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Tuesday, 5 July 2011

पावरकॉम को नहीं हुआ सब्सिडी का भुगतान, याचिका दायर, pawercom, pserc, subsidy,

मामला
 पूर्व इंजीनियर ने पीएसईआरसी के पास दायर की याचिका
 या तो सब्सिडी एडवांस में दी जाए या पूरा शुल्क लगे : याचिकाकर्ता

उप मुख्य संवाददाता, पटियाला : कृषि क्षेत्र, अनुसूचित जाति और घरेलू क्षेत्र के कुछ अन्य वर्गो को मुफ्त बिजली देने के बदले में पंजाब सरकार की ओर से पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड को हर महीने एडवांस में दी जाने वाली सब्सिडी का भुगतान न किए जाने पर पंजाब स्टेट इलेक्टि्रसिटी रेगुलेटरी कमिशन के पास सरकार के खिलाफ याचिका दायर की गई है।
 बिजली निगम के ही एक पूर्व सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर इंजी. गुरनेक सिंह बराड़ ने पीएसईआरसी के पास याचिका दायर कर मांग की है कि या तो सरकार सब्सिडी की राशि एडवांस में पावरकॉम को दे अन्यथा उपभोक्ताओं से पूरा शुल्क वसूलने के लिए आदेश जारी करे। चालू वित्त वर्ष के लिए इसी साल नौ मई को जारी किए गए शुल्क आदेश में कृषि व विभिन्न प्रकार के घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 4188.92 करोड़ रुपये की सालाना सब्सिडी बनती है, जिसे कि अग्रिम मासिक किस्तों में दिया जाना है। इसी स्थिति में सरकार मुफ्त में बिजली दे सकती है। दिलचस्प है कि इसके विपरीत राज्य सरकार 24 मई को एक अन्य आदेश जारी कर 981.93 करोड़ रुपये पिछले बकाये के रूप में एडजस्ट कर चुकी है। इंजी. गुरनेक सिंह ने पीएसईआरसी के आदेशों का हवाला देकर अपनी याचिका में कहा है कि हर महीने सरकार की ओर से 349.08 करोड़ रुपये एडवांस सब्सिडी के रूप में दिए जाने होते हैं। इस साल अप्रैल व मई माह में पावरकॉम को मात्र 380 करोड़ रुपये ही मिले हैं। 190 करोड़ प्रतिमाह सिर्फ दो महीने तक देने के बाद जून में एक पैसा भी जारी नहीं किया गया है। बिजली अधिनियम 2003 की धारा 65 के अनुसार यदि एडवांस में सरकार सब्सिडी की राशि नहीं देती है तो पीएसईआरसी सब्सिडी वापस लेने और पूरा शुल्क लगाने के आदेश जारी कर सकता है। 13 सितंबर 2007 के एक आदेश में पीएसईआरसी ने कहा है कि सब्सिडी का अग्रिम भुगतान कानूनन जरूरी है, जबकि लोन के खिलाफ सब्सिडी एडजस्ट करने की बात कहीं नहीं आती है। केंद्र सरकार की एक योजना के अनुसार पीएसईबी के केंद्रीय कंपनियों पर पड़े बकाये के लिए लंबे समय के बांड जारी करने को अधिकृत किया गया था और ये राशियां एक अक्टूबर 2001 से पहले की हैं। अब त्रिपक्षीय समझौते के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता।

Saturday, 2 July 2011

सस्ती सब्जियों के लिए किसानों को सब्सिडी, plan, vegitables, diversification, farmer, subsidy,


पहल :

