Thursday, 16 September 2010

ghagar; river no more only sewage

अब परिंदे भी पर नहीं मारते
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पहले मछलियां गायब हुई अब पक्षियों को भी पानी नहीं पसंद
प्रवासी पक्षी भी नहीं करते लैंड
20 फीसदी गिरा जलजीवन 96 घंटे में मर जाती है मछली
भूपेश चट्ठा, पटियाला : घग्गर नदी जो पानी ला रही है और जो फिजां बिखेर रही है उसमें परिंदे भी पर नहीं मारते। राजस्व विभाग में जिस नदी में मछलियों के पकड़ने के ठेके दर्ज हैं वहां जल जीवन तो दूर पक्षी भी आना पसंद नहीं कर रहे।
कई दिलकश पक्षी आते थे नजर
पेंटेड स्ट्रोक्स, पीईड एगोसेट्स, ईरोजिन-स्पूनबिल्स, ग्रे हैरोन्स और स्पाट बिल डक्स का इस इस क्षेत्र में भ्रमण करते कुछ साल पहले तक आम दिखते थे लेकिन अब गायब हैं। महेंद्र चौधरी जूलोजिकल पार्क में अक्सर फोटोग्राफी करने जाते रहे पूर्व पत्रकार व लेखक केएस धालीवाल कहते हैं कि घग्गर के किनारों पर सिर्फ इसी क्षेत्र में आप 15-20 पेंटेड स्ट्रोक्स एक साथ दिखाई दे जाते थे, यहां तक कि प्रवासी पक्षियों जिनमें गीज, डक्स के अलावा कई और तरह के इस इलाके में गर्मियों के बाद लेकिन मानसून के विदा होने से पहले आने शुरू हो जाते थे।
सौ किलोमीटर में खूब चहचहाट सोलन के निकट डगशाई की पहाडि़यों के अपने उद्गम स्थल से करीब करीब सौ किलोमीटर दूर तक घग्गर पक्षियों के लिए बेहतरीन स्थान रहा, जीरकपुर से थोड़ा आगे चिडि़या घर के पास की वाटर बॉडी व जंगल क्षेत्र पक्षी व पक्षियों के पे्रमियों के लिए पर्यावरण स्पॉट के रूप में मशहूर था।
मुबारकपुर से लेकर जीरकपुर तक ही घग्गर हो गई मैली
मुबारकपुर से पहले लिए गए सैंपलों में आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्रा क्रमश: 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी 240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया।
प्रदूषण ही है कारण
जल प्रदूषण, नदी के किनारों पर मानव आबादी की कालोनियां बसना और ध्वनि प्रदूषण के साथ सीवरेज को अनट्रीटेड ही छोड़ देना इसका कारण है। क्रस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है।
हैबीटेट सही नहीं
ऐसे ही पर्यावरण प्रेमी व फाइव ऐलिमेंट हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि वनों के नाम पर कीकर और वाटर बॉडी के नाम पर गंदे नाले से बने छप्पड़ पक्षियों को हैबीटेट के रूप में दोगे तो ये नदी तालाबों घाटीयों की बजाए किताबों तस्वीरों में ही दिखाई देंगे।
अब फलदार पौधे लगाने की योजना
फारेस्ट आफिसर एसके सागर कहते हैं कि वन क्षेत्रों मुख्यत: घग्गर नदी के इर्द गिर्द की मोती बाग बीड़ और गुरदयालपुरा बीड़ में एक-एक अतिरिक्त सबमर्सिबल पंप लगाया जा रहा है, जिससे हर मौसम में पानी की उपलब्धता बनी रह सके। वनों में पक्षियों के पसंदीदा फलों के पेड़ लगाने के साथ घास के मैदान का प्लाट गुरदयालपुरा बीड़ में विकसित किया जा रहा है।

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