पंजाब में बड़े किसानों की संख्या सात हजार से ज्यादा नहीं जिनके पास आधी से ज्यादा कृषि भूमि है
छोटे किसानों के पास टयूबवेल कनेक्शन नाममात्र
भूपेश चट्ठा, पटियाला पंजाब में मुफ्त बिजली-पानी के नाम पर लड़े जाने वाले राजनीतिक युद्ध की असलियत यह है कि इसका लाभ गरीब किसान को नहीं बल्कि अमीर किसानों को ही मिल रहा है। कृषि विभाग द्वारा हाल में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक जिन गरीब किसानों को मुफ्त बिजली दी जा रही है, उनमें से तीन चौथाई तो बिल्कुल गरीब नहीं हैं। जो शेष बचे भी हैं, वे आने वाले दिनों में किसान नहीं रहने वाले क्योंकि उनके खेत लगातार छोटे होते जा रहे हैं।
राज्य की कृषि योग्य एक करोड़ एकड़ भूमि में आधे से ज्यादा हिस्सा बड़े व मध्यम किसानों के पास है जो बोनस के रूप में सब्सिडी का आनंद ले रहे हैं। कुल भूमि का एक चौथाई हिस्सा सिर्फ 71 हजार परिवारों में बंटा है, जिनके पास 25 एकड़ से बड़ा खेत है। 28 फीसदी हिस्सा दस से 25 एकड़ के खेतों में है और ऐसे किसानों की संख्या दो लाख 96 हजार है।
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लि की ओर से जारी सवा 12 लाख में से 70 फीसदी टयूबवेल कनेक्शन बड़े किसानों के पास ही हैं। मुफ्त बिजली का लाभ उठाने वालों में से पांच एकड़ से कम वाले किसानों के पास से अपने टयूबवेल कनेक्शन का अधिकार ही एकबारगी छीन लेने वाली सरकारी नीति ने पावरकॉम को भी लगभग दिवालिया कर रखा है। सरकार की ओर से दी जाने वाली तीन हजार करोड़ की सब्सिडी कागजों में इधर से उधर हो रही है और पावरकॉम को खर्च चलाने के लिए लोन लेने पड़ रहे है। पावरकॉम का कर्ज 17 हजार करोड़ के पार हो गया और तीन सालों में सरकार ने अपना बकाया एडजस्ट कर लिया है।
हालांकि कुछ बड़े किसान कृषि क्षेत्र में बिजली बिल देने को भी तैयार हैं पर पूरी बिजली लेने की शर्त पर। फाइव एलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि प्रदेश में बड़े फार्मो की संख्या बढ़ रही है तो छोटे किसान खेत मजदूरों अथवा मिस्ति्रयों में तबदील हो रहे है, ऐसे में कृषि क्षेत्र को दिखावे की नहीं, गंभीर प्रयासों की जरूरत है। जो व्यक्ति बिल दे सकता है उस पर बिल जरूर लगाया जाए लेकिन इंडस्ट्री के समान बिजली भी दी जाए ताकि फसल बचाने महीने में किसान को मंहगा डीजल ना जलाना पड़े
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