 केंद्र की योजना में लुधियाना, जालंधर, पटियाला व फतेहगढ़ शामिल
भूपेश चट्ठा, पटियाला
गांव के खेतों की मिट्टी में बिखरने और शहर में मुर्गे से महंगी बिकने वाली मूंगी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आ ही चुकी है। अब बड़े शहरों में सब्जियां आउट ऑफ सीजन में भी सस्ती करने के लिए किसानों को केंद्र सरकार की योजना के तहत भारी-भरकम सब्सिडी दी जाएगी। केंद्र की राष्ट्रीय बागवानी के तहत शुरू होने वाली इस योजना को उन जिलों में लागू किया जा रहा है, जिसका मुख्यालय या तो घनी आबादी वाला बड़ा शहर है या फिर राज्य की राजधानी के निकट है। दैनिक जागरण से बात करते हुए बागवानी विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डॉ. रणधीर सिंह ने बताया कि अक्सर देखा जाता है कि साल के कुछ विशेष महीनों में सब्जी की किल्लत हो जाती है। शहरों में इसके दाम तो अब दो अंकों से निकल कर तीन में भी जाने लगे हैं, जबकि कुछ महीने ऐसे होते हैं, जब किसान को सब्जी के उचित दाम नहीं मिलते। मांग-सप्लाई के अंतर को पाटने और ट्रांसपोर्ट खर्च कम करने के साथ ही ताजा सब्जी को उपभोक्ता तक साल भर उचित मूल्य में पहुंचाने के लिए ही यह योजना बनाई गई है। योजना के तहत पंजाब के चार अर्बन जिले पटियाला, लुधियाना, जालंधर और फतेहगढ़ साहिब को चुना गया है। डॉ. रणधीर सिंह बताते हैं कि योजना में हर किसान समूह को दो लाख रुपये की सब्सिडी दी जाएगी। 10 से 15 किसानों के एक समूह के पास कम से कम 50 हेक्टेयर जमीन होनी चाहिए। ये किसान सोसायटी बना कर विभाग के पास आ सकते हैं। इसके अलावा सब्जियों की मार्केटिंग बेहतर ढ़ंग से हो सके, इसके लिए भी प्रबंध किए जा रहे हैं। एक बार में मिलने वाली उक्त सब्सिडी के अलावा सब्जियों की प्लांटिंग करने वाले उपकरणों और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए भी 50 फीसदी सब्सिडी दिए जाने की योजना है।

