Sunday, 14 November 2010

अब जिलों में पहुंची पानी की लड़ाई

भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिमाचल प्रदेश वर्सेज पंजाब, पंजाब वर्सेज हरियाणा, पंजाब वर्सेज राजस्थान अथवा हरियाणा वर्सेज दिल्ली.. ये किसी खेल प्रतियोगिता के लिए होने वाले मैच नहीं हैं अलबत्ता गर्मियों के दिनों में पानी के लिए इन राज्यों के बीच होने वाली अधिकारों की लड़ाई है। अब यह एक पायदान नीचे गिर कर एक ही राज्य की सरकार के अधीन शुरू होने जा रही है और इसका बिगुल पटियाला जिले से बज गया है। यहां के डिप्टी कमिश्नर ने जिले के किसानों के लिए अधिक पानी की मांग कर डाली है।
डिप्टी कमिश्नर दीप इंदर सिंह ने सिंचाई विभाग के सचिव को पत्र लिख कर मांग की है कि वर्तमान समय में मिल रहा पानी काफी नहीं है, इससे जिले की सिंचाई जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में अधिक पानी दिया जाए। उन्होंने मांग की है कि वर्तमान कोटे को बढ़ा कर कम से कम दोगुना किया जाए। हाल ही में जिला स्तर पर हुई किसानों व अधिकारियों की बैठक में किसानों की ओर से पानी कम मिलने व सिंचाई जरूरतें पूरा ना होने के उठाए गए मुद्दे के बाद जिला प्रशासन ने अपनी बात राज्य सरकार के पास रखी गई है। आंकड़ों के हवाले से तर्क दिया गया है कि पटियाला जिले को राज्य में सबसे कम पानी अलाट किया गया है, इसे समय की जरूरत अनुसार बढ़ाया नहीं जा सकता तो कम से कम अन्य जिलों के बराबर जरूर किया जाए।
अधिकारी बताते हैं कि जिले के 5.72 लाख एकड़ क्षेत्र में सिंचाई के लिए 8.5 क्यूसिक पानी दिया जा रहा है, जबकि इसे दोगुना किया जाना चाहिए। यही राज्य के अन्य जिलों की धरती व पानी का औसत है। याद रहे कि पटियाला जिले में बीते समय में मक्की की पैदावार खासी हुआ करती थी, इसके अलावा यहां गन्ने के अधीन भी रकबा बहुत ज्यादा था, लेकिन अब यह तबदील हो कर धान और सिर्फ धान में बदलता गया। जिले में कई क्षेत्रों में जल भराव की समस्या इस कदर हावी थी की चार दशक पहले दलदल खत्म करने को सफेदा अथवा यूकेलिप्टस लगाए गए। नहरों के किनारे मजबूत करने को कीकर बहुतायात में लगे पर आज कुल आठ जोन में से चार समाना, पातड़ां, नाभा और पटियाला डार्क जोन में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में पहले अलाट किया गया पानी का कोटा अब पुराने हिसाब से ठीक तो हो सकता है पर मौजूदा स्थिति में नहीं।
बाढ़ व सूखे दोनों की ही मार झेलने वाले सतलुज-यमुना लिंक नहर और हरियाणा की ओर जाने वाली भाखड़ा मेन लाइन के साथ लगते लाछड़ू, सराला कलां, खुर्द, कपूरी जैसे कई गांव हैं जहां पानी 12 सौ फुट से खोद कर निकाला जा रहा है पर साथ लगती नहर के पानी को नहीं छेड़ सकते। बीएमएल के अलावा भाखड़ा की ही नरवाना ब्रांच, सप्लाई लाइन, सरहिंद नहर और घग्गर फीडर जैसी नहरों के अलावा सीजनल नदियों में घग्गर, मारकंडा, टांगरी, पटियाला की राव, मिआंपुर चौ ऐसे बरसाती नाले हैं जो मानसून में मार तो करते हैं पर सिंचाई में नाममात्र ही योगदान करते हैं।
दिलचस्प है कि किसानों के पास नहरी पानी के बिल तो आते हैं पर पानी नहीं आता। कौरजीवाला गांव के पास डेयरी चला रहे परविंदर सिंह कहते हैं कि उन्हें नहरी पानी अलाट है सुआ भी सामने से गुजर रहा है पर पानी देखे हुए जमाना गुजर गया।

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