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Saturday, 7 July 2012

सांसद-सरकारें बदलते रहे, घग्गर उफनता रहा, Bottleneck; No govt. had solution for river Ghagger


गतिरोध: नदी पर्यावरण
-अकाली-भाजपा और कांग्रेस की सरकारें बनती बिगड़ती रही पर बाढ़ नहीं थमी
-1996 से हर चुनाव घग्गर की बाढ़ को मुद्दा बना जीते गए
भूपेश चट्ठा, पटियाला
तुम कांग्रेस के बल निकाल दो हम घग्गर के बल निकाल देंगे, तुसी कांग्रेस नूं चक्क दयो असी घग्गर नू चक दवांगे। 1993 में कहर बरपाने वाली घग्गर की बाढ़ के बाद आया 1996 का लोकसभा चुनाव विशुद्ध रूप से घग्गर के मुद्दे पर लड़ा गया। लेकिन घग्गर की बाढ़ का समाधान नहीं हो पाया।
 इसके बाद लगातार तीन लोकसभा चुनाव और इतने ही विधानसभा चुनाव होने के दौरान दो बार भयंकर बाढ़ फिर आई। बीते 12 में से मात्र दो मानसून सीजन को छोड़ दें तो हर साल बरसातें शुरू होते ही राजपुरा विधानसभा क्षेत्र का कुछ हिस्सा, घनौर, वर्तमान सनौर और पुराना डकाला, शुतराणा व समाना विधानसभा क्षेत्रों के 150 से 200 गांवों पर बाढ़ की तलवार लटक जाती है। आलम यह है कि इन क्षेत्रों के किसानों को अपनी धान की फसल का नष्ट होना सताता है तो अन्य गरीब दलित वर्ग को मजदूरी के लाले भी पड़ जाते हैैं।
 इतनी बड़ी आबादी और पंजाब हरियाणा सीमा पर बसे पटियाला संसदीय क्षेत्र का वोटर जहां नारों, दावों, वायदों, घोषणाओं, किए जाने वाले शिलान्यासों, अधिकारियों की विभिन्न स्तरों पर दी जाने वाली रिपोर्टों को 'चुनावी लारोंÓ का हिस्सा मान बैठा है और घग्गर की बाढ़ को अपनी बदकिस्मती।
 दिलचस्प है कि घग्गर की बाढ़ का स्थाई हल कभी नहीं तलाशा गया। इसके साईफनों की ना तो कभी पानी निकासी क्षमता बढ़ाई गई, इसकी खुदाई कर गहरी करने और हरियाणा की बीबीपुर झील से ओवर फ्लो होकर पानी को बहने से रोकने बांध मजबूत व ऊंचे नहीं किए गए। अकाली भाजपा गठबंधन सरकार में मुद्दा उछला तो केंद्र के कांग्रेसी हरियाणा के समर्थन में लगे रहे।
 संसद में 12 बार से अधिक घग्गर का मामला उठा इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने का दावा एक ओर शिरोमणि अकाली दल करता है और कहता है कि उनके प्रयासों से अब योजना बन चुकी है प्रोजेक्ट पास हो गया है, केंद्र सरकार ने तो कुछ नहीं किया, वर्तमान सरकार 137 करोड़ रुपये की लागत से 35 किलोमीटर घग्गर को सुधारा गया है। 14 हजार क्यूसिक क्षमता का साइफन 25 हजार का किया गया। अगले चरण में जीटी रोड क्षेत्र में 418 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
केंद्रीय जल आयोग ने पिछले जुलाई में आई बाढ़ के बाद तीनों ही राज्यों को अपनी ओर से घग्गर को नियंत्रित करने वाली योजना के प्रस्ताव देने को कहा। पंजाब ड्रेनेज विभाग के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि उक्त विस्तृत प्रोजेक्ट के लिए तीनों ही राज्यों का एक संयुक्त सर्वेक्षण किया गया  घगगर के द्वितीय चरण को पूरा करने की अनुमति अब दी गई है। घग्गर का 22.5 किलोमीटर का खन्नौरी से मकरोड़ साहिब का पहला चरण  2009 में पूरा हो चुका है। 17.5 किलोमीटर के मकरोड़ साहिब से नीचे की ओर करहाली गांव तक का प्रोजेक्ट करीब करीब दस सालों  से लटक रहा है और मालवा क्षेत्र में अब तक हुआ लगभग हर चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा जाता रहा है।
बाढ़ नियंत्रित कब होगी इसका सटीक अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है।

Monday, 4 June 2012

घग्गर को दुरुस्त करना दूसरे ही चरण में अटका, Could not channelized river Ghagger


-दो दशकों में मात्र 17.5 किलोमीटर ही हो पाया चैनेलाइजेशन का काम
-केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए घोषित किया 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट
फोटो: 4
भूपेश चट्ठा, पटियाला
दक्षिणी-पूर्वी पंजाब में बरसात के दिनों में लगभग हर दूसरे साल तबाही मचाने वाले घग्गर दरिया के 'बल-बिंगÓ निकालने के दावे प्रति दावे के नाम पर मालवा क्षेत्र में नारे लगते रहते हैं, लेकिन कई चरणों में होने वाला काम दूसरे ही चरण में अटक गया है। हालांकि साफ सफाई के नाम पर पूरे घग्गर दरिया को पंजाब व हरियाणा दोनों ने ही एक प्रकार से तिलांजली दे रखी है, लेकिन दोनों ही राज्य घग्गर दरिया का जहां कहीं से भी दोहन हो सकता करने में कोर कसर नहीं छोड़ रहे।
पंजाब में चंडीगढ़ व हिमाचल-हरियाणा   के पास जीरकपुर क्षेत्र में जहां तहां से रेता-बजरी निकालने का काम पंजाब की तरफ से इतना हुआ कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से रोक लगानी पड़ी। हालांकि पंजाब ने अपने जिलों एसएएस नगर, पटियाला, संगरूर, मानसा के बड़े भूभाग के लोगों को फलैश फ्लड से बचाने कहीं भी दरिया की सफाई व किनारे मजबूत करने अथवा तटबंधों पर काम शुरु नहीं किया है।
पंजाब व हरियाणा सीमा पर दोनों तरफ बहने वाले घग्गर के मामले में हरियाणा ने चीका रोड पर हांसी बुटाना नहर के नीचे बने साइफन से मिट्टी निकलाने और प्रति टिपर दो हजार रूपये तक में बेचने का काम बड़े पैमाने पर शुरु कर रखा है। बाकायदा टेंडर भी जारी किए गए हैं। सूत्र बताते हैं कि इसके अलावा अंबाला, कैथल जिलों से लेकर दक्षिणी छोर तक कहीं भी सफाई शुरु नहीं की गई है।
बाढ़ की मार सबसे अधिक झेलने वाले पटियाला व संगरूर जिलों में करीब दो सौ किलोमीटर क्षेत्र पर पड़ती है। इस सबके बावजूद घग्गर की बाढ़ नियंत्रण का कार्य दूसरे ही चरण में अटक गया है। पहले चरण में खनौरी से मकरोड़ साहिब के बीच मात्र 17.5 किलोमीटर नदी के चैनेलाइजेशन का काम मुक म्मल हुआ है।
दूसरे चरण के 21.7 किलोमीटर में मकरोड़ साहिब से पंजाब के कड़ैल अथवा हरियाणा के जाखल तक चैनेलाइज करने के बाद अन्य सहायक नदियों के किनारे पक्के करने के प्रोजेक्ट शुरु होने थे। इसी क्रम में हरियाणा राज्य की ओर से अपने क्षेत्र में बांध बनाने को पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट में 70 गांवों के आठ फीट पानी में डूबने का हवाले दे आपत्ति जताई गई तो केंद्र की ओर से फरवरी में प्रोजेक्ट रोकने पर उपमुख्य मंत्री सुखबीर बादल ने मूणक में लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।
इसके बाद केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट दिए जाने की घोषणा कर रखी है। इसमें डेरा बस्सी, बनूड़, राजपुरा, घनौर, पातड़ां, खनौरी, लहरा गागा, मूणक, फतेह गढ़ साहिब, नाभा, बसी पठाना, मंडीगोबिंद गढ़ के नाम शामिल हैं।

जीवनदायनी नदी हो गई डायन!, The river that gave birth turns to killer


- जहां कभी मछलियां पकडऩे के ठेके होते थे वहां पांव-खुर गलने लगे अब टयूबवेलों के पाइप भी नहीं टिकते
भूपेश चट्ठा, पटियाला
हिमाचल प्रदेश के डगशाई से शुरु हो पाकिस्तान तक बहने वाली घग्गर नदी से पंजाब-हरियाणा के अलावा राजस्थान भी प्रभावित होता है, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा पटियाला व संगरूर जिलों में है। करीब दो सौ किलोमीटर क्षेत्र में बहने वाली इस नदी में कभी मछली पकडऩे के लिए सरकारी स्तर पर ठेके हुआ करते थे। पर जीवन दायनी ये नदी अब करीब करीब डायन का रूप धारण कर गई है।
पंजाब व हरियाणा सीमा पर बहने वाली घग्गर नदी के एक तो अब बरसाती होकर रह गई है। जब भी पानी आता है तो बाढ़ के रूप इसके अलावा दस महीने इसमें बहने वाले पानी की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है कि आसपास के खेतों में ट्यूबवेल के पाइप भी गलने लगे हैं और कई स्थानों पर अच्छे मैटल की और पानी में ही डूबने के लिए बनी मोटर भी जंग से जूझ रही होती है।
क्षेत्र में धर्मेहड़ी गांव के बाशिंदे हरदीप सिंह बताते हैं कि पहले घग्गर नदी का पानी सिंचाई के काम में भी आता था। नलकूप की जरूरत तो बाद के सालों में ही पड़ी है। लोग याद करते हैं कि अब पशु इस नदी के पास फटकते नहीं हैं। अगर मजबूरी में इंसानों को आना जाना पड़ जाए तो पांव गलने लग जाते है। गुरदयालपुरा बीड़ के पास मरोड़ी गांव के कश्मीर सिंह बताते हैं कि जो लोग आसपास पशु चराने ले आते है और नदी के एक से दूसरे छोर पर आना जाना पड़ जाए तो जानवरों के खुर तक गल जाते हैं। नदी का क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानीटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई। जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी 240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिरकर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है। हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही हैं।

