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बड़ी नदी, मीरांपुर चो के पानी का हुआ पुन: उपयोग
भूपेश चट्ठा, पटियाला : कृत्रिम रूप से बरसाती पानी को धरती के नीचे भेज कर भूमिगत जल के स्तर को सुधारे जाने अथवा बरसात के मौसम के अलावा साल भर में कभी कभार आने वाली बारिश के पानी का पूरी तरह से दोहन करने के लिए यदि प्रदेश में एक दर्जन पायलेट प्रोजेक्ट बने और चालू हुए हैं तो इनमें से दो पर पटियाला जिले का नाम लिखा है। जिले में घग्गर की सहायक नदियों पटियाला की राव अथवा बड़ी नदी और मीरांपुर चो में पानी के बहाव को कृत्रिम तरीके से थाम कर एक तरह से बहुत छोटे चेक डैम बना कर पानी को न केवल धरती के नीचे उस वक्त के लिए भेजा गया जब बादल आसपास भी नहीं होते अपितु मानसून के रूठने पर धान के सीजन में जरूरत पड़ने पर एक-आध पानी लग जाए इसका उपाय भी किया गया है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के खातों में दर्ज सफल प्रोजेक्टों में पटियाला ब्लॉक में बड़ी नदी में बहते पानी का प्रयोग धरती के पानी को रिचार्ज करने में किया गया है। इस प्रोजेक्ट की अवधारणा के अनुसार प्रदेश में 70 के दशक में जमीन के ऊपर व भीतर पानी रुकने की समस्या से निपटने के लिए बड़ी संख्या में ड्रेनों का निर्माण किया गया लेकिन समय के साथ भूजल के स्तर में आई गिरावट ने इन बनी बनाई ड्रेनों की उपयोगिता खत्म कर दी जिस काम के लिए ये बनी थी वह नजदीक भी न रहा। परिणाम हुआ कि प्राकृतिक रूप से धरती में होने वाला रिचार्ज बंद हो गया। इसे पुन: प्रयोग में लाने और भूमि को रिचार्ज करने के लिए एक मात्र उपाय बचा था कि इनमें बहते पानी को नियंत्रित कर जमीन में एक स्थान पर भेजा जाए। बड़ी नदी में एक लंबी ट्रेंच के साथ 20 छोटी ट्रेंचें बनाई गई, लंबी ट्रेंच में दस छोटे कुएं और प्रत्येक छोटी ट्रेंच में एक रिचार्ज कुआं बनाया गया। इन ट्रेंचों में किसी तरह की खरपतवार न हो, घास न उग आए या फिर किसी तरह से सिल्ट न जमा हो, इसका ख्याल रिचार्ज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किया गया। किसानों में रिचार्ज के प्रति जागरुकता लाने के लिए किया गया यह प्रयास सफल रहा। इस दौरान एक और बात सामने आई कि भूजल स्तर ऊपर उठने के साथ, क्षेत्र में फैलने वाले बाढ़ के पानी में भी तुलनात्मक रूप से कमी दिखी। आंकड़े गवाह बने कि पहली व दूसरी स्लाइस के 20 रिचार्ज कुओं में 10.5 आईपीएस प्रति कुआं की रिचार्ज दर आंकी गई तो ट्रेंच के तीसरे स्लाइस में पांच रिचार्ज कुओं में 8.96 आईपीएस प्रति रंिनंग मीटर मापा गया। दिलचस्प है कि पंजाब-हरियाणा सीमा पर हुए इन सफल प्रयोगों के बाद उत्साहित किसानों ने जहां तहां पानी को रोक कर अपने जुगाड़ बना लिए। बिना बिजली अथवा कम बिजली फूंके गर्मियों के उन दिनों में जब मानसून दगा दे रहा होता है, तो ये जुगाड़ वरदान साबित होते हैं, लेकिन इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी सामने आए। धर्मेड़ी गांव के गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि तीन साल पहले घग्गर के पुलों के निकट ऐसा ही पानी धान को लगाए जाने पर सारी फसल काली पड़ गई फिर पता चला कि जब तक नदी का गंदा पानी एक दो तेज बारिशों के साथ निकल न जाए तब तक सिंचाई के काम में सीधा न लिया जाए।
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