..मुझे यूं भुला ना पाओगे
धरती को सेहत सुधारने का फार्मूला किसानों को फिर याद आया
गेहूं के साथ मोटा अनाज लगाना लाभदाय
गेहूं के साथ चना लगाने पर नहीं डालना पड़ता यूरिया
भूपेश चट्ठा, पटियाला स्वदेशी ज्ञान की खोज ने हमें याद करवा दिया कि गेहूं के साथ मोटे अनाज जौ, चना, जवार, बाजरा, मोठ को शामिल कर बने आटे की रोटी खाने से इंसान की सेहत दुरुस्त रहती है, पर अगर किसान इससे दो कदम आगे बढ़ जाए तो धरती की सेहत भी ठीक रहेगी। चुनिंदा किसानों में ही सही, लेकिन पंजाब में इसका चलन फिर शुरू हुआ है। गेहूं की बिजाई में करीब दो महीने हैं। प्रगतिशील किसानों के बीच गेहूं की किस्मों को लेकर चर्चा शुरू हो चुकी है। फाइव एलिमेंट हेल्थ एंड एजुकेशनल सोसाइटी फनविल के डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि पंजाब में गेहूं, जौ व चने (बेरड़) की खेती होती आई है। इसमें गेहूं के साथ जौ और चने की बिजाई की जाती है। इसी खेत में बीच-बीच में तैलीय बीजों तोरिया और तारामीरा की आड़े अथवा लकीरें खींच दी जाती हैं। इस तरह से खेती करने से फसल को बीमारी नहीं लगती और एक फसल दूसरी के लिए उपयोगी साबित होने के साथ धरती की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाती है। चने की जड़ों में नाइट्रिक बैक्टीरिया होता है, यह हर फली वाली फसल में होता है। गेहूं के साथ चना लगाने पर खेत में यूरिया नहीं डालना पड़ता। जौ के लिए ज्यादा उर्वरा शक्ति की जरूरत नहीं पड़ती, यह कमजोर जमीन में भी उग आता है, जबकि चना धरती की इस शक्ति को बढ़ाता है। दोनों की कीमत पर गेहूं की उपज आ जाती है। चने के पत्ते खेत में बिखरते हैं, जो हरी खाद का काम करते हैं। उनके अनुसार, चने की सुंडी काफी नाजुक होती है। गेहूं पौधे के संपर्क में आने पर स्वत: मर जाती है। गेहूं व जौ की सुंडी के लिए न केवल चना बल्कि आपस में भी टेस्ट विपरीत होने के चलते एक दूसरे पौधे के लिए रक्षा कवच का काम करते हैं। पेस्टीसाइड की जरूरत भी नहीं पड़ती। खेत में गेहूं के साथ अगर अलग-अलग कतार में तोरिया और तारामीरा लगाया जाए तो अन्य कीट भी नहीं लगते। तोरिया से बनने वाला तेल मुख्य रूप से जानवरों के काम आता है। तेज खुशबू और आंखों में जलन तक की क्षमता के चलते ये पौधे गेहूं को पूर्ण सुरक्षित कर देते हैं। हरित क्रांति से खेती का यह तरीका पंजाब में आम था पर अब भुला दिया गया फार्मूला फिर से याद आने लगा है। उधर, कृषि विभाग ने पांच सीजन पहले गेहूं के साथ मेथा की खेती करने का विचार दिया था। मेथा की जड़ें भी गेहूं की फसल के लिए टॉनिक का काम करती हैं और फसल भी काफी पहले आ जाती है। यह प्रयोग सफल रहा पर इसकी मार्केटिंग अमृतसर सहित कुछ ही क्षेत्रों में हो पाई। इस पर मुख्य कृषि अधिकारी डा. बीएस सोहल कहते हैं कि मेथा के प्रोसेसिंग प्लांट न लग पाने की वजह से यह प्रयोग नहीं चल पाया।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6713380_1.html
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