Friday, 24 September 2010

rain water harvesting-6सबसे आसान प्राकृतिक तरीका

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खेत को ढक कर रखने से नहीं होता पानी का वाष्पीकरण
फसल के अवशेषों से पैदा हुए सूक्ष्म जीव जमीन में सुराख कर पानी रिसने के रास्ते खोलते हैं
पटियाला-संगरूर जिलों की सीमा पर छह साल पहले इसे अपनाया तो पानी में नाइट्रेट कम होना शुरू हुआ
भूपेश चट्ठा, पटियाला : रेन वाटर हार्वेस्टिंग, रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग और ग्राउंड वाटर रीचार्ज जैसे शब्द हरित क्रांति के आने के बाद आए, इससे पहले के सालों में अतिरिक्त पानी समस्या हुआ करता था। चाहे वह धरती के ऊपर हो या फिर धरती के नीचे इसी से निपटने के उपाय सोचे जाते थे। कारण था कि पानी को धरती में जाने के असंख्य रास्ते चूहे-सांप से लेकर केंचुए तक ने बना रखे थे। इनके बंद होने से भूमि का जायका बिगड़ गया तो नए रास्ते तलाशे जाने लगे। किसान के अब फिर प्रकृति की ओर मुड़ने के साथ ही हालत बदलने के संकेत आने लगे हैं। पटियाला-संगरूर जिलों की सीमा पर स्थित मांझी गांव में आज से पांच-छह साल पहले जरनैल सिंह ने प्राकृतिक खेती कर साबित किया कि गिरते भूमिगत जल स्तर को ऊपर लाने और इसकी गुणवत्ता संवारने का सबसे आसान तरीका भी प्राकृतिक ही है और यह हीरे की तरह है भी सदा के लिए। इसके साथ कई और लाभ बोनस में भी मिलते हैं। जरनैल सिंह बताते हैं कि खेती एक ऐसा माध्यम है जिससे हम हवा, पानी और मिट्टी तीन तत्वों को दुरूस्त कर सकते हैं, इन्हें प्रदूषण मुक्त भी किया जा सकता है। लेकिन सिर्फ इनके साथ चल कर, इनसे कुश्ती लड़कर हराया नहीं जा सकता। वे कहते हैं कि यूनिवर्सिटियों ने किसान को धान की खेती पडलिंग अथवा कद्दू करके करना सिखाया और किसानों ने इसे अपना भी लिया, लेकिन पानी का प्रयोग बहुत ज्यादा होने के साथ साथ इसने जमीन को बहुत कड़ा भी कर दिया। धरातल सख्त होने से धरती में पानी रिस कर जाना बंद हो गया। खेतों में फसल के अवशेष जलाने से वाष्पीकरण बढ़ गया। हमने पानी ऊपर जाने के रास्ते तो खोल दिए और भूमि में पानी भेजने के रास्ते बंद करते चले गए।
जमीन को ढककर रखें प्राकृतिक तरीके से खेती करने वाले माझी गांव के जरनैल सिंह बताते हैं कि जमीन को नंगा ना छोड़ कर इसे ढक कर रखा जाए। इसके लिए मल्चिंग विधि को अपनाया जा सकता है। एक फसल लेने के बाद बची घास-फूस, रहंद या कचरे को खेत में आग ना लगा कर इसे ऐसे ही छोड़ दिया जाए। खेतों में पड़ी पराली से न्यूट्रिएंट्स खाद माइक्रो आर्गेनिज्म के लिए खुराक का काम करेगी। खेत ढका होने के चलते पानी का वाष्पीकरण नहीं होगा, तो धरती में नमी बनी रहेगी। जहां फसल को चार पानी लगने हैं वहां दो की ही जरूरत पड़ेगी। खेत में सूक्ष्म जीवाणुओं से जीवों का सिलसिला शुरू होगा, ये जीव जमीन में सुराख कर देते हैं, इससे पानी का रिसाव नीचे की ओर तेज हो जाता है। धरती नरम रहती है तो आया अतिरिक्त पानी इसकी कोख में समाता रहता है। अब दिखने लगा है असर जरनैल सिंह कहते हैं कि उन्होंने पांच-छह साल पहले इस तरीके को अपनाया था। खेती पर खर्च कम हो सिर्फ मेहनत रह गई, मुनाफा लगातार बढ़ रहा है। भूमिगत जलस्तर पर हुए प्रभावों पर वे कहते हैं कि भवानीगढ़ ब्लाक में उनके गांव के चार-पांच पढ़े लिखे लड़के अब इसी तरह से खेती करने लगे हैं। 15 एकड़ खुद की जमीन के साथ करीब सौ एकड़ में ऐसे ही खेती होने लगी है। हजारों एकड़ में गिरते जल स्तर को थामने में समय लगेगा, लेकिन हाल ही में चेन्नई के एक एनजीओ ने पानी के नमूने लिए हैं। पांच-सात साल पहले जहां जमीन में बढ़े नाइट्रेट से वे परेशान थे वो अब कम हो गया है। साफ है कि असर तो हुआ है। नाइट्रेट का डाइल्यूट होना प्रदूषण मुक्ति का सुखद संकेत

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