Tuesday, 6 March 2012

पांव-खुर गलते थे अब टयूबवेलों के पाइप भी नहीं टिकते, river ghagger, under ground water, pollution, tubewell,


नदी प्रदूषण: अंतिम
-पांच-छह साल में पाइप तो 10-12 साल में ही गल जाती है मोटर
फोटो:1, 2
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां आए साल नलकूप खोदने पड़ते हों, ऐसा नहीं है कि नदी किनारे भूमिगत जल स्तर गिर रहा है लेकिन पानी की कमी हो जाती है। कई बार अचानक टयूबवेल पानी ही देना बंद कर देता है। पंजाब हरियाणा सीमा पर बहने वाली घग्गर नदी के पानी की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है कि टयूबवेल के पाइप गलने लगे हैं और कई स्थानों पर अच्छे मैटल की और पानी में ही डूबने के लिए बनी मोटर भी जंग से जूझ रही होती है।
दरिया के किनारे कम से कम एक सौ मीटर तकके  टयूबवेलों की हालत कुछ ऐसी हो चली है कि हर पांच-छह साल में इनके पाइप बदलने पड़ते हैं जबकि मोटर की हालत 10-12 साल में गलने वाली हो जाती है। धर्मेहड़ी के किसान हरभजन सिंह बताते हैं कि पानी यहां 60 फीट पर ही है और काफी समय से टिका हुआ भी है, लेकिन पाइप के गलने के चलते निचली लैंथ बदलनी ही पड़ती है। दो तीन साल बाद ही डर सताने लगता है कि कहीं  निचले पाइप के च्यादा गलने से मोटर ही बोर के अंदर ना गिर जाए।
जीवन के छह दशक देख चुके किसान जगमिंदर सिंह कहते हैं कि पहले घग्गर नदी का पानी सिंचाई के काम में भी आता था नलकूप की जरूरत तो बाद के सालों में ही पड़ी है। पर अब इनके साथ ही नई मुसीबत भी आ गई है। इन्हें फिर से खोद कर मोटर व पाइप निकाले जाते है हालांकि बोर वही रहता है पर पाइप बदलने में खासा खर्च आता है। एक ही टुकड़ा 12 सौ से उपर का है, खुदाई की लेबर व मशीनरी का खर्च अलग से है। कई बार पानी में गल चुकी मोटर भी बदलनी पड़ जाती है।
क्षेत्र के बाशिंदे याद करते हैं कि अब पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है और जानवरों के खुर, क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

नापाक हुआ घग्गर किनारे का पानी, river ghagger, water pollution,


जागरण सरोकार : पर्यावरण संरक्षण

...नदी प्रदूषण : एक

फोटो: 1
- सब्जी उगाते हैं, बेचते हैं, पर खाते नहीं हैं
भूपेश चट्ठा, धर्मेहड़ी (पटियाला)
पंजाब के जिस पानी पर अनगिनत लोकगीतों की रचना की गई और जिसे हाथ में लेकर साथ जीने मरने की कसमें खाई जाती थीं, पंजाब के उसी आब को हाथ लगाने की हिम्मत अब नहीं होती। जल प्रदूषण की भेंट घग्गर दरिया इस कदर चढ़ चुका है कि कभी पवित्र निर्मल रहने वाला जल पूरी तरह से नापाक हो चला है।
आलम ये है कि पंजाब-हरियाणा सीमा पर स्थित धर्मेहड़ी गांव के पास से गुजरते घग्गर दरिया के पानी से क्षेत्र के किसान सब्जी उगाते हैं, बेचते भी हैं, पर खाते नहीं हैं। इतना ही नहीं घग्गर के ठीक किनारे पर स्थित खेतों में छोटे-छोटे डेरों पर मोटरें लगी हैं। बिजली भी अपने हिसाब से आती रहती है और ट्यूबवेल चलता भी है, पर यहां के लोग अपने पीने व भोजन के लिए पानी दूसरे की मोटर से लाते हैं।
सीमा पर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि पहले एक दो बोर से ही गड़बड़ वाला पानी आता था। अब ऐसे कई पंप हैं, जहां से दुर्गंध वाला पानी आता है। जिसके चलते पीने अथवा भोजन के लिए प्रयोग नहीं करते।
 ठीक ऐसे ही गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि उन्होंने कुछ मोटरों को ब्लैक लिस्ट जरूर किया है। पीने का पानी उन मोटरों से नहीं लेते, पर सब्जी उगाने और सिर्फ बाजार में बेचे जाने की बात पूरी तरह से सही नहीं है। हालांकि इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा है, पर कोशिश होती है कि सब्जी को न लगाया जाए। यहां जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का एहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता, पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं, वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।
ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है, पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है।
वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा.चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये ऊपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग न करें। डा.चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

Saturday, 24 December 2011

घग्गर की बाढ़, नियंत्रण दूसरे ही चरण में अटका, issues, punjab election, 2012, river ghagger,


...घग्गर का मुद्दा
सरकारें बदलती रहीं पर नहीं बदले हालात
-मात्र 17.5 किलोमीटर ही हो पाया चैनेलाइजेशन का काम
-अब केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए घोषित किया 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट
 भूपेश चट्ठा, पटियाला
पक्ष-विपक्ष में रहने वाला क्षेत्र का चुनाव लडऩे वाला हर वो नेता घग्गर की बाढ़ से निजात दिलाने की बात करता रहा है और ये सिलसिला संभव है कि आजादी के बाद से चला आ रहा है। सरकारें, विधायक और सांसद बदलते रहे पर घग्गर के आस पास रहने वालों के हालात नहीं बदले हैं।
हिमाचल प्रदेश के डग्शई से शुरु हो पाकिस्तान तक बहने वाली इस नदी से पंजाब-हरियाणा के अलावा राजस्थान भी प्रभावित होता है लेकिन सबसे ज्यादा मार पटियाला व संगरूर जिलों में करीब दो सौ किलोमीटर क्षेत्र पर पड़ती है। इस सबके बावजूद घग्गर की बाढ़ नियंत्रण का कार्य दूसरे ही चरण में अटक गया है। पहले चरण में खनौरी से मकरोड़ साहिब के बीच मात्र 17.5 किलोमीटर नदी के चैनेलाइजेशन का काम मुक म्मल हुआ है।
दूसरे चरण के 21.7 किलोमीटर में मकरोड़ साहिब से पंजाब के कड़ैल अथवा हरियाणा के जाखल तक चैनेलाइज करने के बाद अन्य सहायक नदियों के किनारे पक्के करने के प्रोजेक्ट शुरु होने थे। इसी क्रम में हरियाणा राज्य की ओर से अपने क्षेत्र में बांध बनाने को पंजाब ने सुप्रीम कोर्ट में 70 गांवों के आठ फीट पानी में डूबने का हवाले दे आपत्ति जताई गई तो केंद्र की ओर से फरवरी में प्रोजेक्ट रोकने पर उपमुख्य मंत्री सुखबीर बादल ने इसी साल फरवरी में मूणक में लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।
इसके बाद केंद्र ने पटियाला, फतेहगढ़ साहिब और संगरूर के 12 शहरों के लिए 296.96 करोड़ का प्रोजेक्ट दिए जाने की घोषणा कर रखी है। इसमें डेरा बस्सी, बनूड़, राजपुरा, घनौर, पातड़ां, खनौरी, लहरा गागा, मूणक, फतेह गढ़ साहिब, नाभा, बसी पठाना, मंडीगोबिंद गढ़ के नाम शामिल हैं।

केंद्र सिर्फ बातें करता है: सेखों

पंजाब सरकार के सिंचाई मंत्री जनमेजा सिंह सेखों कहते हैं कि ये लोग इजाजत ही नहीं दे रहे। केंद्र में बैठे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के मंत्री ही आगे नहीं बढऩे देते। केंद्रीय केबिनेट मंत्री जय राम रमेश से मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की मुलाकात के बाद हुई घोषणा पर वे कहते हैं कि सिर्फ बाते ही हैं। पौने तीन सौ करोड़ का प्रोजेक्ट बना कर भेजा था अभी तक मंजूरी नहीं आई है।

हमने पहला चरण पूरा करवाया: लाल सिंह

पूर्व सिंचाई मंत्री लाल सिंह कहते हैं कि पहले चरण के लिए नाबार्ड से 72 करोड़ रूपये मंजूर करवा और दस करोड़ अपनी सरकार से लगाने के बाद उन्होंने पहला चरण पूरा करवाया। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए प्रोजेक्ट की नींव पत्थर रखा और पूरा भी करवाया। जिसमें दो पुल और दोनों ओर बांध पक्के करवाए। पंजाब में खनौरी से हरियाणा के जाखल तक कुल 40 किलोमीटर तक चैनेलाइज करने का कार्य था जिसे मौजूदा सरकार आगे नहीं बढ़ा सकी।