Friday, 26 November 2010

ਸਮਰਥ ਨੂੰ ਹੀ ਸਹੂਲਤ

ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਵੱਡੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਸੱਤ ਹਜਾਰ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਨਹੀਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਅੱਧੀ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਭੂਮੀ ਹੈ
ਛੋਟੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਟਿਊਬਵੇਲ ਕਨੇਕਸ਼ਨ ਨਾਮਮਾਤਰ
ਭੂਪੇਸ਼ ਚੱਠਾ , ਪਟਿਆਲਾ
ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ਮੁਫਤ ਬਿਜਲੀ - ਪਾਣੀ ਦੇ ਨਾਮ ਉੱਤੇ ਲੜੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਲੜਾਈ ਦੀ ਅਸਲੀਅਤ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਇਸਦਾ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਗਰੀਬ ਕਿਸਾਨ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਸਗੋਂ ਅਮੀਰ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਹੀ ਮਿਲ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਵਿਭਾਗ ਦੁਆਰਾ ਹਾਲ ਵਿੱਚ ਕੀਤੇ ਗਏ ਸਰਵੇਖਣ ਦੇ ਮੁਤਾਬਕ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਗਰੀਬ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਮੁਫਤ ਬਿਜਲੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ , ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚੋਂ ਤਿੰਨ ਚੌਥਾਈ ਤਾਂ ਬਿਲਕੁੱਲ ਗਰੀਬ ਨਹੀਂ ਹਨ । ਜੋ ਬਾਕੀ ਬਚੇ ਵੀ ਹਨ , ਉਹ ਆਉਣ ਵਾਲੇ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ ਕਿਸਾਨ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਕਿਉਂਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਖੇਤ ਲਗਾਤਾਰ ਛੋਟੇ ਹੁੰਦੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹੈ ।
ਰਾਜ ਦੀ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਲਾਇਕ ਇੱਕ ਕਰੋਡ਼ ਏਕਡ਼ ਭੂਮੀ ਵਿੱਚ ਅੱਧੇ ਤੋਂ ਜ਼ਿਆਦਾ ਹਿੱਸਾ ਵੱਡੇ ਅਤੇ ਮੱਧ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਹੈ ਜੋ ਬੋਨਸ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸਬਸਿਡੀ ਦਾ ਆਨੰਦ ਲੈ ਰਹੇ ਹਨ । ਕੁਲ ਭੂਮੀ ਦਾ ਇੱਕ ਚੌਥਾਈ ਹਿੱਸਾ ਸਿਰਫ 71 ਹਜਾਰ ਪਰਵਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਬੰਟਾ ਹੈ , ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੋਲ 25 ਏਕਡ਼ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਖੇਤ ਹੈ । 28 ਫੀਸਦੀ ਹਿੱਸਾ ਦਸ ਤੋਂ 25 ਏਕਡ਼ ਦੇ ਖੇਤਾਂ ਵਿੱਚ ਹੈ ਅਤੇ ਅਜਿਹੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਦੋ ਲੱਖ 96 ਹਜਾਰ ਹੈ ।
ਪੰਜਾਬ ਸਟੇਟ ਪਾਵਰ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਲਿ ਵਲੋਂ ਜਾਰੀ ਸਵਾ 12 ਲੱਖ ਵਿੱਚੋਂ 70 ਫੀਸਦੀ ਟਿਊਬਵੇਲ ਕਨੇਕਸ਼ਨ ਵੱਡੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਹੀ ਹਨ । ਮੁਫਤ ਬਿਜਲੀ ਦਾ ਮੁਨਾਫ਼ਾ ਚੁੱਕਣ ਵਾਲੀਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਪੰਜ ਏਕਡ਼ ਤੋਂ ਘੱਟ ਵਾਲੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਕੋਲ ਤੋਂ ਆਪਣੇ ਟਿਊਬਵੇਲ ਕਨੇਕਸ਼ਨ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਹੀ ਏਕਬਾਰਗੀ ਖੌਹ ਲੈਣ ਵਾਲੀ ਸਰਕਾਰੀ ਨੀਤੀ ਨੇ ਪਾਵਰਕਾਮ ਨੂੰ ਵੀ ਲੱਗਭੱਗ ਦਿਵਾਲਿਆ ਕਰ ਰੱਖਿਆ ਹੈ । ਸਰਕਾਰ ਵਲੋਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾਣ ਵਾਲੀ ਤਿੰਨ ਹਜਾਰ ਕਰੋਡ਼ ਦੀ ਸਬਸਿਡੀ ਕਾਗਜਾਂ ਵਿੱਚ ਏਧਰ ਨਾਲ ਉੱਧਰ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ ਅਤੇ ਪਾਵਰਕਾਮ ਨੂੰ ਖਰਚ ਚਲਾਣ ਲਈ ਲੂਣ,ਸੁੰਦਰਤਾ ਲੈਣ ਪੈ ਰਹੇ ਹੈ । ਪਾਵਰਕਾਮ ਦਾ ਕਰਜ 17 ਹਜਾਰ ਕਰੋਡ਼ ਦੇ ਪਾਰ ਹੋ ਗਿਆ ਅਤੇ ਤਿੰਨ ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਆਪਣਾ ਬਾਕੀ ਏਡਜਸਟ ਕਰ ਲਿਆ ਹੈ ।
ਹਾਲਾਂਕਿ ਕੁੱਝ ਵੱਡੇ ਕਿਸਾਨ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਬਿਜਲੀ ਬਿਲ ਦੇਣ ਨੂੰ ਵੀ ਤਿਆਰ ਹਨ ਉੱਤੇ ਪੂਰੀ ਬਿਜਲੀ ਲੈਣ ਦੀ ਸ਼ਰਤ ਉੱਤੇ । ਫਾਇਵ ਏਲੀਮੇਂਟ ਹੈਲਥ ਐਂਡ ਏਜੁਕੇਸ਼ਨਲ ਸੋਸਾਇਟੀ ਦੇ ਡੇ . ਜੋਗਿੰਦਰ ਟਾਈਗਰ ਕਹਿੰਦੇ ਹੈ ਕਿ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਵਿੱਚ ਵੱਡੇ ਫਾਰਮਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ ਵੱਧ ਰਹੀ ਹੈ ਤਾਂ ਛੋਟੇ ਕਿਸਾਨ ਖੇਤ ਮਜਦੂਰਾਂ ਅਤੇ ਮਿਸਤਰੀਆਂ ਵਿੱਚ ਤਬਦੀਲ ਹੋ ਰਹੇ ਹੈ , ਅਜਿਹੇ ਵਿੱਚ ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਖੇਤਰ ਨੂੰ ਦਿਖਾਵੇ ਦੀਆਂ ਨਹੀਂ , ਗੰਭੀਰ ਕੋਸ਼ਸ਼ਾਂ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ । ਜੋ ਵਿਅਕਤੀ ਬਿਲ ਦੇ ਸਕਦੇ ਹੈ ਉਸ ਉੱਤੇ ਬਿਲ ਜਰੂਰ ਲਗਾਇਆ ਜਾਵੇ ਲੇਕਿਨ ਇੰਡਸਟਰੀ ਦੇ ਸਮਾਨ ਬਿਜਲੀ ਵੀ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ ਤਾਂਕਿ ਫਸਲ ਬਚਾਉਣ ਮਹੀਨੇ ਵਿੱਚ ਕਿਸਾਨ ਨੂੰ ਮੰਹਗਾ ਡੀਜਲ ਨਾ ਜਲਾਨਾ ਪਏ...

