Tuesday, 6 March 2012

पांव-खुर गलते थे अब टयूबवेलों के पाइप भी नहीं टिकते, river ghagger, under ground water, pollution, tubewell,


नदी प्रदूषण: अंतिम
-पांच-छह साल में पाइप तो 10-12 साल में ही गल जाती है मोटर
फोटो:1, 2
भूपेश चट्ठा, पटियाला
  जिन जंगलों से नदी गुजरती हो वहां आए साल नलकूप खोदने पड़ते हों, ऐसा नहीं है कि नदी किनारे भूमिगत जल स्तर गिर रहा है लेकिन पानी की कमी हो जाती है। कई बार अचानक टयूबवेल पानी ही देना बंद कर देता है। पंजाब हरियाणा सीमा पर बहने वाली घग्गर नदी के पानी की हालत इन दिनों कुछ ऐसी हो गई है कि टयूबवेल के पाइप गलने लगे हैं और कई स्थानों पर अच्छे मैटल की और पानी में ही डूबने के लिए बनी मोटर भी जंग से जूझ रही होती है।
दरिया के किनारे कम से कम एक सौ मीटर तकके  टयूबवेलों की हालत कुछ ऐसी हो चली है कि हर पांच-छह साल में इनके पाइप बदलने पड़ते हैं जबकि मोटर की हालत 10-12 साल में गलने वाली हो जाती है। धर्मेहड़ी के किसान हरभजन सिंह बताते हैं कि पानी यहां 60 फीट पर ही है और काफी समय से टिका हुआ भी है, लेकिन पाइप के गलने के चलते निचली लैंथ बदलनी ही पड़ती है। दो तीन साल बाद ही डर सताने लगता है कि कहीं  निचले पाइप के च्यादा गलने से मोटर ही बोर के अंदर ना गिर जाए।
जीवन के छह दशक देख चुके किसान जगमिंदर सिंह कहते हैं कि पहले घग्गर नदी का पानी सिंचाई के काम में भी आता था नलकूप की जरूरत तो बाद के सालों में ही पड़ी है। पर अब इनके साथ ही नई मुसीबत भी आ गई है। इन्हें फिर से खोद कर मोटर व पाइप निकाले जाते है हालांकि बोर वही रहता है पर पाइप बदलने में खासा खर्च आता है। एक ही टुकड़ा 12 सौ से उपर का है, खुदाई की लेबर व मशीनरी का खर्च अलग से है। कई बार पानी में गल चुकी मोटर भी बदलनी पड़ जाती है।
क्षेत्र के बाशिंदे याद करते हैं कि अब पशु नदी के पास फटकते नहीं हैं, इंसानों के भी पांव गल जाते है और जानवरों के खुर, क्रिस्टल क्लीयर पानी अब काला-भूरा हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि थापर यूनिवर्सिटी और पीपीसीबी के आठ सदस्यों दल की ओर से की गई छह साल पहले की गई मानिटरिंग में सामने आया कि नाइकेटा पेपर मिल मुबारकपुर से पहले लिए गए पानी के सैंपलों मे आर्गेनिक तत्वों, बीओडी सीओडी की मात्र क्रमश 4.2 व 10 माइक्रो ग्राम पाई गई, जिंक 0.46, कैल्शियम 28, मैग्नीशियम 20 एमजी पाया गया। जीरकपुर के आगे अंबाला-चंडीगढ़ पुल पर बीओडी 132, सीओडी  240 एमजी और कैल्शियम 160 व मैग्नीशियम 52 पर आ गया। जल जीवन गिर कर 20 फीसदी रह गया, किसी भी तरह की मछली इस पानी में 96 घंटों में मर जाती है।  हालात इसके बाद से बिगड़े ही हैं और जीरकपुर के बाद घग्गर में पंजाब हरियाणा के बनूड़, घनौर, सनौर, अंबाला, राजपुरा, पटियाला आदी कई शहरों का सीवर आ मिलता है। और दर्जन भर शराब व गत्ता फैक्ट्रीयां सहित कई इंडस्ट्री अपना योगदान दे रही है।

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