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साल में तीन फसल होती है मक्की की, धान-गेहूं दोनों का है विकल्प
भूपेश चट्ठा, पटियाला : एक किलो चावल के लिए तीन से पांच हजार लीटर पानी की खपत, वह भी गर्मी के दिनों में। हालात गेहूं के लिए भी कुछ ऐसे ही हंै, लेकिन धान जितने बुरे नहीं है, लेकिन मक्की के रूप में एक ही फसल ऐसी है जो इन दोनों का बदल भी देती है और एक और यानि एक ही साल में तीसरी फसल भी दे जाती है। इतना सब कुछ होने के बावजूद पानी की बचत के मामले में अव्वल है। हर तरफ से डाइवरसीफिकेशन कर पर्यावरण को संजोने वाली मक्की पर सरकार ने तीन फीसदी का टैक्स लगा दिया है। दिलचस्प है कि मक्की पर जबतब टैक्स लगता रहा है और हटाया भी जाता रहा है। 1990 के दशक के आरंभ में इस पर टैक्स लगा पर फिर हटा दिया गया। इसी दशक के अंत में एक बार फिर लगा दिया गया। ऐसा दो तीन बार हो चुका है। अब फिर लगा दिया गया है। कृषि के मंडीकरण मामलों की जानकारी रखने वाले पर्यावरण प्रेमी अधिकारी नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहते हैं कि राज्य में एक भी मक्की की प्रोसेसिंग यूनिट नहीं लगी है। अब रोपड़, होशियारपुर, नवांशहर व गुरदासपुर के अलावा हिमाचल प्रदेश के साथ लगते जिलों में अब मक्की का रकबा पांच से दस फीसदी बढ़ना शुरू हुआ है। इसे और बढ़ने देना चाहिए न कि रुकावट बनना चाहिए। धान की फसल से दूर होने वाले को तो अफीम छोड़ने वाले के समान लाभ दिया जाना चाहिए न कि सजा लगा देनी चाहिए। वहीं, मुख्य कृषि अधिकारी खुराणा बताते है कि यह इकलौती फसल है, जिसे आप साल में तीन बार फरवरी, जून व अक्टूबर में सियालू मक्की के रूप में लगा सकते है, जबकि फाइव ऐलीमेंट हैल्थ एंड एजुकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते है कि भूमिगत जलस्तर संजोने के अलावा मक्की पंजाब की अपनी फसल है। सरकार को तो चाहिए कि पंजाब की अपनी फसलें उगाने वालों को तो ज्यादा रियायतें दे। भारतीय किसान यूनियन एकता के प्रदेश महासचिव सुखदेव सिंह कहते है कि ये तथाकथित किसान हितैषी सरकार है कुछ भी कर सकती है। यह शहरी विकास टैक्स है। सरकार किसान की जेब से पैसा निकाल कर शहरों का विकास कर रही है। हम इस कर की निंदा करते है और वापस लेने की मांग करते है।
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