक रिचार्ज कुआं बनाया गया। इन ट्रेंचों में किसी तरह की खरपतवार न हो, घास न उग आए या फिर किसी तरह से सिल्ट न जमा हो, इसका ख्याल रिचार्ज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किया गया। किसानों में रिचार्ज के प्रति जागरुकता लाने के लिए किया गया यह प्रयास सफल रहा। इस दौरान एक और बात सामने आई कि भूजल स्तर ऊपर उठने के साथ, क्षेत्र में फैलने वाले बाढ़ के पानी में भी तुलनात्मक रूप से कमी दिखी। आंकड़े गवाह बने कि पहली व दूसरी स्लाइस के 20 रिचार्ज कुओं में 10.5 आईपीएस प्रति कुआं की रिचार्ज दर आंकी गई तो ट्रेंच के तीसरे स्लाइस में पांच रिचार्ज कुओं में 8.96 आईपीएस प्रति रंिनंग मीटर मापा गया। दिलचस्प है कि पंजाब-हरियाणा सीमा पर हुए इन सफल प्रयोगों के बाद उत्साहित किसानों ने जहां तहां पानी को रोक कर अपने जुगाड़ बना लिए। बिना बिजली अथवा कम बिजली फूंके गर्मियों के उन दिनों में जब मानसून दगा दे रहा होता है, तो ये जुगाड़ वरदान साबित होते हैं, लेकिन इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए। धर्मेड़ी गांव के गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि तीन साल पहले घग्गर के पुलों के निकट ऐसा ही पानी धान को लगाए जाने पर सारी फसल काली पड़ गई फिर पता चला कि जब तक नदी का गंदा पानी एक दो तेज बारिशों के साथ निकल न जाए तब तक सिंचाई के काम में सीधा न लिया जाए।

rain water harvesting-3नक्शे से बाहर निकलते ही बेसमेंट, गोदाम और पार्किंग तक बन जाते हैं वाटर टैंक

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दो सौ गज से ऊपर मकान बनाना नहीं होगा आसान
नगर निगम के जनरल हाउस की अगली बैठक में 200 गज के हर निर्माण में लगाना होगा रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम : कमिश्नर
भूपेश चट्ठा, पटियाला प्रदेश में इस समय सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की है तो इन्हीं की चलेगी, कांग्रेस की थी तो कांग्रेसियों की चलती थी इसमें कोई दो राय नहीं है, पर राजनीति से ऊपर रह अर्थव्यवस्था हर शासन में चलती रहती है। शायद यही वजह है कि राष्ट्रपिता की तस्वीर वाले नोट को देखकर हर कोई राजनीति से ऊपर उठकर विकास व आर्थिकता की बात करता है। कुछ ऐसे ही तौर तरीके अपना कर रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के होने वाले आवश्यक उपायों को धत्ता बताया जा रहा है। सारे नियम कानून सिर्फ किताबों तक सिमटाते जाते रहे हैं। पटियाला शहर में अब तक जो हो गया सो हो गया पर अब एक प्रयास और होने जा रहा है, जो कम से कम कानूनी रूप से यह कहलवा देगा कि उत्तर भारत के सबसे कम प्रदूषण वाले शहरों में रहा यह शहर इस दिशा में भी काम करने लगा है। नगर निगम के कमिश्नर मंजीत सिंह नारंग ने बुधवार को इस बारे में पूछे जाने पर बताया कि रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग को वे निगम के जरनल हाउस की अगली बैठक में कानूनी रूप से अनिवार्य करने जा रहे हैं। हर 200 गज के ऊपर के भवन निर्माण में इसकी व्यवस्था करनी होगी। नारंग कहते हैं कि अभी तक उनके पास कॉमर्शियल भवनों के नक्शे पास करवाने वाले तो रेन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रबंध कर आते हैं, लेकिन रिहायशी परिसरों के लिए लोगों में दिलचस्पी न के बराबर ही है। कानून भी पांच सौ गज से ऊपर जोर नहीं देता है। माना जा सकता है कि पर्यावरण संरक्षण की जरूरतों को देख कर कोई भी पार्षद इस पर ऐतराज न करे और 200 गज तक के मकानों को इसकी सीमा में लाए जाने का प्रस्ताव ध्वनि मत से ही पास हो जाए। एक बार नक्शा पास करवाने के बाद रेन वाटर टैंक के नक्शे से निकल कर बेसमेंट, गोदाम, पार्किंग और कभी कभी बैंकुएट हाल का हिस्सा बन जाने के सवाल पर कमिश्नर कहते हैं कि लोगों की मानसिकता बदलने में खासी परेशानी आ रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि इन चीजों का सबसे पहले व सीधा लाभ तो उसी व्यक्ति को है जिसने इन्हें बनवाया हो, पर अक्सर देखा गया है कि संबधित व्यक्ति ही नहीं समझ रहा होता। इसके लिए भी प्रयास होगा कि जागरूकता अभियान चलाया जाए। गौरतलब है कि प्रदेश में लुधियाना व जालंधर नगर निगमों की ओर से रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किए जाने के बाद पंजाब अर्बन डेवलपमेंट एंड प्लानिंग अथारिटी (पूडा) भी अपने 1996 के भवन नियमों में बदलाव करने जा रही है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर कमिशन की ओर जारी हिदायतों के बाद से पटियाला व लुधियाना शहरों में किसी तरह के गहरे नलकूप नहीं खोदने की सिफारिश पांच साल पहले दी गई थी, पर यह सिलसिला दोनों जगह जारी है। पटियाला में अब नहरी पानी लाने की योजना आगे बढ़ने लगी है।