Friday, 28 October 2011

नदी किनारे प्रदूषित नलकूप, गांव वालों ने की तौबा, river ghagger, water pollution, tubewell,



भूपेश चट्ठा, पटियाला
 जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां हर साल नए नलकूप खोदने पड़ते हैं, पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है। क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। घग्गर नदी में कभी मछली पकडऩे के ठेके होते थे आज जल जीवन तो दूर कई पक्षियों की किस्में ही अब दिखाई देनी बंद हो गई। हालात अब इस कदर बदतर हो चुके हैं कि नदी किनारे लगे नलकूपों का पानी प्रदूषित हो चुका है और गांव व आसपास बसे डेरों के लोगों ने इससे तौबा कर ली है।

ऐसा भी नहीं है कि नदी की सफाई नहीं होती, हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है। पंजाब हरियाणा को अलग करती घग्गर नदी में बरसाती पानी गुजर जाने के बाद, शहरों का सीवर और फैक्ट्रीयों का प्रदूषित जल आना शुरू होता है। पानी की रफ्तार कम होते ही यह प्रदूषण आसपास के कुओं नलकूपों के पानी को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है। पंजाब हरियाणा सीमा पर किसान पीने के पानी के तौर पर इसका पानी इस्तेमाल नहीं करते हैं।

पटियाला चीका रोड़ पर पंजाब की  ओर अंतिम खेत के मालिक हरदीप सिंह बताते हैं कि धर्मेहड़ी पुलों के पास क्षेत्र में घग्गर किनारे की पहली दो मोटरों का पानी इस्तेमाल नहीं किया जाता और इच्छा के विपरीत फसलों को तो दिया जा रहा पर कोशिश होती है कि सब्जी को ना लगाया जाए। वहीं गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि जुकाम के दौरान भी दुर्गंध का अहसास हो जाता है। खराबी क्या है? ये तो उन्हें नहीं पता पर पानी स्वाद नहीं है, गेहूं पीली पड़ जाती है। जो लोग खाद की बात करते हैं वे यहां पर गलत हैं, कई बार पौध अचानक ही मर जाती है।

 वहीं पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डायरेक्टर डा. चरणजीत सिंह कहते हैं कि ऐसा बिलकुल सही नहीं है कि दुर्गंध वाला पानी जमीन के 200 फीट नीचे हो सकता है। वैज्ञानिक ढंग़ से सोचा जाए तो किसी भी चीज का बायोलॉजिकल पार्ट पानी के साथ धरती के इतना नीचे नहीं जा सकता। ये उपर ही रह जाएगा। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि घग्गर प्रदूषित है और वे किसी तरह से बचाव नहीं कर रहे, लोगों को चाहिए कि नदी में से पानी निकाल कर सिंचाई के लिए प्रयोग ना करें। डा. चरणजीत कहते हैं कि संभव है कि किसी एक या दो नलकूप के पास पानी जमा होता होगा और रिसता होगा। इसके आसपास किसी कैप्टी से संबंध नहीं हो सकता। नदी के प्रदूषण पर किसी तरह के सर्वे पर वे कहते हैं कि हाल ही में ऐसा कोई सर्वे नहीं किया गया है।

उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

Tuesday, 5 July 2011

घग्गर साफ कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवाई, river ghagger, hansi-butana,

राजनीति
पंजाब के कांग्रेसी दिल्ली के साथ
उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर की साफ सफाई कर रही पंजाब की मशीनें हरियाणा ने उठवा दी हैं। यह खुलासा शिअद के महासचिव एवं पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने किया है। वह शुक्रवार को यहां पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। पंजाब की भूमि पर बाढ़ नियंत्रण के उपाय कर रही इन मशीनों को उठवाने व कार्य रोकने पर किसी तरह का मामला दर्ज करवाने के सवाल पर कहा कि ये सब हरियाणा ने अपने वकीलों की सलाह से तकनीकी रूप से किया है। हांसी-बुटाना नहर और इसके साथ बनाई जा रही दीवार पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से अकालियों पर लगाए गए आरोपों पर कहा कि उनके पास अपनी उपलब्धियां गिनाने को हैं नहीं, अपने शासनकाल में उन्होंने हांसी बुटाना नहर को बनने दिया और अब दोषारोपण गठबंधन पर कर रहे हैं। पंजाब के कांग्रेसी हमेशा से ही दिल्ली के साथ रहे हैं, जबकि अकाली दल ने नहर के खिलाफ प्रधानमंत्री तक का दरवाजा खटखटाया और दीवार बनना शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसी मामले पर सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की पूर्व डिप्टी स्पीकर बीर दविंदर की मांग पर चंदूमाजरा ने कहा कि अब मामला न्यायालय में है ऐसे में सर्वदलीय मीटिंग का ज्यादा औचित्य नहीं रह जाता। प्रो. चंदूमाजरा ने प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हरियाणा से ज्यादा होने के सवाल पर राज्य के पास कम संसाधन होने का हवाला दिया।

Saturday, 2 July 2011

घग्गर को साफ कर रही मशीनें पंजाब ने वापस बुलाई, river ghagger, drainage, punjab,


उप मुख्य संवाददाता, पटियाला :
मानसून के दिनों में कहर बरपाने वाली बरसाती नदी घग्गर में साफ सफाई का काम कर रही पंजाब की मशीनें जहां पहले हरियाणा ने उठवा दी थी वहीं आज शेष बची मशीनरी को पंजाब ने वापस बुला लिया है। पंजाब की भूमि पर घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित करने के किए जा रहे उपायों के तहत काम कर रही मशीनरी अब कम से कम इस सीजन में नहीं दिखाई देगी, इसे एक तरह से हांसी-बुटाना नहर का जिन्न निगल गया है।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि न्यायालय की अवमानना के डर से पंजाब ने यह कदम उठाया है। इसके चलते मकरोड़ साहिब से कराली तक 16.5 किमी की घग्गर में बाढ़ नियंत्रण अथवा नदी को चैनेलाइज करने का काम अब पूरी तरह से बंद हो गया है। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार घग्गर नदी की सफाई का कार्य दोनों राज्यों की सहमति से ही करवाया जा सकता है। दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों की सहमति जरूरी है। बताया जा रहा है कि यह बैठक सिर्फ इसीलिए नहीं हो पा रही है कि हरियाणा के मुख्य सचिव ने घग्गर के मुद्दे पर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसकी वजह से अब मशीनरी उठा ली गई है।
दिलचस्प है कि पंजाब के ड्रेनेज विभाग ने इससे पहले भी जून में वकीलों की सलाह लेने के साथ ही इस क्षेत्र में सर्वे करवाया है। तब भी किसी तरह का कार्य आगे ना बढ़ाने की सलाह सामने आई थी लेकिन जनता के दवाब में कुछ कार्य किए भी गए पर अब बात आगे बढ़ती देख पंजाब पीछे हट गया है।

सरकार फोटो खिंचवाकर चली जाती है.., hansi-butana, river ghagger, flood protection,



हांसी बुटाना नहर का मामला : क्षेत्र के लोग दायर करेंगे सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका
भूपेश चट्ठा, पटियाला
लोग आते हैं। हालात देखते हैं और फोटो खिंचवाकर चलते बनते हैं। मंत्री-संत्री सब जानते हैं, हांसी बुटाना नहर पर दीवार बनने से क्या होगा। हम कुछ कहते हैं तो भड़क उठते हैं करें तो क्या करें? ये व्यथा पंजाब-हरियाणा सीमा पर बसे एक या दो नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों की है, जो दो राज्यों सरकारों की राजनीतिक शक्तियों के बीच अपने अपने वोट बैंक के एजेंडे की लड़ाई में पिस रहे हैं। पंजाब के धर्मेहड़ी, ससी ससा, अलीपुर, करतारपुर, अलीपुर थेह, नौगांवा जैसे गांव पहले से ही हांसी बुटाना नहर की मार तले हैं। धर्मेहड़ी के गुरप्रीत सिंह कहते हैं कि बीते साल तो नहर के टूटने से पानी निकल गया पर अब तो बाढ़ की मार को स्थायी करने के लिए दीवार बनाई जा रही है। दिलचस्प है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री भुपिंदर सिंह हुड्डा के ड्रीम प्रोजेक्ट कही जाने वाली इसी नहर के इस ओर हरियाणा के सौगलपुर, कसौली, पपराला, गगड़पुर, घमेड़ी, विवादास्पद साइफन के ठीक निकट घमेड़ा जैसे गांव भी मार तले हैं। वहीं धर्मेहड़ी के सरपंच कश्मीर सिंह सीधे सीधे आरोप लगाते हैं कि सरकार के नुमाइंदे फोटो खिंचवाकर चले जाते हैं, हम कुछ करते हैं तो पर्चे दर्ज किए जाते हैं। ड्रेन में साफ सफाई का काम अपने हाथ में लिया तो आज जिला प्रशासन मानसून आने के बाद आ खड़ा हुआ और कह रहा है कि मौसम साफ होते ही पुल के नीचे का फर्श खोद कर गहरा कर अन्य ड्रेन भी साफ कर दिए जाएंगे। यहां धरना लगाए बिना कोई सुनवाई ही नहीं होती है। याद रहे कि नहर के निर्माण के शुरुआती दिनों में जहां संघर्ष समिति का गठन किया गया था आंदोलन से बात न बनी तो बाढ़ का पानी चढ़ने पर लोगों ने इसका किनारा तोड़ डाला, नुकसान हरियाणा के चीका शहर तक जा पहुंचा था। लोगों ने सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका के अलावा जनहित याचिका दायर करने मन बना लिया है। इन्हें डायरेक्ट एक्शन से भी गुरेज नहीं है। क्षेत्र का हर बाशिंदा दीवार ढहाने के लिए तैयार बैठा है। हालांकि पानी देने से किसी को एतराज नहीं है। दूसरी ओर क्षेत्र में शनिवार को एसडीएम गुरमीत सिंह ने पटवारियों को साथ लेकर इलाके का दौरा किया और खराब हुई फसल की तुरंत गिरदावरी करने के आदेश भी दिए हैं।

