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अमेरिका के राष्ट्रपति के समान सरपंच का प्रत्यक्ष चुनाव 80 के दशक में फिर शुरू किया था
इस बार की तबदीली ने सत्ताधारी दल को दिए 80 फीसदी सरपंच, लगातार बढ़ रही है संख्या
पंचों को दबाव में ला कर सरपंच को कठपुतली बना दिया गया
भूपेश चट्ठा, पटियाला : पंजाब में सरपंच का चुनाव करने वाली ग्राम सभा की मौत हो गई है और पंच वास्तव में परमेश्र्वर की भूमिका में आ गए है। स्थानीय निकाय स्तर पर संसदीय प्रणाली लागू करने के लिए ग्रामसभा अथवा पूरे गांव के मतदाताओं के बहुमत की जरूरत नहीं रही। नए एक्ट के अनुसार सिर्फ पंच ही बहुमत के आधार पर सरपंच को बदल सकते हैं। ग्रामीण राजनीति के जानकार बताते हैं कि पंचायत सचिव, डायरेक्टर और सबसे अधिक शिरोमणि अकाली दल की ओर से पार्टी स्तर पर नियुक्त किए गए विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी, चाहे वे हारे उम्मीदवार हों या जीते हुए विधायक, के समर्थकों का पलड़ा जिस ओर झुका हो वही सरपंच बन रहा है। गांव की राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखने वाले बताते हैं कि पंचायत की ओर से पहली बार चुने गए सरपंच के दो साल पूरे होते ही राजनीति शुरू हो जाती है और इसके बड़े खिलाड़ी पंच ना होकर सत्ताधारी दल के क्षेत्रीय नेता होते हैं। उन्हीं के इशारे पर सचिव व डायरेक्टर भी एक तरह से राजनीतिक प्यादे की भूमिका निभाते हैं। दिलचस्प है कि पंचों की संख्या सम हो तो भी बैठक बुला ली जाती है और अपने बंदे पूरे व सामने वाले के एक कम होने पर भी फटाफट पहले से तैयार किया हुआ प्रस्ताव पारित कर अपना बंदा सरपंच बना दिया जाता है। हालात ऐसे हो गए हैं कि सत्ताधारी पार्टी के समर्थक सरपंचों की संख्या 80 फीसदी के पार हो चुकी है और लगातार बढ़ रही है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य ब्रंा महिंदरा कहते हैं कि यह आंकड़ा 95 फीसदी के पार हो चुका है। बीडीओ, पंचायत सचिवों को बाकायदा निर्देश देकर अकालियों के हल्का इंचार्ज की पसंद थोपी जा रही है। उनके अपने विधानसभा क्षेत्र समाना के 106 में से 95 गांवों के सरपंच अकाली लगा दिए गए हैं। यूथ डेवलपमेंट बोर्ड पंजाब के चेयरमैन और शिरोमणि अकाली दल के स्टूडेंटस आर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के प्रधान गुरप्रीत सिंह राजू खन्ना कहते हैं कि सरकार का किसी पर दबाव नहीं है और न ही पंचायत के मामले में कोई दखल देती है, लेकिन जो सरपंच अच्छा काम नहीं करता पंचायत उसे खुद ही बदल रही है। ग्राम सभा की मौत के सवाल पर वे कहते हैं कि यह प्रक्रिया पिछली सरकार के कार्यकाल में शुरू हुई थी वर्तमान ने तो सिर्फ पूरी की है। उल्लेखनीय है कि वर्तमान व्यवस्था का प्रयोग पहले भी राज्य में किया जा चुका है और यह तब भी असफल रही थी बदलाव के नाम पर इसमें सरपंच का न्यूनतम कार्यकाल तय किया गया है। इसे लागू करने के पीछे सचिव स्तर के अधिकारी कहते हैं कि सरपंच एक बार चुन तो लिया जाता था पर पंचों का विश्र्वास खोने के बाद वह किसी तरह का कामकाज नहीं चला पाता था इसीलिए यह व्यवस्था की गई है।
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