Friday, 24 September 2010
apna punjab hove ghr de sharab hove pher pestitiside kyoun hoveजड़ों को दारू, बेलों को गूगल धूप
भूपेश चट्ठा, पटियाला रसायनों ने फसलों को कीटों से बेशक निजात दिलाई हो लेकिन उनके साइड इफेक्ट ने किसानों को चिंतित भी कर दिया है। इसी उधेड़बुन में पुराने नुस्खों से नई राह निकल आई है। किसान अब कीटों से फसलों को बचाने के लिए पुराने, देसी व प्राकृतिक नुस्खों को आजमाने लगा है। इसमें उसे सफलता भी मिली है। पटियाला-संगरूर सीमा पर स्थित माझी गांव के किसान जरनैल सिंह क्षेत्र में प्राकृतिक खेती के लिए जाने जाते हैं। उनका कहना है कि हमें मित्र व दुश्मन कीटों का पाठ पढ़ाया जा रहा है। फिर भी हम सभी कीटों को मार रहे हैं। जरूरत है अपनी फसलों का इम्यून सिस्टम दुरुस्त करने की, जिससे कीट अपनी जगह पर रहें और वे फसलों पर अनावश्यक रूप से न आएं। उनका कहना है कि लहसुन, हरी मिर्च, धतूरे के पत्ते, देसी अक व नीम की निमोली की चटनी बना इसे गोमूत्र में उबालने के बाद छान कर प्रति एकड़ दो से ढाई लीटर का छिड़काव हर छह माह पर सभी फसलों पर कर दिया जाता है। इससे कीट फसल के पास नहीं फटकते हैं। वहीं मालवा क्षेत्र के कुछ इलाकों में किसान महंगे कीटनाशकों पर भरोसा न कर स्वयं तैयार की गई देसी शराब पर इतना ऐतबार करते हैं कि वे इसका इस्तेमाल खेतों में कर रहे हैं। पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया गया कि कच्ची शराब को पानी के घोल में डाल कर कीटनाशक छिड़कने वाली मशीन से ही इसे खेतों में नरमे से लेकर सब्जियों तक पर छिड़क दिया जाता है और यह उपाय कारगर भी साबित हो रहा है। जरनैल सिंह भी कहते हैं कि कुछ लोग ऐसा कर रहे हैं। यह भी सामने आया है कि किसान खुद अपने खाने वाली घीया, तोरी, करेले की बेल पर आक्सिटोसिन का टीका नहीं लगाता। वह इन बेलों से उपज लेने के लिए गूगल का धूप लगाकर कीड़े भगाता एवं उड़ाता है और उपज भी बढ़ाता है। ठीक ऐसे ही जब फार्म हाउस की क्यारी में अपने बच्चों के लिए लगाए फलों के पेड़ की जड़ खराब होने लगती है, तो उसमें सरसों की खल डाली जाती है। मीठे पेड़ से जब कीड़े नहीं हटते और दीमक पीछा नहीं छोड़ते हैं, तो आसपास हल्दी की फसल ले ली जाती है। प्राकृतिक खेती के पैरोकार सुभाष पालेकर बताते हैं कि हम खाद के नाम पर सब्जियों को जहर पिला रहे हैं, जबकि इन्हें अमृत की जरूरत है। इसके फार्मूले में वह बताते हैं कि एक एकड़ के लिए सात किलो गौ मूत्र, सात किलो देसी गाय या भैंस का गोबर, दो किलो गुड़, दो किलो दली हुई दालों का आटा, एक मुट्ठी बन्ने की मिट्टी के घोल को 48 घंटे तक 200 लीटर पानी में छाया में रख कर प्राकृतिक तरीके से खाद तैयार की जा सकती है। इस घोल को जहां स्प्रे किया जा सकता है, वहीं इसे पानी के साथ खेत में फैलाया भी जा सकता है। पहली स्प्रे के 15 दिनों पर दूसरी और फिर 25 व 45 दिनों के अंतराल पर तीसरी व चौथी स्प्रे की जा सकती है। फसल के बीज को ही बीमारी मुक्त करने के लिए भी वह कुछ ऐसे ही देसी नुक्ते सुझाते हैं। इनमें ब्रंा अस्त्र, नीम अस्त्र व अग्नि अस्त्र शामिल हैं। उनका मानना है कि रासायनिक खेती में हमें हर चीज बाहर से खरीदने पर मोटी रकम अथवा आमदनी का बड़ा हिस्सा खर्च होता है, जबकि हर चीज लगभग मुफ्त में हमारे आसपास ही मौजूद है। दूसरी ओर डा. सुरिंदर दलाल का कहना है कि नए-नए कीटों का पता वैज्ञानिकों को लंबे अर्से बाद भी नहीं लगता। हमारे पास सिर्फ मारने के तरीके रह गए हैं, बचाव में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। जबकि कीटों पर नियंत्रण और मित्र कीट बचाने दोनों जरूरी हैं। यह तभी होगा, अगर हमारी दवा भी हमारे ही उत्पाद से बने, सात समंदर पार के तेजाब से नहीं।
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