Friday, 17 June 2011

नाबार्ड से पंजाब को नहीं मिला धेला, flood protection, nabard, river ghagger,

नाबार्ड से मांगे थे 101 करोड़ रुपये
 राज्य ने अपने संसाधनों से 26 करोड़ जुटाए, 30 तक निपटाएगा काम
उप-मुख्य संवाददाता, पटियाला : नहरी पानी व ट्यूबवेलों से सिंचाई की व्यवस्था के चलते पंजाब में बहुत कम किसान हैं, जिन्हें बारिश की ज्यादा चिंता रहती है, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या खासी ज्यादा है, जिन्हें मानसून में बाढ़ का फिक्र ज्यादा सताता है। ऐसे हालात में पंजाब व पंजाबियों को नेशनल बैंक फार एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) से करारा झटका मिला है। पंजाब की ओर से मानसून पूर्व बाढ़ रोकथाम के लिए किए जाने वाले उपायों के लिए मांगी गई धन राशि में से एक धेला भी नहीं मिला है। गौरतलब है कि मई-जून के दिनों में उत्तर भारत के ज्यादातर क्षेत्रों में खेत खलिहान खाली रहते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया करवाने की दिशा में पेयजल योजनाओं में कुआं और तालाब खोदने से लेकर सड़क निमार्ण तक के कार्य नाबार्ड की ओर से करवाए जाते हैं, जबकि पंजाब में टोबों से लेकर नदी नालों की साफ सफाई और उनके तटबंध मजबूत करने का काम होता है। बाढ़ रोकने के उपाय भी इनमें शामिल हैं। पंजाब ने अपनी जरूरतें बता नाबार्ड के पास इस बार बाढ़ रोकथाम उपायों के लिए 101 करोड़ रुपये के एस्टीमेट भेजे, लेकिन मानसून आने में एक पखवाड़े से भी कम समय रहने के बावजूद एक पैसा भी पंजाब के लिए जारी नहीं किया गया है, जबकि हर काम के लिए विज्ञापन से टेंडर जारी कर पूरी प्रक्रिया अपनानी होती है और इसमें खासा समय लगता है। उधर, बाढ़ रोकथाम के लिए ड्रेनेज विभाग की ओर से किए जा रहे उपायों पर शुक्रवार को पूछे जाने पर सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर पीएस भोगल कहते हैं कि विभाग प्रदेश में नदियों के उफान व बाढ़ का समय एक जुलाई से 20 सितंबर तक मानकर चलता है, बाढ़ रोकथाम के उपाय 30 जून तक निपटा लिए जाएंगे। राज्य सरकार ने इसके लिए 26 करोड़ रुपये की राशि विभाग को आवंटित की है। इसमें से पिछले साल बुरी तरह से प्रभावित होने वाले पटियाला जिले के लिए चार करोड़ रुपये रखे गए हैं। पटियाला की राव, टांगरी, मारकंडा का कुछ हिस्सा, मीरांपुर चौ सहित घग्गर में सफाई चल रही है। जहां जरूरत है वहां पत्थर भी लगाए जा रहे हैं और कमजोर कडि़यों को पक्का करने के लिए किनारों को मजबूती दी जा रही है। वे कहते हैं कि घग्गर नदी में ही पिछले साल 30 कटाव आए थे। ये सभी पूरी तरह से बंद कर लिए गए हैं। संगरूर जिले में एक दो स्थानों पर काम चल रहा है, उसे भी निपटा लिया जाएगा।

Tuesday, 26 April 2011

कहानी एक नदी की जो गंदा नाला हो गई earth day-1, river ghagger

 मालवा की लाइफ लाइन घग्गर नदी
-चंद साल पहले तक नदी से मछली पकडऩे के ठेके होते रहे, आज सिंचाई लायक भी नहीं पानी
-नदी के पानी से इंसान क्या जानवरों के खुर तक गलने लगे
भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के बंटवारे में झेलम और चेनाब अलग हुई तो दुख सहलाने को  मालवा व बांगर को अलग करने वाले घग्गर दरिया को याद कर कहा जाने लगा कि आज भी हमारे पास चार नदियां तो हैं लेकिन बंटवारे को एक शताब्दी भी ना बीती की सदियों से मालवा की लाइफ लाइन बनी घग्गर नदी गंदे नाले में कब बदल गई किसी को खबर नहीं हुई।
हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के डकशई की 1927 मीटर की उंचाई के अपने उद्गम स्थल से मात्र 10 किलोमीटर आगे बढ़ते ही यह फैक्ट्रियों के प्रदूषित व स्थानीय निकाय के अनट्रीटेड सीवरेज से गंदे नाले में बदलना शुरू होती है। पंजाब में इसका स्वागत एसएएस नगर की सुखना चोअ के साथ आए मणीमाजरा, पंचकुला, जीरकपुर और अंबाला-चंडीगढ़ के सीवरेज भी आ मिलते हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से किए गए एक स्र्वे अनुसार यहां पुल पर बीओडी व सीओडी की मात्रा 132 व 240 एमजी और कैल्शियम व मैग्नीशियम 160 व 52 एमजी पर आ जाता है। जबकि इससे पहले नाईकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों में बीओडी, सीओडी की मात्रा क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम, जिंक 0.46एमजी, कैल्शियम 28 एमजी,व मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया।
चंडीगढ़ के ढ़कांसू नाले के इसमें मिलने के बाद जल जीवन 60 फीसदी से गिर कर 20 फीसदी रह जाता है। इस पानी में किसी भी तरह की मछली 96 घंटे में मर जाती है। स्पष्ट है कि अपनी शुरूआत से दस किलोमीटर पर सीवरेज में बदलना शुरू हुई घग्गर का पानी यहां तक आते आते तेजाबी हो चुका है।
राजस्व विभाग पंजाब के आंकड़े बताते हैं कि घग्गर नदी में पटियाला के समाना शहर से आगे गुरदयाल पुरा बीड़ तक में भी मछलियां पकडऩे के ठेके दिए जाते रहे हैं।
खन्नौरी व मूणक के सीवरेज, शराब फैक्ट्रियों, गन्ना मिलों के अपशिष्ट पदार्थों के मिलने के बाद पानी की हालत इस कदर बिगड़ जाती है कि इसके सींचे जल से पैदा हुई सब्जियों में शीशा, कैडमियम, क्रौमियम, लोहा तय सीमा से कहीं अधिक पाया गया। नदी के दोनो और 250 मीटर की सीमा में नलकूपों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, हालांकि धरती अभी बची हुई है।
बारिश के दिनों में इसके तेजाबीपन में 20 फीसदी की कमी आ जाती है। इन दिनों में कीड़े मकौड़ों के रूप में जीवन पलना शुरू होता है लेकिन इस सीजन के अलावा हरियाणा से आने वाले बुड्डा नाला के गांव सागरा के पास मिलने के बाद इसमें से जीवन सौ फीसदी समाप्त है।
पंजाब में इंसानों के तो क्या जानवरों के खुर तक गला देने वाला पानी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में पीलीया फैलने, पशुओं में मुंह खुर की बिमारियों का कारण बनता है।

Sunday, 13 March 2011

डबलरोल: नदी-नहर किनारे सड़क, बाढ़-ट्रैफिक दोनों नियंत्रित after flood, river ghagger, road, toll tex, traffic