समर्थ को ही सुविधा

पंजाब में बड़े किसानों की संख्या सात हजार से ज्यादा नहीं जिनके पास आधी से ज्यादा कृषि भूमि है
छोटे किसानों के पास टयूबवेल कनेक्शन नाममात्र
भूपेश चट्ठा, पटियाला पंजाब में मुफ्त बिजली-पानी के नाम पर लड़े जाने वाले राजनीतिक युद्ध की असलियत यह है कि इसका लाभ गरीब किसान को नहीं बल्कि अमीर किसानों को ही मिल रहा है। कृषि विभाग द्वारा हाल में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक जिन गरीब किसानों को मुफ्त बिजली दी जा रही है, उनमें से तीन चौथाई तो बिल्कुल गरीब नहीं हैं। जो शेष बचे भी हैं, वे आने वाले दिनों में किसान नहीं रहने वाले क्योंकि उनके खेत लगातार छोटे होते जा रहे हैं।
राज्य की कृषि योग्य एक करोड़ एकड़ भूमि में आधे से ज्यादा हिस्सा बड़े व मध्यम किसानों के पास है जो बोनस के रूप में सब्सिडी का आनंद ले रहे हैं। कुल भूमि का एक चौथाई हिस्सा सिर्फ 71 हजार परिवारों में बंटा है, जिनके पास 25 एकड़ से बड़ा खेत है। 28 फीसदी हिस्सा दस से 25 एकड़ के खेतों में है और ऐसे किसानों की संख्या दो लाख 96 हजार है।
पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लि की ओर से जारी सवा 12 लाख में से 70 फीसदी टयूबवेल कनेक्शन बड़े किसानों के पास ही हैं। मुफ्त बिजली का लाभ उठाने वालों में से पांच एकड़ से कम वाले किसानों के पास से अपने टयूबवेल कनेक्शन का अधिकार ही एकबारगी छीन लेने वाली सरकारी नीति ने पावरकॉम को भी लगभग दिवालिया कर रखा है। सरकार की ओर से दी जाने वाली तीन हजार करोड़ की सब्सिडी कागजों में इधर से उधर हो रही है और पावरकॉम को खर्च चलाने के लिए लोन लेने पड़ रहे है। पावरकॉम का कर्ज 17 हजार करोड़ के पार हो गया और तीन सालों में सरकार ने अपना बकाया एडजस्ट कर लिया है।
हालांकि कुछ बड़े किसान कृषि क्षेत्र में बिजली बिल देने को भी तैयार हैं पर पूरी बिजली लेने की शर्त पर। फाइव एलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि प्रदेश में बड़े फार्मो की संख्या बढ़ रही है तो छोटे किसान खेत मजदूरों अथवा मिस्ति्रयों में तबदील हो रहे है, ऐसे में कृषि क्षेत्र को दिखावे की नहीं, गंभीर प्रयासों की जरूरत है। जो व्यक्ति बिल दे सकता है उस पर बिल जरूर लगाया जाए लेकिन इंडस्ट्री के समान बिजली भी दी जाए ताकि फसल बचाने महीने में किसान को मंहगा डीजल ना जलाना पड़े