गेहूं सड़ रहा, अब चावल की बारी
अन्य राज्यों में सेला व पंजाब, हरियाणा में सड़ रहा कच्चा चावल
दो साल पहले मुद्रास्फीति रोकने को उठाया कदम हुआ ओवरडोज
भूपेश चट्ठा, पटियाला गोदामों में गेहूं सड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर प्रधानमंत्री तक नीतिगत विवादों में उलझ गए हैं और सिर्फ 20 दिनों बाद पंजाब व हरियाणा में धान के साथ ऐसे ही हालात बनने की नौबत आना तय है। देश भर में फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया के पास अब चावल रखने की जगह नहीं है। ऐसे में गैर बासमती का निर्यात खोले बिना भंडारण की समस्या हल होना नामुमकिन है। गेहूं सड़ चुका है और अब चावल की बारी आ रही है। द फेडरेशन ऑफ आल इंडिया राइस शैलर्स मिलर्स एसोसिएशन के प्रधान तरसेम सैणी बताते हैं कि अनाज सड़ने के लिए जितना कर्मियों को दोषी ठहराया जा रहा है उससे कहीं ज्यादा नीतियां बनाने वाले जिम्मेदार हैं। दो साल पहले देश में अनाज की कमी, बढ़ती मंहगाई व मुद्रास्फिति से पार पाने को गैर बासमती चावल के निर्यात पर पाबंदी लगा दी गई। तब समय की जरूरत हो सकती थी पर अब देश भर में एफसीआई के पास कहीं भी चावल रखने की जगह नहीं है फिर भी प्रतिबंध जारी है। चावल सड़ने की तथाकथित तैयारियों में एक अन्य तथ्य यह भी है कि उड़ीसा, आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ जैसे तटीय राज्यों में मोटा कहा जाने वाला सेला चावल उगाया जाता है, लेकिन इन राज्यों में खाने के लिए लोग पंजाब, हरियाणा में पैदा होने वाले कच्चा कहे जाने वाले धान की हाईब्रिड किस्मों से बने चावल को ही पसंद करते हैं। इन्हीं राज्यों से सेला निर्यात किया जाता रहा है पर अब एफसीआई इन राज्यों से कच्चा चावल खरीद रही है। तरसेम कहते है कि इसका सीधा प्रभाव हुआ कि तटीय राज्यों के सेला प्लांट बंद हो गए और पंजाब में चावल रखने की जगह नहीं बची। 20 फीसदी धान आज भी बिना मिलिंग पड़ा है। मुद्रास्फीति रोकने को दी गई दवा ओवरडोज हो गई है। जालंधर, कपूरथला, फिरोजपुर, संगरूर में शैलर धान से अटे पड़े हैं, जबकि बठिंडा व मानसा जिलों में धान की 201 किस्म का प्रभाव शैलरों का पीछा नहीं छोड़ रहा। पंजाब में ही तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक का पिछले साल का धान पड़ा है और अगली फसल कम से कम इन जिलों में मात्र 20 दिन बाद कहां रखेगी और कौन से शैलर में लगाई जाएगी एफसीआई की समझ से बाहर है पर स्पष्टीकरण फिर भी दिए जा रहे हैं। गैर बासमती चावल के अंतरराष्ट्रीय दामों और निर्यात के लाभ पर तरसेम कहते हैं कि वाजिब दाम मिलने तय हैं। बांग्ला देश में सेला की मांग है और पाकिस्तान में बाढ़ से फसल तबाह हुई है। वहीं अपने देश में अनाज खराब करने के बाद खरीद मूल्य से कम दामों पर सिर्फ इसलिए बेचा जा रहा है, क्योंकि खराब हो रहा है। प्रदेश में मिलिंग पर वे कहते हैं कि एक महीने में सारा काम निपटाया जा सकता है यदि चावल एफसीआई समय पर उठाती रहे।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6719698_1.html
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