-मुगलकाल से रियासती काल तक होता रहा है सदुपयोग
भूपेश चट्ठा, पटियाला
मेट्रो शहरों के बाद देश में सबसे सघन सड़क यातायात वाले पंजाब की सड़कों पर बढ़ रही वाहनों की संख्या, हर पांच-सात साल में सड़क चौड़ी करने को मजबूर कर रही है। परिणामस्वरूप किसान की जमीन या तो छिनती है या बंट जाती है। पंजाब का खेत लगातार छोटा होता जा रहा है पर ट्रैफिक समस्या से फिर भी बनी हुई, ऐसे में अब नदी-नहरों के सड़के बना दोहरा लाभ लिया जाएगा। एक ओर पक्के किनारे बाढ़ नियंत्रित करेंगे और बिना जमीन अधिग्रहण किए ट्रैफिक नियंत्रित भी हो जाएगा।
दिलचस्प है कि मुगलकाल से रियासती काल और फिर अंग्रेजी शासन में दरिया के किनारों का प्रयोग तो इस तरह से नहीं हुआ अलबत्ता कच्चे-पक्के सूए से नहरों तक सभी की योजना कुछ इसी तरह ही बनती रही है पर आजादी के बाद यह सीमित हो गया। ड्रैनेज विभाग के ही वरिष्ठ अधिकारी बताते है कि पिछली सरकार की ओर राज्य की 107 सड़कों पर टोल टैक्स लगाए जाने के बाद इस ओर सोचना शुरू किया गया। राष्ट्रीय मार्गो पर लगे टोल टैक्स इससे अलग है। जमीन अधिग्रहण आर्थिक व राजनीतिक रूप से  मंहगा साबित होने लगा है।
राज्य में चंडीगढ़ से अंबाला की ओर जाने डेराबस्सी और जीरकपुर के बीच से घग्गर किनारे शंभू के आगे आसानी से मिला जा सकता है। ऐसे ही हाई-वे पर भीड़ कम करने आसान व छोटे रास्तों में भाखड़ा नहर के अलावा, एसवाईएल और सरहिंद फीडर को भी लिया जा सकता है। घन्नौर से अंबाला तक ऐसी ही सड़क चल रही है तो पटियाला से समाना तक का भाखड़ा नहर का चल रहा रास्ता टोल के बाद बंद किया गया। समाना बाई पास पर हुए एक प्रयास ने आए दिन के जाम बंद कर दिए।
रोपड़ के बाईपास को सरहिंद नहर किनारे चमकौर साहिब तक किया गया है, इसे लुधियाना तक बढ़ाया जा सकता है। दोराहा के पास से जिस तरह से नहर का दोहरा प्रयोग हुआ है। राड़ा साहिब से अहमदगढ़ मंडी पुल तक गई नहरी सड़क को बठिंडा तक ले जाया जा सकता है। सतलुज के अलावा रावी दरिया से निकली नहर किनारे सड़क बना, सेना को सौंप,  इसे सीमा क्षेत्र तक खींच सुरक्षा बढ़ाने के अलावा तस्करी रोकने में भी प्रयोग किया जा सकता है।
वहीं पर्यावरणविद् डा. जोगिंदर टाईगर कहते है कि अगर इस ओर कार्य किया जाता है तो वर्तमान सड़कों के किनारे किसान की जमीनों का हो रहा अधिग्रहण रुकेगा और नहरों के किनारे टूटने से भी बचत होगी, खाली पड़ी सरकारी जमीन का सदुपयोग होने के अलावा। नियमित रूप से चलता ट्रैफिक और सड़क की होने वाली जांच किनारे पक्के रखेगी और बाढ़ से भी निजात दिलाएगी। नदी के एक ओर के धूसी बांध पक्के हो सकेंगे और कनेक्टीविटी बढऩे से ग्रामीण क्षेत्रों का विकास होगा।
वहीं प्रदेश के नहरी विभाग के चीफ इंजीनियर इजी. एएस दुल्लत कहते है कि यह सब कनेक्टिविटी पर निर्भर करता है, हर स्थान पर नहीं किया जा सकता। विभाग की ओर से दोराहा से बठिंडा तक बठिंडा ब्रांच पर सड़क बनाए जाने के विचार पर काम चल रहा है। इसी क्रम में अबोहर ब्रांच पर भी सड़क बनाने का प्रस्ताव है। इस योजना पर भी काम चल रहा है।

Tuesday, 21 December 2010

ਵਰਦਾਨ ਸਾਬਤ ਹੋਈ ਘੱਗਰ ਦੀ ਹੜ੍ਹ , ਕੁਦਰਤ ਨੇ ਕਰਜ ਉਤੱਰਿਆ

ਭੂਜਲ
ਘੱਗਰ ਦੀ ਹੜ੍ਹ ਤੋਂ ਜਲਸਤਰ ਸਾੜ੍ਹੇ ਤਿੰਨ ਮੀਟਰ ਤੱਕ ਉੱਤੇ ਉਠਾ
ਦਸ ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਔਸਤ ਮਾਨਸੂਨ ਵਿੱਚ ਮੀਂਹ 377 ਮਿਮੀ . ਤਾਂ ਇਸ ਸਾਲ ਤਿੰਨ ਮਹੀਨੀਆਂ ਵਿੱਚ ਬਰਸਾ 718 ਮਿਮੀ . ਪਾਣੀ
ਭੂਪੇਸ਼ ਚੱਠਾ , ਪਟਿਆਲਾ

ਮਾਨਸੂਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਪਟਿਆਲਾ ਨੂੰ ਹਿੱਲਿਆ ਦੇਣ ਵਾਲੀ ਹੜ੍ਹ ਭੂਜਲ ਪੱਧਰ ਲਈ ਵਰਦਾਨ ਸਾਬਤ ਹੋ ਗਈ ਹੈ । ਘੱਗਰ ਦੀ ਹੜ੍ਹ ਨੇ ਇਸਦੇ ਆਸਪਾਸ ਦੇ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਧਰਤੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਦਾ ਜਲਸਤਰ ਸਾੜ੍ਹੇ ਤਿੰਨ ਮੀਟਰ ਤੱਕ ਉੱਤੇ ਉਠਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ।

ਘੱਗਰ ਦੀ ਸਹਾਇਕ ਨਦੀਆਂ ਮਾਰਕੰਡਾ , ਟਾਂਗਰੀ , ਮੀਰਾਂਪੁਰ ਚੌ , ਪਟਿਆਲਾ ਦੀ ਰਾਵ ਦਾ ਪਾਣੀ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਖੇਤਰਾਂ ਵਿੱਚ ਕੰਡੇ ਤੋੜਕਰ ਫੈਲਿਆ , ਉੱਥੇ ਭੂਮੀਗਤ ਜਲਸਤਰ ਔਸਤਨ ਦੋ ਮੀਟਰ ਤੱਕ ਉੱਤੇ ਆ ਗਿਆ । ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਮਾਨਸੂਨ ਪੂਰਵ ਅਤੇ ਮਾਨਸੂਨ ਦੇ ਬਾਅਦ ਅਕਤੂਬਰ ਵਿੱਚ ਕੀਤੇ ਸਰਵੇਖਣ ਵਿੱਚ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ ਕਿ ਪਾਤੜਾਂ ਬਲਾਕ ਵਿੱਚ ਸਾੜ੍ਹੇ ਤਿੰਨ ਮੀਟਰ , ਭੂਨਰਹੇੜੀ ਬਲਾਕ ਵਿੱਚ ਤਿੰਨ ਮੀਟਰ ਜਲਸਤਰ ਉੱਤੇ ਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੋ ਬਲਾਕਾਂ ਵਿੱਚ ਹੜ੍ਹ ਦੀ ਭੀਸ਼ਨ ਮਾਰ ਪਈ ਸੀ , ਜਦੋਂ ਕਿ ਹੜ੍ਹ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਹੋਰ ਬਲਾਕਾਂ ਘੰਨੌਰ ਵਿੱਚ ਡੇਢ ਮੀਟਰ , ਸੰਨੌਰ ਵਿੱਚ 1 . 30 ਮੀਟਰ , ਭਰਨਾ ਵਿੱਚ ਅੱਧਾ ਮੀਟਰ ਤੱਕ ਭੂਜਲ ਪੱਧਰ ਵਿੱਚ ਸੁਧਾਰ ਵੇਖਿਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਹੜ੍ਹ ਤੋਂ ਸਬਤੋਂ ਜਿਆਦਾ ਅਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਰਹੇ ਪਟਿਆਲੇ ਦੇ ਹੀ ਬਾਕੀ ਬਲਾਕ ਵਿੱਚ ਜਲਸਤਰ ਡਿਗਿਆ ਹੈ । ਹੜ੍ਹ ਨੂੰ ਦੂਰ ਰਹੇ ਬਲਾਕ ਵਿੱਚ ਰਾਜਪੁਰਾ ਵਿੱਚ ਡੇਢ ਮੀਟਰ , ਪਟਿਆਲਾ ( ਸ਼ਹਿਰੀ ) ਵਿੱਚ 0 . 7 ਮੀਟਰ ਅਤੇ ਨਾਭਾ ਵਿੱਚ ਅੱਧਾ ਮੀਟਰ ਹੇਠਾਂ ਖਿਸਕ ਗਿਆ ਹੈ ।

ਹਾਲਾਂਕਿ , ਪਟਿਆਲੇ ਦੇ ਸਹਾਇਕ ਹਾਇਡਰੋਲਾਜਿਸਟ ਡਾ . ਅਰੁਣ ਕੁਮਾਰ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਹੜ੍ਹ ਨੂੰ ਧਿਆਨ ਵਿੱਚ ਰੱਖਕੇ ਕੋਈ ਸਰਵੇਖਣ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ । ਵਿਭਾਗ ਵਲੋਂ ਹਰ ਸਾਲ ਉਕਤ ਦੋਨਾਂ ਮਹੀਨੀਆਂ ਵਿੱਚ ਸਰਵੇਖਣ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਇਸ ਸਾਲ ਪਿਛਲੇ ਦਸ ਸਾਲਾਂ ਦੀ ਔਸਤ ਮਾਨਸੂਨ ਵਿੱਚ ਮੀਂਹ ਤੋਂ ਕਰੀਬ ਦੁੱਗਣੀ ਮੀਂਹ ਤਿੰਨ ਮਾਨਸੂਨੀ ਮਹੀਨੀਆਂ ਜੁਲਾਈ , ਅਗਸਤ ਅਤੇ ਸਿਤੰਬਰ ਵਿੱਚ ਹੋਈ । ਦਸ ਸਾਲ ਦਾ ਔਸਤ 377 ਮਿਮੀ . ਤਾਂ ਇਸ ਸਾਲ ਤਿੰਨ ਮਹੀਨੀਆਂ ਵਿੱਚ 718 ਮਿਮੀ . ਪਾਣੀ ਬਰਸ ਗਿਆ ।

ਸਰਵੇਖਣ ਵਿੱਚ ਇਹ ਵੀ ਸਾਹਮਣੇ ਆਇਆ ਕਿ ਪਟਿਆਲਾ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਵੀ ਅਜਿਹਾ ਬਲਾਕ ਨਹੀਂ ਹੈ ਜੋ ਅਤੀਸ਼ੋਸ਼ਿਤ ਦੀ ਸ਼੍ਰੇਣੀ ਵਿੱਚ ਨਹੀਂ ਹੋ । ਇਹ ਚੌਥੀ ਸ਼੍ਰੇਣੀ ਵਿੱਚ ਖਤਰਨਾਕ ਸੀਮਾ ਦੇ ਪਾਰ ਹੈ । 15 ਤੋਂ 32 ਮੀਟਰ ਦੇ ਵਿੱਚ ਚੱਲ ਰਹੇ ਭੂਜਲ ਪੱਧਰ ਵਿੱਚ ਪਾਤੜਾਂ ਦੀ ਹੀ ਹਾਲਤ ਸਭਤੋਂ ਖ਼ਰਾਬ ਹੈ । ਇੱਥੇ 30 ਮੀਟਰ ਤੋਂ ਹੇਠਾਂ ਹੀ ਹੈ , ਜਦੋਂ ਕਿ ਕੁਲ 16 ਤੈਅ ਸਥਾਨਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਘੰਨੌਰ ਬਲਾਕ ਵਿੱਚ ਘੱਗਰ ਦੇ ਕੰਡੇ ਇੱਕ ਸਥਾਨ ਅਜਿਹਾ ਵੀ ਹੈ ਜਿੱਥੇ ਸਿਰਫ ਦੋ ਮੀਟਰ ਉੱਤੇ ਪਾਣੀ ਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਡਾ . ਅਰੁਣ ਕੁਮਾਰ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਇਸਦੇ ਕਾਰਣਾਂ ਦੀ ਜਾਂਚ ਕੀਤੀ ਜਾਣੀ ਹੈ ॥

Monday, 20 December 2010

वरदान साबित हुई घग्गर की बाढ़, कुदरत ने कर्ज उतरा

भूजल
घग्गर की बाढ़ से जलस्तर साढ़े तीन मीटर तक ऊपर उठा
दस सालों की औसत मानसून में बारिश 377 मिमी. तो इस साल तीन महीनों में बरसा 718 मिमी. पानी
भूपेश चट्ठा, पटियाला

मानसून से पहले ही पटियाला को हिला देने वाली बाढ़ भूजल स्तर के लिए वरदान साबित हो गई है। घग्गर की बाढ़ ने इसके आसपास के क्षेत्रों में धरती के अंदर का जलस्तर साढ़े तीन मीटर तक ऊपर उठा दिया है।

घग्गर की सहायक नदियों मारकंडा, टांगरी, मीरांपुर चौ, पटियाला की राव का पानी जिन क्षेत्रों में किनारे तोड़कर फैला, वहां भूमिगत जलस्तर औसतन दो मीटर तक ऊपर आ गया। कृषि विभाग के मानसून पूर्व व मानसून के बाद अक्टूबर में किए सर्वेक्षण में सामने आया कि पातड़ां ब्लाक में साढ़े तीन मीटर, भूनरहेड़ी ब्लाक में तीन मीटर जलस्तर ऊपर आ गया है। इन्हीं दो ब्लाकों में बाढ़ की भीषण मार पड़ी थी, जबकि बाढ़ प्रभावित अन्य ब्लाकों घन्नौर में डेढ़ मीटर, सन्नौर में 1.30 मीटर, समाना में आधा मीटर तक भूजल स्तर में सुधार देखा गया है। बाढ़ से सर्वाधिक अप्रभावित रहे पटियाला के ही शेष ब्लाक में जलस्तर गिरा है। बाढ़ से दूर रहे ब्लाक में राजपुरा में डेढ़ मीटर, पटियाला (शहरी) में 0.7 मीटर एवं नाभा में आधा मीटर नीचे खिसक गया है।

हालांकि, पटियाला के सहायक हाइड्रोलॉजिस्ट डा. अरुण कुमार कहते हैं कि बाढ़ को ध्यान में रखकर कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया है। विभाग की ओर से हर साल उक्त दोनों महीनों में सर्वेक्षण किया जाता है। इस साल पिछले दस सालों की औसत मानसून में बारिश से करीब दोगुनी बारिश तीन मानसूनी महीनों जुलाई, अगस्त व सितंबर में हुई। दस साल का औसत 377 मिमी. तो इस साल तीन महीनों में 718 मिमी. पानी बरस गया।

सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि पटियाला में कोई भी ऐसा ब्लाक नहीं है जो अतिशोषित की श्रेणी में न हो। यह चौथी श्रेणी में खतरनाक सीमा के पार है। 15 से 32 मीटर के बीच चल रहे भूजल स्तर में पातड़ां की ही स्थिति सबसे खराब है। यहां 30 मीटर से नीचे ही है, जबकि कुल 16 तय स्थानों में से घन्नौर ब्लाक में घग्गर के किनारे एक स्थान ऐसा भी है जहां मात्र दो मीटर पर पानी आ गया है। डा. अरुण कुमार कहते हैं कि इसके कारणों की जांच की जानी है।

Monday, 13 December 2010

ਘੱਗਰ ਦੀ ਹੜ੍ਹ ਨੂੰ ਹਾਸੀ - ਬੁਟਾਨਾ ਤੋਂ ਫਿਰ ਜੋੜਿਆ ਹਰਿਆਣਾ ਨੇ

ਭੂਪੇਸ਼ ਚੱਠਾ , ਪਟਿਆਲਾ
ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਨਾਲ ਪਾਣੀ ਦਾ ਹਰ ਮਾਮਲਾ ਕੇਂਦਰੀ ਪੱਧਰ ਉੱਤੇ ਨਿੱਪਟਾਣ ਦੀ ਇੱਛਾ ਰੱਖਣ ਵਾਲੇ ਹਰਿਆਣਾ ਨੇ ਹਰ ਸਾਲ ਮਾਨਸੂਨ ਵਿੱਚ ਤਬਾਹੀ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲੀ ਘੱਗਰ ਦੀ ਹੜ੍ਹ ਨੂੰ ਨਿਅੰਤਰਿਤ ਕਰਣ ਵਾਲੇ ਪ੍ਰੋਜੇਕਟ ਘੱਗਰ - ਦੂਸਰਾ ਪੜਾਅ ਨੂੰ ਅੱਗੇ ਵਧਾਉਣ ਵਿੱਚ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਰੋੜਾ ਬਣਦੇ ਹੋਏ ਹਾਂਸੀ - ਬੁਟਾਨਾ ਨਹਿਰ ਨੂੰ ਨਾਲ ਜੋੜ ਅੜੰਗਾ ਲਗਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ।
ਪੰਜਾਬ , ਹਰਿਆਣਾ ਅਤੇ ਰਾਜਸਥਾਨ ਦੇ ਕੁੱਝ ਹਿੱਸੀਆਂ ਵਿੱਚ ਮਾਰ ਕਰਣ ਵਾਲੀ ਇਸ ਬਰਸਾਤੀ ਨਦੀ ਉੱਤੇ ਹਰਿਆਣਾ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਘੱਗਰ ਦੀ ਹੜ੍ਹ ਦਾ ਉਪਾਅ ਕਰਣ ਲਈ ਇੱਕ ਫੈਲਿਆ ਯੋਜਨਾ ਬਣੇ ਅਤੇ ਦੂਸਰਾ ਪੜਾਅ ਇਸਦਾ ਇੱਕ ਹਿੱਸਾ ਹੋ । ਜਦੋਂ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਦੋਨਾਂ ਹੀ ਰਾਜਾਂ ਵਿੱਚ ਇਸ ਸਾਲ ਵੀ ਹੜ੍ਹ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲੀ ਨਦੀ ਲਈ ਘੱਟ ਤੋਂ ਘੱਟ ਪੂਰਵ ਵਿੱਚ ਬਣੇ ਪ੍ਰੋਜੇਕਟੋਂ ਨੂੰ ਹਰੀ ਝੰਡੀ ਜਰੂਰ ਮਿਲ ਜਾਵੇ ।
ਕੇਂਦਰੀ ਪਾਣੀ ਕਮਿਸ਼ਨ ਨੇ ਜੁਲਾਈ ਵਿੱਚ ਆਈ ਹੜ੍ਹ ਦੇ ਬਾਅਦ ਤਿੰਨਾਂ ਹੀ ਰਾਜਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਵੱਲ ਤੋਂ ਘੱਗਰ ਨੂੰ ਨਿਅੰਤਰਿਤ ਕਰਣ ਵਾਲੀ ਯੋਜਨਾ ਦੇ ਪ੍ਰਸਤਾਵ ਦੇਣ ਨੂੰ ਕਿਹਾ । ਪੰਜਾਬ ਡਰੇਨੇਜ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਆਧਿਕਾਰਿਕ ਨਿਯਮ ਦੱਸਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਕਤ ਫੈਲਿਆ ਪ੍ਰੋਜੇਕਟ ਲਈ ਤਿੰਨਾਂ ਹੀ ਰਾਜਾਂ ਦਾ ਇੱਕ ਸੰਯੁਕਤ ਸਰਵੇਖਣ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਲੇਕਿਨ ਪੰਜਾਬ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਘੱਗਰ ਦੇ ਦੂਸਰੇ ਪੜਾਅ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਣ ਦੀ ਆਗਿਆ ਪਹਿਲਾਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ ।
ਘੱਗਰ ਦਾ 22 . 5 ਕਿਲੋਮੀਟਰ ਦਾ ਖੰਨੌਰੀ ਤੋਂ ਮਕਰੋੜ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਪਹਿਲਾ ਪੜਾਅ 2009 ਵਿੱਚ ਪੂਰਾ ਹੋ ਚੁੱਕਿਆ ਹੈ । 17 . 5 ਕਿਲੋਮੀਟਰ ਦੇ ਮਕਰੋੜ ਸਾਹਿਬ ਤੋਂ ਹੇਠਾਂ ਦੇ ਵੱਲ ਕਰਹਾਲੀ ਪਿੰਡ ਤੱਕ ਦਾ ਪ੍ਰੋਜੇਕਟ ਕਰੀਬ ਕਰੀਬ ਦਸ ਸਾਲਾਂ ਤੋਂ ਲਟਕ ਰਿਹਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮਾਲਵਾ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਹੁਣ ਤੱਕ ਹੋਇਆ ਲੱਗਭੱਗ ਹਰ ਚੋਣ ਇਸ ਮੁੱਦੇ ਉੱਤੇ ਲੜਿਆ ਜਾਂਦਾ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਉਥੇ ਹੀ ਹਰਿਆਣੇ ਦੇ ਰਵੈਏ ਤੋਂ ਘਬਰਾਇਆ ਹੋਇਆ ਪੰਜਾਬ ਨੇ ਕੜੀ ਆਪੱਤੀਜਤਾਤੇ ਹੋਏ ਕੇਂਦਰੀ ਪਾਣੀ ਕਮਿਸ਼ਨ ਦੀ 25 ਅਗਸਤ ਨੂੰ ਹੋਈ ਬੈਠਕ ਦੇ ਮਿੰਟ ਵਾਪਸ ਭੇਜ ਦਿੱਤੇ ਹਨ ਅਤੇ ਕਮਿਸ਼ਨ ਨੂੰ ਲਿਖ ਭੇਜਿਆ ਹੈ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਦੁਆਰਾ ਬੈਠਕ ਵਿੱਚ ਚੁੱਕੇ ਗਏ ਐਤਰਾਜ ਮਿਨਟਸ ਵਿੱਚ ਦਰਜ ਕੀਤੇ ਜਾਓ । ਇਸਦੇ ਬਾਅਦ 11 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਤਿੰਨਾਂ ਰਾਜਾਂ ਦੀ ਬੈਠਕ ਵਿੱਚ ਹਿੱਸਾ ਲੈਣ ਵਾਲੇ ਪੰਜਾਬ ਡਰੇਨੇਜ ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਚੀਫ ਇੰਜੀਨੀਅਰ ਏਏਸ ਦੁੱਲਤ ਨੇ ਕਿਹਾ ਕਿ ਵਿਅਕਤੀਗਤ ਰੂਪ ਤੋਂ ਹਰਿਆਣੇ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਹਾਂਸੀ - ਬੁਟਾਨਾ ਨਹਿਰ ਨੂੰ ਬਨਣ ਦੇਣ ਦੀ ਗੱਲ ਚੁੱਕਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਦੋਨਾਂ ਕੰਮ ਨਾਲ ਹੋਣ ਜਾਣਗੇ , ਲੇਕਿਨ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕਰੀਬ ਸੌ ਪਿੰਡਾਂ ਲਈ ਇਹ ਕੰਮ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਕਰਣ ਵਾਲਾ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ । ਅਜਿਹੇ ਵਿੱਚ ਸਹਿਮਤੀ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ।

Wednesday, 8 December 2010

घग्गर की बाढ़ को हासी-बुटाना से फिर जोड़ा हरियाणा ने

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के साथ पानी का हर मामला केंद्रीय स्तर पर निपटाने की इच्छा रखने वाले हरियाणा ने हर साल मानसून में तबाही लाने वाली घग्गर की बाढ़ को नियंत्रित करने वाले प्रोजेक्ट घग्गर-द्वितीय चरण को आगे बढ़ाने में एक बार फिर रोड़ा बनते हुए हांसी-बुटाना नहर को साथ जोड़ अड़ंगा लगा दिया है।
पंजाब, हरियाणा व राजस्थान के कुछ हिस्सों में मार करने वाली इस बरसाती नदी पर हरियाणा का कहना है कि घग्गर की बाढ़ का उपाय करने के लिए एक विस्तृत योजना बने और द्वितीय चरण इसका एक हिस्सा हो। जबकि पंजाब चाहता है कि दोनों ही राज्यों में इस साल भी बाढ़ लाने वाली नदी के लिए कम से कम पूर्व में बने प्रोजेक्टों को हरी झंडी जरूर मिल जाए।
केंद्रीय जल आयोग ने जुलाई में आई बाढ़ के बाद तीनों ही राज्यों को अपनी ओर से घग्गर को नियंत्रित करने वाली योजना के प्रस्ताव देने को कहा। पंजाब ड्रेनेज विभाग के आधिकारिक सूत्र बताते हैं कि उक्त विस्तृत प्रोजेक्ट के लिए तीनों ही राज्यों का एक संयुक्त सर्वेक्षण चल रहा है। लेकिन पंजाब चाहता है कि घग्गर के द्वितीय चरण को पूरा करने की अनुमति पहले दी जाए।
घग्गर का 22.5 किलोमीटर का खन्नौरी से मकरोड़ साहिब का पहला चरण 2009 में पूरा हो चुका है। 17.5 किलोमीटर के मकरोड़ साहिब से नीचे की ओर करहाली गांव तक का प्रोजेक्ट करीब करीब दस सालों से लटक रहा है और मालवा क्षेत्र में अब तक हुआ लगभग हर चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा जाता रहा है। वहीं हरियाणा के रवैये से क्षुब्ध पंजाब ने कड़ी आपत्तिजताते हुए केंद्रीय जल आयोग की 25 अगस्त को हुई बैठक के मिनट वापस भेज दिए हैं और आयोग को लिख भेजा है कि पंजाब द्वारा बैठक में उठाए गए ऐतराज मिनट्स में दर्ज किए जाएं। इसके बाद 11 नवंबर को तीनों राज्यों की बैठक में हिस्सा लेने वाले पंजाब ड्रेनेज विभाग के चीफ इंजीनियर एएस दुल्लत ने कहा कि व्यक्तिगत रूप से हरियाणा के अधिकारी उनसे हांसी-बुटाना नहर को बनने देने की बात उठाते रहते हैं और कहते हैं कि दोनों काम साथ हों जाएंगे, लेकिन पंजाब के करीब सौ गांवों के लिए ये काम खुदकुशी करने वाला हो जाएगा। ऐसे में सहमति नहीं दी जा सकती।

Wednesday, 13 October 2010

नदिया बिक गई माटी के मोल ghagger river is just 10 km. long, rest is severage

भूपेश चट्ठा, पटियाला
पंजाब के बंटवारे में झेलम और चेनाब अलग हुई तो दुख सहलाने को मालवा व बांगर को अलग करने वाले घग्गर दरिया को याद कर कहा जाने लगा कि आज भी हमारे पास चार नदियां तो हैं। लेकिन बंटवारे को एक शताब्दी भी न बीती कि सदियों से मालवा की लाइफ लाइन बनी घग्गर नदी गंदे नाले में कब बदल गई किसी को खबर नहीं हुई। मुनाफा कमाने वाले उद्योगों ने इसकी दुगर्ति कर दी। इसे प्रदूषित करके। रही-सही कसर रेत बजरी के धंधेबाजों ने पूरी कर दी। अवैध खनन खनन करके। घग्गर बिखर गई, बिलख गई। हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की डगशाई की 1927 मीटर की ऊंचाई के अपने उद्गम स्थल से मात्र 10 किलोमीटर आगे बढ़ते ही यह फैक्टि्रयों के प्रदूषित व स्थानीय निकाय के अनट्रीटेड सीवरेज से गंदे नाले में बदलना शुरू होती है। पंजाब में इसका स्वागत एसएएस नगर के सुखना चो (नाले) के साथ आए मनीमाजरा, पंचकुला, जीरकपुर और अंबाला-चंडीगढ़ के सीवरेज भी आ मिलते हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से किए गए एक सर्वे के अनुसार यहां पुल पर बीओडी व सीओडी की मात्रा 132 व 240 एमजी और कैल्शियम व मैग्नीशियम 160 व 52 एमजी पर आ जाता है। इससे पहले नाईकेटा पेपर मिल मुबारिकपुर से पहले लिए गए सैंपलों में आर्गेनिक तत्वों में बीओडी, सीओडी की मात्रा क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम, जिंक 0.46एमजी, कैल्शियम 28 एमजी,व मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। चंडीगढ़ के ढ़कांसू नाले के इसमें मिलने के बाद जल जीवन 60 फीसदी से गिर कर 20 फीसदी रह जाता है। इस पानी में किसी भी तरह की मछली 96 घंटे में मर जाती है। स्पष्ट है कि अपनी शुरूआत से दस किलोमीटर पर सीवरेज में बदलना शुरू हुई घग्गर का पानी यहां तक आते आते तेजाबी हो चुका है। राजस्व विभाग पंजाब के आंकड़े बताते हैं कि घग्गर नदी में पटियाला के समाना शहर से आगे गुरदयाल पुरा बीड़ तक में भी मछलियां पकड़ने के ठेके दिए जाते रहे हैं। खन्नौरी व मूणक के सीवरेज, शराब फैक्टि्रयों, गन्ना मिलों के अपशिष्ट पदार्थो के मिलने के बाद पानी की हालत इस कदर बिगड़ जाती है कि इसके सींचे जल से पैदा हुई सब्जियों में शीशा, कैडमियम, क्रोमियम, लोहा तय सीमा से कहीं अधिक पाया गया। नदी के दोनो ओर 250 मीटर की सीमा में नलकूपों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, हालांकि धरती अभी बची हुई है। बारिश के दिनों में इसके तेजाबीपन में 20 फीसदी की कमी आ जाती है। इन दिनों में कीड़े मकोड़ों के रूप में जीवन पलना शुरू होता है लेकिन इस सीजन के अलावा हरियाणा से आने वाले बुड्ढा नाला के गांव सागरा के पास मिलने के बाद इसमें से जीवन सौ फीसदी समाप्त है। जानवरों के खुर तक गला देने वाला पानी पंजाब ही नहीं, राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में पीलिया फैलने, पशुओं में मुंह-खुर की बीमारियों का कारण बनता है। प्रदूषण की मार तो पड़ी ही, कमाई के चक्कर में अवैध खनन करने वालों ने भी इस नदी के किनारों को खोखला कर दिया। पहाड़ से उतर तलहटी में आते ही इसके किनारे दिन रात चोरी छिपे लगे ट्रैक्टरों- ट्रालियों ने नदी का वेग बिगाड़ा।

Friday, 24 September 2010

घग्गर का पानी हांसी-बुटाना में डाला, आशंकाएं शांत ghagger, season is over

भूपेश चट्ठा, पटियाला
हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के ड्रीम प्रोजेक्ट हांसी-बुटाना नहर में पानी न डालने को लेकर पंजाब व हरियाणा दोनों ही आमने-सामने हैं। दोनों राज्यों की सरकारों को वहां के नेताओं से लेकर आम जनता तक का समर्थन भी प्राप्त है लेकिन घग्गर नदी के खतरे के निशान के पास पहुंचते ही इसके आसपास बसे दोनों ही राज्य के कई गांवों ने परस्पर सहमति जताते इसके फाटक खोल घग्गर का पानी डाल दिया है। इस तरह घग्गर से संभावित रूप से होने वाली तबाही की आशंका को लगभग समाप्त कर दिया गया है।

दिलचस्प यह है कि हांसी-बुटाना नहर में पंजाब आम दिनों में भाखड़ा नहर से पानी डालने नहीं दे रहा और बारिश के दिनों में हरियाणा इस बात का पूरा ख्याल रखता है कि कोई इस नहर में पानी न डाल दे। इस बार भी बड़े पैमाने पर सुरक्षा बलों की तैनाती के साथ-साथ स्थायी पुलिस चौकी का निर्माण कर एसडीएम की तैनाती भी कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट में भी मामला चल रहा है।

संभावित रूप से बाढ़ के हालातों से बचने के लिए पंजाब-हरियाणा सीमा पर स्थित कुछ गांवों हरियाणा के कैथल जिले केसरौला, खम्बड़ा, डाबा, चाबा और पंजाब के धर्मेहड़ी के लोगों ने घग्गर नदी के जलस्तर को साढ़े 22 फीट के ऊपर निकलता देख हांसी-बुटाना नहर के फाटक खोल दिए हैं। जानकार कहते हैं कि यहां पर पुलों के निकट पानी 14 फीट पर आते ही पानी डाल दिया जाए लेकिन 23 फीट पर घग्गर नदी का पानी किनारे तोड़ने लगता है। तेज गति से बढ़ रहा जलस्तर यहीं थम गया है।

उधर खन्नौरी पर आरडी-460 पर पानी साढ़े 11 हजार क्यूसिक की रफ्तार के साथ 747.40 फीट पर चल रहा है, यहां 751 फीट तक आसानी से पानी निकल सकता है। ड्रेनेज विभाग के अधिकारी कहते हैं कि वीरवार तक चार से पांच प्वाइंट तक पानी चढ़ रहा था अब यह एक प्वाइंट एक घंटे पर रह गया है।

हरियाणा के अंबाला जिले के साथ लगते पंजाब के सराला गांव में बीते 24 घंटों में घग्गर में पानी का जलस्तर 15 फीट से कम हो 10 फीट पर आ गया है। उधर मारकंडा 20 फीट और टांगरी 14 फीट पर अपने उच्चतम स्तरों पर चल रही हैं, लेकिन शुक्रवार को बारिश न होने के कारण इसमें भी अगले 24 घंटों में कमी आ जाने की संभावना है। केवल मीरांपुर चौ का पानी बाहर निकला है इससे कुछ क्षेत्र में फसल प्रभावित हुई है।
http://in.jagran.yahoo.com/news/local/punjab/4_2_6752870.html

Thursday, 16 September 2010

ghagar; river no more only sewage

अब परिंदे भी पर नहीं मारते
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=46&edition=2010-08-07&pageno=16#
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पहले मछलियां गायब हुई अब पक्षियों को भी पानी नहीं पसंद
प्रवासी पक्षी भी नहीं करते लैंड
20 फीसदी गिरा जलजीवन 96 घंटे में मर जाती है मछली
भूपेश चट्ठा, पटियाला : घग्गर नदी जो पानी ला रही है और जो फिजां बिखेर रही है उसमें परिंदे भी पर नहीं मारते। राजस्व विभाग में जिस नदी में मछलियों के पकड़ने के ठेके दर्ज हैं वहां जल जीवन तो दूर पक्षी भी आना पसंद नहीं कर रहे।
कई दिलकश पक्षी आते थे नजर
पेंटेड स्ट्रोक्स, पीईड एगोसेट्स, ईरोजिन-स्पूनबिल्स, ग्रे हैरोन्स और स्पाट बिल डक्स का इस इस क्षेत्र में भ्रमण करते कुछ साल पहले तक आम दिखते थे लेकिन अब गायब हैं। महेंद्र चौधरी जूलोजिकल पार्क में अक्सर फोटोग्राफी करने जाते रहे पूर्व पत्रकार व लेखक केएस धालीवाल कहते हैं कि घग्गर के किनारों पर सिर्फ इसी क्षेत्र में आप 15-20 पेंटेड स्ट्रोक्स एक साथ दिखाई दे जाते थे, यहां तक कि प्रवासी पक्षियों जिनमें गीज, डक्स के अलावा कई और तरह के इस इलाके में गर्मियों के बाद लेकिन मानसून के विदा होने से पहले आने शुरू हो जाते थे।
सौ किलोमीटर में खूब चहचहाट सोलन के निकट डगशाई की पहाडि़यों के अपने उद्गम स्थल से करीब करीब सौ किलोमीटर दूर तक घग्गर पक्षियों के लिए बेहतरीन स्थान रहा, जीरकपुर से थोड़ा आगे चिडि़या घर के पास की वाटर बॉडी व जंगल क्षेत्र पक्षी व पक्षियों के पे्रमियों के लिए पर्यावरण स्पॉट के रूप में मशहूर था।
मुबारकपुर से लेकर जीरकपुर तक ही घग्गर हो गई मैली
मुबारकपुर से पहले लिए गए सैंपलों में आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्रा क्रमश: 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी 240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया।
प्रदूषण ही है कारण
जल प्रदूषण, नदी के किनारों पर मानव आबादी की कालोनियां बसना और ध्वनि प्रदूषण के साथ सीवरेज को अनट्रीटेड ही छोड़ देना इसका कारण है। क्रस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है। हर साल आने वाला तेज बरसाती पानी सारी गंदगी बहा ले जाता है पर पानी उतरते ही फिर वही रंग चंद दिनों में लौट आता है।
हैबीटेट सही नहीं
ऐसे ही पर्यावरण प्रेमी व फाइव ऐलिमेंट हेल्थ एंड ऐजूकेशनल सोसायटी के डा. जोगिंदर टाइगर कहते हैं कि वनों के नाम पर कीकर और वाटर बॉडी के नाम पर गंदे नाले से बने छप्पड़ पक्षियों को हैबीटेट के रूप में दोगे तो ये नदी तालाबों घाटीयों की बजाए किताबों तस्वीरों में ही दिखाई देंगे।
अब फलदार पौधे लगाने की योजना
फारेस्ट आफिसर एसके सागर कहते हैं कि वन क्षेत्रों मुख्यत: घग्गर नदी के इर्द गिर्द की मोती बाग बीड़ और गुरदयालपुरा बीड़ में एक-एक अतिरिक्त सबमर्सिबल पंप लगाया जा रहा है, जिससे हर मौसम में पानी की उपलब्धता बनी रह सके। वनों में पक्षियों के पसंदीदा फलों के पेड़ लगाने के साथ घास के मैदान का प्लाट गुरदयालपुरा बीड़ में विकसित किया जा रहा है।